खरीदार और खेत उत्पादकों के बीच एक समझौते पर आधारित है अनुबंध कृषि

जौनपुर

 22-05-2020 09:45 AM
साग-सब्जियाँ

वर्तमान समय में फसलों के अच्छे उत्पादन और गुणवत्ता के लिए उत्पादकों और खरीदारों ने विभिन्न तरीकों या विधियों को विकसित किया है तथा अनुबंध कृषि या खेती भी इसी का ही एक रूप है जो कि मुख्य्तः आलू के उत्पादन से सम्बंधित है। इस प्रकार की कृषि में कृषि उत्पादों के उत्पादन और आपूर्ति के लिए पूर्व-निर्धारित कीमतों पर किसानों और विक्रेता बीच एक समझौता किया जाता है। इस समझौते में फसल के मूल्य और किसान को होने वाले भुगतान आदि सभी आवश्यक चीजों का उल्लेख निहित होता है। इस प्रकार अनुबंध या संविदा खेती में खरीदार और खेत उत्पादकों के बीच एक समझौते के आधार पर कृषि उत्पादन किया जाता है। कभी-कभार खरीदार, आवश्यक गुणवत्ता और कीमत निर्दिष्ट करता है, जिसे किसान भविष्य की तारीख में देने के लिए सहमत हो जाता है। आलू उगाने वाले क्षेत्रों में अनुबंध की खेती लंबे समय से प्रचलित है, विशेष रूप से भारत के सबसे अधिक आलू उत्पादकता वाले क्षेत्रों में, जिसमें जौनपुर सहित उत्तरी मैदान भी शामिल हैं। आलू की खेती के लिए उपयोग की जाने वाली भूमि भारत में दिन पर दिन बढ़ती जा रही है, जिनका उपयोग दोनों प्रकार के आलू (सीधे भोज्य पदार्थ के रूप में खाये जा रहे आलू तथा प्रसंस्कृत आलू) को उगाने के उद्देश्य से किया जा रहा है। अधिक से अधिक किसान अब प्रसंस्कृत ग्रेड किस्में (Process grade varieties) उगा रहे हैं तथा इसका श्रेय पेप्सीको (PepsiCo) और अनुबंध खेती जैसे वैश्विक खाद्य खिलाड़ियों की भागीदारी को दिया जा सकता है।

आलू उगाने वाले क्षेत्रों में, विशेषकर पश्चिम बंगाल में, अनुबंध की खेती लंबे समय से प्रचलित है, पेप्सिको 24,000 किसानों के साथ काम करता है और उन्हें बीज, रासायनिक उर्वरक और बीमा सुविधा प्रदान करता है। बदले में वह पूर्व निर्धारित कीमतों पर फसल वापस खरीद लेते हैं। इस प्रकार यह किसानों और खरीदारों के बीच एक ऊर्ध्वाधर समन्वय है। अनुबंध खेती में किसानों के लिए स्पष्ट लाभ हैं क्योंकि यह उन्हें आलू या भविष्य में किसी अन्य उपज के उत्पादन के लिए तनाव या परेशानी से मुक्त प्रक्रिया प्रदान करता है। भविष्य में भारत में और भी अधिक कॉरपोरेट कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (Corporate Contract Farming) होगी। इसे अक्सर कुछ सरकारी क्षेत्रों में किसानों के लिए एक लाभ के रूप में देखा जाता है। अनुबंध खेती के विरोधी इस प्रकार की मोनो-कल्चर (Mono-culture) प्रक्रिया का विरोध करते हैं तथा इसे एक पारिस्थितिक क्षति कारक के रूप में देखते हैं। क्योंकि इस समय इसके माध्यम से दुनिया भर में केवल एक ही प्रकार की फसल उगाई जा रही है। भारत में, अनुबंध खेती अभी कई महिला किसानों सहित छोटे और सीमांत किसानों से संलग्न नहीं हैं। क्योंकि इन समूहों को बेहतर निवेश वस्तुओं, प्रौद्योगिकी और क्रेडिट (Credit) तक पहुंचने में अधिक सहायता की आवश्यकता होती है। शुरुआत में, खरीददार कम्पनियां किसानों को उनके श्रम और अन्य निवेश लागतों के अनुसार भुगतान करने के लिए सहमत होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वे उन्हें कम भुगतान करना शुरू कर सकते हैं क्योंकि किसानों के पास कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं होता है।

भारत को शीत श्रंखला समाधानों (Cold Chain Solutions) के माध्यम के द्वारा अनुबंध खेती से अपने ताजे फलों और सब्जियों को बचाने में मदद मिल सकती है। यह कृषि पर निर्भर लोगों की संख्या को कम करने में भी मदद कर सकती है। कृषि में कई समस्याएं लगभग आधी आबादी के इस पर निर्भरता के कारण हैं, लेकिन उत्पादकता कम होने के कारण, कृषि सकल घरेलू उत्पाद का केवल 15 प्रतिशत योगदान देती है। कृषि पर निर्भरता कम करना सरकार का एक लक्ष्य है। भारतीय कृषि में पेप्सिको की भागीदारी, किसानों की विश्व स्तरीय कृषि पद्धतियों का लाभ उठाकर भारत में लागत प्रभावी स्थानीयकृत कृषि आधार बनाने के अपने दृष्टिकोण से उपजी है। पेप्सिको इंडिया किसानों के साथ कृषि स्थिरता, फसल विविधीकरण और किसान आय में सुधार के लिए उनकी खेती की तकनीकों को परिष्कृत करने और कृषि उत्पादकता बढ़ाने में मदद करता है। पेप्सिको की खाद्य शाखा फ्रिटो-ले (Frito-Lay), सबसे बड़ी आलू खरीद कंपनी (Company) है और भारत दुनिया भर में उनका तीसरा सबसे बड़ा कार्य क्षेत्र है। इस समय समग्र आलू खरीद में से 50% अनुबंध खेती से आता है। अपनी आलू आपूर्ति के लिए पेप्सिको ने पंजाब, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, पश्चिम बंगाल, गुजरात और महाराष्ट्र में 6,400 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में काम करने वाले 12,000 से अधिक किसानों के साथ काम किया है। यह किसानों को कृषि उत्पादकता और उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार लाने और सतत विकास प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रौद्योगिकी और तकनीकी सलाह प्रदान करता है। इस अनुबंध में किसान, पेप्सिको, बायर क्रॉपसाइंस (Bayer CropScience) शामिल हैं।

अनुबंध से पता चलता है कि उत्पादकों के पास कई जिम्मेदारियां हैं, लेकिन खरीदार की तुलना में अधिकार कम हैं, जोकि उत्पादन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण समर्थन प्रदान नहीं करता है। उत्पादक का दायित्व मुख्य रूप से निर्दिष्ट गुणवत्ता और मात्रा आवश्यकताओं के अनुसार कंपनी को चिप ग्रेड गुणक (Chip Grade Multiplied) आलू बेचना, कंपनी द्वारा प्रदान की गयी रोपण सामग्री का उपयोग केवल अनुबंध के प्रयोजनों के लिए करना, भूमि की तैयारी, सिंचाई, रोपण, पौधों की सुरक्षा के उपाय और कटाई सहित सभी कृषि गतिविधियाँ सम्भालना, कृषि रसायनों और पानी सहित अन्य सभी उत्पादन निवेशी वस्तुओं को खरीदना और उपयोग करना, ठेकेदार के तकनीकी निर्देशों का कड़ाई से पालन करना और खरीदार के प्रतिनिधियों द्वारा हर समय पर्यवेक्षण की अनुमति देना, जहां उत्पादन गतिविधि होती है, उस जमीन से संबंधित सभी कर और लगान का भुगतान करना, पर्याप्त भूमि सुनिश्चित करना, अपने कार्यबल द्वारा की गई गतिविधि को अपने आप देखना (अनुबंध में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उत्पादकों का कार्य बल, कंपनी का प्रत्यक्ष कर्मचारी नहीं माना जायेगा) आदि हैं। जबकि खरीदार का उत्तरदायित्व उत्पादकों से उत्पाद (चिप ग्रेड गुणक आलू) खरीदना, अनुबंध के अनुसार निश्चित मूल्य के साथ-साथ प्रोत्साहन (आवश्यकतानुरूप) का भुगतान करना, उत्पादकों को आलू रोपण सामग्री की आपूर्ति करना आदि हैं।

अनुबंध कृषि में शक्ति असंतुलन के साक्ष्य भी नजर आते हैं अर्थात उत्पादकों के पास अपने उत्पादन के लिए एक आश्वस्त बाजार होता है, लेकिन वहीं दूसरी ओर, असमान संविदात्मक स्थितियां, कंपनी की अपेक्षा उत्पादकों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान नहीं करती हैं। उदाहरण के लिए खरीदार को विशिष्टता की आवश्यकता होती है (उत्पादकों को अपने उत्पादन का 100 प्रतिशत कंपनी को बेचना पड़ता है और यदि वे किसी अन्य पार्टी के साथ समझौता करना चाहते हैं, तो वे कंपनी द्वारा पूर्व सहमति प्राप्त करने के लिए बाध्य होते हैं। कंपनी आवश्यक किस्म की केवल रोपण सामग्री ही प्रदान करती है वो भी तब, जब किसान द्वारा भुगतान किया जाता है। देर से किया गया उत्पाद वितरण प्रक्रिया को नकारात्मक रूप से, विशेष तौर पर उत्पादकों को प्राप्त होने वाले धन को प्रभावित कर सकता है। अगर कम्पनी दोषपूर्ण निवेश वस्तुएं (जैसे- संक्रमित बीज) उपलब्ध कराती है, तो भी उत्पादक से अनुबंध में निर्धारित गुणवत्ता और मात्रा की आवश्यकताओं को पूरा करने का अनुरोध किया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि उत्पादकों को प्रदान की जाने वाली रोपण सामग्री की कीमत कंपनी द्वारा एकतरफा निर्धारित की जाती है।

चित्र (सन्दर्भ):
1. मुख्य चित्र में आलू और फ्रिटोले के उत्पादों के मध्य होने वाले अनुबंध को प्रदर्शित किया गया है।(prarang)
2. दूसरे चित्र में जौनपुर में उत्पादित आलू है। (Pixabay)
3. तीसरे चित्र में पेप्सिको द्वारा २००५ में जारी किया गया आलू उत्पादन चार्ट है। (Prarang)
4. चौथे चित्र में आलू द्वारा बनाये जाने वाले चिप्स का चित्र है। (Pxhere)
5. पांचवे चित्र में आलू की खेती है। (Pexels)
संदर्भ:
1. https://www.orfonline.org/expert-speak/how-to-make-contract-farming-beneficial-for-indian-farmers-50602/
2. https://bit.ly/2XhRMqR
3. http://www.fao.org/in-action/contract-farming/training/module-3/case-study-potato-in-india/en/



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