सद्भाव और समानता का प्रतीक है लंगर

जौनपुर

 12-11-2019 12:22 PM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

भारत एक ऐसा देश है जहां वर्षों से ही विविधता में एकता दिखाई देती रही है तथा इस परंपरा को यहां रहने वाले हर धर्म और संप्रदाय के लोग निभाते चले आ रहे हैं। आज पूरे देश में गुरू नानक देव जी की 550 वीं जयंती मनायी जा रही है। गुरू नानक देव जी सिख धर्म के प्रथम गुरू थे तथा उनके द्वारा दी गयी शिक्षाओं या सिखलाईयों को आज भी उनके अनुयायियों द्वारा निभाया जा रहा है। इस दिन आप प्रत्येक गुरूद्वारे पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देख सकते हैं। प्रत्येक गुरूद्वारे में बड़े पैमाने पर लंगर का आयोजन भी किया जाता है।

वास्तव में लंगर लगाने की परंपरा की शुरूआत स्वयं गुरूनानक देव जी द्वारा ही की गयी थी। माना जाता है कि, 1487 ईसा पूर्व गुरूनानक जी के 18 वें जन्मदिन पर उनके पिता ने उनको एक कार्य सौंपा तथा उनसे अपने विश्वसनीय प्रबंधक, भाई बाला के साथ अपना खुद का व्यवसाय या व्यापार स्थापित करने के लिए कहा। उन्होंने नानक जी को 20 रुपये दिये तथा कुछ ऐसी अच्छी वस्तुएं खरीदकर लाने के लिए कहा जिन्हें बेचकर उन्हें अच्छा लाभ प्राप्त हो। उन्होंने आगे कहा कि यदि वे ऐसा कर पाये तो उन्हें अगली बार वस्तुएं खरीदने के लिए इससे भी अधिक रुपये दिए जायेंगे। उस समय के 20 रुपये आज के 20 लाख रुपये के बराबर हैं। नानक पहले से ही आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे तथा उनका ध्यान केवल लोगों की भलाई और जरूरतमंदों की जरूरतों को पूरा करने की ओर था। उनके लिए इससे अच्छा लाभ कुछ और नहीं हो सकता था। इस प्रकार वे एक फकीरों के समूह के पास गये और उनकी मदद करने का प्रस्ताव रखा किंतु उन्होंने किसी भी प्रकार की भौतिक सहायता को स्वीकार करने से मना कर दिया। अंत में वे भोजन की सहायता स्वीकार करने के लिए राजी हुए।

इस प्रकार जरूरतमंदों के लिए पहला लंगर (मुफ्त भोजन) शुरू हुआ। यह लंगर केवल लोगों को भोजन खिलाने का ही नहीं बल्कि समानता के प्रतीक के रूप में भी उभरा। इस तरह की लंगर व्यवस्था के उदाहरण अन्य स्रोतों से भी प्राप्त होते हैं। सामुदायिक रसोई संस्थानों और स्वयंसेवकों की जड़ें धर्मार्थ भोजन के रूप में भारतीय परंपराओं में बहुत पुरानी हैं। 7 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में चीनी बौद्ध तीर्थयात्री आई चिंग ने भी स्वयंसेवकों द्वारा संचालित ऐसे रसोई आश्रमों के बारे में लिखा था। इसी तरह से गुप्त साम्राज्य काल के हिंदू मंदिरों के साथ धर्मशाला का निर्माण भी किया गया था जहां यात्रियों को नि:शुल्क खाना खिलाया जाता था। सिख धर्म में यह प्रथा पहले सिख गुरू, गुरु नानक देव जी द्वारा शुरू की गयी थी। यह धर्म, जाति, रंग, नस्ल, उम्र, लिंग या सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना सभी लोगों में समानता के सिद्धांत को बनाए रखने के लिए मुख्य रूप से शुरू किया गया था। गुरू नानक देव जी के बाद सिख धर्म के दूसरे गुरु, गुरु अंगद जी ने इस परंपरा को बनाए रखा। तीसरे गुरु, अमर दास जी ने लंगर को एक प्रमुख संस्थान के रूप में स्थापित किया और लोगों को एक साथ मिल-जुल कर भोजन करने को प्रोत्साहित किया।

लंगर को प्रायः निम्नलिखित नियमों के आधार पर बनाया जाता है:
लंगर के लिए कच्चे माल को केवल ईमानदार व्यक्ति ही उपलब्ध करवा सकता है।
आवश्यक रूप से पकाए गए भोजन को यथासंभव व्यापक रूप से वितरित किया जाना चाहिए।
लंगर करने वाले को विनम्र होना चाहिए और लंगर के समय किसी भी प्रकार का अहंकार नहीं करना चाहिए।
धर्म, लिंग, आयु, जाति, पंथ या रंग की परवाह किए बिना सभी को लंगर पंगत (पंक्ति) में बैठकर ग्रहण करना चाहिए।
लंगर को संगत की भावना के साथ परोसा जाना चाहिए। यह मायने नहीं रखता कि कौन सेवा कर रहा है और कौन सेवा का लाभ ले रहा है।
लंगर को उसी भावना से पकाया जाना चाहिए, जैसा कि अपने परिवार और दोस्तों के लिए पकाया जाता है।
लंगर को ताजा पकाया जाना चाहिए और ताजा परोसा जाना चाहिए। इसमें बचे हुए भोजन को शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
लंगर बहुत सादा हो सकता है। अर्थात उसमें दाल रोटी, सब्जी, सलाद, खीर को शामिल किया जा सकता है।
लंगर बिल्कुल शाकाहारी होना चाहिए।

संदर्भ:
1. https://bit.ly/2QcQKul
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Langar_(Sikhism)#Origins
3. https://www.mapsofindia.com/my-india/food/langar-gift-of-guru-nanak-to-humanity
4. https://blogs.scientificamerican.com/food-matters/the-logistics-of-one-of-the-largest-langars/



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