पंचायत राज का इतिहास

जौनपुर

 05-03-2019 11:11 AM
आधुनिक राज्य: 1947 से अब तक

जैसा की हम सब जानते हैं कि भारत गाँवों का देश है। भारत की अधिकांश जनता गाँवों में ही निवास करती है। प्राचीन काल से ही भारत के प्रत्येक गाँव में पंचायती राज चलता आ रहा है। पंचायत द्वारा ही गाँव के भीतर की समस्याओं का समाधान ढूँढा जाता था। भारत में पंचायत राज के इतिहास को निम्न चरणों में विभाजित किया गया है:

प्राचीन काल
कौटिल्य द्वारा अर्थशास्त्र में राजा को 100-500 परिवारों वाले गांवों की इकाइयों का गठन करने की सलाह दी गयी थी। जिसमें 10 गाँव, 200 गाँव, 400 गाँव और 800 गाँव शामिल थे। इन समूहों को क्रमशः संघराण, कार्तिक, द्रोण मुख और स्थानिय के नाम दिए गए थे। वहीं शहर को पुर कहते थे। चंद्रगुप्त मौर्य के शासन में, सत्ता के विकेंद्रीकरण की नीति को अपनाया गया था। गाँव शासन व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई होती थी। गाँव के लोगों द्वारा चुना गया व्यक्ति ग्रामिक (गाँव का प्रधान) होता था।

गुप्त काल में भी गाँव का प्रधान ग्रामिक होता था और गाँव शासन व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई थी। गुप्त काल के अभिलेखों में ग्राम सभा, ग्राम जनपद और पंच मंडली का उल्लेख है। वहीं दक्षिण भारत में, सातवाहन राज्य पहली शताब्दी ईसा पूर्व से ही अस्तित्व में था। सातवाहन राज्य में शहरों के साथ-साथ गाँवों में भी शासन के लिए स्थानीय निकाय मौजूद थी। चोल शासकों द्वारा गांवों में स्वशासन भी विकसित किया गया था। पूर्वोत्तर भारत में, छोटे गणराज्य थे, जहाँ ग्राम पंचायतें पर्याप्त प्रशासनिक शक्तियों के साथ निहित थीं और राजा का बहुत कम हस्तक्षेप होता था।

मध्यकालीन काल
सल्तनत काल के दौरान, दिल्ली के सुल्तानों को पता था कि भारत जैसे विशाल देश को केंद्र से संचालित करना अव्यावहारिक होगा। इसलिए उन्होंने अपने राज्य को विलायत नामक प्रांतों में विभाजित किया। उसमें अमीर या वली एक प्रांत का प्रमुख होता था। एक गाँव में प्रशासन के लिए तीन महत्वपूर्ण ओविक्मलस-मुक्कदम (oWicmls-Mukkadam) थे, पटवारी राजस्व के संग्रह के लिए होते थे और चौधरी पंच की मदद से विवादों पर निर्णय लेने के लिए होते थे। गाँव सबसे छोटी इकाई हुआ करती थी जहाँ का संचालन लम्बरदार, पटवारी और चौकीदार द्वारा किया जाता था। गांवों में पर्याप्त शक्तियां हुआ करती थी, क्योंकि उनके क्षेत्र में स्व-शासन होता था। राज्य के राजस्व में गाँवों से हो रहा कृषि उत्पादन एक मुख्य स्रोत होता था।

ब्रिटिश काल
वर्ष 1870 में लॉर्ड मेयो द्वारा एक सुझाव दिया गया, उन्होंने नगर निकायों को मजबूत बनाने और उन्हें और अधिक शक्तिशाली बनाने का सुझाव दिया। भारत में 1880 में वायसराय के रूप में आए लॉर्ड रिपन द्वारा स्थानीय स्व सरकारी संकल्प, 1882 लागू किया गया, जो उनके कार्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण कार्य था। 1918 में, मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने सुझाव दिया कि स्थानीय पंचायत को प्रतिनिधि निकाय बनाया जाए। राज्य का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिए और उन्हें अपनी गलतियों से स्वयं सीखना चाहिए। भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने प्रांतीय सरकारों को अधिकार प्रदान किये थे।

स्वतंत्रता के बाद की अवधि
भारत में, भारत के संविधान में अनुच्छेद 40 की शुरुआत पंचायतों के पुनरुद्धार की दिशा में पहला बड़ा कदम था और इसे राज्य नीति निर्देशक सिद्धांतों का एक हिस्सा बनाया गया था।

बलवंत राय मेहता समिति को 1952 में, भारत सरकार ने सामुदायिक विकास और राष्ट्रीय विस्तार सेवा योजना के उद्देश्य से शुरू किया गया था। थिरु बलवंतराय मेहता की अध्यक्षता में इस योजना का अध्ययन करने के लिए एक समूह का गठन किया गया था, जिसने 1957 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। सिफारिशों में शामिल थे, (i) विकास कार्य करने वाले गाँव, खण्ड और जिलों के स्तर पर लोकतांत्रिक से जुड़े संस्थानों का निर्माण करना, (ii) विकास खण्ड (पंचायत संघ) सभी विकास कार्यों के प्रभारी होने चाहिए, (iii) ग्राम पंचायतों को मूलभूत सुविधाओं और अवसंरचनात्मक सुविधाओं के प्रावधानों को अपनाना चाहिए और (iv) जिला परिषदों को पंचायत यूनियनों की गतिविधियों का समन्वय करना चाहिए। भारत सरकार ने ग्रामीण विकास में पंचायती राज संस्था की भूमिका और शक्तियों का अध्ययन करने और उपयुक्त सुझाव देने के लिए 1977 में अशोक मेहता समिति को नियुक्त किया था।

आधुनिक पंचायत प्रणाली
आधुनिक पंचायत प्रणाली में तीन अलग-अलग स्तर होते हैं, ग्राम पंचायत, आँचलिक पंचायत और ज़िला परिषद। विभिन्न स्तरों के लिए विभिन्न प्रकार की शक्तियाँ और कर्तव्य होते हैं। ये स्तर सरकार के निर्देशों का पालन और नीतियों को लागू करने में मदद करते हैं। हाल ही में कुछ राज्यों के पंचायतों द्वारा महिलाओं के लिए आरक्षण भी प्रदान किया गया है। उदाहरण मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और राजस्थान हैं इन राज्यों द्वारा महिलाओं के लिए 50% आरक्षण प्रदान किया गया है। यह एक अच्छी पहल है क्योंकि अधिकांश भारतीय गांवों में पितृसत्तात्मक वातावरण मौजूद है।

भारत द्वारा हर वर्ष 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाया जाता है, इसकी शुरुआत 24 अप्रैल 2010 में की गई थी। इस दिन पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक स्वीकृति मिली थी और इसे संवैधानिक मान्यता भारत के प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव द्वारा उनके कार्यकाल के दौरान दी गई थी। वर्तमान में, भारतीय पंचायती राज मंत्रालय का भविष्य दयनीय है, क्योंकि 2015 में इसे भारी बजट कटौती से गुजरना पड़ा था।

संदर्भ :-
1. https://bit.ly/2ISOer3
2. https://bit.ly/2TnXuYj
3.Image Ref.- www.youtube.com/PANCHAYATI RAJ, VRO & VRA BITES/



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