जौनपुर, आज अनुभव कीजिए, ब्लूज़ संगीत में भावनात्मक अभिव्यक्ति को
जौनपुर अपनी ऐतिहासिक इमारतों, शर्की स्थापत्य और गंगा-जमुनी सांस्कृतिक परिवेश के लिए जाना जाता है। किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों और इतिहास से नहीं, बल्कि उन भावनाओं और अनुभवों से भी बनती है जिन्हें कला के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। संगीत की दुनिया में ब्लूज़ इसी मानवीय अनुभव को स्वर देने वाली एक प्रभावशाली विधा है।ब्लूज़ में गिटार (Guitar), पियानो, बेस और ड्रम जैसे वाद्ययंत्र मिलकर एक विशिष्ट ध्वनि रचते हैं। इसकी लय अक्सर सहज और दोहरावपूर्ण होती है, लेकिन कलाकार अपनी गायकी और वाद्य प्रस्तुति में छोटे-छोटे बदलावों से इसे जीवंत बनाता है।ब्लूज़ संगीत में गिटार का विशेष महत्त्व है, क्योंकि इसकी ध्वनि इस विधा की भावनात्मक गहराई और विशिष्ट पहचान को व्यक्त करने में अहम भूमिका निभाती है। गिटार की स्लाइड (Sliding) तकनीक, बेंडिंग (Bending) और विशिष्ट रिफ़्स (Riffs) के माध्यम से कलाकार उदासी, दर्द, संघर्ष और उम्मीद जैसी भावनाओं को सुरों में ढालते हैं। ब्लूज़ में गिटार केवल धुन बजाने का साधन नहीं है, बल्कि यह गायकी के साथ संवाद करते हुए संगीत को एक जीवंत अनुभव बनाता है। रॉबर्ट जॉनसन (Robert Johnson) और बी.बी. किंग (B.B. King) जैसे दिग्गज कलाकारों ने अपने अनूठे गिटार वादन से इस संगीत शैली को लोकप्रिय बनाने और इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी प्रस्तुतियाँ दर्शाती हैं कि कुछ सरल सुर भी किस तरह गहरी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं।इस संगीत की ख़ासियत यह भी है कि एक ही धुन कभी उदासी, कभी दृढ़ता और कभी उम्मीद का एहसास करा सकती है। रॉबर्ट जॉनसन (Robert Johnson) और जॉन ली हूकर (John Lee Hooker) जैसे कलाकारों ने ब्लूज़ की अलग-अलग शैलियों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।विश्व संगीत की इस विधा को जानना संगीत की विविधता को समझने का एक नया अवसर है। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से ब्लूज़ की लय और उसकी भावनात्मक शक्ति का अनुभव करें।संदर्भhttps://l1nq.com/5u3nu4lhttps://sl1nk.com/h97f568
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
आज जानिए, महिषासुर व माँ दुर्गा के 9 दिवसीय युद्ध से जुड़ी नवरात्रि-विजयादशमी पर्व की कथा
हम अभी बड़े हर्ष और उल्लास के साथ नवरात्रि मना रहे हैं। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि साल के अलग-अलग चरणों में, नवरात्रि के त्योहार चार बार मनाए जाते हैं। हालाँकि, इनमें से शुरुआती शरद ऋतु में आने वाली ‘शरद नवरात्रि’ सबसे महत्वपूर्ण है, जो हिंदू पंचांग के आश्विन मास (मुख्य रूप से सितंबर-अक्टूबर) में होती है। इस उत्सव के दौरान पूजे जाने वाले शक्ति के स्वरूपों में क्रमशः दुर्गा, भद्रकाली, अंबा, अन्नपूर्णा देवी, सर्वमंगला, भैरवी, चंडिका, ललिता, भवानी और मूकंबिका शामिल हैं।भारत के विभिन्न क्षेत्रों में नवरात्रि अलग-अलग तरीकों से मनाई जाती है। कई लोगों के लिए यह धार्मिक चिंतन और उपवास का समय होता है। वहीं अन्य लोगों के लिए, यह नृत्य और उत्सव का समय होता है। गुजरात में मनाई जाने वाली शरद नवरात्रि को पूरे देश में, इसके सबसे जीवंत और भव्य उत्सवों में से एक माना जाता है, जहाँ गरबा नृत्य प्रसिद्ध है।यह त्योहार अच्छाई की जीत का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह आदि शक्ति के सम्मान में मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्योहार है। दरअसल, राक्षस महिषासुर ने अग्नि देव से अमर होने का वरदान प्राप्त किया था। इस वरदान के अनुसार, महिषासुर को किसी भी हथियार से मारा या घायल नहीं किया जा सकता था। परिणामस्वरूप, वह इतना शक्तिशाली हो गया कि उसने लोगों के मन में आतंक पैदा कर दिया और हर तरफ विनाश फैला दिया। राक्षस महिषासुर के इस आतंक को समाप्त करने के लिए सभी देवता समाधान पाने हेतु भगवान शिव के पास गए। तब भगवान शिव ने अन्य देवताओं की शक्तियों के साथ मिलकर देवी आद्य शक्ति की रचना की। भगवान शिव सहित सभी देवी-देवताओं ने महिषासुर से मुकाबला करने के लिए उन्हें आभूषण, अस्त्र-शस्त्र और सवारी के रूप में एक सिंह भी प्रदान किया। देवी आद्य शक्ति ने महिषासुर से लगातार नौ दिन और नौ रात तक युद्ध किया। दसवें दिन, उन्होंने महिषासुर का वध कर दिया। इन नौ रातों को ‘नवरात्रि’ के रूप में जाना गया, जबकि दसवें दिन को ‘विजयादशमी’ कहा गया।‘रात्रि’ शब्द का अर्थ, ‘आपको गहरा विश्राम या तीन प्रकार के तापों (कष्टों) से राहत दिलाने वाली चीज या तत्व है। जबकि ‘ताप’ का अर्थ, ‘तीन प्रकार की अग्नियाँ या तीन परेशानियाँ’ है। ये तीन प्रकार की परेशानियाँ निम्नलिखित हैं:1. भौतिक – सांसारिक परेशानियाँ,2. दैविक – ब्रह्मांडीय शक्तियों या देवताओं के स्तर पर होने वाली परेशानियाँ, और3. आत्मा की परेशानियाँ।‘नवरात्रि’ ऐसा गहरा विश्राम प्रदान करती है, जो आपको इन तीनों परेशानियों से मुक्त कर सकता है। इसलिए, यह प्रार्थना और कायाकल्प (ऊर्जावान होने) का समय है। नवरात्रि के दौरान, आपका मन दिव्य चेतना में डूबा रहना चाहिए। एक बच्चे के जन्म में नौ महीने लगते हैं। इसलिए, ये नौ दिन माँ के गर्भ से एक बार फिर बाहर आने और एक नया जन्म लेने जैसे हैं। इन नौ दिनों और रातों के दौरान, व्यक्ति को अंतर्मुखी होना चाहिए और अपने मूल (स्रोत) को याद करना चाहिए। इस समय हमें खुद से “मेरा जन्म कैसे हुआ?”, “मेरा स्रोत क्या है?” जैसे कुछ सवाल भी पूछने चाहिए। इस प्रकार, हमें अपनी चेतना पर विचार करना चाहिए।नवरात्रि के पहले तीन दिन, तमोगुण या जड़ता को समर्पित हैं। अगले तीन दिन रजोगुण या बेचैनी और सक्रियता को समर्पित हैं, जबकि अंतिम तीन दिन सत्व गुण या पवित्रता और उच्च प्राण को समर्पित हैं। सत्व, रज और तम गुण हम सभी में मौजूद हैं। इसके अलावा, इन सभी गुणों पर विजय पाना, स्वयं पर स्थिर रहना और जीवन का जश्न मनाने वाले अंतिम दिन को ‘विजयादशमी’ या ‘विजय दिवस’ कहा जाता है। वास्तव में, नवरात्रि के प्रत्येक दिन का अपना विशेष महत्व है और हर दिन से एक रंग जुड़ा हुआ है।• पहला दिन पर्वतराज की पुत्री माँ शैलपुत्री को समर्पित है। उन्हें भगवान शिव की पत्नी - माता पार्वती का अवतार भी माना जाता है। प्रतिपदा यानी पहले दिन का रंग पीला है। नवरात्रि में पीले रंग का महत्व यह है कि यह धूप और उत्सव के दिनों की शुरुआत में महसूस होने वाली खुशी की भावना का जश्न मनाता है। लोग माँ शैलपुत्री को चमेली के फूल भी अर्पित करते हैं, क्योंकि यह उनका प्रिय फूल माना जाता है।• दूसरा दिन माँ ब्रह्मचारिणी को समर्पित है, जिन्हें दुर्गा का दूसरा अवतार कहा जाता है। कहा जाता है कि यह दुर्गा का वह रूप है, जो आपको मोक्ष या मुक्ति दिला सकता है। इस दिन लोग हरा रंग पहनते हैं, क्योंकि यह एक नई शुरुआत के साथ-साथ विकास का प्रतीक है। लोगों का मानना है कि यदि वे इस दिन हरा रंग पहनें, तो यह उनके जीवन में भी ऊर्जा और प्रगति लेकर आएगा।• तीसरा दिन माँ चंद्रघंटा को समर्पित है, जिन्हें जीवन में शांति, समृद्धि और सुकून लाने वाली देवी कहा जाता है। इस दिन का रंग स्लेटी (ग्रे) है। यह सभी बुराइयों को समाप्त करने के दृढ़ संकल्प और हिम्मत का प्रतीक है।• चौथा दिन माँ कूष्मांडा को समर्पित है, जो ब्रह्मांड की रचयिता हैं। उन्हें मुस्कुराने वाली देवी भी माना जाता है। चूँकि नारंगी रंग सबसे खुशनुमा रंगों में से एक है, इसलिए यह इस दिन का रंग है। यह जीवंतता और ज्ञान का प्रतीक है।• पाँचवा दिन माँ स्कंदमाता को समर्पित है, जो एक माता की शक्ति और कोमलता दोनों को दर्शाती हैं। लोग सफेद रंग पहनकर उनकी पवित्रता और शांति का जश्न मनाते हैं।• छठे दिन माँ कात्यायनी की पूजा की जाती है। वे प्रसिद्ध ऋषि कात्या के यहाँ जन्मी थीं और अपने साहस के लिए जानी जाती थीं। इस दिन भक्त लाल रंग पहनकर, उनकी सुंदरता और वीरता का जश्न मनाते हैं।• सातवें दिन, दुर्गा जी के सबसे भयंकर रूप की पूजा की जाती है, जिन्हें कालरात्रि कहा जाता है। दुर्गा के इस रूप को अक्सर गहरे नीले रंग की त्वचा के साथ दर्शाया जाता है। यही कारण है कि नीला इस दिन का रंग है। नीला रंग उनकी उस असीम शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक है, जो वास्तव में दिव्य है।• आठवें दिन, महागौरी जी की उनके बुद्धिमान और शांत स्वभाव के लिए पूजा की जाती है। उन्हें प्रसन्नता की देवी माना जाता है और उनके दिन को समर्पित रंग मयूर हरा (पीकॉक ग्रीन) है। नवरात्रि में इस हरे रंग का महत्व यह है कि यह सामंजस्य और आनंद की भावना का प्रतीक है।• अंतिम और नौवें दिन, देवी सिद्धिदात्री की कायाकल्प करने वाली और उपचार करने वाली शक्तियों की पूजा की जाती है। उनके लिए गुलाबी रंग चुना गया है। गुलाबी रंग आशा और आत्म-परिमार्जन की भावना को दर्शाता है।साल की चार नवरात्रियों में से, शरद ऋतु की नवरात्रि के अलावा, एक अन्य नवरात्रि भी उसी आस्था से मनाई जाती है। नवरात्रि केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है। यह ब्रह्मांडीय चक्रों, मौसमी बदलावों और आंतरिक मनोवैज्ञानिक बदलावों के साथ तालमेल बिठाने वाला एक सावधानीपूर्वक निर्धारित आध्यात्मिक अनुष्ठान है। हिंदू परंपरा में दो मुख्य नवरात्रियों को मनाया जाता है: चैत्र नवरात्रि, जो वसंत ऋतु में मनाई जाती है, और शरद नवरात्रि, जो शरद ऋतु में मनाई जाती है। ये सौर वर्ष के दो ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ों पर आती हैं, जब प्रकृति स्वयं एक दृश्य परिवर्तन से गुजरती है।वसंत ऋतु नवीनीकरण, उद्भव और संभावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। दूसरी ओर, शरद ऋतु परिपक्वता, फसल कटाई और विश्राम की तैयारी का प्रतीक है। मानव मनोविज्ञान भी इन मौसमी बदलावों को उससे कहीं अधिक गहराई से दर्शाता है, जितना अधिकांश लोग समझते हैं। दोनों नवरात्रियाँ ‘संधि काल’ के रूप में जानी जाने वाली अवधि के दौरान आती हैं, जो कि ऋतुओं के बीच का संक्रांति काल होता है। हिंदू विचार में, संक्रांति की इन अवधियों को ऊर्जा के दृष्टिकोण से बहुत संवेदनशील माना जाता है।ऐसे समय में, शरीर, मन और पर्यावरण असंतुलन के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। नवरात्रि के दौरान किए जाने वाले अनुष्ठान, उपवास और अनुशासित साधना संतुलन बनाए रखने वाले अभ्यासों के रूप में कार्य करती हैं। अति का जश्न मनाने के बजाय, नवरात्रि संयम, सादगी और संतुलन पर जोर देती है, जो बदलाव के समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण गुण हैं।जिस प्रकार प्रकृति में बदलाव होते हैं, मनुष्य भी आंतरिक चक्रों से गुजरता है। साल भर हमारे भावनात्मक पैटर्न, प्रेरणा का स्तर और मानसिक स्पष्टता में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। नवरात्रि को दो बार मनाकर, हिंदू परंपरा आत्म-नियमितीकरण के लिए दो संरचित अवसर प्रदान करती है - एक विकास की शुरुआत करने के लिए, और दूसरा उसे सुदृढ़ करने के लिए।चैत्र नवरात्रि संकल्प लेने और नवीनीकरण को बढ़ावा देती है। जबकि शरद नवरात्रि आत्मनिरीक्षण और खुद को जड़ों से जोड़े रखने (ग्राउंडिंग) के लिए प्रेरित करती है। परिवर्तन के लिए, प्रयास और विश्राम दोनों की आवश्यकता होती है। अतः नवरात्रि, साधक पर अत्यधिक बोझ डाले बिना अनुशासन की केंद्रित अवधि प्रदान करती है।वसंत और शरद ऋतु वे बिंदु हैं, जहाँ गर्मी और सर्दी के बीच का संतुलन काफी हद तक बदल जाता है। ये बदलाव न केवल पर्यावरण को प्रभावित करते हैं बल्कि पाचन, रोग प्रतिरोधक क्षमता, भावनात्मक स्थिरता और मानसिक स्पष्टता को भी प्रभावित करते हैं। प्राचीन ऋषियों ने देखा था कि इन चरणों के दौरान अनुशासित आध्यात्मिक अभ्यास से अधिक गहरे परिणाम मिलते हैं। इस प्रकार, दो नवरात्रियों पर जोर देना चुनिंदा परंपरा नहीं, बल्कि गहरे अवलोकन पर आधारित व्यावहारिकता को दर्शाता है। संदर्भ1. https://tinyurl.com/nhk2yxfd 2. https://tinyurl.com/3fdezvfh 3. https://tinyurl.com/y457tp9t 4. https://tinyurl.com/2bxmnjkn
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
अमेरिका या कनाडा कहां पढ़ाई के बाद आसानी से मिलेगी पक्की नौकरी?
भारतीय छात्रों के लिए विदेश में पढ़ाई करना अब केवल एक विदेशी डिग्री हासिल करने तक सीमित नहीं रह गया है। यह एक बेहतर करियर, अंतरराष्ट्रीय जीवन शैली और कई मामलों में दीर्घकालिक रूप से वहां बसने की नींव रखने का एक जरिया बन चुका है। कुछ साल पहले तक छात्रों का मानना था कि विदेशी शिक्षा एक छोटा सा पड़ाव है और उसके बाद वे स्वदेश लौट आएंगे। लेकिन आज का सच यह है कि ज्यादातर छात्र पढ़ाई के बाद उसी देश में काम करने, अंतरराष्ट्रीय अनुभव प्राप्त करने और अंततः वहीं अपना घर बसाने का सपना देखते हैं। इस पूरे सफर में सबसे अहम भूमिका विभिन्न प्रकार के वीजा नियमों की होती है।अध्ययन, रोजगार और स्थायी निवास के बीच का यह सफर बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि आपने किस देश का चुनाव किया है। हर देश के अपने नियम, रोजगार की मांग और आव्रजन नीतियां होती हैं। कुछ देश पढ़ाई के बाद एक लंबा समय देते हैं ताकि छात्र नौकरी ढूंढ सकें, जबकि कुछ देशों ने अपने नियमों को बहुत सख्त कर दिया है।विदेश में पढ़ाई के बाद छात्रों के लिए रोजगार क्यों महत्वपूर्ण है?विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करना किसी भी छात्र और उसके परिवार के लिए एक बहुत बड़ा आर्थिक और भावनात्मक निवेश है। आप अपना घर और अपनी सुविधा का दायरा छोड़कर वर्षों तक एक नए माहौल में मेहनत करते हैं। ऐसे में पढ़ाई के बाद उस देश में काम करने का अवसर मिलना कई मायनों में जरूरी हो जाता है। पढ़ाई के बाद काम करने से छात्रों को बहुमूल्य वैश्विक कार्य अनुभव मिलता है। सिर्फ डिग्री होना काफी नहीं है, बल्कि नियोक्ताओं को यह दिखाना भी जरूरी है कि आप एक बहुसांस्कृतिक माहौल में काम कर सकते हैं।वित्तीय नजरिए से देखें तो ट्यूशन फीस, रहने का खर्च और यात्रा में भारी रकम खर्च होती है। पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा के जरिए छात्र अपनी शिक्षा पर किए गए निवेश की भरपाई कर सकते हैं। कई छात्र नौकरी लगने के कुछ ही वर्षों के भीतर अपना एजुकेशन लोन चुकाने में सक्षम हो जाते हैं। इसके अलावा, कई छात्रों के लिए यह स्थायी निवास यानी पीआर की दिशा में पहला कदम होता है। विदेशी सरकारें भी ऐसे कुशल प्रवासियों को प्राथमिकता देती हैं जिनके पास स्थानीय शिक्षा और कार्य का अनुभव हो।अमेरिका में नौकरी और वीजा के क्या नियम हैं?अमेरिका हमेशा से ही भारतीय छात्रों, खासकर विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में रुचि रखने वालों की पहली पसंद रहा है। पहली नजर में ऐसा लगता है कि अमेरिका में छात्रों के लिए नियम नहीं बदले हैं। ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय छात्रों को पढ़ाई के बाद बारह महीने की ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (Optional Practical Training) मिलती है। अगर छात्र मान्यता प्राप्त स्टेम कोर्स से पास आउट हैं, तो वे इसे चौबीस महीने और बढ़ा सकते हैं। इसका मतलब है कि स्टेम छात्रों को कुल छ्त्तीस महीने तक काम करने का मौका मिल सकता है।लेकिन असली चुनौती समय की नहीं, बल्कि वर्क वीजा में बदलाव की है। अमेरिका में लंबे समय तक रुकने का रास्ता एच-वनबी वीजा से होकर जाता है। इसका सालाना कोटा सिर्फ 65,000 है और 20,000 अतिरिक्त वीजा अमेरिकी मास्टर डिग्री धारकों के लिए होते हैं। आवेदनों की संख्या इस कोटे से कई गुना ज्यादा होती है। नियोक्ता भी इस असंतुलन से वाकिफ हैं, इसलिए वे ऐसे उम्मीदवारों पर पैसा और समय खर्च करने से कतराते हैं जिन्हें काम सीखने में लंबा वक्त लगता हो। अमेरिका अब उन छात्रों को ज्यादा अवसर देता है जो पढ़ाई के दौरान ही इंटर्नशिप कर लेते हैं और अपने करियर को लेकर स्पष्ट होते हैं। बदलते भू-राजनीतिक हालात और अमेरिकी आव्रजन नीतियों में लगातार हो रहे बदलावों, जैसे अक्टूबर 2026 में इन्फोसिस सहित आठ तकनीकी कंपनियों की ग्रीन कार्ड प्रायोजन प्रक्रिया (PERM) पर रोक, को देखते हुए छात्रों को विदेश में पढ़ाई और रोजगार की योजना बनाते समय नवीनतम वीजा नियमों पर भी नजर रखनी चाहिए।ब्रिटेन में पढ़ाई के बाद रुकने के नियमों में क्या बदलाव हुए हैं?ब्रिटेन ने हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अपनी नीतियां फिर से आकर्षक बनाई हैं, लेकिन यहां भी समय सीमा को लेकर बदलाव हुए हैं। ब्रिटेन का ग्रेजुएट रूट वीजा छात्रों को पढ़ाई के बाद रुकने का मौका देता है। यदि आप इकतीस दिसंबर दो हजार छब्बीस तक आवेदन करते हैं, तो आपको पढ़ाई के बाद दो साल का वर्क वीजा मिलेगा। लेकिन एक जनवरी दो हजार सत्ताईस से आवेदन करने वालों को सिर्फ अठारह महीने का समय मिलेगा। हालांकि पीएचडी करने वाले छात्रों के लिए यह अवधि तीन साल ही रहेगी।कागजों पर यह अंतर सिर्फ छह महीने का लगता है, लेकिन असल जिंदगी में शुरुआती नौकरियां हमेशा सही नहीं होतीं। छात्र इस समय का इस्तेमाल अपनी नौकरी बदलने, बेहतर वेतन पाने और प्रायोजन के स्तर तक पहुंचने में करते हैं। स्किल्ड वर्कर वीजा के लिए न्यूनतम वेतन सीमा अब अड़तीस हजार सात सौ पाउंड कर दी गई है। समय कम होने के कारण छात्रों पर जल्द से जल्द सही नौकरी और नियोक्ता ढूंढने का भारी दबाव रहता है।कनाडा को छात्रों के लिए कितना अनुकूल माना जाता है?कनाडा को छात्रों के बीच सबसे सुरक्षित और अनुमानित देश माना जाता है क्योंकि यह पोस्ट-ग्रेजुएशन वर्क परमिट के तहत तीन साल तक रुकने का मौका देता है। लेकिन नवंबर दो हजार चौबीस के बाद से कनाडा के नियमों में बड़ा बदलाव आया है। अब वर्क परमिट की योग्यता को सीधे तौर पर आपकी पढ़ाई के विषय से जोड़ दिया गया है।अब केवल उन्हीं छात्रों को आसानी से परमिट मिल रहा है जिनके कोर्स कनाडा के श्रम बाजार की जरूरतों से मेल खाते हैं। सरकार ने इसके लिए नौ सौ से अधिक मांग वाले क्षेत्रों की एक सूची तैयार की है। स्वास्थ्य सेवा, तकनीक, इंजीनियरिंग और कुशल व्यापार जैसे क्षेत्रों में पढ़े छात्रों के लिए कनाडा अब भी बेहतरीन है। इसके अलावा, पोस्ट-स्टडी स्तर पर अब अंग्रेजी या फ्रेंच भाषा की परीक्षा पास करने का प्रमाण भी अनिवार्य कर दिया गया है।ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में छात्रों के लिए क्या चुनौतियां हैं?ऑस्ट्रेलिया का पोस्ट-स्टडी ढांचा अब ज्यादा स्पष्ट लेकिन कम लचीला हो गया है। वहाँ टेंपरेरी ग्रेजुएट वीजा के लिए आवेदन करते समय सामान्य आयु सीमा अब पैंतीस वर्ष कर दी गई है। हालांकि रिसर्च मास्टर्स और पीएचडी स्नातकों के लिए यह सीमा पचास वर्ष है। इसके साथ ही अंग्रेजी भाषा की योग्यता भी कड़ी कर दी गई है और अब छात्रों को आईईएलटीएस में कम से कम छह दशमलव पांच बैंड लाने होते हैं। बैचलर और मास्टर्स के छात्रों को दो साल और पीएचडी वालों को तीन साल तक रुकने की अनुमति है। क्षेत्रीय इलाकों में पढ़ाई करने से अतिरिक्त समय और पीआर के लिए अधिक अंक मिल सकते हैं।वहीं, न्यूजीलैंड में पढ़ाई के स्तर के आधार पर तीन साल तक का पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा मिलता है। न्यूजीलैंड की नीतियां स्थिर हैं, लेकिन वहां नौकरी का बाजार ब्रिटेन, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया की तुलना में बहुत छोटा है। कम नियोक्ताओं और सीमित अवसरों के कारण छात्रों को रोजगार खोजने में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।यूरोप के देशों में रोजगार की क्या संभावनाएं हैं?यूरोप की बात करें तो जर्मनी आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरता है, जहां उच्च शिक्षा सस्ती या मुफ्त है। पढ़ाई के बाद जर्मनी छात्रों को नौकरी ढूंढने के लिए अठारह महीने का समय देता है। इस दौरान वे काम भी कर सकते हैं। लेकिन जर्मनी में सफलता वीजा से नहीं, बल्कि भाषा से तय होती है। नियोक्ताओं की अपेक्षा होती है कि उम्मीदवार को बी-वन या बी-टू स्तर की जर्मन भाषा आती हो।फ्रांस में यह अवधि छोटी लेकिन स्पष्ट है। भारतीय छात्रों को नौकरी खोजने या अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए चौबीस महीने तक का समय मिल सकता है। यहां वर्क वीजा में बदलने के लिए वेतन सीमा न्यूनतम मजदूरी का लगभग डेढ़ सौ प्रतिशत होनी चाहिए। दूसरी ओर, संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई में पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा का कोई सीधा नियम नहीं है। वहाँ सब कुछ नियोक्ताओं पर निर्भर करता है। आपको साठ, नब्बे या एक सौ बीस दिन का जॉबसीकर वीजा मिलता है और उसके बाद नियोक्ता ही आपका वर्क वीजा प्रायोजित करता है।नियमों के साथ रोजगार बाजार को समझना क्यों जरूरी है?सिर्फ वीजा नियम जान लेना ही काफी नहीं है, छात्रों को उस देश के श्रम बाजार को भी समझना होगा। हर देश की अपनी आर्थिक स्थिति और उद्योग की जरूरतें होती हैं। छात्रों को ऐसे क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए जो उनके अध्ययन से जुड़े हों और जहां कुशल पेशेवरों की भारी मांग हो।नेटवर्किंग भी नौकरी पाने का एक अहम हिस्सा है। करियर मेले, उद्योग कार्यक्रमों और पूर्व छात्रों की सभाओं में जाने से नौकरी के अच्छे अवसर मिल सकते हैं। इसके अलावा, अपना रेज्यूमे उस देश के मानकों के अनुसार तैयार करना बहुत जरूरी है। कई बार अंतरराष्ट्रीय छात्रों को ऐसे नियोक्ताओं की जरूरत होती है जो उनके वर्क वीजा को प्रायोजित कर सकें। अगर कोई वर्क वीजा नहीं मिल पाता है, तो छात्रों को उद्यमशीलता, फ्रीलांस वर्क या आगे की शिक्षा जैसे विकल्पों के बारे में भी विचार करना चाहिए। बदलते आव्रजन नियमों के बीच छात्रों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे इमिग्रेशन वकीलों या सलाहकारों से सही पेशेवर मार्गदर्शन लेते रहें।निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि आज के दौर में विदेशों में बसने और नौकरी पाने का जो बफर टाइम पहले मिलता था, वह अब सिकुड़ रहा है। विदेशी सरकारें अब उन छात्रों को प्राथमिकता दे रही हैं जो श्रम बाजार की जरूरतों के हिसाब से पढ़ाई कर रहे हैं और जो जल्द से जल्द कुशल पदों को संभाल सकते हैं। इसलिए, विदेश जाने की योजना बना रहे छात्रों को पहले दिन से ही अपने लक्ष्यों के प्रति स्पष्ट रहना होगा।संदर्भ1. https://tinyurl.com/23kqswjj 2. https://tinyurl.com/252rb9xt 3. https://tinyurl.com/29lo2ohz 4. https://tinyurl.com/2o6gtbs4 5. https://tinyurl.com/2fdn546x 6. https://tinyurl.com/26on5gva
वन
ज़मीन के नीचे कैसे बातें करते हैं जंगल के शांत पेड़?
जंगल ऊपर से जितने शांत और स्थिर दिखते हैं, ज़मीन के नीचे उनकी दुनिया उतनी ही रहस्यमयी और जीवंत होती है। एक स्वस्थ जंगल हर साल कई टन मृत लकड़ी, पत्तियां और जैविक कचरा उत्पन्न करता है। फिर भी, जंगल की ज़मीन कभी भी कचरे के ढेर में नहीं दबती। इसका कारण ज़मीन के नीचे काम करने वाले सूक्ष्मजीवों, मुख्य रूप से कवक और बैक्टीरिया का एक विशाल नेटवर्क है। जौनपुर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में मौजूद वृक्षों के पारिस्थितिकी तंत्र को समझने के लिए, हमें ज़मीन के नीचे मौजूद इस जैविक इंजन को समझना होगा। मृत कार्बनिक पदार्थों का अपघटन वन पारिस्थितिकी तंत्र में कार्बन और नाइट्रोजन चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।वन पारिस्थितिकी तंत्र में गिरे हुए पत्तों और मृत लकड़ियों का क्या होता है?जंगलों में मृत कार्बनिक पदार्थों में मोटे और महीन मृत लकड़ी और गिरे हुए पत्ते शामिल होते हैं। गिरे हुए पत्तों का कचरा वार्षिक पौधे के कचरे का 22 से 81 प्रतिशत तक हो सकता है। ठंडे और गर्म समशीतोष्ण वनों में पर्णपाती पेड़ों द्वारा हर साल 3 से 5 टन प्रति हेक्टेयर पत्तों का कचरा उत्पन्न होता है। यह कचरा मिट्टी के कटाव को रोकता है, बारिश की बूंदों से मिट्टी को बचाता है और सूक्ष्म जलवायु में होने वाले उतार-चढ़ाव से सुरक्षा प्रदान करता है।कवक और बैक्टीरिया इस कचरे के मुख्य अपघटक हैं। कवक अपने विशिष्ट एंजाइमों (enzyme) और हाइफे (hyphae) के माध्यम से नए सबस्ट्रेट्स तक पहुंचने की क्षमता के कारण अपघटन में सबसे बड़ा योगदान देते हैं। अपघटन की यह प्रक्रिया वैश्विक स्तर पर हर साल 60 टेराग्राम कार्बन (60 Tg C) छोड़ती है, जो जीवाश्म ईंधन के जलने से निकलने वाले कार्बन से 11 गुना अधिक है। मृत लकड़ी भी वन मिट्टी के लिए पोषक तत्वों का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जो गिरे हुए पत्तों में नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P), पोटेशियम (K) और कैल्शियम (Ca) के वार्षिक इनपुट का 1 से 18 प्रतिशत योगदान देती है।गिरे हुए पत्तों के भीतर मौजूद कार्बन कोशिका भित्ति के क्षरण के माध्यम से बाहर निकलता है। कोशिका भित्ति के घटकों को उनकी कठोरता के आधार पर तीन समूहों में बांटा जा सकता है: पानी में घुलनशील अणु, हेमीसेल्यूलोज (hemicellulose) व सेल्यूलोज (cellulose), और लिग्निन (lignin) व अन्य सुगंधित यौगिक। पानी में घुलनशील छोटे अणु जैसे अमीनो एसिड और शर्करा आसानी से सुलभ होते हैं और तेजी से बढ़ने वाले सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटित कर दिए जाते हैं। अतीत में बैक्टीरिया की भूमिका को अक्सर नजरअंदाज किया गया था, क्योंकि यह माना जाता था कि वे लकड़ी के पॉलिमर को नष्ट करने में सीमित क्षमता रखते हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में यह सिद्ध हुआ है कि बैक्टीरिया भी लिग्निन को विघटित करने में सक्षम हैं। कचरे में नाइट्रोजन की मात्रा अपघटकों द्वारा अपने चयापचय (metabolic) आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बाहरी नाइट्रोजन के अवशोषण से भी प्रभावित होती है।जंगल के पेड़ ज़मीन के नीचे फंगल माइसीलियम के ज़रिए कैसे संवाद करते हैं?पेड़ केवल निष्क्रिय पौधे नहीं हैं, बल्कि वे कवक के एक भूमिगत नेटवर्क के माध्यम से संवाद करते हैं, जिसे माइकोराइजल नेटवर्क (Mycorrhizal networks) कहा जाता है। इन जटिल प्रणालियों में माइसीलियम (Mycelium) नामक छोटे धागे होते हैं जो पेड़ों की जड़ों के साथ जुड़ जाते हैं। यह कवक नेटवर्क एक सूचना राजमार्ग के रूप में कार्य करता है, जो पेड़ों को संसाधनों और महत्वपूर्ण सूचनाओं को साझा करने की अनुमति देता है। इस अद्भुत संचार नेटवर्क को उचित ही "वुड-वाइड वेब" (wood-wide web) का नाम दिया गया है।अपघटक कवक गिरे हुए पत्तों, शाखाओं और यहां तक कि पूरे पेड़ के तनों को तोड़कर पोषक तत्वों को वापस मिट्टी में छोड़ते हैं। पेड़ों और कवक ने एक असाधारण विनिमय प्रणाली विकसित की है। पेड़ प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) के माध्यम से उत्पन्न होने वाली शर्करा (sugars) का 20 प्रतिशत तक अपने फंगल भागीदारों के साथ साझा करते हैं। बदले में, कवक अपने धागों को मिट्टी में फैलाते हैं, जिससे वे मिट्टी के उस आयतन (volume) का पता लगा सकते हैं जो पेड़ों की जड़ों की तुलना में सैकड़ों गुना बड़ा होता है। ये कवक फास्फोरस और नाइट्रोजन जैसे आवश्यक पोषक तत्व निकालकर पेड़ों को देते हैं।जब किसी पेड़ को किसी बीमारी या शिकारी जीव से खतरा होता है, तो वह माइकोराइजल नेटवर्क या हवा के माध्यम से रासायनिक संकेत (chemical signals) छोड़ सकता है। उदाहरण के लिए, जब एक जिराफ अकैसिया (Acacia) के पत्तों को खाना शुरू करता है, तो पेड़ चोट का पता लगाता है और एथिलीन गैस (ethylene gas) के रूप में एक संकट संकेत छोड़ता है। पड़ोसी अकैसिया पेड़ इसके जवाब में अपने पत्तों में टैनिन (tannins) पंप करते हैं, जिससे उनका स्वाद खराब हो जाता है और जिराफ उन्हें खाने से बचते हैं।मातृ वृक्ष पूरे जंगल को एक साथ कैसे जोड़े रखते हैं?जंगल में सबसे बड़े और सबसे पुराने पेड़ों को मातृ वृक्ष या मातृ पेड़ (Mother trees) कहा जाता है। ये मातृ वृक्ष इस संचार प्रणाली के केंद्र में होते हैं, जो आसपास की वनस्पतियों और जीवों का पोषण करते हैं। ये प्राचीन रक्षक अपने विशाल जड़ प्रणालियों के माध्यम से पोषक तत्वों और सूचनाओं के हस्तांतरण की सुविधा प्रदान करते हैं, जिससे छोटे पेड़ों को पनपने में मदद मिलती है। ये मातृ पेड़ कीटों या बीमारियों जैसे आने वाले खतरों के बारे में पड़ोसी पौधों को चेतावनी भी देते हैं।अनुसंधान बताता है कि अधिक मातृ वृक्षों वाले वनों में अधिक जैव विविधता होती है और वे पर्यावरणीय तनावों के प्रति अधिक लचीले होते हैं। जब किसी मातृ वृक्ष को काट दिया जाता है या हटा दिया जाता है, तो स्थापित जड़ प्रणाली गायब हो जाती है, जिससे पोषक तत्वों का साझाकरण और संचार बाधित हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप पड़ोसी पेड़ों को महत्वपूर्ण संसाधनों और सुरक्षात्मक संकेतों से वंचित होना पड़ता है, जिससे पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है।कवक और पेड़ों की यह साझेदारी जलवायु परिवर्तन और बीमारियों से कैसे बचाती है?कवक और पेड़ों की यह साझेदारी वनों को सूखे और जलवायु परिवर्तन (climate change) से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। फंगल नेटवर्क से जुड़े युवा पेड़ों की जीवित रहने की दर उन पेड़ों की तुलना में काफी बेहतर होती है जो इस नेटवर्क से नहीं जुड़े होते। सूखे के दौरान, कवक पेड़ों को मिट्टी की गहरी परतों से पानी तक पहुंचने में मदद करते हैं। भूमध्यसागरीय (Mediterranean) वनों में किए गए हालिया अध्ययनों से पता चलता है कि अत्यधिक सूखे की घटनाओं के दौरान माइकोराइजल नेटवर्क (mycorrhizal network) से जुड़े पेड़ों में जीवित रहने की दर अलग-थलग पेड़ों की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत अधिक थी।कवक पेड़ों को प्राकृतिक सुरक्षा भी प्रदान करते हैं, एंटीबायोटिक्स (antibiotics) का उत्पादन करते हैं और पेड़ों को मजबूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (immune response) विकसित करने में मदद करते हैं। लू या अत्यधिक गर्मी (heat waves) के दौरान, कवक नेटवर्क से जुड़े पेड़ बेहतर जल पहुंच के माध्यम से अपनी पत्तियों के तापमान को अधिक स्थिर बनाए रखते हैं। ठंडी परिस्थितियों में, कवक एंटीफ्रीज यौगिकों (antifreeze compounds) का उत्पादन करके जड़ों को जमने से होने वाले नुकसान से बचाते हैं। इसके अलावा, यह साझेदारी कार्बन भंडारण (carbon storage) का भी समर्थन करती है। कवक मिट्टी में कार्बन को सीधे ग्लोमालिन (Glomalin) जैसे यौगिकों के माध्यम से जमा करते हैं। यह चिपचिपा प्रोटीन मिट्टी में कार्बन को दशकों या सदियों तक बंद रख सकता है। कवक मिट्टी की संरचना में सुधार करते हैं, जिससे मिट्टी के कण एक साथ बंधते हैं, जल प्रतिधारण (water retention) बढ़ता है और कटाव कम होता है।वनों की कटाई या क्लियर-कटिंग (clear-cutting) उन फंगल समुदायों को नष्ट कर देती है जो शायद सदियों से विकसित हुए हों। इसलिए, वनों की बहाली (forest restoration) के लिए स्थानीय मिट्टी का उपयोग करना, परिपक्व पेड़ों की रक्षा करना और शीर्ष मिट्टी (topsoil) को संरक्षित करना आवश्यक है। समशीतोष्ण और बोरियल वनों में आमतौर पर एक्टोमाइकोराइजल कवक (ectomycorrhizal fungi) पाए जाते हैं, जो जड़ के सिरों के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आवरण बनाते हैं। दूसरी ओर, उष्णकटिबंधीय वनों में अर्बस्कुलर माइकोराइजल कवक (arbuscular mycorrhizal fungi) आम हैं, जो सीधे जड़ कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं। पेड़ों और कवक के इस प्राचीन और गहरे संबंध को समझकर ही हम एक ऐसा भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं जिसमें जौनपुर और पूरी दुनिया के जंगल स्वस्थ, लचीले और आत्मनिर्भर बने रहें।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2dc7jwow 2. https://tinyurl.com/2xzhm4gu 3. https://tinyurl.com/2dy2psqc
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
आईए याद करें, क्यों माना गाँधी जी ने, सत्य, करुणा और नैतिकता को, धर्म के प्रमुख स्तंभ ?
जौनपुर की शांत और सुरीली सुबहों में निकलने वाली प्रभात फेरियों की तरह ही, बापू का जीवन भी आध्यात्मिकता और भजनों की मिठास से भरा हुआ था। गांधी जी के लिए धर्म कभी भी बँटवारे या कट्टरपन का ज़रिया नहीं रहा; उनके लिए तो यह इंसान के दिल में छिपी दिव्यता की एक बहुत ही निजी और दार्शनिक खोज थी। आज के दौर में, जहाँ धर्म को लेकर कई तरह की गलतफ़हमियाँ फैली हुई हैं, वहाँ बापू के विचार हमें एक बिल्कुल नई राह दिखाते हैं। इस लेख में हम महात्मा गांधी के धार्मिक दर्शन, उनके आश्रमों में सबके साथ गाए जाने वाले भजनों की अहमियत, और उनके सबसे प्यारे भजन से मिलने वाले हमदर्दी के संदेश को गहराई से समझेंगे। ये बातें आज के सामाजिक और क़ानूनी माहौल में कितनी सटीक बैठती हैं, यह जानकर आप भी अपनी ज़िंदगी में सच्ची शांति और सबको साथ लेकर चलने की सोच अपना सकेंगे।क्या गांधी जी के लिए धर्म का अर्थ केवल सत्य और नैतिकता की खोज था? पश्चिम बंगाल की रायगंज यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. इति चट्टोपाध्याय के एक रिसर्च पेपर के मुताबिक, गांधी जी का धर्म किसी संस्था या इमारत तक सीमित नहीं था। उनका पक्का यकीन था कि धर्म उन सभी मान्यताओं की जड़ है जो हमें ईश्वर या सच्चाई का एहसास कराता है। उनके लिए 'सत्य ही ईश्वर है' और ईश्वर के प्रति यही लगन सच्चा धर्म है। गांधी जी मानते थे कि कोई भी इंसान धर्म के बिना जी नहीं सकता। यहाँ तक कि भगवान को न मानने वाला नास्तिक इंसान भी किसी न किसी उसूल के रूप में ईश्वरीय ताक़त से जुड़ा होता है। धर्म में इंसान के स्वभाव को साफ़ करने और उसे बेहतर बनाने की गज़ब की ताक़त होती है। उन्होंने सभी धर्मों के बीच आपसी तालमेल, सहनशीलता और सम्मान पर बहुत ज़ोर दिया। बापू का मानना था कि दुनिया में सिर्फ़ एक ही धर्म सच्चा नहीं हो सकता, बल्कि लोगों के हिसाब से कई धर्म हो सकते हैं। एकतरफ़ा सोच रखने के बजाय, हमें सहनशील होना चाहिए। अपनी इस बात को समझाने के लिए उन्होंने सात अंधे लोगों और एक हाथी का मशहूर उदाहरण दिया, जहाँ हर इंसान अपनी-अपनी जगह सही था। इसी 'अनेकांतवाद' यानी बहुलता के सिद्धांत ने उन्हें हर धर्म को उसी के नज़रिए से देखने की समझ दी। बापू ने हिंदू धर्म का निष्काम कर्म, जैन और बौद्ध धर्म की अहिंसा, और ईसाई धर्म के प्यार और माफ़ी जैसे गुणों को खुशी-खुशी अपनाया। उन्होंने ज़बरदस्ती धर्म बदलने का कड़ा विरोध किया। वे कहते थे कि अगर कोई ईसाई व्यक्ति हिंदू धर्म अपनाना चाहता है, तो उसे यह समझाना चाहिए कि जो भागवत में लिखा है, वही बाइबिल में भी है; इसलिए उसे एक और बेहतर ईसाई बनने की कोशिश करनी चाहिए। उनका यह भी मानना था कि जो धर्म रोज़मर्रा की उलझनों को नहीं सुलझाता, वह धर्म कहलाने के लायक़ ही नहीं है। तर्क और नैतिकता उनके धर्म के दो सबसे बड़े खंभे थे। उनका दर्शन 'आध्यात्मिक मानववाद' है, जहाँ इंसान सबसे अहम है और इंसानियत की भलाई ही सबसे बड़ा मक़सद है।आश्रमों में संगीत और 'वैष्णव जन तो' भजन हमें क्या सिखाता है? गांधी जी मानते थे कि संगीत हमारी आत्मा की आवाज़ है। उनके आश्रमों में रोज़ाना एक साथ बैठकर भजन गाने की बहुत प्यारी सी परंपरा थी, जिसने सभी आश्रमवासियों के बीच एकता की भावना को मज़बूत किया। इन भजनों में सबसे ख़ास और उनका सबसे पसंदीदा भजन था—'वैष्णव जन तो तेने कहिये'। यह मशहूर गुजराती भजन 15वीं सदी के महान कवि नरसिंह मेहता ने लिखा था। बापू ने इसे अपनी रोज़मर्रा की प्रार्थनाओं में शामिल किया था और उनकी बैठकों से पहले इसे हमेशा गाया जाता था। इस भजन के बोलों में ज़िंदगी का एक बहुत गहरा फलसफ़ा छिपा है। भजन की पंक्तियाँ कहती हैं कि असली वैष्णव (भगवान का भक्त) वही है जो दूसरों के दर्द को अपना समझे, दूसरों के दुख दूर करके उन पर उपकार करे, लेकिन मन में कभी घमंड न लाए। वह पूरी दुनिया में सबका सम्मान करता है, किसी की बुराई नहीं करता और अपनी बातों, कामों और मन को एकदम साफ़ रखता है। ऐसा इंसान सबको एक नज़र से देखता है, लालच छोड़ देता है, पराई औरत को माँ के समान मानता है, कभी झूठ नहीं बोलता और दूसरे के पैसे को हाथ तक नहीं लगाता। उसके मन में कोई मोह-माया नहीं होती और वह वैराग्य अपनाकर बस राम के नाम में मगन रहता है। महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौक़े पर दुनिया भर के 150 से ज़्यादा देशों के कलाकारों ने राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि देने के लिए इस भजन को अपनी आवाज़ दी। (Armenia) से लेकर (Angola), श्रीलंका से लेकर (Serbia), (Iraq) और (Iceland) तक के मशहूर स्थानीय कलाकारों ने इस भजन की पहुँच को पूरी दुनिया में साबित कर दिया। बापू के दिल के सबसे करीब रहने वाले इस गीत में करुणा और सेवा का गहरा संदेश छिपा है। यह संगीत सिर्फ़ आश्रम के रूटीन का हिस्सा नहीं था, बल्कि आत्मा की आवाज़ भी था। आप गांधी जी के इस प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो' की मधुर प्रस्तुति इस वीडियो लिंक के माध्यम से सुन सकते हैं: जिसने दुनिया भर के श्रोताओं को शांति का संदेश दिया है।क्या न्यायिक प्रणाली में भी गांधीवादी सहानुभूति (एम्पैथी) की आवश्यकता है? सामाजिक न्याय के लिए हमदर्दी या सहानुभूति को सबसे ज़रूरी माना जाता है। सामाजिक न्याय वह आदर्श स्थिति है जहाँ समाज के हर इंसान को बराबर मूल अधिकार, सुरक्षा, मौक़े और सामाजिक फ़ायदे मिलते हैं। इसी सोच को ध्यान में रखते हुए 14 अगस्त 2021 को गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति और जी डी गोयनका यूनिवर्सिटी ने 'न्यायिक सहानुभूति, न्यायशास्त्र और न्याय' विषय पर एक ख़ास लेक्चर आयोजित किया। इस प्रोग्राम में दुनिया के जाने-माने क़ानूनी शिक्षाविद् प्रोफ़ेसर उपेंद्र बक्शी ने अपनी बातें रखीं। कई दशकों तक यह माना जाता था कि क़ानून और न्याय के उसूलों में भावनाओं की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, ताकि सिर्फ़ तर्क और कारण की जीत हो सके। लेकिन अब जानकार यह मानने लगे हैं कि भावनाएँ भी कहीं न कहीं क़ानूनी फैसलों और जजों की सोच पर असर डालती हैं। प्रोफ़ेसर बक्शी ने गांधी जी के प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो' का उदाहरण देते हुए हमदर्दी के मतलब को समझाया। उन्होंने मशहूर केशवानंद भारती मामले का ज़िक्र करते हुए बहुत ही ख़ूबसूरती से बताया कि ऊँचे स्तर पर भी हमदर्दी कैसे काम करती है। प्रोफ़ेसर बक्शी के मुताबिक, हमदर्दी का सीधा सा मतलब है ख़ुद को किसी और की जगह रखकर देखना। इसके दो रूप होते हैं: पहला दिमागी (कोग्निटिव) रूप, जहाँ हम अपने विचारों का इस्तेमाल करके दूसरे के नज़रिए से सोचते हैं। दूसरा जज़्बाती (भावनात्मक) रूप, जहाँ हम असल में वही महसूस करते हैं जो सामने वाला झेल रहा है। सबसे मज़बूत हमदर्दी इन दोनों का मिला-जुला रूप होती है। क़ानून की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए इस हमदर्दी का होना बहुत काम आता है। हर क़ानूनी रिपोर्ट और केस की फ़ाइल के पीछे ऐसे इंसान होते हैं जिनकी ज़िंदगी आर्थिक और मानसिक तौर पर बुरी तरह प्रभावित होती है। हमदर्दी हमें उनके नज़रिए की इज़्ज़त करना सिखाती है।क्या सत्य और अहिंसा का मार्ग ही मानव जाति का अंतिम लक्ष्य है? बापू की पूरी ज़िंदगी इसी सच्चाई और अहिंसा की खोज में गुज़र गई। उन्होंने हमेशा यही माना कि धर्म और नैतिकता एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं; बिना नैतिकता के धर्म एकदम खोखला है। (Brunners) कलेक्शन की तस्वीरों और चित्रों में भी उनके इसी सादे लेकिन बहुत गहरे जीवन-दर्शन की झलक देखने को मिलती है। उनका मानना था कि भगवान अपनी ही बनाई दुनिया में बसता है, इसलिए ग़रीबों की सेवा करना ही ईश्वर की सच्ची पूजा है। कुल मिलाकर, गांधी जी के धर्म की परिभाषा में ऊँच-नीच, स्वर्ग-नरक का डर या ज़बरदस्ती धर्म बदलने जैसी उन बातों की कोई जगह नहीं है जो हिंसा और नफ़रत को बढ़ावा देती हैं। उनका यह 'आध्यात्मिक मानववाद' और भजनों के ज़रिए करुणा का संदेश आज भी हमारे समाज को जोड़ने का बेहतरीन काम कर रहा है। संदर्भ:https://tinyurl.com/25qxv8fmhttps://tinyurl.com/22yzk7qyhttps://tinyurl.com/26hy5tmrhttps://tinyurl.com/26a5r9g2https://tinyurl.com/24mjev2f
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
कंप्यूटर अक्षरों को कैसे समझता है,जानिए एनकोडिंग और आस्की कोड का इतिहास
जब हम तकनीक की बात करते हैं, तो एनकोडिंग एक ऐसा शब्द है जो डेटा स्टोरेज, संचार, प्रोग्रामिंग और मल्टीमीडिया में बार-बार सामने आता है। लेकिन जब आप अपने कीबोर्ड पर कोई अक्षर टाइप करते हैं, तो कंप्यूटर उस अक्षर को सीधे तौर पर नहीं देखता है; वह केवल एक बाइनरी संख्या को समझता है। उस अक्षर को संख्यात्मक रूप में बदलने की प्रक्रिया ही एनकोडिंग कहलाती है। आधुनिक कंप्यूटरों से लेकर स्मार्टफोन तक, हर उपकरण इसी तकनीक पर निर्भर करता है।कंप्यूटर की दुनिया में एनकोडिंग क्या है और यह क्यों जरूरी है?एनकोडिंग (Encoding) सूचना को एक रूप या प्रारूप से दूसरे रूप में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है। आमतौर पर, यह परिवर्तन इसलिए किया जाता है ताकि डेटा को कंप्यूटर और अन्य उपकरणों द्वारा कुशलतापूर्वक संग्रहीत, प्रेषित या संसाधित किया जा सके। इसे एक ऐसे संदेश के अनुवाद के रूप में समझा जा सकता है जिसे प्राप्तकर्ता या सिस्टम सबसे अच्छी तरह समझता है। एनकोडिंग के कई फायदे हैं।सबसे पहले, यह डेटा स्टोरेज में मदद करता है। कंप्यूटर डेटा को बाइनरी में संख्याओं के रूप में संग्रहीत करते हैं। एनकोडिंग टेक्स्ट, इमेज और साउंड जैसे विभिन्न प्रकार के डेटा को बाइनरी में दर्शाने की अनुमति देता है। दूसरा, यह डेटा ट्रांसमिशन के लिए महत्वपूर्ण है। चाहे इंटरनेट पर संदेश भेजना हो या वीडियो स्ट्रीम करना हो, एनकोडिंग डेटा को पैकेज करने में मदद करता है ताकि यह सटीक रूप से यात्रा कर सके। तीसरा, यह अनुकूलता सुनिश्चित करता है, जिससे एक सिस्टम पर बनाया गया डेटा दूसरे सिस्टम पर सही ढंग से पढ़ा जा सके। इसके अलावा, डेटा सुरक्षा के लिए भी एनकोडिंग की भूमिका अहम है।एनकोडिंग के प्रमुख प्रकार कौन-कौन से हैं?डेटा के प्रकार और उसके उपयोग के आधार पर एनकोडिंग कई रूप ले लेती है। कैरेक्टर एनकोडिंग (Character Encoding) अक्षरों, संख्याओं और प्रतीकों को बाइनरी में बदलने के बारे में है ताकि कंप्यूटर टेक्स्ट को समझ और प्रदर्शित कर सके। इसके उदाहरण आस्की, यूटीएफ-8 (UTF-8) और यूनिकोड हैं। यूटीएफ-8 आज दुनिया भर की अधिकांश भाषाओं के लिए एक लोकप्रिय एनकोडिंग है, जो कई अक्षरों और इमोजी का समर्थन करता है।मल्टीमीडिया फाइलों को छोटा करने के लिए ऑडियो और वीडियो एनकोडिंग का उपयोग होता है, जिसमें एमपी3 (MP3) और एएसी (AAC) ऑडियो को कंप्रेस करते हैं, जबकि एच.264 (H.264) और एच.265 (H.265) वीडियो को कंप्रेस करते हैं। संचार के लिए डेटा एनकोडिंग में बेस64 (Base64) बाइनरी डेटा को टेक्स्ट प्रारूप में बदलता है ताकि इसे ईमेल के माध्यम से भेजा जा सके। इसी तरह यूआरएल एनकोडिंग वेबसाइट पतों में विशेष वर्णों को ऐसे प्रारूप में परिवर्तित करता है जिसे ब्राउज़र सुरक्षित रूप से संभाल सकें। प्रोग्रामिंग भाषाओं में जैसे कोटलिन (Kotlin), स्ट्रिंग एनकोडिंग और डिकोडिंग को आसानी से संभाला जा सकता है।आस्की कोड की शुरुआत कब और कैसे हुई थी?आस्की (ASCII) का पूरा नाम अमेरिकन स्टैंडर्ड कोड फॉर इंफॉर्मेशन इंटरचेंज है। 1963 में अमेरिकन नेशनल स्टैंडर्ड इंस्टीट्यूट द्वारा आस्की मानक प्रख्यापित किया गया था, जो कंप्यूटर में अक्षरों, संख्याओं, विराम चिह्नों और नियंत्रण संकेतों का प्रतिनिधित्व करने के लिए सात बिट्स के पैटर्न को निर्दिष्ट करता है। ऐतिहासिक रूप से, आस्की टेलीग्राफिक कोड से विकसित हुआ। इसका पहला व्यावसायिक उपयोग बेल डेटा सेवाओं द्वारा प्रचारित सात-बिट टेलीप्रिंटर कोड के रूप में किया गया था।आस्की पर औपचारिक काम 6 अक्टूबर 1960 को अमेरिकन स्टैंडर्ड एसोसिएशन की X3.2 उपसमिति की पहली बैठक के साथ शुरू हुआ। मानक का पहला संस्करण 1963 में प्रकाशित हुआ था। आस्की में 128 वर्णों की परिभाषाएं शामिल हैं, जिनमें 33 गैर-मुद्रण नियंत्रण वर्ण हैं, 94 मुद्रण योग्य वर्ण हैं, और स्पेस को एक अदृश्य ग्राफिक माना जाता है। 2008 तक वर्ल्ड वाइड वेब पर सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला कैरेक्टर एनकोडिंग आस्की ही था, जिसके बाद यूटीएफ-8 ने इसकी जगह ले ली।यूनिकोड कंसोर्टियम ने वैश्विक भाषाओं को डिजिटल पहचान कैसे दी?यूनिकोड कंसोर्टियम को जनवरी 1991 में कैलिफोर्निया राज्य में शामिल किया गया था। इसकी शुरुआत 1987 में ज़ेरॉक्स (Xerox) के इंजीनियर जो बेकर (Joe Becker) और एप्पल (Apple) के इंजीनियरों ली कॉलिन्स (Lee Collins) और मार्क डेविस (Mark Davis) द्वारा की गई चर्चाओं के बाद हुई। इनका लक्ष्य एक नया कैरेक्टर एनकोडिंग बनाना था, जिसे यूनिकोड (Unicode) कहा गया।प्रारंभिक यूनिकोड मानक 1991 में प्रकाशित हुआ था। इसका लक्ष्य आधुनिक पाठ में सभी वर्णों का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक चर बिट मानक बनाना था, जिसमें सभी लैटिन, एशियाई, ग्रीक, अरबी, सिरिलिक और हिब्रू वर्णमाला, संगीत, अंतर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला, इमोजी और यहां तक कि ब्रेल भी शामिल थे। आधुनिक कंप्यूटर और मोबाइल उपकरणों पर लगभग सभी वर्णों का आधार अब यूनिकोड मानक ही है।डिजिटल ब्रेल लिपि और स्क्रीन रीडर तकनीक कैसे काम करती है?कंप्यूटर और मोबाइल उपकरणों पर ब्रेल डिस्प्ले का उपयोग करते समय, स्क्रीन रीडर ही यह निर्धारित करता है कि कौन से ब्रेल कोड उपलब्ध होंगे। यूनिकोड मानक के कारण, सभी 256 आठ-डॉट ब्रेल वर्णों का यूनिकोड मान U+2800 से U+28ff तक होता है। स्क्रीन रीडर इन वर्णों को ब्रेल में प्रस्तुत करने के लिए जिम्मेदार है। यह एक सुचारू प्रक्रिया है, लेकिन कभी-कभी इसमें तकनीकी समस्याएं भी आती हैं।उदाहरण के लिए, एपोस्ट्रोफी (Apostrophe) वर्ण को लेकर समस्या आती है। यूनिकोड में, अक्सर एपोस्ट्रोफी और एकल क्लोजिंग कोटेशन मार्क दोनों को दर्शाने के लिए एक ही वर्ण का उपयोग किया जाता है। आम पाठकों को यह अंतर दिखाई नहीं देता, लेकिन ब्रेल पाठकों के लिए यह एक समस्या है क्योंकि ब्रेल में एपोस्ट्रोफी और क्लोजिंग कोट पूरी तरह से अलग होते हैं। कई ब्रेल पाठक कॉन्ट्रैक्टेड ब्रेल पढ़ना पसंद करते हैं, जिसके लिए स्क्रीन रीडर एक ब्रेल तालिका तक पहुंचता है जो यह जानकारी प्रदान करती है कि पाठ को कैसे अनुबंधित किया जाना चाहिए।मोबाइल और कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम में ब्रेल कोड के क्या विकल्प मौजूद हैं?एप्पल के आईओएस (iOS) और आईपैडओएस (iPadOS) उपकरणों में वॉयसओवर (VoiceOver) सुविधा के तहत ब्रेल सेटिंग्स मौजूद होती हैं। इसमें आउटपुट और इनपुट के लिए अनकॉन्ट्रैक्टेड 6-डॉट, अनकॉन्ट्रैक्टेड 8-डॉट और कॉन्ट्रैक्टेड ब्रेल के विकल्प मिलते हैं। अनकॉन्ट्रैक्टेड 6-डॉट ब्रेल में बड़े अक्षरों को इंगित करने के लिए डॉट 6 का उपयोग होता है, जबकि 8-डॉट ब्रेल में डॉट 7 का उपयोग किया जाता है। अमेरिका में डिफ़ॉल्ट रूप से इंग्लिश यूनिफाइड (Unified English Braille) टेबल लोड होती है। मैक (Mac) कंप्यूटरों में भी वॉयसओवर यूटिलिटी के तहत इसी तरह की सेटिंग्स और ब्रेल ट्रांसलेशन टेबल्स उपलब्ध होती हैं।एंड्रॉइड (Android) उपकरणों की बात करें तो अगस्त 2022 में एंड्रॉइड 13.0 के जारी होने के साथ ब्रेल सुविधाओं को गूगल के स्क्रीन रीडर टॉकबैक (TalkBack) में एकीकृत किया गया था। जनवरी 2023 में, गूगल ने टॉकबैक 13.1 जारी किया जिसमें ब्रेल तालिकाओं की एक विस्तृत सूची उपलब्ध कराई गई। इसमें 6-डॉट कंप्यूटर ब्रेल और नॉर्थ अमेरिकन ब्रेल कंप्यूटर कोड जैसे विकल्प जोड़े गए, जिससे बीआरएफ (BRF) फाइलें पढ़ना संभव हो सका।विंडोज़ (Windows) पीसी पर सबसे लोकप्रिय स्क्रीन रीडर जॉज़ (JAWS) और एनवीडीए (NVDA) हैं। जॉज़ में दर्जनों भाषाओं के लिए ब्रेल अनुवाद की सुविधा है, जिसमें कंप्यूटर ब्रेल, यूएस इंग्लिश ग्रेड 1 और ग्रेड 2, और यूनिफाइड इंग्लिश ब्रेल के विकल्प मिलते हैं। जॉज़ में 8-डॉट ब्रेल मोड में टेक्स्ट प्रदर्शित करने का विकल्प भी है। एनवीडीए में भी 6-डॉट और 8-डॉट कंप्यूटर ब्रेल के साथ-साथ ग्रेड 1 और ग्रेड 2 के इनपुट और आउटपुट टेबल उपलब्ध हैं। इन सभी तकनीकी प्रगति ने दृष्टिबाधित लोगों के लिए डिजिटल दुनिया को बहुत अधिक सुलभ और समावेशी बना दिया है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/27w69ypr2. https://tinyurl.com/2agpuvfc3. https://tinyurl.com/2augl5st4. https://tinyurl.com/22d972fr
जलवायु और मौसम
जौनपुर वासियों, आज पढ़िए, भारत का अनूठा भौगोलिक परिप्रेक्ष्य कैसे देता है मानसून को जन्म
हम सब, प्रत्येक वर्ष जून महीने की शुरुआत में बारिश की राह देखते हैं। हमारे जौनपुर जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में बारिश जीवनदाता है। मानसून, केवल अधिक बारिश की एक बौछार नहीं है, बल्कि भूमि और महासागर के तापन के अंतर के कारण प्रचलित हवाओं में होने वाला एक बड़ा मौसमी बदलाव है। भारत में तीव्र मानसून इसलिए आता है, क्योंकि विशाल एशियाई भूभाग गर्मियों में तेजी से गर्म होकर कम वायु दाब वाला क्षेत्र बनाता है। इससे हिंद महासागर से उठी नमी से भरी हवाएँ भारतीय उपमहाद्वीप पर बहती हैं, जो फिर हिमालय से टकराकर हमारे क्षेत्र में बारिश बनकर गिरती हैं। इसके विपरीत, यूरोप में कोई वास्तविक मानसून नहीं है। हालांकि, मानसून प्रणालियाँ अन्य स्थानों पर भी मौजूद हैं, जो उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका में मौसमी वर्षा को आकार देती हैं।व्यापक रूप से कहें तो पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में विपरीत ऋतुएँ होती हैं। जैसे-जैसे पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है, पृथ्वी के अक्ष का झुकाव बदलता रहता है। जून, जुलाई और अगस्त महीनों के दौरान पृथ्वी का झुकाव उत्तरी गोलार्ध के हिस्से को सूर्य की ओर अधिक रखता है, और दक्षिणी हिस्सा दूर झुका होता है। दिसंबर, जनवरी और फरवरी महीनों में इसके विपरीत स्थिति होती है। तब दक्षिण गोलार्ध में अधिक प्रकाश, लंबे दिन और अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त होती है। ध्यान दें कि ऋतुओं में परिवर्तन पृथ्वी के इसी झुकाव के कारण होते हैं, और न कि पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी के कारण।भूमध्य रेखा (Equator) के निकट स्थित क्षेत्रों में आमतौर पर केवल दो ही ऋतुएँ होती हैं - वर्षा (मानसून) और शुष्क। चूंकि वे क्षेत्र भूमध्य रेखा (जहाँ सूर्य किरणें हमेशा सीधी गिरती हैं) के पास हैं, इसलिए वर्ष के दौरान उन्हें मिलने वाली प्रकाश की मात्रा में बहुत अधिक बदलाव नहीं होता है।इतिहास में मिस्रवासियों के पास नील नदी के आधार पर तीन ऋतुएँ थीं - बाढ़, वृद्धि और कम पानी। प्रारंभिक ब्रिटेन (Britain) में बेल्टैन (Beltane) त्योहार को गर्मियों की शुरुआत और हैलोवीन (Halloween) त्योहार को इसकी समाप्ति के रूप में चिह्नित किया। रोमन लोग (Roman people)चार ऋतुएँ मानते थे; और यूनानी लोग (Greek people) अपने स्थान के आधार तीन या चार ऋतुएँ मानते थे। जबकि हिंदू कैलेंडर में छह ऋतुएँ हैं।भारत में एक प्रभावशाली उष्णकटिबंधीय मानसून है, क्योंकि विशाल एशियाई भूभाग का तीव्र ग्रीष्मकालीन तापन एक विशाल कम दबाव का क्षेत्र बनाता है। यह क्षेत्र, गर्म हिंद महासागर से नमी से भरी हवाओं को खींचता है। यूरोप में इस प्रणाली का अभाव है, क्योंकि इसका उच्च अक्षांश, छोटा भूभाग और ठंडा अटलांटिक महासागर एक वास्तविक उष्णकटिबंधीय मानसून के लिए आवश्यक तापमान के उतार-चढ़ाव और मौसमी हवा के परिवर्तन को रोकते हैं। इस प्रकार, इन दोनों क्षेत्रों में मुख्य भौगोलिक और जलवायु संबंधी अंतर निम्नलिखित हैं:1. भूमि तापन: भारत उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के पास स्थित है, जहाँ सीधी धूप उपमहाद्वीप और तिब्बती पठार को तीव्रता से गर्म करती है, जिससे एक विशाल गर्म क्षेत्र बनता है। यूरोप और उत्तर में स्थित क्षेत्र अधिक हल्के, क्रमिक तापमान परिवर्तनों का अनुभव करते हैं।2. महासागर का प्रभाव: हिंद महासागर और अरब सागर का गर्म उष्णकटिबंधीय पानी, आसानी से भारी मात्रा में जल वाष्प बनाता है। यूरोप के पास स्थित उत्तर अटलांटिक महासागर ठंडा और अधिक स्थिर है, जो भारी वायुमंडलीय पलटाव को चालना देने में विफल रहता है।3. हवा और दबाव में बदलाव: भारत, मौसमी हवाओं के पूर्ण परिवर्तन का अनुभव करता है (दक्षिण-पश्चिम से आने वाली ग्रीष्मकालीन हवाएँ व उत्तर-पूर्व से आने वाली शुष्क शीतकालीन हवाएँ)। इसके बजाय, यूरोप उष्णकटिबंधीय हवा-पैटर्न में बदलाव के बजाय, साल भर स्थिर मध्यम अक्षांश पश्चिमी हवाओं (Westerly winds) और समशीतोष्ण कम दबाव प्रणालियों के वर्चस्व में रहता है।4. प्राकृतिक अवरोध: भारत में हिमालय ठंडी उत्तरी हवाओं को देश में प्रवेश करने से रोकता है और मानसून की नमी को अवरुद्ध करता है, जिससे वर्षा तेज होती है। यूरोप की मुख्य पर्वत श्रृंखला – आल्प्स (Alps) पश्चिम से पूर्व की ओर खड़ी है और मौसमी उष्णकटिबंधीय वायु द्रव्यमान को अवरुद्ध नहीं कर पाती है।मानसून, केवल एशिया महाद्वीप की विशेषता नहीं है। दरअसल, विश्व में बारिश के लिए एशियाई-ऑस्ट्रेलियाई-अफ्रिकी मानसून (Asian-Australian-African Monsoon) कार्य करता है। उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका के बीच मानसून चक्रों में कुछ समानताएँ हैं, और उनके पीछे निश्चित वायुमंडलीय प्रक्रियाएँ हैं। हालांकि ये दोनों क्षेत्र भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से काफी दूर स्थित हैं, लेकिन इनमें मौसमी हवाओं के रुख में होने वाले बदलाव (Seasonal wind shifts) और वायुमंडलीय परिसंचरण (Atmospheric circulation) की प्रणालियों में गहरी समानता पाई जाती है।दोनों ही क्षेत्रों में, मानसूनी चक्र मुख्य रूप से मौसमी हवाओं की दिशा में होने वाले बड़े पैमाने पर परिवर्तन (Reversal) पर निर्भर करते हैं। ग्रीष्म ऋतु में गर्म भूमि के ऊपर कम वायुदाब का क्षेत्र बनता है, जिससे समुद्र से नमी से भरी हवाएं जमीन की ओर बहती हैं।अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का मौसमी स्थानांतरण, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका दोनों जगहों पर मानसूनी वर्षा को निर्धारित करने में मुख्य भूमिका निभाता है। सूर्य की स्थिति के साथ यह क्षेत्र उत्तर और दक्षिण की ओर स्थानांतरण करता है, जिससे दोनों क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से वर्षा और सूखे मौसम के चक्र उत्पन्न होते हैं।एक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि भौगोलिक भिन्नताओं के बावजूद, वायुमंडल और महासागरों की प्रतिक्रियाओं के कारण दोनों क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा का पैटर्न समान नियमों और प्रक्रियाओं से संचालित होता है। इस प्रकार, इस कार्य में बहु-पैमाने की परस्पर क्रिया के दृष्टिकोण से, एशियाई-ऑस्ट्रेलियाई-अफ्रिकी मानसून को एक एकीकृत इकाई के रूप में माना जाता है।मानसून में योगदान देने वाले ये वायुमंडलीय परिवर्तन, निश्चित सिद्धांतों पर आधारित है। गर्म होने पर हवा फैलती है और ठंडी होने पर संकुचित होती है। इसके परिणामस्वरूप, वायुमंडलीय दबाव में बदलाव होता है। वायुमंडलीय दबाव में अंतर उच्च दबाव से कम दबाव की ओर हवा की गति का कारण बनता है, जिससे हवा गति में आ जाती है। वायुमंडलीय दबाव यह भी निर्धारित करता है कि हवा कब ऊपर उठेगी या नीचे बहेगी।क्षैतिज गति में चलने वाली हवा (Wind), विभिन्न अक्षांशों में गर्मी और नमी को पुनर्वितरित करती है, जिससे पूरे ग्रह के लिए एक स्थिर तापमान बना रहता है। इसके विपरीत, नम हवा के लंबवत रूप से ऊपर उठने से बादल बनते हैं और वर्षा होती है। भूमध्य रेखा के पास समुद्र तल पर हवा का दबाव कम होता है और इस क्षेत्र को भूमध्यरेखीय निम्न (Equatorial low) कहा जाता है। 30° उत्तर और 30° दक्षिण अक्षांशों के साथ उच्च दबाव वाले क्षेत्र पाए जाते हैं, जिन्हें उपोष्णकटिबंधीय उच्च (Subtropical highs) कहा जाता है। ध्रुवों की ओर 60° उत्तर और 60° दक्षिण के साथ, कम दबाव की बेल्ट को उपध्रुवीय निम्न (Subpolar lows) कहा जाता है। ध्रुवों के पास दबाव अधिक होता है और इसे ध्रुवीय उच्च (Polar high) कहा जाता है।ये दबाव बेल्ट प्रकृति में स्थायी नहीं होते हैं। वे सूर्य की स्पष्ट गति के साथ स्थानांतरण करते हैं। वे सर्दियों में उत्तरी गोलार्ध में दक्षिण की ओर और गर्मियों में उत्तर की ओर बढ़ते हैं। उच्च और कम दबाव प्रणालियों के परिणामस्वरूप दबाव में अंतर के दो मुख्य कारण हैं – तापीय और गतिक (Dynamic)। जब हवा गर्म होती है, तो यह फैलती है, और इसलिए इसका घनत्व कम हो जाता है। इससे स्वाभाविक रूप से कम दबाव बनता है। इसके विपरीत, शीतलन से संकुचन होता है। यह घनत्व को बढ़ाता है और इस प्रकार उच्च दबाव की स्थिति पैदा करता है। भूमध्यरेखीय निम्न और ध्रुवीय उच्च का निर्माण क्रमशः तापीय निम्न और तापीय उच्च के उदाहरण हैं।तापमान में बदलाव के अलावा, दबाव बेल्ट के गठन को दबाव प्रवणता बलों (Pressure gradient forces) और पृथ्वी के घूर्णन (कोरियोलिस बल – Coriolis force) से उत्पन्न होने वाले गतिशील नियंत्रणों द्वारा समझाया जा सकता है। संदर्भ1. https://tinyurl.com/7pvpd69c2. https://tinyurl.com/4wabrzte3. https://tinyurl.com/462rhmm2
ध्वनि II - भाषाएँ
जब प्रेस के भूखे मजदूरों के लिए प्रेमचंद ने लुटा दिए थे अपने गरम सूट के पैसे
भारतीय साहित्य में आम जनजीवन, ग्रामीण यथार्थ, किसानों के शोषण और सामाजिक रूढ़ियों को जितनी संवेदनशीलता और गहराई से मुंशी प्रेमचंद ने चित्रित किया है, वैसा उदाहरण विश्व साहित्य में विरले ही मिलता है। 31 जुलाई 1880 को बनारस से चार मील दूर लमही गाँव में जन्मे धनपतराय श्रीवास्तव को आज दुनिया 'उपन्यास सम्राट' और 'कलम के सिपाही' के रूप में जानती है। प्रेमचंद का संपूर्ण जीवन घोर अभावों, पारिवारिक त्रासदियों और लगातार संघर्षों के बीच बीता। किंतु जीवन की भयंकर विषमताओं ने उनकी सृजनशीलता को दबाने के बजाय और अधिक धारदार बना दिया। उन्होंने समाज के वंचितों, गरीबों और उपेक्षितों की पीड़ा को केवल कागज़ पर उकेरा ही नहीं, बल्कि स्वयं उसे हर क्षण जिया भी।धनपतराय का बचपन किन विषम परिस्थितियों और घोर अभावों में बीता?प्रेमचंद का प्रारंभिक जीवन अत्यंत दुखद और संघर्षपूर्ण रहा। उनके पिता अजायब राय डाकखाने में एक मामूली नौकर के रूप में कार्य करते थे। जब धनपतराय केवल आठ वर्ष के थे, तब उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। पिता ने दूसरा विवाह कर लिया, जिसके कारण बालक धनपतराय मातृ-स्नेह से सर्वथा वंचित रह गए। घर में भयंकर गरीबी थी; न पहनने के लिए पर्याप्त कपड़े थे और न ही खाने के लिए भरपेट भोजन। सौतेली माँ का कठोर और उपेक्षित व्यवहार बालक के संवेदनशील मन को भीतर तक कचोटता था, जिसकी टीस बाद में उनकी अनेक प्रसिद्ध कहानियों में पात्रों के माध्यम से परिलक्षित हुई।जब वे केवल 15 वर्ष के थे और नौवीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तब उनके पिता ने बिना सोचे-समझे उनका विवाह एक उम्र में बड़ी और कटुभाषी कन्या से करा दिया। इस बेमेल विवाह से प्रेमचंद का वैवाहिक जीवन अत्यंत कष्टप्रद हो गया। विवाह के ठीक एक वर्ष बाद पिता का भी देहांत हो गया। अचानक 16 वर्ष के किशोर धनपतराय के कंधों पर पाँच सदस्यों—विमाता, उनके दो छोटे बच्चे, पत्नी और स्वयं—के भरण-पोषण का भारी बोझ आ गया। आर्थिक तंगी का यह आलम था कि उन्हें अपना कोट और व्यक्तिगत पुस्तकें तक बेचनी पड़ीं। वे गाँव से बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। आगे चलकर वकील बनने की तमन्ना थी, किंतु गरीबी ने सपने तोड़ दिए। स्कूल आने-जाने के खर्च से बचने के लिए उन्होंने एक वकील के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया, जहाँ उन्हें प्रतिमाह पाँच रुपये मिलते थे। इन पाँच रुपयों में से तीन रुपये वे गाँव में परिवार को भेजते थे और शेष दो रुपयों से महीने भर अभावों के बीच रहकर उन्होंने किसी प्रकार अपनी मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।पुस्तकें पढ़ने की दीवानगी ने कैसे एक सेल्स बॉय को महान लेखक बना दिया?विषम परिस्थितियों के बावजूद साहित्य के प्रति प्रेमचंद का अनुराग कभी कम नहीं हुआ। मिडिल स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही उन्हें उपन्यास पढ़ने का ऐसा चस्का लगा कि वे किताबों की दुनिया में ही अपनी तन्हाई का सुकून ढूँढ़ने लगे। इसी शौक को पूरा करने के लिए उनकी पहली नौकरी एक पुस्तक विक्रेता की दुकान पर 'सेल्स बॉय' के रूप में हुई। वहाँ काम करने का एकमात्र उद्देश्य यह था कि वे दुकान पर बैठकर बिना पैसे खर्च किए अधिक से अधिक उपन्यास पढ़ सकें। दो से तीन वर्षों के भीतर ही उन्होंने कितने ही उर्दू उपन्यास पढ़ डाले।उपन्यास पढ़ने की उनकी दीवानगी इस हद तक थी कि एक उपन्यास पढ़ने के लिए उन्होंने एक तंबाकू विक्रेता से मित्रता कर ली और उसकी दुकान पर बैठकर प्रसिद्ध तिलिस्मी गाथा 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' पूरी पढ़ डाली। कम उम्र में ही उन्होंने अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध उपन्यासकार रोनाल्ड (Ronald) की कृतियों के उर्दू अनुवाद पढ़ लिए थे। 13 वर्ष की आयु में ही उन्होंने पहली व्यंग्यात्मक रचना 'मॉकरी' (Mockery) लिखी, जो उनके एक नाते के मामू (चाचा) पर केंद्रित थी, क्योंकि वे प्रेमचंद को किस्से-कहानियाँ पढ़ने पर डांटते थे। वर्ष 1894 में उन्होंने 'होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात' नामक नाटक लिखा। इसके बाद 1898 में ऐतिहासिक उपन्यास 'रूठी रानी' और 1902 में 'प्रेमा' तथा 1904-05 में 'हम खुर्मा व हम सवाब' उपन्यासों की रचना की, जिनमें विधवा-समस्या का सजीव चित्रण किया गया।'सोज़े वतन' पर अंग्रेज़ों का पहरा और नवाब राय के 'प्रेमचंद' बनने की कहानी क्या है?वर्ष 1905 में पारिवारिक कटुता के चलते पहली पत्नी मायके चली गई और कभी नहीं लौटी, यद्यपि प्रेमचंद वर्षों तक उन्हें खर्चा भेजते रहे। 1905 के अंत में उन्होंने एक बाल-विधवा शीवरानी देवी से दूसरा विवाह किया। इस विवाह के बाद उनके जीवन में कुछ आर्थिक स्थिरता आई और वे शिक्षा विभाग में स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर नियुक्त किए गए।आरंभ में वे 'नवाब राय' के नाम से उर्दू में लिखते थे। वर्ष 1907 में उनका पाँच देशभक्तिपूर्ण कहानियों का ऐतिहासिक संग्रह 'सोज़े वतन' (वतन का दुख-दर्द) प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में स्वाधीनता और देशप्रेम की ऐसी प्रखर भावना थी कि अंग्रेज़ी हुकूमत सतर्क हो गई। अंग्रेज़ शासकों ने इसे खुली बगावत मानते हुए नवाब राय को तलब किया। ब्रिटिश अधिकारियों ने प्रेमचंद के सामने ही 'सोज़े वतन' की सभी उपलब्ध प्रतियों को आग के हवाले कर दिया और उन पर बिना पूर्व अनुमति के लिखने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।सरकारी नौकरी और इस प्रशासनिक बंधन के कारण लेखन जारी रखना कठिन हो गया। तब प्रेमचंद ने अपने घनिष्ठ मित्र और 'ज़माना' पत्रिका के संपादक मुंशी दयानारायण निगम से परामर्श किया। मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें गुप्त रूप से 'प्रेमचंद' नाम से लिखने का बहुमूल्य सुझाव दिया। इसके बाद धनपतराय हमेशा के लिए 'प्रेमचंद' बन गए, और पाठकों ने आदरपूर्वक उनके नाम के आगे 'मुंशी' की मानद उपाधि जोड़ दी।सरकारी नौकरी छोड़कर गांधीजी के आंदोलन में क्यों कूद पड़े थे प्रेमचंद?प्रेमचंद केवल कलम के धनी नहीं थे, बल्कि एक सच्चे राष्ट्रभक्त भी थे। जब महात्मा गांधी ने 1920 के दशक में देशव्यापी असहयोग आंदोलन का आह्वान किया, तो प्रेमचंद ने अपने बढ़ते हुए परिवार के भरण-पोषण की भारी चिंताओं के बावजूद अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी (डिप्टी इंस्पेक्टर पद) से तत्काल त्यागपत्र दे दिया।उनका स्पष्ट मानना था कि राष्ट्र की आज़ादी के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा का बलिदान देना आवश्यक है। उन्होंने साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का हथियार बनाया और वाराणसी में 'सरस्वती प्रेस' की स्थापना की। जीवन की सार्थकता पर उनका एक प्रसिद्ध कथन आज भी प्रासंगिक है: "जीवन में सफल होने के लिए जिस चीज़ की आवश्यकता है, वह शिक्षा है; केवल साक्षरता और डिग्रियाँ नहीं।"'कफ़न' से लेकर 'गोदान' तक: प्रेमचंद की अमर कहानियों और उपन्यासों का क्या मर्म है?प्रेमचंद ने अपने जीवनकाल में दर्जनों अमर उपन्यासों और 300 से अधिक कहानियों की रचना की, जो भारतीय समाज का दर्पण हैं:गोदान (1935-36): इसे भारतीय साहित्य का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माना जाता है। यह किसान होरी की गाय पालने की अधूरी लालसा और महाजनी व्यवस्था, कर्ज तथा जातिगत शोषण के दुष्चक्र की हृदयविदारक गाथा है। उनका अंतिम उपन्यास 'मंगलसूत्र' अधूरा रह गया था।कफ़न: घीसू और माधव की यह कहानी भीषण गरीबी द्वारा मानवीय संवेदनाओं और गरिमा के क्षरण की पराकाष्ठा को दिखाती है, जहाँ प्रसव पीड़ा से मरी बुधिया के कफ़न के पैसों से दोनों शराब और पूरियाँ खा जाते हैं।ईदगाह: अनाथ बालक हामिद और उसकी बूढ़ी दादी अमीना के अगाध प्रेम की कहानी। मेले में खिलौने और मिठाइयों के बजाय दादी की उँगलियों को तवे से जलने से बचाने के लिए चिमटा खरीदना बाल-मन के अप्रतिम त्याग को दर्शाता है।पूस की रात: गरीब किसान हल्कू और उसके वफ़ादार कुत्ते जबरा की यह कहानी भीषण ठंड, लगान और कर्ज के दबाव में खेत बर्बाद होने की बेबसी को उकेरती है।नमक का दारोगा: मुंशी वंशीधर की अटूट सत्यनिष्ठा और भ्रष्ट पूंजीपति पंडित अलोपीदीन के घमंड को चूर करने वाली यह कथा धर्म और धन के संघर्ष का शाश्वत संदेश देती है।पंच परमेश्वर: अलगू चौधरी और जुम्मन शेख़ की मित्रता और न्याय के सर्वोच्च आसन पर बैठकर व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर उठने की सीख।दो बैलों की कथा: हीरा और मोती नामक दो बैलों की निष्ठा और आज़ादी की तड़प के माध्यम से मानवीय स्वतंत्रता का रूपक।बूढ़ी काकी: संपत्ति हड़प लेने के बाद परिवार द्वारा उपेक्षित अंधी वृद्धा की दयनीय स्थिति का मर्मस्पर्शी चित्रण।बड़े घर की बेटी: संयुक्त परिवार की मर्यादा, स्वाभिमान और आपसी सामंजस्य की कहानी।सती: पारंपरिक समाज में नारी पर थोपे गए बंधनों, विधवापन और सम्मान के नाम पर होने वाले उत्पीड़न की तीखी आलोचना।सादगी, मानवीय करुणा और अनीश्वरवाद: प्रेमचंद के व्यक्तित्व का क्या रहस्य था?मुंशी प्रेमचंद स्वभाव से अत्यंत सरल, हंसमुख और दिखावे से कोसों दूर रहने वाले व्यक्ति थे। वे सदैव ठेठ गंवई लिबास पहनते थे और जीवन की बड़ी से बड़ी विपत्ति का सामना मुस्कुराते हुए करते थे। मुंशी दयानारायण निगम को लिखे एक पत्र में उन्होंने सूरदास का स्मरण करते हुए लिखा था: "हमारा काम तो खूब जी-तोड़ खेलना है... पटखनी खाने के बाद धूल झाड़कर खड़े हो जाना चाहिए और कहना चाहिए कि तुम जीते हम हारे, पर हम फिर लड़ेंगे।"उनकी मानवीय करुणा का उदाहरण उनकी पत्नी शीवरानी देवी के संस्मरण से मिलता है। एक बार कड़ाके की ठंड में प्रेमचंद को गरम सूट बनवाने के लिए दो बार 40-40 रुपये दिए गए। उन्होंने दोनों बार वे रुपये अपनी सरस्वती प्रेस के भूखे मजदूरों में बाँट दिए। पत्नी के विरोध करने पर उन्होंने सहजता से कहा: "यह कहाँ का इंसाफ़ है कि हमारी प्रेस के मजदूर भूखे मरें और हम गरम सूट पहनकर घूमें।"जीवन भर गरीबी, अन्याय और पीड़ितों की बेबसी देखने के कारण वे पारंपरिक ईश्वरवादी नहीं रह सके। उन्होंने प्रसिद्ध लेखक जैनेंद्र कुमार को लिखा था कि "मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।" यहाँ तक कि मृत्यु से कुछ घंटे पूर्व भी उन्होंने कहा था कि "मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।"वर्ष 1936 में गंभीर रूप से अस्वस्थ होने के बावजूद उन्होंने 'प्रगतिशील लेखक संघ' के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता की। उचित इलाज और साधनों के अभाव में 8 अक्टूबर 1936 को यह महान ज्योतिपुंज सदा के लिए बुझ गया, किंतु उनकी लेखनी आज भी शोषितों और वंचितों के अधिकारों की सबसे बुलंद आवाज़ बनी हुई है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2cn7wkkp2. https://tinyurl.com/23p9s9r63. https://tinyurl.com/233x7ytw
बैक्टीरिया, प्रोटोज़ोआ, क्रोमिस्टा और शैवाल
स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू में क्या है अंतर जिसे जानना है आपके लिए ज़रूरी?
हर साल इन्फ्लूएंजा यानी फ्लू दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करता है, जिसके कारण कई लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है और कई मामलों में यह जानलेवा भी साबित होता है। जब भी फ्लू के विभिन्न प्रकारों की बात होती है, तो स्वाइन फ्लू का नाम सबसे प्रमुखता से सामने आता है। यह एक ऐसा श्वसन संक्रमण है जिसने दुनिया भर के लोगों और स्वास्थ्य प्रणालियों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। हालांकि स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों ही इन्फ्लूएंजा वायरस के कारण होते हैं, लेकिन इनकी उत्पत्ति, लक्षणों की गंभीरता और प्रभावित करने के तरीके में बहुत बड़ा अंतर है। आज के समय में इन दोनों के बीच के अंतर को समझना और सही सावधानियाँ बरतना बेहद ज़रूरी है।स्वाइन फ्लू क्या है? स्वाइन फ्लू एक प्रकार का वायरल संक्रमण है जिसे एच वन एन वन (H1N1) वायरस के नाम से भी जाना जाता है। इस बीमारी का नाम स्वाइन फ्लू इसलिए पड़ा क्योंकि यह इन्फ्लूएंजा वायरस के उस प्रकार से काफी मिलता-जुलता है जो सूअरों में श्वसन तंत्र की बीमारी का कारण बनता है। समय के साथ इस वायरस के जीन में बदलाव हुए और यह इंसानों को भी संक्रमित करने लगा। यह वायरस मुख्य रूप से श्वसन तंत्र यानी नाक, गले और फेफड़ों को अपना शिकार बनाता है। एक बहुत बड़ी गलतफहमी यह है कि स्वाइन फ्लू सूअर का मांस खाने से फैलता है, जबकि चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अच्छी तरह से पकाया गया मांस खाने से यह संक्रमण बिल्कुल नहीं होता है।साल 2009 की स्वाइन फ्लू महामारी ने दुनिया को कैसे प्रभावित किया? अप्रैल 2009 में अमेरिका और मैक्सिको में एच वन एन वन वायरस का एक बिल्कुल नया प्रकार सामने आया था। क्योंकि यह वायरस नया था, इसलिए युवाओं और बच्चों में इसके प्रति कोई रोग प्रतिरोधक क्षमता नहीं थी। देखते ही देखते कुछ ही हफ्तों में यह वायरस दुनिया भर में फैल गया और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित कर दिया। इस महामारी ने दुनिया भर की स्वास्थ्य प्रणालियों की कड़ी परीक्षा ली।एशियाई देशों में इस महामारी के प्रभाव ने कई कमियों को उजागर किया। जब यह संक्रमण एशिया में पहुंचा, तो हवाई अड्डों पर थर्मल स्कैनर लगाए गए और स्कूल बंद किए गए। कई देशों में होटलों को ही आइसोलेशन सेंटर बना दिया गया। हालांकि, ये बाहरी पाबंदियाँ वायरस को रोकने में बहुत ज्यादा कारगर साबित नहीं हुईं। इस दौरान अस्पतालों में वेंटिलेटर और आईसीयू बेड की भारी कमी देखी गई। ऑक्सीजन की आपूर्ति कम पड़ गई और एंटीवायरल दवाओं के वितरण को लेकर भी कई नीतियां विफल रहीं। इस महामारी ने यह सिखाया कि किसी भी आपातकालीन स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए अस्पतालों का बुनियादी ढांचा मजबूत होना और सही जानकारी का तेजी से प्रसार होना कितना जरूरी है। अगस्त 2010 में इस महामारी के खत्म होने की घोषणा की गई, लेकिन यह वायरस आज भी मौसमी फ्लू के एक प्रकार के रूप में मौजूद है।स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू में क्या अंतर है? स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों ही इन्फ्लूएंजा वायरस से होते हैं, लेकिन इनमें कुछ मुख्य अंतर हैं। मौसमी फ्लू आमतौर पर इन्फ्लूएंजा ए, बी, सी और डी वायरस के कारण होता है और यह हर साल सर्दियों के मौसम में लौटकर आता है। मौसमी फ्लू ज्यादातर बुजुर्गों और बहुत छोटे बच्चों के लिए खतरनाक होता है। दूसरी ओर, स्वाइन फ्लू का वायरस युवाओं, गर्भवती महिलाओं और बच्चों को गंभीर रूप से अपना शिकार बनाता है। जहां मौसमी फ्लू में श्वसन संबंधी समस्याएं ज्यादा होती हैं, वहीं स्वाइन फ्लू के मरीजों में उल्टी और डायरिया जैसी पेट से जुड़ी समस्याएं अधिक देखी जाती हैं। स्वाइन फ्लू बहुत तेजी से निमोनिया और शरीर के कई अंगों के काम न करने जैसी जानलेवा स्थितियों में बदल सकता है, जबकि मौसमी फ्लू आमतौर पर एक या दो हफ्ते में ठीक हो जाता है।स्वाइन फ्लू के प्रमुख लक्षण क्या हैं? स्वाइन फ्लू के लक्षण संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने के एक से चार दिन के भीतर नजर आने लगते हैं, जिसे ऊष्मायन अवधि कहा जाता है। इसके लक्षण आम फ्लू जैसे ही होते हैं, लेकिन कई बार ये बहुत तेजी से गंभीर हो जाते हैं। इसके प्रमुख लक्षणों में तेज बुखार आना, ठंड लगना, सूखी खांसी, गले में खराश, शरीर और मांसपेशियों में भयंकर दर्द, सिरदर्द, बहुत ज्यादा थकान और कमजोरी महसूस होना शामिल है। कई मरीजों में आंखों का लाल होना, आंखों में दर्द, बहती या बंद नाक, और छोटे बच्चों में चिड़चिड़ापन भी देखा जाता है। इसके अलावा, उल्टी आना, जी मिचलाना और डायरिया भी स्वाइन फ्लू के खास लक्षण हैं।अगर सांस लेने में तकलीफ हो, छाती में दर्द हो, होंठ या त्वचा का रंग नीला पड़ने लगे, बहुत ज्यादा चक्कर आएं या शरीर में पानी की भारी कमी हो जाए, तो यह आपातकालीन स्थिति होती है और मरीज को तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।यह बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में कैसे फैलती है? यह वायरस हवा और सीधे संपर्क के माध्यम से फैलता है। जब स्वाइन फ्लू से पीड़ित कोई व्यक्ति खांसता, छींकता या बात करता है, तो उसके मुंह और नाक से निकलने वाली छोटी-छोटी बूंदों के जरिए वायरस हवा में फैल जाता है। जब कोई स्वस्थ व्यक्ति उस हवा में सांस लेता है, तो वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसके अलावा, अगर कोई व्यक्ति किसी ऐसी सतह को छूता है जहां वायरस मौजूद हो, जैसे दरवाजे का हैंडल या मेज, और फिर उन्हीं हाथों से अपनी आंख, नाक या मुंह को छूता है, तो भी वह संक्रमित हो जाता है। एक संक्रमित व्यक्ति बीमारी के लक्षण दिखने से एक दिन पहले और लक्षण शुरू होने के पांच से सात दिन बाद तक दूसरों को संक्रमित कर सकता है।स्वाइन फ्लू का सबसे ज्यादा खतरा किसे होता है? वैसे तो यह बीमारी किसी को भी हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों में इसके गंभीर होने का खतरा बहुत ज्यादा होता है। इनमें पांच साल से कम उम्र के बच्चे और पैंसठ साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग शामिल हैं। गर्भवती महिलाओं के लिए यह वायरस बहुत खतरनाक है, क्योंकि इससे गर्भपात या समय से पहले प्रसव होने का खतरा रहता है। इसके अलावा जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है, जैसे कैंसर, एचआईवी या अंग प्रत्यारोपण वाले मरीज, वे इसके आसानी से शिकार हो सकते हैं। अस्थमा, डायबिटीज, दिल की बीमारी, फेफड़ों की बीमारी और मोटापे से पीड़ित लोगों में भी इस संक्रमण के कारण जानलेवा जटिलताएं पैदा होने की संभावना बहुत अधिक होती है।इस गंभीर बीमारी की पहचान और इलाज कैसे किया जाता है?स्वाइन फ्लू की पहचान करने के लिए डॉक्टर मरीज के लक्षणों की जांच करते हैं और रैपिड फ्लू टेस्ट या स्वैब टेस्ट की सलाह देते हैं। इस टेस्ट में नाक या गले के पिछले हिस्से से स्वैब लेकर प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा जाता है, जिससे वायरस के आरएनए की पहचान की जा सके।इलाज के मामले में, अगर व्यक्ति स्वस्थ है और लक्षण हल्के हैं, तो उसे घर पर ही आराम करने, खूब सारा तरल पदार्थ पीने और हल्का भोजन करने की सलाह दी जाती है। बुखार और दर्द कम करने के लिए सामान्य दवाएं दी जाती हैं। हालांकि, गंभीर मरीजों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है। स्वाइन फ्लू के इलाज के लिए ओसेल्टामिविर (Oseltamivir) और ज़ानामिविर (Zanamivir) जैसी विशेष एंटीवायरल दवाएं दी जाती हैं। ये दवाएं तब सबसे ज्यादा असरदार होती हैं जब इन्हें लक्षण शुरू होने के अड़तालीस घंटे के भीतर लिया जाए। यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह एक वायरल संक्रमण है, इसलिए इसमें एंटीबायोटिक दवाएं काम नहीं करती हैं।स्वाइन फ्लू से बचने के लिए क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए?स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों से बचने का सबसे प्रभावी तरीका बचाव और साफ-सफाई है। सबसे जरूरी कदम हर साल फ्लू का टीका यानी वैक्सीन लगवाना है। यह वैक्सीन स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों के वायरस से सुरक्षा प्रदान करती है और गंभीर बीमारी या अस्पताल में भर्ती होने के खतरे को काफी हद तक कम करती है।इसके साथ ही, अपनी दिनचर्या में अच्छी आदतों को शामिल करना चाहिए। अपने हाथों को दिन में कई बार साबुन और पानी से कम से कम बीस सेकंड तक अच्छी तरह धोएं। अगर साबुन उपलब्ध न हो, तो अल्कोहल वाले हैंड सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करें। खांसते और छींकते समय अपने मुंह और नाक को टिश्यू पेपर या अपनी कोहनी से ढकें, और इस्तेमाल किए गए टिश्यू को तुरंत कूड़ेदान में फेंक दें। अपने चेहरे, खासकर आंखों, नाक और मुंह को बार-बार छूने से बचें।अगर कोई व्यक्ति बीमार है, तो उससे उचित दूरी बनाकर रखें और अगर आप खुद बीमार हैं, तो घर पर ही रहें ताकि दूसरों को संक्रमण न फैले। घर के उन हिस्सों और सतहों को नियमित रूप से साफ करें जिन्हें बार-बार छुआ जाता है। इसके अलावा, एक अच्छी जीवनशैली अपनाएं, जिसमें पौष्टिक आहार, नियमित व्यायाम और भरपूर नींद शामिल हो, ताकि आपके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहे। जागरूकता, सही समय पर डॉक्टरी सलाह और साफ-सफाई ही इस गंभीर बीमारी को हराने का एकमात्र मूलमंत्र है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/25xql4ed 2. https://tinyurl.com/y9h9vh2b 3. https://tinyurl.com/26py8ng4 4. https://tinyurl.com/2d6m5mrk 5. https://tinyurl.com/ydl8gdsh 6. https://tinyurl.com/24nay9jh
धर्म का युग : 600 ई.पू. से 300 ई.
जौनपुर वासियों, पढ़ते हैं शिव पुराण के आख्यान व आधुनिक भौतिकी में मौजूद संबंध के बारे में
जौनपुर वासियों, क्या आप जानते हैं कि शिव पुराण, हिंदू धर्म के संस्कृत ग्रंथों की पुराण-श्रेणी के अठारह महापुराणों में से एक प्रमुख ग्रंथ है। यह शैव साहित्य-परंपरा का एक अभिन्न अंग है। यह मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की लीलाओं एवं महिमाओं को बताता है। साथ ही, इसमें समस्त देवी-देवताओं का आदरपूर्वक उल्लेख एवं वंदन किया गया है।हिंदू साहित्य के अन्य पुराणों की भांति, शिव पुराण भी एक गतिशील ग्रंथ (जीवंत परंपरा) रहा है। इसे एक लंबी समयावधि में नियमित रूप से संपादित, पुनर्गठित एवं परिमार्जित किया गया है। शिव पुराण में यह उल्लेख मिलता है कि मूलतः इसमें बारह संहिताओं (खंडों) के अंतर्गत 1,00,000 श्लोक समाहित थे। हालांकि, इस ग्रंथ में यह भी बात कही गई है कि महर्षि वेदव्यास ने, अपने शिष्य सूत जी को इसका अध्ययन कराने से पूर्व इसे संक्षिप्त कर दिया था। इसकी वर्तमान समय में उपलब्ध पांडुलिपियां कई भिन्न-भिन्न संस्करणों और सामग्रियों में प्राप्त होती हैं। इनमें सात संहिताओं वाला एक प्रमुख संस्करण (जो मुख्यतः दक्षिण भारत में प्रचलित है) और छह संहिताओं वाला दूसरा संस्करण शामिल है। वहीं, मध्यकालीन बंगाल क्षेत्र से प्राप्त तीसरे संस्करण में संहिताएं नहीं हैं, बल्कि, यह दो वृहद खंडों में विभाजित है, जिन्हें 'पूर्व-खंड' (प्रथम भाग) और 'उत्तर-खंड' (उत्तर भाग) कहा जाता है।शिव पुराण की सटीक रचना-तिथि और रचयिता के संबंध में कोई अंतिम ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। चूंकि पांडुलिपियों की रचना-तिथि पर रेडियोकार्बन डेटिंग (Radiocarbon Dating) जैसी तकनीकें पूर्णतः सटीक सिद्ध नहीं होतीं, अतः ग्रंथ काल-निर्धारण हेतु इसके आंतरिक साक्ष्यों और संदर्भों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। एक अनुमान के अनुसार, शिव पुराण के उपलब्ध हस्तलेखों के सबसे प्राचीन अंशों की रचना संभवतः नौवीं से ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में हुई थी। इसके अलावा, वर्तमान में प्राप्त शिव पुराण की पांडुलिपियों के कुछ अध्यायों को तेरहवीं शताब्दी के पश्चात् रचित माना जाता है।शिव पुराण में शिव-केंद्रित सृष्टि-विज्ञान (ब्रह्मांड उत्पत्ति), देवताओं का पारस्परिक संबंध, नीतिशास्त्र, योग, तीर्थ-माहात्म्य, भक्ति-तत्व, नदियों का वर्णन, भूगोल तथा अन्य विविध विषय समाहित हैं। प्रथम सहस्त्राब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध तथा द्वितीय सहस्त्राब्दी के प्रारंभ में, शैव संप्रदायों के विविध स्वरूपों और उनके दार्शनिक सिद्धांतों को समझने के लिए, यह ग्रंथ ऐतिहासिक जानकारी का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसके प्राचीनतम अध्यायों में भक्ति भाव के साथ-साथ, अद्वैत वेदांत दर्शन का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में, ‘वायु पुराण’ को कभी-कभी शिव पुराण का नाम दिया जाता था अथवा इसे शिव पुराण का ही एक भाग माना जाता था। किंतु अधिक पांडुलिपियों की खोज के उपरांत, आधुनिक विद्वान इन दोनों ग्रंथों को पृथक मानते हैं। वायु पुराण को अधिक प्राचीन, अर्थात द्वितीय शताब्दी ईस्वी से पूर्व रचित ग्रंथ स्वीकार किया गया है। कुछ विद्वान शिव पुराण को अठारह महापुराणों की सूची में गिनते हैं, जबकि अन्य विद्वान इसे उपपुराण की श्रेणी में रखते हैं।शिव पुराण में, सृष्टि की कथा और भगवान शिव जी का उद्भव भी वर्णित है। इसके अनुसार, सृष्टि के आरंभ से पूर्व न पृथ्वी थी, न आकाश और न ही कोई देवता। तब केवल सर्वव्यापी अंधकार (तमस) और महाशून्यता विद्यमान थी। उस अनंत शून्य में केवल शाश्वत, निराकार 'ब्रह्म' का अस्तित्व था। परम चेतना और शक्ति से परिपूर्ण ब्रह्म, अपने निर्गुण रूप में स्वयं भगवान शिव ही थे।उस महाशून्य के मध्य से 'ज्योतिर्लिंग' नामक अग्नि और परम प्रकाश का एक अत्यंत तीव्र एवं अनंत स्तंभ प्रकट हुआ। इस स्तंभ का न कोई आदि (प्रारंभ) था और न ही कोई अंत। यह ज्योतिर्लिंग, शिव जी का मूल स्वरूप था, जो शुद्ध, असीम और निराकार ऊर्जा थी। इसी दिव्य प्रकाश से संपूर्ण ब्रह्मांड का आविर्भाव हुआ। इसी ज्योतिर्लिंग से ब्रह्मा और श्री विष्णु का उद्भव हुआ। प्रारंभ में, वे दोनों अपनी उत्पत्ति के स्रोत को लेकर भ्रमित थे और स्वयं को एक-दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने के विवाद में उलझ गए। उनके इस संशय का निवारण करने के लिए, उस ज्योति-स्तंभ से एक दिव्य आकाशवाणी हुई, जिसने ब्रह्मा जी को उस अग्नि-स्तंभ का शीर्ष और विष्णु जी को उसका आधार बताया।तब, विष्णु जी ने वराह रूप धारण किया और वे तल की ओर गहराई में स्तंभ का आधार खोजने लगे। इसके विपरीत, ब्रह्मा जी हंस रूप धारण कर आकाश की ओर ऊपर उड़े। सहस्रों वर्षों की निरंतर खोज के पश्चात् भी, दोनों में से कोई भी उस अनंत स्तंभ का अंत न ढूंढ सके। तब विष्णु जी ने अपनी सीमा स्वीकार की और वे विनम्रतापूर्वक नतमस्तक हो गए। दूसरी तरफ, ब्रह्मा जी ने असत्य का सहारा लेकर, केतकी के पुष्प को झूठी गवाही के लिए तैयार करके, यह दावा किया कि उन्होंने ज्योतिर्लिंग का शीर्ष देख लिया है।तभी उस ज्योतिर्लिंग के मध्य से भगवान शिव साकार रूप में प्रकट हुए, जो रूप उग्र, दिव्य और रुद्र था। उन्होंने विष्णु जी की सत्यनिष्ठा और नम्रता की सराहना की, जबकि असत्य बोलने के दंडस्वरूप, ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि भूलोक में उनकी पूजा हेतु कोई भी मंदिर समर्पित नहीं होगा। केतकी के पुष्प को भी असत्य का भागी बनने के कारण शिव-पूजा से सर्वथा वर्जित कर दिया गया। यह घटना शिव के 'निराकार' (अव्यक्त) से 'साकार' (व्यक्त) रूप में उद्भव की प्रतीक है।तत्पश्चात, शिव जी ने ब्रह्मांडीय दायित्वों का विभाजन किया। उन्होंने विश्व की रचना हेतु ब्रह्मा जी को, उसके पालन-पोषण एवं संरक्षण हेतु विष्णु जी को, और कालचक्र के अंत में संहार हेतु स्वयं को उत्तरदायित्व दिया। इस प्रकार संपूर्ण सृष्टि-चक्र का शुभारंभ हुआ।यदि हम शिव पुराण की कथाओं का सूक्ष्मता से अध्ययन करेंगे, तो पाएंगे कि सापेक्षता का सिद्धांत (Theory of Relativity) और क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) जैसे आधुनिक भौतिकी के गूढ़ सिद्धांत कुछ आख्यानों के माध्यम से, अत्यंत सुंदरता से अभिव्यक्त किए गए हैं। यह हमारी संस्कृति की एक अद्भुत द्वंद्वात्मक शैली रही है, जहां गूढ़ वैज्ञानिक सत्यों को कथाओं का रूप दिया गया और हर तत्व का मानवीकरण (Personification) किया गया।किंतु समय के साथ, समाज ने इसके पीछे छिपे वैज्ञानिक मर्म को भुला दिया और केवल कथाओं को थामे रखा। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन आख्यानों को इतना अतिरंजित और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाने लगा कि वे अपनी मूल तार्किकता खोकर हास्यास्पद प्रतीत होने लगे। यदि हम इन पौराणिक कथाओं में निहित वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पुनः समझें, तो यह गूढ़ विज्ञान को जन-सामान्य तक पहुंचाने का एक अत्यंत सुंदर माध्यम सिद्ध होगा।शिव पुराण मानव चेतना को उसके उच्चतम शिखर तक ले जाने का एक परम विज्ञान है। इसे अत्यंत मनोरम कथाओं के रूप में पिरोया गया है। योगशास्त्र को बिना किसी कथा के साथ, एक विशुद्ध विज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। परंतु यदि आप गहराई से विचार करें, तो योग और शिव पुराण एक ही सत्य के दो पहलू हैं। जिन्हें पृथक नहीं किया जा सकता। एक उन लोगों के लिए है, जो कथाओं के माध्यम से सत्य को समझते हैं, और दूसरा उन लोगों के लिए है, जो विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं। अर्थात, इन दोनों का मूल सिद्धांत एक ही है।आजकल, शिक्षाविद् एवं वैज्ञानिक आधुनिक शिक्षण-पद्धतियों पर गहन शोध कर रहे हैं। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार, ज्ञान प्रदान करने का सरल तरीका यह है कि इसे कथाओं या खेल-खेल के माध्यम से सिखाया जाए। आधुनिक विश्व में इस दिशा में कुछ प्रयास आरंभ हुए हैं, किंतु अधिकांश शिक्षा प्रणाली आज भी अत्यधिक तनावपूर्ण एवं दमनकारी बनी हुई है। जब तक ज्ञान को एक सहज और रोचक माध्यम से न प्रदान किया जाए, तब तक सूचनाओं का भारी बोझ बुद्धिमत्ता को दबा देगा। ऐसी स्थिति में, कहानियों के माध्यम से सिखाना ही सबसे प्रभावी मार्ग है। हमारी भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से यही किया गया था, जैसा कि शिव पुराण के उदाहरण से समझा जा सकता है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/yvtu6ppw 2. https://tinyurl.com/522ca3vs 3. https://tinyurl.com/3h686edj
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
जौनपुर, जानिए अन्य देशों में कैसे मनाए जाते हैं, रक्षाबंधन जैसे खास पर्व
हम जानते हैं कि रक्षाबंधन, जिसे राखी के नाम से भी जाना जाता है, भाई-बहन के पवित्र प्रेम को समर्पित एक विशेष हिंदू त्योहार है। यह भाई और बहन के बीच के अटूट बंधन का उत्सव है, तथा दुनिया भर के अधिकांश भारतीय समुदायों में बहुत उल्लास के साथ मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन, बहनें स्नेह और शुभकामनाओं के प्रतीक के रूप में अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र यानी ‘राखी’ बाँधती हैं और उसकी लंबी उम्र व उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना करती हैं। इसके बदले में, भाई उन्हें सुंदर उपहार देते हैं और जीवनभर उनकी रक्षा करने का दृढ़ वचन देते हैं।इस समारोह का मुख्य आकर्षण वह पल होता है, जब एक बहन अपने भाई की कलाई पर रेशमी धागा, यानी राखी बाँधती है। आजकल, राखी के अधिक विस्तृत और आधुनिक संस्करण सोने या रेशम के जटिल रूप से बुने हुए धागे हो सकते हैं, लेकिन रक्षाबंधन पर भाइयों को दी जाने वाली पारंपरिक राखी रेशम का एक ही धागा होती है। रक्षाबंधन पर विशेष पूजा-अर्चना और प्रार्थनाएँ भी की जाती हैं, क्योंकि पूरा परिवार इस उत्सव में एक साथ शामिल होता है।माना जाता है कि राखी की यह परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन यह 16वीं शताब्दी में विशेष रूप से लोकप्रिय हुई थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रक्षाबंधन की उत्पत्ति उस प्रसंग से मानी जाती है, जब भगवान कृष्ण पतंग उड़ा रहे थे और उनकी उंगली कट गई थी। उस समय, पांडवों की पत्नी द्रौपदी उन्हें घायल देखकर इतनी व्यथित हो गईं कि उन्होंने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी खून बहती उंगली पर बाँध दिया। कृष्ण इस भाव से बहुत द्रवित हुए और हर परिस्थिति में उनकी रक्षा करने का वचन दिया। कृष्ण ने इसे ‘रक्षा सूत्र’ के रूप में स्वीकार किया था। संस्कृत शब्द “रक्षाबंधन” का शाब्दिक अर्थ “सुरक्षा, दायित्व या देखभाल का बंधन” है। यही कारण है कि इतिहास में ऐसी तस्वीरें भी मिलती हैं, जिनमें कुछ महिलाएँ स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति, डॉ. राजेंद्र प्रसाद को “सुरक्षा, दायित्व या देखभाल के बंधन” की उम्मीद में राखी बाँध रही हैं।भाई-बहन एक ऐसा अनूठा बंधन साझा करते हैं, जो संस्कृतियों, धर्मों और भौगोलिक सीमाओं से परे है। इस विशेष रिश्ते को दुनिया भर में विभिन्न त्योहारों के माध्यम से मनाया जाता है, जो भाइयों और बहनों के बीच के प्यार, देखभाल और जुड़ाव को उजागर करते हैं। आइए, ऐसी ही कुछ विदेशी परंपराओं का पता लगाते हैं:1. तिहार (नेपाल): तिहार, जिसे रोशनी के त्योहार के रूप में भी जाना जाता है, नेपाल के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह पाँच दिनों तक चलता है, जिसमें प्रत्येक दिन जीवन और प्रकृति के विभिन्न पहलुओं को समर्पित होता है। तिहार का दूसरा दिन, जिसे ‘भाई टीका’ के नाम से जाना जाता है, भाइयों और बहनों के बीच के बंधन को समर्पित है। बहनें अपने भाइयों के माथे पर “टीका” (तिलक) लगाती हैं तथा उनकी लंबी उम्र और समृद्धि की प्रार्थनाओं के साथ उन्हें आशीर्वाद देती हैं। इसके बदले में भाई उन्हें उपहार देते हैं और रक्षाबंधन की भावना को दर्शाते हुए, अपनी बहनों की रक्षा करने का वादा करते हैं।2. सिबलिंग डे – Sibling Day (संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा): हालांकि अन्य पारंपरिक त्योहारों की तरह इसे बहुत व्यापक रूप से नहीं मनाया जाता है, लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में ‘सिबलिंग डे’ भाई-बहनों के विशेष रिश्ते का सम्मान करने वाले दिन के रूप में तेजी से लोकप्रियता प्राप्त कर रहा है। हर साल 10 अप्रैल को मनाए जाने वाले इस दिन को, लोगों को संदेशों, उपहारों और साझा यादों के माध्यम से अपने भाई-बहनों की सराहना करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। हालांकि यह एक अधिक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष उत्सव है, लेकिन यह भाई-बहन के रिश्तों के सार्वभौमिक मूल्य को खूबसूरती से दर्शाता है।3. चूसेक – Chuseok (दक्षिण कोरिया): दक्षिण कोरिया की सबसे महत्वपूर्ण छुट्टियों में से एक, ‘चूसेक’, परिवारों के लिए एक साथ आने और एक समृद्ध फसल के लिए अपने पूर्वजों को धन्यवाद देने का समय है। हालांकि यह त्योहार आम तौर पर पूरे परिवार पर केंद्रित होता है, लेकिन यह वह समय भी होता है, जब भाई-बहन एक साथ आते हैं। यह अवकाश, भव्य दावतों, पैतृक अनुष्ठानों और पारंपरिक खेलों द्वारा चिह्नित किया जाता है, जो भाई-बहनों को आपस में जुड़ने और अपनी साझा विरासत का जश्न मनाने का बेहतरीन अवसर प्रदान करता है।4. भाई दूज (भारत और नेपाल): रक्षाबंधन के समान ही, भाई दूज भारत और नेपाल का एक अन्य प्रमुख त्योहार है, जो भाइयों और बहनों के बीच के पवित्र बंधन का जश्न मनाता है। यह पाँच दिवसीय दीवाली के त्योहार के ठीक आखिरी दिन पड़ता है।रक्षाबंधन और भाई दूज दोनों ही भाई-बहन के प्रेम को समर्पित हैं, फिर भी इनमें निम्नलिखित अंतर हैं:पंचांग और समय: दोनों त्योहार, एक ही दिन या एक ही महीने में नहीं मनाए जाते। रक्षाबंधन मानसून के मौसम में सावन महीने की पूर्णिमा के दिन, आमतौर पर अगस्त में आता है। दूसरी ओर, भाई दूज कार्तिक के महीने में दीवाली के दो दिन बाद मनाया जाता है। इसलिए, जहाँ रक्षाबंधन में बरसात के दिनों की भीनी-भीनी खुशबू और हरियाली होती है, वहीं भाई दूज तब आता है, जब हवा दीवाली के दीयों की रोशनी और मिठाइयों की खुशबू से भर जाती है।अनुष्ठान की विधि: रक्षाबंधन पर, बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, उसकी खुशी के लिए प्रार्थना करती है, और बदले में उसे उपहार या आशीर्वाद दिया जाता है। इसके विपरीत, भाई दूज पर बहन अपने भाई के माथे पर चंदन या सिंदूर का एक तिलक लगाती है, जो उसकी सुरक्षा और समृद्धि का प्रतिनिधित्व करती है। फिर वह आरती करती है और उसे मिठाइयाँ खिलाती है, जिसके बदले में बहन उसे उपहार देती है।क्षेत्रीय विविधता: भारत की विविधता इन समारोहों में और अधिक रंग भर देती है। रक्षाबंधन देश भर में लगभग हर राज्य में लोकप्रिय है। हालाँकि, भाई दूज के कई क्षेत्रीय नाम हैं। महाराष्ट्र और गोवा में इसे ‘भाऊबीज’ कहा जाता है, तो पश्चिम बंगाल में इसे ‘भाई फोंटा’ के रूप में जाना जाता है।जब हम भाई दूज और रक्षाबंधन के बारे में सोचते हैं, तो दोनों का मूल उद्देश्य भाई-बहन के प्रेम को दर्शाना ही है, भले ही इसे अलग-अलग तरीकों से व्यक्त किया जाता हो। रक्षाबंधन मुख्य रूप से एक रक्षक के रूप में भाई की भूमिका पर ध्यान केंद्रित करता है और बहन की सुरक्षा की कामना को अपनाता है। जबकि भाई दूज अधिक संतुलित प्रतीत होता है। एक बहन के लिए एक विचारशील भाईदूज उपहार, उसे वास्तव में विशेष महसूस करा सकता है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/5bnkjdc5 2. https://tinyurl.com/yw7vc8s7 3. https://tinyurl.com/yca4hcaf
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
राग जौनपुरी के नगर से जानें, बांसुरी की मधुर धुनों ने कैसे विश्व के दिलों में बनाई जगह
जौनपुर सदियों से संगीत, साहित्य और कला की समृद्ध परंपरा का केंद्र रहा है। शर्की सल्तनत के शासनकाल में यह नगर संगीत संरक्षण और नई रचनात्मक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध हुआ। इसी काल में विकसित राग जौनपुरी आज भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रमुख रागों में गिना जाता है। संगीत की यह विरासत हमें दुनिया के अन्य संगीत रूपों को जानने के लिए भी प्रेरित करती है। पश्चिमी संगीत में भी एक अत्यंत मधुर और लोकप्रिय वाद्य है—फ्लूट या बांसुरी।बांसुरी संसार के सबसे प्राचीन वाद्यों में से एक है। इसमें किसी तार या झिल्ली का प्रयोग नहीं होता, बल्कि वायु के कंपन से मधुर ध्वनि उत्पन्न होती है। कलाकार अपनी साँस, उँगलियों की गति और स्वर नियंत्रण के माध्यम से कोमल, शांत या तेज़ गति वाली धुनों को सहजता से प्रस्तुत कर सकता है। यही कारण है कि फ्लूट / बांसुरी पश्चिमी शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, जैज़ और फिल्म संगीत सहित अनेक विधाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।फ्लूट की विविध अभिव्यक्तियों को समझने के लिए कुछ उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ देखी जा सकती हैं। विश्वविख्यात फ्लूट वादक जेम्स गॉलवे (James Galway) की प्रस्तुति इस वाद्य की मधुरता और स्वच्छ स्वर-सौंदर्य का सुंदर उदाहरण है। वहीं इमैनुएल पह्यू (Emmanuel Pahud) अपनी तकनीकी दक्षता और भावपूर्ण प्रस्तुति के माध्यम से आधुनिक पश्चिमी फ्लूट वादन की उत्कृष्ट झलक प्रस्तुत करते हैं। भारतीय संदर्भ में पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की जॉन मैकलॉफलिन, जान गारबारेक और उस्ताद ज़ाकिर हुसैन के साथ की गई फ़्यूज़न प्रस्तुति यह दर्शाती है कि भारतीय बाँसुरी और पश्चिमी संगीत परंपराएँ मिलकर कितनी सुंदर संगीत यात्रा रच सकती हैं।आज फ्लूट केवल किसी एक देश या संगीत परंपरा का वाद्य नहीं रह गया है। पश्चिमी कॉन्सर्ट फ्लूट और भारतीय बाँसुरी, दोनों ने अपनी-अपनी विशिष्ट पहचान के साथ विश्व संगीत को समृद्ध बनाया है। यदि आप इस वाद्य की मधुरता, तकनीकी क्षमता और भावपूर्ण अभिव्यक्ति का अनुभव करना चाहते हैं, तो ये प्रस्तुतियाँ फ्लूट की वैश्विक लोकप्रियता और इसकी संगीत यात्रा का उत्कृष्ट परिचय देती हैं।संदर्भ:https://tinyurl.com/4e2f7sfp https://tinyurl.com/2zwfx6t3 https://tinyurl.com/mu57rtm3 https://tinyurl.com/24jtc4cy https://tinyurl.com/yc3mywbr https://tinyurl.com/2rv2svaz
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
25-10-2026 09:55 AM • Jaunpur District-Hindi
जौनपुर, आज अनुभव कीजिए, ब्लूज़ संगीत में भावनात्मक अभिव्यक्ति को
जौनपुर अपनी ऐतिहासिक इमारतों, शर्की स्थापत्य और गंगा-जमुनी सांस्कृतिक परिवेश के लिए जाना जाता है। किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों और इतिहास से नहीं, बल्कि उन भावनाओं और अनुभवों से भी बनती है जिन्हें कला के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। संगीत की दुनिया में ब्लूज़ इसी मानवीय अनुभव को स्वर देने वाली एक प्रभावशाली विधा है।
ब्लूज़ में गिटार (Guitar), पियानो, बेस और ड्रम जैसे वाद्ययंत्र मिलकर एक विशिष्ट ध्वनि रचते हैं। इसकी लय अक्सर सहज और दोहरावपूर्ण होती है, लेकिन कलाकार अपनी गायकी और वाद्य प्रस्तुति में छोटे-छोटे बदलावों से इसे जीवंत बनाता है।
ब्लूज़ संगीत में गिटार का विशेष महत्त्व है, क्योंकि इसकी ध्वनि इस विधा की भावनात्मक गहराई और विशिष्ट पहचान को व्यक्त करने में अहम भूमिका निभाती है। गिटार की स्लाइड (Sliding) तकनीक, बेंडिंग (Bending) और विशिष्ट रिफ़्स (Riffs) के माध्यम से कलाकार उदासी, दर्द, संघर्ष और उम्मीद जैसी भावनाओं को सुरों में ढालते हैं। ब्लूज़ में गिटार केवल धुन बजाने का साधन नहीं है, बल्कि यह गायकी के साथ संवाद करते हुए संगीत को एक जीवंत अनुभव बनाता है। रॉबर्ट जॉनसन (Robert Johnson) और बी.बी. किंग (B.B. King) जैसे दिग्गज कलाकारों ने अपने अनूठे गिटार वादन से इस संगीत शैली को लोकप्रिय बनाने और इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी प्रस्तुतियाँ दर्शाती हैं कि कुछ सरल सुर भी किस तरह गहरी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं।
इस संगीत की ख़ासियत यह भी है कि एक ही धुन कभी उदासी, कभी दृढ़ता और कभी उम्मीद का एहसास करा सकती है। रॉबर्ट जॉनसन (Robert Johnson) और जॉन ली हूकर (John Lee Hooker) जैसे कलाकारों ने ब्लूज़ की अलग-अलग शैलियों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विश्व संगीत की इस विधा को जानना संगीत की विविधता को समझने का एक नया अवसर है। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से ब्लूज़ की लय और उसकी भावनात्मक शक्ति का अनुभव करें।
आज जानिए, महिषासुर व माँ दुर्गा के 9 दिवसीय युद्ध से जुड़ी नवरात्रि-विजयादशमी पर्व की कथा
हम अभी बड़े हर्ष और उल्लास के साथ नवरात्रि मना रहे हैं। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि साल के अलग-अलग चरणों में, नवरात्रि के त्योहार चार बार मनाए जाते हैं। हालाँकि, इनमें से शुरुआती शरद ऋतु में आने वाली ‘शरद नवरात्रि’ सबसे महत्वपूर्ण है, जो हिंदू पंचांग के आश्विन मास (मुख्य रूप से सितंबर-अक्टूबर) में होती है। इस उत्सव के दौरान पूजे जाने वाले शक्ति के स्वरूपों में क्रमशः दुर्गा, भद्रकाली, अंबा, अन्नपूर्णा देवी, सर्वमंगला, भैरवी, चंडिका, ललिता, भवानी और मूकंबिका शामिल हैं।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में नवरात्रि अलग-अलग तरीकों से मनाई जाती है। कई लोगों के लिए यह धार्मिक चिंतन और उपवास का समय होता है। वहीं अन्य लोगों के लिए, यह नृत्य और उत्सव का समय होता है। गुजरात में मनाई जाने वाली शरद नवरात्रि को पूरे देश में, इसके सबसे जीवंत और भव्य उत्सवों में से एक माना जाता है, जहाँ गरबा नृत्य प्रसिद्ध है।
यह त्योहार अच्छाई की जीत का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह आदि शक्ति के सम्मान में मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्योहार है। दरअसल, राक्षस महिषासुर ने अग्नि देव से अमर होने का वरदान प्राप्त किया था। इस वरदान के अनुसार, महिषासुर को किसी भी हथियार से मारा या घायल नहीं किया जा सकता था। परिणामस्वरूप, वह इतना शक्तिशाली हो गया कि उसने लोगों के मन में आतंक पैदा कर दिया और हर तरफ विनाश फैला दिया। राक्षस महिषासुर के इस आतंक को समाप्त करने के लिए सभी देवता समाधान पाने हेतु भगवान शिव के पास गए। तब भगवान शिव ने अन्य देवताओं की शक्तियों के साथ मिलकर देवी आद्य शक्ति की रचना की। भगवान शिव सहित सभी देवी-देवताओं ने महिषासुर से मुकाबला करने के लिए उन्हें आभूषण, अस्त्र-शस्त्र और सवारी के रूप में एक सिंह भी प्रदान किया। देवी आद्य शक्ति ने महिषासुर से लगातार नौ दिन और नौ रात तक युद्ध किया। दसवें दिन, उन्होंने महिषासुर का वध कर दिया। इन नौ रातों को ‘नवरात्रि’ के रूप में जाना गया, जबकि दसवें दिन को ‘विजयादशमी’ कहा गया।
‘रात्रि’ शब्द का अर्थ, ‘आपको गहरा विश्राम या तीन प्रकार के तापों (कष्टों) से राहत दिलाने वाली चीज या तत्व है। जबकि ‘ताप’ का अर्थ, ‘तीन प्रकार की अग्नियाँ या तीन परेशानियाँ’ है। ये तीन प्रकार की परेशानियाँ निम्नलिखित हैं:
1. भौतिक – सांसारिक परेशानियाँ,
2. दैविक – ब्रह्मांडीय शक्तियों या देवताओं के स्तर पर होने वाली परेशानियाँ, और
3. आत्मा की परेशानियाँ।
‘नवरात्रि’ ऐसा गहरा विश्राम प्रदान करती है, जो आपको इन तीनों परेशानियों से मुक्त कर सकता है। इसलिए, यह प्रार्थना और कायाकल्प (ऊर्जावान होने) का समय है। नवरात्रि के दौरान, आपका मन दिव्य चेतना में डूबा रहना चाहिए। एक बच्चे के जन्म में नौ महीने लगते हैं। इसलिए, ये नौ दिन माँ के गर्भ से एक बार फिर बाहर आने और एक नया जन्म लेने जैसे हैं। इन नौ दिनों और रातों के दौरान, व्यक्ति को अंतर्मुखी होना चाहिए और अपने मूल (स्रोत) को याद करना चाहिए। इस समय हमें खुद से “मेरा जन्म कैसे हुआ?”, “मेरा स्रोत क्या है?” जैसे कुछ सवाल भी पूछने चाहिए। इस प्रकार, हमें अपनी चेतना पर विचार करना चाहिए।
नवरात्रि के पहले तीन दिन, तमोगुण या जड़ता को समर्पित हैं। अगले तीन दिन रजोगुण या बेचैनी और सक्रियता को समर्पित हैं, जबकि अंतिम तीन दिन सत्व गुण या पवित्रता और उच्च प्राण को समर्पित हैं। सत्व, रज और तम गुण हम सभी में मौजूद हैं। इसके अलावा, इन सभी गुणों पर विजय पाना, स्वयं पर स्थिर रहना और जीवन का जश्न मनाने वाले अंतिम दिन को ‘विजयादशमी’ या ‘विजय दिवस’ कहा जाता है। वास्तव में, नवरात्रि के प्रत्येक दिन का अपना विशेष महत्व है और हर दिन से एक रंग जुड़ा हुआ है।
• पहला दिन पर्वतराज की पुत्री माँ शैलपुत्री को समर्पित है। उन्हें भगवान शिव की पत्नी - माता पार्वती का अवतार भी माना जाता है। प्रतिपदा यानी पहले दिन का रंग पीला है। नवरात्रि में पीले रंग का महत्व यह है कि यह धूप और उत्सव के दिनों की शुरुआत में महसूस होने वाली खुशी की भावना का जश्न मनाता है। लोग माँ शैलपुत्री को चमेली के फूल भी अर्पित करते हैं, क्योंकि यह उनका प्रिय फूल माना जाता है।
• दूसरा दिन माँ ब्रह्मचारिणी को समर्पित है, जिन्हें दुर्गा का दूसरा अवतार कहा जाता है। कहा जाता है कि यह दुर्गा का वह रूप है, जो आपको मोक्ष या मुक्ति दिला सकता है। इस दिन लोग हरा रंग पहनते हैं, क्योंकि यह एक नई शुरुआत के साथ-साथ विकास का प्रतीक है। लोगों का मानना है कि यदि वे इस दिन हरा रंग पहनें, तो यह उनके जीवन में भी ऊर्जा और प्रगति लेकर आएगा।
• तीसरा दिन माँ चंद्रघंटा को समर्पित है, जिन्हें जीवन में शांति, समृद्धि और सुकून लाने वाली देवी कहा जाता है। इस दिन का रंग स्लेटी (ग्रे) है। यह सभी बुराइयों को समाप्त करने के दृढ़ संकल्प और हिम्मत का प्रतीक है।
• चौथा दिन माँ कूष्मांडा को समर्पित है, जो ब्रह्मांड की रचयिता हैं। उन्हें मुस्कुराने वाली देवी भी माना जाता है। चूँकि नारंगी रंग सबसे खुशनुमा रंगों में से एक है, इसलिए यह इस दिन का रंग है। यह जीवंतता और ज्ञान का प्रतीक है।
• पाँचवा दिन माँ स्कंदमाता को समर्पित है, जो एक माता की शक्ति और कोमलता दोनों को दर्शाती हैं। लोग सफेद रंग पहनकर उनकी पवित्रता और शांति का जश्न मनाते हैं।
• छठे दिन माँ कात्यायनी की पूजा की जाती है। वे प्रसिद्ध ऋषि कात्या के यहाँ जन्मी थीं और अपने साहस के लिए जानी जाती थीं। इस दिन भक्त लाल रंग पहनकर, उनकी सुंदरता और वीरता का जश्न मनाते हैं।
• सातवें दिन, दुर्गा जी के सबसे भयंकर रूप की पूजा की जाती है, जिन्हें कालरात्रि कहा जाता है। दुर्गा के इस रूप को अक्सर गहरे नीले रंग की त्वचा के साथ दर्शाया जाता है। यही कारण है कि नीला इस दिन का रंग है। नीला रंग उनकी उस असीम शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक है, जो वास्तव में दिव्य है।
• आठवें दिन, महागौरी जी की उनके बुद्धिमान और शांत स्वभाव के लिए पूजा की जाती है। उन्हें प्रसन्नता की देवी माना जाता है और उनके दिन को समर्पित रंग मयूर हरा (पीकॉक ग्रीन) है। नवरात्रि में इस हरे रंग का महत्व यह है कि यह सामंजस्य और आनंद की भावना का प्रतीक है।
• अंतिम और नौवें दिन, देवी सिद्धिदात्री की कायाकल्प करने वाली और उपचार करने वाली शक्तियों की पूजा की जाती है। उनके लिए गुलाबी रंग चुना गया है। गुलाबी रंग आशा और आत्म-परिमार्जन की भावना को दर्शाता है।
साल की चार नवरात्रियों में से, शरद ऋतु की नवरात्रि के अलावा, एक अन्य नवरात्रि भी उसी आस्था से मनाई जाती है। नवरात्रि केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है। यह ब्रह्मांडीय चक्रों, मौसमी बदलावों और आंतरिक मनोवैज्ञानिक बदलावों के साथ तालमेल बिठाने वाला एक सावधानीपूर्वक निर्धारित आध्यात्मिक अनुष्ठान है। हिंदू परंपरा में दो मुख्य नवरात्रियों को मनाया जाता है: चैत्र नवरात्रि, जो वसंत ऋतु में मनाई जाती है, और शरद नवरात्रि, जो शरद ऋतु में मनाई जाती है। ये सौर वर्ष के दो ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ों पर आती हैं, जब प्रकृति स्वयं एक दृश्य परिवर्तन से गुजरती है।
वसंत ऋतु नवीनीकरण, उद्भव और संभावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। दूसरी ओर, शरद ऋतु परिपक्वता, फसल कटाई और विश्राम की तैयारी का प्रतीक है। मानव मनोविज्ञान भी इन मौसमी बदलावों को उससे कहीं अधिक गहराई से दर्शाता है, जितना अधिकांश लोग समझते हैं। दोनों नवरात्रियाँ ‘संधि काल’ के रूप में जानी जाने वाली अवधि के दौरान आती हैं, जो कि ऋतुओं के बीच का संक्रांति काल होता है। हिंदू विचार में, संक्रांति की इन अवधियों को ऊर्जा के दृष्टिकोण से बहुत संवेदनशील माना जाता है।
ऐसे समय में, शरीर, मन और पर्यावरण असंतुलन के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। नवरात्रि के दौरान किए जाने वाले अनुष्ठान, उपवास और अनुशासित साधना संतुलन बनाए रखने वाले अभ्यासों के रूप में कार्य करती हैं। अति का जश्न मनाने के बजाय, नवरात्रि संयम, सादगी और संतुलन पर जोर देती है, जो बदलाव के समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण गुण हैं।
जिस प्रकार प्रकृति में बदलाव होते हैं, मनुष्य भी आंतरिक चक्रों से गुजरता है। साल भर हमारे भावनात्मक पैटर्न, प्रेरणा का स्तर और मानसिक स्पष्टता में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। नवरात्रि को दो बार मनाकर, हिंदू परंपरा आत्म-नियमितीकरण के लिए दो संरचित अवसर प्रदान करती है - एक विकास की शुरुआत करने के लिए, और दूसरा उसे सुदृढ़ करने के लिए।
चैत्र नवरात्रि संकल्प लेने और नवीनीकरण को बढ़ावा देती है। जबकि शरद नवरात्रि आत्मनिरीक्षण और खुद को जड़ों से जोड़े रखने (ग्राउंडिंग) के लिए प्रेरित करती है। परिवर्तन के लिए, प्रयास और विश्राम दोनों की आवश्यकता होती है। अतः नवरात्रि, साधक पर अत्यधिक बोझ डाले बिना अनुशासन की केंद्रित अवधि प्रदान करती है।
वसंत और शरद ऋतु वे बिंदु हैं, जहाँ गर्मी और सर्दी के बीच का संतुलन काफी हद तक बदल जाता है। ये बदलाव न केवल पर्यावरण को प्रभावित करते हैं बल्कि पाचन, रोग प्रतिरोधक क्षमता, भावनात्मक स्थिरता और मानसिक स्पष्टता को भी प्रभावित करते हैं। प्राचीन ऋषियों ने देखा था कि इन चरणों के दौरान अनुशासित आध्यात्मिक अभ्यास से अधिक गहरे परिणाम मिलते हैं। इस प्रकार, दो नवरात्रियों पर जोर देना चुनिंदा परंपरा नहीं, बल्कि गहरे अवलोकन पर आधारित व्यावहारिकता को दर्शाता है।
अमेरिका या कनाडा कहां पढ़ाई के बाद आसानी से मिलेगी पक्की नौकरी?
भारतीय छात्रों के लिए विदेश में पढ़ाई करना अब केवल एक विदेशी डिग्री हासिल करने तक सीमित नहीं रह गया है। यह एक बेहतर करियर, अंतरराष्ट्रीय जीवन शैली और कई मामलों में दीर्घकालिक रूप से वहां बसने की नींव रखने का एक जरिया बन चुका है। कुछ साल पहले तक छात्रों का मानना था कि विदेशी शिक्षा एक छोटा सा पड़ाव है और उसके बाद वे स्वदेश लौट आएंगे। लेकिन आज का सच यह है कि ज्यादातर छात्र पढ़ाई के बाद उसी देश में काम करने, अंतरराष्ट्रीय अनुभव प्राप्त करने और अंततः वहीं अपना घर बसाने का सपना देखते हैं। इस पूरे सफर में सबसे अहम भूमिका विभिन्न प्रकार के वीजा नियमों की होती है।
अध्ययन, रोजगार और स्थायी निवास के बीच का यह सफर बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि आपने किस देश का चुनाव किया है। हर देश के अपने नियम, रोजगार की मांग और आव्रजन नीतियां होती हैं। कुछ देश पढ़ाई के बाद एक लंबा समय देते हैं ताकि छात्र नौकरी ढूंढ सकें, जबकि कुछ देशों ने अपने नियमों को बहुत सख्त कर दिया है।
विदेश में पढ़ाई के बाद छात्रों के लिए रोजगार क्यों महत्वपूर्ण है? विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करना किसी भी छात्र और उसके परिवार के लिए एक बहुत बड़ा आर्थिक और भावनात्मक निवेश है। आप अपना घर और अपनी सुविधा का दायरा छोड़कर वर्षों तक एक नए माहौल में मेहनत करते हैं। ऐसे में पढ़ाई के बाद उस देश में काम करने का अवसर मिलना कई मायनों में जरूरी हो जाता है। पढ़ाई के बाद काम करने से छात्रों को बहुमूल्य वैश्विक कार्य अनुभव मिलता है। सिर्फ डिग्री होना काफी नहीं है, बल्कि नियोक्ताओं को यह दिखाना भी जरूरी है कि आप एक बहुसांस्कृतिक माहौल में काम कर सकते हैं।
वित्तीय नजरिए से देखें तो ट्यूशन फीस, रहने का खर्च और यात्रा में भारी रकम खर्च होती है। पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा के जरिए छात्र अपनी शिक्षा पर किए गए निवेश की भरपाई कर सकते हैं। कई छात्र नौकरी लगने के कुछ ही वर्षों के भीतर अपना एजुकेशन लोन चुकाने में सक्षम हो जाते हैं। इसके अलावा, कई छात्रों के लिए यह स्थायी निवास यानी पीआर की दिशा में पहला कदम होता है। विदेशी सरकारें भी ऐसे कुशल प्रवासियों को प्राथमिकता देती हैं जिनके पास स्थानीय शिक्षा और कार्य का अनुभव हो।
अमेरिका में नौकरी और वीजा के क्या नियम हैं? अमेरिका हमेशा से ही भारतीय छात्रों, खासकर विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में रुचि रखने वालों की पहली पसंद रहा है। पहली नजर में ऐसा लगता है कि अमेरिका में छात्रों के लिए नियम नहीं बदले हैं। ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय छात्रों को पढ़ाई के बाद बारह महीने की ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (Optional Practical Training) मिलती है। अगर छात्र मान्यता प्राप्त स्टेम कोर्स से पास आउट हैं, तो वे इसे चौबीस महीने और बढ़ा सकते हैं। इसका मतलब है कि स्टेम छात्रों को कुल छ्त्तीस महीने तक काम करने का मौका मिल सकता है।
लेकिन असली चुनौती समय की नहीं, बल्कि वर्क वीजा में बदलाव की है। अमेरिका में लंबे समय तक रुकने का रास्ता एच-वनबी वीजा से होकर जाता है। इसका सालाना कोटा सिर्फ 65,000 है और 20,000 अतिरिक्त वीजा अमेरिकी मास्टर डिग्री धारकों के लिए होते हैं। आवेदनों की संख्या इस कोटे से कई गुना ज्यादा होती है। नियोक्ता भी इस असंतुलन से वाकिफ हैं, इसलिए वे ऐसे उम्मीदवारों पर पैसा और समय खर्च करने से कतराते हैं जिन्हें काम सीखने में लंबा वक्त लगता हो। अमेरिका अब उन छात्रों को ज्यादा अवसर देता है जो पढ़ाई के दौरान ही इंटर्नशिप कर लेते हैं और अपने करियर को लेकर स्पष्ट होते हैं।
बदलते भू-राजनीतिक हालात और अमेरिकी आव्रजन नीतियों में लगातार हो रहे बदलावों, जैसे अक्टूबर 2026 में इन्फोसिस सहित आठ तकनीकी कंपनियों की ग्रीन कार्ड प्रायोजन प्रक्रिया (PERM) पर रोक, को देखते हुए छात्रों को विदेश में पढ़ाई और रोजगार की योजना बनाते समय नवीनतम वीजा नियमों पर भी नजर रखनी चाहिए।
ब्रिटेन में पढ़ाई के बाद रुकने के नियमों में क्या बदलाव हुए हैं? ब्रिटेन ने हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अपनी नीतियां फिर से आकर्षक बनाई हैं, लेकिन यहां भी समय सीमा को लेकर बदलाव हुए हैं। ब्रिटेन का ग्रेजुएट रूट वीजा छात्रों को पढ़ाई के बाद रुकने का मौका देता है। यदि आप इकतीस दिसंबर दो हजार छब्बीस तक आवेदन करते हैं, तो आपको पढ़ाई के बाद दो साल का वर्क वीजा मिलेगा। लेकिन एक जनवरी दो हजार सत्ताईस से आवेदन करने वालों को सिर्फ अठारह महीने का समय मिलेगा। हालांकि पीएचडी करने वाले छात्रों के लिए यह अवधि तीन साल ही रहेगी।
कागजों पर यह अंतर सिर्फ छह महीने का लगता है, लेकिन असल जिंदगी में शुरुआती नौकरियां हमेशा सही नहीं होतीं। छात्र इस समय का इस्तेमाल अपनी नौकरी बदलने, बेहतर वेतन पाने और प्रायोजन के स्तर तक पहुंचने में करते हैं। स्किल्ड वर्कर वीजा के लिए न्यूनतम वेतन सीमा अब अड़तीस हजार सात सौ पाउंड कर दी गई है। समय कम होने के कारण छात्रों पर जल्द से जल्द सही नौकरी और नियोक्ता ढूंढने का भारी दबाव रहता है।
कनाडा को छात्रों के लिए कितना अनुकूल माना जाता है? कनाडा को छात्रों के बीच सबसे सुरक्षित और अनुमानित देश माना जाता है क्योंकि यह पोस्ट-ग्रेजुएशन वर्क परमिट के तहत तीन साल तक रुकने का मौका देता है। लेकिन नवंबर दो हजार चौबीस के बाद से कनाडा के नियमों में बड़ा बदलाव आया है। अब वर्क परमिट की योग्यता को सीधे तौर पर आपकी पढ़ाई के विषय से जोड़ दिया गया है।
अब केवल उन्हीं छात्रों को आसानी से परमिट मिल रहा है जिनके कोर्स कनाडा के श्रम बाजार की जरूरतों से मेल खाते हैं। सरकार ने इसके लिए नौ सौ से अधिक मांग वाले क्षेत्रों की एक सूची तैयार की है। स्वास्थ्य सेवा, तकनीक, इंजीनियरिंग और कुशल व्यापार जैसे क्षेत्रों में पढ़े छात्रों के लिए कनाडा अब भी बेहतरीन है। इसके अलावा, पोस्ट-स्टडी स्तर पर अब अंग्रेजी या फ्रेंच भाषा की परीक्षा पास करने का प्रमाण भी अनिवार्य कर दिया गया है।
ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में छात्रों के लिए क्या चुनौतियां हैं? ऑस्ट्रेलिया का पोस्ट-स्टडी ढांचा अब ज्यादा स्पष्ट लेकिन कम लचीला हो गया है। वहाँ टेंपरेरी ग्रेजुएट वीजा के लिए आवेदन करते समय सामान्य आयु सीमा अब पैंतीस वर्ष कर दी गई है। हालांकि रिसर्च मास्टर्स और पीएचडी स्नातकों के लिए यह सीमा पचास वर्ष है। इसके साथ ही अंग्रेजी भाषा की योग्यता भी कड़ी कर दी गई है और अब छात्रों को आईईएलटीएस में कम से कम छह दशमलव पांच बैंड लाने होते हैं। बैचलर और मास्टर्स के छात्रों को दो साल और पीएचडी वालों को तीन साल तक रुकने की अनुमति है। क्षेत्रीय इलाकों में पढ़ाई करने से अतिरिक्त समय और पीआर के लिए अधिक अंक मिल सकते हैं।
वहीं, न्यूजीलैंड में पढ़ाई के स्तर के आधार पर तीन साल तक का पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा मिलता है। न्यूजीलैंड की नीतियां स्थिर हैं, लेकिन वहां नौकरी का बाजार ब्रिटेन, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया की तुलना में बहुत छोटा है। कम नियोक्ताओं और सीमित अवसरों के कारण छात्रों को रोजगार खोजने में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।
यूरोप के देशों में रोजगार की क्या संभावनाएं हैं? यूरोप की बात करें तो जर्मनी आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरता है, जहां उच्च शिक्षा सस्ती या मुफ्त है। पढ़ाई के बाद जर्मनी छात्रों को नौकरी ढूंढने के लिए अठारह महीने का समय देता है। इस दौरान वे काम भी कर सकते हैं। लेकिन जर्मनी में सफलता वीजा से नहीं, बल्कि भाषा से तय होती है। नियोक्ताओं की अपेक्षा होती है कि उम्मीदवार को बी-वन या बी-टू स्तर की जर्मन भाषा आती हो।
फ्रांस में यह अवधि छोटी लेकिन स्पष्ट है। भारतीय छात्रों को नौकरी खोजने या अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए चौबीस महीने तक का समय मिल सकता है। यहां वर्क वीजा में बदलने के लिए वेतन सीमा न्यूनतम मजदूरी का लगभग डेढ़ सौ प्रतिशत होनी चाहिए। दूसरी ओर, संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई में पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा का कोई सीधा नियम नहीं है। वहाँ सब कुछ नियोक्ताओं पर निर्भर करता है। आपको साठ, नब्बे या एक सौ बीस दिन का जॉबसीकर वीजा मिलता है और उसके बाद नियोक्ता ही आपका वर्क वीजा प्रायोजित करता है।
नियमों के साथ रोजगार बाजार को समझना क्यों जरूरी है? सिर्फ वीजा नियम जान लेना ही काफी नहीं है, छात्रों को उस देश के श्रम बाजार को भी समझना होगा। हर देश की अपनी आर्थिक स्थिति और उद्योग की जरूरतें होती हैं। छात्रों को ऐसे क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए जो उनके अध्ययन से जुड़े हों और जहां कुशल पेशेवरों की भारी मांग हो।
नेटवर्किंग भी नौकरी पाने का एक अहम हिस्सा है। करियर मेले, उद्योग कार्यक्रमों और पूर्व छात्रों की सभाओं में जाने से नौकरी के अच्छे अवसर मिल सकते हैं। इसके अलावा, अपना रेज्यूमे उस देश के मानकों के अनुसार तैयार करना बहुत जरूरी है। कई बार अंतरराष्ट्रीय छात्रों को ऐसे नियोक्ताओं की जरूरत होती है जो उनके वर्क वीजा को प्रायोजित कर सकें। अगर कोई वर्क वीजा नहीं मिल पाता है, तो छात्रों को उद्यमशीलता, फ्रीलांस वर्क या आगे की शिक्षा जैसे विकल्पों के बारे में भी विचार करना चाहिए। बदलते आव्रजन नियमों के बीच छात्रों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे इमिग्रेशन वकीलों या सलाहकारों से सही पेशेवर मार्गदर्शन लेते रहें।
निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि आज के दौर में विदेशों में बसने और नौकरी पाने का जो बफर टाइम पहले मिलता था, वह अब सिकुड़ रहा है। विदेशी सरकारें अब उन छात्रों को प्राथमिकता दे रही हैं जो श्रम बाजार की जरूरतों के हिसाब से पढ़ाई कर रहे हैं और जो जल्द से जल्द कुशल पदों को संभाल सकते हैं। इसलिए, विदेश जाने की योजना बना रहे छात्रों को पहले दिन से ही अपने लक्ष्यों के प्रति स्पष्ट रहना होगा।
ज़मीन के नीचे कैसे बातें करते हैं जंगल के शांत पेड़?
जंगल ऊपर से जितने शांत और स्थिर दिखते हैं, ज़मीन के नीचे उनकी दुनिया उतनी ही रहस्यमयी और जीवंत होती है। एक स्वस्थ जंगल हर साल कई टन मृत लकड़ी, पत्तियां और जैविक कचरा उत्पन्न करता है। फिर भी, जंगल की ज़मीन कभी भी कचरे के ढेर में नहीं दबती। इसका कारण ज़मीन के नीचे काम करने वाले सूक्ष्मजीवों, मुख्य रूप से कवक और बैक्टीरिया का एक विशाल नेटवर्क है। जौनपुर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में मौजूद वृक्षों के पारिस्थितिकी तंत्र को समझने के लिए, हमें ज़मीन के नीचे मौजूद इस जैविक इंजन को समझना होगा। मृत कार्बनिक पदार्थों का अपघटन वन पारिस्थितिकी तंत्र में कार्बन और नाइट्रोजन चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
वन पारिस्थितिकी तंत्र में गिरे हुए पत्तों और मृत लकड़ियों का क्या होता है? जंगलों में मृत कार्बनिक पदार्थों में मोटे और महीन मृत लकड़ी और गिरे हुए पत्ते शामिल होते हैं। गिरे हुए पत्तों का कचरा वार्षिक पौधे के कचरे का 22 से 81 प्रतिशत तक हो सकता है। ठंडे और गर्म समशीतोष्ण वनों में पर्णपाती पेड़ों द्वारा हर साल 3 से 5 टन प्रति हेक्टेयर पत्तों का कचरा उत्पन्न होता है। यह कचरा मिट्टी के कटाव को रोकता है, बारिश की बूंदों से मिट्टी को बचाता है और सूक्ष्म जलवायु में होने वाले उतार-चढ़ाव से सुरक्षा प्रदान करता है।
कवक और बैक्टीरिया इस कचरे के मुख्य अपघटक हैं। कवक अपने विशिष्ट एंजाइमों (enzyme) और हाइफे (hyphae) के माध्यम से नए सबस्ट्रेट्स तक पहुंचने की क्षमता के कारण अपघटन में सबसे बड़ा योगदान देते हैं। अपघटन की यह प्रक्रिया वैश्विक स्तर पर हर साल 60 टेराग्राम कार्बन (60 Tg C) छोड़ती है, जो जीवाश्म ईंधन के जलने से निकलने वाले कार्बन से 11 गुना अधिक है। मृत लकड़ी भी वन मिट्टी के लिए पोषक तत्वों का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जो गिरे हुए पत्तों में नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P), पोटेशियम (K) और कैल्शियम (Ca) के वार्षिक इनपुट का 1 से 18 प्रतिशत योगदान देती है।
गिरे हुए पत्तों के भीतर मौजूद कार्बन कोशिका भित्ति के क्षरण के माध्यम से बाहर निकलता है। कोशिका भित्ति के घटकों को उनकी कठोरता के आधार पर तीन समूहों में बांटा जा सकता है: पानी में घुलनशील अणु, हेमीसेल्यूलोज (hemicellulose) व सेल्यूलोज (cellulose), और लिग्निन (lignin) व अन्य सुगंधित यौगिक। पानी में घुलनशील छोटे अणु जैसे अमीनो एसिड और शर्करा आसानी से सुलभ होते हैं और तेजी से बढ़ने वाले सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटित कर दिए जाते हैं। अतीत में बैक्टीरिया की भूमिका को अक्सर नजरअंदाज किया गया था, क्योंकि यह माना जाता था कि वे लकड़ी के पॉलिमर को नष्ट करने में सीमित क्षमता रखते हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में यह सिद्ध हुआ है कि बैक्टीरिया भी लिग्निन को विघटित करने में सक्षम हैं। कचरे में नाइट्रोजन की मात्रा अपघटकों द्वारा अपने चयापचय (metabolic) आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बाहरी नाइट्रोजन के अवशोषण से भी प्रभावित होती है।
जंगल के पेड़ ज़मीन के नीचे फंगल माइसीलियम के ज़रिए कैसे संवाद करते हैं? पेड़ केवल निष्क्रिय पौधे नहीं हैं, बल्कि वे कवक के एक भूमिगत नेटवर्क के माध्यम से संवाद करते हैं, जिसे माइकोराइजल नेटवर्क (Mycorrhizal networks) कहा जाता है। इन जटिल प्रणालियों में माइसीलियम (Mycelium) नामक छोटे धागे होते हैं जो पेड़ों की जड़ों के साथ जुड़ जाते हैं। यह कवक नेटवर्क एक सूचना राजमार्ग के रूप में कार्य करता है, जो पेड़ों को संसाधनों और महत्वपूर्ण सूचनाओं को साझा करने की अनुमति देता है। इस अद्भुत संचार नेटवर्क को उचित ही "वुड-वाइड वेब" (wood-wide web) का नाम दिया गया है।
अपघटक कवक गिरे हुए पत्तों, शाखाओं और यहां तक कि पूरे पेड़ के तनों को तोड़कर पोषक तत्वों को वापस मिट्टी में छोड़ते हैं। पेड़ों और कवक ने एक असाधारण विनिमय प्रणाली विकसित की है। पेड़ प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) के माध्यम से उत्पन्न होने वाली शर्करा (sugars) का 20 प्रतिशत तक अपने फंगल भागीदारों के साथ साझा करते हैं। बदले में, कवक अपने धागों को मिट्टी में फैलाते हैं, जिससे वे मिट्टी के उस आयतन (volume) का पता लगा सकते हैं जो पेड़ों की जड़ों की तुलना में सैकड़ों गुना बड़ा होता है। ये कवक फास्फोरस और नाइट्रोजन जैसे आवश्यक पोषक तत्व निकालकर पेड़ों को देते हैं।
जब किसी पेड़ को किसी बीमारी या शिकारी जीव से खतरा होता है, तो वह माइकोराइजल नेटवर्क या हवा के माध्यम से रासायनिक संकेत (chemical signals) छोड़ सकता है। उदाहरण के लिए, जब एक जिराफ अकैसिया (Acacia) के पत्तों को खाना शुरू करता है, तो पेड़ चोट का पता लगाता है और एथिलीन गैस (ethylene gas) के रूप में एक संकट संकेत छोड़ता है। पड़ोसी अकैसिया पेड़ इसके जवाब में अपने पत्तों में टैनिन (tannins) पंप करते हैं, जिससे उनका स्वाद खराब हो जाता है और जिराफ उन्हें खाने से बचते हैं।
मातृ वृक्ष पूरे जंगल को एक साथ कैसे जोड़े रखते हैं? जंगल में सबसे बड़े और सबसे पुराने पेड़ों को मातृ वृक्ष या मातृ पेड़ (Mother trees) कहा जाता है। ये मातृ वृक्ष इस संचार प्रणाली के केंद्र में होते हैं, जो आसपास की वनस्पतियों और जीवों का पोषण करते हैं। ये प्राचीन रक्षक अपने विशाल जड़ प्रणालियों के माध्यम से पोषक तत्वों और सूचनाओं के हस्तांतरण की सुविधा प्रदान करते हैं, जिससे छोटे पेड़ों को पनपने में मदद मिलती है। ये मातृ पेड़ कीटों या बीमारियों जैसे आने वाले खतरों के बारे में पड़ोसी पौधों को चेतावनी भी देते हैं।
अनुसंधान बताता है कि अधिक मातृ वृक्षों वाले वनों में अधिक जैव विविधता होती है और वे पर्यावरणीय तनावों के प्रति अधिक लचीले होते हैं। जब किसी मातृ वृक्ष को काट दिया जाता है या हटा दिया जाता है, तो स्थापित जड़ प्रणाली गायब हो जाती है, जिससे पोषक तत्वों का साझाकरण और संचार बाधित हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप पड़ोसी पेड़ों को महत्वपूर्ण संसाधनों और सुरक्षात्मक संकेतों से वंचित होना पड़ता है, जिससे पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है।
कवक और पेड़ों की यह साझेदारी जलवायु परिवर्तन और बीमारियों से कैसे बचाती है? कवक और पेड़ों की यह साझेदारी वनों को सूखे और जलवायु परिवर्तन (climate change) से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। फंगल नेटवर्क से जुड़े युवा पेड़ों की जीवित रहने की दर उन पेड़ों की तुलना में काफी बेहतर होती है जो इस नेटवर्क से नहीं जुड़े होते। सूखे के दौरान, कवक पेड़ों को मिट्टी की गहरी परतों से पानी तक पहुंचने में मदद करते हैं। भूमध्यसागरीय (Mediterranean) वनों में किए गए हालिया अध्ययनों से पता चलता है कि अत्यधिक सूखे की घटनाओं के दौरान माइकोराइजल नेटवर्क (mycorrhizal network) से जुड़े पेड़ों में जीवित रहने की दर अलग-थलग पेड़ों की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत अधिक थी।
कवक पेड़ों को प्राकृतिक सुरक्षा भी प्रदान करते हैं, एंटीबायोटिक्स (antibiotics) का उत्पादन करते हैं और पेड़ों को मजबूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (immune response) विकसित करने में मदद करते हैं। लू या अत्यधिक गर्मी (heat waves) के दौरान, कवक नेटवर्क से जुड़े पेड़ बेहतर जल पहुंच के माध्यम से अपनी पत्तियों के तापमान को अधिक स्थिर बनाए रखते हैं। ठंडी परिस्थितियों में, कवक एंटीफ्रीज यौगिकों (antifreeze compounds) का उत्पादन करके जड़ों को जमने से होने वाले नुकसान से बचाते हैं। इसके अलावा, यह साझेदारी कार्बन भंडारण (carbon storage) का भी समर्थन करती है। कवक मिट्टी में कार्बन को सीधे ग्लोमालिन (Glomalin) जैसे यौगिकों के माध्यम से जमा करते हैं। यह चिपचिपा प्रोटीन मिट्टी में कार्बन को दशकों या सदियों तक बंद रख सकता है। कवक मिट्टी की संरचना में सुधार करते हैं, जिससे मिट्टी के कण एक साथ बंधते हैं, जल प्रतिधारण (water retention) बढ़ता है और कटाव कम होता है।
वनों की कटाई या क्लियर-कटिंग (clear-cutting) उन फंगल समुदायों को नष्ट कर देती है जो शायद सदियों से विकसित हुए हों। इसलिए, वनों की बहाली (forest restoration) के लिए स्थानीय मिट्टी का उपयोग करना, परिपक्व पेड़ों की रक्षा करना और शीर्ष मिट्टी (topsoil) को संरक्षित करना आवश्यक है। समशीतोष्ण और बोरियल वनों में आमतौर पर एक्टोमाइकोराइजल कवक (ectomycorrhizal fungi) पाए जाते हैं, जो जड़ के सिरों के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आवरण बनाते हैं। दूसरी ओर, उष्णकटिबंधीय वनों में अर्बस्कुलर माइकोराइजल कवक (arbuscular mycorrhizal fungi) आम हैं, जो सीधे जड़ कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं। पेड़ों और कवक के इस प्राचीन और गहरे संबंध को समझकर ही हम एक ऐसा भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं जिसमें जौनपुर और पूरी दुनिया के जंगल स्वस्थ, लचीले और आत्मनिर्भर बने रहें।
आईए याद करें, क्यों माना गाँधी जी ने, सत्य, करुणा और नैतिकता को, धर्म के प्रमुख स्तंभ ?
जौनपुर की शांत और सुरीली सुबहों में निकलने वाली प्रभात फेरियों की तरह ही, बापू का जीवन भी आध्यात्मिकता और भजनों की मिठास से भरा हुआ था। गांधी जी के लिए धर्म कभी भी बँटवारे या कट्टरपन का ज़रिया नहीं रहा; उनके लिए तो यह इंसान के दिल में छिपी दिव्यता की एक बहुत ही निजी और दार्शनिक खोज थी। आज के दौर में, जहाँ धर्म को लेकर कई तरह की गलतफ़हमियाँ फैली हुई हैं, वहाँ बापू के विचार हमें एक बिल्कुल नई राह दिखाते हैं। इस लेख में हम महात्मा गांधी के धार्मिक दर्शन, उनके आश्रमों में सबके साथ गाए जाने वाले भजनों की अहमियत, और उनके सबसे प्यारे भजन से मिलने वाले हमदर्दी के संदेश को गहराई से समझेंगे। ये बातें आज के सामाजिक और क़ानूनी माहौल में कितनी सटीक बैठती हैं, यह जानकर आप भी अपनी ज़िंदगी में सच्ची शांति और सबको साथ लेकर चलने की सोच अपना सकेंगे।
क्या गांधी जी के लिए धर्म का अर्थ केवल सत्य और नैतिकता की खोज था? पश्चिम बंगाल की रायगंज यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. इति चट्टोपाध्याय के एक रिसर्च पेपर के मुताबिक, गांधी जी का धर्म किसी संस्था या इमारत तक सीमित नहीं था। उनका पक्का यकीन था कि धर्म उन सभी मान्यताओं की जड़ है जो हमें ईश्वर या सच्चाई का एहसास कराता है। उनके लिए 'सत्य ही ईश्वर है' और ईश्वर के प्रति यही लगन सच्चा धर्म है। गांधी जी मानते थे कि कोई भी इंसान धर्म के बिना जी नहीं सकता। यहाँ तक कि भगवान को न मानने वाला नास्तिक इंसान भी किसी न किसी उसूल के रूप में ईश्वरीय ताक़त से जुड़ा होता है। धर्म में इंसान के स्वभाव को साफ़ करने और उसे बेहतर बनाने की गज़ब की ताक़त होती है। उन्होंने सभी धर्मों के बीच आपसी तालमेल, सहनशीलता और सम्मान पर बहुत ज़ोर दिया। बापू का मानना था कि दुनिया में सिर्फ़ एक ही धर्म सच्चा नहीं हो सकता, बल्कि लोगों के हिसाब से कई धर्म हो सकते हैं। एकतरफ़ा सोच रखने के बजाय, हमें सहनशील होना चाहिए। अपनी इस बात को समझाने के लिए उन्होंने सात अंधे लोगों और एक हाथी का मशहूर उदाहरण दिया, जहाँ हर इंसान अपनी-अपनी जगह सही था। इसी 'अनेकांतवाद' यानी बहुलता के सिद्धांत ने उन्हें हर धर्म को उसी के नज़रिए से देखने की समझ दी। बापू ने हिंदू धर्म का निष्काम कर्म, जैन और बौद्ध धर्म की अहिंसा, और ईसाई धर्म के प्यार और माफ़ी जैसे गुणों को खुशी-खुशी अपनाया। उन्होंने ज़बरदस्ती धर्म बदलने का कड़ा विरोध किया। वे कहते थे कि अगर कोई ईसाई व्यक्ति हिंदू धर्म अपनाना चाहता है, तो उसे यह समझाना चाहिए कि जो भागवत में लिखा है, वही बाइबिल में भी है; इसलिए उसे एक और बेहतर ईसाई बनने की कोशिश करनी चाहिए। उनका यह भी मानना था कि जो धर्म रोज़मर्रा की उलझनों को नहीं सुलझाता, वह धर्म कहलाने के लायक़ ही नहीं है। तर्क और नैतिकता उनके धर्म के दो सबसे बड़े खंभे थे। उनका दर्शन 'आध्यात्मिक मानववाद' है, जहाँ इंसान सबसे अहम है और इंसानियत की भलाई ही सबसे बड़ा मक़सद है।
आश्रमों में संगीत और 'वैष्णव जन तो' भजन हमें क्या सिखाता है? गांधी जी मानते थे कि संगीत हमारी आत्मा की आवाज़ है। उनके आश्रमों में रोज़ाना एक साथ बैठकर भजन गाने की बहुत प्यारी सी परंपरा थी, जिसने सभी आश्रमवासियों के बीच एकता की भावना को मज़बूत किया। इन भजनों में सबसे ख़ास और उनका सबसे पसंदीदा भजन था—'वैष्णव जन तो तेने कहिये'। यह मशहूर गुजराती भजन 15वीं सदी के महान कवि नरसिंह मेहता ने लिखा था। बापू ने इसे अपनी रोज़मर्रा की प्रार्थनाओं में शामिल किया था और उनकी बैठकों से पहले इसे हमेशा गाया जाता था। इस भजन के बोलों में ज़िंदगी का एक बहुत गहरा फलसफ़ा छिपा है। भजन की पंक्तियाँ कहती हैं कि असली वैष्णव (भगवान का भक्त) वही है जो दूसरों के दर्द को अपना समझे, दूसरों के दुख दूर करके उन पर उपकार करे, लेकिन मन में कभी घमंड न लाए। वह पूरी दुनिया में सबका सम्मान करता है, किसी की बुराई नहीं करता और अपनी बातों, कामों और मन को एकदम साफ़ रखता है। ऐसा इंसान सबको एक नज़र से देखता है, लालच छोड़ देता है, पराई औरत को माँ के समान मानता है, कभी झूठ नहीं बोलता और दूसरे के पैसे को हाथ तक नहीं लगाता। उसके मन में कोई मोह-माया नहीं होती और वह वैराग्य अपनाकर बस राम के नाम में मगन रहता है। महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौक़े पर दुनिया भर के 150 से ज़्यादा देशों के कलाकारों ने राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि देने के लिए इस भजन को अपनी आवाज़ दी। (Armenia) से लेकर (Angola), श्रीलंका से लेकर (Serbia), (Iraq) और (Iceland) तक के मशहूर स्थानीय कलाकारों ने इस भजन की पहुँच को पूरी दुनिया में साबित कर दिया। बापू के दिल के सबसे करीब रहने वाले इस गीत में करुणा और सेवा का गहरा संदेश छिपा है। यह संगीत सिर्फ़ आश्रम के रूटीन का हिस्सा नहीं था, बल्कि आत्मा की आवाज़ भी था। आप गांधी जी के इस प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो' की मधुर प्रस्तुति इस वीडियो लिंक के माध्यम से सुन सकते हैं:
जिसने दुनिया भर के श्रोताओं को शांति का संदेश दिया है।
क्या न्यायिक प्रणाली में भी गांधीवादी सहानुभूति (एम्पैथी) की आवश्यकता है? सामाजिक न्याय के लिए हमदर्दी या सहानुभूति को सबसे ज़रूरी माना जाता है। सामाजिक न्याय वह आदर्श स्थिति है जहाँ समाज के हर इंसान को बराबर मूल अधिकार, सुरक्षा, मौक़े और सामाजिक फ़ायदे मिलते हैं। इसी सोच को ध्यान में रखते हुए 14 अगस्त 2021 को गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति और जी डी गोयनका यूनिवर्सिटी ने 'न्यायिक सहानुभूति, न्यायशास्त्र और न्याय' विषय पर एक ख़ास लेक्चर आयोजित किया। इस प्रोग्राम में दुनिया के जाने-माने क़ानूनी शिक्षाविद् प्रोफ़ेसर उपेंद्र बक्शी ने अपनी बातें रखीं। कई दशकों तक यह माना जाता था कि क़ानून और न्याय के उसूलों में भावनाओं की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, ताकि सिर्फ़ तर्क और कारण की जीत हो सके। लेकिन अब जानकार यह मानने लगे हैं कि भावनाएँ भी कहीं न कहीं क़ानूनी फैसलों और जजों की सोच पर असर डालती हैं। प्रोफ़ेसर बक्शी ने गांधी जी के प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो' का उदाहरण देते हुए हमदर्दी के मतलब को समझाया। उन्होंने मशहूर केशवानंद भारती मामले का ज़िक्र करते हुए बहुत ही ख़ूबसूरती से बताया कि ऊँचे स्तर पर भी हमदर्दी कैसे काम करती है। प्रोफ़ेसर बक्शी के मुताबिक, हमदर्दी का सीधा सा मतलब है ख़ुद को किसी और की जगह रखकर देखना। इसके दो रूप होते हैं: पहला दिमागी (कोग्निटिव) रूप, जहाँ हम अपने विचारों का इस्तेमाल करके दूसरे के नज़रिए से सोचते हैं। दूसरा जज़्बाती (भावनात्मक) रूप, जहाँ हम असल में वही महसूस करते हैं जो सामने वाला झेल रहा है। सबसे मज़बूत हमदर्दी इन दोनों का मिला-जुला रूप होती है। क़ानून की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए इस हमदर्दी का होना बहुत काम आता है। हर क़ानूनी रिपोर्ट और केस की फ़ाइल के पीछे ऐसे इंसान होते हैं जिनकी ज़िंदगी आर्थिक और मानसिक तौर पर बुरी तरह प्रभावित होती है। हमदर्दी हमें उनके नज़रिए की इज़्ज़त करना सिखाती है।
क्या सत्य और अहिंसा का मार्ग ही मानव जाति का अंतिम लक्ष्य है? बापू की पूरी ज़िंदगी इसी सच्चाई और अहिंसा की खोज में गुज़र गई। उन्होंने हमेशा यही माना कि धर्म और नैतिकता एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं; बिना नैतिकता के धर्म एकदम खोखला है। (Brunners) कलेक्शन की तस्वीरों और चित्रों में भी उनके इसी सादे लेकिन बहुत गहरे जीवन-दर्शन की झलक देखने को मिलती है। उनका मानना था कि भगवान अपनी ही बनाई दुनिया में बसता है, इसलिए ग़रीबों की सेवा करना ही ईश्वर की सच्ची पूजा है। कुल मिलाकर, गांधी जी के धर्म की परिभाषा में ऊँच-नीच, स्वर्ग-नरक का डर या ज़बरदस्ती धर्म बदलने जैसी उन बातों की कोई जगह नहीं है जो हिंसा और नफ़रत को बढ़ावा देती हैं। उनका यह 'आध्यात्मिक मानववाद' और भजनों के ज़रिए करुणा का संदेश आज भी हमारे समाज को जोड़ने का बेहतरीन काम कर रहा है।
कंप्यूटर अक्षरों को कैसे समझता है,जानिए एनकोडिंग और आस्की कोड का इतिहास
जब हम तकनीक की बात करते हैं, तो एनकोडिंग एक ऐसा शब्द है जो डेटा स्टोरेज, संचार, प्रोग्रामिंग और मल्टीमीडिया में बार-बार सामने आता है। लेकिन जब आप अपने कीबोर्ड पर कोई अक्षर टाइप करते हैं, तो कंप्यूटर उस अक्षर को सीधे तौर पर नहीं देखता है; वह केवल एक बाइनरी संख्या को समझता है। उस अक्षर को संख्यात्मक रूप में बदलने की प्रक्रिया ही एनकोडिंग कहलाती है। आधुनिक कंप्यूटरों से लेकर स्मार्टफोन तक, हर उपकरण इसी तकनीक पर निर्भर करता है।
कंप्यूटर की दुनिया में एनकोडिंग क्या है और यह क्यों जरूरी है? एनकोडिंग (Encoding) सूचना को एक रूप या प्रारूप से दूसरे रूप में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है। आमतौर पर, यह परिवर्तन इसलिए किया जाता है ताकि डेटा को कंप्यूटर और अन्य उपकरणों द्वारा कुशलतापूर्वक संग्रहीत, प्रेषित या संसाधित किया जा सके। इसे एक ऐसे संदेश के अनुवाद के रूप में समझा जा सकता है जिसे प्राप्तकर्ता या सिस्टम सबसे अच्छी तरह समझता है। एनकोडिंग के कई फायदे हैं।
सबसे पहले, यह डेटा स्टोरेज में मदद करता है। कंप्यूटर डेटा को बाइनरी में संख्याओं के रूप में संग्रहीत करते हैं। एनकोडिंग टेक्स्ट, इमेज और साउंड जैसे विभिन्न प्रकार के डेटा को बाइनरी में दर्शाने की अनुमति देता है। दूसरा, यह डेटा ट्रांसमिशन के लिए महत्वपूर्ण है। चाहे इंटरनेट पर संदेश भेजना हो या वीडियो स्ट्रीम करना हो, एनकोडिंग डेटा को पैकेज करने में मदद करता है ताकि यह सटीक रूप से यात्रा कर सके। तीसरा, यह अनुकूलता सुनिश्चित करता है, जिससे एक सिस्टम पर बनाया गया डेटा दूसरे सिस्टम पर सही ढंग से पढ़ा जा सके। इसके अलावा, डेटा सुरक्षा के लिए भी एनकोडिंग की भूमिका अहम है।
एनकोडिंग के प्रमुख प्रकार कौन-कौन से हैं? डेटा के प्रकार और उसके उपयोग के आधार पर एनकोडिंग कई रूप ले लेती है। कैरेक्टर एनकोडिंग (Character Encoding) अक्षरों, संख्याओं और प्रतीकों को बाइनरी में बदलने के बारे में है ताकि कंप्यूटर टेक्स्ट को समझ और प्रदर्शित कर सके। इसके उदाहरण आस्की, यूटीएफ-8 (UTF-8) और यूनिकोड हैं। यूटीएफ-8 आज दुनिया भर की अधिकांश भाषाओं के लिए एक लोकप्रिय एनकोडिंग है, जो कई अक्षरों और इमोजी का समर्थन करता है।
मल्टीमीडिया फाइलों को छोटा करने के लिए ऑडियो और वीडियो एनकोडिंग का उपयोग होता है, जिसमें एमपी3 (MP3) और एएसी (AAC) ऑडियो को कंप्रेस करते हैं, जबकि एच.264 (H.264) और एच.265 (H.265) वीडियो को कंप्रेस करते हैं। संचार के लिए डेटा एनकोडिंग में बेस64 (Base64) बाइनरी डेटा को टेक्स्ट प्रारूप में बदलता है ताकि इसे ईमेल के माध्यम से भेजा जा सके। इसी तरह यूआरएल एनकोडिंग वेबसाइट पतों में विशेष वर्णों को ऐसे प्रारूप में परिवर्तित करता है जिसे ब्राउज़र सुरक्षित रूप से संभाल सकें। प्रोग्रामिंग भाषाओं में जैसे कोटलिन (Kotlin), स्ट्रिंग एनकोडिंग और डिकोडिंग को आसानी से संभाला जा सकता है।
आस्की कोड की शुरुआत कब और कैसे हुई थी? आस्की (ASCII) का पूरा नाम अमेरिकन स्टैंडर्ड कोड फॉर इंफॉर्मेशन इंटरचेंज है। 1963 में अमेरिकन नेशनल स्टैंडर्ड इंस्टीट्यूट द्वारा आस्की मानक प्रख्यापित किया गया था, जो कंप्यूटर में अक्षरों, संख्याओं, विराम चिह्नों और नियंत्रण संकेतों का प्रतिनिधित्व करने के लिए सात बिट्स के पैटर्न को निर्दिष्ट करता है। ऐतिहासिक रूप से, आस्की टेलीग्राफिक कोड से विकसित हुआ। इसका पहला व्यावसायिक उपयोग बेल डेटा सेवाओं द्वारा प्रचारित सात-बिट टेलीप्रिंटर कोड के रूप में किया गया था।
आस्की पर औपचारिक काम 6 अक्टूबर 1960 को अमेरिकन स्टैंडर्ड एसोसिएशन की X3.2 उपसमिति की पहली बैठक के साथ शुरू हुआ। मानक का पहला संस्करण 1963 में प्रकाशित हुआ था। आस्की में 128 वर्णों की परिभाषाएं शामिल हैं, जिनमें 33 गैर-मुद्रण नियंत्रण वर्ण हैं, 94 मुद्रण योग्य वर्ण हैं, और स्पेस को एक अदृश्य ग्राफिक माना जाता है। 2008 तक वर्ल्ड वाइड वेब पर सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला कैरेक्टर एनकोडिंग आस्की ही था, जिसके बाद यूटीएफ-8 ने इसकी जगह ले ली।
यूनिकोड कंसोर्टियम ने वैश्विक भाषाओं को डिजिटल पहचान कैसे दी? यूनिकोड कंसोर्टियम को जनवरी 1991 में कैलिफोर्निया राज्य में शामिल किया गया था। इसकी शुरुआत 1987 में ज़ेरॉक्स (Xerox) के इंजीनियर जो बेकर (Joe Becker) और एप्पल (Apple) के इंजीनियरों ली कॉलिन्स (Lee Collins) और मार्क डेविस (Mark Davis) द्वारा की गई चर्चाओं के बाद हुई। इनका लक्ष्य एक नया कैरेक्टर एनकोडिंग बनाना था, जिसे यूनिकोड (Unicode) कहा गया।
प्रारंभिक यूनिकोड मानक 1991 में प्रकाशित हुआ था। इसका लक्ष्य आधुनिक पाठ में सभी वर्णों का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक चर बिट मानक बनाना था, जिसमें सभी लैटिन, एशियाई, ग्रीक, अरबी, सिरिलिक और हिब्रू वर्णमाला, संगीत, अंतर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला, इमोजी और यहां तक कि ब्रेल भी शामिल थे। आधुनिक कंप्यूटर और मोबाइल उपकरणों पर लगभग सभी वर्णों का आधार अब यूनिकोड मानक ही है।
डिजिटल ब्रेल लिपि और स्क्रीन रीडर तकनीक कैसे काम करती है? कंप्यूटर और मोबाइल उपकरणों पर ब्रेल डिस्प्ले का उपयोग करते समय, स्क्रीन रीडर ही यह निर्धारित करता है कि कौन से ब्रेल कोड उपलब्ध होंगे। यूनिकोड मानक के कारण, सभी 256 आठ-डॉट ब्रेल वर्णों का यूनिकोड मान U+2800 से U+28ff तक होता है। स्क्रीन रीडर इन वर्णों को ब्रेल में प्रस्तुत करने के लिए जिम्मेदार है। यह एक सुचारू प्रक्रिया है, लेकिन कभी-कभी इसमें तकनीकी समस्याएं भी आती हैं।
उदाहरण के लिए, एपोस्ट्रोफी (Apostrophe) वर्ण को लेकर समस्या आती है। यूनिकोड में, अक्सर एपोस्ट्रोफी और एकल क्लोजिंग कोटेशन मार्क दोनों को दर्शाने के लिए एक ही वर्ण का उपयोग किया जाता है। आम पाठकों को यह अंतर दिखाई नहीं देता, लेकिन ब्रेल पाठकों के लिए यह एक समस्या है क्योंकि ब्रेल में एपोस्ट्रोफी और क्लोजिंग कोट पूरी तरह से अलग होते हैं। कई ब्रेल पाठक कॉन्ट्रैक्टेड ब्रेल पढ़ना पसंद करते हैं, जिसके लिए स्क्रीन रीडर एक ब्रेल तालिका तक पहुंचता है जो यह जानकारी प्रदान करती है कि पाठ को कैसे अनुबंधित किया जाना चाहिए।
मोबाइल और कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम में ब्रेल कोड के क्या विकल्प मौजूद हैं? एप्पल के आईओएस (iOS) और आईपैडओएस (iPadOS) उपकरणों में वॉयसओवर (VoiceOver) सुविधा के तहत ब्रेल सेटिंग्स मौजूद होती हैं। इसमें आउटपुट और इनपुट के लिए अनकॉन्ट्रैक्टेड 6-डॉट, अनकॉन्ट्रैक्टेड 8-डॉट और कॉन्ट्रैक्टेड ब्रेल के विकल्प मिलते हैं। अनकॉन्ट्रैक्टेड 6-डॉट ब्रेल में बड़े अक्षरों को इंगित करने के लिए डॉट 6 का उपयोग होता है, जबकि 8-डॉट ब्रेल में डॉट 7 का उपयोग किया जाता है। अमेरिका में डिफ़ॉल्ट रूप से इंग्लिश यूनिफाइड (Unified English Braille) टेबल लोड होती है। मैक (Mac) कंप्यूटरों में भी वॉयसओवर यूटिलिटी के तहत इसी तरह की सेटिंग्स और ब्रेल ट्रांसलेशन टेबल्स उपलब्ध होती हैं।
एंड्रॉइड (Android) उपकरणों की बात करें तो अगस्त 2022 में एंड्रॉइड 13.0 के जारी होने के साथ ब्रेल सुविधाओं को गूगल के स्क्रीन रीडर टॉकबैक (TalkBack) में एकीकृत किया गया था। जनवरी 2023 में, गूगल ने टॉकबैक 13.1 जारी किया जिसमें ब्रेल तालिकाओं की एक विस्तृत सूची उपलब्ध कराई गई। इसमें 6-डॉट कंप्यूटर ब्रेल और नॉर्थ अमेरिकन ब्रेल कंप्यूटर कोड जैसे विकल्प जोड़े गए, जिससे बीआरएफ (BRF) फाइलें पढ़ना संभव हो सका।
विंडोज़ (Windows) पीसी पर सबसे लोकप्रिय स्क्रीन रीडर जॉज़ (JAWS) और एनवीडीए (NVDA) हैं। जॉज़ में दर्जनों भाषाओं के लिए ब्रेल अनुवाद की सुविधा है, जिसमें कंप्यूटर ब्रेल, यूएस इंग्लिश ग्रेड 1 और ग्रेड 2, और यूनिफाइड इंग्लिश ब्रेल के विकल्प मिलते हैं। जॉज़ में 8-डॉट ब्रेल मोड में टेक्स्ट प्रदर्शित करने का विकल्प भी है। एनवीडीए में भी 6-डॉट और 8-डॉट कंप्यूटर ब्रेल के साथ-साथ ग्रेड 1 और ग्रेड 2 के इनपुट और आउटपुट टेबल उपलब्ध हैं। इन सभी तकनीकी प्रगति ने दृष्टिबाधित लोगों के लिए डिजिटल दुनिया को बहुत अधिक सुलभ और समावेशी बना दिया है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/27w69ypr
2. https://tinyurl.com/2agpuvfc
3. https://tinyurl.com/2augl5st
4. https://tinyurl.com/22d972fr
जलवायु और मौसम
21-09-2026 09:27 AM • Jaunpur District-Hindi
जौनपुर वासियों, आज पढ़िए, भारत का अनूठा भौगोलिक परिप्रेक्ष्य कैसे देता है मानसून को जन्म
हम सब, प्रत्येक वर्ष जून महीने की शुरुआत में बारिश की राह देखते हैं। हमारे जौनपुर जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में बारिश जीवनदाता है। मानसून, केवल अधिक बारिश की एक बौछार नहीं है, बल्कि भूमि और महासागर के तापन के अंतर के कारण प्रचलित हवाओं में होने वाला एक बड़ा मौसमी बदलाव है। भारत में तीव्र मानसून इसलिए आता है, क्योंकि विशाल एशियाई भूभाग गर्मियों में तेजी से गर्म होकर कम वायु दाब वाला क्षेत्र बनाता है। इससे हिंद महासागर से उठी नमी से भरी हवाएँ भारतीय उपमहाद्वीप पर बहती हैं, जो फिर हिमालय से टकराकर हमारे क्षेत्र में बारिश बनकर गिरती हैं। इसके विपरीत, यूरोप में कोई वास्तविक मानसून नहीं है। हालांकि, मानसून प्रणालियाँ अन्य स्थानों पर भी मौजूद हैं, जो उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका में मौसमी वर्षा को आकार देती हैं।
व्यापक रूप से कहें तो पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में विपरीत ऋतुएँ होती हैं। जैसे-जैसे पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है, पृथ्वी के अक्ष का झुकाव बदलता रहता है। जून, जुलाई और अगस्त महीनों के दौरान पृथ्वी का झुकाव उत्तरी गोलार्ध के हिस्से को सूर्य की ओर अधिक रखता है, और दक्षिणी हिस्सा दूर झुका होता है। दिसंबर, जनवरी और फरवरी महीनों में इसके विपरीत स्थिति होती है। तब दक्षिण गोलार्ध में अधिक प्रकाश, लंबे दिन और अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त होती है। ध्यान दें कि ऋतुओं में परिवर्तन पृथ्वी के इसी झुकाव के कारण होते हैं, और न कि पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी के कारण।
भूमध्य रेखा (Equator) के निकट स्थित क्षेत्रों में आमतौर पर केवल दो ही ऋतुएँ होती हैं - वर्षा (मानसून) और शुष्क। चूंकि वे क्षेत्र भूमध्य रेखा (जहाँ सूर्य किरणें हमेशा सीधी गिरती हैं) के पास हैं, इसलिए वर्ष के दौरान उन्हें मिलने वाली प्रकाश की मात्रा में बहुत अधिक बदलाव नहीं होता है।
इतिहास में मिस्रवासियों के पास नील नदी के आधार पर तीन ऋतुएँ थीं - बाढ़, वृद्धि और कम पानी। प्रारंभिक ब्रिटेन (Britain) में बेल्टैन (Beltane) त्योहार को गर्मियों की शुरुआत और हैलोवीन (Halloween) त्योहार को इसकी समाप्ति के रूप में चिह्नित किया। रोमन लोग (Roman people)चार ऋतुएँ मानते थे; और यूनानी लोग (Greek people) अपने स्थान के आधार तीन या चार ऋतुएँ मानते थे। जबकि हिंदू कैलेंडर में छह ऋतुएँ हैं।
भारत में एक प्रभावशाली उष्णकटिबंधीय मानसून है, क्योंकि विशाल एशियाई भूभाग का तीव्र ग्रीष्मकालीन तापन एक विशाल कम दबाव का क्षेत्र बनाता है। यह क्षेत्र, गर्म हिंद महासागर से नमी से भरी हवाओं को खींचता है। यूरोप में इस प्रणाली का अभाव है, क्योंकि इसका उच्च अक्षांश, छोटा भूभाग और ठंडा अटलांटिक महासागर एक वास्तविक उष्णकटिबंधीय मानसून के लिए आवश्यक तापमान के उतार-चढ़ाव और मौसमी हवा के परिवर्तन को रोकते हैं। इस प्रकार, इन दोनों क्षेत्रों में मुख्य भौगोलिक और जलवायु संबंधी अंतर निम्नलिखित हैं:
1. भूमि तापन: भारत उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के पास स्थित है, जहाँ सीधी धूप उपमहाद्वीप और तिब्बती पठार को तीव्रता से गर्म करती है, जिससे एक विशाल गर्म क्षेत्र बनता है। यूरोप और उत्तर में स्थित क्षेत्र अधिक हल्के, क्रमिक तापमान परिवर्तनों का अनुभव करते हैं।
2. महासागर का प्रभाव: हिंद महासागर और अरब सागर का गर्म उष्णकटिबंधीय पानी, आसानी से भारी मात्रा में जल वाष्प बनाता है। यूरोप के पास स्थित उत्तर अटलांटिक महासागर ठंडा और अधिक स्थिर है, जो भारी वायुमंडलीय पलटाव को चालना देने में विफल रहता है।
3. हवा और दबाव में बदलाव: भारत, मौसमी हवाओं के पूर्ण परिवर्तन का अनुभव करता है (दक्षिण-पश्चिम से आने वाली ग्रीष्मकालीन हवाएँ व उत्तर-पूर्व से आने वाली शुष्क शीतकालीन हवाएँ)। इसके बजाय, यूरोप उष्णकटिबंधीय हवा-पैटर्न में बदलाव के बजाय, साल भर स्थिर मध्यम अक्षांश पश्चिमी हवाओं (Westerly winds) और समशीतोष्ण कम दबाव प्रणालियों के वर्चस्व में रहता है।
4. प्राकृतिक अवरोध: भारत में हिमालय ठंडी उत्तरी हवाओं को देश में प्रवेश करने से रोकता है और मानसून की नमी को अवरुद्ध करता है, जिससे वर्षा तेज होती है। यूरोप की मुख्य पर्वत श्रृंखला – आल्प्स (Alps) पश्चिम से पूर्व की ओर खड़ी है और मौसमी उष्णकटिबंधीय वायु द्रव्यमान को अवरुद्ध नहीं कर पाती है।
मानसून, केवल एशिया महाद्वीप की विशेषता नहीं है। दरअसल, विश्व में बारिश के लिए एशियाई-ऑस्ट्रेलियाई-अफ्रिकी मानसून (Asian-Australian-African Monsoon) कार्य करता है। उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका के बीच मानसून चक्रों में कुछ समानताएँ हैं, और उनके पीछे निश्चित वायुमंडलीय प्रक्रियाएँ हैं। हालांकि ये दोनों क्षेत्र भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से काफी दूर स्थित हैं, लेकिन इनमें मौसमी हवाओं के रुख में होने वाले बदलाव (Seasonal wind shifts) और वायुमंडलीय परिसंचरण (Atmospheric circulation) की प्रणालियों में गहरी समानता पाई जाती है।
दोनों ही क्षेत्रों में, मानसूनी चक्र मुख्य रूप से मौसमी हवाओं की दिशा में होने वाले बड़े पैमाने पर परिवर्तन (Reversal) पर निर्भर करते हैं। ग्रीष्म ऋतु में गर्म भूमि के ऊपर कम वायुदाब का क्षेत्र बनता है, जिससे समुद्र से नमी से भरी हवाएं जमीन की ओर बहती हैं।
अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का मौसमी स्थानांतरण, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका दोनों जगहों पर मानसूनी वर्षा को निर्धारित करने में मुख्य भूमिका निभाता है। सूर्य की स्थिति के साथ यह क्षेत्र उत्तर और दक्षिण की ओर स्थानांतरण करता है, जिससे दोनों क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से वर्षा और सूखे मौसम के चक्र उत्पन्न होते हैं।
एक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि भौगोलिक भिन्नताओं के बावजूद, वायुमंडल और महासागरों की प्रतिक्रियाओं के कारण दोनों क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा का पैटर्न समान नियमों और प्रक्रियाओं से संचालित होता है। इस प्रकार, इस कार्य में बहु-पैमाने की परस्पर क्रिया के दृष्टिकोण से, एशियाई-ऑस्ट्रेलियाई-अफ्रिकी मानसून को एक एकीकृत इकाई के रूप में माना जाता है।
मानसून में योगदान देने वाले ये वायुमंडलीय परिवर्तन, निश्चित सिद्धांतों पर आधारित है। गर्म होने पर हवा फैलती है और ठंडी होने पर संकुचित होती है। इसके परिणामस्वरूप, वायुमंडलीय दबाव में बदलाव होता है। वायुमंडलीय दबाव में अंतर उच्च दबाव से कम दबाव की ओर हवा की गति का कारण बनता है, जिससे हवा गति में आ जाती है। वायुमंडलीय दबाव यह भी निर्धारित करता है कि हवा कब ऊपर उठेगी या नीचे बहेगी।
क्षैतिज गति में चलने वाली हवा (Wind), विभिन्न अक्षांशों में गर्मी और नमी को पुनर्वितरित करती है, जिससे पूरे ग्रह के लिए एक स्थिर तापमान बना रहता है। इसके विपरीत, नम हवा के लंबवत रूप से ऊपर उठने से बादल बनते हैं और वर्षा होती है। भूमध्य रेखा के पास समुद्र तल पर हवा का दबाव कम होता है और इस क्षेत्र को भूमध्यरेखीय निम्न (Equatorial low) कहा जाता है। 30° उत्तर और 30° दक्षिण अक्षांशों के साथ उच्च दबाव वाले क्षेत्र पाए जाते हैं, जिन्हें उपोष्णकटिबंधीय उच्च (Subtropical highs) कहा जाता है। ध्रुवों की ओर 60° उत्तर और 60° दक्षिण के साथ, कम दबाव की बेल्ट को उपध्रुवीय निम्न (Subpolar lows) कहा जाता है। ध्रुवों के पास दबाव अधिक होता है और इसे ध्रुवीय उच्च (Polar high) कहा जाता है।
ये दबाव बेल्ट प्रकृति में स्थायी नहीं होते हैं। वे सूर्य की स्पष्ट गति के साथ स्थानांतरण करते हैं। वे सर्दियों में उत्तरी गोलार्ध में दक्षिण की ओर और गर्मियों में उत्तर की ओर बढ़ते हैं। उच्च और कम दबाव प्रणालियों के परिणामस्वरूप दबाव में अंतर के दो मुख्य कारण हैं – तापीय और गतिक (Dynamic)। जब हवा गर्म होती है, तो यह फैलती है, और इसलिए इसका घनत्व कम हो जाता है। इससे स्वाभाविक रूप से कम दबाव बनता है। इसके विपरीत, शीतलन से संकुचन होता है। यह घनत्व को बढ़ाता है और इस प्रकार उच्च दबाव की स्थिति पैदा करता है। भूमध्यरेखीय निम्न और ध्रुवीय उच्च का निर्माण क्रमशः तापीय निम्न और तापीय उच्च के उदाहरण हैं।
तापमान में बदलाव के अलावा, दबाव बेल्ट के गठन को दबाव प्रवणता बलों (Pressure gradient forces) और पृथ्वी के घूर्णन (कोरियोलिस बल – Coriolis force) से उत्पन्न होने वाले गतिशील नियंत्रणों द्वारा समझाया जा सकता है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/7pvpd69c
2. https://tinyurl.com/4wabrzte
3. https://tinyurl.com/462rhmm2
ध्वनि II - भाषाएँ
14-09-2026 09:31 AM • Jaunpur District-Hindi
जब प्रेस के भूखे मजदूरों के लिए प्रेमचंद ने लुटा दिए थे अपने गरम सूट के पैसे
भारतीय साहित्य में आम जनजीवन, ग्रामीण यथार्थ, किसानों के शोषण और सामाजिक रूढ़ियों को जितनी संवेदनशीलता और गहराई से मुंशी प्रेमचंद ने चित्रित किया है, वैसा उदाहरण विश्व साहित्य में विरले ही मिलता है। 31 जुलाई 1880 को बनारस से चार मील दूर लमही गाँव में जन्मे धनपतराय श्रीवास्तव को आज दुनिया 'उपन्यास सम्राट' और 'कलम के सिपाही' के रूप में जानती है। प्रेमचंद का संपूर्ण जीवन घोर अभावों, पारिवारिक त्रासदियों और लगातार संघर्षों के बीच बीता। किंतु जीवन की भयंकर विषमताओं ने उनकी सृजनशीलता को दबाने के बजाय और अधिक धारदार बना दिया। उन्होंने समाज के वंचितों, गरीबों और उपेक्षितों की पीड़ा को केवल कागज़ पर उकेरा ही नहीं, बल्कि स्वयं उसे हर क्षण जिया भी।
धनपतराय का बचपन किन विषम परिस्थितियों और घोर अभावों में बीता? प्रेमचंद का प्रारंभिक जीवन अत्यंत दुखद और संघर्षपूर्ण रहा। उनके पिता अजायब राय डाकखाने में एक मामूली नौकर के रूप में कार्य करते थे। जब धनपतराय केवल आठ वर्ष के थे, तब उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। पिता ने दूसरा विवाह कर लिया, जिसके कारण बालक धनपतराय मातृ-स्नेह से सर्वथा वंचित रह गए। घर में भयंकर गरीबी थी; न पहनने के लिए पर्याप्त कपड़े थे और न ही खाने के लिए भरपेट भोजन। सौतेली माँ का कठोर और उपेक्षित व्यवहार बालक के संवेदनशील मन को भीतर तक कचोटता था, जिसकी टीस बाद में उनकी अनेक प्रसिद्ध कहानियों में पात्रों के माध्यम से परिलक्षित हुई।
जब वे केवल 15 वर्ष के थे और नौवीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तब उनके पिता ने बिना सोचे-समझे उनका विवाह एक उम्र में बड़ी और कटुभाषी कन्या से करा दिया। इस बेमेल विवाह से प्रेमचंद का वैवाहिक जीवन अत्यंत कष्टप्रद हो गया। विवाह के ठीक एक वर्ष बाद पिता का भी देहांत हो गया। अचानक 16 वर्ष के किशोर धनपतराय के कंधों पर पाँच सदस्यों—विमाता, उनके दो छोटे बच्चे, पत्नी और स्वयं—के भरण-पोषण का भारी बोझ आ गया। आर्थिक तंगी का यह आलम था कि उन्हें अपना कोट और व्यक्तिगत पुस्तकें तक बेचनी पड़ीं। वे गाँव से बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। आगे चलकर वकील बनने की तमन्ना थी, किंतु गरीबी ने सपने तोड़ दिए। स्कूल आने-जाने के खर्च से बचने के लिए उन्होंने एक वकील के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया, जहाँ उन्हें प्रतिमाह पाँच रुपये मिलते थे। इन पाँच रुपयों में से तीन रुपये वे गाँव में परिवार को भेजते थे और शेष दो रुपयों से महीने भर अभावों के बीच रहकर उन्होंने किसी प्रकार अपनी मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।
पुस्तकें पढ़ने की दीवानगी ने कैसे एक सेल्स बॉय को महान लेखक बना दिया? विषम परिस्थितियों के बावजूद साहित्य के प्रति प्रेमचंद का अनुराग कभी कम नहीं हुआ। मिडिल स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही उन्हें उपन्यास पढ़ने का ऐसा चस्का लगा कि वे किताबों की दुनिया में ही अपनी तन्हाई का सुकून ढूँढ़ने लगे। इसी शौक को पूरा करने के लिए उनकी पहली नौकरी एक पुस्तक विक्रेता की दुकान पर 'सेल्स बॉय' के रूप में हुई। वहाँ काम करने का एकमात्र उद्देश्य यह था कि वे दुकान पर बैठकर बिना पैसे खर्च किए अधिक से अधिक उपन्यास पढ़ सकें। दो से तीन वर्षों के भीतर ही उन्होंने कितने ही उर्दू उपन्यास पढ़ डाले।
उपन्यास पढ़ने की उनकी दीवानगी इस हद तक थी कि एक उपन्यास पढ़ने के लिए उन्होंने एक तंबाकू विक्रेता से मित्रता कर ली और उसकी दुकान पर बैठकर प्रसिद्ध तिलिस्मी गाथा 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' पूरी पढ़ डाली। कम उम्र में ही उन्होंने अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध उपन्यासकार रोनाल्ड (Ronald) की कृतियों के उर्दू अनुवाद पढ़ लिए थे। 13 वर्ष की आयु में ही उन्होंने पहली व्यंग्यात्मक रचना 'मॉकरी' (Mockery) लिखी, जो उनके एक नाते के मामू (चाचा) पर केंद्रित थी, क्योंकि वे प्रेमचंद को किस्से-कहानियाँ पढ़ने पर डांटते थे। वर्ष 1894 में उन्होंने 'होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात' नामक नाटक लिखा। इसके बाद 1898 में ऐतिहासिक उपन्यास 'रूठी रानी' और 1902 में 'प्रेमा' तथा 1904-05 में 'हम खुर्मा व हम सवाब' उपन्यासों की रचना की, जिनमें विधवा-समस्या का सजीव चित्रण किया गया।
'सोज़े वतन' पर अंग्रेज़ों का पहरा और नवाब राय के 'प्रेमचंद' बनने की कहानी क्या है? वर्ष 1905 में पारिवारिक कटुता के चलते पहली पत्नी मायके चली गई और कभी नहीं लौटी, यद्यपि प्रेमचंद वर्षों तक उन्हें खर्चा भेजते रहे। 1905 के अंत में उन्होंने एक बाल-विधवा शीवरानी देवी से दूसरा विवाह किया। इस विवाह के बाद उनके जीवन में कुछ आर्थिक स्थिरता आई और वे शिक्षा विभाग में स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर नियुक्त किए गए।
आरंभ में वे 'नवाब राय' के नाम से उर्दू में लिखते थे। वर्ष 1907 में उनका पाँच देशभक्तिपूर्ण कहानियों का ऐतिहासिक संग्रह 'सोज़े वतन' (वतन का दुख-दर्द) प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में स्वाधीनता और देशप्रेम की ऐसी प्रखर भावना थी कि अंग्रेज़ी हुकूमत सतर्क हो गई। अंग्रेज़ शासकों ने इसे खुली बगावत मानते हुए नवाब राय को तलब किया। ब्रिटिश अधिकारियों ने प्रेमचंद के सामने ही 'सोज़े वतन' की सभी उपलब्ध प्रतियों को आग के हवाले कर दिया और उन पर बिना पूर्व अनुमति के लिखने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
सरकारी नौकरी और इस प्रशासनिक बंधन के कारण लेखन जारी रखना कठिन हो गया। तब प्रेमचंद ने अपने घनिष्ठ मित्र और 'ज़माना' पत्रिका के संपादक मुंशी दयानारायण निगम से परामर्श किया। मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें गुप्त रूप से 'प्रेमचंद' नाम से लिखने का बहुमूल्य सुझाव दिया। इसके बाद धनपतराय हमेशा के लिए 'प्रेमचंद' बन गए, और पाठकों ने आदरपूर्वक उनके नाम के आगे 'मुंशी' की मानद उपाधि जोड़ दी।
सरकारी नौकरी छोड़कर गांधीजी के आंदोलन में क्यों कूद पड़े थे प्रेमचंद? प्रेमचंद केवल कलम के धनी नहीं थे, बल्कि एक सच्चे राष्ट्रभक्त भी थे। जब महात्मा गांधी ने 1920 के दशक में देशव्यापी असहयोग आंदोलन का आह्वान किया, तो प्रेमचंद ने अपने बढ़ते हुए परिवार के भरण-पोषण की भारी चिंताओं के बावजूद अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी (डिप्टी इंस्पेक्टर पद) से तत्काल त्यागपत्र दे दिया।
उनका स्पष्ट मानना था कि राष्ट्र की आज़ादी के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा का बलिदान देना आवश्यक है। उन्होंने साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का हथियार बनाया और वाराणसी में 'सरस्वती प्रेस' की स्थापना की। जीवन की सार्थकता पर उनका एक प्रसिद्ध कथन आज भी प्रासंगिक है: "जीवन में सफल होने के लिए जिस चीज़ की आवश्यकता है, वह शिक्षा है; केवल साक्षरता और डिग्रियाँ नहीं।"
'कफ़न' से लेकर 'गोदान' तक: प्रेमचंद की अमर कहानियों और उपन्यासों का क्या मर्म है? प्रेमचंद ने अपने जीवनकाल में दर्जनों अमर उपन्यासों और 300 से अधिक कहानियों की रचना की, जो भारतीय समाज का दर्पण हैं:
गोदान (1935-36): इसे भारतीय साहित्य का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माना जाता है। यह किसान होरी की गाय पालने की अधूरी लालसा और महाजनी व्यवस्था, कर्ज तथा जातिगत शोषण के दुष्चक्र की हृदयविदारक गाथा है। उनका अंतिम उपन्यास 'मंगलसूत्र' अधूरा रह गया था।
कफ़न: घीसू और माधव की यह कहानी भीषण गरीबी द्वारा मानवीय संवेदनाओं और गरिमा के क्षरण की पराकाष्ठा को दिखाती है, जहाँ प्रसव पीड़ा से मरी बुधिया के कफ़न के पैसों से दोनों शराब और पूरियाँ खा जाते हैं।
ईदगाह: अनाथ बालक हामिद और उसकी बूढ़ी दादी अमीना के अगाध प्रेम की कहानी। मेले में खिलौने और मिठाइयों के बजाय दादी की उँगलियों को तवे से जलने से बचाने के लिए चिमटा खरीदना बाल-मन के अप्रतिम त्याग को दर्शाता है।
पूस की रात: गरीब किसान हल्कू और उसके वफ़ादार कुत्ते जबरा की यह कहानी भीषण ठंड, लगान और कर्ज के दबाव में खेत बर्बाद होने की बेबसी को उकेरती है।
नमक का दारोगा: मुंशी वंशीधर की अटूट सत्यनिष्ठा और भ्रष्ट पूंजीपति पंडित अलोपीदीन के घमंड को चूर करने वाली यह कथा धर्म और धन के संघर्ष का शाश्वत संदेश देती है।
पंच परमेश्वर: अलगू चौधरी और जुम्मन शेख़ की मित्रता और न्याय के सर्वोच्च आसन पर बैठकर व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर उठने की सीख।
दो बैलों की कथा: हीरा और मोती नामक दो बैलों की निष्ठा और आज़ादी की तड़प के माध्यम से मानवीय स्वतंत्रता का रूपक।
बूढ़ी काकी: संपत्ति हड़प लेने के बाद परिवार द्वारा उपेक्षित अंधी वृद्धा की दयनीय स्थिति का मर्मस्पर्शी चित्रण।
बड़े घर की बेटी: संयुक्त परिवार की मर्यादा, स्वाभिमान और आपसी सामंजस्य की कहानी।
सती: पारंपरिक समाज में नारी पर थोपे गए बंधनों, विधवापन और सम्मान के नाम पर होने वाले उत्पीड़न की तीखी आलोचना।
सादगी, मानवीय करुणा और अनीश्वरवाद: प्रेमचंद के व्यक्तित्व का क्या रहस्य था? मुंशी प्रेमचंद स्वभाव से अत्यंत सरल, हंसमुख और दिखावे से कोसों दूर रहने वाले व्यक्ति थे। वे सदैव ठेठ गंवई लिबास पहनते थे और जीवन की बड़ी से बड़ी विपत्ति का सामना मुस्कुराते हुए करते थे। मुंशी दयानारायण निगम को लिखे एक पत्र में उन्होंने सूरदास का स्मरण करते हुए लिखा था: "हमारा काम तो खूब जी-तोड़ खेलना है... पटखनी खाने के बाद धूल झाड़कर खड़े हो जाना चाहिए और कहना चाहिए कि तुम जीते हम हारे, पर हम फिर लड़ेंगे।"
उनकी मानवीय करुणा का उदाहरण उनकी पत्नी शीवरानी देवी के संस्मरण से मिलता है। एक बार कड़ाके की ठंड में प्रेमचंद को गरम सूट बनवाने के लिए दो बार 40-40 रुपये दिए गए। उन्होंने दोनों बार वे रुपये अपनी सरस्वती प्रेस के भूखे मजदूरों में बाँट दिए। पत्नी के विरोध करने पर उन्होंने सहजता से कहा: "यह कहाँ का इंसाफ़ है कि हमारी प्रेस के मजदूर भूखे मरें और हम गरम सूट पहनकर घूमें।"
जीवन भर गरीबी, अन्याय और पीड़ितों की बेबसी देखने के कारण वे पारंपरिक ईश्वरवादी नहीं रह सके। उन्होंने प्रसिद्ध लेखक जैनेंद्र कुमार को लिखा था कि "मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।" यहाँ तक कि मृत्यु से कुछ घंटे पूर्व भी उन्होंने कहा था कि "मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।"
वर्ष 1936 में गंभीर रूप से अस्वस्थ होने के बावजूद उन्होंने 'प्रगतिशील लेखक संघ' के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता की। उचित इलाज और साधनों के अभाव में 8 अक्टूबर 1936 को यह महान ज्योतिपुंज सदा के लिए बुझ गया, किंतु उनकी लेखनी आज भी शोषितों और वंचितों के अधिकारों की सबसे बुलंद आवाज़ बनी हुई है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2cn7wkkp
2. https://tinyurl.com/23p9s9r6
3. https://tinyurl.com/233x7ytw
बैक्टीरिया, प्रोटोज़ोआ, क्रोमिस्टा और शैवाल
07-09-2026 09:54 AM • Jaunpur District-Hindi
स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू में क्या है अंतर जिसे जानना है आपके लिए ज़रूरी?
हर साल इन्फ्लूएंजा यानी फ्लू दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करता है, जिसके कारण कई लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है और कई मामलों में यह जानलेवा भी साबित होता है। जब भी फ्लू के विभिन्न प्रकारों की बात होती है, तो स्वाइन फ्लू का नाम सबसे प्रमुखता से सामने आता है। यह एक ऐसा श्वसन संक्रमण है जिसने दुनिया भर के लोगों और स्वास्थ्य प्रणालियों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। हालांकि स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों ही इन्फ्लूएंजा वायरस के कारण होते हैं, लेकिन इनकी उत्पत्ति, लक्षणों की गंभीरता और प्रभावित करने के तरीके में बहुत बड़ा अंतर है। आज के समय में इन दोनों के बीच के अंतर को समझना और सही सावधानियाँ बरतना बेहद ज़रूरी है।
स्वाइन फ्लू क्या है? स्वाइन फ्लू एक प्रकार का वायरल संक्रमण है जिसे एच वन एन वन (H1N1) वायरस के नाम से भी जाना जाता है। इस बीमारी का नाम स्वाइन फ्लू इसलिए पड़ा क्योंकि यह इन्फ्लूएंजा वायरस के उस प्रकार से काफी मिलता-जुलता है जो सूअरों में श्वसन तंत्र की बीमारी का कारण बनता है। समय के साथ इस वायरस के जीन में बदलाव हुए और यह इंसानों को भी संक्रमित करने लगा। यह वायरस मुख्य रूप से श्वसन तंत्र यानी नाक, गले और फेफड़ों को अपना शिकार बनाता है। एक बहुत बड़ी गलतफहमी यह है कि स्वाइन फ्लू सूअर का मांस खाने से फैलता है, जबकि चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अच्छी तरह से पकाया गया मांस खाने से यह संक्रमण बिल्कुल नहीं होता है।
साल 2009 की स्वाइन फ्लू महामारी ने दुनिया को कैसे प्रभावित किया? अप्रैल 2009 में अमेरिका और मैक्सिको में एच वन एन वन वायरस का एक बिल्कुल नया प्रकार सामने आया था। क्योंकि यह वायरस नया था, इसलिए युवाओं और बच्चों में इसके प्रति कोई रोग प्रतिरोधक क्षमता नहीं थी। देखते ही देखते कुछ ही हफ्तों में यह वायरस दुनिया भर में फैल गया और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित कर दिया। इस महामारी ने दुनिया भर की स्वास्थ्य प्रणालियों की कड़ी परीक्षा ली।
एशियाई देशों में इस महामारी के प्रभाव ने कई कमियों को उजागर किया। जब यह संक्रमण एशिया में पहुंचा, तो हवाई अड्डों पर थर्मल स्कैनर लगाए गए और स्कूल बंद किए गए। कई देशों में होटलों को ही आइसोलेशन सेंटर बना दिया गया। हालांकि, ये बाहरी पाबंदियाँ वायरस को रोकने में बहुत ज्यादा कारगर साबित नहीं हुईं। इस दौरान अस्पतालों में वेंटिलेटर और आईसीयू बेड की भारी कमी देखी गई। ऑक्सीजन की आपूर्ति कम पड़ गई और एंटीवायरल दवाओं के वितरण को लेकर भी कई नीतियां विफल रहीं। इस महामारी ने यह सिखाया कि किसी भी आपातकालीन स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए अस्पतालों का बुनियादी ढांचा मजबूत होना और सही जानकारी का तेजी से प्रसार होना कितना जरूरी है। अगस्त 2010 में इस महामारी के खत्म होने की घोषणा की गई, लेकिन यह वायरस आज भी मौसमी फ्लू के एक प्रकार के रूप में मौजूद है।
स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू में क्या अंतर है? स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों ही इन्फ्लूएंजा वायरस से होते हैं, लेकिन इनमें कुछ मुख्य अंतर हैं। मौसमी फ्लू आमतौर पर इन्फ्लूएंजा ए, बी, सी और डी वायरस के कारण होता है और यह हर साल सर्दियों के मौसम में लौटकर आता है। मौसमी फ्लू ज्यादातर बुजुर्गों और बहुत छोटे बच्चों के लिए खतरनाक होता है। दूसरी ओर, स्वाइन फ्लू का वायरस युवाओं, गर्भवती महिलाओं और बच्चों को गंभीर रूप से अपना शिकार बनाता है। जहां मौसमी फ्लू में श्वसन संबंधी समस्याएं ज्यादा होती हैं, वहीं स्वाइन फ्लू के मरीजों में उल्टी और डायरिया जैसी पेट से जुड़ी समस्याएं अधिक देखी जाती हैं। स्वाइन फ्लू बहुत तेजी से निमोनिया और शरीर के कई अंगों के काम न करने जैसी जानलेवा स्थितियों में बदल सकता है, जबकि मौसमी फ्लू आमतौर पर एक या दो हफ्ते में ठीक हो जाता है।
स्वाइन फ्लू के प्रमुख लक्षण क्या हैं? स्वाइन फ्लू के लक्षण संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने के एक से चार दिन के भीतर नजर आने लगते हैं, जिसे ऊष्मायन अवधि कहा जाता है। इसके लक्षण आम फ्लू जैसे ही होते हैं, लेकिन कई बार ये बहुत तेजी से गंभीर हो जाते हैं। इसके प्रमुख लक्षणों में तेज बुखार आना, ठंड लगना, सूखी खांसी, गले में खराश, शरीर और मांसपेशियों में भयंकर दर्द, सिरदर्द, बहुत ज्यादा थकान और कमजोरी महसूस होना शामिल है। कई मरीजों में आंखों का लाल होना, आंखों में दर्द, बहती या बंद नाक, और छोटे बच्चों में चिड़चिड़ापन भी देखा जाता है। इसके अलावा, उल्टी आना, जी मिचलाना और डायरिया भी स्वाइन फ्लू के खास लक्षण हैं।
अगर सांस लेने में तकलीफ हो, छाती में दर्द हो, होंठ या त्वचा का रंग नीला पड़ने लगे, बहुत ज्यादा चक्कर आएं या शरीर में पानी की भारी कमी हो जाए, तो यह आपातकालीन स्थिति होती है और मरीज को तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।
यह बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में कैसे फैलती है? यह वायरस हवा और सीधे संपर्क के माध्यम से फैलता है। जब स्वाइन फ्लू से पीड़ित कोई व्यक्ति खांसता, छींकता या बात करता है, तो उसके मुंह और नाक से निकलने वाली छोटी-छोटी बूंदों के जरिए वायरस हवा में फैल जाता है। जब कोई स्वस्थ व्यक्ति उस हवा में सांस लेता है, तो वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसके अलावा, अगर कोई व्यक्ति किसी ऐसी सतह को छूता है जहां वायरस मौजूद हो, जैसे दरवाजे का हैंडल या मेज, और फिर उन्हीं हाथों से अपनी आंख, नाक या मुंह को छूता है, तो भी वह संक्रमित हो जाता है। एक संक्रमित व्यक्ति बीमारी के लक्षण दिखने से एक दिन पहले और लक्षण शुरू होने के पांच से सात दिन बाद तक दूसरों को संक्रमित कर सकता है।
स्वाइन फ्लू का सबसे ज्यादा खतरा किसे होता है? वैसे तो यह बीमारी किसी को भी हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों में इसके गंभीर होने का खतरा बहुत ज्यादा होता है। इनमें पांच साल से कम उम्र के बच्चे और पैंसठ साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग शामिल हैं। गर्भवती महिलाओं के लिए यह वायरस बहुत खतरनाक है, क्योंकि इससे गर्भपात या समय से पहले प्रसव होने का खतरा रहता है। इसके अलावा जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है, जैसे कैंसर, एचआईवी या अंग प्रत्यारोपण वाले मरीज, वे इसके आसानी से शिकार हो सकते हैं। अस्थमा, डायबिटीज, दिल की बीमारी, फेफड़ों की बीमारी और मोटापे से पीड़ित लोगों में भी इस संक्रमण के कारण जानलेवा जटिलताएं पैदा होने की संभावना बहुत अधिक होती है।
इस गंभीर बीमारी की पहचान और इलाज कैसे किया जाता है? स्वाइन फ्लू की पहचान करने के लिए डॉक्टर मरीज के लक्षणों की जांच करते हैं और रैपिड फ्लू टेस्ट या स्वैब टेस्ट की सलाह देते हैं। इस टेस्ट में नाक या गले के पिछले हिस्से से स्वैब लेकर प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा जाता है, जिससे वायरस के आरएनए की पहचान की जा सके।
इलाज के मामले में, अगर व्यक्ति स्वस्थ है और लक्षण हल्के हैं, तो उसे घर पर ही आराम करने, खूब सारा तरल पदार्थ पीने और हल्का भोजन करने की सलाह दी जाती है। बुखार और दर्द कम करने के लिए सामान्य दवाएं दी जाती हैं। हालांकि, गंभीर मरीजों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है। स्वाइन फ्लू के इलाज के लिए ओसेल्टामिविर (Oseltamivir) और ज़ानामिविर (Zanamivir) जैसी विशेष एंटीवायरल दवाएं दी जाती हैं। ये दवाएं तब सबसे ज्यादा असरदार होती हैं जब इन्हें लक्षण शुरू होने के अड़तालीस घंटे के भीतर लिया जाए। यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह एक वायरल संक्रमण है, इसलिए इसमें एंटीबायोटिक दवाएं काम नहीं करती हैं।
स्वाइन फ्लू से बचने के लिए क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए? स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों से बचने का सबसे प्रभावी तरीका बचाव और साफ-सफाई है। सबसे जरूरी कदम हर साल फ्लू का टीका यानी वैक्सीन लगवाना है। यह वैक्सीन स्वाइन फ्लू और मौसमी फ्लू दोनों के वायरस से सुरक्षा प्रदान करती है और गंभीर बीमारी या अस्पताल में भर्ती होने के खतरे को काफी हद तक कम करती है।
इसके साथ ही, अपनी दिनचर्या में अच्छी आदतों को शामिल करना चाहिए। अपने हाथों को दिन में कई बार साबुन और पानी से कम से कम बीस सेकंड तक अच्छी तरह धोएं। अगर साबुन उपलब्ध न हो, तो अल्कोहल वाले हैंड सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करें। खांसते और छींकते समय अपने मुंह और नाक को टिश्यू पेपर या अपनी कोहनी से ढकें, और इस्तेमाल किए गए टिश्यू को तुरंत कूड़ेदान में फेंक दें। अपने चेहरे, खासकर आंखों, नाक और मुंह को बार-बार छूने से बचें।
अगर कोई व्यक्ति बीमार है, तो उससे उचित दूरी बनाकर रखें और अगर आप खुद बीमार हैं, तो घर पर ही रहें ताकि दूसरों को संक्रमण न फैले। घर के उन हिस्सों और सतहों को नियमित रूप से साफ करें जिन्हें बार-बार छुआ जाता है। इसके अलावा, एक अच्छी जीवनशैली अपनाएं, जिसमें पौष्टिक आहार, नियमित व्यायाम और भरपूर नींद शामिल हो, ताकि आपके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहे। जागरूकता, सही समय पर डॉक्टरी सलाह और साफ-सफाई ही इस गंभीर बीमारी को हराने का एकमात्र मूलमंत्र है।
जौनपुर वासियों, पढ़ते हैं शिव पुराण के आख्यान व आधुनिक भौतिकी में मौजूद संबंध के बारे में
जौनपुर वासियों, क्या आप जानते हैं कि शिव पुराण, हिंदू धर्म के संस्कृत ग्रंथों की पुराण-श्रेणी के अठारह महापुराणों में से एक प्रमुख ग्रंथ है। यह शैव साहित्य-परंपरा का एक अभिन्न अंग है। यह मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की लीलाओं एवं महिमाओं को बताता है। साथ ही, इसमें समस्त देवी-देवताओं का आदरपूर्वक उल्लेख एवं वंदन किया गया है।
हिंदू साहित्य के अन्य पुराणों की भांति, शिव पुराण भी एक गतिशील ग्रंथ (जीवंत परंपरा) रहा है। इसे एक लंबी समयावधि में नियमित रूप से संपादित, पुनर्गठित एवं परिमार्जित किया गया है। शिव पुराण में यह उल्लेख मिलता है कि मूलतः इसमें बारह संहिताओं (खंडों) के अंतर्गत 1,00,000 श्लोक समाहित थे। हालांकि, इस ग्रंथ में यह भी बात कही गई है कि महर्षि वेदव्यास ने, अपने शिष्य सूत जी को इसका अध्ययन कराने से पूर्व इसे संक्षिप्त कर दिया था। इसकी वर्तमान समय में उपलब्ध पांडुलिपियां कई भिन्न-भिन्न संस्करणों और सामग्रियों में प्राप्त होती हैं। इनमें सात संहिताओं वाला एक प्रमुख संस्करण (जो मुख्यतः दक्षिण भारत में प्रचलित है) और छह संहिताओं वाला दूसरा संस्करण शामिल है। वहीं, मध्यकालीन बंगाल क्षेत्र से प्राप्त तीसरे संस्करण में संहिताएं नहीं हैं, बल्कि, यह दो वृहद खंडों में विभाजित है, जिन्हें 'पूर्व-खंड' (प्रथम भाग) और 'उत्तर-खंड' (उत्तर भाग) कहा जाता है।
शिव पुराण की सटीक रचना-तिथि और रचयिता के संबंध में कोई अंतिम ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। चूंकि पांडुलिपियों की रचना-तिथि पर रेडियोकार्बन डेटिंग (Radiocarbon Dating) जैसी तकनीकें पूर्णतः सटीक सिद्ध नहीं होतीं, अतः ग्रंथ काल-निर्धारण हेतु इसके आंतरिक साक्ष्यों और संदर्भों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। एक अनुमान के अनुसार, शिव पुराण के उपलब्ध हस्तलेखों के सबसे प्राचीन अंशों की रचना संभवतः नौवीं से ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में हुई थी। इसके अलावा, वर्तमान में प्राप्त शिव पुराण की पांडुलिपियों के कुछ अध्यायों को तेरहवीं शताब्दी के पश्चात् रचित माना जाता है।
शिव पुराण में शिव-केंद्रित सृष्टि-विज्ञान (ब्रह्मांड उत्पत्ति), देवताओं का पारस्परिक संबंध, नीतिशास्त्र, योग, तीर्थ-माहात्म्य, भक्ति-तत्व, नदियों का वर्णन, भूगोल तथा अन्य विविध विषय समाहित हैं। प्रथम सहस्त्राब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध तथा द्वितीय सहस्त्राब्दी के प्रारंभ में, शैव संप्रदायों के विविध स्वरूपों और उनके दार्शनिक सिद्धांतों को समझने के लिए, यह ग्रंथ ऐतिहासिक जानकारी का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसके प्राचीनतम अध्यायों में भक्ति भाव के साथ-साथ, अद्वैत वेदांत दर्शन का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में, ‘वायु पुराण’ को कभी-कभी शिव पुराण का नाम दिया जाता था अथवा इसे शिव पुराण का ही एक भाग माना जाता था। किंतु अधिक पांडुलिपियों की खोज के उपरांत, आधुनिक विद्वान इन दोनों ग्रंथों को पृथक मानते हैं। वायु पुराण को अधिक प्राचीन, अर्थात द्वितीय शताब्दी ईस्वी से पूर्व रचित ग्रंथ स्वीकार किया गया है। कुछ विद्वान शिव पुराण को अठारह महापुराणों की सूची में गिनते हैं, जबकि अन्य विद्वान इसे उपपुराण की श्रेणी में रखते हैं।
शिव पुराण में, सृष्टि की कथा और भगवान शिव जी का उद्भव भी वर्णित है। इसके अनुसार, सृष्टि के आरंभ से पूर्व न पृथ्वी थी, न आकाश और न ही कोई देवता। तब केवल सर्वव्यापी अंधकार (तमस) और महाशून्यता विद्यमान थी। उस अनंत शून्य में केवल शाश्वत, निराकार 'ब्रह्म' का अस्तित्व था। परम चेतना और शक्ति से परिपूर्ण ब्रह्म, अपने निर्गुण रूप में स्वयं भगवान शिव ही थे।
उस महाशून्य के मध्य से 'ज्योतिर्लिंग' नामक अग्नि और परम प्रकाश का एक अत्यंत तीव्र एवं अनंत स्तंभ प्रकट हुआ। इस स्तंभ का न कोई आदि (प्रारंभ) था और न ही कोई अंत। यह ज्योतिर्लिंग, शिव जी का मूल स्वरूप था, जो शुद्ध, असीम और निराकार ऊर्जा थी। इसी दिव्य प्रकाश से संपूर्ण ब्रह्मांड का आविर्भाव हुआ। इसी ज्योतिर्लिंग से ब्रह्मा और श्री विष्णु का उद्भव हुआ। प्रारंभ में, वे दोनों अपनी उत्पत्ति के स्रोत को लेकर भ्रमित थे और स्वयं को एक-दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने के विवाद में उलझ गए। उनके इस संशय का निवारण करने के लिए, उस ज्योति-स्तंभ से एक दिव्य आकाशवाणी हुई, जिसने ब्रह्मा जी को उस अग्नि-स्तंभ का शीर्ष और विष्णु जी को उसका आधार बताया।
तब, विष्णु जी ने वराह रूप धारण किया और वे तल की ओर गहराई में स्तंभ का आधार खोजने लगे। इसके विपरीत, ब्रह्मा जी हंस रूप धारण कर आकाश की ओर ऊपर उड़े। सहस्रों वर्षों की निरंतर खोज के पश्चात् भी, दोनों में से कोई भी उस अनंत स्तंभ का अंत न ढूंढ सके। तब विष्णु जी ने अपनी सीमा स्वीकार की और वे विनम्रतापूर्वक नतमस्तक हो गए। दूसरी तरफ, ब्रह्मा जी ने असत्य का सहारा लेकर, केतकी के पुष्प को झूठी गवाही के लिए तैयार करके, यह दावा किया कि उन्होंने ज्योतिर्लिंग का शीर्ष देख लिया है।
तभी उस ज्योतिर्लिंग के मध्य से भगवान शिव साकार रूप में प्रकट हुए, जो रूप उग्र, दिव्य और रुद्र था। उन्होंने विष्णु जी की सत्यनिष्ठा और नम्रता की सराहना की, जबकि असत्य बोलने के दंडस्वरूप, ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि भूलोक में उनकी पूजा हेतु कोई भी मंदिर समर्पित नहीं होगा। केतकी के पुष्प को भी असत्य का भागी बनने के कारण शिव-पूजा से सर्वथा वर्जित कर दिया गया। यह घटना शिव के 'निराकार' (अव्यक्त) से 'साकार' (व्यक्त) रूप में उद्भव की प्रतीक है।
तत्पश्चात, शिव जी ने ब्रह्मांडीय दायित्वों का विभाजन किया। उन्होंने विश्व की रचना हेतु ब्रह्मा जी को, उसके पालन-पोषण एवं संरक्षण हेतु विष्णु जी को, और कालचक्र के अंत में संहार हेतु स्वयं को उत्तरदायित्व दिया। इस प्रकार संपूर्ण सृष्टि-चक्र का शुभारंभ हुआ।
यदि हम शिव पुराण की कथाओं का सूक्ष्मता से अध्ययन करेंगे, तो पाएंगे कि सापेक्षता का सिद्धांत (Theory of Relativity) और क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) जैसे आधुनिक भौतिकी के गूढ़ सिद्धांत कुछ आख्यानों के माध्यम से, अत्यंत सुंदरता से अभिव्यक्त किए गए हैं। यह हमारी संस्कृति की एक अद्भुत द्वंद्वात्मक शैली रही है, जहां गूढ़ वैज्ञानिक सत्यों को कथाओं का रूप दिया गया और हर तत्व का मानवीकरण (Personification) किया गया।
किंतु समय के साथ, समाज ने इसके पीछे छिपे वैज्ञानिक मर्म को भुला दिया और केवल कथाओं को थामे रखा। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन आख्यानों को इतना अतिरंजित और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाने लगा कि वे अपनी मूल तार्किकता खोकर हास्यास्पद प्रतीत होने लगे। यदि हम इन पौराणिक कथाओं में निहित वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पुनः समझें, तो यह गूढ़ विज्ञान को जन-सामान्य तक पहुंचाने का एक अत्यंत सुंदर माध्यम सिद्ध होगा।
शिव पुराण मानव चेतना को उसके उच्चतम शिखर तक ले जाने का एक परम विज्ञान है। इसे अत्यंत मनोरम कथाओं के रूप में पिरोया गया है। योगशास्त्र को बिना किसी कथा के साथ, एक विशुद्ध विज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। परंतु यदि आप गहराई से विचार करें, तो योग और शिव पुराण एक ही सत्य के दो पहलू हैं। जिन्हें पृथक नहीं किया जा सकता। एक उन लोगों के लिए है, जो कथाओं के माध्यम से सत्य को समझते हैं, और दूसरा उन लोगों के लिए है, जो विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं। अर्थात, इन दोनों का मूल सिद्धांत एक ही है।
आजकल, शिक्षाविद् एवं वैज्ञानिक आधुनिक शिक्षण-पद्धतियों पर गहन शोध कर रहे हैं। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार, ज्ञान प्रदान करने का सरल तरीका यह है कि इसे कथाओं या खेल-खेल के माध्यम से सिखाया जाए। आधुनिक विश्व में इस दिशा में कुछ प्रयास आरंभ हुए हैं, किंतु अधिकांश शिक्षा प्रणाली आज भी अत्यधिक तनावपूर्ण एवं दमनकारी बनी हुई है। जब तक ज्ञान को एक सहज और रोचक माध्यम से न प्रदान किया जाए, तब तक सूचनाओं का भारी बोझ बुद्धिमत्ता को दबा देगा। ऐसी स्थिति में, कहानियों के माध्यम से सिखाना ही सबसे प्रभावी मार्ग है। हमारी भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से यही किया गया था, जैसा कि शिव पुराण के उदाहरण से समझा जा सकता है।
जौनपुर, जानिए अन्य देशों में कैसे मनाए जाते हैं, रक्षाबंधन जैसे खास पर्व
हम जानते हैं कि रक्षाबंधन, जिसे राखी के नाम से भी जाना जाता है, भाई-बहन के पवित्र प्रेम को समर्पित एक विशेष हिंदू त्योहार है। यह भाई और बहन के बीच के अटूट बंधन का उत्सव है, तथा दुनिया भर के अधिकांश भारतीय समुदायों में बहुत उल्लास के साथ मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन, बहनें स्नेह और शुभकामनाओं के प्रतीक के रूप में अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र यानी ‘राखी’ बाँधती हैं और उसकी लंबी उम्र व उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना करती हैं। इसके बदले में, भाई उन्हें सुंदर उपहार देते हैं और जीवनभर उनकी रक्षा करने का दृढ़ वचन देते हैं।
इस समारोह का मुख्य आकर्षण वह पल होता है, जब एक बहन अपने भाई की कलाई पर रेशमी धागा, यानी राखी बाँधती है। आजकल, राखी के अधिक विस्तृत और आधुनिक संस्करण सोने या रेशम के जटिल रूप से बुने हुए धागे हो सकते हैं, लेकिन रक्षाबंधन पर भाइयों को दी जाने वाली पारंपरिक राखी रेशम का एक ही धागा होती है। रक्षाबंधन पर विशेष पूजा-अर्चना और प्रार्थनाएँ भी की जाती हैं, क्योंकि पूरा परिवार इस उत्सव में एक साथ शामिल होता है।
माना जाता है कि राखी की यह परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन यह 16वीं शताब्दी में विशेष रूप से लोकप्रिय हुई थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रक्षाबंधन की उत्पत्ति उस प्रसंग से मानी जाती है, जब भगवान कृष्ण पतंग उड़ा रहे थे और उनकी उंगली कट गई थी। उस समय, पांडवों की पत्नी द्रौपदी उन्हें घायल देखकर इतनी व्यथित हो गईं कि उन्होंने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी खून बहती उंगली पर बाँध दिया। कृष्ण इस भाव से बहुत द्रवित हुए और हर परिस्थिति में उनकी रक्षा करने का वचन दिया। कृष्ण ने इसे ‘रक्षा सूत्र’ के रूप में स्वीकार किया था।
संस्कृत शब्द “रक्षाबंधन” का शाब्दिक अर्थ “सुरक्षा, दायित्व या देखभाल का बंधन” है। यही कारण है कि इतिहास में ऐसी तस्वीरें भी मिलती हैं, जिनमें कुछ महिलाएँ स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति, डॉ. राजेंद्र प्रसाद को “सुरक्षा, दायित्व या देखभाल के बंधन” की उम्मीद में राखी बाँध रही हैं।
भाई-बहन एक ऐसा अनूठा बंधन साझा करते हैं, जो संस्कृतियों, धर्मों और भौगोलिक सीमाओं से परे है। इस विशेष रिश्ते को दुनिया भर में विभिन्न त्योहारों के माध्यम से मनाया जाता है, जो भाइयों और बहनों के बीच के प्यार, देखभाल और जुड़ाव को उजागर करते हैं। आइए, ऐसी ही कुछ विदेशी परंपराओं का पता लगाते हैं:
1. तिहार (नेपाल): तिहार, जिसे रोशनी के त्योहार के रूप में भी जाना जाता है, नेपाल के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह पाँच दिनों तक चलता है, जिसमें प्रत्येक दिन जीवन और प्रकृति के विभिन्न पहलुओं को समर्पित होता है। तिहार का दूसरा दिन, जिसे ‘भाई टीका’ के नाम से जाना जाता है, भाइयों और बहनों के बीच के बंधन को समर्पित है। बहनें अपने भाइयों के माथे पर “टीका” (तिलक) लगाती हैं तथा उनकी लंबी उम्र और समृद्धि की प्रार्थनाओं के साथ उन्हें आशीर्वाद देती हैं। इसके बदले में भाई उन्हें उपहार देते हैं और रक्षाबंधन की भावना को दर्शाते हुए, अपनी बहनों की रक्षा करने का वादा करते हैं।
2. सिबलिंग डे – Sibling Day (संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा): हालांकि अन्य पारंपरिक त्योहारों की तरह इसे बहुत व्यापक रूप से नहीं मनाया जाता है, लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में ‘सिबलिंग डे’ भाई-बहनों के विशेष रिश्ते का सम्मान करने वाले दिन के रूप में तेजी से लोकप्रियता प्राप्त कर रहा है। हर साल 10 अप्रैल को मनाए जाने वाले इस दिन को, लोगों को संदेशों, उपहारों और साझा यादों के माध्यम से अपने भाई-बहनों की सराहना करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। हालांकि यह एक अधिक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष उत्सव है, लेकिन यह भाई-बहन के रिश्तों के सार्वभौमिक मूल्य को खूबसूरती से दर्शाता है।
3. चूसेक – Chuseok (दक्षिण कोरिया): दक्षिण कोरिया की सबसे महत्वपूर्ण छुट्टियों में से एक, ‘चूसेक’, परिवारों के लिए एक साथ आने और एक समृद्ध फसल के लिए अपने पूर्वजों को धन्यवाद देने का समय है। हालांकि यह त्योहार आम तौर पर पूरे परिवार पर केंद्रित होता है, लेकिन यह वह समय भी होता है, जब भाई-बहन एक साथ आते हैं। यह अवकाश, भव्य दावतों, पैतृक अनुष्ठानों और पारंपरिक खेलों द्वारा चिह्नित किया जाता है, जो भाई-बहनों को आपस में जुड़ने और अपनी साझा विरासत का जश्न मनाने का बेहतरीन अवसर प्रदान करता है।
4. भाई दूज (भारत और नेपाल): रक्षाबंधन के समान ही, भाई दूज भारत और नेपाल का एक अन्य प्रमुख त्योहार है, जो भाइयों और बहनों के बीच के पवित्र बंधन का जश्न मनाता है। यह पाँच दिवसीय दीवाली के त्योहार के ठीक आखिरी दिन पड़ता है।
रक्षाबंधन और भाई दूज दोनों ही भाई-बहन के प्रेम को समर्पित हैं, फिर भी इनमें निम्नलिखित अंतर हैं:
पंचांग और समय: दोनों त्योहार, एक ही दिन या एक ही महीने में नहीं मनाए जाते। रक्षाबंधन मानसून के मौसम में सावन महीने की पूर्णिमा के दिन, आमतौर पर अगस्त में आता है। दूसरी ओर, भाई दूज कार्तिक के महीने में दीवाली के दो दिन बाद मनाया जाता है। इसलिए, जहाँ रक्षाबंधन में बरसात के दिनों की भीनी-भीनी खुशबू और हरियाली होती है, वहीं भाई दूज तब आता है, जब हवा दीवाली के दीयों की रोशनी और मिठाइयों की खुशबू से भर जाती है।
अनुष्ठान की विधि: रक्षाबंधन पर, बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, उसकी खुशी के लिए प्रार्थना करती है, और बदले में उसे उपहार या आशीर्वाद दिया जाता है। इसके विपरीत, भाई दूज पर बहन अपने भाई के माथे पर चंदन या सिंदूर का एक तिलक लगाती है, जो उसकी सुरक्षा और समृद्धि का प्रतिनिधित्व करती है। फिर वह आरती करती है और उसे मिठाइयाँ खिलाती है, जिसके बदले में बहन उसे उपहार देती है।
क्षेत्रीय विविधता: भारत की विविधता इन समारोहों में और अधिक रंग भर देती है। रक्षाबंधन देश भर में लगभग हर राज्य में लोकप्रिय है। हालाँकि, भाई दूज के कई क्षेत्रीय नाम हैं। महाराष्ट्र और गोवा में इसे ‘भाऊबीज’ कहा जाता है, तो पश्चिम बंगाल में इसे ‘भाई फोंटा’ के रूप में जाना जाता है।
जब हम भाई दूज और रक्षाबंधन के बारे में सोचते हैं, तो दोनों का मूल उद्देश्य भाई-बहन के प्रेम को दर्शाना ही है, भले ही इसे अलग-अलग तरीकों से व्यक्त किया जाता हो। रक्षाबंधन मुख्य रूप से एक रक्षक के रूप में भाई की भूमिका पर ध्यान केंद्रित करता है और बहन की सुरक्षा की कामना को अपनाता है। जबकि भाई दूज अधिक संतुलित प्रतीत होता है। एक बहन के लिए एक विचारशील भाईदूज उपहार, उसे वास्तव में विशेष महसूस करा सकता है।
राग जौनपुरी के नगर से जानें, बांसुरी की मधुर धुनों ने कैसे विश्व के दिलों में बनाई जगह
जौनपुर सदियों से संगीत, साहित्य और कला की समृद्ध परंपरा का केंद्र रहा है। शर्की सल्तनत के शासनकाल में यह नगर संगीत संरक्षण और नई रचनात्मक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध हुआ। इसी काल में विकसित राग जौनपुरी आज भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रमुख रागों में गिना जाता है। संगीत की यह विरासत हमें दुनिया के अन्य संगीत रूपों को जानने के लिए भी प्रेरित करती है। पश्चिमी संगीत में भी एक अत्यंत मधुर और लोकप्रिय वाद्य है—फ्लूट या बांसुरी।
बांसुरी संसार के सबसे प्राचीन वाद्यों में से एक है। इसमें किसी तार या झिल्ली का प्रयोग नहीं होता, बल्कि वायु के कंपन से मधुर ध्वनि उत्पन्न होती है। कलाकार अपनी साँस, उँगलियों की गति और स्वर नियंत्रण के माध्यम से कोमल, शांत या तेज़ गति वाली धुनों को सहजता से प्रस्तुत कर सकता है। यही कारण है कि फ्लूट / बांसुरी पश्चिमी शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, जैज़ और फिल्म संगीत सहित अनेक विधाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
फ्लूट की विविध अभिव्यक्तियों को समझने के लिए कुछ उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ देखी जा सकती हैं। विश्वविख्यात फ्लूट वादक जेम्स गॉलवे (James Galway) की प्रस्तुति इस वाद्य की मधुरता और स्वच्छ स्वर-सौंदर्य का सुंदर उदाहरण है। वहीं इमैनुएल पह्यू (Emmanuel Pahud) अपनी तकनीकी दक्षता और भावपूर्ण प्रस्तुति के माध्यम से आधुनिक पश्चिमी फ्लूट वादन की उत्कृष्ट झलक प्रस्तुत करते हैं। भारतीय संदर्भ में पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की जॉन मैकलॉफलिन, जान गारबारेक और उस्ताद ज़ाकिर हुसैन के साथ की गई फ़्यूज़न प्रस्तुति यह दर्शाती है कि भारतीय बाँसुरी और पश्चिमी संगीत परंपराएँ मिलकर कितनी सुंदर संगीत यात्रा रच सकती हैं।
आज फ्लूट केवल किसी एक देश या संगीत परंपरा का वाद्य नहीं रह गया है। पश्चिमी कॉन्सर्ट फ्लूट और भारतीय बाँसुरी, दोनों ने अपनी-अपनी विशिष्ट पहचान के साथ विश्व संगीत को समृद्ध बनाया है। यदि आप इस वाद्य की मधुरता, तकनीकी क्षमता और भावपूर्ण अभिव्यक्ति का अनुभव करना चाहते हैं, तो ये प्रस्तुतियाँ फ्लूट की वैश्विक लोकप्रियता और इसकी संगीत यात्रा का उत्कृष्ट परिचय देती हैं।