ज़मीन के नीचे कैसे बातें करते हैं जंगल के शांत पेड़?
जंगल ऊपर से जितने शांत और स्थिर दिखते हैं, ज़मीन के नीचे उनकी दुनिया उतनी ही रहस्यमयी और जीवंत होती है। एक स्वस्थ जंगल हर साल कई टन मृत लकड़ी, पत्तियां और जैविक कचरा उत्पन्न करता है। फिर भी, जंगल की ज़मीन कभी भी कचरे के ढेर में नहीं दबती। इसका कारण ज़मीन के नीचे काम करने वाले सूक्ष्मजीवों, मुख्य रूप से कवक और बैक्टीरिया का एक विशाल नेटवर्क है। जौनपुर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में मौजूद वृक्षों के पारिस्थितिकी तंत्र को समझने के लिए, हमें ज़मीन के नीचे मौजूद इस जैविक इंजन को समझना होगा। मृत कार्बनिक पदार्थों का अपघटन वन पारिस्थितिकी तंत्र में कार्बन और नाइट्रोजन चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।वन पारिस्थितिकी तंत्र में गिरे हुए पत्तों और मृत लकड़ियों का क्या होता है?जंगलों में मृत कार्बनिक पदार्थों में मोटे और महीन मृत लकड़ी और गिरे हुए पत्ते शामिल होते हैं। गिरे हुए पत्तों का कचरा वार्षिक पौधे के कचरे का 22 से 81 प्रतिशत तक हो सकता है। ठंडे और गर्म समशीतोष्ण वनों में पर्णपाती पेड़ों द्वारा हर साल 3 से 5 टन प्रति हेक्टेयर पत्तों का कचरा उत्पन्न होता है। यह कचरा मिट्टी के कटाव को रोकता है, बारिश की बूंदों से मिट्टी को बचाता है और सूक्ष्म जलवायु में होने वाले उतार-चढ़ाव से सुरक्षा प्रदान करता है।कवक और बैक्टीरिया इस कचरे के मुख्य अपघटक हैं। कवक अपने विशिष्ट एंजाइमों (enzyme) और हाइफे (hyphae) के माध्यम से नए सबस्ट्रेट्स तक पहुंचने की क्षमता के कारण अपघटन में सबसे बड़ा योगदान देते हैं। अपघटन की यह प्रक्रिया वैश्विक स्तर पर हर साल 60 टेराग्राम कार्बन (60 Tg C) छोड़ती है, जो जीवाश्म ईंधन के जलने से निकलने वाले कार्बन से 11 गुना अधिक है। मृत लकड़ी भी वन मिट्टी के लिए पोषक तत्वों का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जो गिरे हुए पत्तों में नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P), पोटेशियम (K) और कैल्शियम (Ca) के वार्षिक इनपुट का 1 से 18 प्रतिशत योगदान देती है।गिरे हुए पत्तों के भीतर मौजूद कार्बन कोशिका भित्ति के क्षरण के माध्यम से बाहर निकलता है। कोशिका भित्ति के घटकों को उनकी कठोरता के आधार पर तीन समूहों में बांटा जा सकता है: पानी में घुलनशील अणु, हेमीसेल्यूलोज (hemicellulose) व सेल्यूलोज (cellulose), और लिग्निन (lignin) व अन्य सुगंधित यौगिक। पानी में घुलनशील छोटे अणु जैसे अमीनो एसिड और शर्करा आसानी से सुलभ होते हैं और तेजी से बढ़ने वाले सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटित कर दिए जाते हैं। अतीत में बैक्टीरिया की भूमिका को अक्सर नजरअंदाज किया गया था, क्योंकि यह माना जाता था कि वे लकड़ी के पॉलिमर को नष्ट करने में सीमित क्षमता रखते हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में यह सिद्ध हुआ है कि बैक्टीरिया भी लिग्निन को विघटित करने में सक्षम हैं। कचरे में नाइट्रोजन की मात्रा अपघटकों द्वारा अपने चयापचय (metabolic) आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बाहरी नाइट्रोजन के अवशोषण से भी प्रभावित होती है।जंगल के पेड़ ज़मीन के नीचे फंगल माइसीलियम के ज़रिए कैसे संवाद करते हैं?पेड़ केवल निष्क्रिय पौधे नहीं हैं, बल्कि वे कवक के एक भूमिगत नेटवर्क के माध्यम से संवाद करते हैं, जिसे माइकोराइजल नेटवर्क (Mycorrhizal networks) कहा जाता है। इन जटिल प्रणालियों में माइसीलियम (Mycelium) नामक छोटे धागे होते हैं जो पेड़ों की जड़ों के साथ जुड़ जाते हैं। यह कवक नेटवर्क एक सूचना राजमार्ग के रूप में कार्य करता है, जो पेड़ों को संसाधनों और महत्वपूर्ण सूचनाओं को साझा करने की अनुमति देता है। इस अद्भुत संचार नेटवर्क को उचित ही "वुड-वाइड वेब" (wood-wide web) का नाम दिया गया है।अपघटक कवक गिरे हुए पत्तों, शाखाओं और यहां तक कि पूरे पेड़ के तनों को तोड़कर पोषक तत्वों को वापस मिट्टी में छोड़ते हैं। पेड़ों और कवक ने एक असाधारण विनिमय प्रणाली विकसित की है। पेड़ प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) के माध्यम से उत्पन्न होने वाली शर्करा (sugars) का 20 प्रतिशत तक अपने फंगल भागीदारों के साथ साझा करते हैं। बदले में, कवक अपने धागों को मिट्टी में फैलाते हैं, जिससे वे मिट्टी के उस आयतन (volume) का पता लगा सकते हैं जो पेड़ों की जड़ों की तुलना में सैकड़ों गुना बड़ा होता है। ये कवक फास्फोरस और नाइट्रोजन जैसे आवश्यक पोषक तत्व निकालकर पेड़ों को देते हैं।जब किसी पेड़ को किसी बीमारी या शिकारी जीव से खतरा होता है, तो वह माइकोराइजल नेटवर्क या हवा के माध्यम से रासायनिक संकेत (chemical signals) छोड़ सकता है। उदाहरण के लिए, जब एक जिराफ अकैसिया (Acacia) के पत्तों को खाना शुरू करता है, तो पेड़ चोट का पता लगाता है और एथिलीन गैस (ethylene gas) के रूप में एक संकट संकेत छोड़ता है। पड़ोसी अकैसिया पेड़ इसके जवाब में अपने पत्तों में टैनिन (tannins) पंप करते हैं, जिससे उनका स्वाद खराब हो जाता है और जिराफ उन्हें खाने से बचते हैं।मातृ वृक्ष पूरे जंगल को एक साथ कैसे जोड़े रखते हैं?जंगल में सबसे बड़े और सबसे पुराने पेड़ों को मातृ वृक्ष या मातृ पेड़ (Mother trees) कहा जाता है। ये मातृ वृक्ष इस संचार प्रणाली के केंद्र में होते हैं, जो आसपास की वनस्पतियों और जीवों का पोषण करते हैं। ये प्राचीन रक्षक अपने विशाल जड़ प्रणालियों के माध्यम से पोषक तत्वों और सूचनाओं के हस्तांतरण की सुविधा प्रदान करते हैं, जिससे छोटे पेड़ों को पनपने में मदद मिलती है। ये मातृ पेड़ कीटों या बीमारियों जैसे आने वाले खतरों के बारे में पड़ोसी पौधों को चेतावनी भी देते हैं।अनुसंधान बताता है कि अधिक मातृ वृक्षों वाले वनों में अधिक जैव विविधता होती है और वे पर्यावरणीय तनावों के प्रति अधिक लचीले होते हैं। जब किसी मातृ वृक्ष को काट दिया जाता है या हटा दिया जाता है, तो स्थापित जड़ प्रणाली गायब हो जाती है, जिससे पोषक तत्वों का साझाकरण और संचार बाधित हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप पड़ोसी पेड़ों को महत्वपूर्ण संसाधनों और सुरक्षात्मक संकेतों से वंचित होना पड़ता है, जिससे पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है।कवक और पेड़ों की यह साझेदारी जलवायु परिवर्तन और बीमारियों से कैसे बचाती है?कवक और पेड़ों की यह साझेदारी वनों को सूखे और जलवायु परिवर्तन (climate change) से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। फंगल नेटवर्क से जुड़े युवा पेड़ों की जीवित रहने की दर उन पेड़ों की तुलना में काफी बेहतर होती है जो इस नेटवर्क से नहीं जुड़े होते। सूखे के दौरान, कवक पेड़ों को मिट्टी की गहरी परतों से पानी तक पहुंचने में मदद करते हैं। भूमध्यसागरीय (Mediterranean) वनों में किए गए हालिया अध्ययनों से पता चलता है कि अत्यधिक सूखे की घटनाओं के दौरान माइकोराइजल नेटवर्क (mycorrhizal network) से जुड़े पेड़ों में जीवित रहने की दर अलग-थलग पेड़ों की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत अधिक थी।कवक पेड़ों को प्राकृतिक सुरक्षा भी प्रदान करते हैं, एंटीबायोटिक्स (antibiotics) का उत्पादन करते हैं और पेड़ों को मजबूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (immune response) विकसित करने में मदद करते हैं। लू या अत्यधिक गर्मी (heat waves) के दौरान, कवक नेटवर्क से जुड़े पेड़ बेहतर जल पहुंच के माध्यम से अपनी पत्तियों के तापमान को अधिक स्थिर बनाए रखते हैं। ठंडी परिस्थितियों में, कवक एंटीफ्रीज यौगिकों (antifreeze compounds) का उत्पादन करके जड़ों को जमने से होने वाले नुकसान से बचाते हैं। इसके अलावा, यह साझेदारी कार्बन भंडारण (carbon storage) का भी समर्थन करती है। कवक मिट्टी में कार्बन को सीधे ग्लोमालिन (Glomalin) जैसे यौगिकों के माध्यम से जमा करते हैं। यह चिपचिपा प्रोटीन मिट्टी में कार्बन को दशकों या सदियों तक बंद रख सकता है। कवक मिट्टी की संरचना में सुधार करते हैं, जिससे मिट्टी के कण एक साथ बंधते हैं, जल प्रतिधारण (water retention) बढ़ता है और कटाव कम होता है।वनों की कटाई या क्लियर-कटिंग (clear-cutting) उन फंगल समुदायों को नष्ट कर देती है जो शायद सदियों से विकसित हुए हों। इसलिए, वनों की बहाली (forest restoration) के लिए स्थानीय मिट्टी का उपयोग करना, परिपक्व पेड़ों की रक्षा करना और शीर्ष मिट्टी (topsoil) को संरक्षित करना आवश्यक है। समशीतोष्ण और बोरियल वनों में आमतौर पर एक्टोमाइकोराइजल कवक (ectomycorrhizal fungi) पाए जाते हैं, जो जड़ के सिरों के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आवरण बनाते हैं। दूसरी ओर, उष्णकटिबंधीय वनों में अर्बस्कुलर माइकोराइजल कवक (arbuscular mycorrhizal fungi) आम हैं, जो सीधे जड़ कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं। पेड़ों और कवक के इस प्राचीन और गहरे संबंध को समझकर ही हम एक ऐसा भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं जिसमें जौनपुर और पूरी दुनिया के जंगल स्वस्थ, लचीले और आत्मनिर्भर बने रहें।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2dc7jwow 2. https://tinyurl.com/2xzhm4gu 3. https://tinyurl.com/2dy2psqc
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
आईए याद करें, क्यों माना गाँधी जी ने, सत्य, करुणा और नैतिकता को, धर्म के प्रमुख स्तंभ ?
जौनपुर की शांत और सुरीली सुबहों में निकलने वाली प्रभात फेरियों की तरह ही, बापू का जीवन भी आध्यात्मिकता और भजनों की मिठास से भरा हुआ था। गांधी जी के लिए धर्म कभी भी बँटवारे या कट्टरपन का ज़रिया नहीं रहा; उनके लिए तो यह इंसान के दिल में छिपी दिव्यता की एक बहुत ही निजी और दार्शनिक खोज थी। आज के दौर में, जहाँ धर्म को लेकर कई तरह की गलतफ़हमियाँ फैली हुई हैं, वहाँ बापू के विचार हमें एक बिल्कुल नई राह दिखाते हैं। इस लेख में हम महात्मा गांधी के धार्मिक दर्शन, उनके आश्रमों में सबके साथ गाए जाने वाले भजनों की अहमियत, और उनके सबसे प्यारे भजन से मिलने वाले हमदर्दी के संदेश को गहराई से समझेंगे। ये बातें आज के सामाजिक और क़ानूनी माहौल में कितनी सटीक बैठती हैं, यह जानकर आप भी अपनी ज़िंदगी में सच्ची शांति और सबको साथ लेकर चलने की सोच अपना सकेंगे।क्या गांधी जी के लिए धर्म का अर्थ केवल सत्य और नैतिकता की खोज था? पश्चिम बंगाल की रायगंज यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. इति चट्टोपाध्याय के एक रिसर्च पेपर के मुताबिक, गांधी जी का धर्म किसी संस्था या इमारत तक सीमित नहीं था। उनका पक्का यकीन था कि धर्म उन सभी मान्यताओं की जड़ है जो हमें ईश्वर या सच्चाई का एहसास कराता है। उनके लिए 'सत्य ही ईश्वर है' और ईश्वर के प्रति यही लगन सच्चा धर्म है। गांधी जी मानते थे कि कोई भी इंसान धर्म के बिना जी नहीं सकता। यहाँ तक कि भगवान को न मानने वाला नास्तिक इंसान भी किसी न किसी उसूल के रूप में ईश्वरीय ताक़त से जुड़ा होता है। धर्म में इंसान के स्वभाव को साफ़ करने और उसे बेहतर बनाने की गज़ब की ताक़त होती है। उन्होंने सभी धर्मों के बीच आपसी तालमेल, सहनशीलता और सम्मान पर बहुत ज़ोर दिया। बापू का मानना था कि दुनिया में सिर्फ़ एक ही धर्म सच्चा नहीं हो सकता, बल्कि लोगों के हिसाब से कई धर्म हो सकते हैं। एकतरफ़ा सोच रखने के बजाय, हमें सहनशील होना चाहिए। अपनी इस बात को समझाने के लिए उन्होंने सात अंधे लोगों और एक हाथी का मशहूर उदाहरण दिया, जहाँ हर इंसान अपनी-अपनी जगह सही था। इसी 'अनेकांतवाद' यानी बहुलता के सिद्धांत ने उन्हें हर धर्म को उसी के नज़रिए से देखने की समझ दी। बापू ने हिंदू धर्म का निष्काम कर्म, जैन और बौद्ध धर्म की अहिंसा, और ईसाई धर्म के प्यार और माफ़ी जैसे गुणों को खुशी-खुशी अपनाया। उन्होंने ज़बरदस्ती धर्म बदलने का कड़ा विरोध किया। वे कहते थे कि अगर कोई ईसाई व्यक्ति हिंदू धर्म अपनाना चाहता है, तो उसे यह समझाना चाहिए कि जो भागवत में लिखा है, वही बाइबिल में भी है; इसलिए उसे एक और बेहतर ईसाई बनने की कोशिश करनी चाहिए। उनका यह भी मानना था कि जो धर्म रोज़मर्रा की उलझनों को नहीं सुलझाता, वह धर्म कहलाने के लायक़ ही नहीं है। तर्क और नैतिकता उनके धर्म के दो सबसे बड़े खंभे थे। उनका दर्शन 'आध्यात्मिक मानववाद' है, जहाँ इंसान सबसे अहम है और इंसानियत की भलाई ही सबसे बड़ा मक़सद है।आश्रमों में संगीत और 'वैष्णव जन तो' भजन हमें क्या सिखाता है? गांधी जी मानते थे कि संगीत हमारी आत्मा की आवाज़ है। उनके आश्रमों में रोज़ाना एक साथ बैठकर भजन गाने की बहुत प्यारी सी परंपरा थी, जिसने सभी आश्रमवासियों के बीच एकता की भावना को मज़बूत किया। इन भजनों में सबसे ख़ास और उनका सबसे पसंदीदा भजन था—'वैष्णव जन तो तेने कहिये'। यह मशहूर गुजराती भजन 15वीं सदी के महान कवि नरसिंह मेहता ने लिखा था। बापू ने इसे अपनी रोज़मर्रा की प्रार्थनाओं में शामिल किया था और उनकी बैठकों से पहले इसे हमेशा गाया जाता था। इस भजन के बोलों में ज़िंदगी का एक बहुत गहरा फलसफ़ा छिपा है। भजन की पंक्तियाँ कहती हैं कि असली वैष्णव (भगवान का भक्त) वही है जो दूसरों के दर्द को अपना समझे, दूसरों के दुख दूर करके उन पर उपकार करे, लेकिन मन में कभी घमंड न लाए। वह पूरी दुनिया में सबका सम्मान करता है, किसी की बुराई नहीं करता और अपनी बातों, कामों और मन को एकदम साफ़ रखता है। ऐसा इंसान सबको एक नज़र से देखता है, लालच छोड़ देता है, पराई औरत को माँ के समान मानता है, कभी झूठ नहीं बोलता और दूसरे के पैसे को हाथ तक नहीं लगाता। उसके मन में कोई मोह-माया नहीं होती और वह वैराग्य अपनाकर बस राम के नाम में मगन रहता है। महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौक़े पर दुनिया भर के 150 से ज़्यादा देशों के कलाकारों ने राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि देने के लिए इस भजन को अपनी आवाज़ दी। (Armenia) से लेकर (Angola), श्रीलंका से लेकर (Serbia), (Iraq) और (Iceland) तक के मशहूर स्थानीय कलाकारों ने इस भजन की पहुँच को पूरी दुनिया में साबित कर दिया। बापू के दिल के सबसे करीब रहने वाले इस गीत में करुणा और सेवा का गहरा संदेश छिपा है। यह संगीत सिर्फ़ आश्रम के रूटीन का हिस्सा नहीं था, बल्कि आत्मा की आवाज़ भी था। आप गांधी जी के इस प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो' की मधुर प्रस्तुति इस वीडियो लिंक के माध्यम से सुन सकते हैं: जिसने दुनिया भर के श्रोताओं को शांति का संदेश दिया है।क्या न्यायिक प्रणाली में भी गांधीवादी सहानुभूति (एम्पैथी) की आवश्यकता है? सामाजिक न्याय के लिए हमदर्दी या सहानुभूति को सबसे ज़रूरी माना जाता है। सामाजिक न्याय वह आदर्श स्थिति है जहाँ समाज के हर इंसान को बराबर मूल अधिकार, सुरक्षा, मौक़े और सामाजिक फ़ायदे मिलते हैं। इसी सोच को ध्यान में रखते हुए 14 अगस्त 2021 को गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति और जी डी गोयनका यूनिवर्सिटी ने 'न्यायिक सहानुभूति, न्यायशास्त्र और न्याय' विषय पर एक ख़ास लेक्चर आयोजित किया। इस प्रोग्राम में दुनिया के जाने-माने क़ानूनी शिक्षाविद् प्रोफ़ेसर उपेंद्र बक्शी ने अपनी बातें रखीं। कई दशकों तक यह माना जाता था कि क़ानून और न्याय के उसूलों में भावनाओं की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, ताकि सिर्फ़ तर्क और कारण की जीत हो सके। लेकिन अब जानकार यह मानने लगे हैं कि भावनाएँ भी कहीं न कहीं क़ानूनी फैसलों और जजों की सोच पर असर डालती हैं। प्रोफ़ेसर बक्शी ने गांधी जी के प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो' का उदाहरण देते हुए हमदर्दी के मतलब को समझाया। उन्होंने मशहूर केशवानंद भारती मामले का ज़िक्र करते हुए बहुत ही ख़ूबसूरती से बताया कि ऊँचे स्तर पर भी हमदर्दी कैसे काम करती है। प्रोफ़ेसर बक्शी के मुताबिक, हमदर्दी का सीधा सा मतलब है ख़ुद को किसी और की जगह रखकर देखना। इसके दो रूप होते हैं: पहला दिमागी (कोग्निटिव) रूप, जहाँ हम अपने विचारों का इस्तेमाल करके दूसरे के नज़रिए से सोचते हैं। दूसरा जज़्बाती (भावनात्मक) रूप, जहाँ हम असल में वही महसूस करते हैं जो सामने वाला झेल रहा है। सबसे मज़बूत हमदर्दी इन दोनों का मिला-जुला रूप होती है। क़ानून की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए इस हमदर्दी का होना बहुत काम आता है। हर क़ानूनी रिपोर्ट और केस की फ़ाइल के पीछे ऐसे इंसान होते हैं जिनकी ज़िंदगी आर्थिक और मानसिक तौर पर बुरी तरह प्रभावित होती है। हमदर्दी हमें उनके नज़रिए की इज़्ज़त करना सिखाती है।क्या सत्य और अहिंसा का मार्ग ही मानव जाति का अंतिम लक्ष्य है? बापू की पूरी ज़िंदगी इसी सच्चाई और अहिंसा की खोज में गुज़र गई। उन्होंने हमेशा यही माना कि धर्म और नैतिकता एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं; बिना नैतिकता के धर्म एकदम खोखला है। (Brunners) कलेक्शन की तस्वीरों और चित्रों में भी उनके इसी सादे लेकिन बहुत गहरे जीवन-दर्शन की झलक देखने को मिलती है। उनका मानना था कि भगवान अपनी ही बनाई दुनिया में बसता है, इसलिए ग़रीबों की सेवा करना ही ईश्वर की सच्ची पूजा है। कुल मिलाकर, गांधी जी के धर्म की परिभाषा में ऊँच-नीच, स्वर्ग-नरक का डर या ज़बरदस्ती धर्म बदलने जैसी उन बातों की कोई जगह नहीं है जो हिंसा और नफ़रत को बढ़ावा देती हैं। उनका यह 'आध्यात्मिक मानववाद' और भजनों के ज़रिए करुणा का संदेश आज भी हमारे समाज को जोड़ने का बेहतरीन काम कर रहा है। संदर्भ:https://tinyurl.com/25qxv8fmhttps://tinyurl.com/22yzk7qyhttps://tinyurl.com/26hy5tmrhttps://tinyurl.com/26a5r9g2https://tinyurl.com/24mjev2f
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
कंप्यूटर अक्षरों को कैसे समझता है,जानिए एनकोडिंग और आस्की कोड का इतिहास
जब हम तकनीक की बात करते हैं, तो एनकोडिंग एक ऐसा शब्द है जो डेटा स्टोरेज, संचार, प्रोग्रामिंग और मल्टीमीडिया में बार-बार सामने आता है। लेकिन जब आप अपने कीबोर्ड पर कोई अक्षर टाइप करते हैं, तो कंप्यूटर उस अक्षर को सीधे तौर पर नहीं देखता है; वह केवल एक बाइनरी संख्या को समझता है। उस अक्षर को संख्यात्मक रूप में बदलने की प्रक्रिया ही एनकोडिंग कहलाती है। आधुनिक कंप्यूटरों से लेकर स्मार्टफोन तक, हर उपकरण इसी तकनीक पर निर्भर करता है।कंप्यूटर की दुनिया में एनकोडिंग क्या है और यह क्यों जरूरी है?एनकोडिंग (Encoding) सूचना को एक रूप या प्रारूप से दूसरे रूप में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है। आमतौर पर, यह परिवर्तन इसलिए किया जाता है ताकि डेटा को कंप्यूटर और अन्य उपकरणों द्वारा कुशलतापूर्वक संग्रहीत, प्रेषित या संसाधित किया जा सके। इसे एक ऐसे संदेश के अनुवाद के रूप में समझा जा सकता है जिसे प्राप्तकर्ता या सिस्टम सबसे अच्छी तरह समझता है। एनकोडिंग के कई फायदे हैं।सबसे पहले, यह डेटा स्टोरेज में मदद करता है। कंप्यूटर डेटा को बाइनरी में संख्याओं के रूप में संग्रहीत करते हैं। एनकोडिंग टेक्स्ट, इमेज और साउंड जैसे विभिन्न प्रकार के डेटा को बाइनरी में दर्शाने की अनुमति देता है। दूसरा, यह डेटा ट्रांसमिशन के लिए महत्वपूर्ण है। चाहे इंटरनेट पर संदेश भेजना हो या वीडियो स्ट्रीम करना हो, एनकोडिंग डेटा को पैकेज करने में मदद करता है ताकि यह सटीक रूप से यात्रा कर सके। तीसरा, यह अनुकूलता सुनिश्चित करता है, जिससे एक सिस्टम पर बनाया गया डेटा दूसरे सिस्टम पर सही ढंग से पढ़ा जा सके। इसके अलावा, डेटा सुरक्षा के लिए भी एनकोडिंग की भूमिका अहम है।एनकोडिंग के प्रमुख प्रकार कौन-कौन से हैं?डेटा के प्रकार और उसके उपयोग के आधार पर एनकोडिंग कई रूप ले लेती है। कैरेक्टर एनकोडिंग (Character Encoding) अक्षरों, संख्याओं और प्रतीकों को बाइनरी में बदलने के बारे में है ताकि कंप्यूटर टेक्स्ट को समझ और प्रदर्शित कर सके। इसके उदाहरण आस्की, यूटीएफ-8 (UTF-8) और यूनिकोड हैं। यूटीएफ-8 आज दुनिया भर की अधिकांश भाषाओं के लिए एक लोकप्रिय एनकोडिंग है, जो कई अक्षरों और इमोजी का समर्थन करता है।मल्टीमीडिया फाइलों को छोटा करने के लिए ऑडियो और वीडियो एनकोडिंग का उपयोग होता है, जिसमें एमपी3 (MP3) और एएसी (AAC) ऑडियो को कंप्रेस करते हैं, जबकि एच.264 (H.264) और एच.265 (H.265) वीडियो को कंप्रेस करते हैं। संचार के लिए डेटा एनकोडिंग में बेस64 (Base64) बाइनरी डेटा को टेक्स्ट प्रारूप में बदलता है ताकि इसे ईमेल के माध्यम से भेजा जा सके। इसी तरह यूआरएल एनकोडिंग वेबसाइट पतों में विशेष वर्णों को ऐसे प्रारूप में परिवर्तित करता है जिसे ब्राउज़र सुरक्षित रूप से संभाल सकें। प्रोग्रामिंग भाषाओं में जैसे कोटलिन (Kotlin), स्ट्रिंग एनकोडिंग और डिकोडिंग को आसानी से संभाला जा सकता है।आस्की कोड की शुरुआत कब और कैसे हुई थी?आस्की (ASCII) का पूरा नाम अमेरिकन स्टैंडर्ड कोड फॉर इंफॉर्मेशन इंटरचेंज है। 1963 में अमेरिकन नेशनल स्टैंडर्ड इंस्टीट्यूट द्वारा आस्की मानक प्रख्यापित किया गया था, जो कंप्यूटर में अक्षरों, संख्याओं, विराम चिह्नों और नियंत्रण संकेतों का प्रतिनिधित्व करने के लिए सात बिट्स के पैटर्न को निर्दिष्ट करता है। ऐतिहासिक रूप से, आस्की टेलीग्राफिक कोड से विकसित हुआ। इसका पहला व्यावसायिक उपयोग बेल डेटा सेवाओं द्वारा प्रचारित सात-बिट टेलीप्रिंटर कोड के रूप में किया गया था।आस्की पर औपचारिक काम 6 अक्टूबर 1960 को अमेरिकन स्टैंडर्ड एसोसिएशन की X3.2 उपसमिति की पहली बैठक के साथ शुरू हुआ। मानक का पहला संस्करण 1963 में प्रकाशित हुआ था। आस्की में 128 वर्णों की परिभाषाएं शामिल हैं, जिनमें 33 गैर-मुद्रण नियंत्रण वर्ण हैं, 94 मुद्रण योग्य वर्ण हैं, और स्पेस को एक अदृश्य ग्राफिक माना जाता है। 2008 तक वर्ल्ड वाइड वेब पर सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला कैरेक्टर एनकोडिंग आस्की ही था, जिसके बाद यूटीएफ-8 ने इसकी जगह ले ली।यूनिकोड कंसोर्टियम ने वैश्विक भाषाओं को डिजिटल पहचान कैसे दी?यूनिकोड कंसोर्टियम को जनवरी 1991 में कैलिफोर्निया राज्य में शामिल किया गया था। इसकी शुरुआत 1987 में ज़ेरॉक्स (Xerox) के इंजीनियर जो बेकर (Joe Becker) और एप्पल (Apple) के इंजीनियरों ली कॉलिन्स (Lee Collins) और मार्क डेविस (Mark Davis) द्वारा की गई चर्चाओं के बाद हुई। इनका लक्ष्य एक नया कैरेक्टर एनकोडिंग बनाना था, जिसे यूनिकोड (Unicode) कहा गया।प्रारंभिक यूनिकोड मानक 1991 में प्रकाशित हुआ था। इसका लक्ष्य आधुनिक पाठ में सभी वर्णों का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक चर बिट मानक बनाना था, जिसमें सभी लैटिन, एशियाई, ग्रीक, अरबी, सिरिलिक और हिब्रू वर्णमाला, संगीत, अंतर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला, इमोजी और यहां तक कि ब्रेल भी शामिल थे। आधुनिक कंप्यूटर और मोबाइल उपकरणों पर लगभग सभी वर्णों का आधार अब यूनिकोड मानक ही है।डिजिटल ब्रेल लिपि और स्क्रीन रीडर तकनीक कैसे काम करती है?कंप्यूटर और मोबाइल उपकरणों पर ब्रेल डिस्प्ले का उपयोग करते समय, स्क्रीन रीडर ही यह निर्धारित करता है कि कौन से ब्रेल कोड उपलब्ध होंगे। यूनिकोड मानक के कारण, सभी 256 आठ-डॉट ब्रेल वर्णों का यूनिकोड मान U+2800 से U+28ff तक होता है। स्क्रीन रीडर इन वर्णों को ब्रेल में प्रस्तुत करने के लिए जिम्मेदार है। यह एक सुचारू प्रक्रिया है, लेकिन कभी-कभी इसमें तकनीकी समस्याएं भी आती हैं।उदाहरण के लिए, एपोस्ट्रोफी (Apostrophe) वर्ण को लेकर समस्या आती है। यूनिकोड में, अक्सर एपोस्ट्रोफी और एकल क्लोजिंग कोटेशन मार्क दोनों को दर्शाने के लिए एक ही वर्ण का उपयोग किया जाता है। आम पाठकों को यह अंतर दिखाई नहीं देता, लेकिन ब्रेल पाठकों के लिए यह एक समस्या है क्योंकि ब्रेल में एपोस्ट्रोफी और क्लोजिंग कोट पूरी तरह से अलग होते हैं। कई ब्रेल पाठक कॉन्ट्रैक्टेड ब्रेल पढ़ना पसंद करते हैं, जिसके लिए स्क्रीन रीडर एक ब्रेल तालिका तक पहुंचता है जो यह जानकारी प्रदान करती है कि पाठ को कैसे अनुबंधित किया जाना चाहिए।मोबाइल और कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम में ब्रेल कोड के क्या विकल्प मौजूद हैं?एप्पल के आईओएस (iOS) और आईपैडओएस (iPadOS) उपकरणों में वॉयसओवर (VoiceOver) सुविधा के तहत ब्रेल सेटिंग्स मौजूद होती हैं। इसमें आउटपुट और इनपुट के लिए अनकॉन्ट्रैक्टेड 6-डॉट, अनकॉन्ट्रैक्टेड 8-डॉट और कॉन्ट्रैक्टेड ब्रेल के विकल्प मिलते हैं। अनकॉन्ट्रैक्टेड 6-डॉट ब्रेल में बड़े अक्षरों को इंगित करने के लिए डॉट 6 का उपयोग होता है, जबकि 8-डॉट ब्रेल में डॉट 7 का उपयोग किया जाता है। अमेरिका में डिफ़ॉल्ट रूप से इंग्लिश यूनिफाइड (Unified English Braille) टेबल लोड होती है। मैक (Mac) कंप्यूटरों में भी वॉयसओवर यूटिलिटी के तहत इसी तरह की सेटिंग्स और ब्रेल ट्रांसलेशन टेबल्स उपलब्ध होती हैं।एंड्रॉइड (Android) उपकरणों की बात करें तो अगस्त 2022 में एंड्रॉइड 13.0 के जारी होने के साथ ब्रेल सुविधाओं को गूगल के स्क्रीन रीडर टॉकबैक (TalkBack) में एकीकृत किया गया था। जनवरी 2023 में, गूगल ने टॉकबैक 13.1 जारी किया जिसमें ब्रेल तालिकाओं की एक विस्तृत सूची उपलब्ध कराई गई। इसमें 6-डॉट कंप्यूटर ब्रेल और नॉर्थ अमेरिकन ब्रेल कंप्यूटर कोड जैसे विकल्प जोड़े गए, जिससे बीआरएफ (BRF) फाइलें पढ़ना संभव हो सका।विंडोज़ (Windows) पीसी पर सबसे लोकप्रिय स्क्रीन रीडर जॉज़ (JAWS) और एनवीडीए (NVDA) हैं। जॉज़ में दर्जनों भाषाओं के लिए ब्रेल अनुवाद की सुविधा है, जिसमें कंप्यूटर ब्रेल, यूएस इंग्लिश ग्रेड 1 और ग्रेड 2, और यूनिफाइड इंग्लिश ब्रेल के विकल्प मिलते हैं। जॉज़ में 8-डॉट ब्रेल मोड में टेक्स्ट प्रदर्शित करने का विकल्प भी है। एनवीडीए में भी 6-डॉट और 8-डॉट कंप्यूटर ब्रेल के साथ-साथ ग्रेड 1 और ग्रेड 2 के इनपुट और आउटपुट टेबल उपलब्ध हैं। इन सभी तकनीकी प्रगति ने दृष्टिबाधित लोगों के लिए डिजिटल दुनिया को बहुत अधिक सुलभ और समावेशी बना दिया है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/27w69ypr2. https://tinyurl.com/2agpuvfc3. https://tinyurl.com/2augl5st4. https://tinyurl.com/22d972fr
जलवायु और मौसम
जौनपुर वासियों, आज पढ़िए, भारत का अनूठा भौगोलिक परिप्रेक्ष्य कैसे देता है मानसून को जन्म
हम सब, प्रत्येक वर्ष जून महीने की शुरुआत में बारिश की राह देखते हैं। हमारे जौनपुर जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में बारिश जीवनदाता है। मानसून, केवल अधिक बारिश की एक बौछार नहीं है, बल्कि भूमि और महासागर के तापन के अंतर के कारण प्रचलित हवाओं में होने वाला एक बड़ा मौसमी बदलाव है। भारत में तीव्र मानसून इसलिए आता है, क्योंकि विशाल एशियाई भूभाग गर्मियों में तेजी से गर्म होकर कम वायु दाब वाला क्षेत्र बनाता है। इससे हिंद महासागर से उठी नमी से भरी हवाएँ भारतीय उपमहाद्वीप पर बहती हैं, जो फिर हिमालय से टकराकर हमारे क्षेत्र में बारिश बनकर गिरती हैं। इसके विपरीत, यूरोप में कोई वास्तविक मानसून नहीं है। हालांकि, मानसून प्रणालियाँ अन्य स्थानों पर भी मौजूद हैं, जो उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका में मौसमी वर्षा को आकार देती हैं।व्यापक रूप से कहें तो पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में विपरीत ऋतुएँ होती हैं। जैसे-जैसे पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है, पृथ्वी के अक्ष का झुकाव बदलता रहता है। जून, जुलाई और अगस्त महीनों के दौरान पृथ्वी का झुकाव उत्तरी गोलार्ध के हिस्से को सूर्य की ओर अधिक रखता है, और दक्षिणी हिस्सा दूर झुका होता है। दिसंबर, जनवरी और फरवरी महीनों में इसके विपरीत स्थिति होती है। तब दक्षिण गोलार्ध में अधिक प्रकाश, लंबे दिन और अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त होती है। ध्यान दें कि ऋतुओं में परिवर्तन पृथ्वी के इसी झुकाव के कारण होते हैं, और न कि पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी के कारण।भूमध्य रेखा (Equator) के निकट स्थित क्षेत्रों में आमतौर पर केवल दो ही ऋतुएँ होती हैं - वर्षा (मानसून) और शुष्क। चूंकि वे क्षेत्र भूमध्य रेखा (जहाँ सूर्य किरणें हमेशा सीधी गिरती हैं) के पास हैं, इसलिए वर्ष के दौरान उन्हें मिलने वाली प्रकाश की मात्रा में बहुत अधिक बदलाव नहीं होता है।इतिहास में मिस्रवासियों के पास नील नदी के आधार पर तीन ऋतुएँ थीं - बाढ़, वृद्धि और कम पानी। प्रारंभिक ब्रिटेन (Britain) में बेल्टैन (Beltane) त्योहार को गर्मियों की शुरुआत और हैलोवीन (Halloween) त्योहार को इसकी समाप्ति के रूप में चिह्नित किया। रोमन लोग (Roman people)चार ऋतुएँ मानते थे; और यूनानी लोग (Greek people) अपने स्थान के आधार तीन या चार ऋतुएँ मानते थे। जबकि हिंदू कैलेंडर में छह ऋतुएँ हैं।भारत में एक प्रभावशाली उष्णकटिबंधीय मानसून है, क्योंकि विशाल एशियाई भूभाग का तीव्र ग्रीष्मकालीन तापन एक विशाल कम दबाव का क्षेत्र बनाता है। यह क्षेत्र, गर्म हिंद महासागर से नमी से भरी हवाओं को खींचता है। यूरोप में इस प्रणाली का अभाव है, क्योंकि इसका उच्च अक्षांश, छोटा भूभाग और ठंडा अटलांटिक महासागर एक वास्तविक उष्णकटिबंधीय मानसून के लिए आवश्यक तापमान के उतार-चढ़ाव और मौसमी हवा के परिवर्तन को रोकते हैं। इस प्रकार, इन दोनों क्षेत्रों में मुख्य भौगोलिक और जलवायु संबंधी अंतर निम्नलिखित हैं:1. भूमि तापन: भारत उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के पास स्थित है, जहाँ सीधी धूप उपमहाद्वीप और तिब्बती पठार को तीव्रता से गर्म करती है, जिससे एक विशाल गर्म क्षेत्र बनता है। यूरोप और उत्तर में स्थित क्षेत्र अधिक हल्के, क्रमिक तापमान परिवर्तनों का अनुभव करते हैं।2. महासागर का प्रभाव: हिंद महासागर और अरब सागर का गर्म उष्णकटिबंधीय पानी, आसानी से भारी मात्रा में जल वाष्प बनाता है। यूरोप के पास स्थित उत्तर अटलांटिक महासागर ठंडा और अधिक स्थिर है, जो भारी वायुमंडलीय पलटाव को चालना देने में विफल रहता है।3. हवा और दबाव में बदलाव: भारत, मौसमी हवाओं के पूर्ण परिवर्तन का अनुभव करता है (दक्षिण-पश्चिम से आने वाली ग्रीष्मकालीन हवाएँ व उत्तर-पूर्व से आने वाली शुष्क शीतकालीन हवाएँ)। इसके बजाय, यूरोप उष्णकटिबंधीय हवा-पैटर्न में बदलाव के बजाय, साल भर स्थिर मध्यम अक्षांश पश्चिमी हवाओं (Westerly winds) और समशीतोष्ण कम दबाव प्रणालियों के वर्चस्व में रहता है।4. प्राकृतिक अवरोध: भारत में हिमालय ठंडी उत्तरी हवाओं को देश में प्रवेश करने से रोकता है और मानसून की नमी को अवरुद्ध करता है, जिससे वर्षा तेज होती है। यूरोप की मुख्य पर्वत श्रृंखला – आल्प्स (Alps) पश्चिम से पूर्व की ओर खड़ी है और मौसमी उष्णकटिबंधीय वायु द्रव्यमान को अवरुद्ध नहीं कर पाती है।मानसून, केवल एशिया महाद्वीप की विशेषता नहीं है। दरअसल, विश्व में बारिश के लिए एशियाई-ऑस्ट्रेलियाई-अफ्रिकी मानसून (Asian-Australian-African Monsoon) कार्य करता है। उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका के बीच मानसून चक्रों में कुछ समानताएँ हैं, और उनके पीछे निश्चित वायुमंडलीय प्रक्रियाएँ हैं। हालांकि ये दोनों क्षेत्र भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से काफी दूर स्थित हैं, लेकिन इनमें मौसमी हवाओं के रुख में होने वाले बदलाव (Seasonal wind shifts) और वायुमंडलीय परिसंचरण (Atmospheric circulation) की प्रणालियों में गहरी समानता पाई जाती है।दोनों ही क्षेत्रों में, मानसूनी चक्र मुख्य रूप से मौसमी हवाओं की दिशा में होने वाले बड़े पैमाने पर परिवर्तन (Reversal) पर निर्भर करते हैं। ग्रीष्म ऋतु में गर्म भूमि के ऊपर कम वायुदाब का क्षेत्र बनता है, जिससे समुद्र से नमी से भरी हवाएं जमीन की ओर बहती हैं।अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का मौसमी स्थानांतरण, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका दोनों जगहों पर मानसूनी वर्षा को निर्धारित करने में मुख्य भूमिका निभाता है। सूर्य की स्थिति के साथ यह क्षेत्र उत्तर और दक्षिण की ओर स्थानांतरण करता है, जिससे दोनों क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से वर्षा और सूखे मौसम के चक्र उत्पन्न होते हैं।एक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि भौगोलिक भिन्नताओं के बावजूद, वायुमंडल और महासागरों की प्रतिक्रियाओं के कारण दोनों क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा का पैटर्न समान नियमों और प्रक्रियाओं से संचालित होता है। इस प्रकार, इस कार्य में बहु-पैमाने की परस्पर क्रिया के दृष्टिकोण से, एशियाई-ऑस्ट्रेलियाई-अफ्रिकी मानसून को एक एकीकृत इकाई के रूप में माना जाता है।मानसून में योगदान देने वाले ये वायुमंडलीय परिवर्तन, निश्चित सिद्धांतों पर आधारित है। गर्म होने पर हवा फैलती है और ठंडी होने पर संकुचित होती है। इसके परिणामस्वरूप, वायुमंडलीय दबाव में बदलाव होता है। वायुमंडलीय दबाव में अंतर उच्च दबाव से कम दबाव की ओर हवा की गति का कारण बनता है, जिससे हवा गति में आ जाती है। वायुमंडलीय दबाव यह भी निर्धारित करता है कि हवा कब ऊपर उठेगी या नीचे बहेगी।क्षैतिज गति में चलने वाली हवा (Wind), विभिन्न अक्षांशों में गर्मी और नमी को पुनर्वितरित करती है, जिससे पूरे ग्रह के लिए एक स्थिर तापमान बना रहता है। इसके विपरीत, नम हवा के लंबवत रूप से ऊपर उठने से बादल बनते हैं और वर्षा होती है। भूमध्य रेखा के पास समुद्र तल पर हवा का दबाव कम होता है और इस क्षेत्र को भूमध्यरेखीय निम्न (Equatorial low) कहा जाता है। 30° उत्तर और 30° दक्षिण अक्षांशों के साथ उच्च दबाव वाले क्षेत्र पाए जाते हैं, जिन्हें उपोष्णकटिबंधीय उच्च (Subtropical highs) कहा जाता है। ध्रुवों की ओर 60° उत्तर और 60° दक्षिण के साथ, कम दबाव की बेल्ट को उपध्रुवीय निम्न (Subpolar lows) कहा जाता है। ध्रुवों के पास दबाव अधिक होता है और इसे ध्रुवीय उच्च (Polar high) कहा जाता है।ये दबाव बेल्ट प्रकृति में स्थायी नहीं होते हैं। वे सूर्य की स्पष्ट गति के साथ स्थानांतरण करते हैं। वे सर्दियों में उत्तरी गोलार्ध में दक्षिण की ओर और गर्मियों में उत्तर की ओर बढ़ते हैं। उच्च और कम दबाव प्रणालियों के परिणामस्वरूप दबाव में अंतर के दो मुख्य कारण हैं – तापीय और गतिक (Dynamic)। जब हवा गर्म होती है, तो यह फैलती है, और इसलिए इसका घनत्व कम हो जाता है। इससे स्वाभाविक रूप से कम दबाव बनता है। इसके विपरीत, शीतलन से संकुचन होता है। यह घनत्व को बढ़ाता है और इस प्रकार उच्च दबाव की स्थिति पैदा करता है। भूमध्यरेखीय निम्न और ध्रुवीय उच्च का निर्माण क्रमशः तापीय निम्न और तापीय उच्च के उदाहरण हैं।तापमान में बदलाव के अलावा, दबाव बेल्ट के गठन को दबाव प्रवणता बलों (Pressure gradient forces) और पृथ्वी के घूर्णन (कोरियोलिस बल – Coriolis force) से उत्पन्न होने वाले गतिशील नियंत्रणों द्वारा समझाया जा सकता है। संदर्भ1. https://tinyurl.com/7pvpd69c2. https://tinyurl.com/4wabrzte3. https://tinyurl.com/462rhmm2
ध्वनि II - भाषाएँ
जब प्रेस के भूखे मजदूरों के लिए प्रेमचंद ने लुटा दिए थे अपने गरम सूट के पैसे
भारतीय साहित्य में आम जनजीवन, ग्रामीण यथार्थ, किसानों के शोषण और सामाजिक रूढ़ियों को जितनी संवेदनशीलता और गहराई से मुंशी प्रेमचंद ने चित्रित किया है, वैसा उदाहरण विश्व साहित्य में विरले ही मिलता है। 31 जुलाई 1880 को बनारस से चार मील दूर लमही गाँव में जन्मे धनपतराय श्रीवास्तव को आज दुनिया 'उपन्यास सम्राट' और 'कलम के सिपाही' के रूप में जानती है। प्रेमचंद का संपूर्ण जीवन घोर अभावों, पारिवारिक त्रासदियों और लगातार संघर्षों के बीच बीता। किंतु जीवन की भयंकर विषमताओं ने उनकी सृजनशीलता को दबाने के बजाय और अधिक धारदार बना दिया। उन्होंने समाज के वंचितों, गरीबों और उपेक्षितों की पीड़ा को केवल कागज़ पर उकेरा ही नहीं, बल्कि स्वयं उसे हर क्षण जिया भी।धनपतराय का बचपन किन विषम परिस्थितियों और घोर अभावों में बीता?प्रेमचंद का प्रारंभिक जीवन अत्यंत दुखद और संघर्षपूर्ण रहा। उनके पिता अजायब राय डाकखाने में एक मामूली नौकर के रूप में कार्य करते थे। जब धनपतराय केवल आठ वर्ष के थे, तब उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। पिता ने दूसरा विवाह कर लिया, जिसके कारण बालक धनपतराय मातृ-स्नेह से सर्वथा वंचित रह गए। घर में भयंकर गरीबी थी; न पहनने के लिए पर्याप्त कपड़े थे और न ही खाने के लिए भरपेट भोजन। सौतेली माँ का कठोर और उपेक्षित व्यवहार बालक के संवेदनशील मन को भीतर तक कचोटता था, जिसकी टीस बाद में उनकी अनेक प्रसिद्ध कहानियों में पात्रों के माध्यम से परिलक्षित हुई।जब वे केवल 15 वर्ष के थे और नौवीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तब उनके पिता ने बिना सोचे-समझे उनका विवाह एक उम्र में बड़ी और कटुभाषी कन्या से करा दिया। इस बेमेल विवाह से प्रेमचंद का वैवाहिक जीवन अत्यंत कष्टप्रद हो गया। विवाह के ठीक एक वर्ष बाद पिता का भी देहांत हो गया। अचानक 16 वर्ष के किशोर धनपतराय के कंधों पर पाँच सदस्यों—विमाता, उनके दो छोटे बच्चे, पत्नी और स्वयं—के भरण-पोषण का भारी बोझ आ गया। आर्थिक तंगी का यह आलम था कि उन्हें अपना कोट और व्यक्तिगत पुस्तकें तक बेचनी पड़ीं। वे गाँव से बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। आगे चलकर वकील बनने की तमन्ना थी, किंतु गरीबी ने सपने तोड़ दिए। स्कूल आने-जाने के खर्च से बचने के लिए उन्होंने एक वकील के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया, जहाँ उन्हें प्रतिमाह पाँच रुपये मिलते थे। इन पाँच रुपयों में से तीन रुपये वे गाँव में परिवार को भेजते थे और शेष दो रुपयों से महीने भर अभावों के बीच रहकर उन्होंने किसी प्रकार अपनी मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।पुस्तकें पढ़ने की दीवानगी ने कैसे एक सेल्स बॉय को महान लेखक बना दिया?विषम परिस्थितियों के बावजूद साहित्य के प्रति प्रेमचंद का अनुराग कभी कम नहीं हुआ। मिडिल स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही उन्हें उपन्यास पढ़ने का ऐसा चस्का लगा कि वे किताबों की दुनिया में ही अपनी तन्हाई का सुकून ढूँढ़ने लगे। इसी शौक को पूरा करने के लिए उनकी पहली नौकरी एक पुस्तक विक्रेता की दुकान पर 'सेल्स बॉय' के रूप में हुई। वहाँ काम करने का एकमात्र उद्देश्य यह था कि वे दुकान पर बैठकर बिना पैसे खर्च किए अधिक से अधिक उपन्यास पढ़ सकें। दो से तीन वर्षों के भीतर ही उन्होंने कितने ही उर्दू उपन्यास पढ़ डाले।उपन्यास पढ़ने की उनकी दीवानगी इस हद तक थी कि एक उपन्यास पढ़ने के लिए उन्होंने एक तंबाकू विक्रेता से मित्रता कर ली और उसकी दुकान पर बैठकर प्रसिद्ध तिलिस्मी गाथा 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' पूरी पढ़ डाली। कम उम्र में ही उन्होंने अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध उपन्यासकार रोनाल्ड (Ronald) की कृतियों के उर्दू अनुवाद पढ़ लिए थे। 13 वर्ष की आयु में ही उन्होंने पहली व्यंग्यात्मक रचना 'मॉकरी' (Mockery) लिखी, जो उनके एक नाते के मामू (चाचा) पर केंद्रित थी, क्योंकि वे प्रेमचंद को किस्से-कहानियाँ पढ़ने पर डांटते थे। वर्ष 1894 में उन्होंने 'होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात' नामक नाटक लिखा। इसके बाद 1898 में ऐतिहासिक उपन्यास 'रूठी रानी' और 1902 में 'प्रेमा' तथा 1904-05 में 'हम खुर्मा व हम सवाब' उपन्यासों की रचना की, जिनमें विधवा-समस्या का सजीव चित्रण किया गया।'सोज़े वतन' पर अंग्रेज़ों का पहरा और नवाब राय के 'प्रेमचंद' बनने की कहानी क्या है?वर्ष 1905 में पारिवारिक कटुता के चलते पहली पत्नी मायके चली गई और कभी नहीं लौटी, यद्यपि प्रेमचंद वर्षों तक उन्हें खर्चा भेजते रहे। 1905 के अंत में उन्होंने एक बाल-विधवा शीवरानी देवी से दूसरा विवाह किया। इस विवाह के बाद उनके जीवन में कुछ आर्थिक स्थिरता आई और वे शिक्षा विभाग में स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर नियुक्त किए गए।आरंभ में वे 'नवाब राय' के नाम से उर्दू में लिखते थे। वर्ष 1907 में उनका पाँच देशभक्तिपूर्ण कहानियों का ऐतिहासिक संग्रह 'सोज़े वतन' (वतन का दुख-दर्द) प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में स्वाधीनता और देशप्रेम की ऐसी प्रखर भावना थी कि अंग्रेज़ी हुकूमत सतर्क हो गई। अंग्रेज़ शासकों ने इसे खुली बगावत मानते हुए नवाब राय को तलब किया। ब्रिटिश अधिकारियों ने प्रेमचंद के सामने ही 'सोज़े वतन' की सभी उपलब्ध प्रतियों को आग के हवाले कर दिया और उन पर बिना पूर्व अनुमति के लिखने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।सरकारी नौकरी और इस प्रशासनिक बंधन के कारण लेखन जारी रखना कठिन हो गया। तब प्रेमचंद ने अपने घनिष्ठ मित्र और 'ज़माना' पत्रिका के संपादक मुंशी दयानारायण निगम से परामर्श किया। मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें गुप्त रूप से 'प्रेमचंद' नाम से लिखने का बहुमूल्य सुझाव दिया। इसके बाद धनपतराय हमेशा के लिए 'प्रेमचंद' बन गए, और पाठकों ने आदरपूर्वक उनके नाम के आगे 'मुंशी' की मानद उपाधि जोड़ दी।सरकारी नौकरी छोड़कर गांधीजी के आंदोलन में क्यों कूद पड़े थे प्रेमचंद?प्रेमचंद केवल कलम के धनी नहीं थे, बल्कि एक सच्चे राष्ट्रभक्त भी थे। जब महात्मा गांधी ने 1920 के दशक में देशव्यापी असहयोग आंदोलन का आह्वान किया, तो प्रेमचंद ने अपने बढ़ते हुए परिवार के भरण-पोषण की भारी चिंताओं के बावजूद अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी (डिप्टी इंस्पेक्टर पद) से तत्काल त्यागपत्र दे दिया।उनका स्पष्ट मानना था कि राष्ट्र की आज़ादी के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा का बलिदान देना आवश्यक है। उन्होंने साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का हथियार बनाया और वाराणसी में 'सरस्वती प्रेस' की स्थापना की। जीवन की सार्थकता पर उनका एक प्रसिद्ध कथन आज भी प्रासंगिक है: "जीवन में सफल होने के लिए जिस चीज़ की आवश्यकता है, वह शिक्षा है; केवल साक्षरता और डिग्रियाँ नहीं।"'कफ़न' से लेकर 'गोदान' तक: प्रेमचंद की अमर कहानियों और उपन्यासों का क्या मर्म है?प्रेमचंद ने अपने जीवनकाल में दर्जनों अमर उपन्यासों और 300 से अधिक कहानियों की रचना की, जो भारतीय समाज का दर्पण हैं:गोदान (1935-36): इसे भारतीय साहित्य का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माना जाता है। यह किसान होरी की गाय पालने की अधूरी लालसा और महाजनी व्यवस्था, कर्ज तथा जातिगत शोषण के दुष्चक्र की हृदयविदारक गाथा है। उनका अंतिम उपन्यास 'मंगलसूत्र' अधूरा रह गया था।कफ़न: घीसू और माधव की यह कहानी भीषण गरीबी द्वारा मानवीय संवेदनाओं और गरिमा के क्षरण की पराकाष्ठा को दिखाती है, जहाँ प्रसव पीड़ा से मरी बुधिया के कफ़न के पैसों से दोनों शराब और पूरियाँ खा जाते हैं।ईदगाह: अनाथ बालक हामिद और उसकी बूढ़ी दादी अमीना के अगाध प्रेम की कहानी। मेले में खिलौने और मिठाइयों के बजाय दादी की उँगलियों को तवे से जलने से बचाने के लिए चिमटा खरीदना बाल-मन के अप्रतिम त्याग को दर्शाता है।पूस की रात: गरीब किसान हल्कू और उसके वफ़ादार कुत्ते जबरा की यह कहानी भीषण ठंड, लगान और कर्ज के दबाव में खेत बर्बाद होने की बेबसी को उकेरती है।नमक का दारोगा: मुंशी वंशीधर की अटूट सत्यनिष्ठा और भ्रष्ट पूंजीपति पंडित अलोपीदीन के घमंड को चूर करने वाली यह कथा धर्म और धन के संघर्ष का शाश्वत संदेश देती है।पंच परमेश्वर: अलगू चौधरी और जुम्मन शेख़ की मित्रता और न्याय के सर्वोच्च आसन पर बैठकर व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर उठने की सीख।दो बैलों की कथा: हीरा और मोती नामक दो बैलों की निष्ठा और आज़ादी की तड़प के माध्यम से मानवीय स्वतंत्रता का रूपक।बूढ़ी काकी: संपत्ति हड़प लेने के बाद परिवार द्वारा उपेक्षित अंधी वृद्धा की दयनीय स्थिति का मर्मस्पर्शी चित्रण।बड़े घर की बेटी: संयुक्त परिवार की मर्यादा, स्वाभिमान और आपसी सामंजस्य की कहानी।सती: पारंपरिक समाज में नारी पर थोपे गए बंधनों, विधवापन और सम्मान के नाम पर होने वाले उत्पीड़न की तीखी आलोचना।सादगी, मानवीय करुणा और अनीश्वरवाद: प्रेमचंद के व्यक्तित्व का क्या रहस्य था?मुंशी प्रेमचंद स्वभाव से अत्यंत सरल, हंसमुख और दिखावे से कोसों दूर रहने वाले व्यक्ति थे। वे सदैव ठेठ गंवई लिबास पहनते थे और जीवन की बड़ी से बड़ी विपत्ति का सामना मुस्कुराते हुए करते थे। मुंशी दयानारायण निगम को लिखे एक पत्र में उन्होंने सूरदास का स्मरण करते हुए लिखा था: "हमारा काम तो खूब जी-तोड़ खेलना है... पटखनी खाने के बाद धूल झाड़कर खड़े हो जाना चाहिए और कहना चाहिए कि तुम जीते हम हारे, पर हम फिर लड़ेंगे।"उनकी मानवीय करुणा का उदाहरण उनकी पत्नी शीवरानी देवी के संस्मरण से मिलता है। एक बार कड़ाके की ठंड में प्रेमचंद को गरम सूट बनवाने के लिए दो बार 40-40 रुपये दिए गए। उन्होंने दोनों बार वे रुपये अपनी सरस्वती प्रेस के भूखे मजदूरों में बाँट दिए। पत्नी के विरोध करने पर उन्होंने सहजता से कहा: "यह कहाँ का इंसाफ़ है कि हमारी प्रेस के मजदूर भूखे मरें और हम गरम सूट पहनकर घूमें।"जीवन भर गरीबी, अन्याय और पीड़ितों की बेबसी देखने के कारण वे पारंपरिक ईश्वरवादी नहीं रह सके। उन्होंने प्रसिद्ध लेखक जैनेंद्र कुमार को लिखा था कि "मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।" यहाँ तक कि मृत्यु से कुछ घंटे पूर्व भी उन्होंने कहा था कि "मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।"वर्ष 1936 में गंभीर रूप से अस्वस्थ होने के बावजूद उन्होंने 'प्रगतिशील लेखक संघ' के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता की। उचित इलाज और साधनों के अभाव में 8 अक्टूबर 1936 को यह महान ज्योतिपुंज सदा के लिए बुझ गया, किंतु उनकी लेखनी आज भी शोषितों और वंचितों के अधिकारों की सबसे बुलंद आवाज़ बनी हुई है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2cn7wkkp2. https://tinyurl.com/23p9s9r63. https://tinyurl.com/233x7ytw
बैक्टीरिया, प्रोटोज़ोआ, क्रोमिस्टा और शैवाल
स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू में क्या है अंतर जिसे जानना है आपके लिए ज़रूरी?
हर साल इन्फ्लूएंजा यानी फ्लू दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करता है, जिसके कारण कई लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है और कई मामलों में यह जानलेवा भी साबित होता है। जब भी फ्लू के विभिन्न प्रकारों की बात होती है, तो स्वाइन फ्लू का नाम सबसे प्रमुखता से सामने आता है। यह एक ऐसा श्वसन संक्रमण है जिसने दुनिया भर के लोगों और स्वास्थ्य प्रणालियों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। हालांकि स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों ही इन्फ्लूएंजा वायरस के कारण होते हैं, लेकिन इनकी उत्पत्ति, लक्षणों की गंभीरता और प्रभावित करने के तरीके में बहुत बड़ा अंतर है। आज के समय में इन दोनों के बीच के अंतर को समझना और सही सावधानियाँ बरतना बेहद ज़रूरी है।स्वाइन फ्लू क्या है? स्वाइन फ्लू एक प्रकार का वायरल संक्रमण है जिसे एच वन एन वन (H1N1) वायरस के नाम से भी जाना जाता है। इस बीमारी का नाम स्वाइन फ्लू इसलिए पड़ा क्योंकि यह इन्फ्लूएंजा वायरस के उस प्रकार से काफी मिलता-जुलता है जो सूअरों में श्वसन तंत्र की बीमारी का कारण बनता है। समय के साथ इस वायरस के जीन में बदलाव हुए और यह इंसानों को भी संक्रमित करने लगा। यह वायरस मुख्य रूप से श्वसन तंत्र यानी नाक, गले और फेफड़ों को अपना शिकार बनाता है। एक बहुत बड़ी गलतफहमी यह है कि स्वाइन फ्लू सूअर का मांस खाने से फैलता है, जबकि चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अच्छी तरह से पकाया गया मांस खाने से यह संक्रमण बिल्कुल नहीं होता है।साल 2009 की स्वाइन फ्लू महामारी ने दुनिया को कैसे प्रभावित किया? अप्रैल 2009 में अमेरिका और मैक्सिको में एच वन एन वन वायरस का एक बिल्कुल नया प्रकार सामने आया था। क्योंकि यह वायरस नया था, इसलिए युवाओं और बच्चों में इसके प्रति कोई रोग प्रतिरोधक क्षमता नहीं थी। देखते ही देखते कुछ ही हफ्तों में यह वायरस दुनिया भर में फैल गया और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित कर दिया। इस महामारी ने दुनिया भर की स्वास्थ्य प्रणालियों की कड़ी परीक्षा ली।एशियाई देशों में इस महामारी के प्रभाव ने कई कमियों को उजागर किया। जब यह संक्रमण एशिया में पहुंचा, तो हवाई अड्डों पर थर्मल स्कैनर लगाए गए और स्कूल बंद किए गए। कई देशों में होटलों को ही आइसोलेशन सेंटर बना दिया गया। हालांकि, ये बाहरी पाबंदियाँ वायरस को रोकने में बहुत ज्यादा कारगर साबित नहीं हुईं। इस दौरान अस्पतालों में वेंटिलेटर और आईसीयू बेड की भारी कमी देखी गई। ऑक्सीजन की आपूर्ति कम पड़ गई और एंटीवायरल दवाओं के वितरण को लेकर भी कई नीतियां विफल रहीं। इस महामारी ने यह सिखाया कि किसी भी आपातकालीन स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए अस्पतालों का बुनियादी ढांचा मजबूत होना और सही जानकारी का तेजी से प्रसार होना कितना जरूरी है। अगस्त 2010 में इस महामारी के खत्म होने की घोषणा की गई, लेकिन यह वायरस आज भी मौसमी फ्लू के एक प्रकार के रूप में मौजूद है।स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू में क्या अंतर है? स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों ही इन्फ्लूएंजा वायरस से होते हैं, लेकिन इनमें कुछ मुख्य अंतर हैं। मौसमी फ्लू आमतौर पर इन्फ्लूएंजा ए, बी, सी और डी वायरस के कारण होता है और यह हर साल सर्दियों के मौसम में लौटकर आता है। मौसमी फ्लू ज्यादातर बुजुर्गों और बहुत छोटे बच्चों के लिए खतरनाक होता है। दूसरी ओर, स्वाइन फ्लू का वायरस युवाओं, गर्भवती महिलाओं और बच्चों को गंभीर रूप से अपना शिकार बनाता है। जहां मौसमी फ्लू में श्वसन संबंधी समस्याएं ज्यादा होती हैं, वहीं स्वाइन फ्लू के मरीजों में उल्टी और डायरिया जैसी पेट से जुड़ी समस्याएं अधिक देखी जाती हैं। स्वाइन फ्लू बहुत तेजी से निमोनिया और शरीर के कई अंगों के काम न करने जैसी जानलेवा स्थितियों में बदल सकता है, जबकि मौसमी फ्लू आमतौर पर एक या दो हफ्ते में ठीक हो जाता है।स्वाइन फ्लू के प्रमुख लक्षण क्या हैं? स्वाइन फ्लू के लक्षण संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने के एक से चार दिन के भीतर नजर आने लगते हैं, जिसे ऊष्मायन अवधि कहा जाता है। इसके लक्षण आम फ्लू जैसे ही होते हैं, लेकिन कई बार ये बहुत तेजी से गंभीर हो जाते हैं। इसके प्रमुख लक्षणों में तेज बुखार आना, ठंड लगना, सूखी खांसी, गले में खराश, शरीर और मांसपेशियों में भयंकर दर्द, सिरदर्द, बहुत ज्यादा थकान और कमजोरी महसूस होना शामिल है। कई मरीजों में आंखों का लाल होना, आंखों में दर्द, बहती या बंद नाक, और छोटे बच्चों में चिड़चिड़ापन भी देखा जाता है। इसके अलावा, उल्टी आना, जी मिचलाना और डायरिया भी स्वाइन फ्लू के खास लक्षण हैं।अगर सांस लेने में तकलीफ हो, छाती में दर्द हो, होंठ या त्वचा का रंग नीला पड़ने लगे, बहुत ज्यादा चक्कर आएं या शरीर में पानी की भारी कमी हो जाए, तो यह आपातकालीन स्थिति होती है और मरीज को तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।यह बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में कैसे फैलती है? यह वायरस हवा और सीधे संपर्क के माध्यम से फैलता है। जब स्वाइन फ्लू से पीड़ित कोई व्यक्ति खांसता, छींकता या बात करता है, तो उसके मुंह और नाक से निकलने वाली छोटी-छोटी बूंदों के जरिए वायरस हवा में फैल जाता है। जब कोई स्वस्थ व्यक्ति उस हवा में सांस लेता है, तो वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसके अलावा, अगर कोई व्यक्ति किसी ऐसी सतह को छूता है जहां वायरस मौजूद हो, जैसे दरवाजे का हैंडल या मेज, और फिर उन्हीं हाथों से अपनी आंख, नाक या मुंह को छूता है, तो भी वह संक्रमित हो जाता है। एक संक्रमित व्यक्ति बीमारी के लक्षण दिखने से एक दिन पहले और लक्षण शुरू होने के पांच से सात दिन बाद तक दूसरों को संक्रमित कर सकता है।स्वाइन फ्लू का सबसे ज्यादा खतरा किसे होता है? वैसे तो यह बीमारी किसी को भी हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों में इसके गंभीर होने का खतरा बहुत ज्यादा होता है। इनमें पांच साल से कम उम्र के बच्चे और पैंसठ साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग शामिल हैं। गर्भवती महिलाओं के लिए यह वायरस बहुत खतरनाक है, क्योंकि इससे गर्भपात या समय से पहले प्रसव होने का खतरा रहता है। इसके अलावा जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है, जैसे कैंसर, एचआईवी या अंग प्रत्यारोपण वाले मरीज, वे इसके आसानी से शिकार हो सकते हैं। अस्थमा, डायबिटीज, दिल की बीमारी, फेफड़ों की बीमारी और मोटापे से पीड़ित लोगों में भी इस संक्रमण के कारण जानलेवा जटिलताएं पैदा होने की संभावना बहुत अधिक होती है।इस गंभीर बीमारी की पहचान और इलाज कैसे किया जाता है?स्वाइन फ्लू की पहचान करने के लिए डॉक्टर मरीज के लक्षणों की जांच करते हैं और रैपिड फ्लू टेस्ट या स्वैब टेस्ट की सलाह देते हैं। इस टेस्ट में नाक या गले के पिछले हिस्से से स्वैब लेकर प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा जाता है, जिससे वायरस के आरएनए की पहचान की जा सके।इलाज के मामले में, अगर व्यक्ति स्वस्थ है और लक्षण हल्के हैं, तो उसे घर पर ही आराम करने, खूब सारा तरल पदार्थ पीने और हल्का भोजन करने की सलाह दी जाती है। बुखार और दर्द कम करने के लिए सामान्य दवाएं दी जाती हैं। हालांकि, गंभीर मरीजों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है। स्वाइन फ्लू के इलाज के लिए ओसेल्टामिविर (Oseltamivir) और ज़ानामिविर (Zanamivir) जैसी विशेष एंटीवायरल दवाएं दी जाती हैं। ये दवाएं तब सबसे ज्यादा असरदार होती हैं जब इन्हें लक्षण शुरू होने के अड़तालीस घंटे के भीतर लिया जाए। यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह एक वायरल संक्रमण है, इसलिए इसमें एंटीबायोटिक दवाएं काम नहीं करती हैं।स्वाइन फ्लू से बचने के लिए क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए?स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों से बचने का सबसे प्रभावी तरीका बचाव और साफ-सफाई है। सबसे जरूरी कदम हर साल फ्लू का टीका यानी वैक्सीन लगवाना है। यह वैक्सीन स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों के वायरस से सुरक्षा प्रदान करती है और गंभीर बीमारी या अस्पताल में भर्ती होने के खतरे को काफी हद तक कम करती है।इसके साथ ही, अपनी दिनचर्या में अच्छी आदतों को शामिल करना चाहिए। अपने हाथों को दिन में कई बार साबुन और पानी से कम से कम बीस सेकंड तक अच्छी तरह धोएं। अगर साबुन उपलब्ध न हो, तो अल्कोहल वाले हैंड सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करें। खांसते और छींकते समय अपने मुंह और नाक को टिश्यू पेपर या अपनी कोहनी से ढकें, और इस्तेमाल किए गए टिश्यू को तुरंत कूड़ेदान में फेंक दें। अपने चेहरे, खासकर आंखों, नाक और मुंह को बार-बार छूने से बचें।अगर कोई व्यक्ति बीमार है, तो उससे उचित दूरी बनाकर रखें और अगर आप खुद बीमार हैं, तो घर पर ही रहें ताकि दूसरों को संक्रमण न फैले। घर के उन हिस्सों और सतहों को नियमित रूप से साफ करें जिन्हें बार-बार छुआ जाता है। इसके अलावा, एक अच्छी जीवनशैली अपनाएं, जिसमें पौष्टिक आहार, नियमित व्यायाम और भरपूर नींद शामिल हो, ताकि आपके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहे। जागरूकता, सही समय पर डॉक्टरी सलाह और साफ-सफाई ही इस गंभीर बीमारी को हराने का एकमात्र मूलमंत्र है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/25xql4ed 2. https://tinyurl.com/y9h9vh2b 3. https://tinyurl.com/26py8ng4 4. https://tinyurl.com/2d6m5mrk 5. https://tinyurl.com/ydl8gdsh 6. https://tinyurl.com/24nay9jh
धर्म का युग : 600 ई.पू. से 300 ई.
जौनपुर वासियों, पढ़ते हैं शिव पुराण के आख्यान व आधुनिक भौतिकी में मौजूद संबंध के बारे में
जौनपुर वासियों, क्या आप जानते हैं कि शिव पुराण, हिंदू धर्म के संस्कृत ग्रंथों की पुराण-श्रेणी के अठारह महापुराणों में से एक प्रमुख ग्रंथ है। यह शैव साहित्य-परंपरा का एक अभिन्न अंग है। यह मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की लीलाओं एवं महिमाओं को बताता है। साथ ही, इसमें समस्त देवी-देवताओं का आदरपूर्वक उल्लेख एवं वंदन किया गया है।हिंदू साहित्य के अन्य पुराणों की भांति, शिव पुराण भी एक गतिशील ग्रंथ (जीवंत परंपरा) रहा है। इसे एक लंबी समयावधि में नियमित रूप से संपादित, पुनर्गठित एवं परिमार्जित किया गया है। शिव पुराण में यह उल्लेख मिलता है कि मूलतः इसमें बारह संहिताओं (खंडों) के अंतर्गत 1,00,000 श्लोक समाहित थे। हालांकि, इस ग्रंथ में यह भी बात कही गई है कि महर्षि वेदव्यास ने, अपने शिष्य सूत जी को इसका अध्ययन कराने से पूर्व इसे संक्षिप्त कर दिया था। इसकी वर्तमान समय में उपलब्ध पांडुलिपियां कई भिन्न-भिन्न संस्करणों और सामग्रियों में प्राप्त होती हैं। इनमें सात संहिताओं वाला एक प्रमुख संस्करण (जो मुख्यतः दक्षिण भारत में प्रचलित है) और छह संहिताओं वाला दूसरा संस्करण शामिल है। वहीं, मध्यकालीन बंगाल क्षेत्र से प्राप्त तीसरे संस्करण में संहिताएं नहीं हैं, बल्कि, यह दो वृहद खंडों में विभाजित है, जिन्हें 'पूर्व-खंड' (प्रथम भाग) और 'उत्तर-खंड' (उत्तर भाग) कहा जाता है।शिव पुराण की सटीक रचना-तिथि और रचयिता के संबंध में कोई अंतिम ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। चूंकि पांडुलिपियों की रचना-तिथि पर रेडियोकार्बन डेटिंग (Radiocarbon Dating) जैसी तकनीकें पूर्णतः सटीक सिद्ध नहीं होतीं, अतः ग्रंथ काल-निर्धारण हेतु इसके आंतरिक साक्ष्यों और संदर्भों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। एक अनुमान के अनुसार, शिव पुराण के उपलब्ध हस्तलेखों के सबसे प्राचीन अंशों की रचना संभवतः नौवीं से ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में हुई थी। इसके अलावा, वर्तमान में प्राप्त शिव पुराण की पांडुलिपियों के कुछ अध्यायों को तेरहवीं शताब्दी के पश्चात् रचित माना जाता है।शिव पुराण में शिव-केंद्रित सृष्टि-विज्ञान (ब्रह्मांड उत्पत्ति), देवताओं का पारस्परिक संबंध, नीतिशास्त्र, योग, तीर्थ-माहात्म्य, भक्ति-तत्व, नदियों का वर्णन, भूगोल तथा अन्य विविध विषय समाहित हैं। प्रथम सहस्त्राब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध तथा द्वितीय सहस्त्राब्दी के प्रारंभ में, शैव संप्रदायों के विविध स्वरूपों और उनके दार्शनिक सिद्धांतों को समझने के लिए, यह ग्रंथ ऐतिहासिक जानकारी का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसके प्राचीनतम अध्यायों में भक्ति भाव के साथ-साथ, अद्वैत वेदांत दर्शन का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में, ‘वायु पुराण’ को कभी-कभी शिव पुराण का नाम दिया जाता था अथवा इसे शिव पुराण का ही एक भाग माना जाता था। किंतु अधिक पांडुलिपियों की खोज के उपरांत, आधुनिक विद्वान इन दोनों ग्रंथों को पृथक मानते हैं। वायु पुराण को अधिक प्राचीन, अर्थात द्वितीय शताब्दी ईस्वी से पूर्व रचित ग्रंथ स्वीकार किया गया है। कुछ विद्वान शिव पुराण को अठारह महापुराणों की सूची में गिनते हैं, जबकि अन्य विद्वान इसे उपपुराण की श्रेणी में रखते हैं।शिव पुराण में, सृष्टि की कथा और भगवान शिव जी का उद्भव भी वर्णित है। इसके अनुसार, सृष्टि के आरंभ से पूर्व न पृथ्वी थी, न आकाश और न ही कोई देवता। तब केवल सर्वव्यापी अंधकार (तमस) और महाशून्यता विद्यमान थी। उस अनंत शून्य में केवल शाश्वत, निराकार 'ब्रह्म' का अस्तित्व था। परम चेतना और शक्ति से परिपूर्ण ब्रह्म, अपने निर्गुण रूप में स्वयं भगवान शिव ही थे।उस महाशून्य के मध्य से 'ज्योतिर्लिंग' नामक अग्नि और परम प्रकाश का एक अत्यंत तीव्र एवं अनंत स्तंभ प्रकट हुआ। इस स्तंभ का न कोई आदि (प्रारंभ) था और न ही कोई अंत। यह ज्योतिर्लिंग, शिव जी का मूल स्वरूप था, जो शुद्ध, असीम और निराकार ऊर्जा थी। इसी दिव्य प्रकाश से संपूर्ण ब्रह्मांड का आविर्भाव हुआ। इसी ज्योतिर्लिंग से ब्रह्मा और श्री विष्णु का उद्भव हुआ। प्रारंभ में, वे दोनों अपनी उत्पत्ति के स्रोत को लेकर भ्रमित थे और स्वयं को एक-दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने के विवाद में उलझ गए। उनके इस संशय का निवारण करने के लिए, उस ज्योति-स्तंभ से एक दिव्य आकाशवाणी हुई, जिसने ब्रह्मा जी को उस अग्नि-स्तंभ का शीर्ष और विष्णु जी को उसका आधार बताया।तब, विष्णु जी ने वराह रूप धारण किया और वे तल की ओर गहराई में स्तंभ का आधार खोजने लगे। इसके विपरीत, ब्रह्मा जी हंस रूप धारण कर आकाश की ओर ऊपर उड़े। सहस्रों वर्षों की निरंतर खोज के पश्चात् भी, दोनों में से कोई भी उस अनंत स्तंभ का अंत न ढूंढ सके। तब विष्णु जी ने अपनी सीमा स्वीकार की और वे विनम्रतापूर्वक नतमस्तक हो गए। दूसरी तरफ, ब्रह्मा जी ने असत्य का सहारा लेकर, केतकी के पुष्प को झूठी गवाही के लिए तैयार करके, यह दावा किया कि उन्होंने ज्योतिर्लिंग का शीर्ष देख लिया है।तभी उस ज्योतिर्लिंग के मध्य से भगवान शिव साकार रूप में प्रकट हुए, जो रूप उग्र, दिव्य और रुद्र था। उन्होंने विष्णु जी की सत्यनिष्ठा और नम्रता की सराहना की, जबकि असत्य बोलने के दंडस्वरूप, ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि भूलोक में उनकी पूजा हेतु कोई भी मंदिर समर्पित नहीं होगा। केतकी के पुष्प को भी असत्य का भागी बनने के कारण शिव-पूजा से सर्वथा वर्जित कर दिया गया। यह घटना शिव के 'निराकार' (अव्यक्त) से 'साकार' (व्यक्त) रूप में उद्भव की प्रतीक है।तत्पश्चात, शिव जी ने ब्रह्मांडीय दायित्वों का विभाजन किया। उन्होंने विश्व की रचना हेतु ब्रह्मा जी को, उसके पालन-पोषण एवं संरक्षण हेतु विष्णु जी को, और कालचक्र के अंत में संहार हेतु स्वयं को उत्तरदायित्व दिया। इस प्रकार संपूर्ण सृष्टि-चक्र का शुभारंभ हुआ।यदि हम शिव पुराण की कथाओं का सूक्ष्मता से अध्ययन करेंगे, तो पाएंगे कि सापेक्षता का सिद्धांत (Theory of Relativity) और क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) जैसे आधुनिक भौतिकी के गूढ़ सिद्धांत कुछ आख्यानों के माध्यम से, अत्यंत सुंदरता से अभिव्यक्त किए गए हैं। यह हमारी संस्कृति की एक अद्भुत द्वंद्वात्मक शैली रही है, जहां गूढ़ वैज्ञानिक सत्यों को कथाओं का रूप दिया गया और हर तत्व का मानवीकरण (Personification) किया गया।किंतु समय के साथ, समाज ने इसके पीछे छिपे वैज्ञानिक मर्म को भुला दिया और केवल कथाओं को थामे रखा। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन आख्यानों को इतना अतिरंजित और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाने लगा कि वे अपनी मूल तार्किकता खोकर हास्यास्पद प्रतीत होने लगे। यदि हम इन पौराणिक कथाओं में निहित वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पुनः समझें, तो यह गूढ़ विज्ञान को जन-सामान्य तक पहुंचाने का एक अत्यंत सुंदर माध्यम सिद्ध होगा।शिव पुराण मानव चेतना को उसके उच्चतम शिखर तक ले जाने का एक परम विज्ञान है। इसे अत्यंत मनोरम कथाओं के रूप में पिरोया गया है। योगशास्त्र को बिना किसी कथा के साथ, एक विशुद्ध विज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। परंतु यदि आप गहराई से विचार करें, तो योग और शिव पुराण एक ही सत्य के दो पहलू हैं। जिन्हें पृथक नहीं किया जा सकता। एक उन लोगों के लिए है, जो कथाओं के माध्यम से सत्य को समझते हैं, और दूसरा उन लोगों के लिए है, जो विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं। अर्थात, इन दोनों का मूल सिद्धांत एक ही है।आजकल, शिक्षाविद् एवं वैज्ञानिक आधुनिक शिक्षण-पद्धतियों पर गहन शोध कर रहे हैं। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार, ज्ञान प्रदान करने का सरल तरीका यह है कि इसे कथाओं या खेल-खेल के माध्यम से सिखाया जाए। आधुनिक विश्व में इस दिशा में कुछ प्रयास आरंभ हुए हैं, किंतु अधिकांश शिक्षा प्रणाली आज भी अत्यधिक तनावपूर्ण एवं दमनकारी बनी हुई है। जब तक ज्ञान को एक सहज और रोचक माध्यम से न प्रदान किया जाए, तब तक सूचनाओं का भारी बोझ बुद्धिमत्ता को दबा देगा। ऐसी स्थिति में, कहानियों के माध्यम से सिखाना ही सबसे प्रभावी मार्ग है। हमारी भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से यही किया गया था, जैसा कि शिव पुराण के उदाहरण से समझा जा सकता है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/yvtu6ppw 2. https://tinyurl.com/522ca3vs 3. https://tinyurl.com/3h686edj
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
जौनपुर, जानिए अन्य देशों में कैसे मनाए जाते हैं, रक्षाबंधन जैसे खास पर्व
हम जानते हैं कि रक्षाबंधन, जिसे राखी के नाम से भी जाना जाता है, भाई-बहन के पवित्र प्रेम को समर्पित एक विशेष हिंदू त्योहार है। यह भाई और बहन के बीच के अटूट बंधन का उत्सव है, तथा दुनिया भर के अधिकांश भारतीय समुदायों में बहुत उल्लास के साथ मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन, बहनें स्नेह और शुभकामनाओं के प्रतीक के रूप में अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र यानी ‘राखी’ बाँधती हैं और उसकी लंबी उम्र व उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना करती हैं। इसके बदले में, भाई उन्हें सुंदर उपहार देते हैं और जीवनभर उनकी रक्षा करने का दृढ़ वचन देते हैं।इस समारोह का मुख्य आकर्षण वह पल होता है, जब एक बहन अपने भाई की कलाई पर रेशमी धागा, यानी राखी बाँधती है। आजकल, राखी के अधिक विस्तृत और आधुनिक संस्करण सोने या रेशम के जटिल रूप से बुने हुए धागे हो सकते हैं, लेकिन रक्षाबंधन पर भाइयों को दी जाने वाली पारंपरिक राखी रेशम का एक ही धागा होती है। रक्षाबंधन पर विशेष पूजा-अर्चना और प्रार्थनाएँ भी की जाती हैं, क्योंकि पूरा परिवार इस उत्सव में एक साथ शामिल होता है।माना जाता है कि राखी की यह परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन यह 16वीं शताब्दी में विशेष रूप से लोकप्रिय हुई थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रक्षाबंधन की उत्पत्ति उस प्रसंग से मानी जाती है, जब भगवान कृष्ण पतंग उड़ा रहे थे और उनकी उंगली कट गई थी। उस समय, पांडवों की पत्नी द्रौपदी उन्हें घायल देखकर इतनी व्यथित हो गईं कि उन्होंने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी खून बहती उंगली पर बाँध दिया। कृष्ण इस भाव से बहुत द्रवित हुए और हर परिस्थिति में उनकी रक्षा करने का वचन दिया। कृष्ण ने इसे ‘रक्षा सूत्र’ के रूप में स्वीकार किया था। संस्कृत शब्द “रक्षाबंधन” का शाब्दिक अर्थ “सुरक्षा, दायित्व या देखभाल का बंधन” है। यही कारण है कि इतिहास में ऐसी तस्वीरें भी मिलती हैं, जिनमें कुछ महिलाएँ स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति, डॉ. राजेंद्र प्रसाद को “सुरक्षा, दायित्व या देखभाल के बंधन” की उम्मीद में राखी बाँध रही हैं।भाई-बहन एक ऐसा अनूठा बंधन साझा करते हैं, जो संस्कृतियों, धर्मों और भौगोलिक सीमाओं से परे है। इस विशेष रिश्ते को दुनिया भर में विभिन्न त्योहारों के माध्यम से मनाया जाता है, जो भाइयों और बहनों के बीच के प्यार, देखभाल और जुड़ाव को उजागर करते हैं। आइए, ऐसी ही कुछ विदेशी परंपराओं का पता लगाते हैं:1. तिहार (नेपाल): तिहार, जिसे रोशनी के त्योहार के रूप में भी जाना जाता है, नेपाल के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह पाँच दिनों तक चलता है, जिसमें प्रत्येक दिन जीवन और प्रकृति के विभिन्न पहलुओं को समर्पित होता है। तिहार का दूसरा दिन, जिसे ‘भाई टीका’ के नाम से जाना जाता है, भाइयों और बहनों के बीच के बंधन को समर्पित है। बहनें अपने भाइयों के माथे पर “टीका” (तिलक) लगाती हैं तथा उनकी लंबी उम्र और समृद्धि की प्रार्थनाओं के साथ उन्हें आशीर्वाद देती हैं। इसके बदले में भाई उन्हें उपहार देते हैं और रक्षाबंधन की भावना को दर्शाते हुए, अपनी बहनों की रक्षा करने का वादा करते हैं।2. सिबलिंग डे – Sibling Day (संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा): हालांकि अन्य पारंपरिक त्योहारों की तरह इसे बहुत व्यापक रूप से नहीं मनाया जाता है, लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में ‘सिबलिंग डे’ भाई-बहनों के विशेष रिश्ते का सम्मान करने वाले दिन के रूप में तेजी से लोकप्रियता प्राप्त कर रहा है। हर साल 10 अप्रैल को मनाए जाने वाले इस दिन को, लोगों को संदेशों, उपहारों और साझा यादों के माध्यम से अपने भाई-बहनों की सराहना करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। हालांकि यह एक अधिक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष उत्सव है, लेकिन यह भाई-बहन के रिश्तों के सार्वभौमिक मूल्य को खूबसूरती से दर्शाता है।3. चूसेक – Chuseok (दक्षिण कोरिया): दक्षिण कोरिया की सबसे महत्वपूर्ण छुट्टियों में से एक, ‘चूसेक’, परिवारों के लिए एक साथ आने और एक समृद्ध फसल के लिए अपने पूर्वजों को धन्यवाद देने का समय है। हालांकि यह त्योहार आम तौर पर पूरे परिवार पर केंद्रित होता है, लेकिन यह वह समय भी होता है, जब भाई-बहन एक साथ आते हैं। यह अवकाश, भव्य दावतों, पैतृक अनुष्ठानों और पारंपरिक खेलों द्वारा चिह्नित किया जाता है, जो भाई-बहनों को आपस में जुड़ने और अपनी साझा विरासत का जश्न मनाने का बेहतरीन अवसर प्रदान करता है।4. भाई दूज (भारत और नेपाल): रक्षाबंधन के समान ही, भाई दूज भारत और नेपाल का एक अन्य प्रमुख त्योहार है, जो भाइयों और बहनों के बीच के पवित्र बंधन का जश्न मनाता है। यह पाँच दिवसीय दीवाली के त्योहार के ठीक आखिरी दिन पड़ता है।रक्षाबंधन और भाई दूज दोनों ही भाई-बहन के प्रेम को समर्पित हैं, फिर भी इनमें निम्नलिखित अंतर हैं:पंचांग और समय: दोनों त्योहार, एक ही दिन या एक ही महीने में नहीं मनाए जाते। रक्षाबंधन मानसून के मौसम में सावन महीने की पूर्णिमा के दिन, आमतौर पर अगस्त में आता है। दूसरी ओर, भाई दूज कार्तिक के महीने में दीवाली के दो दिन बाद मनाया जाता है। इसलिए, जहाँ रक्षाबंधन में बरसात के दिनों की भीनी-भीनी खुशबू और हरियाली होती है, वहीं भाई दूज तब आता है, जब हवा दीवाली के दीयों की रोशनी और मिठाइयों की खुशबू से भर जाती है।अनुष्ठान की विधि: रक्षाबंधन पर, बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, उसकी खुशी के लिए प्रार्थना करती है, और बदले में उसे उपहार या आशीर्वाद दिया जाता है। इसके विपरीत, भाई दूज पर बहन अपने भाई के माथे पर चंदन या सिंदूर का एक तिलक लगाती है, जो उसकी सुरक्षा और समृद्धि का प्रतिनिधित्व करती है। फिर वह आरती करती है और उसे मिठाइयाँ खिलाती है, जिसके बदले में बहन उसे उपहार देती है।क्षेत्रीय विविधता: भारत की विविधता इन समारोहों में और अधिक रंग भर देती है। रक्षाबंधन देश भर में लगभग हर राज्य में लोकप्रिय है। हालाँकि, भाई दूज के कई क्षेत्रीय नाम हैं। महाराष्ट्र और गोवा में इसे ‘भाऊबीज’ कहा जाता है, तो पश्चिम बंगाल में इसे ‘भाई फोंटा’ के रूप में जाना जाता है।जब हम भाई दूज और रक्षाबंधन के बारे में सोचते हैं, तो दोनों का मूल उद्देश्य भाई-बहन के प्रेम को दर्शाना ही है, भले ही इसे अलग-अलग तरीकों से व्यक्त किया जाता हो। रक्षाबंधन मुख्य रूप से एक रक्षक के रूप में भाई की भूमिका पर ध्यान केंद्रित करता है और बहन की सुरक्षा की कामना को अपनाता है। जबकि भाई दूज अधिक संतुलित प्रतीत होता है। एक बहन के लिए एक विचारशील भाईदूज उपहार, उसे वास्तव में विशेष महसूस करा सकता है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/5bnkjdc5 2. https://tinyurl.com/yw7vc8s7 3. https://tinyurl.com/yca4hcaf
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
राग जौनपुरी के नगर से जानें, बांसुरी की मधुर धुनों ने कैसे विश्व के दिलों में बनाई जगह
जौनपुर सदियों से संगीत, साहित्य और कला की समृद्ध परंपरा का केंद्र रहा है। शर्की सल्तनत के शासनकाल में यह नगर संगीत संरक्षण और नई रचनात्मक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध हुआ। इसी काल में विकसित राग जौनपुरी आज भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रमुख रागों में गिना जाता है। संगीत की यह विरासत हमें दुनिया के अन्य संगीत रूपों को जानने के लिए भी प्रेरित करती है। पश्चिमी संगीत में भी एक अत्यंत मधुर और लोकप्रिय वाद्य है—फ्लूट या बांसुरी।बांसुरी संसार के सबसे प्राचीन वाद्यों में से एक है। इसमें किसी तार या झिल्ली का प्रयोग नहीं होता, बल्कि वायु के कंपन से मधुर ध्वनि उत्पन्न होती है। कलाकार अपनी साँस, उँगलियों की गति और स्वर नियंत्रण के माध्यम से कोमल, शांत या तेज़ गति वाली धुनों को सहजता से प्रस्तुत कर सकता है। यही कारण है कि फ्लूट / बांसुरी पश्चिमी शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, जैज़ और फिल्म संगीत सहित अनेक विधाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।फ्लूट की विविध अभिव्यक्तियों को समझने के लिए कुछ उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ देखी जा सकती हैं। विश्वविख्यात फ्लूट वादक जेम्स गॉलवे (James Galway) की प्रस्तुति इस वाद्य की मधुरता और स्वच्छ स्वर-सौंदर्य का सुंदर उदाहरण है। वहीं इमैनुएल पह्यू (Emmanuel Pahud) अपनी तकनीकी दक्षता और भावपूर्ण प्रस्तुति के माध्यम से आधुनिक पश्चिमी फ्लूट वादन की उत्कृष्ट झलक प्रस्तुत करते हैं। भारतीय संदर्भ में पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की जॉन मैकलॉफलिन, जान गारबारेक और उस्ताद ज़ाकिर हुसैन के साथ की गई फ़्यूज़न प्रस्तुति यह दर्शाती है कि भारतीय बाँसुरी और पश्चिमी संगीत परंपराएँ मिलकर कितनी सुंदर संगीत यात्रा रच सकती हैं।आज फ्लूट केवल किसी एक देश या संगीत परंपरा का वाद्य नहीं रह गया है। पश्चिमी कॉन्सर्ट फ्लूट और भारतीय बाँसुरी, दोनों ने अपनी-अपनी विशिष्ट पहचान के साथ विश्व संगीत को समृद्ध बनाया है। यदि आप इस वाद्य की मधुरता, तकनीकी क्षमता और भावपूर्ण अभिव्यक्ति का अनुभव करना चाहते हैं, तो ये प्रस्तुतियाँ फ्लूट की वैश्विक लोकप्रियता और इसकी संगीत यात्रा का उत्कृष्ट परिचय देती हैं।संदर्भ:https://tinyurl.com/4e2f7sfp https://tinyurl.com/2zwfx6t3 https://tinyurl.com/mu57rtm3 https://tinyurl.com/24jtc4cy https://tinyurl.com/yc3mywbr https://tinyurl.com/2rv2svaz
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
राजाओं के शासन से आधुनिक लोकतंत्र तक सफर कैसा रहा?
राजनीति विज्ञान एक ऐसा विषय है जिसने सदियों से यह तय किया है कि समाज कैसे काम करेगा और सरकारों का निर्माण किस आधार पर होगा। शुरुआत में यह विषय केवल राजाओं उनके अधिकारों और कानूनों के अध्ययन तक सीमित था। लेकिन समय के साथ इसने लोकतंत्र सार्वजनिक नीति मानवाधिकार कूटनीति और वैश्विक राजनीति का रूप ले लिया। आज हम जिस शासन प्रणाली और अधिकारों के साथ जी रहे हैं, वह रातोंरात नहीं बनी है। इसके पीछे सदियों का वैचारिक संघर्ष और कई महान दार्शनिकों का योगदान है। भारतीय संदर्भ में भी महात्मा गांधी और बी. आर. आंबेडकर जैसे विचारकों ने भारत में लोकतंत्र और राजनीतिक विचारों को गहराई से प्रभावित किया है।राजनीति विज्ञान की शुरुआत और विकास कैसे हुआ?शुरुआती दौर में विचारकों का मुख्य ध्यान एक आदर्श सरकार बनाने और शासकों की भूमिका तय करने पर होता था। लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे समाज का विकास हुआ, राजनीति विज्ञान का दायरा भी बढ़ता गया। प्राचीन काल से लेकर आज तक इस विषय ने कई नए क्षेत्रों को जन्म दिया है। राजनीतिक सिद्धांत न्याय स्वतंत्रता और सत्ता के विचारों का अध्ययन करता है। वहीं लोक प्रशासन इस बात पर केंद्रित है कि सरकारें कैसे काम करती हैं और आम जनता तक सेवाएं कैसे पहुंचाती हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय संबंध दो देशों के बीच के रिश्तों वैश्विक संघर्षों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका की जांच करता है। कुल मिलाकर यह विषय आज आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणालियों और विश्व मामलों को समझने का सबसे महत्वपूर्ण साधन बन गया है।प्लेटो ने एक आदर्श राज्य की कल्पना कैसे की? पश्चिमी दर्शन के सबसे प्रमुख विचारकों में प्लेटो (Plato) का नाम सबसे ऊपर आता है। उनका जन्म प्राचीन यूनान में हुआ था। वह सुकरात के छात्र थे और बाद में उन्होंने अरस्तू को शिक्षा दी। प्लेटो ने अपनी मशहूर रचना “द रिपब्लिक” में एक ऐसे समझदार समाज का खाका खींचा था जिसे दार्शनिक राजाओं द्वारा चलाया जाना चाहिए। प्लेटो का मानना था कि एक आम इंसान बाहरी दुनिया को समझता है लेकिन एक दार्शनिक विचारों की गहराई को समझता है। प्लेटो ने मानव आत्मा को तीन हिस्सों में बांटा था, जिनमें तर्क, भावना और भूख शामिल थीं। उनका मानना था कि जब ये तीनों हिस्से सही तालमेल में काम करते हैं, तभी एक न्यायपूर्ण इंसान बनता है।इसी विचार को उन्होंने एक राज्य पर भी लागू किया। उनके अनुसार एक आदर्श राज्य में तीन वर्ग होने चाहिए शासक रक्षक और उत्पादक। समझदार राज्य वह है जहां शासक अच्छाई को समझते हों। साहसी राज्य वह है जहां रक्षक युद्ध के मैदान में शासकों के आदेशों का पालन करें और संयमित राज्य वह है जहां सभी नागरिक इस बात पर सहमत हों कि शासन कौन करेगा। जब हर वर्ग अपना काम सही ढंग से करता है तभी एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण होता है। प्लेटो ने “द एकेडमी” की भी स्थापना की थी, जिसे पश्चिमी दुनिया का पहला विश्वविद्यालय माना जाता है।अरस्तू ने राजनीति और विज्ञान को कैसे जोड़ा? अरस्तू (Aristotle) एक और महान यूनानी दार्शनिक थे, जिन्होंने राजनीति को एक नया वैज्ञानिक दृष्टिकोण दिया। अरस्तू ने विज्ञान को तीन हिस्सों में बांटा - उत्पादक, व्यावहारिक और सैद्धांतिक। उनके अनुसार व्यावहारिक विज्ञान वह है जो मानव व्यवहार का मार्गदर्शन करता है और इसमें राजनीति तथा नैतिकता सबसे अहम हैं।अरस्तू ने प्लेटो के कई विचारों में सुधार किया और यथार्थवाद पर जोर दिया। उनका मानना था कि एक स्थिर समाज के लिए संतुलित शासन और नागरिकों की भागीदारी सबसे ज्यादा जरूरी है। उन्होंने सरकार के विभिन्न रूपों का अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि सत्ता किसी एक व्यक्ति या कुछ लोगों के हाथ में केंद्रित नहीं होनी चाहिए। अरस्तू पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने औपचारिक तर्कशास्त्र का आविष्कार किया। उन्होंने ज्ञान और अनुसंधान की एक नई लहर पैदा की। वह सिकंदर महान के गुरु भी थे और बाद में उन्होंने एथेंस में "द लीसियम" (The Lyceum) नाम से अपना खुद का स्कूल स्थापित किया जहां ज्ञान की कई शाखाओं का स्वतंत्र रूप से अध्ययन किया जाता था।कार्ल मार्क्स ने समाज और वर्ग संघर्ष के बारे में क्या कहा?कार्ल मार्क्स (Karl Marx) एक क्रांतिकारी समाजशास्त्री इतिहासकार और अर्थशास्त्री थे जिन्होंने राजनीतिक विचारों की दुनिया में भूचाल ला दिया। मार्क्स ने फ्रेडरिक एंगेल्स (Friedrich Engels) के साथ मिलकर “द कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो” (The Communist Manifesto) और दास कैपिटल (Das Kapital) जैसी रचनाएं लिखीं जिन्होंने मार्क्सवाद की नींव रखीं। मार्क्स का सबसे बड़ा तर्क यह था कि अब तक का पूरा मानव इतिहास केवल वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है।उन्होंने बताया कि ऐतिहासिक रूप से समाज की संरचना हमेशा उस वर्ग के हितों को बढ़ावा देने के लिए की गई है जिसका अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण होता है। कार्ल मार्क्स ने आर्थिक असमानता और मजदूरों के अधिकारों की बात की। उन्होंने पूंजीपतियों और मजदूर वर्ग के बीच की खाई को उजागर किया और कहा कि एक दिन मजदूर वर्ग एकजुट होकर इस पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकेगा जिससे एक वर्गहीन समाज की स्थापना होगी। उनके इन विचारों ने दुनिया भर की आधुनिक राजनीतिक प्रणालियों और सामाजिक आंदोलनों को प्रेरित किया।आधुनिक दुनिया में लोकतंत्र का क्या महत्व है?लोकतंत्र आज दुनिया भर में सबसे स्वीकार्य शासन प्रणाली है। राजनीति विज्ञान ने लोकतंत्र चुनाव कानून और सार्वजनिक नीति को समझने में अहम भूमिका निभाई है। यह विषय बताता है कि सरकारें कैसे काम करती हैं नेता कैसे चुने जाते हैं कानून कैसे बनते हैं और राजनीतिक फैसले समाज पर क्या असर डालते हैं। लोकतंत्र एक ऐसा माहौल तैयार करता है जो मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता का सम्मान करता है। इसमें लोगों की इच्छाओं का सम्मान होता है और वे अपने फैसले लेने वालों को जवाबदेह ठहरा सकते हैं।संयुक्त राष्ट्र लोकतंत्र और मानवाधिकारों को कैसे बढ़ावा देता है?संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक दस्तावेजों में लोकतंत्र शब्द का सीधा जिक्र नहीं था लेकिन हम भारत के लोग जैसी शुरुआत इस बात को पुष्ट करती है कि संप्रभु राज्यों की वैधता का आधार लोगों की इच्छा ही है। संयुक्त राष्ट्र किसी एक विशेष सरकारी मॉडल की वकालत नहीं करता है लेकिन वह लोकतांत्रिक शासन को मूल्यों और सिद्धांतों के एक समूह के रूप में बढ़ावा देता है।संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के जरिए शासन को मजबूत करने चुनाव प्रक्रियाओं में सहायता करने और नागरिक समाज को सशक्त बनाने का काम किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र लोकतंत्र कोष उन परियोजनाओं को धन देता है जो नागरिक समाज को मजबूत करती हैं मानवाधिकारों को बढ़ावा देती हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में सभी समूहों की भागीदारी सुनिश्चित करती हैं।महिलाओं और युवाओं की भूमिका क्यों जरूरी है? लोकतंत्र तब तक सच्चा लोकतंत्र नहीं हो सकता जब तक उसमें महिलाओं और युवाओं की पूरी भागीदारी न हो। हालांकि प्रगति बहुत धीमी रही है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार राष्ट्रीय संसदों में लैंगिक समानता हासिल करने में अभी और 63 साल लग सकते हैं और सत्ता के सर्वोच्च पदों पर समानता पहुंचने में लगभग एक सौ तीस साल का समय लग सकता है। संयुक्त राष्ट्र इन दूरियों को पाटने के लिए चुनाव प्रक्रियाओं को समावेशी बनाने का काम कर रहा है। इसके साथ ही युवाओं की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है। जलवायु परिवर्तन बेरोजगारी और असमानता जैसी वैश्विक चुनौतियों से लड़ने के लिए युवाओं का जागरूक होना और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भाग लेना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।इस तरह राजनीति विज्ञान केवल एक विषय नहीं है, बल्कि यह मानव समाज के विकास, अधिकारों की लड़ाई और एक बेहतर भविष्य के निर्माण का सबसे सशक्त माध्यम है। प्लेटो के आदर्श विचारों से लेकर मार्क्स की क्रांति और आज के आधुनिक लोकतंत्र तक यह यात्रा हमें बताती है कि एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण निरंतर चलने वाली एक प्रक्रिया है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/jzeuc5v7 2. https://tinyurl.com/3c7b65s33. https://tinyurl.com/5bpksan3 4. https://tinyurl.com/srm6kfh45. https://tinyurl.com/wjcxbpvb6. https://tinyurl.com/mxzmt6pb
आधुनिक राज्य : 1947 ई. से वर्तमान तक
जौनपुर की महिलाओं ने रच दिया इतिहास, 5 लाख तिरंगे बनाकर दिया देशभक्ति का संदेश
स्वतंत्रता दिवस किसी भी देश के लिए केवल एक राष्ट्रीय पर्व नहीं होता, बल्कि यह देशवासियों के स्वाभिमान और उनके संघर्षों का प्रतीक होता है। पिछले कुछ वर्षों से भारत सरकार का ‘हर घर तिरंगा’ अभियान इस पर्व को एक नई ऊंचाई दे रहा है। यह अभियान अब केवल सरकारी इमारतों पर झंडा फहराने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह घर-घर तक पहुंच गया है। इस वर्ष उत्तर प्रदेश के जौनपुर ज़िले ने इस अभियान में जो जनभागीदारी दिखाई है, वह पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है। विशेषकर जिले की ग्रामीण महिलाओं ने अपने कौशल और देशभक्ति से इस अभियान को एक नई दिशा दी है।जौनपुर की महिलाओं ने कैसे तैयार किए 5 लाख तिरंगे?जौनपुर में 'हर घर तिरंगा अभियान-2026' को सफल बनाने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी जिले की मातृशक्ति ने उठाई है। केंद्र सरकार के राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के अंतर्गत, ज़िले के 62 स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी लगभग 300 महिलाओं ने 5 लाख राष्ट्रीय ध्वज तैयार करने का एक विशाल लक्ष्य हासिल किया है।इन महिलाओं ने दिन-रात एक करके पूरी लगन और श्रद्धा के साथ इन तिरंगों की सिलाई की है। अब इन तिरंगों को ज़िले के आवासीय भवनों, सरकारी और अर्द्धसरकारी कार्यालयों, स्कूलों तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर पूरे सम्मान के साथ फहराया जा रहा है। ज़िलाधिकारी सैमुअल पॉल एन के कुशल निर्देशन में यह अभियान राष्ट्रभक्ति के एक भव्य उत्सव में बदल गया है।इस अभियान से ग्रामीण महिलाओं की आमदनी पर क्या असर पड़ा?यह अभियान केवल देशभक्ति का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि यह महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने का भी एक बेहतरीन उदाहरण बन गया है। इन महिलाओं के लिए झंडे सिलना केवल एक काम नहीं, बल्कि रोज़गार का एक बड़ा अवसर साबित हुआ है।बजरंग स्वयं सहायता समूह की सदस्य विजयलक्ष्मी मौर्य बताती हैं कि उनके समूह को 17,000 झंडे सिलने का लक्ष्य दिया गया था। इस काम में उनके समूह की 10 से अधिक महिलाएं शामिल हैं। विजयलक्ष्मी के अनुसार, इस अभियान से जुड़कर वे 30,000 रुपये से लेकर 40,000 रुपये तक की अतिरिक्त कमाई कर पा रही हैं।अधिकारियों के अनुसार, क्लस्टर स्तर के संगठनों को प्रत्येक झंडा तैयार करने के लिए लगभग 20 रुपये दिए जाते हैं। कार्य की व्यवस्था के आधार पर, सिलाई करने वाली महिलाओं को प्रति झंडा 2 से 3 रुपये की आमदनी हो रही है। डिप्टी कमिश्नर जितेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि सरकार द्वारा दिए गए इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए क्लस्टर स्तर पर बहुत तेज़ी से काम किया गया है।9 से 17 अगस्त तक ज़िले में कौन-कौन से कार्यक्रम आयोजित होंगे?ज़िला प्रशासन ने स्वतंत्रता दिवस को ऐतिहासिक बनाने के लिए 9 अगस्त से 17 अगस्त तक कई भव्य कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की है। ज़िलाधिकारी की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह तय किया गया कि इन कार्यक्रमों में अधिक से अधिक लोगों की जनभागीदारी सुनिश्चित की जाए।कला और रंगोली प्रतियोगिताएं: 9 से 15 अगस्त तक ज़िले के विभिन्न परिषदीय, माध्यमिक विद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में तिरंगा-प्रेरित कला गतिविधियां कराई जा रही हैं। छात्र-छात्राएं देशभक्ति से ओतप्रोत आकर्षक रंगोलियां और स्वतंत्रता सेनानियों के चित्र बना रहे हैं। वंदे मातरम् से जुड़ी गतिविधियां भी आयोजित की जा रही हैं, जिससे विद्यार्थियों में राष्ट्रीय एकता और अखंडता का बोध हो सके।सार्वजनिक स्थलों की विशेष सजावट: 10 से 15 अगस्त तक जौनपुर के सभी सरकारी भवनों, रेलवे स्टेशन, बस अड्डों, प्रमुख चौराहों और अन्य सार्वजनिक स्थानों को तिरंगे की थीम वाली रोशनी और सजावट से सजाया जा रहा है। इससे पूरा शहर तिरंगामय नज़र आ रहा है।तिरंगा प्रदर्शनी और कॉन्सर्ट: 11 से 15 अगस्त तक प्रमुख सार्वजनिक स्थलों और शिक्षण संस्थानों में विशेष 'तिरंगा प्रदर्शनी' लगाई जा रही है। इसमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां प्रदर्शित की जा रही हैं। इसके अलावा, 14 अगस्त को एक भव्य ‘तिरंगा कॉन्सर्ट’ भी आयोजित किया था, जो सम्पूर्ण रूप से देशभक्ति के रंग में रंगा हुआ था।ज़िलाधिकारी की नागरिकों से क्या अपील है?इस पूरे अभियान का मुख्य उद्देश्य हर नागरिक के दिल में राष्ट्रध्वज के प्रति सम्मान और देशभक्ति की भावना को प्रगाढ़ करना है। ज़िलाधिकारी सैमुअल पॉल एन ने समस्त जनपदवासियों से इस 'हर घर तिरंगा अभियान' को एक ऐतिहासिक सफलता दिलाने का आह्वान किया है। उन्होंने नागरिकों से अपील की है कि वे 15 अगस्त को अपने-अपने घरों और प्रतिष्ठानों पर पूरे उत्साह के साथ तिरंगा फहराएं। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि झंडा फहराते समय राष्ट्रध्वज के नियमों और उसकी गरिमा (Flag Code of India) का विशेष ध्यान रखा जाए।जौनपुर में तिरंगे की शान में हो रहे ये आयोजन और विशेषकर स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं का यह शानदार योगदान, यह साबित करता है कि जब समाज का हर वर्ग किसी राष्ट्रीय पर्व में अपनी भागीदारी निभाता है, तो वह केवल एक सरकारी आयोजन न रहकर एक सच्चा 'लोक उत्सव' बन जाता है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2xrrbjj4 2. https://tinyurl.com/23os95eo 3. https://tinyurl.com/24anojp2
हथियार और खिलौने
आत्मनिर्भर भारत की गूंज: आइए पढ़ते हैं, स्वदेशी मिसाइल कार्यक्रम व ब्रह्मोस के उदय के बारे में
जौनपुर, आज हम बमों और मिसाइलों के इतिहास को पढ़ेंगे, और समझेंगे कि ये हथियार समय के साथ कैसे विकसित हुए। दरअसल, बम, एक विस्फोटक हथियार होता है, जो अचानक अत्यधिक एवं हिंसक ऊर्जा प्रदान करने के लिए विस्फोटक सामग्री की ऊष्माक्षेपी प्रतिक्रिया का उपयोग करता है। बमों का उपयोग पूर्वी एशिया में ग्यारहवीं शताब्दी से ही किया जाता रहा है। अन्य सैन्य विस्फोटक हथियार जिन्हें ‘बम’ के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है, उनमें गोले, गहराई चार्ज (पानी में प्रयुक्त), और भूमि खदानें शामिल हैं।ठोस प्रोपेलेंट (Propellant) विस्फोटक हथियार की उत्पत्ति, दसवीं सदी के दौरान चीन में हुई थी, जहां बांस की नलियों में विस्फोटक बारूद भरा जाता था, और इसे चलाया जाता था। यह युद्ध में ठोस प्रोपेलेंट रॉकेटों के पहले रिकॉर्ड किए गए उपयोग का प्रतिनिधित्व करता है। चौदहवीं शताब्दी तक, ये हथियार यूरोप में पहुंच गए। फिर, कुछ प्रसिद्ध विचारकों ने रॉकेट डिजाइनों की जांच शुरू की। लेकिन, सोलहवीं शताब्दी में एक जर्मन इंजीनियर - कॉनराड हास (Conrad Haas) - ने एक बहुमंजिला रॉकेट का स्केच बनाकर, और उड़ान स्थिरता में सुधार हेतु स्वेप्ट-बैक पंखों (Swept-back fins) का प्रस्ताव करके इस अवधारणा को आगे बढ़ाया।अठारहवीं सदी में, ब्रिटिश और फ्रांसीसीयों के खिलाफ लड़ाई के दौरान, भारतीय सैनिकों ने भी 3 से 6 किलोग्राम वजन वाले आग लगाने वाले रॉकेटों का इस्तेमाल किया था। इन हथियारों में बारूद से भरा एक सिलेंडर होता था, जो पीछे की ओर फैली हुई एक लंबी छड़ी से जुड़ा होता था। हालांकि, उनकी विनाशकारी क्षमताएं सीमित थीं, फिर भी उन्होंने अत्यधिक मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक लाभ प्रदान किया। भारतीय डिज़ाइनों से प्रभावित होकर, ब्रिटिश कर्नल विलियम कांग्रेव (William Congreve) ने उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में उनके साथ कुछ प्रयोग किए।प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, गुब्बारे और ज़ेपेलिंस (Zeppelins) जैसी रणनीतिक वस्तुओं को लक्षित करने के लिए, रॉकेटों में फिर से रुचि बढ़ गई। तब, एक ब्रिटिश प्रोफेसर ने फ्लाइंग टारगेट (Flying Target) नामक एक रेडियो-नियंत्रित मोनोप्लेन (Monoplane) डिजाइन किया और रेडियो-नियंत्रित रॉकेट के साथ प्रयोग किया।1918 में, संयुक्त राज्य अमेरिका में एक हवाई टॉरपीडो (Torpedo) के रूप में कार्य करने वाला, एक मानव रहित हवाई जहाज ‘द बग (The Bug)’ डिजाइन किया। इसमें 100 किमी की सीमा तक दिशा बनाए रखने के लिए, प्रीसेट वैक्यूम रिले (Preset vacuum relay) का उपयोग किया गया था।प्रथम विश्व युद्ध के बाद, जर्मनी में एडॉल्फ हिटलर (Adolf Hitler) ने एक विशाल एवं शीर्ष गुप्त सुविधा को वित्त पोषित किया, जो उड़ान वाहनों में पहले व्यवस्थित अनुसंधान प्रयास को चिह्नित करता है। हालांकि, जर्मनी की हार के बाद, सोवियत संघ और अमेरिकी सेनाओं ने जर्मन प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिकों का उपयोग करने के लिए हाथापाई की। उन्नत निर्देशित हथियार प्रौद्योगिकी अंततः विश्व स्तर पर फैल गई।कुछ वर्षों बाद, 1983 में भारत ने ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नेतृत्व में अपना ‘एकीकृत मिसाइल विकास कार्यक्रम’ शुरू किया। अब्दुल कलाम ने सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों (आकाश और त्रिशूल), टैंक रोधी मिसाइलों (नाग), और सतह से सतह पर मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों (पृथ्वीअ और अग्नि) सहित, कई स्वदेशी शस्त्रागार को सफलतापूर्वक विकसित किया।दूसरी ओर, मोटे तौर पर, ग्रेनेड (Grenades) कम दूरी के उपयोग के लिए बनाया गया एक छोटा बम होता है। बम में, विस्फोट उत्पन्न करने के लिए दहनशील सामग्री को प्रज्वलित किया जाता है, जिससे गैसों का तेजी से विस्तार होकर मजबूत बाहरी दबाव बनता है। इस प्रकार, ग्रेनेड के आवश्यक तत्व - दहनशील सामग्री और एक प्रज्वलन प्रणाली हैं। ग्रेनेड में सभी प्रकार की ज्वलनशील सामग्री का उपयोग किया जाता है, और वे विभिन्न प्रकार के विस्फोट उत्पन्न करते हैं। कुछ विस्फोटों से आग फैलती है, जबकि, अन्य विस्फोटों से बहुत सारी गैसें या धुआं निकलता है। प्रज्वलन प्रणालियां भी अलग–अलग होती हैं, और उनका उद्देश्य इसके उपयोगकर्ता से कुछ दूरी पर विस्फोट करना है।स्टिंगर मिसाइल (Stinger missile) को जमीनी सैनिकों को कम उड़ान वाले हमलावर हवाई जहाजों और हेलीकॉप्टरों से निपटने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ऐसे जहाज, बमबारी या गोलाबारी करते हैं, निगरानी करते हैं, या सैनिकों का वहन भी करते हैं। इन खतरों को खत्म करने का सबसे आसान तरीका इन विमानों को मार गिराना है। इसके लिए, सबसे पहले सैनिक मिसाइल से लक्ष्य पर निशाना लगाता है। फिर उसका ट्रिगर खींचा जाता है। तब, एक छोटा प्रक्षेपण रॉकेट, प्रक्षेपण नली से मिसाइल को छोड़ता है, और इसे दागने वाले सैनिक से पूरी तरह दूर रहता है। फिर, प्रक्षेपण इंजन नीचे गिर जाता है, और मुख्य ठोस रॉकेट इंजन जल उठता है। फिर मिसाइल स्वचालित रूप से लक्ष्य पर उड़ती है, और विस्फोट करती है।स्टिंगर मिसाइल, 11,500 फीट की ऊंचाई तक उड़ने वाले लक्ष्य को मार सकती है, और इसकी सीमा लगभग 5 मील है। इसके अलावा, अपने लक्ष्य को ट्रैक करने के लिए स्टिंगर मिसाइलें निष्क्रिय आईआर/यूवी सेंसर (IR/UV censor) का उपयोग करती हैं।इसी तरह, परमाणु बम भी एक शक्तिशाली हथियार हैं, जिनमें विस्फोटक ऊर्जा के स्रोत के रूप में परमाणु प्रतिक्रियाओं का उपयोग होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, वैज्ञानिकों ने पहली बार परमाणु हथियार तकनीक विकसित की थी। इनका उपयोग युद्ध में केवल दो बार ही किया गया है। दोनों बार, संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान के खिलाफ हिरोशिमा और नागासाकी में इन बमों को डाला था। उस युद्ध के बाद, परमाणु प्रसार का दौर शुरू हुआ।पिछली शताब्दी में, परमाणु बम और मिसाइल प्रौद्योगिकी ने युद्ध के तरीकों को बदल दिया है। प्रोपेलेंट, मार्गदर्शन प्रणालियों, और लक्ष्यीकरण में हुई प्रगति ने सेनाओं को पहले से कहीं अधिक तेजी से, दूर तक और अधिक सटीकता से हमला करने की अनुमति दी है। प्रारंभिक बैलिस्टिक मिसाइलों से लेकर आधुनिक हाइपरसोनिक प्रणालियों तक, इन हथियारों ने लंबी दूरी के हमलों को सक्षम करके सैन्य रणनीति को नया आकार दिया है। कई मामलों में, निर्देशित मिसाइलों ने उच्च प्रभाव वाले संचालन के लिए, पारंपरिक तोपखाने को पूरक या प्रतिस्थापित किया है।मिसाइलों के उदय से पहले, दूर के लक्ष्यों पर हमला करने हेतु आमतौर पर विमान, तोपखाने, या बड़ी संरचनाओं को उस स्थिति में ले जाने की आवश्यकता होती थी। मिसाइल प्रणालियों ने सेनाओं, वायु सेनाओं और नौसेनाओं को सैकड़ों या यहां तक कि हजारों मील दूर से हमले करने की अनुमति देकर इस स्थिति को बदल दिया है।1970 के दशक में, रशिया द्वारा मिसाइल प्रभाव की लंबी सीमा के साथ नवाचार; तथा 1980 के दशक में अमेरिका में ऐसे ही कुछ प्रयोगों ने मिसाइल क्षमताओं में क्रांति ला दी। इसके अलावा, 1990 के दशक में ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (Global Positioning System) तकनीक के एकीकरण ने मिसाइल युद्ध को बदल दिया। इसने मिसाइलों को किसी भी दूरी पर अत्यधिक सटीकता बनाए रखने की अनुमति दी। दूसरी तरफ, उन्नत अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (Intercontinental Ballistic Missiles) स्वतंत्र रूप से लक्षित रीएंट्री वाहनों (Multiple Independently-targetable Reentry Vehicles) को ले जाने के लिए विकसित हुईं।अन्य देशों द्वारा नवाचारों की इस होड़ में, भारत भी पीछे नहीं है। भारत ने बहुत ही सीमित संसाधनों के साथ अपना मिसाइल कार्यक्रम शुरू किया था। और आज, हम एक प्रमुख मिसाइल शक्ति के रूप में खड़े हैं। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) सभी मिसाइल विकास का नेतृत्व करता है। भारत ने 1983 में, एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (Integrated Guided Missile Development Programme) लॉन्च किया था। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने इस कार्यक्रम का नेतृत्व किया था। इस कार्यक्रम का लक्ष्य, पांच प्रमुख मिसाइलें विकसित करना था, जो पृथ्वी, अग्नि, त्रिशूल, नाग और आकाश थे।अग्नि श्रृंखला भारत की सबसे महत्वपूर्ण बैलिस्टिक मिसाइल श्रृंखला है। डीआरडीओ ने सभी अग्नि वेरिएंट विकसित किए। ये मिसाइलें परमाणु और पारंपरिक हथियार का वहन कर सकती हैं।अग्नि-I, 700-800 किमी की रेंज के साथ, कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है। अग्नि-II की रेंज 2,000-3,000 किमी है, जो इसे मध्यम दूरी की मिसाइल बनाती है। इससे पड़ोसी देशों के बड़े हिस्से को निशाना बनाया जा सकता है। अग्नि-III, 3,000-5,000 किमी की रेंज पा सकती है। जबकि, अग्नि-IV उन्नत नेविगेशन का उपयोग करता है और अधिक सटीक है। दूसरी ओर, अग्नि-V, 5,000-8,000 किमी की रेंज के साथ, पूरे चीन और यूरोप के कुछ हिस्सों पर हमला कर सकता है।अग्नि के अलावा, ब्रह्मोस एक अन्य महत्वपूर्ण मिसाइल है। यह एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे भारत और रूस ने मिलकर विकसित किया है। यह 2.8 से 3.0 मैक की गति से चलता है, जो इसे दुनिया का सबसे तेज़ ऑपरेशनल क्रूज़ मिसाइल बनाता है। इसकी रेंज 300-500 किमी है, जबकि इसका विस्तारित संस्करण 800 किमी तक पहुंच सकता है। भारत की तीनों रक्षा सेवाएं ब्रह्मोस मिसाइल का उपयोग करती हैं। यह जमीन, समुद्र और हवा से लॉन्च हो सकता है। मई 2025 में, ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान, पहली बार युद्ध में ब्रह्मोस का इस्तेमाल किया गया था। यह भारत के रक्षा निर्यात और आत्मनिर्भर भारत मिशन को बढ़ावा देता है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/4tuxkd6j 2. https://tinyurl.com/9a43uakk 3. https://tinyurl.com/58hhx5uj 4. https://tinyurl.com/yzb9ffd9 5. https://tinyurl.com/4j5d4jp3 6. https://tinyurl.com/mvxxv4dc 7. https://tinyurl.com/4ucb3ed9 8. https://tinyurl.com/4b8enne5 9. https://tinyurl.com/2pp53zn7
वन
09-10-2026 09:22 AM • Jaunpur District-Hindi
ज़मीन के नीचे कैसे बातें करते हैं जंगल के शांत पेड़?
जंगल ऊपर से जितने शांत और स्थिर दिखते हैं, ज़मीन के नीचे उनकी दुनिया उतनी ही रहस्यमयी और जीवंत होती है। एक स्वस्थ जंगल हर साल कई टन मृत लकड़ी, पत्तियां और जैविक कचरा उत्पन्न करता है। फिर भी, जंगल की ज़मीन कभी भी कचरे के ढेर में नहीं दबती। इसका कारण ज़मीन के नीचे काम करने वाले सूक्ष्मजीवों, मुख्य रूप से कवक और बैक्टीरिया का एक विशाल नेटवर्क है। जौनपुर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में मौजूद वृक्षों के पारिस्थितिकी तंत्र को समझने के लिए, हमें ज़मीन के नीचे मौजूद इस जैविक इंजन को समझना होगा। मृत कार्बनिक पदार्थों का अपघटन वन पारिस्थितिकी तंत्र में कार्बन और नाइट्रोजन चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
वन पारिस्थितिकी तंत्र में गिरे हुए पत्तों और मृत लकड़ियों का क्या होता है? जंगलों में मृत कार्बनिक पदार्थों में मोटे और महीन मृत लकड़ी और गिरे हुए पत्ते शामिल होते हैं। गिरे हुए पत्तों का कचरा वार्षिक पौधे के कचरे का 22 से 81 प्रतिशत तक हो सकता है। ठंडे और गर्म समशीतोष्ण वनों में पर्णपाती पेड़ों द्वारा हर साल 3 से 5 टन प्रति हेक्टेयर पत्तों का कचरा उत्पन्न होता है। यह कचरा मिट्टी के कटाव को रोकता है, बारिश की बूंदों से मिट्टी को बचाता है और सूक्ष्म जलवायु में होने वाले उतार-चढ़ाव से सुरक्षा प्रदान करता है।
कवक और बैक्टीरिया इस कचरे के मुख्य अपघटक हैं। कवक अपने विशिष्ट एंजाइमों (enzyme) और हाइफे (hyphae) के माध्यम से नए सबस्ट्रेट्स तक पहुंचने की क्षमता के कारण अपघटन में सबसे बड़ा योगदान देते हैं। अपघटन की यह प्रक्रिया वैश्विक स्तर पर हर साल 60 टेराग्राम कार्बन (60 Tg C) छोड़ती है, जो जीवाश्म ईंधन के जलने से निकलने वाले कार्बन से 11 गुना अधिक है। मृत लकड़ी भी वन मिट्टी के लिए पोषक तत्वों का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जो गिरे हुए पत्तों में नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P), पोटेशियम (K) और कैल्शियम (Ca) के वार्षिक इनपुट का 1 से 18 प्रतिशत योगदान देती है।
गिरे हुए पत्तों के भीतर मौजूद कार्बन कोशिका भित्ति के क्षरण के माध्यम से बाहर निकलता है। कोशिका भित्ति के घटकों को उनकी कठोरता के आधार पर तीन समूहों में बांटा जा सकता है: पानी में घुलनशील अणु, हेमीसेल्यूलोज (hemicellulose) व सेल्यूलोज (cellulose), और लिग्निन (lignin) व अन्य सुगंधित यौगिक। पानी में घुलनशील छोटे अणु जैसे अमीनो एसिड और शर्करा आसानी से सुलभ होते हैं और तेजी से बढ़ने वाले सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटित कर दिए जाते हैं। अतीत में बैक्टीरिया की भूमिका को अक्सर नजरअंदाज किया गया था, क्योंकि यह माना जाता था कि वे लकड़ी के पॉलिमर को नष्ट करने में सीमित क्षमता रखते हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में यह सिद्ध हुआ है कि बैक्टीरिया भी लिग्निन को विघटित करने में सक्षम हैं। कचरे में नाइट्रोजन की मात्रा अपघटकों द्वारा अपने चयापचय (metabolic) आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बाहरी नाइट्रोजन के अवशोषण से भी प्रभावित होती है।
जंगल के पेड़ ज़मीन के नीचे फंगल माइसीलियम के ज़रिए कैसे संवाद करते हैं? पेड़ केवल निष्क्रिय पौधे नहीं हैं, बल्कि वे कवक के एक भूमिगत नेटवर्क के माध्यम से संवाद करते हैं, जिसे माइकोराइजल नेटवर्क (Mycorrhizal networks) कहा जाता है। इन जटिल प्रणालियों में माइसीलियम (Mycelium) नामक छोटे धागे होते हैं जो पेड़ों की जड़ों के साथ जुड़ जाते हैं। यह कवक नेटवर्क एक सूचना राजमार्ग के रूप में कार्य करता है, जो पेड़ों को संसाधनों और महत्वपूर्ण सूचनाओं को साझा करने की अनुमति देता है। इस अद्भुत संचार नेटवर्क को उचित ही "वुड-वाइड वेब" (wood-wide web) का नाम दिया गया है।
अपघटक कवक गिरे हुए पत्तों, शाखाओं और यहां तक कि पूरे पेड़ के तनों को तोड़कर पोषक तत्वों को वापस मिट्टी में छोड़ते हैं। पेड़ों और कवक ने एक असाधारण विनिमय प्रणाली विकसित की है। पेड़ प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) के माध्यम से उत्पन्न होने वाली शर्करा (sugars) का 20 प्रतिशत तक अपने फंगल भागीदारों के साथ साझा करते हैं। बदले में, कवक अपने धागों को मिट्टी में फैलाते हैं, जिससे वे मिट्टी के उस आयतन (volume) का पता लगा सकते हैं जो पेड़ों की जड़ों की तुलना में सैकड़ों गुना बड़ा होता है। ये कवक फास्फोरस और नाइट्रोजन जैसे आवश्यक पोषक तत्व निकालकर पेड़ों को देते हैं।
जब किसी पेड़ को किसी बीमारी या शिकारी जीव से खतरा होता है, तो वह माइकोराइजल नेटवर्क या हवा के माध्यम से रासायनिक संकेत (chemical signals) छोड़ सकता है। उदाहरण के लिए, जब एक जिराफ अकैसिया (Acacia) के पत्तों को खाना शुरू करता है, तो पेड़ चोट का पता लगाता है और एथिलीन गैस (ethylene gas) के रूप में एक संकट संकेत छोड़ता है। पड़ोसी अकैसिया पेड़ इसके जवाब में अपने पत्तों में टैनिन (tannins) पंप करते हैं, जिससे उनका स्वाद खराब हो जाता है और जिराफ उन्हें खाने से बचते हैं।
मातृ वृक्ष पूरे जंगल को एक साथ कैसे जोड़े रखते हैं? जंगल में सबसे बड़े और सबसे पुराने पेड़ों को मातृ वृक्ष या मातृ पेड़ (Mother trees) कहा जाता है। ये मातृ वृक्ष इस संचार प्रणाली के केंद्र में होते हैं, जो आसपास की वनस्पतियों और जीवों का पोषण करते हैं। ये प्राचीन रक्षक अपने विशाल जड़ प्रणालियों के माध्यम से पोषक तत्वों और सूचनाओं के हस्तांतरण की सुविधा प्रदान करते हैं, जिससे छोटे पेड़ों को पनपने में मदद मिलती है। ये मातृ पेड़ कीटों या बीमारियों जैसे आने वाले खतरों के बारे में पड़ोसी पौधों को चेतावनी भी देते हैं।
अनुसंधान बताता है कि अधिक मातृ वृक्षों वाले वनों में अधिक जैव विविधता होती है और वे पर्यावरणीय तनावों के प्रति अधिक लचीले होते हैं। जब किसी मातृ वृक्ष को काट दिया जाता है या हटा दिया जाता है, तो स्थापित जड़ प्रणाली गायब हो जाती है, जिससे पोषक तत्वों का साझाकरण और संचार बाधित हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप पड़ोसी पेड़ों को महत्वपूर्ण संसाधनों और सुरक्षात्मक संकेतों से वंचित होना पड़ता है, जिससे पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है।
कवक और पेड़ों की यह साझेदारी जलवायु परिवर्तन और बीमारियों से कैसे बचाती है? कवक और पेड़ों की यह साझेदारी वनों को सूखे और जलवायु परिवर्तन (climate change) से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। फंगल नेटवर्क से जुड़े युवा पेड़ों की जीवित रहने की दर उन पेड़ों की तुलना में काफी बेहतर होती है जो इस नेटवर्क से नहीं जुड़े होते। सूखे के दौरान, कवक पेड़ों को मिट्टी की गहरी परतों से पानी तक पहुंचने में मदद करते हैं। भूमध्यसागरीय (Mediterranean) वनों में किए गए हालिया अध्ययनों से पता चलता है कि अत्यधिक सूखे की घटनाओं के दौरान माइकोराइजल नेटवर्क (mycorrhizal network) से जुड़े पेड़ों में जीवित रहने की दर अलग-थलग पेड़ों की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत अधिक थी।
कवक पेड़ों को प्राकृतिक सुरक्षा भी प्रदान करते हैं, एंटीबायोटिक्स (antibiotics) का उत्पादन करते हैं और पेड़ों को मजबूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (immune response) विकसित करने में मदद करते हैं। लू या अत्यधिक गर्मी (heat waves) के दौरान, कवक नेटवर्क से जुड़े पेड़ बेहतर जल पहुंच के माध्यम से अपनी पत्तियों के तापमान को अधिक स्थिर बनाए रखते हैं। ठंडी परिस्थितियों में, कवक एंटीफ्रीज यौगिकों (antifreeze compounds) का उत्पादन करके जड़ों को जमने से होने वाले नुकसान से बचाते हैं। इसके अलावा, यह साझेदारी कार्बन भंडारण (carbon storage) का भी समर्थन करती है। कवक मिट्टी में कार्बन को सीधे ग्लोमालिन (Glomalin) जैसे यौगिकों के माध्यम से जमा करते हैं। यह चिपचिपा प्रोटीन मिट्टी में कार्बन को दशकों या सदियों तक बंद रख सकता है। कवक मिट्टी की संरचना में सुधार करते हैं, जिससे मिट्टी के कण एक साथ बंधते हैं, जल प्रतिधारण (water retention) बढ़ता है और कटाव कम होता है।
वनों की कटाई या क्लियर-कटिंग (clear-cutting) उन फंगल समुदायों को नष्ट कर देती है जो शायद सदियों से विकसित हुए हों। इसलिए, वनों की बहाली (forest restoration) के लिए स्थानीय मिट्टी का उपयोग करना, परिपक्व पेड़ों की रक्षा करना और शीर्ष मिट्टी (topsoil) को संरक्षित करना आवश्यक है। समशीतोष्ण और बोरियल वनों में आमतौर पर एक्टोमाइकोराइजल कवक (ectomycorrhizal fungi) पाए जाते हैं, जो जड़ के सिरों के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आवरण बनाते हैं। दूसरी ओर, उष्णकटिबंधीय वनों में अर्बस्कुलर माइकोराइजल कवक (arbuscular mycorrhizal fungi) आम हैं, जो सीधे जड़ कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं। पेड़ों और कवक के इस प्राचीन और गहरे संबंध को समझकर ही हम एक ऐसा भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं जिसमें जौनपुर और पूरी दुनिया के जंगल स्वस्थ, लचीले और आत्मनिर्भर बने रहें।
आईए याद करें, क्यों माना गाँधी जी ने, सत्य, करुणा और नैतिकता को, धर्म के प्रमुख स्तंभ ?
जौनपुर की शांत और सुरीली सुबहों में निकलने वाली प्रभात फेरियों की तरह ही, बापू का जीवन भी आध्यात्मिकता और भजनों की मिठास से भरा हुआ था। गांधी जी के लिए धर्म कभी भी बँटवारे या कट्टरपन का ज़रिया नहीं रहा; उनके लिए तो यह इंसान के दिल में छिपी दिव्यता की एक बहुत ही निजी और दार्शनिक खोज थी। आज के दौर में, जहाँ धर्म को लेकर कई तरह की गलतफ़हमियाँ फैली हुई हैं, वहाँ बापू के विचार हमें एक बिल्कुल नई राह दिखाते हैं। इस लेख में हम महात्मा गांधी के धार्मिक दर्शन, उनके आश्रमों में सबके साथ गाए जाने वाले भजनों की अहमियत, और उनके सबसे प्यारे भजन से मिलने वाले हमदर्दी के संदेश को गहराई से समझेंगे। ये बातें आज के सामाजिक और क़ानूनी माहौल में कितनी सटीक बैठती हैं, यह जानकर आप भी अपनी ज़िंदगी में सच्ची शांति और सबको साथ लेकर चलने की सोच अपना सकेंगे।
क्या गांधी जी के लिए धर्म का अर्थ केवल सत्य और नैतिकता की खोज था? पश्चिम बंगाल की रायगंज यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. इति चट्टोपाध्याय के एक रिसर्च पेपर के मुताबिक, गांधी जी का धर्म किसी संस्था या इमारत तक सीमित नहीं था। उनका पक्का यकीन था कि धर्म उन सभी मान्यताओं की जड़ है जो हमें ईश्वर या सच्चाई का एहसास कराता है। उनके लिए 'सत्य ही ईश्वर है' और ईश्वर के प्रति यही लगन सच्चा धर्म है। गांधी जी मानते थे कि कोई भी इंसान धर्म के बिना जी नहीं सकता। यहाँ तक कि भगवान को न मानने वाला नास्तिक इंसान भी किसी न किसी उसूल के रूप में ईश्वरीय ताक़त से जुड़ा होता है। धर्म में इंसान के स्वभाव को साफ़ करने और उसे बेहतर बनाने की गज़ब की ताक़त होती है। उन्होंने सभी धर्मों के बीच आपसी तालमेल, सहनशीलता और सम्मान पर बहुत ज़ोर दिया। बापू का मानना था कि दुनिया में सिर्फ़ एक ही धर्म सच्चा नहीं हो सकता, बल्कि लोगों के हिसाब से कई धर्म हो सकते हैं। एकतरफ़ा सोच रखने के बजाय, हमें सहनशील होना चाहिए। अपनी इस बात को समझाने के लिए उन्होंने सात अंधे लोगों और एक हाथी का मशहूर उदाहरण दिया, जहाँ हर इंसान अपनी-अपनी जगह सही था। इसी 'अनेकांतवाद' यानी बहुलता के सिद्धांत ने उन्हें हर धर्म को उसी के नज़रिए से देखने की समझ दी। बापू ने हिंदू धर्म का निष्काम कर्म, जैन और बौद्ध धर्म की अहिंसा, और ईसाई धर्म के प्यार और माफ़ी जैसे गुणों को खुशी-खुशी अपनाया। उन्होंने ज़बरदस्ती धर्म बदलने का कड़ा विरोध किया। वे कहते थे कि अगर कोई ईसाई व्यक्ति हिंदू धर्म अपनाना चाहता है, तो उसे यह समझाना चाहिए कि जो भागवत में लिखा है, वही बाइबिल में भी है; इसलिए उसे एक और बेहतर ईसाई बनने की कोशिश करनी चाहिए। उनका यह भी मानना था कि जो धर्म रोज़मर्रा की उलझनों को नहीं सुलझाता, वह धर्म कहलाने के लायक़ ही नहीं है। तर्क और नैतिकता उनके धर्म के दो सबसे बड़े खंभे थे। उनका दर्शन 'आध्यात्मिक मानववाद' है, जहाँ इंसान सबसे अहम है और इंसानियत की भलाई ही सबसे बड़ा मक़सद है।
आश्रमों में संगीत और 'वैष्णव जन तो' भजन हमें क्या सिखाता है? गांधी जी मानते थे कि संगीत हमारी आत्मा की आवाज़ है। उनके आश्रमों में रोज़ाना एक साथ बैठकर भजन गाने की बहुत प्यारी सी परंपरा थी, जिसने सभी आश्रमवासियों के बीच एकता की भावना को मज़बूत किया। इन भजनों में सबसे ख़ास और उनका सबसे पसंदीदा भजन था—'वैष्णव जन तो तेने कहिये'। यह मशहूर गुजराती भजन 15वीं सदी के महान कवि नरसिंह मेहता ने लिखा था। बापू ने इसे अपनी रोज़मर्रा की प्रार्थनाओं में शामिल किया था और उनकी बैठकों से पहले इसे हमेशा गाया जाता था। इस भजन के बोलों में ज़िंदगी का एक बहुत गहरा फलसफ़ा छिपा है। भजन की पंक्तियाँ कहती हैं कि असली वैष्णव (भगवान का भक्त) वही है जो दूसरों के दर्द को अपना समझे, दूसरों के दुख दूर करके उन पर उपकार करे, लेकिन मन में कभी घमंड न लाए। वह पूरी दुनिया में सबका सम्मान करता है, किसी की बुराई नहीं करता और अपनी बातों, कामों और मन को एकदम साफ़ रखता है। ऐसा इंसान सबको एक नज़र से देखता है, लालच छोड़ देता है, पराई औरत को माँ के समान मानता है, कभी झूठ नहीं बोलता और दूसरे के पैसे को हाथ तक नहीं लगाता। उसके मन में कोई मोह-माया नहीं होती और वह वैराग्य अपनाकर बस राम के नाम में मगन रहता है। महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौक़े पर दुनिया भर के 150 से ज़्यादा देशों के कलाकारों ने राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि देने के लिए इस भजन को अपनी आवाज़ दी। (Armenia) से लेकर (Angola), श्रीलंका से लेकर (Serbia), (Iraq) और (Iceland) तक के मशहूर स्थानीय कलाकारों ने इस भजन की पहुँच को पूरी दुनिया में साबित कर दिया। बापू के दिल के सबसे करीब रहने वाले इस गीत में करुणा और सेवा का गहरा संदेश छिपा है। यह संगीत सिर्फ़ आश्रम के रूटीन का हिस्सा नहीं था, बल्कि आत्मा की आवाज़ भी था। आप गांधी जी के इस प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो' की मधुर प्रस्तुति इस वीडियो लिंक के माध्यम से सुन सकते हैं:
जिसने दुनिया भर के श्रोताओं को शांति का संदेश दिया है।
क्या न्यायिक प्रणाली में भी गांधीवादी सहानुभूति (एम्पैथी) की आवश्यकता है? सामाजिक न्याय के लिए हमदर्दी या सहानुभूति को सबसे ज़रूरी माना जाता है। सामाजिक न्याय वह आदर्श स्थिति है जहाँ समाज के हर इंसान को बराबर मूल अधिकार, सुरक्षा, मौक़े और सामाजिक फ़ायदे मिलते हैं। इसी सोच को ध्यान में रखते हुए 14 अगस्त 2021 को गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति और जी डी गोयनका यूनिवर्सिटी ने 'न्यायिक सहानुभूति, न्यायशास्त्र और न्याय' विषय पर एक ख़ास लेक्चर आयोजित किया। इस प्रोग्राम में दुनिया के जाने-माने क़ानूनी शिक्षाविद् प्रोफ़ेसर उपेंद्र बक्शी ने अपनी बातें रखीं। कई दशकों तक यह माना जाता था कि क़ानून और न्याय के उसूलों में भावनाओं की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, ताकि सिर्फ़ तर्क और कारण की जीत हो सके। लेकिन अब जानकार यह मानने लगे हैं कि भावनाएँ भी कहीं न कहीं क़ानूनी फैसलों और जजों की सोच पर असर डालती हैं। प्रोफ़ेसर बक्शी ने गांधी जी के प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो' का उदाहरण देते हुए हमदर्दी के मतलब को समझाया। उन्होंने मशहूर केशवानंद भारती मामले का ज़िक्र करते हुए बहुत ही ख़ूबसूरती से बताया कि ऊँचे स्तर पर भी हमदर्दी कैसे काम करती है। प्रोफ़ेसर बक्शी के मुताबिक, हमदर्दी का सीधा सा मतलब है ख़ुद को किसी और की जगह रखकर देखना। इसके दो रूप होते हैं: पहला दिमागी (कोग्निटिव) रूप, जहाँ हम अपने विचारों का इस्तेमाल करके दूसरे के नज़रिए से सोचते हैं। दूसरा जज़्बाती (भावनात्मक) रूप, जहाँ हम असल में वही महसूस करते हैं जो सामने वाला झेल रहा है। सबसे मज़बूत हमदर्दी इन दोनों का मिला-जुला रूप होती है। क़ानून की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए इस हमदर्दी का होना बहुत काम आता है। हर क़ानूनी रिपोर्ट और केस की फ़ाइल के पीछे ऐसे इंसान होते हैं जिनकी ज़िंदगी आर्थिक और मानसिक तौर पर बुरी तरह प्रभावित होती है। हमदर्दी हमें उनके नज़रिए की इज़्ज़त करना सिखाती है।
क्या सत्य और अहिंसा का मार्ग ही मानव जाति का अंतिम लक्ष्य है? बापू की पूरी ज़िंदगी इसी सच्चाई और अहिंसा की खोज में गुज़र गई। उन्होंने हमेशा यही माना कि धर्म और नैतिकता एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं; बिना नैतिकता के धर्म एकदम खोखला है। (Brunners) कलेक्शन की तस्वीरों और चित्रों में भी उनके इसी सादे लेकिन बहुत गहरे जीवन-दर्शन की झलक देखने को मिलती है। उनका मानना था कि भगवान अपनी ही बनाई दुनिया में बसता है, इसलिए ग़रीबों की सेवा करना ही ईश्वर की सच्ची पूजा है। कुल मिलाकर, गांधी जी के धर्म की परिभाषा में ऊँच-नीच, स्वर्ग-नरक का डर या ज़बरदस्ती धर्म बदलने जैसी उन बातों की कोई जगह नहीं है जो हिंसा और नफ़रत को बढ़ावा देती हैं। उनका यह 'आध्यात्मिक मानववाद' और भजनों के ज़रिए करुणा का संदेश आज भी हमारे समाज को जोड़ने का बेहतरीन काम कर रहा है।
कंप्यूटर अक्षरों को कैसे समझता है,जानिए एनकोडिंग और आस्की कोड का इतिहास
जब हम तकनीक की बात करते हैं, तो एनकोडिंग एक ऐसा शब्द है जो डेटा स्टोरेज, संचार, प्रोग्रामिंग और मल्टीमीडिया में बार-बार सामने आता है। लेकिन जब आप अपने कीबोर्ड पर कोई अक्षर टाइप करते हैं, तो कंप्यूटर उस अक्षर को सीधे तौर पर नहीं देखता है; वह केवल एक बाइनरी संख्या को समझता है। उस अक्षर को संख्यात्मक रूप में बदलने की प्रक्रिया ही एनकोडिंग कहलाती है। आधुनिक कंप्यूटरों से लेकर स्मार्टफोन तक, हर उपकरण इसी तकनीक पर निर्भर करता है।
कंप्यूटर की दुनिया में एनकोडिंग क्या है और यह क्यों जरूरी है? एनकोडिंग (Encoding) सूचना को एक रूप या प्रारूप से दूसरे रूप में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है। आमतौर पर, यह परिवर्तन इसलिए किया जाता है ताकि डेटा को कंप्यूटर और अन्य उपकरणों द्वारा कुशलतापूर्वक संग्रहीत, प्रेषित या संसाधित किया जा सके। इसे एक ऐसे संदेश के अनुवाद के रूप में समझा जा सकता है जिसे प्राप्तकर्ता या सिस्टम सबसे अच्छी तरह समझता है। एनकोडिंग के कई फायदे हैं।
सबसे पहले, यह डेटा स्टोरेज में मदद करता है। कंप्यूटर डेटा को बाइनरी में संख्याओं के रूप में संग्रहीत करते हैं। एनकोडिंग टेक्स्ट, इमेज और साउंड जैसे विभिन्न प्रकार के डेटा को बाइनरी में दर्शाने की अनुमति देता है। दूसरा, यह डेटा ट्रांसमिशन के लिए महत्वपूर्ण है। चाहे इंटरनेट पर संदेश भेजना हो या वीडियो स्ट्रीम करना हो, एनकोडिंग डेटा को पैकेज करने में मदद करता है ताकि यह सटीक रूप से यात्रा कर सके। तीसरा, यह अनुकूलता सुनिश्चित करता है, जिससे एक सिस्टम पर बनाया गया डेटा दूसरे सिस्टम पर सही ढंग से पढ़ा जा सके। इसके अलावा, डेटा सुरक्षा के लिए भी एनकोडिंग की भूमिका अहम है।
एनकोडिंग के प्रमुख प्रकार कौन-कौन से हैं? डेटा के प्रकार और उसके उपयोग के आधार पर एनकोडिंग कई रूप ले लेती है। कैरेक्टर एनकोडिंग (Character Encoding) अक्षरों, संख्याओं और प्रतीकों को बाइनरी में बदलने के बारे में है ताकि कंप्यूटर टेक्स्ट को समझ और प्रदर्शित कर सके। इसके उदाहरण आस्की, यूटीएफ-8 (UTF-8) और यूनिकोड हैं। यूटीएफ-8 आज दुनिया भर की अधिकांश भाषाओं के लिए एक लोकप्रिय एनकोडिंग है, जो कई अक्षरों और इमोजी का समर्थन करता है।
मल्टीमीडिया फाइलों को छोटा करने के लिए ऑडियो और वीडियो एनकोडिंग का उपयोग होता है, जिसमें एमपी3 (MP3) और एएसी (AAC) ऑडियो को कंप्रेस करते हैं, जबकि एच.264 (H.264) और एच.265 (H.265) वीडियो को कंप्रेस करते हैं। संचार के लिए डेटा एनकोडिंग में बेस64 (Base64) बाइनरी डेटा को टेक्स्ट प्रारूप में बदलता है ताकि इसे ईमेल के माध्यम से भेजा जा सके। इसी तरह यूआरएल एनकोडिंग वेबसाइट पतों में विशेष वर्णों को ऐसे प्रारूप में परिवर्तित करता है जिसे ब्राउज़र सुरक्षित रूप से संभाल सकें। प्रोग्रामिंग भाषाओं में जैसे कोटलिन (Kotlin), स्ट्रिंग एनकोडिंग और डिकोडिंग को आसानी से संभाला जा सकता है।
आस्की कोड की शुरुआत कब और कैसे हुई थी? आस्की (ASCII) का पूरा नाम अमेरिकन स्टैंडर्ड कोड फॉर इंफॉर्मेशन इंटरचेंज है। 1963 में अमेरिकन नेशनल स्टैंडर्ड इंस्टीट्यूट द्वारा आस्की मानक प्रख्यापित किया गया था, जो कंप्यूटर में अक्षरों, संख्याओं, विराम चिह्नों और नियंत्रण संकेतों का प्रतिनिधित्व करने के लिए सात बिट्स के पैटर्न को निर्दिष्ट करता है। ऐतिहासिक रूप से, आस्की टेलीग्राफिक कोड से विकसित हुआ। इसका पहला व्यावसायिक उपयोग बेल डेटा सेवाओं द्वारा प्रचारित सात-बिट टेलीप्रिंटर कोड के रूप में किया गया था।
आस्की पर औपचारिक काम 6 अक्टूबर 1960 को अमेरिकन स्टैंडर्ड एसोसिएशन की X3.2 उपसमिति की पहली बैठक के साथ शुरू हुआ। मानक का पहला संस्करण 1963 में प्रकाशित हुआ था। आस्की में 128 वर्णों की परिभाषाएं शामिल हैं, जिनमें 33 गैर-मुद्रण नियंत्रण वर्ण हैं, 94 मुद्रण योग्य वर्ण हैं, और स्पेस को एक अदृश्य ग्राफिक माना जाता है। 2008 तक वर्ल्ड वाइड वेब पर सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला कैरेक्टर एनकोडिंग आस्की ही था, जिसके बाद यूटीएफ-8 ने इसकी जगह ले ली।
यूनिकोड कंसोर्टियम ने वैश्विक भाषाओं को डिजिटल पहचान कैसे दी? यूनिकोड कंसोर्टियम को जनवरी 1991 में कैलिफोर्निया राज्य में शामिल किया गया था। इसकी शुरुआत 1987 में ज़ेरॉक्स (Xerox) के इंजीनियर जो बेकर (Joe Becker) और एप्पल (Apple) के इंजीनियरों ली कॉलिन्स (Lee Collins) और मार्क डेविस (Mark Davis) द्वारा की गई चर्चाओं के बाद हुई। इनका लक्ष्य एक नया कैरेक्टर एनकोडिंग बनाना था, जिसे यूनिकोड (Unicode) कहा गया।
प्रारंभिक यूनिकोड मानक 1991 में प्रकाशित हुआ था। इसका लक्ष्य आधुनिक पाठ में सभी वर्णों का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक चर बिट मानक बनाना था, जिसमें सभी लैटिन, एशियाई, ग्रीक, अरबी, सिरिलिक और हिब्रू वर्णमाला, संगीत, अंतर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला, इमोजी और यहां तक कि ब्रेल भी शामिल थे। आधुनिक कंप्यूटर और मोबाइल उपकरणों पर लगभग सभी वर्णों का आधार अब यूनिकोड मानक ही है।
डिजिटल ब्रेल लिपि और स्क्रीन रीडर तकनीक कैसे काम करती है? कंप्यूटर और मोबाइल उपकरणों पर ब्रेल डिस्प्ले का उपयोग करते समय, स्क्रीन रीडर ही यह निर्धारित करता है कि कौन से ब्रेल कोड उपलब्ध होंगे। यूनिकोड मानक के कारण, सभी 256 आठ-डॉट ब्रेल वर्णों का यूनिकोड मान U+2800 से U+28ff तक होता है। स्क्रीन रीडर इन वर्णों को ब्रेल में प्रस्तुत करने के लिए जिम्मेदार है। यह एक सुचारू प्रक्रिया है, लेकिन कभी-कभी इसमें तकनीकी समस्याएं भी आती हैं।
उदाहरण के लिए, एपोस्ट्रोफी (Apostrophe) वर्ण को लेकर समस्या आती है। यूनिकोड में, अक्सर एपोस्ट्रोफी और एकल क्लोजिंग कोटेशन मार्क दोनों को दर्शाने के लिए एक ही वर्ण का उपयोग किया जाता है। आम पाठकों को यह अंतर दिखाई नहीं देता, लेकिन ब्रेल पाठकों के लिए यह एक समस्या है क्योंकि ब्रेल में एपोस्ट्रोफी और क्लोजिंग कोट पूरी तरह से अलग होते हैं। कई ब्रेल पाठक कॉन्ट्रैक्टेड ब्रेल पढ़ना पसंद करते हैं, जिसके लिए स्क्रीन रीडर एक ब्रेल तालिका तक पहुंचता है जो यह जानकारी प्रदान करती है कि पाठ को कैसे अनुबंधित किया जाना चाहिए।
मोबाइल और कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम में ब्रेल कोड के क्या विकल्प मौजूद हैं? एप्पल के आईओएस (iOS) और आईपैडओएस (iPadOS) उपकरणों में वॉयसओवर (VoiceOver) सुविधा के तहत ब्रेल सेटिंग्स मौजूद होती हैं। इसमें आउटपुट और इनपुट के लिए अनकॉन्ट्रैक्टेड 6-डॉट, अनकॉन्ट्रैक्टेड 8-डॉट और कॉन्ट्रैक्टेड ब्रेल के विकल्प मिलते हैं। अनकॉन्ट्रैक्टेड 6-डॉट ब्रेल में बड़े अक्षरों को इंगित करने के लिए डॉट 6 का उपयोग होता है, जबकि 8-डॉट ब्रेल में डॉट 7 का उपयोग किया जाता है। अमेरिका में डिफ़ॉल्ट रूप से इंग्लिश यूनिफाइड (Unified English Braille) टेबल लोड होती है। मैक (Mac) कंप्यूटरों में भी वॉयसओवर यूटिलिटी के तहत इसी तरह की सेटिंग्स और ब्रेल ट्रांसलेशन टेबल्स उपलब्ध होती हैं।
एंड्रॉइड (Android) उपकरणों की बात करें तो अगस्त 2022 में एंड्रॉइड 13.0 के जारी होने के साथ ब्रेल सुविधाओं को गूगल के स्क्रीन रीडर टॉकबैक (TalkBack) में एकीकृत किया गया था। जनवरी 2023 में, गूगल ने टॉकबैक 13.1 जारी किया जिसमें ब्रेल तालिकाओं की एक विस्तृत सूची उपलब्ध कराई गई। इसमें 6-डॉट कंप्यूटर ब्रेल और नॉर्थ अमेरिकन ब्रेल कंप्यूटर कोड जैसे विकल्प जोड़े गए, जिससे बीआरएफ (BRF) फाइलें पढ़ना संभव हो सका।
विंडोज़ (Windows) पीसी पर सबसे लोकप्रिय स्क्रीन रीडर जॉज़ (JAWS) और एनवीडीए (NVDA) हैं। जॉज़ में दर्जनों भाषाओं के लिए ब्रेल अनुवाद की सुविधा है, जिसमें कंप्यूटर ब्रेल, यूएस इंग्लिश ग्रेड 1 और ग्रेड 2, और यूनिफाइड इंग्लिश ब्रेल के विकल्प मिलते हैं। जॉज़ में 8-डॉट ब्रेल मोड में टेक्स्ट प्रदर्शित करने का विकल्प भी है। एनवीडीए में भी 6-डॉट और 8-डॉट कंप्यूटर ब्रेल के साथ-साथ ग्रेड 1 और ग्रेड 2 के इनपुट और आउटपुट टेबल उपलब्ध हैं। इन सभी तकनीकी प्रगति ने दृष्टिबाधित लोगों के लिए डिजिटल दुनिया को बहुत अधिक सुलभ और समावेशी बना दिया है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/27w69ypr
2. https://tinyurl.com/2agpuvfc
3. https://tinyurl.com/2augl5st
4. https://tinyurl.com/22d972fr
जलवायु और मौसम
21-09-2026 09:27 AM • Jaunpur District-Hindi
जौनपुर वासियों, आज पढ़िए, भारत का अनूठा भौगोलिक परिप्रेक्ष्य कैसे देता है मानसून को जन्म
हम सब, प्रत्येक वर्ष जून महीने की शुरुआत में बारिश की राह देखते हैं। हमारे जौनपुर जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में बारिश जीवनदाता है। मानसून, केवल अधिक बारिश की एक बौछार नहीं है, बल्कि भूमि और महासागर के तापन के अंतर के कारण प्रचलित हवाओं में होने वाला एक बड़ा मौसमी बदलाव है। भारत में तीव्र मानसून इसलिए आता है, क्योंकि विशाल एशियाई भूभाग गर्मियों में तेजी से गर्म होकर कम वायु दाब वाला क्षेत्र बनाता है। इससे हिंद महासागर से उठी नमी से भरी हवाएँ भारतीय उपमहाद्वीप पर बहती हैं, जो फिर हिमालय से टकराकर हमारे क्षेत्र में बारिश बनकर गिरती हैं। इसके विपरीत, यूरोप में कोई वास्तविक मानसून नहीं है। हालांकि, मानसून प्रणालियाँ अन्य स्थानों पर भी मौजूद हैं, जो उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका में मौसमी वर्षा को आकार देती हैं।
व्यापक रूप से कहें तो पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में विपरीत ऋतुएँ होती हैं। जैसे-जैसे पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है, पृथ्वी के अक्ष का झुकाव बदलता रहता है। जून, जुलाई और अगस्त महीनों के दौरान पृथ्वी का झुकाव उत्तरी गोलार्ध के हिस्से को सूर्य की ओर अधिक रखता है, और दक्षिणी हिस्सा दूर झुका होता है। दिसंबर, जनवरी और फरवरी महीनों में इसके विपरीत स्थिति होती है। तब दक्षिण गोलार्ध में अधिक प्रकाश, लंबे दिन और अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त होती है। ध्यान दें कि ऋतुओं में परिवर्तन पृथ्वी के इसी झुकाव के कारण होते हैं, और न कि पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी के कारण।
भूमध्य रेखा (Equator) के निकट स्थित क्षेत्रों में आमतौर पर केवल दो ही ऋतुएँ होती हैं - वर्षा (मानसून) और शुष्क। चूंकि वे क्षेत्र भूमध्य रेखा (जहाँ सूर्य किरणें हमेशा सीधी गिरती हैं) के पास हैं, इसलिए वर्ष के दौरान उन्हें मिलने वाली प्रकाश की मात्रा में बहुत अधिक बदलाव नहीं होता है।
इतिहास में मिस्रवासियों के पास नील नदी के आधार पर तीन ऋतुएँ थीं - बाढ़, वृद्धि और कम पानी। प्रारंभिक ब्रिटेन (Britain) में बेल्टैन (Beltane) त्योहार को गर्मियों की शुरुआत और हैलोवीन (Halloween) त्योहार को इसकी समाप्ति के रूप में चिह्नित किया। रोमन लोग (Roman people)चार ऋतुएँ मानते थे; और यूनानी लोग (Greek people) अपने स्थान के आधार तीन या चार ऋतुएँ मानते थे। जबकि हिंदू कैलेंडर में छह ऋतुएँ हैं।
भारत में एक प्रभावशाली उष्णकटिबंधीय मानसून है, क्योंकि विशाल एशियाई भूभाग का तीव्र ग्रीष्मकालीन तापन एक विशाल कम दबाव का क्षेत्र बनाता है। यह क्षेत्र, गर्म हिंद महासागर से नमी से भरी हवाओं को खींचता है। यूरोप में इस प्रणाली का अभाव है, क्योंकि इसका उच्च अक्षांश, छोटा भूभाग और ठंडा अटलांटिक महासागर एक वास्तविक उष्णकटिबंधीय मानसून के लिए आवश्यक तापमान के उतार-चढ़ाव और मौसमी हवा के परिवर्तन को रोकते हैं। इस प्रकार, इन दोनों क्षेत्रों में मुख्य भौगोलिक और जलवायु संबंधी अंतर निम्नलिखित हैं:
1. भूमि तापन: भारत उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के पास स्थित है, जहाँ सीधी धूप उपमहाद्वीप और तिब्बती पठार को तीव्रता से गर्म करती है, जिससे एक विशाल गर्म क्षेत्र बनता है। यूरोप और उत्तर में स्थित क्षेत्र अधिक हल्के, क्रमिक तापमान परिवर्तनों का अनुभव करते हैं।
2. महासागर का प्रभाव: हिंद महासागर और अरब सागर का गर्म उष्णकटिबंधीय पानी, आसानी से भारी मात्रा में जल वाष्प बनाता है। यूरोप के पास स्थित उत्तर अटलांटिक महासागर ठंडा और अधिक स्थिर है, जो भारी वायुमंडलीय पलटाव को चालना देने में विफल रहता है।
3. हवा और दबाव में बदलाव: भारत, मौसमी हवाओं के पूर्ण परिवर्तन का अनुभव करता है (दक्षिण-पश्चिम से आने वाली ग्रीष्मकालीन हवाएँ व उत्तर-पूर्व से आने वाली शुष्क शीतकालीन हवाएँ)। इसके बजाय, यूरोप उष्णकटिबंधीय हवा-पैटर्न में बदलाव के बजाय, साल भर स्थिर मध्यम अक्षांश पश्चिमी हवाओं (Westerly winds) और समशीतोष्ण कम दबाव प्रणालियों के वर्चस्व में रहता है।
4. प्राकृतिक अवरोध: भारत में हिमालय ठंडी उत्तरी हवाओं को देश में प्रवेश करने से रोकता है और मानसून की नमी को अवरुद्ध करता है, जिससे वर्षा तेज होती है। यूरोप की मुख्य पर्वत श्रृंखला – आल्प्स (Alps) पश्चिम से पूर्व की ओर खड़ी है और मौसमी उष्णकटिबंधीय वायु द्रव्यमान को अवरुद्ध नहीं कर पाती है।
मानसून, केवल एशिया महाद्वीप की विशेषता नहीं है। दरअसल, विश्व में बारिश के लिए एशियाई-ऑस्ट्रेलियाई-अफ्रिकी मानसून (Asian-Australian-African Monsoon) कार्य करता है। उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका के बीच मानसून चक्रों में कुछ समानताएँ हैं, और उनके पीछे निश्चित वायुमंडलीय प्रक्रियाएँ हैं। हालांकि ये दोनों क्षेत्र भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से काफी दूर स्थित हैं, लेकिन इनमें मौसमी हवाओं के रुख में होने वाले बदलाव (Seasonal wind shifts) और वायुमंडलीय परिसंचरण (Atmospheric circulation) की प्रणालियों में गहरी समानता पाई जाती है।
दोनों ही क्षेत्रों में, मानसूनी चक्र मुख्य रूप से मौसमी हवाओं की दिशा में होने वाले बड़े पैमाने पर परिवर्तन (Reversal) पर निर्भर करते हैं। ग्रीष्म ऋतु में गर्म भूमि के ऊपर कम वायुदाब का क्षेत्र बनता है, जिससे समुद्र से नमी से भरी हवाएं जमीन की ओर बहती हैं।
अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का मौसमी स्थानांतरण, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका दोनों जगहों पर मानसूनी वर्षा को निर्धारित करने में मुख्य भूमिका निभाता है। सूर्य की स्थिति के साथ यह क्षेत्र उत्तर और दक्षिण की ओर स्थानांतरण करता है, जिससे दोनों क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से वर्षा और सूखे मौसम के चक्र उत्पन्न होते हैं।
एक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि भौगोलिक भिन्नताओं के बावजूद, वायुमंडल और महासागरों की प्रतिक्रियाओं के कारण दोनों क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा का पैटर्न समान नियमों और प्रक्रियाओं से संचालित होता है। इस प्रकार, इस कार्य में बहु-पैमाने की परस्पर क्रिया के दृष्टिकोण से, एशियाई-ऑस्ट्रेलियाई-अफ्रिकी मानसून को एक एकीकृत इकाई के रूप में माना जाता है।
मानसून में योगदान देने वाले ये वायुमंडलीय परिवर्तन, निश्चित सिद्धांतों पर आधारित है। गर्म होने पर हवा फैलती है और ठंडी होने पर संकुचित होती है। इसके परिणामस्वरूप, वायुमंडलीय दबाव में बदलाव होता है। वायुमंडलीय दबाव में अंतर उच्च दबाव से कम दबाव की ओर हवा की गति का कारण बनता है, जिससे हवा गति में आ जाती है। वायुमंडलीय दबाव यह भी निर्धारित करता है कि हवा कब ऊपर उठेगी या नीचे बहेगी।
क्षैतिज गति में चलने वाली हवा (Wind), विभिन्न अक्षांशों में गर्मी और नमी को पुनर्वितरित करती है, जिससे पूरे ग्रह के लिए एक स्थिर तापमान बना रहता है। इसके विपरीत, नम हवा के लंबवत रूप से ऊपर उठने से बादल बनते हैं और वर्षा होती है। भूमध्य रेखा के पास समुद्र तल पर हवा का दबाव कम होता है और इस क्षेत्र को भूमध्यरेखीय निम्न (Equatorial low) कहा जाता है। 30° उत्तर और 30° दक्षिण अक्षांशों के साथ उच्च दबाव वाले क्षेत्र पाए जाते हैं, जिन्हें उपोष्णकटिबंधीय उच्च (Subtropical highs) कहा जाता है। ध्रुवों की ओर 60° उत्तर और 60° दक्षिण के साथ, कम दबाव की बेल्ट को उपध्रुवीय निम्न (Subpolar lows) कहा जाता है। ध्रुवों के पास दबाव अधिक होता है और इसे ध्रुवीय उच्च (Polar high) कहा जाता है।
ये दबाव बेल्ट प्रकृति में स्थायी नहीं होते हैं। वे सूर्य की स्पष्ट गति के साथ स्थानांतरण करते हैं। वे सर्दियों में उत्तरी गोलार्ध में दक्षिण की ओर और गर्मियों में उत्तर की ओर बढ़ते हैं। उच्च और कम दबाव प्रणालियों के परिणामस्वरूप दबाव में अंतर के दो मुख्य कारण हैं – तापीय और गतिक (Dynamic)। जब हवा गर्म होती है, तो यह फैलती है, और इसलिए इसका घनत्व कम हो जाता है। इससे स्वाभाविक रूप से कम दबाव बनता है। इसके विपरीत, शीतलन से संकुचन होता है। यह घनत्व को बढ़ाता है और इस प्रकार उच्च दबाव की स्थिति पैदा करता है। भूमध्यरेखीय निम्न और ध्रुवीय उच्च का निर्माण क्रमशः तापीय निम्न और तापीय उच्च के उदाहरण हैं।
तापमान में बदलाव के अलावा, दबाव बेल्ट के गठन को दबाव प्रवणता बलों (Pressure gradient forces) और पृथ्वी के घूर्णन (कोरियोलिस बल – Coriolis force) से उत्पन्न होने वाले गतिशील नियंत्रणों द्वारा समझाया जा सकता है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/7pvpd69c
2. https://tinyurl.com/4wabrzte
3. https://tinyurl.com/462rhmm2
ध्वनि II - भाषाएँ
14-09-2026 09:31 AM • Jaunpur District-Hindi
जब प्रेस के भूखे मजदूरों के लिए प्रेमचंद ने लुटा दिए थे अपने गरम सूट के पैसे
भारतीय साहित्य में आम जनजीवन, ग्रामीण यथार्थ, किसानों के शोषण और सामाजिक रूढ़ियों को जितनी संवेदनशीलता और गहराई से मुंशी प्रेमचंद ने चित्रित किया है, वैसा उदाहरण विश्व साहित्य में विरले ही मिलता है। 31 जुलाई 1880 को बनारस से चार मील दूर लमही गाँव में जन्मे धनपतराय श्रीवास्तव को आज दुनिया 'उपन्यास सम्राट' और 'कलम के सिपाही' के रूप में जानती है। प्रेमचंद का संपूर्ण जीवन घोर अभावों, पारिवारिक त्रासदियों और लगातार संघर्षों के बीच बीता। किंतु जीवन की भयंकर विषमताओं ने उनकी सृजनशीलता को दबाने के बजाय और अधिक धारदार बना दिया। उन्होंने समाज के वंचितों, गरीबों और उपेक्षितों की पीड़ा को केवल कागज़ पर उकेरा ही नहीं, बल्कि स्वयं उसे हर क्षण जिया भी।
धनपतराय का बचपन किन विषम परिस्थितियों और घोर अभावों में बीता? प्रेमचंद का प्रारंभिक जीवन अत्यंत दुखद और संघर्षपूर्ण रहा। उनके पिता अजायब राय डाकखाने में एक मामूली नौकर के रूप में कार्य करते थे। जब धनपतराय केवल आठ वर्ष के थे, तब उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। पिता ने दूसरा विवाह कर लिया, जिसके कारण बालक धनपतराय मातृ-स्नेह से सर्वथा वंचित रह गए। घर में भयंकर गरीबी थी; न पहनने के लिए पर्याप्त कपड़े थे और न ही खाने के लिए भरपेट भोजन। सौतेली माँ का कठोर और उपेक्षित व्यवहार बालक के संवेदनशील मन को भीतर तक कचोटता था, जिसकी टीस बाद में उनकी अनेक प्रसिद्ध कहानियों में पात्रों के माध्यम से परिलक्षित हुई।
जब वे केवल 15 वर्ष के थे और नौवीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तब उनके पिता ने बिना सोचे-समझे उनका विवाह एक उम्र में बड़ी और कटुभाषी कन्या से करा दिया। इस बेमेल विवाह से प्रेमचंद का वैवाहिक जीवन अत्यंत कष्टप्रद हो गया। विवाह के ठीक एक वर्ष बाद पिता का भी देहांत हो गया। अचानक 16 वर्ष के किशोर धनपतराय के कंधों पर पाँच सदस्यों—विमाता, उनके दो छोटे बच्चे, पत्नी और स्वयं—के भरण-पोषण का भारी बोझ आ गया। आर्थिक तंगी का यह आलम था कि उन्हें अपना कोट और व्यक्तिगत पुस्तकें तक बेचनी पड़ीं। वे गाँव से बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। आगे चलकर वकील बनने की तमन्ना थी, किंतु गरीबी ने सपने तोड़ दिए। स्कूल आने-जाने के खर्च से बचने के लिए उन्होंने एक वकील के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया, जहाँ उन्हें प्रतिमाह पाँच रुपये मिलते थे। इन पाँच रुपयों में से तीन रुपये वे गाँव में परिवार को भेजते थे और शेष दो रुपयों से महीने भर अभावों के बीच रहकर उन्होंने किसी प्रकार अपनी मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।
पुस्तकें पढ़ने की दीवानगी ने कैसे एक सेल्स बॉय को महान लेखक बना दिया? विषम परिस्थितियों के बावजूद साहित्य के प्रति प्रेमचंद का अनुराग कभी कम नहीं हुआ। मिडिल स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही उन्हें उपन्यास पढ़ने का ऐसा चस्का लगा कि वे किताबों की दुनिया में ही अपनी तन्हाई का सुकून ढूँढ़ने लगे। इसी शौक को पूरा करने के लिए उनकी पहली नौकरी एक पुस्तक विक्रेता की दुकान पर 'सेल्स बॉय' के रूप में हुई। वहाँ काम करने का एकमात्र उद्देश्य यह था कि वे दुकान पर बैठकर बिना पैसे खर्च किए अधिक से अधिक उपन्यास पढ़ सकें। दो से तीन वर्षों के भीतर ही उन्होंने कितने ही उर्दू उपन्यास पढ़ डाले।
उपन्यास पढ़ने की उनकी दीवानगी इस हद तक थी कि एक उपन्यास पढ़ने के लिए उन्होंने एक तंबाकू विक्रेता से मित्रता कर ली और उसकी दुकान पर बैठकर प्रसिद्ध तिलिस्मी गाथा 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' पूरी पढ़ डाली। कम उम्र में ही उन्होंने अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध उपन्यासकार रोनाल्ड (Ronald) की कृतियों के उर्दू अनुवाद पढ़ लिए थे। 13 वर्ष की आयु में ही उन्होंने पहली व्यंग्यात्मक रचना 'मॉकरी' (Mockery) लिखी, जो उनके एक नाते के मामू (चाचा) पर केंद्रित थी, क्योंकि वे प्रेमचंद को किस्से-कहानियाँ पढ़ने पर डांटते थे। वर्ष 1894 में उन्होंने 'होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात' नामक नाटक लिखा। इसके बाद 1898 में ऐतिहासिक उपन्यास 'रूठी रानी' और 1902 में 'प्रेमा' तथा 1904-05 में 'हम खुर्मा व हम सवाब' उपन्यासों की रचना की, जिनमें विधवा-समस्या का सजीव चित्रण किया गया।
'सोज़े वतन' पर अंग्रेज़ों का पहरा और नवाब राय के 'प्रेमचंद' बनने की कहानी क्या है? वर्ष 1905 में पारिवारिक कटुता के चलते पहली पत्नी मायके चली गई और कभी नहीं लौटी, यद्यपि प्रेमचंद वर्षों तक उन्हें खर्चा भेजते रहे। 1905 के अंत में उन्होंने एक बाल-विधवा शीवरानी देवी से दूसरा विवाह किया। इस विवाह के बाद उनके जीवन में कुछ आर्थिक स्थिरता आई और वे शिक्षा विभाग में स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर नियुक्त किए गए।
आरंभ में वे 'नवाब राय' के नाम से उर्दू में लिखते थे। वर्ष 1907 में उनका पाँच देशभक्तिपूर्ण कहानियों का ऐतिहासिक संग्रह 'सोज़े वतन' (वतन का दुख-दर्द) प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में स्वाधीनता और देशप्रेम की ऐसी प्रखर भावना थी कि अंग्रेज़ी हुकूमत सतर्क हो गई। अंग्रेज़ शासकों ने इसे खुली बगावत मानते हुए नवाब राय को तलब किया। ब्रिटिश अधिकारियों ने प्रेमचंद के सामने ही 'सोज़े वतन' की सभी उपलब्ध प्रतियों को आग के हवाले कर दिया और उन पर बिना पूर्व अनुमति के लिखने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
सरकारी नौकरी और इस प्रशासनिक बंधन के कारण लेखन जारी रखना कठिन हो गया। तब प्रेमचंद ने अपने घनिष्ठ मित्र और 'ज़माना' पत्रिका के संपादक मुंशी दयानारायण निगम से परामर्श किया। मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें गुप्त रूप से 'प्रेमचंद' नाम से लिखने का बहुमूल्य सुझाव दिया। इसके बाद धनपतराय हमेशा के लिए 'प्रेमचंद' बन गए, और पाठकों ने आदरपूर्वक उनके नाम के आगे 'मुंशी' की मानद उपाधि जोड़ दी।
सरकारी नौकरी छोड़कर गांधीजी के आंदोलन में क्यों कूद पड़े थे प्रेमचंद? प्रेमचंद केवल कलम के धनी नहीं थे, बल्कि एक सच्चे राष्ट्रभक्त भी थे। जब महात्मा गांधी ने 1920 के दशक में देशव्यापी असहयोग आंदोलन का आह्वान किया, तो प्रेमचंद ने अपने बढ़ते हुए परिवार के भरण-पोषण की भारी चिंताओं के बावजूद अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी (डिप्टी इंस्पेक्टर पद) से तत्काल त्यागपत्र दे दिया।
उनका स्पष्ट मानना था कि राष्ट्र की आज़ादी के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा का बलिदान देना आवश्यक है। उन्होंने साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का हथियार बनाया और वाराणसी में 'सरस्वती प्रेस' की स्थापना की। जीवन की सार्थकता पर उनका एक प्रसिद्ध कथन आज भी प्रासंगिक है: "जीवन में सफल होने के लिए जिस चीज़ की आवश्यकता है, वह शिक्षा है; केवल साक्षरता और डिग्रियाँ नहीं।"
'कफ़न' से लेकर 'गोदान' तक: प्रेमचंद की अमर कहानियों और उपन्यासों का क्या मर्म है? प्रेमचंद ने अपने जीवनकाल में दर्जनों अमर उपन्यासों और 300 से अधिक कहानियों की रचना की, जो भारतीय समाज का दर्पण हैं:
गोदान (1935-36): इसे भारतीय साहित्य का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माना जाता है। यह किसान होरी की गाय पालने की अधूरी लालसा और महाजनी व्यवस्था, कर्ज तथा जातिगत शोषण के दुष्चक्र की हृदयविदारक गाथा है। उनका अंतिम उपन्यास 'मंगलसूत्र' अधूरा रह गया था।
कफ़न: घीसू और माधव की यह कहानी भीषण गरीबी द्वारा मानवीय संवेदनाओं और गरिमा के क्षरण की पराकाष्ठा को दिखाती है, जहाँ प्रसव पीड़ा से मरी बुधिया के कफ़न के पैसों से दोनों शराब और पूरियाँ खा जाते हैं।
ईदगाह: अनाथ बालक हामिद और उसकी बूढ़ी दादी अमीना के अगाध प्रेम की कहानी। मेले में खिलौने और मिठाइयों के बजाय दादी की उँगलियों को तवे से जलने से बचाने के लिए चिमटा खरीदना बाल-मन के अप्रतिम त्याग को दर्शाता है।
पूस की रात: गरीब किसान हल्कू और उसके वफ़ादार कुत्ते जबरा की यह कहानी भीषण ठंड, लगान और कर्ज के दबाव में खेत बर्बाद होने की बेबसी को उकेरती है।
नमक का दारोगा: मुंशी वंशीधर की अटूट सत्यनिष्ठा और भ्रष्ट पूंजीपति पंडित अलोपीदीन के घमंड को चूर करने वाली यह कथा धर्म और धन के संघर्ष का शाश्वत संदेश देती है।
पंच परमेश्वर: अलगू चौधरी और जुम्मन शेख़ की मित्रता और न्याय के सर्वोच्च आसन पर बैठकर व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर उठने की सीख।
दो बैलों की कथा: हीरा और मोती नामक दो बैलों की निष्ठा और आज़ादी की तड़प के माध्यम से मानवीय स्वतंत्रता का रूपक।
बूढ़ी काकी: संपत्ति हड़प लेने के बाद परिवार द्वारा उपेक्षित अंधी वृद्धा की दयनीय स्थिति का मर्मस्पर्शी चित्रण।
बड़े घर की बेटी: संयुक्त परिवार की मर्यादा, स्वाभिमान और आपसी सामंजस्य की कहानी।
सती: पारंपरिक समाज में नारी पर थोपे गए बंधनों, विधवापन और सम्मान के नाम पर होने वाले उत्पीड़न की तीखी आलोचना।
सादगी, मानवीय करुणा और अनीश्वरवाद: प्रेमचंद के व्यक्तित्व का क्या रहस्य था? मुंशी प्रेमचंद स्वभाव से अत्यंत सरल, हंसमुख और दिखावे से कोसों दूर रहने वाले व्यक्ति थे। वे सदैव ठेठ गंवई लिबास पहनते थे और जीवन की बड़ी से बड़ी विपत्ति का सामना मुस्कुराते हुए करते थे। मुंशी दयानारायण निगम को लिखे एक पत्र में उन्होंने सूरदास का स्मरण करते हुए लिखा था: "हमारा काम तो खूब जी-तोड़ खेलना है... पटखनी खाने के बाद धूल झाड़कर खड़े हो जाना चाहिए और कहना चाहिए कि तुम जीते हम हारे, पर हम फिर लड़ेंगे।"
उनकी मानवीय करुणा का उदाहरण उनकी पत्नी शीवरानी देवी के संस्मरण से मिलता है। एक बार कड़ाके की ठंड में प्रेमचंद को गरम सूट बनवाने के लिए दो बार 40-40 रुपये दिए गए। उन्होंने दोनों बार वे रुपये अपनी सरस्वती प्रेस के भूखे मजदूरों में बाँट दिए। पत्नी के विरोध करने पर उन्होंने सहजता से कहा: "यह कहाँ का इंसाफ़ है कि हमारी प्रेस के मजदूर भूखे मरें और हम गरम सूट पहनकर घूमें।"
जीवन भर गरीबी, अन्याय और पीड़ितों की बेबसी देखने के कारण वे पारंपरिक ईश्वरवादी नहीं रह सके। उन्होंने प्रसिद्ध लेखक जैनेंद्र कुमार को लिखा था कि "मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।" यहाँ तक कि मृत्यु से कुछ घंटे पूर्व भी उन्होंने कहा था कि "मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।"
वर्ष 1936 में गंभीर रूप से अस्वस्थ होने के बावजूद उन्होंने 'प्रगतिशील लेखक संघ' के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता की। उचित इलाज और साधनों के अभाव में 8 अक्टूबर 1936 को यह महान ज्योतिपुंज सदा के लिए बुझ गया, किंतु उनकी लेखनी आज भी शोषितों और वंचितों के अधिकारों की सबसे बुलंद आवाज़ बनी हुई है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2cn7wkkp
2. https://tinyurl.com/23p9s9r6
3. https://tinyurl.com/233x7ytw
बैक्टीरिया, प्रोटोज़ोआ, क्रोमिस्टा और शैवाल
07-09-2026 09:54 AM • Jaunpur District-Hindi
स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू में क्या है अंतर जिसे जानना है आपके लिए ज़रूरी?
हर साल इन्फ्लूएंजा यानी फ्लू दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करता है, जिसके कारण कई लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है और कई मामलों में यह जानलेवा भी साबित होता है। जब भी फ्लू के विभिन्न प्रकारों की बात होती है, तो स्वाइन फ्लू का नाम सबसे प्रमुखता से सामने आता है। यह एक ऐसा श्वसन संक्रमण है जिसने दुनिया भर के लोगों और स्वास्थ्य प्रणालियों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। हालांकि स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों ही इन्फ्लूएंजा वायरस के कारण होते हैं, लेकिन इनकी उत्पत्ति, लक्षणों की गंभीरता और प्रभावित करने के तरीके में बहुत बड़ा अंतर है। आज के समय में इन दोनों के बीच के अंतर को समझना और सही सावधानियाँ बरतना बेहद ज़रूरी है।
स्वाइन फ्लू क्या है? स्वाइन फ्लू एक प्रकार का वायरल संक्रमण है जिसे एच वन एन वन (H1N1) वायरस के नाम से भी जाना जाता है। इस बीमारी का नाम स्वाइन फ्लू इसलिए पड़ा क्योंकि यह इन्फ्लूएंजा वायरस के उस प्रकार से काफी मिलता-जुलता है जो सूअरों में श्वसन तंत्र की बीमारी का कारण बनता है। समय के साथ इस वायरस के जीन में बदलाव हुए और यह इंसानों को भी संक्रमित करने लगा। यह वायरस मुख्य रूप से श्वसन तंत्र यानी नाक, गले और फेफड़ों को अपना शिकार बनाता है। एक बहुत बड़ी गलतफहमी यह है कि स्वाइन फ्लू सूअर का मांस खाने से फैलता है, जबकि चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अच्छी तरह से पकाया गया मांस खाने से यह संक्रमण बिल्कुल नहीं होता है।
साल 2009 की स्वाइन फ्लू महामारी ने दुनिया को कैसे प्रभावित किया? अप्रैल 2009 में अमेरिका और मैक्सिको में एच वन एन वन वायरस का एक बिल्कुल नया प्रकार सामने आया था। क्योंकि यह वायरस नया था, इसलिए युवाओं और बच्चों में इसके प्रति कोई रोग प्रतिरोधक क्षमता नहीं थी। देखते ही देखते कुछ ही हफ्तों में यह वायरस दुनिया भर में फैल गया और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित कर दिया। इस महामारी ने दुनिया भर की स्वास्थ्य प्रणालियों की कड़ी परीक्षा ली।
एशियाई देशों में इस महामारी के प्रभाव ने कई कमियों को उजागर किया। जब यह संक्रमण एशिया में पहुंचा, तो हवाई अड्डों पर थर्मल स्कैनर लगाए गए और स्कूल बंद किए गए। कई देशों में होटलों को ही आइसोलेशन सेंटर बना दिया गया। हालांकि, ये बाहरी पाबंदियाँ वायरस को रोकने में बहुत ज्यादा कारगर साबित नहीं हुईं। इस दौरान अस्पतालों में वेंटिलेटर और आईसीयू बेड की भारी कमी देखी गई। ऑक्सीजन की आपूर्ति कम पड़ गई और एंटीवायरल दवाओं के वितरण को लेकर भी कई नीतियां विफल रहीं। इस महामारी ने यह सिखाया कि किसी भी आपातकालीन स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए अस्पतालों का बुनियादी ढांचा मजबूत होना और सही जानकारी का तेजी से प्रसार होना कितना जरूरी है। अगस्त 2010 में इस महामारी के खत्म होने की घोषणा की गई, लेकिन यह वायरस आज भी मौसमी फ्लू के एक प्रकार के रूप में मौजूद है।
स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू में क्या अंतर है? स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों ही इन्फ्लूएंजा वायरस से होते हैं, लेकिन इनमें कुछ मुख्य अंतर हैं। मौसमी फ्लू आमतौर पर इन्फ्लूएंजा ए, बी, सी और डी वायरस के कारण होता है और यह हर साल सर्दियों के मौसम में लौटकर आता है। मौसमी फ्लू ज्यादातर बुजुर्गों और बहुत छोटे बच्चों के लिए खतरनाक होता है। दूसरी ओर, स्वाइन फ्लू का वायरस युवाओं, गर्भवती महिलाओं और बच्चों को गंभीर रूप से अपना शिकार बनाता है। जहां मौसमी फ्लू में श्वसन संबंधी समस्याएं ज्यादा होती हैं, वहीं स्वाइन फ्लू के मरीजों में उल्टी और डायरिया जैसी पेट से जुड़ी समस्याएं अधिक देखी जाती हैं। स्वाइन फ्लू बहुत तेजी से निमोनिया और शरीर के कई अंगों के काम न करने जैसी जानलेवा स्थितियों में बदल सकता है, जबकि मौसमी फ्लू आमतौर पर एक या दो हफ्ते में ठीक हो जाता है।
स्वाइन फ्लू के प्रमुख लक्षण क्या हैं? स्वाइन फ्लू के लक्षण संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने के एक से चार दिन के भीतर नजर आने लगते हैं, जिसे ऊष्मायन अवधि कहा जाता है। इसके लक्षण आम फ्लू जैसे ही होते हैं, लेकिन कई बार ये बहुत तेजी से गंभीर हो जाते हैं। इसके प्रमुख लक्षणों में तेज बुखार आना, ठंड लगना, सूखी खांसी, गले में खराश, शरीर और मांसपेशियों में भयंकर दर्द, सिरदर्द, बहुत ज्यादा थकान और कमजोरी महसूस होना शामिल है। कई मरीजों में आंखों का लाल होना, आंखों में दर्द, बहती या बंद नाक, और छोटे बच्चों में चिड़चिड़ापन भी देखा जाता है। इसके अलावा, उल्टी आना, जी मिचलाना और डायरिया भी स्वाइन फ्लू के खास लक्षण हैं।
अगर सांस लेने में तकलीफ हो, छाती में दर्द हो, होंठ या त्वचा का रंग नीला पड़ने लगे, बहुत ज्यादा चक्कर आएं या शरीर में पानी की भारी कमी हो जाए, तो यह आपातकालीन स्थिति होती है और मरीज को तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।
यह बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में कैसे फैलती है? यह वायरस हवा और सीधे संपर्क के माध्यम से फैलता है। जब स्वाइन फ्लू से पीड़ित कोई व्यक्ति खांसता, छींकता या बात करता है, तो उसके मुंह और नाक से निकलने वाली छोटी-छोटी बूंदों के जरिए वायरस हवा में फैल जाता है। जब कोई स्वस्थ व्यक्ति उस हवा में सांस लेता है, तो वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसके अलावा, अगर कोई व्यक्ति किसी ऐसी सतह को छूता है जहां वायरस मौजूद हो, जैसे दरवाजे का हैंडल या मेज, और फिर उन्हीं हाथों से अपनी आंख, नाक या मुंह को छूता है, तो भी वह संक्रमित हो जाता है। एक संक्रमित व्यक्ति बीमारी के लक्षण दिखने से एक दिन पहले और लक्षण शुरू होने के पांच से सात दिन बाद तक दूसरों को संक्रमित कर सकता है।
स्वाइन फ्लू का सबसे ज्यादा खतरा किसे होता है? वैसे तो यह बीमारी किसी को भी हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों में इसके गंभीर होने का खतरा बहुत ज्यादा होता है। इनमें पांच साल से कम उम्र के बच्चे और पैंसठ साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग शामिल हैं। गर्भवती महिलाओं के लिए यह वायरस बहुत खतरनाक है, क्योंकि इससे गर्भपात या समय से पहले प्रसव होने का खतरा रहता है। इसके अलावा जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है, जैसे कैंसर, एचआईवी या अंग प्रत्यारोपण वाले मरीज, वे इसके आसानी से शिकार हो सकते हैं। अस्थमा, डायबिटीज, दिल की बीमारी, फेफड़ों की बीमारी और मोटापे से पीड़ित लोगों में भी इस संक्रमण के कारण जानलेवा जटिलताएं पैदा होने की संभावना बहुत अधिक होती है।
इस गंभीर बीमारी की पहचान और इलाज कैसे किया जाता है? स्वाइन फ्लू की पहचान करने के लिए डॉक्टर मरीज के लक्षणों की जांच करते हैं और रैपिड फ्लू टेस्ट या स्वैब टेस्ट की सलाह देते हैं। इस टेस्ट में नाक या गले के पिछले हिस्से से स्वैब लेकर प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा जाता है, जिससे वायरस के आरएनए की पहचान की जा सके।
इलाज के मामले में, अगर व्यक्ति स्वस्थ है और लक्षण हल्के हैं, तो उसे घर पर ही आराम करने, खूब सारा तरल पदार्थ पीने और हल्का भोजन करने की सलाह दी जाती है। बुखार और दर्द कम करने के लिए सामान्य दवाएं दी जाती हैं। हालांकि, गंभीर मरीजों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है। स्वाइन फ्लू के इलाज के लिए ओसेल्टामिविर (Oseltamivir) और ज़ानामिविर (Zanamivir) जैसी विशेष एंटीवायरल दवाएं दी जाती हैं। ये दवाएं तब सबसे ज्यादा असरदार होती हैं जब इन्हें लक्षण शुरू होने के अड़तालीस घंटे के भीतर लिया जाए। यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह एक वायरल संक्रमण है, इसलिए इसमें एंटीबायोटिक दवाएं काम नहीं करती हैं।
स्वाइन फ्लू से बचने के लिए क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए? स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों से बचने का सबसे प्रभावी तरीका बचाव और साफ-सफाई है। सबसे जरूरी कदम हर साल फ्लू का टीका यानी वैक्सीन लगवाना है। यह वैक्सीन स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों के वायरस से सुरक्षा प्रदान करती है और गंभीर बीमारी या अस्पताल में भर्ती होने के खतरे को काफी हद तक कम करती है।
इसके साथ ही, अपनी दिनचर्या में अच्छी आदतों को शामिल करना चाहिए। अपने हाथों को दिन में कई बार साबुन और पानी से कम से कम बीस सेकंड तक अच्छी तरह धोएं। अगर साबुन उपलब्ध न हो, तो अल्कोहल वाले हैंड सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करें। खांसते और छींकते समय अपने मुंह और नाक को टिश्यू पेपर या अपनी कोहनी से ढकें, और इस्तेमाल किए गए टिश्यू को तुरंत कूड़ेदान में फेंक दें। अपने चेहरे, खासकर आंखों, नाक और मुंह को बार-बार छूने से बचें।
अगर कोई व्यक्ति बीमार है, तो उससे उचित दूरी बनाकर रखें और अगर आप खुद बीमार हैं, तो घर पर ही रहें ताकि दूसरों को संक्रमण न फैले। घर के उन हिस्सों और सतहों को नियमित रूप से साफ करें जिन्हें बार-बार छुआ जाता है। इसके अलावा, एक अच्छी जीवनशैली अपनाएं, जिसमें पौष्टिक आहार, नियमित व्यायाम और भरपूर नींद शामिल हो, ताकि आपके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहे। जागरूकता, सही समय पर डॉक्टरी सलाह और साफ-सफाई ही इस गंभीर बीमारी को हराने का एकमात्र मूलमंत्र है।
जौनपुर वासियों, पढ़ते हैं शिव पुराण के आख्यान व आधुनिक भौतिकी में मौजूद संबंध के बारे में
जौनपुर वासियों, क्या आप जानते हैं कि शिव पुराण, हिंदू धर्म के संस्कृत ग्रंथों की पुराण-श्रेणी के अठारह महापुराणों में से एक प्रमुख ग्रंथ है। यह शैव साहित्य-परंपरा का एक अभिन्न अंग है। यह मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की लीलाओं एवं महिमाओं को बताता है। साथ ही, इसमें समस्त देवी-देवताओं का आदरपूर्वक उल्लेख एवं वंदन किया गया है।
हिंदू साहित्य के अन्य पुराणों की भांति, शिव पुराण भी एक गतिशील ग्रंथ (जीवंत परंपरा) रहा है। इसे एक लंबी समयावधि में नियमित रूप से संपादित, पुनर्गठित एवं परिमार्जित किया गया है। शिव पुराण में यह उल्लेख मिलता है कि मूलतः इसमें बारह संहिताओं (खंडों) के अंतर्गत 1,00,000 श्लोक समाहित थे। हालांकि, इस ग्रंथ में यह भी बात कही गई है कि महर्षि वेदव्यास ने, अपने शिष्य सूत जी को इसका अध्ययन कराने से पूर्व इसे संक्षिप्त कर दिया था। इसकी वर्तमान समय में उपलब्ध पांडुलिपियां कई भिन्न-भिन्न संस्करणों और सामग्रियों में प्राप्त होती हैं। इनमें सात संहिताओं वाला एक प्रमुख संस्करण (जो मुख्यतः दक्षिण भारत में प्रचलित है) और छह संहिताओं वाला दूसरा संस्करण शामिल है। वहीं, मध्यकालीन बंगाल क्षेत्र से प्राप्त तीसरे संस्करण में संहिताएं नहीं हैं, बल्कि, यह दो वृहद खंडों में विभाजित है, जिन्हें 'पूर्व-खंड' (प्रथम भाग) और 'उत्तर-खंड' (उत्तर भाग) कहा जाता है।
शिव पुराण की सटीक रचना-तिथि और रचयिता के संबंध में कोई अंतिम ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। चूंकि पांडुलिपियों की रचना-तिथि पर रेडियोकार्बन डेटिंग (Radiocarbon Dating) जैसी तकनीकें पूर्णतः सटीक सिद्ध नहीं होतीं, अतः ग्रंथ काल-निर्धारण हेतु इसके आंतरिक साक्ष्यों और संदर्भों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। एक अनुमान के अनुसार, शिव पुराण के उपलब्ध हस्तलेखों के सबसे प्राचीन अंशों की रचना संभवतः नौवीं से ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में हुई थी। इसके अलावा, वर्तमान में प्राप्त शिव पुराण की पांडुलिपियों के कुछ अध्यायों को तेरहवीं शताब्दी के पश्चात् रचित माना जाता है।
शिव पुराण में शिव-केंद्रित सृष्टि-विज्ञान (ब्रह्मांड उत्पत्ति), देवताओं का पारस्परिक संबंध, नीतिशास्त्र, योग, तीर्थ-माहात्म्य, भक्ति-तत्व, नदियों का वर्णन, भूगोल तथा अन्य विविध विषय समाहित हैं। प्रथम सहस्त्राब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध तथा द्वितीय सहस्त्राब्दी के प्रारंभ में, शैव संप्रदायों के विविध स्वरूपों और उनके दार्शनिक सिद्धांतों को समझने के लिए, यह ग्रंथ ऐतिहासिक जानकारी का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसके प्राचीनतम अध्यायों में भक्ति भाव के साथ-साथ, अद्वैत वेदांत दर्शन का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में, ‘वायु पुराण’ को कभी-कभी शिव पुराण का नाम दिया जाता था अथवा इसे शिव पुराण का ही एक भाग माना जाता था। किंतु अधिक पांडुलिपियों की खोज के उपरांत, आधुनिक विद्वान इन दोनों ग्रंथों को पृथक मानते हैं। वायु पुराण को अधिक प्राचीन, अर्थात द्वितीय शताब्दी ईस्वी से पूर्व रचित ग्रंथ स्वीकार किया गया है। कुछ विद्वान शिव पुराण को अठारह महापुराणों की सूची में गिनते हैं, जबकि अन्य विद्वान इसे उपपुराण की श्रेणी में रखते हैं।
शिव पुराण में, सृष्टि की कथा और भगवान शिव जी का उद्भव भी वर्णित है। इसके अनुसार, सृष्टि के आरंभ से पूर्व न पृथ्वी थी, न आकाश और न ही कोई देवता। तब केवल सर्वव्यापी अंधकार (तमस) और महाशून्यता विद्यमान थी। उस अनंत शून्य में केवल शाश्वत, निराकार 'ब्रह्म' का अस्तित्व था। परम चेतना और शक्ति से परिपूर्ण ब्रह्म, अपने निर्गुण रूप में स्वयं भगवान शिव ही थे।
उस महाशून्य के मध्य से 'ज्योतिर्लिंग' नामक अग्नि और परम प्रकाश का एक अत्यंत तीव्र एवं अनंत स्तंभ प्रकट हुआ। इस स्तंभ का न कोई आदि (प्रारंभ) था और न ही कोई अंत। यह ज्योतिर्लिंग, शिव जी का मूल स्वरूप था, जो शुद्ध, असीम और निराकार ऊर्जा थी। इसी दिव्य प्रकाश से संपूर्ण ब्रह्मांड का आविर्भाव हुआ। इसी ज्योतिर्लिंग से ब्रह्मा और श्री विष्णु का उद्भव हुआ। प्रारंभ में, वे दोनों अपनी उत्पत्ति के स्रोत को लेकर भ्रमित थे और स्वयं को एक-दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने के विवाद में उलझ गए। उनके इस संशय का निवारण करने के लिए, उस ज्योति-स्तंभ से एक दिव्य आकाशवाणी हुई, जिसने ब्रह्मा जी को उस अग्नि-स्तंभ का शीर्ष और विष्णु जी को उसका आधार बताया।
तब, विष्णु जी ने वराह रूप धारण किया और वे तल की ओर गहराई में स्तंभ का आधार खोजने लगे। इसके विपरीत, ब्रह्मा जी हंस रूप धारण कर आकाश की ओर ऊपर उड़े। सहस्रों वर्षों की निरंतर खोज के पश्चात् भी, दोनों में से कोई भी उस अनंत स्तंभ का अंत न ढूंढ सके। तब विष्णु जी ने अपनी सीमा स्वीकार की और वे विनम्रतापूर्वक नतमस्तक हो गए। दूसरी तरफ, ब्रह्मा जी ने असत्य का सहारा लेकर, केतकी के पुष्प को झूठी गवाही के लिए तैयार करके, यह दावा किया कि उन्होंने ज्योतिर्लिंग का शीर्ष देख लिया है।
तभी उस ज्योतिर्लिंग के मध्य से भगवान शिव साकार रूप में प्रकट हुए, जो रूप उग्र, दिव्य और रुद्र था। उन्होंने विष्णु जी की सत्यनिष्ठा और नम्रता की सराहना की, जबकि असत्य बोलने के दंडस्वरूप, ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि भूलोक में उनकी पूजा हेतु कोई भी मंदिर समर्पित नहीं होगा। केतकी के पुष्प को भी असत्य का भागी बनने के कारण शिव-पूजा से सर्वथा वर्जित कर दिया गया। यह घटना शिव के 'निराकार' (अव्यक्त) से 'साकार' (व्यक्त) रूप में उद्भव की प्रतीक है।
तत्पश्चात, शिव जी ने ब्रह्मांडीय दायित्वों का विभाजन किया। उन्होंने विश्व की रचना हेतु ब्रह्मा जी को, उसके पालन-पोषण एवं संरक्षण हेतु विष्णु जी को, और कालचक्र के अंत में संहार हेतु स्वयं को उत्तरदायित्व दिया। इस प्रकार संपूर्ण सृष्टि-चक्र का शुभारंभ हुआ।
यदि हम शिव पुराण की कथाओं का सूक्ष्मता से अध्ययन करेंगे, तो पाएंगे कि सापेक्षता का सिद्धांत (Theory of Relativity) और क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) जैसे आधुनिक भौतिकी के गूढ़ सिद्धांत कुछ आख्यानों के माध्यम से, अत्यंत सुंदरता से अभिव्यक्त किए गए हैं। यह हमारी संस्कृति की एक अद्भुत द्वंद्वात्मक शैली रही है, जहां गूढ़ वैज्ञानिक सत्यों को कथाओं का रूप दिया गया और हर तत्व का मानवीकरण (Personification) किया गया।
किंतु समय के साथ, समाज ने इसके पीछे छिपे वैज्ञानिक मर्म को भुला दिया और केवल कथाओं को थामे रखा। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन आख्यानों को इतना अतिरंजित और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाने लगा कि वे अपनी मूल तार्किकता खोकर हास्यास्पद प्रतीत होने लगे। यदि हम इन पौराणिक कथाओं में निहित वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पुनः समझें, तो यह गूढ़ विज्ञान को जन-सामान्य तक पहुंचाने का एक अत्यंत सुंदर माध्यम सिद्ध होगा।
शिव पुराण मानव चेतना को उसके उच्चतम शिखर तक ले जाने का एक परम विज्ञान है। इसे अत्यंत मनोरम कथाओं के रूप में पिरोया गया है। योगशास्त्र को बिना किसी कथा के साथ, एक विशुद्ध विज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। परंतु यदि आप गहराई से विचार करें, तो योग और शिव पुराण एक ही सत्य के दो पहलू हैं। जिन्हें पृथक नहीं किया जा सकता। एक उन लोगों के लिए है, जो कथाओं के माध्यम से सत्य को समझते हैं, और दूसरा उन लोगों के लिए है, जो विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं। अर्थात, इन दोनों का मूल सिद्धांत एक ही है।
आजकल, शिक्षाविद् एवं वैज्ञानिक आधुनिक शिक्षण-पद्धतियों पर गहन शोध कर रहे हैं। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार, ज्ञान प्रदान करने का सरल तरीका यह है कि इसे कथाओं या खेल-खेल के माध्यम से सिखाया जाए। आधुनिक विश्व में इस दिशा में कुछ प्रयास आरंभ हुए हैं, किंतु अधिकांश शिक्षा प्रणाली आज भी अत्यधिक तनावपूर्ण एवं दमनकारी बनी हुई है। जब तक ज्ञान को एक सहज और रोचक माध्यम से न प्रदान किया जाए, तब तक सूचनाओं का भारी बोझ बुद्धिमत्ता को दबा देगा। ऐसी स्थिति में, कहानियों के माध्यम से सिखाना ही सबसे प्रभावी मार्ग है। हमारी भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से यही किया गया था, जैसा कि शिव पुराण के उदाहरण से समझा जा सकता है।
जौनपुर, जानिए अन्य देशों में कैसे मनाए जाते हैं, रक्षाबंधन जैसे खास पर्व
हम जानते हैं कि रक्षाबंधन, जिसे राखी के नाम से भी जाना जाता है, भाई-बहन के पवित्र प्रेम को समर्पित एक विशेष हिंदू त्योहार है। यह भाई और बहन के बीच के अटूट बंधन का उत्सव है, तथा दुनिया भर के अधिकांश भारतीय समुदायों में बहुत उल्लास के साथ मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन, बहनें स्नेह और शुभकामनाओं के प्रतीक के रूप में अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र यानी ‘राखी’ बाँधती हैं और उसकी लंबी उम्र व उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना करती हैं। इसके बदले में, भाई उन्हें सुंदर उपहार देते हैं और जीवनभर उनकी रक्षा करने का दृढ़ वचन देते हैं।
इस समारोह का मुख्य आकर्षण वह पल होता है, जब एक बहन अपने भाई की कलाई पर रेशमी धागा, यानी राखी बाँधती है। आजकल, राखी के अधिक विस्तृत और आधुनिक संस्करण सोने या रेशम के जटिल रूप से बुने हुए धागे हो सकते हैं, लेकिन रक्षाबंधन पर भाइयों को दी जाने वाली पारंपरिक राखी रेशम का एक ही धागा होती है। रक्षाबंधन पर विशेष पूजा-अर्चना और प्रार्थनाएँ भी की जाती हैं, क्योंकि पूरा परिवार इस उत्सव में एक साथ शामिल होता है।
माना जाता है कि राखी की यह परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन यह 16वीं शताब्दी में विशेष रूप से लोकप्रिय हुई थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रक्षाबंधन की उत्पत्ति उस प्रसंग से मानी जाती है, जब भगवान कृष्ण पतंग उड़ा रहे थे और उनकी उंगली कट गई थी। उस समय, पांडवों की पत्नी द्रौपदी उन्हें घायल देखकर इतनी व्यथित हो गईं कि उन्होंने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी खून बहती उंगली पर बाँध दिया। कृष्ण इस भाव से बहुत द्रवित हुए और हर परिस्थिति में उनकी रक्षा करने का वचन दिया। कृष्ण ने इसे ‘रक्षा सूत्र’ के रूप में स्वीकार किया था।
संस्कृत शब्द “रक्षाबंधन” का शाब्दिक अर्थ “सुरक्षा, दायित्व या देखभाल का बंधन” है। यही कारण है कि इतिहास में ऐसी तस्वीरें भी मिलती हैं, जिनमें कुछ महिलाएँ स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति, डॉ. राजेंद्र प्रसाद को “सुरक्षा, दायित्व या देखभाल के बंधन” की उम्मीद में राखी बाँध रही हैं।
भाई-बहन एक ऐसा अनूठा बंधन साझा करते हैं, जो संस्कृतियों, धर्मों और भौगोलिक सीमाओं से परे है। इस विशेष रिश्ते को दुनिया भर में विभिन्न त्योहारों के माध्यम से मनाया जाता है, जो भाइयों और बहनों के बीच के प्यार, देखभाल और जुड़ाव को उजागर करते हैं। आइए, ऐसी ही कुछ विदेशी परंपराओं का पता लगाते हैं:
1. तिहार (नेपाल): तिहार, जिसे रोशनी के त्योहार के रूप में भी जाना जाता है, नेपाल के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह पाँच दिनों तक चलता है, जिसमें प्रत्येक दिन जीवन और प्रकृति के विभिन्न पहलुओं को समर्पित होता है। तिहार का दूसरा दिन, जिसे ‘भाई टीका’ के नाम से जाना जाता है, भाइयों और बहनों के बीच के बंधन को समर्पित है। बहनें अपने भाइयों के माथे पर “टीका” (तिलक) लगाती हैं तथा उनकी लंबी उम्र और समृद्धि की प्रार्थनाओं के साथ उन्हें आशीर्वाद देती हैं। इसके बदले में भाई उन्हें उपहार देते हैं और रक्षाबंधन की भावना को दर्शाते हुए, अपनी बहनों की रक्षा करने का वादा करते हैं।
2. सिबलिंग डे – Sibling Day (संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा): हालांकि अन्य पारंपरिक त्योहारों की तरह इसे बहुत व्यापक रूप से नहीं मनाया जाता है, लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में ‘सिबलिंग डे’ भाई-बहनों के विशेष रिश्ते का सम्मान करने वाले दिन के रूप में तेजी से लोकप्रियता प्राप्त कर रहा है। हर साल 10 अप्रैल को मनाए जाने वाले इस दिन को, लोगों को संदेशों, उपहारों और साझा यादों के माध्यम से अपने भाई-बहनों की सराहना करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। हालांकि यह एक अधिक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष उत्सव है, लेकिन यह भाई-बहन के रिश्तों के सार्वभौमिक मूल्य को खूबसूरती से दर्शाता है।
3. चूसेक – Chuseok (दक्षिण कोरिया): दक्षिण कोरिया की सबसे महत्वपूर्ण छुट्टियों में से एक, ‘चूसेक’, परिवारों के लिए एक साथ आने और एक समृद्ध फसल के लिए अपने पूर्वजों को धन्यवाद देने का समय है। हालांकि यह त्योहार आम तौर पर पूरे परिवार पर केंद्रित होता है, लेकिन यह वह समय भी होता है, जब भाई-बहन एक साथ आते हैं। यह अवकाश, भव्य दावतों, पैतृक अनुष्ठानों और पारंपरिक खेलों द्वारा चिह्नित किया जाता है, जो भाई-बहनों को आपस में जुड़ने और अपनी साझा विरासत का जश्न मनाने का बेहतरीन अवसर प्रदान करता है।
4. भाई दूज (भारत और नेपाल): रक्षाबंधन के समान ही, भाई दूज भारत और नेपाल का एक अन्य प्रमुख त्योहार है, जो भाइयों और बहनों के बीच के पवित्र बंधन का जश्न मनाता है। यह पाँच दिवसीय दीवाली के त्योहार के ठीक आखिरी दिन पड़ता है।
रक्षाबंधन और भाई दूज दोनों ही भाई-बहन के प्रेम को समर्पित हैं, फिर भी इनमें निम्नलिखित अंतर हैं:
पंचांग और समय: दोनों त्योहार, एक ही दिन या एक ही महीने में नहीं मनाए जाते। रक्षाबंधन मानसून के मौसम में सावन महीने की पूर्णिमा के दिन, आमतौर पर अगस्त में आता है। दूसरी ओर, भाई दूज कार्तिक के महीने में दीवाली के दो दिन बाद मनाया जाता है। इसलिए, जहाँ रक्षाबंधन में बरसात के दिनों की भीनी-भीनी खुशबू और हरियाली होती है, वहीं भाई दूज तब आता है, जब हवा दीवाली के दीयों की रोशनी और मिठाइयों की खुशबू से भर जाती है।
अनुष्ठान की विधि: रक्षाबंधन पर, बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, उसकी खुशी के लिए प्रार्थना करती है, और बदले में उसे उपहार या आशीर्वाद दिया जाता है। इसके विपरीत, भाई दूज पर बहन अपने भाई के माथे पर चंदन या सिंदूर का एक तिलक लगाती है, जो उसकी सुरक्षा और समृद्धि का प्रतिनिधित्व करती है। फिर वह आरती करती है और उसे मिठाइयाँ खिलाती है, जिसके बदले में बहन उसे उपहार देती है।
क्षेत्रीय विविधता: भारत की विविधता इन समारोहों में और अधिक रंग भर देती है। रक्षाबंधन देश भर में लगभग हर राज्य में लोकप्रिय है। हालाँकि, भाई दूज के कई क्षेत्रीय नाम हैं। महाराष्ट्र और गोवा में इसे ‘भाऊबीज’ कहा जाता है, तो पश्चिम बंगाल में इसे ‘भाई फोंटा’ के रूप में जाना जाता है।
जब हम भाई दूज और रक्षाबंधन के बारे में सोचते हैं, तो दोनों का मूल उद्देश्य भाई-बहन के प्रेम को दर्शाना ही है, भले ही इसे अलग-अलग तरीकों से व्यक्त किया जाता हो। रक्षाबंधन मुख्य रूप से एक रक्षक के रूप में भाई की भूमिका पर ध्यान केंद्रित करता है और बहन की सुरक्षा की कामना को अपनाता है। जबकि भाई दूज अधिक संतुलित प्रतीत होता है। एक बहन के लिए एक विचारशील भाईदूज उपहार, उसे वास्तव में विशेष महसूस करा सकता है।
राग जौनपुरी के नगर से जानें, बांसुरी की मधुर धुनों ने कैसे विश्व के दिलों में बनाई जगह
जौनपुर सदियों से संगीत, साहित्य और कला की समृद्ध परंपरा का केंद्र रहा है। शर्की सल्तनत के शासनकाल में यह नगर संगीत संरक्षण और नई रचनात्मक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध हुआ। इसी काल में विकसित राग जौनपुरी आज भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रमुख रागों में गिना जाता है। संगीत की यह विरासत हमें दुनिया के अन्य संगीत रूपों को जानने के लिए भी प्रेरित करती है। पश्चिमी संगीत में भी एक अत्यंत मधुर और लोकप्रिय वाद्य है—फ्लूट या बांसुरी।
बांसुरी संसार के सबसे प्राचीन वाद्यों में से एक है। इसमें किसी तार या झिल्ली का प्रयोग नहीं होता, बल्कि वायु के कंपन से मधुर ध्वनि उत्पन्न होती है। कलाकार अपनी साँस, उँगलियों की गति और स्वर नियंत्रण के माध्यम से कोमल, शांत या तेज़ गति वाली धुनों को सहजता से प्रस्तुत कर सकता है। यही कारण है कि फ्लूट / बांसुरी पश्चिमी शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, जैज़ और फिल्म संगीत सहित अनेक विधाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
फ्लूट की विविध अभिव्यक्तियों को समझने के लिए कुछ उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ देखी जा सकती हैं। विश्वविख्यात फ्लूट वादक जेम्स गॉलवे (James Galway) की प्रस्तुति इस वाद्य की मधुरता और स्वच्छ स्वर-सौंदर्य का सुंदर उदाहरण है। वहीं इमैनुएल पह्यू (Emmanuel Pahud) अपनी तकनीकी दक्षता और भावपूर्ण प्रस्तुति के माध्यम से आधुनिक पश्चिमी फ्लूट वादन की उत्कृष्ट झलक प्रस्तुत करते हैं। भारतीय संदर्भ में पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की जॉन मैकलॉफलिन, जान गारबारेक और उस्ताद ज़ाकिर हुसैन के साथ की गई फ़्यूज़न प्रस्तुति यह दर्शाती है कि भारतीय बाँसुरी और पश्चिमी संगीत परंपराएँ मिलकर कितनी सुंदर संगीत यात्रा रच सकती हैं।
आज फ्लूट केवल किसी एक देश या संगीत परंपरा का वाद्य नहीं रह गया है। पश्चिमी कॉन्सर्ट फ्लूट और भारतीय बाँसुरी, दोनों ने अपनी-अपनी विशिष्ट पहचान के साथ विश्व संगीत को समृद्ध बनाया है। यदि आप इस वाद्य की मधुरता, तकनीकी क्षमता और भावपूर्ण अभिव्यक्ति का अनुभव करना चाहते हैं, तो ये प्रस्तुतियाँ फ्लूट की वैश्विक लोकप्रियता और इसकी संगीत यात्रा का उत्कृष्ट परिचय देती हैं।
राजाओं के शासन से आधुनिक लोकतंत्र तक सफर कैसा रहा?
राजनीति विज्ञान एक ऐसा विषय है जिसने सदियों से यह तय किया है कि समाज कैसे काम करेगा और सरकारों का निर्माण किस आधार पर होगा। शुरुआत में यह विषय केवल राजाओं उनके अधिकारों और कानूनों के अध्ययन तक सीमित था। लेकिन समय के साथ इसने लोकतंत्र सार्वजनिक नीति मानवाधिकार कूटनीति और वैश्विक राजनीति का रूप ले लिया। आज हम जिस शासन प्रणाली और अधिकारों के साथ जी रहे हैं, वह रातोंरात नहीं बनी है। इसके पीछे सदियों का वैचारिक संघर्ष और कई महान दार्शनिकों का योगदान है। भारतीय संदर्भ में भी महात्मा गांधी और बी. आर. आंबेडकर जैसे विचारकों ने भारत में लोकतंत्र और राजनीतिक विचारों को गहराई से प्रभावित किया है।
राजनीति विज्ञान की शुरुआत और विकास कैसे हुआ? शुरुआती दौर में विचारकों का मुख्य ध्यान एक आदर्श सरकार बनाने और शासकों की भूमिका तय करने पर होता था। लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे समाज का विकास हुआ, राजनीति विज्ञान का दायरा भी बढ़ता गया। प्राचीन काल से लेकर आज तक इस विषय ने कई नए क्षेत्रों को जन्म दिया है। राजनीतिक सिद्धांत न्याय स्वतंत्रता और सत्ता के विचारों का अध्ययन करता है। वहीं लोक प्रशासन इस बात पर केंद्रित है कि सरकारें कैसे काम करती हैं और आम जनता तक सेवाएं कैसे पहुंचाती हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय संबंध दो देशों के बीच के रिश्तों वैश्विक संघर्षों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका की जांच करता है। कुल मिलाकर यह विषय आज आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणालियों और विश्व मामलों को समझने का सबसे महत्वपूर्ण साधन बन गया है।
प्लेटो ने एक आदर्श राज्य की कल्पना कैसे की? पश्चिमी दर्शन के सबसे प्रमुख विचारकों में प्लेटो (Plato) का नाम सबसे ऊपर आता है। उनका जन्म प्राचीन यूनान में हुआ था। वह सुकरात के छात्र थे और बाद में उन्होंने अरस्तू को शिक्षा दी। प्लेटो ने अपनी मशहूर रचना “द रिपब्लिक” में एक ऐसे समझदार समाज का खाका खींचा था जिसे दार्शनिक राजाओं द्वारा चलाया जाना चाहिए। प्लेटो का मानना था कि एक आम इंसान बाहरी दुनिया को समझता है लेकिन एक दार्शनिक विचारों की गहराई को समझता है। प्लेटो ने मानव आत्मा को तीन हिस्सों में बांटा था, जिनमें तर्क, भावना और भूख शामिल थीं। उनका मानना था कि जब ये तीनों हिस्से सही तालमेल में काम करते हैं, तभी एक न्यायपूर्ण इंसान बनता है।
इसी विचार को उन्होंने एक राज्य पर भी लागू किया। उनके अनुसार एक आदर्श राज्य में तीन वर्ग होने चाहिए शासक रक्षक और उत्पादक। समझदार राज्य वह है जहां शासक अच्छाई को समझते हों। साहसी राज्य वह है जहां रक्षक युद्ध के मैदान में शासकों के आदेशों का पालन करें और संयमित राज्य वह है जहां सभी नागरिक इस बात पर सहमत हों कि शासन कौन करेगा। जब हर वर्ग अपना काम सही ढंग से करता है तभी एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण होता है। प्लेटो ने “द एकेडमी” की भी स्थापना की थी, जिसे पश्चिमी दुनिया का पहला विश्वविद्यालय माना जाता है।
अरस्तू ने राजनीति और विज्ञान को कैसे जोड़ा? अरस्तू (Aristotle) एक और महान यूनानी दार्शनिक थे, जिन्होंने राजनीति को एक नया वैज्ञानिक दृष्टिकोण दिया। अरस्तू ने विज्ञान को तीन हिस्सों में बांटा - उत्पादक, व्यावहारिक और सैद्धांतिक। उनके अनुसार व्यावहारिक विज्ञान वह है जो मानव व्यवहार का मार्गदर्शन करता है और इसमें राजनीति तथा नैतिकता सबसे अहम हैं।
अरस्तू ने प्लेटो के कई विचारों में सुधार किया और यथार्थवाद पर जोर दिया। उनका मानना था कि एक स्थिर समाज के लिए संतुलित शासन और नागरिकों की भागीदारी सबसे ज्यादा जरूरी है। उन्होंने सरकार के विभिन्न रूपों का अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि सत्ता किसी एक व्यक्ति या कुछ लोगों के हाथ में केंद्रित नहीं होनी चाहिए। अरस्तू पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने औपचारिक तर्कशास्त्र का आविष्कार किया। उन्होंने ज्ञान और अनुसंधान की एक नई लहर पैदा की। वह सिकंदर महान के गुरु भी थे और बाद में उन्होंने एथेंस में "द लीसियम" (The Lyceum) नाम से अपना खुद का स्कूल स्थापित किया जहां ज्ञान की कई शाखाओं का स्वतंत्र रूप से अध्ययन किया जाता था।
कार्ल मार्क्स ने समाज और वर्ग संघर्ष के बारे में क्या कहा? कार्ल मार्क्स (Karl Marx) एक क्रांतिकारी समाजशास्त्री इतिहासकार और अर्थशास्त्री थे जिन्होंने राजनीतिक विचारों की दुनिया में भूचाल ला दिया। मार्क्स ने फ्रेडरिक एंगेल्स (Friedrich Engels) के साथ मिलकर “द कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो” (The Communist Manifesto) और दास कैपिटल (Das Kapital) जैसी रचनाएं लिखीं जिन्होंने मार्क्सवाद की नींव रखीं। मार्क्स का सबसे बड़ा तर्क यह था कि अब तक का पूरा मानव इतिहास केवल वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है।
उन्होंने बताया कि ऐतिहासिक रूप से समाज की संरचना हमेशा उस वर्ग के हितों को बढ़ावा देने के लिए की गई है जिसका अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण होता है। कार्ल मार्क्स ने आर्थिक असमानता और मजदूरों के अधिकारों की बात की। उन्होंने पूंजीपतियों और मजदूर वर्ग के बीच की खाई को उजागर किया और कहा कि एक दिन मजदूर वर्ग एकजुट होकर इस पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकेगा जिससे एक वर्गहीन समाज की स्थापना होगी। उनके इन विचारों ने दुनिया भर की आधुनिक राजनीतिक प्रणालियों और सामाजिक आंदोलनों को प्रेरित किया।
आधुनिक दुनिया में लोकतंत्र का क्या महत्व है? लोकतंत्र आज दुनिया भर में सबसे स्वीकार्य शासन प्रणाली है। राजनीति विज्ञान ने लोकतंत्र चुनाव कानून और सार्वजनिक नीति को समझने में अहम भूमिका निभाई है। यह विषय बताता है कि सरकारें कैसे काम करती हैं नेता कैसे चुने जाते हैं कानून कैसे बनते हैं और राजनीतिक फैसले समाज पर क्या असर डालते हैं। लोकतंत्र एक ऐसा माहौल तैयार करता है जो मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता का सम्मान करता है। इसमें लोगों की इच्छाओं का सम्मान होता है और वे अपने फैसले लेने वालों को जवाबदेह ठहरा सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र लोकतंत्र और मानवाधिकारों को कैसे बढ़ावा देता है? संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक दस्तावेजों में लोकतंत्र शब्द का सीधा जिक्र नहीं था लेकिन हम भारत के लोग जैसी शुरुआत इस बात को पुष्ट करती है कि संप्रभु राज्यों की वैधता का आधार लोगों की इच्छा ही है। संयुक्त राष्ट्र किसी एक विशेष सरकारी मॉडल की वकालत नहीं करता है लेकिन वह लोकतांत्रिक शासन को मूल्यों और सिद्धांतों के एक समूह के रूप में बढ़ावा देता है।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के जरिए शासन को मजबूत करने चुनाव प्रक्रियाओं में सहायता करने और नागरिक समाज को सशक्त बनाने का काम किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र लोकतंत्र कोष उन परियोजनाओं को धन देता है जो नागरिक समाज को मजबूत करती हैं मानवाधिकारों को बढ़ावा देती हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में सभी समूहों की भागीदारी सुनिश्चित करती हैं।
महिलाओं और युवाओं की भूमिका क्यों जरूरी है? लोकतंत्र तब तक सच्चा लोकतंत्र नहीं हो सकता जब तक उसमें महिलाओं और युवाओं की पूरी भागीदारी न हो। हालांकि प्रगति बहुत धीमी रही है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार राष्ट्रीय संसदों में लैंगिक समानता हासिल करने में अभी और 63 साल लग सकते हैं और सत्ता के सर्वोच्च पदों पर समानता पहुंचने में लगभग एक सौ तीस साल का समय लग सकता है। संयुक्त राष्ट्र इन दूरियों को पाटने के लिए चुनाव प्रक्रियाओं को समावेशी बनाने का काम कर रहा है। इसके साथ ही युवाओं की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है। जलवायु परिवर्तन बेरोजगारी और असमानता जैसी वैश्विक चुनौतियों से लड़ने के लिए युवाओं का जागरूक होना और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भाग लेना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
इस तरह राजनीति विज्ञान केवल एक विषय नहीं है, बल्कि यह मानव समाज के विकास, अधिकारों की लड़ाई और एक बेहतर भविष्य के निर्माण का सबसे सशक्त माध्यम है। प्लेटो के आदर्श विचारों से लेकर मार्क्स की क्रांति और आज के आधुनिक लोकतंत्र तक यह यात्रा हमें बताती है कि एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण निरंतर चलने वाली एक प्रक्रिया है।
जौनपुर की महिलाओं ने रच दिया इतिहास, 5 लाख तिरंगे बनाकर दिया देशभक्ति का संदेश
स्वतंत्रता दिवस किसी भी देश के लिए केवल एक राष्ट्रीय पर्व नहीं होता, बल्कि यह देशवासियों के स्वाभिमान और उनके संघर्षों का प्रतीक होता है। पिछले कुछ वर्षों से भारत सरकार का ‘हर घर तिरंगा’ अभियान इस पर्व को एक नई ऊंचाई दे रहा है। यह अभियान अब केवल सरकारी इमारतों पर झंडा फहराने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह घर-घर तक पहुंच गया है। इस वर्ष उत्तर प्रदेश के जौनपुर ज़िले ने इस अभियान में जो जनभागीदारी दिखाई है, वह पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है। विशेषकर जिले की ग्रामीण महिलाओं ने अपने कौशल और देशभक्ति से इस अभियान को एक नई दिशा दी है।
जौनपुर की महिलाओं ने कैसे तैयार किए 5 लाख तिरंगे? जौनपुर में 'हर घर तिरंगा अभियान-2026' को सफल बनाने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी जिले की मातृशक्ति ने उठाई है। केंद्र सरकार के राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के अंतर्गत, ज़िले के 62 स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी लगभग 300 महिलाओं ने 5 लाख राष्ट्रीय ध्वज तैयार करने का एक विशाल लक्ष्य हासिल किया है।
इन महिलाओं ने दिन-रात एक करके पूरी लगन और श्रद्धा के साथ इन तिरंगों की सिलाई की है। अब इन तिरंगों को ज़िले के आवासीय भवनों, सरकारी और अर्द्धसरकारी कार्यालयों, स्कूलों तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर पूरे सम्मान के साथ फहराया जा रहा है। ज़िलाधिकारी सैमुअल पॉल एन के कुशल निर्देशन में यह अभियान राष्ट्रभक्ति के एक भव्य उत्सव में बदल गया है।
इस अभियान से ग्रामीण महिलाओं की आमदनी पर क्या असर पड़ा? यह अभियान केवल देशभक्ति का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि यह महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने का भी एक बेहतरीन उदाहरण बन गया है। इन महिलाओं के लिए झंडे सिलना केवल एक काम नहीं, बल्कि रोज़गार का एक बड़ा अवसर साबित हुआ है।
बजरंग स्वयं सहायता समूह की सदस्य विजयलक्ष्मी मौर्य बताती हैं कि उनके समूह को 17,000 झंडे सिलने का लक्ष्य दिया गया था। इस काम में उनके समूह की 10 से अधिक महिलाएं शामिल हैं। विजयलक्ष्मी के अनुसार, इस अभियान से जुड़कर वे 30,000 रुपये से लेकर 40,000 रुपये तक की अतिरिक्त कमाई कर पा रही हैं।
अधिकारियों के अनुसार, क्लस्टर स्तर के संगठनों को प्रत्येक झंडा तैयार करने के लिए लगभग 20 रुपये दिए जाते हैं। कार्य की व्यवस्था के आधार पर, सिलाई करने वाली महिलाओं को प्रति झंडा 2 से 3 रुपये की आमदनी हो रही है। डिप्टी कमिश्नर जितेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि सरकार द्वारा दिए गए इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए क्लस्टर स्तर पर बहुत तेज़ी से काम किया गया है।
9 से 17 अगस्त तक ज़िले में कौन-कौन से कार्यक्रम आयोजित होंगे? ज़िला प्रशासन ने स्वतंत्रता दिवस को ऐतिहासिक बनाने के लिए 9 अगस्त से 17 अगस्त तक कई भव्य कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की है। ज़िलाधिकारी की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह तय किया गया कि इन कार्यक्रमों में अधिक से अधिक लोगों की जनभागीदारी सुनिश्चित की जाए।
कला और रंगोली प्रतियोगिताएं: 9 से 15 अगस्त तक ज़िले के विभिन्न परिषदीय, माध्यमिक विद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में तिरंगा-प्रेरित कला गतिविधियां कराई जा रही हैं। छात्र-छात्राएं देशभक्ति से ओतप्रोत आकर्षक रंगोलियां और स्वतंत्रता सेनानियों के चित्र बना रहे हैं। वंदे मातरम् से जुड़ी गतिविधियां भी आयोजित की जा रही हैं, जिससे विद्यार्थियों में राष्ट्रीय एकता और अखंडता का बोध हो सके।
सार्वजनिक स्थलों की विशेष सजावट: 10 से 15 अगस्त तक जौनपुर के सभी सरकारी भवनों, रेलवे स्टेशन, बस अड्डों, प्रमुख चौराहों और अन्य सार्वजनिक स्थानों को तिरंगे की थीम वाली रोशनी और सजावट से सजाया जा रहा है। इससे पूरा शहर तिरंगामय नज़र आ रहा है।
तिरंगा प्रदर्शनी और कॉन्सर्ट: 11 से 15 अगस्त तक प्रमुख सार्वजनिक स्थलों और शिक्षण संस्थानों में विशेष 'तिरंगा प्रदर्शनी' लगाई जा रही है। इसमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां प्रदर्शित की जा रही हैं। इसके अलावा, 14 अगस्त को एक भव्य ‘तिरंगा कॉन्सर्ट’ भी आयोजित किया था, जो सम्पूर्ण रूप से देशभक्ति के रंग में रंगा हुआ था।
ज़िलाधिकारी की नागरिकों से क्या अपील है? इस पूरे अभियान का मुख्य उद्देश्य हर नागरिक के दिल में राष्ट्रध्वज के प्रति सम्मान और देशभक्ति की भावना को प्रगाढ़ करना है। ज़िलाधिकारी सैमुअल पॉल एन ने समस्त जनपदवासियों से इस 'हर घर तिरंगा अभियान' को एक ऐतिहासिक सफलता दिलाने का आह्वान किया है। उन्होंने नागरिकों से अपील की है कि वे 15 अगस्त को अपने-अपने घरों और प्रतिष्ठानों पर पूरे उत्साह के साथ तिरंगा फहराएं। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि झंडा फहराते समय राष्ट्रध्वज के नियमों और उसकी गरिमा (Flag Code of India) का विशेष ध्यान रखा जाए।
जौनपुर में तिरंगे की शान में हो रहे ये आयोजन और विशेषकर स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं का यह शानदार योगदान, यह साबित करता है कि जब समाज का हर वर्ग किसी राष्ट्रीय पर्व में अपनी भागीदारी निभाता है, तो वह केवल एक सरकारी आयोजन न रहकर एक सच्चा 'लोक उत्सव' बन जाता है।
आत्मनिर्भर भारत की गूंज: आइए पढ़ते हैं, स्वदेशी मिसाइल कार्यक्रम व ब्रह्मोस के उदय के बारे में
जौनपुर, आज हम बमों और मिसाइलों के इतिहास को पढ़ेंगे, और समझेंगे कि ये हथियार समय के साथ कैसे विकसित हुए। दरअसल, बम, एक विस्फोटक हथियार होता है, जो अचानक अत्यधिक एवं हिंसक ऊर्जा प्रदान करने के लिए विस्फोटक सामग्री की ऊष्माक्षेपी प्रतिक्रिया का उपयोग करता है। बमों का उपयोग पूर्वी एशिया में ग्यारहवीं शताब्दी से ही किया जाता रहा है। अन्य सैन्य विस्फोटक हथियार जिन्हें ‘बम’ के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है, उनमें गोले, गहराई चार्ज (पानी में प्रयुक्त), और भूमि खदानें शामिल हैं।
ठोस प्रोपेलेंट (Propellant) विस्फोटक हथियार की उत्पत्ति, दसवीं सदी के दौरान चीन में हुई थी, जहां बांस की नलियों में विस्फोटक बारूद भरा जाता था, और इसे चलाया जाता था। यह युद्ध में ठोस प्रोपेलेंट रॉकेटों के पहले रिकॉर्ड किए गए उपयोग का प्रतिनिधित्व करता है। चौदहवीं शताब्दी तक, ये हथियार यूरोप में पहुंच गए। फिर, कुछ प्रसिद्ध विचारकों ने रॉकेट डिजाइनों की जांच शुरू की। लेकिन, सोलहवीं शताब्दी में एक जर्मन इंजीनियर - कॉनराड हास (Conrad Haas) - ने एक बहुमंजिला रॉकेट का स्केच बनाकर, और उड़ान स्थिरता में सुधार हेतु स्वेप्ट-बैक पंखों (Swept-back fins) का प्रस्ताव करके इस अवधारणा को आगे बढ़ाया।
अठारहवीं सदी में, ब्रिटिश और फ्रांसीसीयों के खिलाफ लड़ाई के दौरान, भारतीय सैनिकों ने भी 3 से 6 किलोग्राम वजन वाले आग लगाने वाले रॉकेटों का इस्तेमाल किया था। इन हथियारों में बारूद से भरा एक सिलेंडर होता था, जो पीछे की ओर फैली हुई एक लंबी छड़ी से जुड़ा होता था। हालांकि, उनकी विनाशकारी क्षमताएं सीमित थीं, फिर भी उन्होंने अत्यधिक मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक लाभ प्रदान किया। भारतीय डिज़ाइनों से प्रभावित होकर, ब्रिटिश कर्नल विलियम कांग्रेव (William Congreve) ने उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में उनके साथ कुछ प्रयोग किए।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, गुब्बारे और ज़ेपेलिंस (Zeppelins) जैसी रणनीतिक वस्तुओं को लक्षित करने के लिए, रॉकेटों में फिर से रुचि बढ़ गई। तब, एक ब्रिटिश प्रोफेसर ने फ्लाइंग टारगेट (Flying Target) नामक एक रेडियो-नियंत्रित मोनोप्लेन (Monoplane) डिजाइन किया और रेडियो-नियंत्रित रॉकेट के साथ प्रयोग किया।
1918 में, संयुक्त राज्य अमेरिका में एक हवाई टॉरपीडो (Torpedo) के रूप में कार्य करने वाला, एक मानव रहित हवाई जहाज ‘द बग (The Bug)’ डिजाइन किया। इसमें 100 किमी की सीमा तक दिशा बनाए रखने के लिए, प्रीसेट वैक्यूम रिले (Preset vacuum relay) का उपयोग किया गया था।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद, जर्मनी में एडॉल्फ हिटलर (Adolf Hitler) ने एक विशाल एवं शीर्ष गुप्त सुविधा को वित्त पोषित किया, जो उड़ान वाहनों में पहले व्यवस्थित अनुसंधान प्रयास को चिह्नित करता है। हालांकि, जर्मनी की हार के बाद, सोवियत संघ और अमेरिकी सेनाओं ने जर्मन प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिकों का उपयोग करने के लिए हाथापाई की। उन्नत निर्देशित हथियार प्रौद्योगिकी अंततः विश्व स्तर पर फैल गई।
कुछ वर्षों बाद, 1983 में भारत ने ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नेतृत्व में अपना ‘एकीकृत मिसाइल विकास कार्यक्रम’ शुरू किया। अब्दुल कलाम ने सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों (आकाश और त्रिशूल), टैंक रोधी मिसाइलों (नाग), और सतह से सतह पर मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों (पृथ्वीअ और अग्नि) सहित, कई स्वदेशी शस्त्रागार को सफलतापूर्वक विकसित किया।
दूसरी ओर, मोटे तौर पर, ग्रेनेड (Grenades) कम दूरी के उपयोग के लिए बनाया गया एक छोटा बम होता है। बम में, विस्फोट उत्पन्न करने के लिए दहनशील सामग्री को प्रज्वलित किया जाता है, जिससे गैसों का तेजी से विस्तार होकर मजबूत बाहरी दबाव बनता है। इस प्रकार, ग्रेनेड के आवश्यक तत्व - दहनशील सामग्री और एक प्रज्वलन प्रणाली हैं। ग्रेनेड में सभी प्रकार की ज्वलनशील सामग्री का उपयोग किया जाता है, और वे विभिन्न प्रकार के विस्फोट उत्पन्न करते हैं। कुछ विस्फोटों से आग फैलती है, जबकि, अन्य विस्फोटों से बहुत सारी गैसें या धुआं निकलता है। प्रज्वलन प्रणालियां भी अलग–अलग होती हैं, और उनका उद्देश्य इसके उपयोगकर्ता से कुछ दूरी पर विस्फोट करना है।
स्टिंगर मिसाइल (Stinger missile) को जमीनी सैनिकों को कम उड़ान वाले हमलावर हवाई जहाजों और हेलीकॉप्टरों से निपटने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ऐसे जहाज, बमबारी या गोलाबारी करते हैं, निगरानी करते हैं, या सैनिकों का वहन भी करते हैं। इन खतरों को खत्म करने का सबसे आसान तरीका इन विमानों को मार गिराना है। इसके लिए, सबसे पहले सैनिक मिसाइल से लक्ष्य पर निशाना लगाता है। फिर उसका ट्रिगर खींचा जाता है। तब, एक छोटा प्रक्षेपण रॉकेट, प्रक्षेपण नली से मिसाइल को छोड़ता है, और इसे दागने वाले सैनिक से पूरी तरह दूर रहता है। फिर, प्रक्षेपण इंजन नीचे गिर जाता है, और मुख्य ठोस रॉकेट इंजन जल उठता है। फिर मिसाइल स्वचालित रूप से लक्ष्य पर उड़ती है, और विस्फोट करती है।
स्टिंगर मिसाइल, 11,500 फीट की ऊंचाई तक उड़ने वाले लक्ष्य को मार सकती है, और इसकी सीमा लगभग 5 मील है। इसके अलावा, अपने लक्ष्य को ट्रैक करने के लिए स्टिंगर मिसाइलें निष्क्रिय आईआर/यूवी सेंसर (IR/UV censor) का उपयोग करती हैं।
इसी तरह, परमाणु बम भी एक शक्तिशाली हथियार हैं, जिनमें विस्फोटक ऊर्जा के स्रोत के रूप में परमाणु प्रतिक्रियाओं का उपयोग होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, वैज्ञानिकों ने पहली बार परमाणु हथियार तकनीक विकसित की थी। इनका उपयोग युद्ध में केवल दो बार ही किया गया है। दोनों बार, संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान के खिलाफ हिरोशिमा और नागासाकी में इन बमों को डाला था। उस युद्ध के बाद, परमाणु प्रसार का दौर शुरू हुआ।
पिछली शताब्दी में, परमाणु बम और मिसाइल प्रौद्योगिकी ने युद्ध के तरीकों को बदल दिया है। प्रोपेलेंट, मार्गदर्शन प्रणालियों, और लक्ष्यीकरण में हुई प्रगति ने सेनाओं को पहले से कहीं अधिक तेजी से, दूर तक और अधिक सटीकता से हमला करने की अनुमति दी है। प्रारंभिक बैलिस्टिक मिसाइलों से लेकर आधुनिक हाइपरसोनिक प्रणालियों तक, इन हथियारों ने लंबी दूरी के हमलों को सक्षम करके सैन्य रणनीति को नया आकार दिया है। कई मामलों में, निर्देशित मिसाइलों ने उच्च प्रभाव वाले संचालन के लिए, पारंपरिक तोपखाने को पूरक या प्रतिस्थापित किया है।
मिसाइलों के उदय से पहले, दूर के लक्ष्यों पर हमला करने हेतु आमतौर पर विमान, तोपखाने, या बड़ी संरचनाओं को उस स्थिति में ले जाने की आवश्यकता होती थी। मिसाइल प्रणालियों ने सेनाओं, वायु सेनाओं और नौसेनाओं को सैकड़ों या यहां तक कि हजारों मील दूर से हमले करने की अनुमति देकर इस स्थिति को बदल दिया है।
1970 के दशक में, रशिया द्वारा मिसाइल प्रभाव की लंबी सीमा के साथ नवाचार; तथा 1980 के दशक में अमेरिका में ऐसे ही कुछ प्रयोगों ने मिसाइल क्षमताओं में क्रांति ला दी। इसके अलावा, 1990 के दशक में ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (Global Positioning System) तकनीक के एकीकरण ने मिसाइल युद्ध को बदल दिया। इसने मिसाइलों को किसी भी दूरी पर अत्यधिक सटीकता बनाए रखने की अनुमति दी। दूसरी तरफ, उन्नत अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (Intercontinental Ballistic Missiles) स्वतंत्र रूप से लक्षित रीएंट्री वाहनों (Multiple Independently-targetable Reentry Vehicles) को ले जाने के लिए विकसित हुईं।
अन्य देशों द्वारा नवाचारों की इस होड़ में, भारत भी पीछे नहीं है। भारत ने बहुत ही सीमित संसाधनों के साथ अपना मिसाइल कार्यक्रम शुरू किया था। और आज, हम एक प्रमुख मिसाइल शक्ति के रूप में खड़े हैं। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) सभी मिसाइल विकास का नेतृत्व करता है। भारत ने 1983 में, एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (Integrated Guided Missile Development Programme) लॉन्च किया था। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने इस कार्यक्रम का नेतृत्व किया था। इस कार्यक्रम का लक्ष्य, पांच प्रमुख मिसाइलें विकसित करना था, जो पृथ्वी, अग्नि, त्रिशूल, नाग और आकाश थे।
अग्नि श्रृंखला भारत की सबसे महत्वपूर्ण बैलिस्टिक मिसाइल श्रृंखला है। डीआरडीओ ने सभी अग्नि वेरिएंट विकसित किए। ये मिसाइलें परमाणु और पारंपरिक हथियार का वहन कर सकती हैं।
अग्नि-I, 700-800 किमी की रेंज के साथ, कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है। अग्नि-II की रेंज 2,000-3,000 किमी है, जो इसे मध्यम दूरी की मिसाइल बनाती है। इससे पड़ोसी देशों के बड़े हिस्से को निशाना बनाया जा सकता है। अग्नि-III, 3,000-5,000 किमी की रेंज पा सकती है। जबकि, अग्नि-IV उन्नत नेविगेशन का उपयोग करता है और अधिक सटीक है। दूसरी ओर, अग्नि-V, 5,000-8,000 किमी की रेंज के साथ, पूरे चीन और यूरोप के कुछ हिस्सों पर हमला कर सकता है।
अग्नि के अलावा, ब्रह्मोस एक अन्य महत्वपूर्ण मिसाइल है। यह एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे भारत और रूस ने मिलकर विकसित किया है। यह 2.8 से 3.0 मैक की गति से चलता है, जो इसे दुनिया का सबसे तेज़ ऑपरेशनल क्रूज़ मिसाइल बनाता है। इसकी रेंज 300-500 किमी है, जबकि इसका विस्तारित संस्करण 800 किमी तक पहुंच सकता है। भारत की तीनों रक्षा सेवाएं ब्रह्मोस मिसाइल का उपयोग करती हैं। यह जमीन, समुद्र और हवा से लॉन्च हो सकता है। मई 2025 में, ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान, पहली बार युद्ध में ब्रह्मोस का इस्तेमाल किया गया था। यह भारत के रक्षा निर्यात और आत्मनिर्भर भारत मिशन को बढ़ावा देता है।