जौनपुर में फव्वारे लगाने से बढ़ सकती है शहर की शोभा

जौनपुर

 13-09-2019 01:32 PM
नगरीकरण- शहर व शक्ति

अक्सर जब भी हम किसी जगह फव्वारे को देखते हैं तो उसकी ओर ना चाहते हुए भी आकर्षित हो जाते हैं। शहरों में फव्वारे आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। जहाँ भी यह दिखते हैं, पर्यटक और स्थानीय जनता इन्हें निहारने के लिए कुछ पल ठहर जाती है और ढलती शाम के समय अक्सर लोग फव्वारों के सामने फोटो (Photo) खिंचवाते हैं। पुराने ज़माने में इन फव्वारों में पीने का पानी चलाया जाता था। लेकिन वर्तमान समय में कई ऐतिहासिक फव्वारों में पीने वाले पानी की आपूर्ति नहीं होती है। ये मात्र सिर्फ एक शोपीस (Show Piece) बनकर रह गए हैं।

फव्वारे लगाने का विचार बगीचों में सर्वप्रथम प्राचीन मध्य पूर्व में आया था। प्राचीन मिस्र की तस्वीरों में समाधियों और घरों के आंगनों में फव्वारे की तस्वीरें देखने को मिलती हैं। फारसियों ने बगीचों और पूलों (Pools) के बाड़े के माध्यम से पानी के फव्वारे का निर्माण किया था और फव्वारे को एक दैनिक आवश्यकता (विशेष रूप से उनके स्नान के अनुष्ठानों के लिए) के रूप में इस्तेमाल किया गया था।

फव्वारों को पानी की व्यावहारिक और सौंदर्य ज़रूरतों के बीच सामंजस्य बनाने के लिए भी डिज़ाइन (Design) किया गया। प्राचीन काल में फव्वारों को सार्वजनिक स्थानों में पानी से संबंधित ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बनाया गया था। इनमें ताज़ा पानी मौजूद होने के साथ-साथ विभिन्न कलात्मक आकृतियाँ भी मौजूद रहती थीं। फारसी उद्यानों में पानी का विशेष रूप से प्रतीकात्मक अर्थ है, लेकिन यह हवा को ठंडा करने और छाया प्रदान करने वाले पौधों को पोषित करने में भी मदद करता है। फव्वारे, आज भी, सामाजिक, प्रतीकात्मक और कलात्मक आदर्शों के सहजीवन के रूप में काम करते हैं।

प्रारंभिक समय में फव्वारों को कलात्मक रूप से विभिन्न आकृतियों में सजाया जाता था, उदाहरण के लिए लोगों (अक्सर देवता, स्वर्गदूतों, अप्सराओं, स्तनधारियों और पौराणिक प्राणियों), जानवरों या पौधों की आकृति में। जैसा कि हमने आपको बताया है कि पहले के फव्वारों से लोग पानी पीते थे, लेकिन आधुनिक पानी के फव्वारे का कार्यात्मक उद्देश्य केवल सजावटी दृश्य प्रदान करना है न कि पानी की आपूर्ति करना।

जौनपुर के किले के अंदर भी काफी पुराना पानी का फव्वारा मौजूद है। इस खूबसूरत विरासत को पुनर्जीवित करने के लिए, जौनपुर के चौराहों पर और भी अधिक फव्वारों की स्थापना करने की ज़रूरत है। जौनपुर की अटाला मस्जिद में भी आकर्षक फव्वारा इस इमारत की शोभा को बढ़ाता है। लेकिन अगर देखा जाए तो सामान्य रूप से फव्वारे आम तौर पर कार्यात्मक होने के लिए नहीं होते हैं। वे सजावटी मूर्तिकला, धन, प्रतिष्ठा और अवनति का प्रतीक हैं और कभी-कभी वे सिर्फ सौन्दर्य को दर्शाते हैं।

संदर्भ:
1.
http://uttarpradesh.gov.in/en/thingstodo/things-to-do/31003400
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Sebil_(fountain)
3. https://theculturetrip.com/middle-east/articles/water-in-islamic-architecture/
4. https://en.wikipedia.org/wiki/Fountain
5. https://www.garden-fountains.com/pages/the-history-of-fountains
6. http://www.arthistoryarchive.com/arthistory/sculpture/Fountains.html



RECENT POST

  • खरोष्ठी भाषा का उद्भव
    ध्वनि 2- भाषायें

     10-07-2020 05:29 PM


  • अत्यधिक रंजित मोम का स्राव करते हैं लाख या लाह कीट
    तितलियाँ व कीड़े

     10-07-2020 05:34 PM


  • भारत के हितों में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का पुनरुद्धार और प्रभावशीलता
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     08-07-2020 06:48 PM


  • भारत में नवपाषाण स्वास्थ्य बदलाव
    सभ्यताः 10000 ईसापूर्व से 2000 ईसापूर्व

     08-07-2020 07:44 PM


  • सूफीवाद पर सबसे प्राचीन फारसी ग्रंथ : कासफ़-उल-महज़ोब
    ध्वनि 2- भाषायें

     07-07-2020 04:55 PM


  • जौनपुर की अद्भुत मृदा
    भूमि प्रकार (खेतिहर व बंजर)

     06-07-2020 03:37 PM


  • आईएसएस को आपकी छत से देखा जा सकता है
    य़ातायात और व्यायाम व व्यायामशाला

     04-07-2020 07:22 PM


  • भारत के दलदल जंगल
    जंगल

     03-07-2020 03:16 PM


  • शाश्वत प्रतीक्षा का प्रतीक है नंदी (बैल)
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     03-07-2020 11:09 AM


  • शिल्पकारों के कलात्मक उत्साह को दर्शाती है पेपर मेशे (Paper mache) हस्तकला
    द्रिश्य 3 कला व सौन्दर्य

     01-07-2020 11:53 AM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.