निकल: एक बहुमूल्य धातु

जौनपुर

 25-02-2019 11:34 AM
खनिज

बहुत से लोगो को पता नहीं है कि पुराने समय में निकल लोगो की एक पसंदीदा धातु थी। यह उनके गर्दन, कलाई और बालों के आभूषण को बनाने में इस्तेमाल किया जाता था। आश्चर्य की बात यह है कि 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में भी निकल को एक कीमती धातु माना जाता था। किन्तु समय के साथ इसकी थोड़ी सी भी मात्रा आभूषणों में मिलाने की प्रथा समाप्त हो गई। ऐसा नहीं है कि इंजीनियर इस धातु में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे थे, बस उस समय तक इसको उपयोग में लाने का कोई तरीका विकसित नहीं किया गया था। संभावना है कि लोगों ने निकल के उपयोग के बारे में कई युगों पहले सीखा था। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में, चीनी लोगो ने तांबा और जस्ता के साथ निकल का एक “पैकफॉन्ग” (Packfong) नामक मिश्र धातु बनाई, जिसकी कई देशों में मांग थी। तत्पश्चात इसे बैक्ट्रिया राज्य में लाया गया, जो आज के मध्य सोवियत एशिया के क्षेत्र में स्थित था। बैक्ट्रियन लोगो ने इससे सिक्के बनाए। उनमें से, 235 ईसा पूर्व में बना एक सिक्का लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में रखा गया है।

स्वीडिश खनिज रसायनज्ञ, क्रोनस्टेड ने निकल को 1751 में निकोलाइट खनिज में खोजा था। लेकिन उस समय, इस खनिज को "कूफ़ेरनिकल" ("तांबे का शैतान") कहा जाता था, जिसके पीछे एक कहानी है। मध्य युग में, सैक्सन खनिक, खदान से अक्सर एक लाल रंग के खनिज से सने हुए आते थे, जिसे वे गलती से तांबा अयस्क समझते थे। बहुत समय तक उन्होंने तांबे को गलाने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन उनकी स्थिति उस फिल्म की तरह थी जिसमे "दार्शनिक पत्थर" के माध्यम से लोग, पशु मूत्र द्वारा सोने का उत्पादन करने की कोशिश करते थे। सैक्सन इस बात से परेशान थे कि उनकी विफलता का कारण क्या हो सकता है। अंत में, उनको यह लगा यह कि “निक” (पहाड़ों की बुरी आत्मा) की कोई चाल है, वह खुद को तांबे की खदान के पत्थरों से चारों ओर से सुरक्षित कर रहा होगा जिससे कोई भी तांबे के एक औंस को भी उसके चंगुल से बाहर न लेजा सके। फलस्वरूप, मध्ययुगीन पुरुषों ने अपनी इस परिकल्पना को प्रमाणित करने का प्रबंधन किया और किसी भी हाल में, लाल खनिज से तांबा प्राप्त करने के लिए और अधिक प्रयास नहीं किए गए और इसे "कॉपर डेविल" नाम देने का निर्णय लिया गया ताकि किसी को भी इसके साथ कुछ भी करने का विचार न आये। खोजी क्रोनस्टेड अंधविश्वासी नहीं था। वह शैतान से डरता नहीं था और कूफ़ेर निकल से एक धातु प्राप्त करता था। हालांकि, यह तांबा नहीं लेकिन एक नया तत्व था जिसे उन्होंने निकल कहा था।

पचास वर्ष बीत जाने के बाद, एक और जर्मन रसायनज्ञ, रिक्टर अयस्क से अपेक्षाकृत शुद्ध निकल निकालने में सफल हुए। यह एक चांदी की तरह सफेद धातु थी जिसमें मुश्किल से भूरे रंग का मिश्रण होता था। फिर भी अभी तक वाणिज्यिक निकल उत्पादन की कोई बात नहीं हुई थी। 1865 में न्यू कैलेडोनिया में निकल अयस्कों के बड़े भंडार खोजे गए थे। उससे पहले जोल्स गार्नियर को फ्रांसीसी उपनिवेश के, खनन विभाग के प्रमुख पद पर नियुक्त किया गया था। गार्नियर ने तुरंत खनिजों की तलाश में एक अच्छी शुरुआत की और वह सफल हुआ और जल्द ही यह पता चला कि वह द्वीप, निकल अयस्क से भरा हुआ है। उस ऊर्जावान भूविज्ञानी के सम्मान में न्यू कैलेडोनियन खनिज को "गार्नियराइट" नाम दिया गया था। लगभग बीस साल बाद कनाडा में, प्रशांत रेलवे के निर्माण के समय श्रमिकों ने तांबा- निकल अयस्कों के जबरदस्त भंडारों को पाया। इन दोनों खोजों ने निकल के व्यावसायिक उत्पादन की शुरुआत के लिए एक शक्तिशाली प्रोत्साहन दिया। लगभग उसी समय धातुविदों ने स्टील की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए निकल की एक महत्वपूर्ण क्षमता की खोज की। 1820 की शुरुआत में प्रसिद्ध अंग्रेजी रसायनज्ञ और प्राकृतिक दार्शनिक माइकल फैराडे ने निकल युक्त स्टील्स बनाने में कई प्रयोग किए थे, लेकिन इसमें स्टील निर्माताओं को रुचि नहीं थी।

पिछली शताब्दी के अंत में सेंट पीटरबर्ग में ओबुखोव संयंत्र को, नौसेना विभाग कि लिये उच्च गुणवत्ता वाले जहाज की कवच प्लेट के निर्माण के लिए एक प्रक्रिया विकसित करने का कार्य दिया गया। उस समय तक ब्रिटिश और फ्रांसीसी नौसेनाएं पहले से ही निकल स्टील से लेपित कवच इस्तेमाल करती थी, जिसकी विशेषज्ञों द्वारा बहुत प्रशंसा की गई थी। कुछ ही समय बाद प्रख्यात रूसी धातुविद् ए.ए. रेज़ेशोटार्स्की को उनके गहन प्रयासों द्वारा नए स्टील के विकास के लिए सफलता मिली। ओबुखोव संयंत्र ने उत्कृष्ट 10-इंच की कवच प्लेट का निर्माण शुरू किया, जो किसी भी तरह से विदेशी उत्पाद से कम नहीं था, लेकिन रेज़ेशोटार्स्की चाहते थे कि यह और भी बेहतर हो। कुछ समय के बाद रेज़ेशोटार्स्की स्टील के कवच बनाने की एक नई प्रक्रिया शुरू करने में सक्षम हुए, जिसमें धातु की बाहरी परत को कार्बन के साथ संतृप्त किया गया। नई धातु अत्यधिक मजबूत और अधिक कठोर बाहरी परत के साथ निर्मित होने लगी। वर्तमान में निकल गुणवत्ता वाले स्टील के लिये उपयोग किया जाता है। इससे निर्मित, सर्जिकल तथा रासायनिक उपकरण और घरेलू वस्तुएं घटक प्रमुख हैं। निकल एक रासायनिक तत्व है जो रासायनिक रूप से संक्रमण धातु समूह का सदस्य है। जिसका उपयोग उच्च श्रेणी के इस्पात निर्माण के लिए किया जाता है। निकल एक मिश्र धातु तत्व के रूप में, स्टेनलेस स्टील के महत्वपूर्ण गुणों को बढ़ाता है। स्टेनलेस स्टील में लौह आधारित मिश्र धातुओं की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल होती है, लेकिन पारंपरिक स्टील के विपरीत स्टेनलेस स्टील जंग के प्रतिरोधी होते हैं और पानी के संपर्क में आने पर इनमें जंग नहीं लगता है। निकल को इस्पात में मिलाकर उसे 'स्टेनलेस' (ज़ंग-रोधक) बनाने के काम करता है। निकल पृथ्वी की सतह पर शुद्ध रूप में नहीं मिलता है यह तांबे, यूरेनियम और अन्य धातुओं के साथ पाया जाता है तथा यह महत्वपूर्ण मिश्र धातु है। यह सख़्त और तन्य होता है। इसलिए निकल स्टील का उपयोग बख्तरबंद प्लेटों, बुलेट जैकेटों के निर्माण के लिए किया जाता है। निकल-एल्यूमीनियम मिश्र धातु का उपयोग हवाई जहाज और आंतरिक दहन इंजन के निर्माण के लिए किया जाता है तथा धात्विक निकल का उपयोग भंडारण बैटरी बनाने में किया जाता है।

2017 में खानों में निकल का विश्व उत्पादन का अनुमान लगभग 2.1 मिलियन मीट्रिक टन का लगाया गया था। निकल खनन में प्रमुख देशों में इंडोनेशिया, फिलीपींस, कनाडा और न्यू कैलेडोनिया शामिल हैं। ब्राजील और रूस के बाद ऑस्ट्रेलिया सबसे बड़ा निकल के भंडार वाला देश है। भारत की बात की जाये तो देश में शुद्ध निकल की वार्षिक मांग लगभग 45,000 टन है और इसका घरेलू बाजार पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। परंतु 2016 में भारत का निकल उत्पादन करने वाली पहली सुविधा हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (एचसीएल) झारखंड द्वारा शुरू की गई। यह निकल, कॉपर और एसिड रिकवरी सयंत्र झारखंड के घाटशिला में स्थित है। यह एलएमई ग्रेड (लंदन मेटल एक्सचेंज-London Metal Exchange) के निकल धातु का उत्पादन करने वाली भारत में एकमात्र इकाई है। इससे उत्पादित धातु का उपयोग मुख्य रूप से स्टेनलेस स्टील बनाने के लिए किया जाता है।

भारत में निकल, ओडिशा के जाजपुर जिले की सुकिंदा घाटी में क्रोमाइट की परतों में निकेलिफेरस लिमोनाइट मिलता है जो ऑक्साइड के रूप में होता है। लगभग 92 फीसदी निकल ओडिशा में मिलता है बाकि का 8 प्रतिशत झारखंड, नागालैंड और कर्नाटक में वितरित है। ये झारखंड के पूर्वी सिंहभूम में निकल, तांबे के खनिज के साथ निकल सल्फाइड के रूप में भी पाया जाता है। साथ ही साथ ये झारखंड के जाडुगुडा में यूरेनियम के भंडार के साथ भी पाया जाता है, और इसकी कुछ मात्रा कर्नाटक, केरल और राजस्थान में भी पाई जाती हैं। समुद्र तल में पॉलीमेटालिक नोड्यूल निकल का एक अन्य स्रोत हैं।

संदर्भ:
1. https://www.pmfias.com/copper-nickel-chromite-distribution/
2. https://www.statista.com/topics/1572/nickel/
3. https://bit.ly/2tBURne



RECENT POST

  • मुगलकालीन प्रसिद्ध व्‍यंजन जर्दा
    स्वाद- खाद्य का इतिहास

     20-10-2020 08:47 AM


  • नौ रात्रियों का पर्व
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     19-10-2020 07:21 AM


  • कोविड-19 से लड़ रहे रोगियों के लिए आशा का स्रोत बना है, गीत ‘येरूशलेमा’
    ध्वनि 1- स्पन्दन से ध्वनि

     18-10-2020 10:10 AM


  • भारत में मिट्टी के स्वस्थ्य के प्रशिक्षण में नहीं बना कोविड-19 रुकावट
    भूमि प्रकार (खेतिहर व बंजर)

     16-10-2020 10:22 PM


  • मनुष्य के अच्छे दोस्त- फायदेमंद कीट
    तितलियाँ व कीड़े

     16-10-2020 05:44 AM


  • महामारी प्रसार का मुख्य कारण माने जाने वाले चूहे, टीके के विकास में अब बन गए हैं
    स्तनधारी

     14-10-2020 04:15 PM


  • क्या है आल्हा रामायण का इतिहास और क्यूँ है वो इतनी ख़ास?
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     13-10-2020 03:03 PM


  • विकास या पतन की और ले जाती सड़कें
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     12-10-2020 03:10 PM


  • रोजगार उत्पन्न करने में सहायक है, जौनपुर निर्मित दरियों का निर्यात
    घर- आन्तरिक साज सज्जा, कुर्सियाँ तथा दरियाँ

     12-10-2020 02:04 AM


  • जलवायु परिवर्तन के एक संकेतक के रूप में कार्य करता है, नोक्टिलुका स्किन्टिलन
    कीटाणु,एक कोशीय जीव,क्रोमिस्टा, व शैवाल

     11-10-2020 03:29 AM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.

    login_user_id