धरती की रक्षा बिना हथियार: जौनपुर के खेतों में जीव-जगत का गुप्त योगदान
जौनपुरवासियों, हमारे चारों ओर फैले खेत, बाग़-बग़ीचे, नहरें और गाँव केवल मानव जीवन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक ऐसा संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र है, जिसे हम अनेक अन्य जीवों के साथ साझा करते हैं। इन्हीं जीवों में सांप भी शामिल हैं, जिन्हें अक्सर डर, अज्ञान और भ्रांतियों की नज़र से देखा जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि जौनपुर जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में सांप भारतीय कृषि व्यवस्था, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में एक मौन लेकिन बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज के दौर में, जब खेती, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण एक साथ कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, तब सांपों के वास्तविक महत्व को समझना और उन्हें प्रकृति के सहयोगी के रूप में देखना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।आइए समझते हैं कि, सांप कृषि के लिए कैसे फायदेमंद होते हैं। हमारे शहर में, रैट स्नेक, अजगर, कोबरा, स्पेक्टाकल्ड कोबरा और कॉमन क्रेट, जैसे विभिन्न प्रकार के सांप पाए जाते हैं। ये सांप कृषि के लिए उपयोगी हैं, क्योंकि, ये फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले चूहों की आबादी को नियंत्रित करते हैं। सांप कीटों को भी खाते हैं, जिससे, फसलों की रक्षा होती है। हालांकि, कई क्षेत्रों में सांपों को मार दिया जाता है, क्योंकि, लोग सोचते हैं कि वे मनुष्यों के लिए हानिकारक हैं। परंतु, केवल 25% सांप ही जहरीले होते हैं, और मनुष्यों के लिए ख़तरा पैदा कर सकते हैं। सांप हमारे पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, और आर्थिक और चिकित्सीय लाभ प्रदान करते हैं। स्वस्थ समाज बनाने के लिए, जैव विविधता में सांपों के महत्व को जानना अतः आवश्यक है।भारत के अधिकांश क्षेत्रों में, रैट स्नेक (Rat snakes) सबसे आम सांप हैं। एक वयस्क रैट सांप की लंबाई, लगभग तीन मीटर से अधिक होती है। आपको, यह देखकर अक्सर ही आश्चर्य होता होगा कि, किसी सांप ने रेंगते हुए पूरी सड़क की चौड़ाई को नाप लिया हैं। इस सांप की अन्य अनूठी विशेषता, इसकी बड़ी आंखें हैं, जो इसके सिर की चौड़ाई तक फैली हुई होती हैं। उनके भीतर एक अद्भुत चमक के साथ, गोल व काली पुतलियां होती हैं। इसके होठों पर चित्रित ऊबड़-खाबड़ काली रेखाओं पर भी हमारा ध्यान जाता हैं। दरअसल, सांपों को मोटे तौर पर, ‘जहरीले’ और ‘गैर-जहरीले’ श्रेणी में वर्गीकृत किया जा सकता है। हालांकि, कहा जाता है कि, दुनिया भर में सांपों की लगभग 3,500 प्रजातियां पाई जाती हैं। लेकिन, उनमें से बमुश्किल लगभग 25% प्रजातियां ही जहरीली होती हैं।विषैले सांपों में किंग कोबरा (ओफियोफैगस हन्ना – Ophiophagus Hannah) सबसे घातक है। यह अधिकतर पहाड़ी इलाकों तक ही सीमित है। यह एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगा सकता है, और अपना जहर हवा में छोड़ सकता है। अगर किसी व्यक्ति की आंखों में, किंग कोबरा का जहर चला जाए, तो वह अंधा भी हो सकता है। वे आम तौर पर मानव निवास से बचते हैं। परंतु, यह केवल मनुष्य ही हैं, जो शहरों और कस्बों के विस्तार के साथ-साथ सांपों के आवासों पर आक्रमण करते हैं, और सरीसृपों को दोष देते हैं।जबकि, कोबरा (नाजा नाजा – Naja Naja) मानव बस्तियों के पास रहता है। वे धान के खेतों में मौजूद चूहों को खाते हैं, और उनकी फसल बचाते हैं। अन्य जहरीले सांपों में, वाइपर (Viper) शामिल है, जिसके, शरीर पर अंडाकार या हीरे के आकार के धब्बे होते हैं। इसका जहर रक्त के थक्के और मांसपेशियों के क्षय का कारण बन सकता है। एक तरफ़, क्रेट (Krait), क्षैतिज सफेद या पीली धारी वाला एक अन्य जहरीला सांप है। क्रेट कीड़ों को खाते हैं, और कीटों को नियंत्रित करते हैं।वास्तव में, सांप देवता के रूप में भी, विभिन्न संस्कृतियों में पूजनीय हैं। उन्हें प्रजनन क्षमता, पुनर्जन्म, चिकित्सा, उपचार और समृद्धि के प्रतीक के रूप में जाना जाता हैं। विरोधाभासी रूप से, ओफिडियोफोबिया (Ophidiophobia) अर्थात, सांपों का डर, जानवरों के सबसे आम भय में से एक है। यह 2-3% मानव आबादी को प्रभावित करता है। इसलिए, सर्पदंश के डर से अक्सर सांपों को देखते ही मार दिया जाता है।हालांकि, दुनिया भर में सांपों की लगभग 85-90% प्रजातियां गैर-जहरीली हैं। अधिकांश सांप स्वभाव से आक्रामक नहीं होते हैं, और अक्सर खुद के बचाव में या धमकी दिए जाने या उकसाए जाने पर काटते हैं। सांपों को मारना समस्याग्रस्त है। क्योंकि, उनकी घटती आबादी न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि मनुष्यों के लिए भी हानिकारक है।शिकारी के रूप में सांप, मेंढकों, कीड़ों, चूहों और अन्य कृंतकों को खाते हैं, जिससे उनकी आबादी को नियंत्रण में रखने में मदद मिलती है। सांपों को अन्य प्रजातियां भी खाती हैं, इस प्रकार वे शिकार के रूप में खाद्य-श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।‘पारिस्थितिकी तंत्र-अभियंता’ के रूप में, सांप ‘द्वितीयक बीज फैलाव’ की सुविधा प्रदान करते हुए, पौधों के प्रजनन में योगदान देते हैं। जब सांप कृंतकों (जो बीज खाते हैं) को निगलते हैं, तो उनके मल के माध्यम से बीज उत्सर्जन होता हैं। इस प्रकार, बीज पर्यावरण में अक्षुण्ण तरीके से निष्कासित हो जाते हैं।सांप बीमारियों की रोकथाम में भी भूमिका निभाते हैं, और कृषि समुदायों को लाभ पहुंचाते हैं। कृंतक कई पशुजन्य रोगों के वाहक होते हैं, जो मनुष्यों, कुत्तों, मवेशियों, भेड़ और अन्य घरेलू जानवरों को प्रभावित करते हैं। कृंतकों की आबादी में अचानक वृद्धि से, पशुजन्य रोगों का प्रकोप हो सकता है। उनकी अधिक आबादी फसलों को भी प्रभावित कर सकती है। अतः कृंतकों को खाकर, सांप कृंतकों की आबादी को नियंत्रण में रखते हैं, इस प्रकार पशुजन्य रोग के संचरण को रोकते हैं, और खाद्य सुरक्षा में योगदान करते हैं।सांप कई औषधियों का भी स्रोत होते हैं। सर्पदंश के लिए एकमात्र सिद्ध और प्रभावी उपचार - सांप-विरोधी जहर या एंटी वेनम (Anti venom) भी सांपों के जहर से प्राप्त होता है। सांप के जहर का, विरोधी - जहर उत्पादन से परे चिकित्सीय महत्व है। उनसे प्राप्त कई दवाओं का उपयोग नैदानिक अभ्यास में किया जाता है।एक तरफ, हमारे गंगा नदी के क्षेत्र में, निम्नलिखित मुख्य सांप पाए जाते हैं।1.एनहाइड्रिस सीबोल्डी (Enhydris sieboldii)2.ज़ेनोक्रोफ़िस पिस्केटर (Xenochrophis piscator)3.एक्स. पिस्केटर (X. piscator)4.डेंड्रेलाफिस ट्रिस्टिस (Dendrelaphis tristis)5.ओलिगोडोन अर्नेंसिस (Oligodon arnensis)6.सैम्मोफिस कोंडानारस (Psammophis condanarus)7.एम्फिस्मा स्टोलैटम (Amphiesma stolatum)8.लाइकोडोन ऑलिकस (Lycodon aulicus)9.बंगारस कैर्यूलस (Bungarus caeruleus)10.नाजा कौठिया (Naja kaouthia)11.नाजा नाजा (Naja Naja)12.एरिक्स जॉनी (Eryx johnii)13.पायथन मोलुरस (Python molurus) संदर्भ-https://tinyurl.com/47tsjc5bhttps://tinyurl.com/22ykxp4ehttps://tinyurl.com/mvft5fj3https://tinyurl.com/3w6ndu9x
मछलियाँ और उभयचर
सूशी का बढ़ता चलन और समुद्री मछलियों के अस्तित्व पर गहराता संकट
जौनपुरवासियों, आज की तेज़ी से बदलती जीवनशैली में हमारे खान-पान के तरीके भी तेजी से बदल रहे हैं। कभी जो विदेशी व्यंजन केवल बड़े होटलों तक सीमित थे, आज वे ऑनलाइन डिलीवरी ऐप्स और कैफे संस्कृति के ज़रिये जौनपुर जैसे शहरों तक पहुँच चुके हैं। इन्हीं में से एक है जापानी व्यंजन सूशी, जो अब केवल लग्ज़री नहीं बल्कि ट्रेंडिंग फ़ास्ट फ़ूड बन चुका है। युवा पीढ़ी से लेकर फूड लवर्स तक, हर कोई इसके स्वाद और प्रेज़ेंटेशन का दीवाना होता जा रहा है। लेकिन इसके साथ एक गंभीर सवाल भी जुड़ा है — क्या सूशी की बढ़ती लोकप्रियता समुद्री मछलियों को विलुप्ति की ओर तो नहीं ले जा रही? यह लेख इसी स्वाद और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को समझाने का प्रयास करता है। आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2019 से सूशी (Sushi) के ऑर्डर (order) में करीब 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। गुवाहाटी और लुधियाना जैसे छोटे शहरों से भी इसकी काफी मांग दर्ज की गई है। जापानी व्यंजन सूशी को, चावल, जिन्हें वेजीटेबल (Vegetable), सैल्मन और टूना मछली (salmon and tuna) और फलों के साथ भी परोसा जाता है, भारत में इसके काफी प्रशंसक है, विशेष रूप से दिल्ली में, और हाल ही में एक ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म स्विगी (Swiggy) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण ने इसकी पुष्टि की है।सूशी के विकास का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसकी शुरुआत प्राचीन चीन (china) से हुई थी। मछली को लम्बे समय तक संरक्षित रखने के लिए सूशी के प्रारंभिक स्वरूप का जन्म हुआ।मछली को ताजा रखने के लिए, इसे चावल के साथ किण्वित किया जाता था और बाद में चावल को त्याग दिया गया और मछली का सेवन कर लिया जाता। इस प्रकिया ने जापान में भी अपना रास्ता बना लिया, जहां लोगों ने मछली के साथ चावल खाना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे कुछ संशोधनों के साथ सूशी का जन्म हुआ। यह जल्द ही जापानियों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गया और उन्होंने इसे एकदम सही बनाने के लिए सीज़निंग और सिरके (seasonings and vinegar) के साथ इसे पकाना शुरू कर दिया। सूशी व्यापक रूप से खाए जाने वाले फास्ट फूड के रूप में उभरी जो जापानी संस्कृति और परंपरा से दृढ़ता से जुड़ा हुआ है। अब, आधुनिक समय में, सूशी एक विश्व स्तर पर पसंद किया जाने वाला फास्ट फूड बन गया है, जिसे दुनिया भर में विभिन्न लोगों द्वारा अलग-अलग तरीके से खाया जाता है।वर्तमान में भारत में भी सूशी काफी लोकप्रिय है, परन्तु पहले भारतीयों के लिए यह इतनी स्वादिष्ट या सुलभ नहीं थी, जिसे ज्यादातर महंगे पांच सितारा होटलों में ही परोसा जाता था। हालांकि, बदलते समय में जापानी व्यंजनों की लोकप्रियता में वृद्धि के साथ सूशी में भी कई बदलाव हुए, विशेष रूप से शाकाहारी लोगों के लिए विभिन्न सामग्रियों के साथ सूशी की शुरूआत हुई, कई बदलाव भारतीयों के स्वाद अनुसार किये गए जिससे भारतीयों के बीच इस जापानी व्यंजन ने अपनी एक ख़ास जगह बना ली।वर्तमान समय में भारत में आपको होटलो के मेन्यू में 15 तरह की सूशी देखने को मिल जाएंगी जिन्हे भारतीय स्वाद को ध्यान में रखते हुए विभिन्न सामग्रियों और टॉपिंग के साथ नए प्रकार से बनाया जाता है। भारत में सूशी की खपत और दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में बहुत अलग है, क्योंकि अच्छी गुणवत्ता वाली सूशी को उच्च कीमत के साथ जोड़ा जाता है। दुनिया भर में सूशी महंगी है जिसके तीन मुख्य कारण है: पहला, उत्पाद की गुणवत्ता; दूसरा, शेफ (chef) के कौशल का स्तर और तीसरा, मछली जिसे कम तापमान में रखने के लिए आवश्यक उपकरणों को खरीदने और चलाने में पैसा लगता है। जापान विदेश व्यापार संगठन की रिपोर्ट कहती है कि भारत में लगभग 100 रेस्तरां (restaurant) हैं जो मुख्य रूप से जापानी व्यंजन परोसते हैं।आप जानते हैं कि नई दिल्ली में “टोक्यो”, भारत का पहला जापानी रेस्तरां था? यह 1989 में भारत पर्यटन विकास निगम की मदद से भारत में जापानी व्यंजनों के लिए खोला गया था। हालांकि, ताजी मछली और मुख्य सामग्री की कमी की शिकायतों के कारण इसे बंद कर दिया गया। “सकुरा”, वर्ष 2000 में कनॉट प्लेस के मेट्रोपॉलिटन में खुलने वाला अगला होटल था। इसके बाद तो जैसे झड़ी ही लग गई जापानी रेस्तरां की! मुंबई में त्सुबाकी (Tsubaki), ताकी- ताकी (Taki-Taki), वाकाई(Wakai); नई दिल्ली में हाराजुकु कैफे (Harajuku Cafe) और मेन्शो टोक्यो (Mensho Tokyo), गोवा में मकुत्सु (Makutsu), इज़ुमी (Izumi’s) और कोफुकु का नया आउटलेट (Kofuku’s new outlet); और चेन्नई में ओयामा (Oyama), कुछ नाम जो शीर्ष पर है और ये एक वर्ष के भीतर ही बने हैं। वर्तमान में जापानी रेस्तरां भी शाकाहारियों के लिए सूशी परोसते हैं, अब यह व्यंजन सभी का पसंदीदा बन गया है। यह रेस्तरां उन लोगों के स्वाद का भी ध्यान रखते हैं जो कच्चा मांस पसंद नहीं करते हैं।सैल्मन का उपयोग न केवल सूशी बल्कि कई व्यजनों में किया जा रहा है। अब 'अमृतसारी तवा सैल्मन' और 'बंगाली दही सरसों सामन' जैसे भारतीय संस्करणों में उत्तरी अटलांटिक (North Atlantic) और प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की सहायक नदियों के मूल निवासी सैल्मन का स्वाद ले सकते हैं। 2015 में सैल्मन की भारतीय खपत लगभग 450 टन थी, परन्तु यह धीरे-धीरे बढ़ रही है, देश में हर साल लगभग 9.2 मिलियन टन समुद्री भोजन की खपत होती है, जिसमें से आधा हिस्सा हिंद महासागर से आता है और शेष ताजे पानी के जलीय कृषि से आता है। भारत में आयातित समुद्री भोजन की दीर्घकालिक संभावना है।हालांकि, भारत में सैल्मन के बारे में किसी को भी कोई ख़ास जानकारी नहीं है फिर भी ये मछली यहाँ बड़े चाव\खाई जाती है, यह ठंडे पानी की मछली है जो समुद्र के पानी में 4 से 15 डिग्री सेल्सियस के बीच रहती है। इसलिए, अधिकांश सैल्मन फार्म उत्तरी गोलार्ध में हैं। इस मछली को खाने से रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद मिल सकती है। इसमें मौजूद फैटी एसिड हृदय के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होते है। इन्ही लाभों के कारण इसकी मांग साल दरसाल बढ़ती ही जा रही है।उत्तरी अमेरिका (North America), यूरोप (Europe) और एशिया (Asia) में सूशी और डिब्बाबंद टूना मछली की मांग से हिंद महासागर में तेजी से येलोफिन (yellowfin) टूना खत्म हो रही है। पर्यावरणविदों का कहना है कि अधिक मछली पकड़ने से टूना के विलुप्त होने का खतरा है। इनकी आबादी इतनी कम हो गई है की प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (The International Union for Conservation of Nature) की "लाल सूची" में इसकी कई प्रजातियों को रखा गया हैं। मछलियों को प्रजनन करने से पहले ही मार या पकड़ लिया जाता है, जिसका अर्थ है कि वे विलुप्त होने की ओर बढ़ रहे हैं।लंदन स्थित ब्लू मरीन फाउंडेशन (Blue Marine Foundation-BLUE) एडवोकेसी ग्रुप (advocacy group) के अनुसार, इन मछलियों को वैश्विक स्तर पर लगभग 450,000 मीट्रिक टन के करीब सालाना पकड़ा जाता है। फ्रांसीसी (French) और स्पैनिश (Spanish) भी मछली पकड़ने के बेड़े में "पर्स सीन" (purse seine) जैसे औद्योगिक तरीकों का उपयोग करते हुए विशाल जाल के साथ अधिकांश मछली लेते हैं, जो अक्सर किशोर पीले फिन का शिकार करते हैं। मछली पकड़ना समुद्री जीवों के आबादी में गिरावट लाने का एक महत्वपूर्ण कारण है। मछली की शिकार करना कोई बुरी बात नहीं है, पर यह जब बड़े बड़े जहाजों द्वारा तेजी से पकड़ी जाती है, तो इसे ओवेर फिशिंग (Over Fishing) कहा जाता है। अरबों लोग प्रोटीन के लिए मछली पर निर्भर होते है। मछली पकड़ना मुख्य रूप से लोगों का व्ययसाय होता है और लाखो लोगों का यह आजीविका का साधन है।ओवेर फिशिंग मतलब एक हद से ज्यादा मछली को पकड़ना है। इससे प्रजनन करने वाली आबादी ठीक होने के लिए बहुत कम हो जाती है। इसके लिए ख़राब मत्स्य प्रबंधन, मछली पकड़ने की अस्थिरता, आर्थिक जरूरतों के साथ-साथ अवैधता को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। इसके प्रभावों में समुद्री जीवन असंतुलन, आय की हानि, और लुप्तप्राय समुद्री प्रजातियों की कटाई शामिल है, और यह दुनिया के महासागर और समुद्री जीवन को अनकहा नुकसान पहुंचा रहा है।संदर्भ:https://bit.ly/3xEeUlq https://bit.ly/3zWEWTJ https://bit.ly/3tWlYJ3
शहरीकरण - नगर/ऊर्जा
मिट्टी के तेल की रोशनी: केरोसिन का आविष्कार, वैश्विक यात्रा और भारत में बदलती भूमिका
दैनिक जीवन के विभिन्न कार्यों को करने के लिए हमें ऊर्जा की आवश्यकता होती है। विद्युत ऊर्जा और ईंधन ऊर्जा हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, जो हमें विभिन्न नवीकरणीय और गैर नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त होती है। वर्तमान समय में इनके बिना जीवन की कल्पना करना असंभव प्रतीत होता है। एक समय ऐसा था जब विद्युत ऊर्जा या ईंधन ऊर्जा के लिए मनुष्य मिट्टी के तेल अर्थात केरोसिन (Kerosene) पर निर्भर था। तो आइए, आज इस लेख के जरिए केरोसिन के आविष्कार तथा इसकी उपयोगिता के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।मिट्टी का तेल अर्थात केरोसिन, जिसे पैराफिन (Paraffin) के नाम से भी जाना जाता है, एक दहनशील हाइड्रोकार्बन तरल (hydrocarbon liquid) है, जिसे पेट्रोलियम (Petroleum) से प्राप्त किया जाता है। केरोसिन का उपयोग हवा में उड़ने वाले विमानों के साथ-साथ घरों में ईंधन के रूप में व्यापक रूप से किया जाता है। केरोसिन शब्द “ग्रीक” (Greek) भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है "मोम”। केरोसिन शब्द का उपयोग अर्जेंटीना (Argentina), ऑस्ट्रेलिया (Australia), कनाडा (Canada), भारत, न्यूजीलैंड (New Zealand), नाइजीरिया (Nigeria) और संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) के अधिकांश हिस्सों में किया जाता है, जबकि चिली (Chile), पूर्वी अफ्रीका (Eastern Africa), दक्षिण अफ़्रीका (South Africa), नॉर्वे (Norway) और यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) में केरोसिन को पैराफिन के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा एशिया (Asia) और दक्षिणपूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिकांश हिस्सों में केरोसिन को लैंप ऑयल (Lamp Oil) के नाम से जाना जाता है।केरोसिन के बारे में एक अवधारणा है कि यह पेट्रोलियम से प्राप्त होता है किंतु सबसे पहले केरोसिन का आविष्कार पेट्रोलियम से नहीं, बल्कि कोयले का आसवन करके किया गया था तथा इसका पहला बड़ा अनुप्रयोग खाना पकाने के ईंधन के रूप में नहीं, बल्कि लैंप जलाने के लिए (बिजली के आविष्कार से पहले) किया गया।तेल के लैंप का उपयोग सदियों से किया जाता रहा है, सबसे पहले खोजे गए लैंप 9वीं शताब्दी के फारस (Persia) के हैं। ऐतिहासिक रूप से ये लैंप वनस्पति तेल, मनुष्य या पशु वसा से जलाए जाते थे। 1700 और 1800 के दशक की शुरुआत में, लैंप जलाने के लिए व्हेल के तेल का उपयोग किया जाता था । लेकिन फिर 1846 में जब कनाडा (Canada) के प्रसिद्ध भूविज्ञानी और आविष्कारक अब्राहम गेस्नर (Abraham Gesner) बिटुमिनस कोयले (Bituminous coal) और तेल शेल (Oil shale) का आसवन कर रहे थे, तब उन्हें एक महत्वपूर्ण पदार्थ प्राप्त हुआ जिसे केरोसिन नाम दिया गया। केरोसिन पारंपरिक तेल के लैंप को रोशन करने के लिए इस्तेमाल होने पर एक चमकदार लौ पैदा करता था जिससे इसका उपयोग व्यापक हो गया। केरोसिन के आविष्कार के बाद 1854 में इसका व्यावसायिक उत्पादन शुरू हुआ। इसका उपयोग व्यापक रूप से विमान के जेट इंजनों और कुछ रॉकेट इंजनों को रॉकेट प्रोपेलेंट-1 या रिफाइंड पेट्रोलियम-1 (Rocket Propellant-1 or Refined Petroleum-1 (RP-1) के रूप में ऊर्जा देने के लिए किया जाता है। इसके अलावा इसका उपयोग आमतौर पर खाना पकाने के लिए और प्रकाश ईंधन के रूप में भी किया जाता है। एशिया के कुछ हिस्सों में केरोसिन का उपयोग छोटी आउटबोर्ड मोटरों (Outboard motors) या मोटरसाइकिलों के लिए ईंधन के रूप में किया जाता है। ऐसा अनुमान है कि पूरे विश्व में विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रति दिन लगभग 1,110,000 घन मीटर केरोसिन का उपयोग होता है। केरोसिन की खोज के बाद कई दैनिक गतिविधियां बहुत आसान बन गईं। उद्योगों और घरों में इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाने लगा। विभिन्न उद्योग बिजली पैदा करने और ईंधन के रूप में केरोसिन का उपयोग करने लगे तथा लोगों ने दीयों या लैंपों को जलाने और खाना पकाने के लिए केरोसिन का उपयोग शुरू कर दिया।प्रारंभ में केरोसिन बहुत महंगा था, लेकिन जब शोध से पता चला कि केरोसिन को पेट्रोलियम से भी परिष्कृत किया जा सकता है, तो केरोसिन के उपयोग में वृद्धि होने लगी। ऐसा अनुमान है कि 1860 तक अमेरिका में केरोसिन का उत्पादन करने वाली रिफाइनरियों की संख्या 30 के आस-पास हो गई । जिससे धीरे-धीरे केरोसिन के दाम में गिरावट होने लगे । 1850 के दशक के उत्तरार्ध में केरोसिन से जलने वाले लैंपों की मांग में अत्यधिक बढ़ोतरी हुई। 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के दौरान केरोसिन की सहायता से जलने वाले लैंपों का उपयोग घर, खुदरा प्रतिष्ठान, चिकित्सा कार्यालय, अस्पताल, कारखानें इत्यादि लगभग हर जगह किया जाने लगा। एक समय तो ऐसा भी था जब शहरों की कानून व्यवस्था की देखभाल करने वाली पुलिस भी प्रकाश व्यवस्था के लिए पूरी तरह से केरोसिन पर निर्भर थी। इसके अलावा ट्रेनों के लिए इनडोर लाइटिंग (Indoor lighting), हेडलैम्प्स (Headlamps) और सिग्नलिंग उपकरणों (Signaling devices) में भी केरोसिन का उपयोग किया जाने लगा। केरोसिन का आविष्कार कृषि में भी सहायक बना क्योंकि अब किसान घंटों तक अपने खेतों में काम कर सकते थे, परिणामस्वरूप उनकी उपज में वृद्धि हुई। विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी केरोसिन का उपयोग किया जाने लगा, यहां तक कि सिर के जूँ को मारने के लिए भी केरोसिन उपयोगी हो गया।1879 में एक विश्वसनीय, व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य इलेक्ट्रिक लाइट बल्ब के आविष्कार के साथ केरोसिन से जलने वाले लैंपों या दीयों के उपयोग में गिरावट आने लगी। हालांकि, 1940 के दशक तक भी कुछ समुदाय केरोसिन से जलने वाले लैंपों का उपयोग कर रहे थे। आज अधिकांश देशों, विशेष रूप से, उत्तरी अमेरिका में केरोसिन को एक सुखद स्मृति के रूप में याद किया जाता है, जो उन्हें पुराने अच्छे दिनों की याद दिलाता है। कुछ विकासशील देशों जैसे नाइजीरिया (Nigeria) में अनुमानित 90 प्रतिशत घर अभी भी खाना पकाने, प्रकाश आदि के लिए केरोसिन पर निर्भर हैं।भारत में केरोसीन को सबसे पहले अलाप्पुझा स्थित मैसर्स अर्नोल्ड चेनी एंड कंपनी ऑफ न्यूयॉर्क (M/s Arnold Cheney and Co of New York) और बाद में मैसर्स रिप्ले और मैके (M/s Ripley and Mackay) द्वारा त्रावणकोर में आयात किया गया था। इसके बाद बर्मा-शेल (Burma Shell) कंपनी ने 1928 में केरोसिन का आयात और विपणन किया। भारत में केरोसिन में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की शुरुआत करीब 80 से 90 साल पहले हुई थी। अमेरिकियों ने भारत में केरोसिन का एक बड़ा बाजार देखा और इस प्रकार भारत में 5 जुलाई 1952 को 'ईएसएसओ' (ESSO) कंपनी एक नए नाम 'स्टैंडर्ड वैक्यूम रिफाइनिंग कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड' (Standard Vacuum Refining Company of India Limited) के साथ स्थापित की गई। बर्मा शेल (Burma Shell) कंपनी ने भारत में केरोसिन की खोज की, जिससे भारत में केरोसिन का उपयोग अधिक व्यापक हो गया । परिणामस्वरूप, भारत इस तरल पदार्थ पर काफी निर्भर हो गया। घरों में इस्तेमाल होने वाले लैंप और लालटेन केरोसिन से जलाए जाने लगे, गाड़ियाँ, मोटरसाइकिलें और यहाँ तक कि पंखे भी केरोसिन की मदद से चलाए जाने लगे। केरोसिन ने कई अन्य उद्योगों को भी जन्म दिया, जैसे लैंप में इस्तेमाल होने वाले रेशम के आवरण तथा केरोसिन के इस्तेमाल से उपयोग की जाने वाली इस्त्री आदि। भारत में केरोसिन दैनिक जीवन का इतना महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया कि इसे राशन की दुकानों में बेचा जाने लगा। हालांकि, आज विद्युत या बिजली ने केरोसिन का स्थान ले लिया है, जो आज सबसे दूरस्थ स्थानों तक भी पहुंच गई है। जिस केरोसिन से कभी बाइक और कारें चलती थीं, वह बिजली के आविष्कार के बाद से अप्रचलित हो गई। स्वच्छ और अधिक परिष्कृत ईंधन उपलब्ध होने के कारण केरोसिन पर लोगों की निर्भरता कम हो गई।संदर्भ:https://tinyurl.com/y2emjxnchttps://tinyurl.com/2zyd326vhttps://tinyurl.com/mr2mdh5nhttps://tinyurl.com/dpvd43chhttps://tinyurl.com/28ytcytj
स्तनधारी
जौनपुरवासियों, जानिए दूध के पौष्टिक रहस्य और मानव सभ्यता में उसकी अमूल्य भूमिका
हमारी भारतीय संस्कृति में दूध को पार्यप्त आहार माना गया है। पार्यप्त आहार होने का यह तर्क यूं ही नहीं दिया गया, बल्कि इसके पीछे एक ठोस आधार है। दरसअल दूध को शरीर के समुचित विकास के लिए सबसे आदर्श आहार माना गया है। क्यों की इसमें शरीर के लिए सभी बेहद ज़रूरी पोषक तत्व जैसे, कैल्शियम (calcium), फास्फोरस (phosphorus), विटामिन बी (B vitamins), पोटेशियम (potassium) और विटामिन डी (vitamin D) के साथ ही प्रोटीन आदि प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अलावा इसमें कई एंजाइम और कुछ जीवित रक्त कोशिकाएं भी हो सकती हैं। इंटरनेशनल डेयरी जर्नल (International Dairy Journal) के द्वारा किये गए एक शोध से यह बात साबित हो चुकी है कि दूध न पीने वाले लोगों की तुलना में, रोजाना कम से कम एक ग्लास दूध पीने वाले लोग हमेशा मानसिक और बौद्धिक तौर पर बेहतर स्थिति में होते हैं।मनुष्य अथवा जानवरों का नवजात शिशु तब तक दूध पर निर्भर रहता है, जब तक वह अन्य पदार्थों का सेवन करने में अक्षम होता है। जिसे वह अपनी माता से प्राप्त करता है। साधारणतया दूध में 85 प्रतिशत जल होता है, और शेष भाग में ठोस तत्व यानी खनिज व वसा होता है। गाय-भैंस के अलावा बाज़ारों में विभिन्न कंपनियों का डिब्बा बंद दूध भी उपलब्ध हो जाता है। मनुष्य ने सबसे पहले नियमित रूप से अन्य स्तनधारियों के दूध का सेवन करना नवपाषाण क्रांति या कृषि के विकास के दौरान सीखा, जब उनसे जानवरों पालतू बनाना शुरू किया।दूध पीने की शुरुआत मेसोपोटामिया (Mesopotamia) में 9000–7000 ईसा पूर्व से अमेरिका (Americas) में 3500–3000 ईसा पूर्व के बीच हुई। दक्षिण पश्चिम एशिया में सबसे पहले भेड़ और बकरियों को पालतू बनाया गया और दूध प्राप्त किया गया। प्रारंभ में जानवरों को मांस के लिए रखा जाता था, और डेयरी उद्योग, बालों और श्रम के लिए घरेलू पशुओं का इस्तेमाल चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में बहुत बाद में शुरू हुआ। लगभग 7000 ईसा पूर्व तक दूध देने वाले घरेलु जानवर दक्षिण पश्चिम एशिया से यूरोप में फैल गए। अफ्रीका में भी भेड़ और बकरियों को दक्षिण पश्चिम एशिया से लाया गया, लेकिन अफ्रीकी मवेशियों को लगभग 7000-6000 ईसा पूर्व स्वतंत्र रूप से पालतू बनाया गया। चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक पालतू ऊंटों को मध्य अरब, उत्तरी अफ्रीका और अरब प्रायद्वीप में डेयरी जानवरों के रूप में भी इस्तेमाल किया जाने लगा। मध्य युग के दौरान दूध को "पुण्य सफेद शराब (virtuous white wine)" कहा जाता था, क्योंकि शराब पीने के लिए पानी की तुलना में अधिक सुरक्षित थी।10,000 वर्ष पूर्व प्रारंभिक मनुष्यों ने जंगली जानवरों को अपने बच्चों को पालते हुए देखा जैसे वे अपने बच्चों को पालते थे। जिसके बाद मनुष्य ने बकरियों और ऑरोच (गाय की पैतृक नस्लों) को पकड़कर दूध को मिट्टी के बर्तनों में इकट्ठा करना शुरू कर दिया । वे भी जल्द ही समझ गए थे की अन्य जानवरों का दूध एक संपूर्ण, पौष्टिक भोजन है। वैज्ञानिकों के पास इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि मनुष्यों ने कम से कम 10,000 साल पहले जानवरों का कच्चा दूध पीना शुरू किया था। प्राचीन शिशु बोतलें इस बात का प्रमाण देती हैं, कि कम से कम 8,000 साल पहले जानवरों के दूध का इस्तेमाल मानव शिशुओं को पिलाने के लिए शरू कर दिया था। दूसरे जानवरों का दूध पिलाने की यह संस्कृति इतनी लोकप्रिय हुई की अगले कुछ हज़ार वर्षों में ही भूमध्यसागरीय क्षेत्र, यूरोप, एशिया और मध्य पूर्व में फैल गईं। मानव इतिहास में, ऊंट, गाय, बकरी, भेड़, गधे, घोड़े, जल भैंस, हिरन और अन्य स्तनधारियों सहित कई प्रजातियों का उपयोग उनके दूध के लिए किया गया है।दूध के प्रचलित होने से अब लोगों को अब अपना अधिकांश समय भोजन प्राप्त करने में खर्च नहीं करना पड़ता था, और इसके बजाय वे कस्बों के विकास के लिए अपनी मस्तिष्क शक्ति का उपयोग कर सकते थे। जिसके बाद पालतू जानवर उच्च मूल्य की संपत्ति बन गए। जैसे-जैसे सभ्यता आगे बढ़ी, दूध देने वाले स्तनधारियों के मालिक अमीर बन गए और समुदायों के लिए भोजन का स्रोत बन गए। कच्चे दूध ने मनुष्यों को ऐसी परिस्थितियों में भी पनपने में सहायता की , जहां जीवित रहना मुश्किल होता। दूध ने मानव को भोजन की स्थिर आपूर्ति के साथ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रवास और प्रसार करने की अनुमति दी।आज भारत में, डेयरी क्षेत्र देश के सामाजिक-आर्थिक और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। डेयरी उद्योग गांवों में लाखों घरों को आजीविका प्रदान करता है तथा शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में लोगों को गुणवत्तापूर्ण दूध और दूध उत्पादों की आपूर्ति सुनिश्चित करता है।वैश्विक दुग्ध उत्पादन में भारत प्रथम स्थान पर है, जो 1990-1991 के 53.9 मिलियन टन से बढ़कर 2012- 13 में 127.9 मिलियन टन हो गया है। यह क्षेत्र भारत की राष्ट्रीय आय का लगभग एक चौथाई योगदान देता है, और कृषि में लगे कुल कर्मचारियों की संख्या लगभग 60 प्रतिशत है। भारत 21वीं सदी के मेगा डेयरी बाजार के रूप में उभर रहा है। यह देश में ग्रामीण रोजगार और आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। पिछले तीन दशकों के दौरान भारत में इस क्षेत्र की वृद्धि दर 5% प्रति वर्ष देखी गई है। 90% से अधिक पशुधन की देखभाल और प्रबंधन महिलाओं द्वारा किया जाता है। जहां एक सामान्य वर्ष में, फसल उत्पादन केवल 90 से 120 दिनों के रोजगार पैदा कर सकता है। बाकी बचे हुए समय में किसान बेरोज़गार रहते हैं, ऐसी स्थिति में डेयरी उद्पादन ग्रामीण क्षेत्रों मील का पत्थर साबित हो सकता है।संदर्भhttps://bit.ly/3BEPiFu https://bbc.in/3jHw8bM https://en.wikipedia.org/wiki/Milk
अवधारणा II - नागरिक की पहचान
दक्षिण भारतीय विवाह परंपराएँ: विविध संस्कृतियों, रस्मों और उत्तर भारत से भिन्नताओं की झलक
हमारा देश भारत अपने समृद्ध इतिहास के साथ साथ अपनी समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों के लिए जाना जाता है। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा कि हमारा देश भारत विविध संस्कृतियों का एक ऐसा रंग-बिरंगा गुलदस्ता है, जिसमें प्रत्येक संस्कृति रूपी फूल की अपनी एक अनोखी विशेषता है। यह विविधता प्रत्येक क्षेत्र की अनोखी विवाह परंपराओं में भी देखी जाती है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक प्रत्येक क्षेत्र और राज्य में होने वाले विवाह उत्सवों से संबंधित रीति रिवाजों एवं परंपराओं में कहीं समानता देखने को मिलती है तो कहीं पूरी तरह भिन्नता।उत्तर भारत में जहाँ विवाह रात के दौरान संपन्न किये जाते हैं, वहीं दक्षिण भारत में विवाह उत्सव दिन के दौरान संपन्न होते हैं। जैसा कि हम उत्तर भारत में ही निवास करते हैं तो उत्तर भारत के विवाह उत्सवों के रीति रिवाज़ों से हम भली भांति परिचित हैं। तो आइये आज के अपने इस लेख के माध्यम से हम आपको दक्षिण भारत में संपन्न होने वाले विवाह उत्सवों की संस्कृति एवं परंपराओं के विषय में बताने का प्रयास करते हैं। इसके साथ ही यह भी जानते हैं कि दक्षिण भारतीय विवाह उत्सव उत्तर भारतीय विवाह समारोहों से कैसे भिन्न होते हैं।दक्षिण भारत में विवाह के दौरान भव्य समारोह आयोजित किए जाते हैं। हालांकि पूरे भारतवर्ष में हिंदू विवाह में कुछ मुख्य रस्में तो आम होती हैं लेकिन दक्षिण भारतीय विवाह में कुछ अनूठी रस्मों एवं परंपराओं का पालन किया जाता है। केवल इतना ही नहीं दक्षिण में भी अलग अलग राज्यों में और कभी कभी राज्यों के अंदर अलग अलग क्षेत्रों में कुछ विशेष परंपराएं होती हैं। केरल में गठबंधन स्वीकृत होने के बाद, दोनों परिवार विवाह की तारीख तय करने के लिए मिलते हैं और एक सगाई समारोह आयोजित करके इसकी घोषणा कर देते हैं।वहीं तमिलनाडु में दोनों परिवार विवाह से एक दिन पहले घर पर या मंदिर में अपने देवताओं से नए जोड़े के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं। इस रिवाज को पंडा काल मुहूर्तम कहा जाता है। दुल्हन सुखी वैवाहिक जीवन के लिए सुमंगली प्रार्थना करती है। चावल के आटे से पारंपरिक डिज़ाइन बनाए जाते हैं, जिन्हें 'कोलम' कहा जाता है। अनिष्ट से बचने के लिए दूल्हा-दुल्हन की कमर पर हल्दी से रंगा सूती धागा बांधा जाता है।जबकि कर्नाटक में आधिकारिक सगाई समारोह को निश्चय तामुलम कहते हैं, जिसमें माता-पिता दोनों पान के पत्तों का आदान-प्रदान करते हैं और दूल्हा और दुल्हन को अपने नए परिवारों से उपहार मिलते हैं। दोनों परिवारों में नंदी शास्त्र का पाठ किया जाता है, जहां विवाह समारोह की शुरुआत का संकेत देने के लिए घर में पानी से भरा एक तांबे का कलश और उसके ऊपर एक नारियल रखा जाता है। और तेलंगाना में विवाह से कुछ दिन पहले, पेलिकुटुरु और पेलिकोडुकु समारोह आयोजित किए जाते हैं, जिनमे परिवार की महिलाएं दूल्हा दुल्हन के शरीर पर आटा, हल्दी और सुगंधित तेल का पेस्ट लगाती हैं और उन्हें हल्दी के पानी से स्नान कराती हैं। हालांकि दक्षिण भारतीय विवाह में मेहंदी, संगीत और हल्दी समारोह उत्तर भारतीय परंपराओं के समान ही आयोजित किए जाते हैं।विवाह के दिन तमिलनाडु में, दूल्हा और दुल्हन को उनके परिवार की विवाहित महिलाएँ हल्दी, चंदन और सिन्दूर का मिश्रण लगाती हैं और पवित्र जल से स्नान कराती हैं; इसे मंगला स्नानम कहा जाता है। दुल्हन देवी का आशीर्वाद पाने के लिए गौरी पूजा करती है। कर्नाटक में दूल्हे आसपास के सभी मंदिरों में जाते हैं और सभी देवताओं से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।केरल में, दूल्हे को दुल्हन के परिवार की महिलाएं 'थालम' में फूल, अगरबत्ती और दीपक जैसी विभिन्न शुभ वस्तुएं लेकर पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि के साथ मंडप तक ले जाती हैं। वहीं तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक में दूल्हे एक छड़ी, छाता और कुछ भोजन लेकर काशी की ओर भागने का नाटक करते हैं - मानो कि यह उनके कुंवारे रहने का आखिरी मौका है। दुल्हन के पिता उसका पीछा करते हैं, और उसे विश्वास दिलाते हैं कि उनकी बेटी से विवाह करना उसके लिए बेहतर होगा। तेलुगु शादियों में, दुल्हन के पिता और भाई दूल्हे को गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के लिए मनाते हैं।दक्षिण भारतीय विवाह में दुल्हन के विवाह स्थल पर पहुंचने के बाद दुल्हन के परिवार की ओर से पद पूजा समारोह किया जाता है। दुल्हन का परिवार दूल्हे के पैरों को गुलाब जल, पवित्र जल, दूध, चंदन और कुमकुम से धोता है। धोने के बाद पैरों को फूलों की पंखुड़ियों से पोंछा जाता है। यह एक सम्मान है जो दुल्हन का परिवार दूल्हे को देता है। काशी यात्रा और पद पूजा के बाद मलाई मात्रल समारोह होता है जिसमें दूल्हा और दुल्हन एक-दूसरे को फूल माला पहनाते हैं और इस अनुष्ठान को तीन बार दोहराया जाता है।दक्षिण भारतीय विवाह में दूल्हे को भगवान विष्णु के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है। दूल्हा-दुल्हन को जीवन भर के बंधन में बांधने के लिए, दुल्हन की साड़ी के सिरे को दूल्हे के अंगवस्त्रम के सिरे से बांधा जाता है। दुल्हन की माँ दूल्हे के पैर धोकर दूल्हे की आँखों में काजल लगाती है। फिर दुल्हन के पिता अपनी बेटी का हाथ पकड़कर उन्हें एक नारियल देते हैं जिस पर दुल्हन की मां पवित्र जल डालती है। फिर सप्तपदी की रस्म में दूल्हा-दुल्हन हाथ पकड़ते हैं और वैदिक मंत्रों के जाप के साथ पवित्र अग्नि के चारों ओर सात बार परिक्रमा करते हैं।दक्षिण भारतीय विवाह की वह विशेषता जो उत्तर भारतीय विवाह से पूरी तरह अलग है, वह है दूल्हे और दुल्हन के विवाह के जोड़े। दक्षिण भारतीय विवाह में दूल्हे को क्रीम रंग की रेशमी शर्ट, या कुर्ता, और धोती, या मुंडू पहनाया जाता है। तेलुगु और कन्नड़ दूल्हे कपड़े की पगड़ी पहनते हैं। वही दक्षिण भारतीय दुल्हन विवाह के दिन सोने के आभूषणों, और लाल एवं अन्य जीवंत रंगों की रेशमी साड़ी में पूरी तरह खिल जाती है। कुछ समुदायों में, दूल्हा इस समय दुल्हन को 'पुदावा' या दुल्हन की साड़ियाँ उपहार में देता है। केरल की दुल्हनें आम तौर पर ऑफ-व्हाइट या क्रीम रंग की वेष्टी-मुंडू, या बॉर्डर वाली बनारसी रेशम की साड़ियाँ पहनती हैं। तमिलनाडु में दुल्हन आम तौर पर या तो पारंपरिक 9 गज़ की 'मदिसार' साड़ी या गहना टोन में भारी कांचीपुरम साड़ी पहनती है। तेलुगु और कन्नड़ दुल्हनें पारंपरिक रूप से लाल, हरे, मैरून, बैंगनी जैसे गहरे रंगों वाली साड़ियां पहनती है। काले और सफेद रंग को अशुभ माना जाता है और आमतौर पर दुल्हन इसे कभी नहीं पहनती है।आइए अब जानते हैं कि दक्षिण भारतीय विवाह उत्तर भारतीय विवाह समारोहों से किस तरह भिन्न होते हैं:1. समारोह और अनुष्ठान: आमतौर पर, दक्षिण भारतीय विवाहों को धार्मिक और पारंपरिक परंपराओं से चिह्नित किया जाता है। शुभ "मुहूर्त" से लेकर मालाओं के आदान-प्रदान और मंगलसूत्र बांधने तक, प्रत्येक रस्म को मंत्रोच्चारण के साथ संपन्न किया जाता है। दूसरी ओर, उत्तर भारतीय विवाहों में हल्दी, संगीत और जूता छुपाई जैसे रीति-रिवाज दक्षिण से पूरी तरह अलग होते हैं।2. गहने और कपड़े: दक्षिण भारत में दुल्हन आमतौर पर पारंपरिक रेशम की साड़ी और सोने के आभूषण पहनती है। दूसरी ओर, उत्तर भारतीय दुल्हन "पोल्की" और "कुंदन" सेट जैसे अलंकृत सोने के आभूषणों के साथ रंगीन साड़ी या लहंगा पहनना पसंद करती हैं। वही दक्षिण भारतीय दूल्हे सफेद या क्रीम रंग की शर्ट और धोती पहनते हैं तो उत्तर भारतीय दूल्हे जड़ाऊ शेरवानी या सूट पहनना पसंद करते हैं।3. भोजन: उत्तर और दक्षिण दोनों विवाह समारोहों में प्रत्येक क्षेत्र की विविध पाक परंपराओं को दर्शाया जाता है। दक्षिण भारतीय विवाह में डोसा, इडली, वड़ा जैसे व्यंजन और चावल से बने कई व्यंजन शामिल होते हैं। दूसरी ओर, उत्तर भारतीय विवाह में समृद्ध करी और स्वादिष्ट कबाब से लेकर जलेबी और गुलाब जामुन जैसी समृद्ध मिठाइयों तक विविध प्रकार के भोजन शामिल होते हैं। उत्तरी शादी की दावतों के मुख्य आकर्षणों में स्वादिष्ट बिरयानी और तंदूरी रसोई के व्यंजन भी शामिल हैं।4. स्थान और सजावट: दोनों क्षेत्रों के बीच विवाह समारोह के माहौल और शैली में बड़ा अंतर है। दक्षिण भारतीय विवाहों में पारंपरिक फूलों की सजावट और रूपांकन आम हैं। आयोजन स्थलों को मुख्य रूप से आम के पत्तों और सुगंधित चमेली के फूलों से सजाया जाता है। दूसरी ओर, उत्तर भारतीय विवाहों में महंगी सजावट, जटिल मंच सेट, जीवंत पर्दे और विस्तृत पुष्प पृष्ठभूमि, आदि पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।5. नृत्य और संगीत: भारत में किसी भी क्षेत्र में विवाह उत्सव को संगीत और नृत्य के बिना पूरा नहीं माना जाता। दक्षिण भारतीय विवाह में नादस्वरम और मृदंगम जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ भरतनाट्यम जैसे शास्त्रीय नृत्यों और कर्नाटक संगीत का मंच पर आयोजन होता है । वहीं दूसरी ओर, शहनाई और ढोल की आवाज़ के साथ गिद्दा और भांगड़ा जैसे जीवंत लोक नृत्य अक्सर उत्तर भारतीय विवाहों से जुड़े होते हैं। उत्तर भारतीय विवाह समारोहों में मंच पर अक्सर बॉलीवुड संगीत और नृत्य प्रदर्शन शामिल होते हैं।6. निमंत्रण पत्र: परंपरागत रूप से, अक्सर धार्मिक विषयों, या देवताओं की तस्वीरों के साथ, दक्षिण भारतीय विवाह निमंत्रण पत्र, सुंदर और विनम्र होते हैं, । इनमें विवाह समारोह के प्रमुख तत्वों को सटीक और संक्षिप्त रूप से व्यक्त करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। दूसरी ओर, उत्तरी विवाह निमंत्रण पत्र भव्य और विस्तृत होते हैं, जिनमें समृद्ध डिजाइन, ज्वलंत रंग और फ़ॉइलिंग, एम्बॉसिंग और लेजर-कट विवरण जैसे अलंकरण होते हैं। ये निमंत्रण कला के नमूने होते हैं जो उत्तर भारतीय विवाहों की समृद्धि और भव्यता को दर्शाते हैं।7. विवाह से पहले और बाद की परंपराएं: उत्तर और दक्षिण क्षेत्रों के विवाह समारोह की पहले और बाद की परंपराएं भिन्न भिन्न होती हैं। जबकि उत्तरी विवाह में संगीत और हल्दी समारोह जैसी विवाह से पहले की रस्में नृत्य, संगीत और मौज-मस्ती से भरपूर होती हैं, दक्षिण भारतीय विवाहों में मेहंदी समारोह और निश्चयार्थम (सगाई) जैसी विवाह से पहले की रस्में, सादगी से की जाती हैं। गृहप्रवेशम समारोह, जो दुल्हन का उसके नए घर में स्वागत को संदर्भित करता है, और सप्तपदी समारोह, जिसमें पवित्र अग्नि के चारों ओर सात फेरे लगाना शामिल है, विवाह के बाद के रीति-रिवाज़ हैं जो जोड़े की एक साथ यात्रा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वास्तव में दोनों क्षेत्रों की विवाह रस्मों एवं परंपराओं में यह अंतर, प्रत्येक क्षेत्र एवं राज्य के विशिष्ट ऐतिहासिक रीति-रिवाज़, पोशाक, भोजन और सांस्कृतिक गतिविधियों के कारण होता है।संदर्भhttps://tinyurl.com/2p9pfmtm https://tinyurl.com/2kfut887 https://tinyurl.com/459yva26
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
प्रयाग के त्रिवेणी संगम पर माघ मेला:आस्था, इतिहास और पवित्र स्नान की पारंपरिक तीर्थ यात्रा
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ!प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) में त्रिवेणी संगम के पावन तट पर लगने वाला माघ मेला भारत की प्रमुख धार्मिक यात्राओं में से एक है। यह मेला हिंदू पंचांग के माघ मास में आयोजित होता है, जो सामान्यतः जनवरी-फ़रवरी के बीच आता है। माघ मेला लगभग 45 दिनों तक चलता है और इसकी शुरुआत पौष पूर्णिमा से होकर महाशिवरात्रि पर संपन्न होती है। गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती नदियों के संगम पर स्नान करना इस मेले का मुख्य धार्मिक आधार माना जाता है। इतिहास के पन्नों में भी माघ मेले के उल्लेख मिलते हैं। सातवीं शताब्दी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) ने प्रयाग में होने वाले धार्मिक आयोजनों का वर्णन किया है। वहीं, मुग़ल काल के एक फ़ारसी ग्रंथ खुलासत-उत-तवारीख में भी यहाँ होने वाले वार्षिक हिंदू धार्मिक स्नानोत्सव का उल्लेख मिलता है, जिसे माघ मेला माना जाता है। यह दर्शाता है कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।मेले की शुरुआत पौष पूर्णिमा के पहले स्नान से होती है। पूरे आयोजन के दौरान कई पवित्र स्नान तिथियाँ आती हैं, जिनमें मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी, माघ पूर्णिमा जैसी तिथियाँ विशेष महत्व रखती हैं। इन दिनों संगम पर लाखों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं। विशेष रूप से कल्पवास करने वाले श्रद्धालुओं के लिए ये स्नान अनिवार्य माने जाते हैं। कल्पवास के दौरान श्रद्धालु संगम तट पर अस्थायी कुटियों में रहकर संयमित जीवन, पूजा, दान और तप का पालन करते हैं। कल्पवास के समय यज्ञ, हवन और दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। भोजन दान, अनाज दान और तिल दान को अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। साधु-संतों की उपस्थिति, धार्मिक अनुष्ठान और भक्ति का वातावरण पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।हर चौथे वर्ष माघ मेला कुंभ मेले का रूप ले लेता है और बारहवें वर्ष यह महाकुंभ बन जाता है, जब देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु प्रयागराज पहुँचते हैं। इस प्रकार माघ मेला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और सामूहिक श्रद्धा की जीवंत मिसाल भी है।संदर्भ:https://tinyurl.com/x6dupfdf https://tinyurl.com/rfkwaksy
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
कैसे रेडियो के आविष्कार ने बदल दी संचार और मनोरंजन की दुनिया की पूरी कहानी
जौनपुरवासियों, आज के डिजिटल दौर में जब सूचनाएँ मोबाइल स्क्रीन पर पल-पल बदलती रहती हैं और सोशल मीडिया पर आवाज़ें शोर में बदल जाती हैं, ऐसे समय में रेडियो आज भी एक शांत, भरोसेमंद और मानवीय माध्यम बना हुआ है। जौनपुर जैसे शहरों में रेडियो केवल मनोरंजन या ख़बरों का साधन नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक स्वाभाविक हिस्सा रहा है। सुबह की चाय के साथ बजता कार्यक्रम हो, खेत या दुकान पर काम करते समय सुनाई देती आवाज़ हो, या सफ़र के दौरान रास्ते का साथी - रेडियो बिना ध्यान खींचे जीवन के साथ चलता रहता है।हर साल 13 फ़रवरी को विश्व रेडियो दिवस (World Radio Day) मनाया जाता है, जो हमें याद दिलाता है कि तमाम तकनीकी बदलावों के बावजूद रेडियो की प्रासंगिकता क्यों बनी हुई है। यह दिवस सिर्फ़ एक माध्यम का उत्सव नहीं, बल्कि उस भरोसे, आत्मीयता और सांस्कृतिक जुड़ाव का सम्मान है जो रेडियो लोगों के साथ वर्षों से बनाता आया है। रेडियो की खासियत यही है कि यह देखने की नहीं, सुनने और महसूस करने की चीज़ है - एक ऐसी आवाज़ जो अकेलेपन में साथी बनती है और समुदाय में अपनापन जगाती है।प्राचीन काल से ही मानव ने अपने मनोरंजन के लिये विविध प्रकार के तरीकों को अपनाया। किंतु समय बदलने के साथ ये तरकीबें आविष्कारों में परिवर्तित होने लगीं जिन्होंने लोगों को कई वर्षों तक मनोरंजित किया। रेडियो (Radio) भी इन्हीं आविष्कारों में से एक है। रेडियो का विकास पहले वायरलेस टेलीग्राफी (Wireless Telegraphy) के रूप में शुरू हुआ। किंतु बाद में इसने अपने इतिहास में प्रसारण को भी शामिल कर लिया। तो जानते हैं कि रेडियो है क्या और इसका आविष्कार कैसे हुआ।वास्तव में रेडियो वह तकनीक है जो रेडियो तरंगों का उपयोग करके संकेत या संचार का माध्यम बनती है। रेडियो तरंगें 30 हर्ट्ज़ (Hertz) और 300 गीगाहर्ट्ज़ (Gigahertz) के बीच की आवृत्ति की विद्युत चुम्बकीय तरंगें हैं। ये तरंगे तब उत्पन्न होती हैं जब एक इलेक्ट्रॉनिक (Electronic) उपकरण जिसे ट्रांसमीटर (Transmitter) कहा जाता है, को एक एंटीना (Antenna) से जोड़ा जाता है जिससे यह तरंगों को प्रसारित करने लगता है। ये तरंगे दूसरे एंटीना से जुड़े एक रेडियो रिसीवर (Receiver) द्वारा प्राप्त की जाती हैं। रेडियो के आविष्कार की प्रक्रिया और विकास ने बहुत समय लिया जिसे लेकर विविध प्रकार के सिद्धांत भी दिए गये।गुग्लीयेल्मो मार्कोनी (Guglielmo Marconi)रेडियो संचार के आविष्कार के लिये गुग्लीयेल्मो मार्कोनी (Guglielmo Marconi) को श्रेय दिया गया है। किंतु इसका इतिहास इतना ही नहीं बल्कि बहुत विस्तृत है। दरसल इनसे पहले 1860 में स्कॉटिश भौतिक विज्ञानी जेम्स क्लर्क मैक्सवेल (James Clerk Maxwell) ने रेडियो तरंगों के अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी। 1888 में हेनरिक रुडोल्फ हर्ट्ज़ ने एक प्रयोग में चुम्बकीय तरंगों के वायु में संचरण को निर्णायक रूप से सिद्ध कर मैक्सवेल के विद्युत चुंबकत्व सिद्धांत की पुष्टि की। उन्होंने यह दर्शाया कि विद्युत प्रवाह के तेज़ बदलावों को रेडियो तरंगों के रूप में अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया जा सकता है। इस बीच कई वैज्ञानिकों ने इस पर शोध किया। तत्पश्चात 1894 में इतालवी आविष्कारक गुग्लीयेल्मो मार्कोनी ने एयरबोर्न हर्ट्ज़ियन (Airborne Hertzian) तरंगों (रेडियो प्रसारण) पर आधारित पहला पूर्ण और व्यावसायिक रूप से सफल वायरलेस टेलीग्राफी सिस्टम बनाया। मार्कोनी ने सैन्य और समुद्री संचार में रेडियो के अनुप्रयोग का प्रदर्शन किया और रेडियो संचार सेवाओं और उपकरणों के विकास और प्रसार के लिए एक कंपनी शुरू की।1920 में फ्रैंक कोनराड (Frank Conrad) ने सरकार की अनुमति से पहली बार रेडियो स्टेशन शुरू किया और इसलिये वे रेडियो ब्रोडकास्टिंग (Radio broadcasting) के जनक कहलाये जाने लगे। इसके बाद कई सारे रेडियो स्टेशन की शुरुआत हुई जिनमें से लन्दन का बीबीसी रेडियो ब्रोडकास्टिंग अति विख्यात हुआ। भारत में ऑल इंडिया रेडियो (All India Radio) की स्थापना 1936 में की गयी जिसे 1957 में आकाशवाणी के नाम से पुकारा जाने लगा।आपके लिये यह जानना बहुत रोचक होगा कि वास्तव में भारतीय भौतिक वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने भी इस आविष्कार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब हेनरिक हर्ट्ज़ ने विद्युत चुम्बकीय तरंगों के अस्तित्व की पुष्टि की तब बोस कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज (Presidency College) में शामिल हुए थे। हेनरिक हर्ट्ज़ के शोध पर प्रकाशित एक पुस्तक से वे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने रेडियो और सूक्ष्म तरंगों पर अध्ययन करना शुरू किया। यूं तो रेडियो का आविष्कारक मार्कोनी को माना जाता है किंतु वास्तव में इसका आविष्कार बोस ने किया यह कहना भी गलत नहीं होगा क्योंकि मार्कोनी के प्रदर्शन से पहले ही वर्ष 1885 में बोस ने रेडियो तरंगों द्वारा बेतार संचार का प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन में जगदीश चंद्र बोस ने दूर से एक घंटी बजाकर बारूद में विस्फोट कराया, जो तरंगों की ताकत का एक नमूना था। जे. सी. बोस ऐसे प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने एक ऐसे यंत्र का निर्माण किया जो सूक्ष्म तरंगें पैदा कर सकता था। उनका यंत्र इतना छोटा था कि उसे एक छोटे बक्से में कहीं भी ले जाया जा सकता था। उन्होंने दुनिया को उस समय एक बिल्कुल नए तरह की रेडियो तरंग दिखाई जो कि ऐसी थी जिसे आज माइक्रोवेव्स या सूक्ष्म तरंग कहा जाता है। उन्होंने एक बेहद संवेदनशील कोहेरर (Coherer- एक ऐसा यन्त्र जो रेडियो तरंगों को ज्ञान कराता है) का निर्माण किया जिसे मार्कोनी ने अपने प्रदर्शन में उपयोग किया था। इस प्रकार रेडियो आविष्कार में उनके द्वारा दिये गये योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है।रेडियो की पहुंच अब लगभग सभी जगह हो गयी है। लखनऊ सरकार ने क्षेत्रीय गीतों और मनोरंजन साधन प्रदान करने के लिए एक रेडियो कंपनी के साथ सहयोग किया। यह लखनऊ मेट्रो (Metro) के 8 स्टेशनों पर संगीत, मनोरंजन और सामान्य ज्ञान का प्रसारण करता है। इसने यात्रियों के सफ़र को एक सुखद अनुभव दिया है। कुछ महीनों पहले रेडियो सिटी (Radio City) ने नोएडा यात्रियों के सफ़र अनुभव को भी सुखद बनाने के लिये नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (NMRC- Noida Metro Rail Corporation) के साथ साझेदारी की है।हालांकि टेलीविज़न (Television) और मोबाइल फोन (Mobile Phone) के कारण इनकी लोकप्रियता कम हो गई है लेकिन आज भी कई लोग रेडियो सुनना पसंद करते हैं क्योंकि यह मोबाइल्स जैसे छोटे उपकरणों पर भी मौजूद है। इन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम आज भी श्रोताओं को लुभा रहे हैं।संदर्भ:https://tinyurl.com/4crh9shy https://tinyurl.com/t2wb2dwx https://tinyurl.com/zj35dhtm
व्यवहार के अनुसार वर्गीकरण
सूरजमुखी का सूर्य-अनुसरण: हेलियोट्रोपिज्म, जैविक घड़ी और परागण का विज्ञान
भोर के समय सूर्य के उगने पर, सभी सूरजमुखी फूल, पूर्व की ओर मुड़ जाते हैं। और फिर दिन चढ़ने पर पश्चिम दिशा की ओर सूरज के साथ-साथ अपनी दिशा भी बदलते रहते हैं। एक बार जब सूरज पश्चिमी आकाश में डूब जाता है, तब वे युवा सूरजमुखी रात्रि के दौरान धीरे-धीरे फिर से पूर्व दिशा की ओर मुड़ जाते हैं, और एक बार फिर सूरज के उगने का इंतजार करते हैं। हालांकि, जैसे-जैसे सूरजमुखी के पौधे की उम्र बढ़ती है, यह गतिविधि कम होती जाती है। एक बार जब सूरजमुखी परिपक्व हो जाता है, तो वह सूर्य का अनुसरण करना बंद कर देता है और पूर्व की ओर मुख करके खड़ा रह जाता है।वर्तमान समय में, यह जानने में काफ़ी प्रगति हुई है कि, सूरजमुखी फूल आकाश में सूर्य की गति के हिसाब से कैसे मुड़ते हैं, लेकिन, कुछ वनस्पतिशास्त्री अभी भी इस मुद्दे पर बहस कर रहे हैं।दरअसल, सूरजमुखी के पौधे में एक आंतरिक घड़ी होती है, जिससे सूरज के साथ साथ इस फूल के मुख की दिशा निर्धारित होती है। पौधों को प्रजनन के लिए, फूलों पर सही तापमान प्राप्त करना महत्वपूर्ण है। पौधों के तापमान में वृद्धि पौधों की संरचनाओं द्वारा प्रत्यक्ष सौर विकिरण के अवशोषण और पौधे के आसपास की संरचनाओं के उष्णता विकिरण के माध्यम से हो सकती है। सौर विकिरण के अवशोषण को बढ़ाने का एक प्रभावी तरीका, सूर्य की गति और दिशा के साथ मुड़ना है।सूर्य की रोशनी में होने के कारण, गर्म हुए फूलों के साथ किए गए, प्रयोगों से पता चला कि, गर्म फूलों की ओर, अधिक परागणक आकर्षित होते हैं। यह परिदृश्य हेलियोट्रोपिज्म (Heliotropism) की व्याख्या के अनुरूप है, जो फूलों को गर्माहट प्रदान करने हेतु, सूर्य की रोशनी का पता लगाता है। इसे सौर ट्रैकिंग (Solar tracking) के रूप में भी जाना जाता है। इससे, वे फूल आने वाले परागणकों के लिए एक आरामदायक स्थान बन जाते हैं।हेलियोट्रोपिज्म पौधों की कई प्रजातियों में पाया जाता है, और प्रकाश संश्लेषण के लिए अवशोषित सूर्य के प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करता है। इसमें सूरजमुखी (Sunflower) या हेलियनथस एनुअस (Helianthus annuus) एक मुख्य एवं सर्वज्ञात उदाहरण है।इसके अलावा, कुछ अन्य कारक भी होते हैं, जो इस गतिविधि के लिए ज़िम्मेदार हैं। यदि सूरजमुखी का फूल पूर्व की ओर होता है, तो वह फूल सुबह के सूरज से रोशन होता है। साथ ही, फूलों के सुनहरे रंग पर पड़ने वाली सूरज की रोशनी द्वारा परागणकों को पौधे के नए खिले एवं युवा फूलों की ओर आकर्षित किया जाता है। फूलों में सिर्फ परागकण ही नहीं, बल्कि कुछ अन्य खाद्य स्रोत भी होते हैं। जैसे कि युवा बीज एवं नेक्टर (Nectar) आदि।इस कारण, फूलों की ओर अवांछित आगंतुक भी आकर्षित हो सकते हैं। पूर्व की ओर मुड़ने से, फूल रात भर जमा होने वाली ओस से जल्द ही सूख जाता है, जिससे कवक तथा अन्य संक्रमण का खतरा कम हो जाता है।साथ ही, दोपहर का समय सुबह की तुलना में अधिक गर्म होता है। उच्च तापमान की इस अवधि के दौरान, पूर्व की ओर मौजूद सूरजमुखी फूल सूर्य से दूर होता है। इसका मतलब यह है कि, फूल के शीर्ष का अधिकांश भाग सूर्य और पराग के बीच होगा, जिससे गर्मी अधिक होने पर, सूर्य की किरणें पराग पर नहीं पड़ती हैं।कुछ अध्ययन एवं प्रयोग निश्चित रूप से ही, फूलों के सूर्य की ओर मुड़ने हेतु,गर्मी की परिकल्पना का समर्थन करते हैं।लेकिन,संभावना है कि,इसके लिए कुछ अन्य कारण भी, सच हो सकते हैं।दूसरी ओर, वैज्ञानिक स्टैसी हार्मर (Stacey Harmer) के अध्ययन से पता चला है कि, यह घटना इन पौधों की आंतरिक सर्कैडियन घड़ी (Circadian clock) द्वारा नियंत्रित होती है।सुबह पूर्व दिशा की ओर मुड़े फूल, पश्चिम दिशा की ओर मुड़े हुए फूलों की तुलना में, काफी गर्म थे। हार्मर ने कहा है कि, यह गर्माहट सुबह-सुबह भोजन खोजने वाली मधुमक्खियों के लिए, ऊर्जा लाभ लेकर आती है। सीधी धूप फूलों की पंखुड़ियों पर पराबैंगनी निशान भी दिखाती है, जो मधुमक्खियों को तो दिखाई देते है, परन्तु जिन्हें, हम इंसान अपनी आंखों से नहीं देख पाते।पौधों के ऐसे उन्मुखीकरण ने फूलों के विकास और प्रजनन सफलता को भी प्रभावित किया है। पूर्व की ओर मुख वाले पौधे, बड़े और भारी बीज पैदा करते हैं।ऐसा प्रतीत होता है कि, ये प्रभाव एवं घटना फूल के शीर्ष के तापमान द्वारा नियंत्रित होते हैं। शोधकर्ताओं ने जब, पश्चिम की ओर मुड़े हुए फूलों को गर्म करने के लिए,एक हीटर का उपयोग किया, तो उन्होंने भी समान परिणाम प्रदर्शित किए।अंत में, वर्जीनिया विश्वविद्यालय (University of Virginia) के एक अध्ययन में पाया गया कि, पूर्व दिशा की ओर रहने वाले पौधों के परागकण, पश्चिम की ओर रहने वाले पौधों की तुलना में, अधिक प्रजनन के लिए जिम्मेदार थे। दरअसल, युवा सूरजमुखी के तने रात के दौरान, केवल पश्चिम की ओर अधिक बढ़ते हैं, जो सूरजमुखी के सिर को पूर्व की ओर झुकने की अनुमति देते है। जबकि, दिन के दौरान, तने का केवल पूर्वी भाग बढ़ता है, जिसके परिणामस्वरूप,उनकी सूर्य के साथ पश्चिम की ओर गति होती है। इस बात को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता है कि, सूरजमुखी के फूलों का सूर्य प्रेमी होना, केवल हेलियो ट्रोपिज्म एवं सर्कैडियन घड़ी का एक प्रभाव है, वर्तमान साक्ष्य भी इस तथ्य की ओर इशारा करते हैं। सूरजमुखी का पूर्व दिशा की ओर झुकाव और फूलों की शारीरिक रचना, कैसे सुबह के तापमान और परागणकों के लिए दृश्यता को बढ़ाती है और फूलों के सिरों को अत्यधिक सौर विकिरण से कैसे बचाती है, यह भविष्य के शोध के लिए, एक रोमांचक विषय होगा।संदर्भhttps://tinyurl.com/3estf5jz https://tinyurl.com/udennpuf https://tinyurl.com/mp6cn9zm https://tinyurl.com/2uapuczt
अवधारणा I - मापन उपकरण (कागज़/घड़ी)
कागज़ के वैश्विक मानक आकार: इतिहास, विकास और ISO प्रणाली की दिलचस्प कहानी
201 ईसा पूर्व के आसपास, चीन (China) के हान राजवंश (Han Dynasty) के काल में काग़ज़ का आविष्कार हुआ, जिसके बाद इसका उपयोग धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैलता चला गया। आज काग़ज़ हमारे जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है और इसका प्रयोग लेखन, मुद्रण, पैकेजिंग, शिक्षा और प्रशासन जैसे अनेक क्षेत्रों में किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि काग़ज़ अलग-अलग मानक आकारों में ही क्यों उपलब्ध होता है? दरअसल, अलग-अलग समय और देशों में काग़ज़ के कई मानक आकार प्रचलन में रहे हैं, परंतु वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आईएसओ (ISO) मानक को सबसे अधिक स्वीकार्यता प्राप्त है। इस लेख में हम काग़ज़ के इन्हीं मानकों को विस्तार से समझेंगे।इतिहासकारों के अनुसार, भारत में काग़ज़ का निर्माण और उपयोग सबसे पहले सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान हुआ। समय के साथ भारत में काग़ज़ का उत्पादन विभिन्न रूपों और आकारों में होने लगा। हालांकि, भारत में काग़ज़ बनाने का पहला संगठित कारख़ाना कश्मीर में सुल्तान जैनुल आबेदीन (1417–1467 ईसवी) के शासनकाल में स्थापित किया गया था। इसके बाद 1870 के आसपास कोलकाता के पास ‘बाली’ नामक स्थान पर हुगली नदी के तट पर प्राचीन तकनीक पर आधारित एक आधुनिक काग़ज़ मिल की स्थापना हुई। आगे चलकर देश के अन्य हिस्सों में भी काग़ज़ उद्योग का तेज़ी से विकास हुआ।विश्व भर में स्टेशनरी (Stationery), कार्ड और मुद्रित दस्तावेज़ों के लिए प्रयुक्त काग़ज़ की शीट्स अलग-अलग आकारों में मिलती हैं। इन मानक आकारों को आईएसओ मानक काग़ज़ आकार कहा जाता है। वर्ष 1975 में ‘अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन’ (International Organisation for Standardisation – ISO) द्वारा ‘आईएसओ 216’ मानक के अंतर्गत इन्हें औपचारिक रूप से अपनाया गया। ये मानक काग़ज़ की लंबाई और चौड़ाई के बीच एक निश्चित अनुपात पर आधारित होते हैं। इनमें सबसे अधिक प्रचलित आकार A4 है, जिसे अधिकांश कार्यालयी दस्तावेज़ों के लिए डिफ़ॉल्ट माना जाता है। A4 काग़ज़ का माप 210 मिमी × 297 मिमी होता है।आईएसओ 216 मानक की नींव जर्मन डीआईएन 476 (German DIN 476) प्रणाली पर रखी गई थी। डीआईएन (Deutsches Institut für Normung) जर्मनी का राष्ट्रीय मानकीकरण संस्थान है, जिसका मुख्यालय बर्लिन (Berlin) में स्थित है। इस प्रणाली की खासियत यह है कि किसी भी आकार का काग़ज़ उसी श्रृंखला के अगले बड़े आकार के काग़ज़ के क्षेत्रफल का ठीक आधा होता है। सभी आईएसओ काग़ज़ आकार √2 : 1 (लगभग 1:1.414) के अनुपात पर आधारित होते हैं।इस अनुपात को पूरी श्रृंखला में बनाए रखा जाता है, जिससे किसी दस्तावेज़ को छोटा या बड़ा करते समय उसका अनुपात नहीं बिगड़ता। A-श्रृंखला का मूल आकार A0 होता है, जिसका क्षेत्रफल ठीक 1 वर्ग मीटर होता है। मिलीमीटर में इसका माप 841 × 1189 मिमी (33.1 × 46.8 इंच) होता है। काग़ज़ के आकारों की कई श्रृंखलाएं होती हैं, जैसे A, B और C। A3, A4, A5, B4 और B5 जैसे आकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप से उपयोग में लाए जाते हैं। ये आकार कैस्केडिंग स्टाइल शीट्स (Cascading Style Sheets – CSS) में भी शामिल हैं, जो HTML या XML में लिखे गए दस्तावेज़ों की प्रस्तुति को नियंत्रित करने के लिए प्रयुक्त होती हैं।आईएसओ 216 मानक का उपयोग उत्तरी अमेरिका (North America) और लैटिन अमेरिका (Latin America) के कुछ हिस्सों को छोड़कर लगभग पूरी दुनिया में किया जाता है। उल्लेखनीय है कि उत्तरी अमेरिका में एक अलग ‘नॉर्थ अमेरिकन पेपर साइज’ प्रणाली प्रचलित है, जो मिलीमीटर के बजाय इंच पर आधारित होती है। इसके अतिरिक्त, आईएसओ 217 और आईएसओ 269 जैसे पूरक मानक भी हैं, जिनमें आईएसओ 269 की ‘C’ श्रृंखला को प्रायः A और B आकारों के साथ जोड़ा जाता है, खासकर लिफ़ाफ़ों के लिए।क्या आप जानते हैं कि काग़ज़ के आकार का सबसे पहला दस्तावेजीकृत मानक वर्ष 1389 में इटली के बोलोना (Bologna, Italy) शहर में पत्थर पर अंकित किया गया था? इसमें चार मानक आकारों का उल्लेख मिलता है। A-श्रृंखला को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि किसी शीट को आधा काटने पर उसी अनुपात के दो छोटे आकार प्राप्त हो जाते हैं। गणितीय सूत्र √2 : 1 (लगभग 1.414 : 1) इस संरचना का आधार है।A-श्रृंखला में A0 से लेकर A10 तक काग़ज़ के आकार उपलब्ध हैं, जिनमें A4 सबसे अधिक प्रचलित कार्यालयी आकार है। आईएसओ प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ यह है कि प्रत्येक आकार अपने पास के आकार से या तो दोगुना बड़ा होता है या आधा। उदाहरण के लिए, A4 काग़ज़ A5 से दोगुना और A3 का आधा होता है। इसके अलावा ‘लेटर’, ‘लीगल’, ‘लेजर’ और ‘टैब्लॉयड’ (Letter, Legal, Ledger, Tabloid) जैसे आकार भी आज तक दैनिक उपयोग में आम तौर पर देखे जाते रहे हैं, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां आईएसओ मानक पूरी तरह लागू नहीं है।संदर्भ:https://tinyurl.com/yc2d3zmc https://tinyurl.com/ey97kvw7
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
2005 में शुरू हुआ 20–20 क्रिकेट प्रारूप, आज बना खेल का सबसे लोकप्रिय चेहरा
जौनपुरवासियों, क्रिकेट का ज़िक्र आते ही हमारे मन में कभी पाँच दिनों तक चलने वाले टेस्ट मैचों की तस्वीर उभरती है, तो कभी पूरे दिन टीवी के सामने बैठकर एकदिवसीय मुकाबले देखने की यादें ताज़ा हो जाती हैं। लेकिन समय के साथ-साथ न सिर्फ़ हमारी ज़िंदगी की रफ़्तार बदली है, बल्कि क्रिकेट ने भी खुद को उसी रफ़्तार में ढाल लिया है। ऐसे दौर में 20-20 क्रिकेट प्रारूप एक नए अनुभव के रूप में सामने आया, जिसने खेल को छोटा, तेज़ और ज़्यादा रोमांचक बना दिया। जौनपुर जैसे शहर में भी इस बदलाव की झलक साफ़ दिखाई देती है, जहाँ गली-मोहल्लों से लेकर घरों की बैठकों तक टी20 मैचों की चर्चा आम हो गई है। हर ओवर में बदलता खेल, चौके-छक्कों की भरमार और आख़िरी गेंद तक बना रहने वाला रोमांच दर्शकों को पूरी तरह बाँध कर रखता है। अब जब फ़रवरी 2026 से शुरू होने वाले टी20 विश्व कप को लेकर देशभर में उत्साह बढ़ रहा है, तो यह समझना और भी ज़रूरी हो जाता है कि कैसे 20-20 क्रिकेट ने खेल की पहचान ही बदल दी। यह लेख उसी बदलाव, उसी सफ़र और उसी अनुभव को आसान और क्रमबद्ध तरीके से आपके सामने रखने का प्रयास है।क्रिकेट का इतिहास जितना समृद्ध और लंबा रहा है, उतना ही रोचक इसका निरंतर बदलता स्वरूप भी रहा है। पांच दिवसीय टेस्ट मैचों से लेकर लगभग सात घंटे तक चलने वाले एकदिवसीय मुकाबलों और फिर मात्र तीन घंटे में सिमट जाने वाले 20–20 मैचों तक, समय के साथ क्रिकेट के प्रारूपों में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। बदलती जीवनशैली और दर्शकों की समय-संबंधी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए क्रिकेट ने खुद को ढाला और इसी प्रक्रिया में करीब दो दशक पहले शुरू हुआ 20–20 प्रारूप बेहद कम समय में असाधारण रूप से लोकप्रिय हो गया। शायद इसकी शुरुआत के समय किसी ने भी नहीं सोचा था कि यह प्रारूप इतनी तेज़ी से दुनिया भर में छा जाएगा।20–20 क्रिकेट की अवधारणा इंग्लैंड (England) और वेल्स क्रिकेट बोर्ड (Wales Cricket Board (ECB)) से जुड़े मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव स्टुअर्ट रॉबर्टसन (marketing executive Stuart Robertson) द्वारा प्रस्तुत की गई थी। उस दौर में क्रिकेट को अक्सर एक अभिजात्य और अपेक्षाकृत बुज़ुर्गों का खेल माना जाता था, जिससे युवा दर्शक इससे दूरी बना रहे थे। वहीं दूसरी ओर, तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में लोगों के लिए टेस्ट मैच के पांच दिन या एकदिवसीय मैच के सात घंटे निकाल पाना कठिन होता जा रहा था। इसी चुनौती का समाधान खोजते हुए रॉबर्टसन ने एक ऐसे छोटे और रोमांचक प्रारूप की कल्पना की, जो कम समय में ज़्यादा मनोरंजन दे सके—और यहीं से 20–20 क्रिकेट का जन्म हुआ।पुरुषों का पहला टी20 अंतर्राष्ट्रीय मुकाबला 17 फरवरी 2005 को ऑकलैंड (Auckland) में न्यूजीलैंड (New Zealand) और ऑस्ट्रेलिया (Australia) के बीच खेला गया। उस समय के वनडे विश्व कप विजेता ऑस्ट्रेलिया ने 20 ओवरों में 214/5 का विशाल स्कोर खड़ा किया और मैच 44 रनों से जीत लिया। इस ऐतिहासिक मुकाबले को दोनों टीमों ने काफी हल्के-फुल्के और मनोरंजक अंदाज़ में खेला। खिलाड़ियों ने 1980 के दशक की रेट्रो जर्सी पहनीं और कुछ ने तो नकली मूंछें भी लगाईं, जिससे यह मैच किसी प्रदर्शनी मुकाबले जैसा प्रतीत हुआ। ईडन पार्क (Eden Park) में खेले गए इस मैच को देखने के लिए 30,000 से अधिक दर्शक मैदान में मौजूद थे।20–20 क्रिकेट की असली लोकप्रियता 2007 में आयोजित पहले टी20 विश्व कप के बाद देखने को मिली। इस टूर्नामेंट ने पारंपरिक क्रिकेट खेलने वाले देशों से आगे बढ़कर नए दर्शकों को भी आकर्षित किया और देखते ही देखते यह प्रारूप दुनिया भर में सबसे अधिक खेला जाने वाला बन गया। एक दिलचस्प तथ्य यह है कि आज विश्व की सबसे लोकप्रिय टी20 लीग मानी जाने वाली ‘इंडियन प्रीमियर लीग’ (Indian Premier League (IPL)) ने अपने शुरुआती दौर में इस छोटे प्रारूप को अपनाने को लेकर हिचकिचाहट दिखाई थी।भारत ने अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय टी20 मुकाबला 1 दिसंबर 2006 को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ जोहान्सबर्ग (Johannesburg) में खेला। यह टी20 अंतर्राष्ट्रीय इतिहास का दसवां मैच था। इस मुकाबले में ग्रीम स्मिथ की कप्तानी में दक्षिण अफ्रीका ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 20 ओवरों में 126/9 का स्कोर बनाया। भारतीय टीम ने यह लक्ष्य आखिरी गेंद पर छह विकेट शेष रहते हासिल कर लिया और इस नए प्रारूप में अपनी पहली जीत दर्ज की।20–20 क्रिकेट, क्रिकेट का सबसे संक्षिप्त और तेज़ प्रारूप है, जिसने 2003 में नियमों में किए गए बदलावों के बाद खेल में एक नई ऊर्जा भर दी। इसके मूल नियम अन्य प्रारूपों जैसे ही हैं, लेकिन प्रत्येक टीम की पारी 20 ओवरों तक सीमित होती है। एक गेंदबाज़ अधिकतम चार ओवर ही डाल सकता है और बड़े शॉट्स व तेज़ रन गति को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्ररक्षण पर कुछ विशेष प्रतिबंध लगाए जाते हैं। इन्हीं कारणों से यह प्रारूप दर्शकों के बीच बेहद रोमांचक बन गया है, खासकर भारत में, जहां आईपीएल जैसे टूर्नामेंट्स में स्टेडियम खचाखच भरे रहते हैं और करोड़ों लोग टीवी व डिजिटल माध्यमों पर मुकाबले देखते हैं।अब तक आयोजित टी20 विश्व कप के परिणाम इस प्रकार रहे हैं:वर्षटीम–1टीम–2परिणाम2007भारतपाकिस्तानभारत 5 रनों से जीता2009पाकिस्तानश्रीलंकापाकिस्तान 8 विकेट से जीता2010इंग्लैंडऑस्ट्रेलियाइंग्लैंड 8 विकेट से जीता2012वेस्टइंडीजश्रीलंकावेस्टइंडीज 36 रनों से जीता2014श्रीलंकाभारतश्रीलंका 6 विकेट से जीता2016वेस्टइंडीजइंग्लैंडवेस्टइंडीज 4 विकेट से जीता2021ऑस्ट्रेलियान्यूज़ीलैंडऑस्ट्रेलिया 8 विकेट से जीता2022इंग्लैंडपाकिस्तानइंग्लैंड 5 विकेट से जीताक्रिकेट का यह तेज़ और लोकप्रिय प्रारूप अब राज्य स्तर पर भी अपनी पहचान बना रहा है। उत्तर प्रदेश में ‘उत्तर प्रदेश टी20 लीग’ (Uttar Pradesh T20 League (UP T20)) का आयोजन किया जाता है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2023 में उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन द्वारा की गई। यह लीग आमतौर पर अगस्त से सितंबर के बीच खेली जाती है और अब इसे हर वर्ष आयोजित करने की योजना है।इस लीग में राज्य के छह शहरों की फ्रेंचाइज़ी टीमें भाग लेती हैं:गोरखपुर लायंस, गोरखपुरकानपुर सुपरस्टार्स, कानपुरकाशी रूद्रास, वाराणसीनोएडा सुपर किंग्स, नोएडालखनऊ फाल्कन्स, लखनऊमेरठ मेवरिक, मेरठइस तरह, 20–20 क्रिकेट ने न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बल्कि स्थानीय और राज्यीय स्तर पर भी क्रिकेट को एक नई पहचान और नई ऊर्जा प्रदान की है।संदर्भhttps://tinyurl.com/2m3tf9jc https://tinyurl.com/ac6tnzcn https://tinyurl.com/58nzv9dm https://tinyurl.com/453h4avh https://tinyurl.com/4rf4k4br
जलवायु और मौसम
उत्तर भारत में सर्दियों का कोहरा: जनजीवन, कृषि प्रभाव और जल संचयन की संभावनाएँ
साल के अंतिम महीनों और नए साल की शुरुआत के साथ जब सर्दी अपने चरम पर पहुँचती है, तब उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में कोहरे की घनी परत छा जाती है। इस दौरान न्यूनतम औसत तापमान अक्सर 6 से 9 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। कोहरे के कारण पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में दृश्यता घटकर लगभग 200 मीटर रह जाती है। कुछ क्षेत्रों में हालात इतने गंभीर हो जाते हैं कि दृश्यता 50 मीटर से भी कम दर्ज की जाती है।घने कोहरे की स्थिति स्थानीय निवासियों के लिए कई तरह की चुनौतियाँ लेकर आती है। परिवहन सेवाएँ सबसे अधिक प्रभावित होती हैं, जिसके चलते कई बार हवाई उड़ानें और ट्रेनें रद्द करनी पड़ती हैं या उनमें लंबी देरी हो जाती है। इसके साथ ही कोहरा कृषि और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। आइए अब कोहरे के कृषि पर पड़ने वाले प्रभाव और उसके महत्व को समझते हैं। लंबे समय तक कोहरा छाए रहने से पौधों तक पहुँचने वाली सूर्य किरणों की मात्रा कम हो जाती है, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बाधित होती है और पौधों की समग्र वृद्धि प्रभावित होती है। धूप की कमी के कारण फसलों में रोग और कीट लगने की संभावना भी बढ़ जाती है।लगातार कोहरा बने रहने से सब्जियों और फलों की फसलों पर विशेष रूप से प्रतिकूल असर पड़ता है। सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में रबी की फसलों, खासकर गेहूं के पौधों की पत्तियाँ और उनकी युक्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं। हालांकि कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रभाव अस्थायी होता है और जैसे ही मौसम साफ होता है तथा धूप निकलती है, पौधे दोबारा सामान्य स्थिति में आ जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार सर्दियों में तापमान में अचानक गिरावट और घने कोहरे की स्थिति गेहूं की फसल के लिए कई मायनों में अनुकूल भी मानी जाती है। गेहूं ठंडे वातावरण में बेहतर पनपता है और कोहरा इसके विकास के लिए उपयुक्त नमी प्रदान करता है। कुल मिलाकर ठंडा मौसम गेहूं में बेहतर तलशाखन, यानी प्रति पौधे अधिक अंकुर निकलने में सहायक होता है। यही कारण है कि जितनी अधिक ठंड और कोहरा होता है, गेहूं की फसल उतनी ही भरपूर विकसित होती है। गेहूं की बुआई सामान्यतः अक्टूबर के अंत से दिसंबर की शुरुआत के बीच की जाती है।हालांकि बुआई से पहले खेतों में पिछली फसल के अवशेष हटाने के लिए कई बार किसान, विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा में, पराली जलाने का सहारा लेते हैं। इससे वातावरण में घने कोहरे के साथ काली धुंध भी छा जाती है, जो वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से खराब कर देती है और लोगों के लिए सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है। वैज्ञानिकों के हालिया अध्ययनों से पता चला है कि उत्तर-पश्चिम भारत में फसल अवशेष जलाने का प्रभाव केवल उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह मध्य और दक्षिणी राज्यों जैसे महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के कुछ हिस्सों तक भी फैल सकता है। जहाँ सामान्य कोहरे में मौजूद जलवाष्प स्थानीय स्तर तक सीमित रहते हैं, वहीं पराली जलाने से उत्पन्न ब्लैक कार्बन उत्तर-पश्चिमी हवाओं के साथ दूर-दराज़ क्षेत्रों तक पहुँच जाता है।दिलचस्प बात यह है कि जिस कोहरे के कारण इतनी परेशानियाँ उत्पन्न होती हैं, उसका सकारात्मक उपयोग भी संभव है। कोहरे से विशेष तकनीक के माध्यम से जल संचयन किया जा सकता है। यह तकनीक उन क्षेत्रों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है जहाँ सतही जल, कुएँ या वर्षा जैसे पारंपरिक जल स्रोत पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होते। यह प्रणाली न केवल सरल है, बल्कि लागत प्रभावी भी मानी जाती है। इससे प्राप्त किया गया पानी अच्छी गुणवत्ता का होता है और इसे लंबे समय तक संग्रहित किया जा सकता है।कोहरा संग्राहक (Fog Collector) एक चौकोर ढाँचा होता है, जिसे ऊर्ध्वाधर रूप से लगाए गए जाल की सहायता से बनाया जाता है। जब कोहरा इस जाल से होकर गुजरता है, तो उसकी सूक्ष्म बूंदें जाल पर जम जाती हैं। ये बूंदें जाल के तारों के सहारे नीचे की ओर बहकर एक नलिका के माध्यम से भंडारण टंकी में एकत्र हो जाती हैं। बड़े कोहरा संग्राहक आमतौर पर 12 मीटर लंबे और 6 मीटर ऊँचे होते हैं, जिनमें ऊपरी 4 मीटर हिस्से पर जाल लगा होता है। एक संग्राहक से प्रतिदिन लगभग 150 से 750 लीटर तक पानी एकत्र किया जा सकता है। हालांकि इस तकनीक को अपनाते समय स्थानीय मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक होता है।संदर्भhttps://tinyurl.com/3rwe3ex3 https://tinyurl.com/mvnyk3zc https://tinyurl.com/5hdu5pbx
नदियाँ और नहरें
जौनपुर की गोमती नदी: वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ
प्रकृति ने जौनपुर शहर को गोमती नदी के रूप में एक अमूल्य और जीवनदायिनी धरोहर प्रदान की है। लेकिन उचित देखरेख के अभाव और मानवीय लापरवाही के कारण यह अनमोल नदी आज गंभीर प्रदूषण की चपेट में आ चुकी है। स्थिति यह है कि गोमती का पानी अब न चाहते हुए भी मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बनता जा रहा है। जौनपुर ज़िले का अधिकांश भूभाग रेतीली, दोमट और चिकनी मिट्टी से घिरा है। यहां औसत वार्षिक तापमान लगभग 44.30 डिग्री सेल्सियस (Celsius) से 44.60 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है, जबकि औसत वार्षिक वर्षा लगभग 987 मिलीमीटर (millimeter) दर्ज की जाती है। गोमती नदी, जो गंगा नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है, उत्तर प्रदेश के पीलीभीत ज़िले के माधोगनी टांडा गाँव के पास गोमठ ताल से निकलती है और जौनपुर शहर के बीचो-बीच से होकर बहती है। आज गोमती में बढ़ता प्रदूषण जौनपुर की सबसे गंभीर समस्याओं में शामिल हो चुका है। यह नदी वाराणसी के पास गंगा नदी में मिलने से पहले लगभग 940 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए उत्तर प्रदेश के नौ ज़िलों से होकर गुजरती है। वर्तमान हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि नदी में स्नान करने या इससे मछली पकड़कर खाने वालों के लिए यह जानलेवा साबित हो सकती है। गोमती नदी के प्रदूषण का मुख्य कारण औद्योगिक अपशिष्ट और अनुपचारित सीवेज डिस्चार्ज (Untreated Sewage Discharge) है। दुर्भाग्यवश, इस समस्या से निपटने के लिए जौनपुर में आज भी कोई ठोस सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (Sewage Treatment Plant) मौजूद नहीं है।जौनपुर में शाही पुल और सद्भावना पुल के बीच गोमती नदी का प्रदूषण विशेष रूप से चिंता का विषय बन गया है। सीवेज में मौजूद जैविक कचरे के अपघटन के कारण इस क्षेत्र में नदी का पानी काले रंग में बदल गया है। नदी के किनारों पर मानव और पशु अपशिष्ट, प्लास्टिक और अन्य हानिकारक कचरा जमा हो चुका है। हालात ऐसे हो गए हैं कि नदी का पानी न तो मानव उपयोग के योग्य रहा है और न ही जलीय जीवों के लिए सुरक्षित। आसपास के खुले और बंद नालों का प्रदूषित पानी सीधे नदी में छोड़ा जा रहा है। हनुमान घाट के पास नदी किनारे पड़े जंग लगे ऑटोरिक्शा (Auto Rickshaw) बरसात के दिनों में जंग को पानी के साथ नदी में घोल देते हैं। वहीं शाही पुल के पास बना एक छोटा तालाब कचरा डंप और खुले में शौच का केंद्र बन चुका है। नदी को स्वच्छ रखने के लिए लगाए गए साइन बोर्ड (Signboard) और चेतावनियों के बावजूद हालात में कोई ठोस सुधार नहीं दिखता। भारी प्रदूषण के बावजूद कई लोग आज भी गोमती में स्नान करते हैं और इसके किनारे स्थित मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं, बिना यह समझे कि वे अपने स्वास्थ्य के साथ कितना बड़ा जोखिम उठा रहे हैं। मछुआरे, जिनकी आजीविका इसी नदी पर निर्भर है, प्रदूषित पानी में समय बिताने को मजबूर हैं और इसी पानी में पली मछलियों को बेचते हैं।गोमती नदी का प्रदूषण केवल जौनपुर तक सीमित नहीं है। लखनऊ और सुल्तानपुर जैसे शहरों से भी मानव, कृषि और औद्योगिक कचरे के निर्वहन के कारण नदी की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। गोमती नदी के रासायनिक और जैविक प्रदूषण पर केंद्रित कई अध्ययनों में पानी और तलछट में पारा और सीसा (Mercury and Lead), कीटनाशकों और अन्य हानिकारक प्रदूषकों की उच्च मात्रा पाई गई है।नदी प्रदूषण के साथ-साथ भूजल संदूषण भी आज एक गंभीर समस्या बन चुका है। भूमि के भीतर मौजूद जल में हानिकारक पदार्थों की मौजूदगी को भूजल संदूषण कहा जाता है। यह समस्या विभिन्न मानवीय गतिविधियों के कारण उत्पन्न होती है, जैसे—सैप्टिक टैंक और सेसपूल का रिसाव (Leakage Of Septic Tanks And Cesspools),हानिकारक कचरे का अनुचित निपटान,कृषि अपवाह,तेल का रिसाव।भूजल संदूषण के दुष्प्रभाव दूरगामी होते हैं। इससे स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुँचता है और आर्थिक क्षति भी होती है। भूजल संदूषण को रोकने के लिए कुछ आवश्यक उपाय अपनाए जा सकते हैं, जैसे—हानिकारक कचरे का उचित निपटान करना,कम विषैले कीटनाशकों और उर्वरकों का उपयोग करना,सेप्टिक टैंक और सेसपूल से होने वाले रिसाव की रोकथाम करना।इन उपायों के साथ-साथ भारत सरकार और कुछ निजी कंपनियाँ भी नदियों और भूजल की सफाई के लिए प्रभावी तकनीकों के साथ आगे आ रही हैं। बेंगलुरु की कंपनी एल्फेमॅर्स लिमिटेड (Alphamers Ltd.) इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण है। इस कंपनी ने नदियों की सफाई के लिए स्टील (Steel) की जाली और जंजीरों से बने फ्लोटिंग बैरियर (Floating Barrier) की एक अनूठी तकनीक विकसित की है। इसे नदी के बहाव के विपरीत दिशा में लगाया जाता है, जिससे कचरा स्वतः नदी के किनारे इकट्ठा हो जाता है। इसके बाद भूमि आधारित उत्खननकर्ताओं द्वारा इस कचरे को हटाकर ट्रकों के माध्यम से ले जाया जाता है। यह तकनीक नावों के आवागमन को भी बाधित नहीं करती।यह फ्लोटिंग बैरियर तकनीक भारी मानसून के दौरान भी प्रभावी ढंग से काम करती है और उथली तथा तेज़ बहाव वाली नदियों या नालों में भी तैनात की जा सकती है। इसे देश के आठ भारतीय शहरों में लागू किया जा चुका है और अपने पहले ही वर्ष में इस तकनीक की मदद से नदियों से 2200 टन प्लास्टिक कचरा हटाया गया है। साथ ही यह समाधान लागत प्रभावी भी सिद्ध हुआ है।भारतीय प्रयासों के साथ-साथ नदियों की सफाई के लिए विदेशों से भी सहयोग मिल रहा है। इस दिशा में डेनमार्क (Denmark) सबसे आगे है, जिसने गंगा नदी की सफाई में भारत की सहायता करने की पेशकश की है। डेनिश (Danish) सरकार इस परियोजना के लिए तकनीकी सहायता और वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराएगी। गंगा नदी सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र मानी जाती है और करोड़ों लोगों के लिए जल का प्रमुख स्रोत भी है, लेकिन आज यह भी औद्योगिक कचरे, सीवेज और कृषि अपवाह से बुरी तरह प्रदूषित हो चुकी है। भारत सरकार वर्षों से गंगा की सफाई के प्रयास कर रही है, हालांकि यह एक जटिल चुनौती बनी हुई है। जल प्रबंधन में डेनमार्क के व्यापक अनुभव और प्रदूषित नदियों की सफाई में उनके सफल ट्रैक रिकॉर्ड (Track Record) को देखते हुए यह सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे न केवल लाखों लोगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, बल्कि पर्यटन उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा। यह पहल भारत और डेनमार्क के बीच मज़बूत होते संबंधों का भी प्रतीक है। प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए सरकारों और व्यवसायों द्वारा उठाए जा रहे कदम इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा हैं। अब समय आ गया है कि इन प्रयासों को और तेज़ किया जाए, सख़्त मानदंड और नीतियाँ अपनाई जाएँ और एक परिपत्र अर्थव्यवस्था की दिशा में ठोस बदलाव लाया जाए।संदर्भhttps://rb.gy/ab71a https://rb.gy/8it5n https://rb.gy/1jn0l https://tinyurl.com/fdcfby2x
सरीसृप
25-02-2026 09:25 AM • Jaunpur District-Hindi
धरती की रक्षा बिना हथियार: जौनपुर के खेतों में जीव-जगत का गुप्त योगदान
जौनपुरवासियों, हमारे चारों ओर फैले खेत, बाग़-बग़ीचे, नहरें और गाँव केवल मानव जीवन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक ऐसा संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र है, जिसे हम अनेक अन्य जीवों के साथ साझा करते हैं। इन्हीं जीवों में सांप भी शामिल हैं, जिन्हें अक्सर डर, अज्ञान और भ्रांतियों की नज़र से देखा जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि जौनपुर जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में सांप भारतीय कृषि व्यवस्था, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में एक मौन लेकिन बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज के दौर में, जब खेती, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण एक साथ कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, तब सांपों के वास्तविक महत्व को समझना और उन्हें प्रकृति के सहयोगी के रूप में देखना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।
आइए समझते हैं कि, सांप कृषि के लिए कैसे फायदेमंद होते हैं। हमारे शहर में, रैट स्नेक, अजगर, कोबरा, स्पेक्टाकल्ड कोबरा और कॉमन क्रेट, जैसे विभिन्न प्रकार के सांप पाए जाते हैं। ये सांप कृषि के लिए उपयोगी हैं, क्योंकि, ये फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले चूहों की आबादी को नियंत्रित करते हैं। सांप कीटों को भी खाते हैं, जिससे, फसलों की रक्षा होती है। हालांकि, कई क्षेत्रों में सांपों को मार दिया जाता है, क्योंकि, लोग सोचते हैं कि वे मनुष्यों के लिए हानिकारक हैं। परंतु, केवल 25% सांप ही जहरीले होते हैं, और मनुष्यों के लिए ख़तरा पैदा कर सकते हैं। सांप हमारे पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, और आर्थिक और चिकित्सीय लाभ प्रदान करते हैं। स्वस्थ समाज बनाने के लिए, जैव विविधता में सांपों के महत्व को जानना अतः आवश्यक है।
भारत के अधिकांश क्षेत्रों में, रैट स्नेक (Rat snakes) सबसे आम सांप हैं। एक वयस्क रैट सांप की लंबाई, लगभग तीन मीटर से अधिक होती है। आपको, यह देखकर अक्सर ही आश्चर्य होता होगा कि, किसी सांप ने रेंगते हुए पूरी सड़क की चौड़ाई को नाप लिया हैं। इस सांप की अन्य अनूठी विशेषता, इसकी बड़ी आंखें हैं, जो इसके सिर की चौड़ाई तक फैली हुई होती हैं। उनके भीतर एक अद्भुत चमक के साथ, गोल व काली पुतलियां होती हैं। इसके होठों पर चित्रित ऊबड़-खाबड़ काली रेखाओं पर भी हमारा ध्यान जाता हैं। दरअसल, सांपों को मोटे तौर पर, ‘जहरीले’ और ‘गैर-जहरीले’ श्रेणी में वर्गीकृत किया जा सकता है। हालांकि, कहा जाता है कि, दुनिया भर में सांपों की लगभग 3,500 प्रजातियां पाई जाती हैं। लेकिन, उनमें से बमुश्किल लगभग 25% प्रजातियां ही जहरीली होती हैं।
विषैले सांपों में किंग कोबरा (ओफियोफैगस हन्ना – Ophiophagus Hannah) सबसे घातक है। यह अधिकतर पहाड़ी इलाकों तक ही सीमित है। यह एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगा सकता है, और अपना जहर हवा में छोड़ सकता है। अगर किसी व्यक्ति की आंखों में, किंग कोबरा का जहर चला जाए, तो वह अंधा भी हो सकता है। वे आम तौर पर मानव निवास से बचते हैं। परंतु, यह केवल मनुष्य ही हैं, जो शहरों और कस्बों के विस्तार के साथ-साथ सांपों के आवासों पर आक्रमण करते हैं, और सरीसृपों को दोष देते हैं।
जबकि, कोबरा (नाजा नाजा – Naja Naja) मानव बस्तियों के पास रहता है। वे धान के खेतों में मौजूद चूहों को खाते हैं, और उनकी फसल बचाते हैं। अन्य जहरीले सांपों में, वाइपर (Viper) शामिल है, जिसके, शरीर पर अंडाकार या हीरे के आकार के धब्बे होते हैं। इसका जहर रक्त के थक्के और मांसपेशियों के क्षय का कारण बन सकता है। एक तरफ़, क्रेट (Krait), क्षैतिज सफेद या पीली धारी वाला एक अन्य जहरीला सांप है। क्रेट कीड़ों को खाते हैं, और कीटों को नियंत्रित करते हैं।
वास्तव में, सांप देवता के रूप में भी, विभिन्न संस्कृतियों में पूजनीय हैं। उन्हें प्रजनन क्षमता, पुनर्जन्म, चिकित्सा, उपचार और समृद्धि के प्रतीक के रूप में जाना जाता हैं। विरोधाभासी रूप से, ओफिडियोफोबिया (Ophidiophobia) अर्थात, सांपों का डर, जानवरों के सबसे आम भय में से एक है। यह 2-3% मानव आबादी को प्रभावित करता है। इसलिए, सर्पदंश के डर से अक्सर सांपों को देखते ही मार दिया जाता है।
हालांकि, दुनिया भर में सांपों की लगभग 85-90% प्रजातियां गैर-जहरीली हैं। अधिकांश सांप स्वभाव से आक्रामक नहीं होते हैं, और अक्सर खुद के बचाव में या धमकी दिए जाने या उकसाए जाने पर काटते हैं। सांपों को मारना समस्याग्रस्त है। क्योंकि, उनकी घटती आबादी न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि मनुष्यों के लिए भी हानिकारक है।
शिकारी के रूप में सांप, मेंढकों, कीड़ों, चूहों और अन्य कृंतकों को खाते हैं, जिससे उनकी आबादी को नियंत्रण में रखने में मदद मिलती है। सांपों को अन्य प्रजातियां भी खाती हैं, इस प्रकार वे शिकार के रूप में खाद्य-श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
‘पारिस्थितिकी तंत्र-अभियंता’ के रूप में, सांप ‘द्वितीयक बीज फैलाव’ की सुविधा प्रदान करते हुए, पौधों के प्रजनन में योगदान देते हैं। जब सांप कृंतकों (जो बीज खाते हैं) को निगलते हैं, तो उनके मल के माध्यम से बीज उत्सर्जन होता हैं। इस प्रकार, बीज पर्यावरण में अक्षुण्ण तरीके से निष्कासित हो जाते हैं।
सांप बीमारियों की रोकथाम में भी भूमिका निभाते हैं, और कृषि समुदायों को लाभ पहुंचाते हैं। कृंतक कई पशुजन्य रोगों के वाहक होते हैं, जो मनुष्यों, कुत्तों, मवेशियों, भेड़ और अन्य घरेलू जानवरों को प्रभावित करते हैं। कृंतकों की आबादी में अचानक वृद्धि से, पशुजन्य रोगों का प्रकोप हो सकता है। उनकी अधिक आबादी फसलों को भी प्रभावित कर सकती है। अतः कृंतकों को खाकर, सांप कृंतकों की आबादी को नियंत्रण में रखते हैं, इस प्रकार पशुजन्य रोग के संचरण को रोकते हैं, और खाद्य सुरक्षा में योगदान करते हैं।
सांप कई औषधियों का भी स्रोत होते हैं। सर्पदंश के लिए एकमात्र सिद्ध और प्रभावी उपचार - सांप-विरोधी जहर या एंटी वेनम (Anti venom) भी सांपों के जहर से प्राप्त होता है। सांप के जहर का, विरोधी - जहर उत्पादन से परे चिकित्सीय महत्व है। उनसे प्राप्त कई दवाओं का उपयोग नैदानिक अभ्यास में किया जाता है।
एक तरफ, हमारे गंगा नदी के क्षेत्र में, निम्नलिखित मुख्य सांप पाए जाते हैं।
सूशी का बढ़ता चलन और समुद्री मछलियों के अस्तित्व पर गहराता संकट
जौनपुरवासियों, आज की तेज़ी से बदलती जीवनशैली में हमारे खान-पान के तरीके भी तेजी से बदल रहे हैं। कभी जो विदेशी व्यंजन केवल बड़े होटलों तक सीमित थे, आज वे ऑनलाइन डिलीवरी ऐप्स और कैफे संस्कृति के ज़रिये जौनपुर जैसे शहरों तक पहुँच चुके हैं। इन्हीं में से एक है जापानी व्यंजन सूशी, जो अब केवल लग्ज़री नहीं बल्कि ट्रेंडिंग फ़ास्ट फ़ूड बन चुका है। युवा पीढ़ी से लेकर फूड लवर्स तक, हर कोई इसके स्वाद और प्रेज़ेंटेशन का दीवाना होता जा रहा है। लेकिन इसके साथ एक गंभीर सवाल भी जुड़ा है — क्या सूशी की बढ़ती लोकप्रियता समुद्री मछलियों को विलुप्ति की ओर तो नहीं ले जा रही? यह लेख इसी स्वाद और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को समझाने का प्रयास करता है। आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2019 से सूशी (Sushi) के ऑर्डर (order) में करीब 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। गुवाहाटी और लुधियाना जैसे छोटे शहरों से भी इसकी काफी मांग दर्ज की गई है। जापानी व्यंजन सूशी को, चावल, जिन्हें वेजीटेबल (Vegetable), सैल्मन और टूना मछली (salmon and tuna) और फलों के साथ भी परोसा जाता है, भारत में इसके काफी प्रशंसक है, विशेष रूप से दिल्ली में, और हाल ही में एक ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म स्विगी (Swiggy) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण ने इसकी पुष्टि की है। सूशी के विकास का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसकी शुरुआत प्राचीन चीन (china) से हुई थी। मछली को लम्बे समय तक संरक्षित रखने के लिए सूशी के प्रारंभिक स्वरूप का जन्म हुआ। मछली को ताजा रखने के लिए, इसे चावल के साथ किण्वित किया जाता था और बाद में चावल को त्याग दिया गया और मछली का सेवन कर लिया जाता। इस प्रकिया ने जापान में भी अपना रास्ता बना लिया, जहां लोगों ने मछली के साथ चावल खाना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे कुछ संशोधनों के साथ सूशी का जन्म हुआ। यह जल्द ही जापानियों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गया और उन्होंने इसे एकदम सही बनाने के लिए सीज़निंग और सिरके (seasonings and vinegar) के साथ इसे पकाना शुरू कर दिया। सूशी व्यापक रूप से खाए जाने वाले फास्ट फूड के रूप में उभरी जो जापानी संस्कृति और परंपरा से दृढ़ता से जुड़ा हुआ है। अब, आधुनिक समय में, सूशी एक विश्व स्तर पर पसंद किया जाने वाला फास्ट फूड बन गया है, जिसे दुनिया भर में विभिन्न लोगों द्वारा अलग-अलग तरीके से खाया जाता है। वर्तमान में भारत में भी सूशी काफी लोकप्रिय है, परन्तु पहले भारतीयों के लिए यह इतनी स्वादिष्ट या सुलभ नहीं थी, जिसे ज्यादातर महंगे पांच सितारा होटलों में ही परोसा जाता था। हालांकि, बदलते समय में जापानी व्यंजनों की लोकप्रियता में वृद्धि के साथ सूशी में भी कई बदलाव हुए, विशेष रूप से शाकाहारी लोगों के लिए विभिन्न सामग्रियों के साथ सूशी की शुरूआत हुई, कई बदलाव भारतीयों के स्वाद अनुसार किये गए जिससे भारतीयों के बीच इस जापानी व्यंजन ने अपनी एक ख़ास जगह बना ली। वर्तमान समय में भारत में आपको होटलो के मेन्यू में 15 तरह की सूशी देखने को मिल जाएंगी जिन्हे भारतीय स्वाद को ध्यान में रखते हुए विभिन्न सामग्रियों और टॉपिंग के साथ नए प्रकार से बनाया जाता है। भारत में सूशी की खपत और दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में बहुत अलग है, क्योंकि अच्छी गुणवत्ता वाली सूशी को उच्च कीमत के साथ जोड़ा जाता है। दुनिया भर में सूशी महंगी है जिसके तीन मुख्य कारण है: पहला, उत्पाद की गुणवत्ता; दूसरा, शेफ (chef) के कौशल का स्तर और तीसरा, मछली जिसे कम तापमान में रखने के लिए आवश्यक उपकरणों को खरीदने और चलाने में पैसा लगता है। जापान विदेश व्यापार संगठन की रिपोर्ट कहती है कि भारत में लगभग 100 रेस्तरां (restaurant) हैं जो मुख्य रूप से जापानी व्यंजन परोसते हैं। आप जानते हैं कि नई दिल्ली में “टोक्यो”, भारत का पहला जापानी रेस्तरां था? यह 1989 में भारत पर्यटन विकास निगम की मदद से भारत में जापानी व्यंजनों के लिए खोला गया था। हालांकि, ताजी मछली और मुख्य सामग्री की कमी की शिकायतों के कारण इसे बंद कर दिया गया। “सकुरा”, वर्ष 2000 में कनॉट प्लेस के मेट्रोपॉलिटन में खुलने वाला अगला होटल था। इसके बाद तो जैसे झड़ी ही लग गई जापानी रेस्तरां की! मुंबई में त्सुबाकी (Tsubaki), ताकी- ताकी (Taki-Taki), वाकाई(Wakai); नई दिल्ली में हाराजुकु कैफे (Harajuku Cafe) और मेन्शो टोक्यो (Mensho Tokyo), गोवा में मकुत्सु (Makutsu), इज़ुमी (Izumi’s) और कोफुकु का नया आउटलेट (Kofuku’s new outlet); और चेन्नई में ओयामा (Oyama), कुछ नाम जो शीर्ष पर है और ये एक वर्ष के भीतर ही बने हैं। वर्तमान में जापानी रेस्तरां भी शाकाहारियों के लिए सूशी परोसते हैं, अब यह व्यंजन सभी का पसंदीदा बन गया है। यह रेस्तरां उन लोगों के स्वाद का भी ध्यान रखते हैं जो कच्चा मांस पसंद नहीं करते हैं। सैल्मन का उपयोग न केवल सूशी बल्कि कई व्यजनों में किया जा रहा है। अब 'अमृतसारी तवा सैल्मन' और 'बंगाली दही सरसों सामन' जैसे भारतीय संस्करणों में उत्तरी अटलांटिक (North Atlantic) और प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की सहायक नदियों के मूल निवासी सैल्मन का स्वाद ले सकते हैं। 2015 में सैल्मन की भारतीय खपत लगभग 450 टन थी, परन्तु यह धीरे-धीरे बढ़ रही है, देश में हर साल लगभग 9.2 मिलियन टन समुद्री भोजन की खपत होती है, जिसमें से आधा हिस्सा हिंद महासागर से आता है और शेष ताजे पानी के जलीय कृषि से आता है। भारत में आयातित समुद्री भोजन की दीर्घकालिक संभावना है। हालांकि, भारत में सैल्मन के बारे में किसी को भी कोई ख़ास जानकारी नहीं है फिर भी ये मछली यहाँ बड़े चाव\खाई जाती है, यह ठंडे पानी की मछली है जो समुद्र के पानी में 4 से 15 डिग्री सेल्सियस के बीच रहती है। इसलिए, अधिकांश सैल्मन फार्म उत्तरी गोलार्ध में हैं। इस मछली को खाने से रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद मिल सकती है। इसमें मौजूद फैटी एसिड हृदय के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होते है। इन्ही लाभों के कारण इसकी मांग साल दरसाल बढ़ती ही जा रही है। उत्तरी अमेरिका (North America), यूरोप (Europe) और एशिया (Asia) में सूशी और डिब्बाबंद टूना मछली की मांग से हिंद महासागर में तेजी से येलोफिन (yellowfin) टूना खत्म हो रही है। पर्यावरणविदों का कहना है कि अधिक मछली पकड़ने से टूना के विलुप्त होने का खतरा है। इनकी आबादी इतनी कम हो गई है की प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (The International Union for Conservation of Nature) की "लाल सूची" में इसकी कई प्रजातियों को रखा गया हैं। मछलियों को प्रजनन करने से पहले ही मार या पकड़ लिया जाता है, जिसका अर्थ है कि वे विलुप्त होने की ओर बढ़ रहे हैं। लंदन स्थित ब्लू मरीन फाउंडेशन (Blue Marine Foundation-BLUE) एडवोकेसी ग्रुप (advocacy group) के अनुसार, इन मछलियों को वैश्विक स्तर पर लगभग 450,000 मीट्रिक टन के करीब सालाना पकड़ा जाता है। फ्रांसीसी (French) और स्पैनिश (Spanish) भी मछली पकड़ने के बेड़े में "पर्स सीन" (purse seine) जैसे औद्योगिक तरीकों का उपयोग करते हुए विशाल जाल के साथ अधिकांश मछली लेते हैं, जो अक्सर किशोर पीले फिन का शिकार करते हैं। मछली पकड़ना समुद्री जीवों के आबादी में गिरावट लाने का एक महत्वपूर्ण कारण है। मछली की शिकार करना कोई बुरी बात नहीं है, पर यह जब बड़े बड़े जहाजों द्वारा तेजी से पकड़ी जाती है, तो इसे ओवेर फिशिंग (Over Fishing) कहा जाता है। अरबों लोग प्रोटीन के लिए मछली पर निर्भर होते है। मछली पकड़ना मुख्य रूप से लोगों का व्ययसाय होता है और लाखो लोगों का यह आजीविका का साधन है। ओवेर फिशिंग मतलब एक हद से ज्यादा मछली को पकड़ना है। इससे प्रजनन करने वाली आबादी ठीक होने के लिए बहुत कम हो जाती है। इसके लिए ख़राब मत्स्य प्रबंधन, मछली पकड़ने की अस्थिरता, आर्थिक जरूरतों के साथ-साथ अवैधता को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। इसके प्रभावों में समुद्री जीवन असंतुलन, आय की हानि, और लुप्तप्राय समुद्री प्रजातियों की कटाई शामिल है, और यह दुनिया के महासागर और समुद्री जीवन को अनकहा नुकसान पहुंचा रहा है।
मिट्टी के तेल की रोशनी: केरोसिन का आविष्कार, वैश्विक यात्रा और भारत में बदलती भूमिका
दैनिक जीवन के विभिन्न कार्यों को करने के लिए हमें ऊर्जा की आवश्यकता होती है। विद्युत ऊर्जा और ईंधन ऊर्जा हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, जो हमें विभिन्न नवीकरणीय और गैर नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त होती है। वर्तमान समय में इनके बिना जीवन की कल्पना करना असंभव प्रतीत होता है। एक समय ऐसा था जब विद्युत ऊर्जा या ईंधन ऊर्जा के लिए मनुष्य मिट्टी के तेल अर्थात केरोसिन (Kerosene) पर निर्भर था। तो आइए, आज इस लेख के जरिए केरोसिन के आविष्कार तथा इसकी उपयोगिता के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। मिट्टी का तेल अर्थात केरोसिन, जिसे पैराफिन (Paraffin) के नाम से भी जाना जाता है, एक दहनशील हाइड्रोकार्बन तरल (hydrocarbon liquid) है, जिसे पेट्रोलियम (Petroleum) से प्राप्त किया जाता है। केरोसिन का उपयोग हवा में उड़ने वाले विमानों के साथ-साथ घरों में ईंधन के रूप में व्यापक रूप से किया जाता है। केरोसिन शब्द “ग्रीक” (Greek) भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है "मोम”। केरोसिन शब्द का उपयोग अर्जेंटीना (Argentina), ऑस्ट्रेलिया (Australia), कनाडा (Canada), भारत, न्यूजीलैंड (New Zealand), नाइजीरिया (Nigeria) और संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) के अधिकांश हिस्सों में किया जाता है, जबकि चिली (Chile), पूर्वी अफ्रीका (Eastern Africa), दक्षिण अफ़्रीका (South Africa), नॉर्वे (Norway) और यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) में केरोसिन को पैराफिन के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा एशिया (Asia) और दक्षिणपूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिकांश हिस्सों में केरोसिन को लैंप ऑयल (Lamp Oil) के नाम से जाना जाता है। केरोसिन के बारे में एक अवधारणा है कि यह पेट्रोलियम से प्राप्त होता है किंतु सबसे पहले केरोसिन का आविष्कार पेट्रोलियम से नहीं, बल्कि कोयले का आसवन करके किया गया था तथा इसका पहला बड़ा अनुप्रयोग खाना पकाने के ईंधन के रूप में नहीं, बल्कि लैंप जलाने के लिए (बिजली के आविष्कार से पहले) किया गया।
तेल के लैंप का उपयोग सदियों से किया जाता रहा है, सबसे पहले खोजे गए लैंप 9वीं शताब्दी के फारस (Persia) के हैं। ऐतिहासिक रूप से ये लैंप वनस्पति तेल, मनुष्य या पशु वसा से जलाए जाते थे। 1700 और 1800 के दशक की शुरुआत में, लैंप जलाने के लिए व्हेल के तेल का उपयोग किया जाता था । लेकिन फिर 1846 में जब कनाडा (Canada) के प्रसिद्ध भूविज्ञानी और आविष्कारक अब्राहम गेस्नर (Abraham Gesner) बिटुमिनस कोयले (Bituminous coal) और तेल शेल (Oil shale) का आसवन कर रहे थे, तब उन्हें एक महत्वपूर्ण पदार्थ प्राप्त हुआ जिसे केरोसिन नाम दिया गया। केरोसिन पारंपरिक तेल के लैंप को रोशन करने के लिए इस्तेमाल होने पर एक चमकदार लौ पैदा करता था जिससे इसका उपयोग व्यापक हो गया। केरोसिन के आविष्कार के बाद 1854 में इसका व्यावसायिक उत्पादन शुरू हुआ। इसका उपयोग व्यापक रूप से विमान के जेट इंजनों और कुछ रॉकेट इंजनों को रॉकेट प्रोपेलेंट-1 या रिफाइंड पेट्रोलियम-1 (Rocket Propellant-1 or Refined Petroleum-1 (RP-1) के रूप में ऊर्जा देने के लिए किया जाता है। इसके अलावा इसका उपयोग आमतौर पर खाना पकाने के लिए और प्रकाश ईंधन के रूप में भी किया जाता है। एशिया के कुछ हिस्सों में केरोसिन का उपयोग छोटी आउटबोर्ड मोटरों (Outboard motors) या मोटरसाइकिलों के लिए ईंधन के रूप में किया जाता है। ऐसा अनुमान है कि पूरे विश्व में विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रति दिन लगभग 1,110,000 घन मीटर केरोसिन का उपयोग होता है। केरोसिन की खोज के बाद कई दैनिक गतिविधियां बहुत आसान बन गईं। उद्योगों और घरों में इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाने लगा। विभिन्न उद्योग बिजली पैदा करने और ईंधन के रूप में केरोसिन का उपयोग करने लगे तथा लोगों ने दीयों या लैंपों को जलाने और खाना पकाने के लिए केरोसिन का उपयोग शुरू कर दिया। प्रारंभ में केरोसिन बहुत महंगा था, लेकिन जब शोध से पता चला कि केरोसिन को पेट्रोलियम से भी परिष्कृत किया जा सकता है, तो केरोसिन के उपयोग में वृद्धि होने लगी। ऐसा अनुमान है कि 1860 तक अमेरिका में केरोसिन का उत्पादन करने वाली रिफाइनरियों की संख्या 30 के आस-पास हो गई । जिससे धीरे-धीरे केरोसिन के दाम में गिरावट होने लगे । 1850 के दशक के उत्तरार्ध में केरोसिन से जलने वाले लैंपों की मांग में अत्यधिक बढ़ोतरी हुई। 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के दौरान केरोसिन की सहायता से जलने वाले लैंपों का उपयोग घर, खुदरा प्रतिष्ठान, चिकित्सा कार्यालय, अस्पताल, कारखानें इत्यादि लगभग हर जगह किया जाने लगा। एक समय तो ऐसा भी था जब शहरों की कानून व्यवस्था की देखभाल करने वाली पुलिस भी प्रकाश व्यवस्था के लिए पूरी तरह से केरोसिन पर निर्भर थी। इसके अलावा ट्रेनों के लिए इनडोर लाइटिंग (Indoor lighting), हेडलैम्प्स (Headlamps) और सिग्नलिंग उपकरणों (Signaling devices) में भी केरोसिन का उपयोग किया जाने लगा। केरोसिन का आविष्कार कृषि में भी सहायक बना क्योंकि अब किसान घंटों तक अपने खेतों में काम कर सकते थे, परिणामस्वरूप उनकी उपज में वृद्धि हुई। विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी केरोसिन का उपयोग किया जाने लगा, यहां तक कि सिर के जूँ को मारने के लिए भी केरोसिन उपयोगी हो गया। 1879 में एक विश्वसनीय, व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य इलेक्ट्रिक लाइट बल्ब के आविष्कार के साथ केरोसिन से जलने वाले लैंपों या दीयों के उपयोग में गिरावट आने लगी। हालांकि, 1940 के दशक तक भी कुछ समुदाय केरोसिन से जलने वाले लैंपों का उपयोग कर रहे थे। आज अधिकांश देशों, विशेष रूप से, उत्तरी अमेरिका में केरोसिन को एक सुखद स्मृति के रूप में याद किया जाता है, जो उन्हें पुराने अच्छे दिनों की याद दिलाता है। कुछ विकासशील देशों जैसे नाइजीरिया (Nigeria) में अनुमानित 90 प्रतिशत घर अभी भी खाना पकाने, प्रकाश आदि के लिए केरोसिन पर निर्भर हैं।भारत में केरोसीन को सबसे पहले अलाप्पुझा स्थित मैसर्स अर्नोल्ड चेनी एंड कंपनी ऑफ न्यूयॉर्क (M/s Arnold Cheney and Co of New York) और बाद में मैसर्स रिप्ले और मैके (M/s Ripley and Mackay) द्वारा त्रावणकोर में आयात किया गया था। इसके बाद बर्मा-शेल (Burma Shell) कंपनी ने 1928 में केरोसिन का आयात और विपणन किया। भारत में केरोसिन में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की शुरुआत करीब 80 से 90 साल पहले हुई थी। अमेरिकियों ने भारत में केरोसिन का एक बड़ा बाजार देखा और इस प्रकार भारत में 5 जुलाई 1952 को 'ईएसएसओ' (ESSO) कंपनी एक नए नाम 'स्टैंडर्ड वैक्यूम रिफाइनिंग कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड' (Standard Vacuum Refining Company of India Limited) के साथ स्थापित की गई। बर्मा शेल (Burma Shell) कंपनी ने भारत में केरोसिन की खोज की, जिससे भारत में केरोसिन का उपयोग अधिक व्यापक हो गया । परिणामस्वरूप, भारत इस तरल पदार्थ पर काफी निर्भर हो गया। घरों में इस्तेमाल होने वाले लैंप और लालटेन केरोसिन से जलाए जाने लगे, गाड़ियाँ, मोटरसाइकिलें और यहाँ तक कि पंखे भी केरोसिन की मदद से चलाए जाने लगे।
केरोसिन ने कई अन्य उद्योगों को भी जन्म दिया, जैसे लैंप में इस्तेमाल होने वाले रेशम के आवरण तथा केरोसिन के इस्तेमाल से उपयोग की जाने वाली इस्त्री आदि। भारत में केरोसिन दैनिक जीवन का इतना महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया कि इसे राशन की दुकानों में बेचा जाने लगा। हालांकि, आज विद्युत या बिजली ने केरोसिन का स्थान ले लिया है, जो आज सबसे दूरस्थ स्थानों तक भी पहुंच गई है। जिस केरोसिन से कभी बाइक और कारें चलती थीं, वह बिजली के आविष्कार के बाद से अप्रचलित हो गई। स्वच्छ और अधिक परिष्कृत ईंधन उपलब्ध होने के कारण केरोसिन पर लोगों की निर्भरता कम हो गई।
जौनपुरवासियों, जानिए दूध के पौष्टिक रहस्य और मानव सभ्यता में उसकी अमूल्य भूमिका
हमारी भारतीय संस्कृति में दूध को पार्यप्त आहार माना गया है। पार्यप्त आहार होने का यह तर्क यूं ही नहीं दिया गया, बल्कि इसके पीछे एक ठोस आधार है। दरसअल दूध को शरीर के समुचित विकास के लिए सबसे आदर्श आहार माना गया है। क्यों की इसमें शरीर के लिए सभी बेहद ज़रूरी पोषक तत्व जैसे, कैल्शियम (calcium), फास्फोरस (phosphorus), विटामिन बी (B vitamins), पोटेशियम (potassium) और विटामिन डी (vitamin D) के साथ ही प्रोटीन आदि प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अलावा इसमें कई एंजाइम और कुछ जीवित रक्त कोशिकाएं भी हो सकती हैं। इंटरनेशनल डेयरी जर्नल (International Dairy Journal) के द्वारा किये गए एक शोध से यह बात साबित हो चुकी है कि दूध न पीने वाले लोगों की तुलना में, रोजाना कम से कम एक ग्लास दूध पीने वाले लोग हमेशा मानसिक और बौद्धिक तौर पर बेहतर स्थिति में होते हैं। मनुष्य अथवा जानवरों का नवजात शिशु तब तक दूध पर निर्भर रहता है, जब तक वह अन्य पदार्थों का सेवन करने में अक्षम होता है। जिसे वह अपनी माता से प्राप्त करता है। साधारणतया दूध में 85 प्रतिशत जल होता है, और शेष भाग में ठोस तत्व यानी खनिज व वसा होता है। गाय-भैंस के अलावा बाज़ारों में विभिन्न कंपनियों का डिब्बा बंद दूध भी उपलब्ध हो जाता है। मनुष्य ने सबसे पहले नियमित रूप से अन्य स्तनधारियों के दूध का सेवन करना नवपाषाण क्रांति या कृषि के विकास के दौरान सीखा, जब उनसे जानवरों पालतू बनाना शुरू किया। दूध पीने की शुरुआत मेसोपोटामिया (Mesopotamia) में 9000–7000 ईसा पूर्व से अमेरिका (Americas) में 3500–3000 ईसा पूर्व के बीच हुई। दक्षिण पश्चिम एशिया में सबसे पहले भेड़ और बकरियों को पालतू बनाया गया और दूध प्राप्त किया गया। प्रारंभ में जानवरों को मांस के लिए रखा जाता था, और डेयरी उद्योग, बालों और श्रम के लिए घरेलू पशुओं का इस्तेमाल चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में बहुत बाद में शुरू हुआ। लगभग 7000 ईसा पूर्व तक दूध देने वाले घरेलु जानवर दक्षिण पश्चिम एशिया से यूरोप में फैल गए। अफ्रीका में भी भेड़ और बकरियों को दक्षिण पश्चिम एशिया से लाया गया, लेकिन अफ्रीकी मवेशियों को लगभग 7000-6000 ईसा पूर्व स्वतंत्र रूप से पालतू बनाया गया। चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक पालतू ऊंटों को मध्य अरब, उत्तरी अफ्रीका और अरब प्रायद्वीप में डेयरी जानवरों के रूप में भी इस्तेमाल किया जाने लगा। मध्य युग के दौरान दूध को "पुण्य सफेद शराब (virtuous white wine)" कहा जाता था, क्योंकि शराब पीने के लिए पानी की तुलना में अधिक सुरक्षित थी। 10,000 वर्ष पूर्व प्रारंभिक मनुष्यों ने जंगली जानवरों को अपने बच्चों को पालते हुए देखा जैसे वे अपने बच्चों को पालते थे। जिसके बाद मनुष्य ने बकरियों और ऑरोच (गाय की पैतृक नस्लों) को पकड़कर दूध को मिट्टी के बर्तनों में इकट्ठा करना शुरू कर दिया । वे भी जल्द ही समझ गए थे की अन्य जानवरों का दूध एक संपूर्ण, पौष्टिक भोजन है। वैज्ञानिकों के पास इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि मनुष्यों ने कम से कम 10,000 साल पहले जानवरों का कच्चा दूध पीना शुरू किया था। प्राचीन शिशु बोतलें इस बात का प्रमाण देती हैं, कि कम से कम 8,000 साल पहले जानवरों के दूध का इस्तेमाल मानव शिशुओं को पिलाने के लिए शरू कर दिया था। दूसरे जानवरों का दूध पिलाने की यह संस्कृति इतनी लोकप्रिय हुई की अगले कुछ हज़ार वर्षों में ही भूमध्यसागरीय क्षेत्र, यूरोप, एशिया और मध्य पूर्व में फैल गईं। मानव इतिहास में, ऊंट, गाय, बकरी, भेड़, गधे, घोड़े, जल भैंस, हिरन और अन्य स्तनधारियों सहित कई प्रजातियों का उपयोग उनके दूध के लिए किया गया है। दूध के प्रचलित होने से अब लोगों को अब अपना अधिकांश समय भोजन प्राप्त करने में खर्च नहीं करना पड़ता था, और इसके बजाय वे कस्बों के विकास के लिए अपनी मस्तिष्क शक्ति का उपयोग कर सकते थे। जिसके बाद पालतू जानवर उच्च मूल्य की संपत्ति बन गए। जैसे-जैसे सभ्यता आगे बढ़ी, दूध देने वाले स्तनधारियों के मालिक अमीर बन गए और समुदायों के लिए भोजन का स्रोत बन गए। कच्चे दूध ने मनुष्यों को ऐसी परिस्थितियों में भी पनपने में सहायता की , जहां जीवित रहना मुश्किल होता। दूध ने मानव को भोजन की स्थिर आपूर्ति के साथ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रवास और प्रसार करने की अनुमति दी। आज भारत में, डेयरी क्षेत्र देश के सामाजिक-आर्थिक और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। डेयरी उद्योग गांवों में लाखों घरों को आजीविका प्रदान करता है तथा शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में लोगों को गुणवत्तापूर्ण दूध और दूध उत्पादों की आपूर्ति सुनिश्चित करता है। वैश्विक दुग्ध उत्पादन में भारत प्रथम स्थान पर है, जो 1990-1991 के 53.9 मिलियन टन से बढ़कर 2012- 13 में 127.9 मिलियन टन हो गया है। यह क्षेत्र भारत की राष्ट्रीय आय का लगभग एक चौथाई योगदान देता है, और कृषि में लगे कुल कर्मचारियों की संख्या लगभग 60 प्रतिशत है। भारत 21वीं सदी के मेगा डेयरी बाजार के रूप में उभर रहा है। यह देश में ग्रामीण रोजगार और आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। पिछले तीन दशकों के दौरान भारत में इस क्षेत्र की वृद्धि दर 5% प्रति वर्ष देखी गई है। 90% से अधिक पशुधन की देखभाल और प्रबंधन महिलाओं द्वारा किया जाता है। जहां एक सामान्य वर्ष में, फसल उत्पादन केवल 90 से 120 दिनों के रोजगार पैदा कर सकता है। बाकी बचे हुए समय में किसान बेरोज़गार रहते हैं, ऐसी स्थिति में डेयरी उद्पादन ग्रामीण क्षेत्रों मील का पत्थर साबित हो सकता है।
दक्षिण भारतीय विवाह परंपराएँ: विविध संस्कृतियों, रस्मों और उत्तर भारत से भिन्नताओं की झलक
हमारा देश भारत अपने समृद्ध इतिहास के साथ साथ अपनी समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों के लिए जाना जाता है। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा कि हमारा देश भारत विविध संस्कृतियों का एक ऐसा रंग-बिरंगा गुलदस्ता है, जिसमें प्रत्येक संस्कृति रूपी फूल की अपनी एक अनोखी विशेषता है। यह विविधता प्रत्येक क्षेत्र की अनोखी विवाह परंपराओं में भी देखी जाती है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक प्रत्येक क्षेत्र और राज्य में होने वाले विवाह उत्सवों से संबंधित रीति रिवाजों एवं परंपराओं में कहीं समानता देखने को मिलती है तो कहीं पूरी तरह भिन्नता। उत्तर भारत में जहाँ विवाह रात के दौरान संपन्न किये जाते हैं, वहीं दक्षिण भारत में विवाह उत्सव दिन के दौरान संपन्न होते हैं। जैसा कि हम उत्तर भारत में ही निवास करते हैं तो उत्तर भारत के विवाह उत्सवों के रीति रिवाज़ों से हम भली भांति परिचित हैं। तो आइये आज के अपने इस लेख के माध्यम से हम आपको दक्षिण भारत में संपन्न होने वाले विवाह उत्सवों की संस्कृति एवं परंपराओं के विषय में बताने का प्रयास करते हैं। इसके साथ ही यह भी जानते हैं कि दक्षिण भारतीय विवाह उत्सव उत्तर भारतीय विवाह समारोहों से कैसे भिन्न होते हैं।
दक्षिण भारत में विवाह के दौरान भव्य समारोह आयोजित किए जाते हैं। हालांकि पूरे भारतवर्ष में हिंदू विवाह में कुछ मुख्य रस्में तो आम होती हैं लेकिन दक्षिण भारतीय विवाह में कुछ अनूठी रस्मों एवं परंपराओं का पालन किया जाता है। केवल इतना ही नहीं दक्षिण में भी अलग अलग राज्यों में और कभी कभी राज्यों के अंदर अलग अलग क्षेत्रों में कुछ विशेष परंपराएं होती हैं। केरल में गठबंधन स्वीकृत होने के बाद, दोनों परिवार विवाह की तारीख तय करने के लिए मिलते हैं और एक सगाई समारोह आयोजित करके इसकी घोषणा कर देते हैं। वहीं तमिलनाडु में दोनों परिवार विवाह से एक दिन पहले घर पर या मंदिर में अपने देवताओं से नए जोड़े के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं। इस रिवाज को पंडा काल मुहूर्तम कहा जाता है। दुल्हन सुखी वैवाहिक जीवन के लिए सुमंगली प्रार्थना करती है। चावल के आटे से पारंपरिक डिज़ाइन बनाए जाते हैं, जिन्हें 'कोलम' कहा जाता है। अनिष्ट से बचने के लिए दूल्हा-दुल्हन की कमर पर हल्दी से रंगा सूती धागा बांधा जाता है।
जबकि कर्नाटक में आधिकारिक सगाई समारोह को निश्चय तामुलम कहते हैं, जिसमें माता-पिता दोनों पान के पत्तों का आदान-प्रदान करते हैं और दूल्हा और दुल्हन को अपने नए परिवारों से उपहार मिलते हैं। दोनों परिवारों में नंदी शास्त्र का पाठ किया जाता है, जहां विवाह समारोह की शुरुआत का संकेत देने के लिए घर में पानी से भरा एक तांबे का कलश और उसके ऊपर एक नारियल रखा जाता है। और तेलंगाना में विवाह से कुछ दिन पहले, पेलिकुटुरु और पेलिकोडुकु समारोह आयोजित किए जाते हैं, जिनमे परिवार की महिलाएं दूल्हा दुल्हन के शरीर पर आटा, हल्दी और सुगंधित तेल का पेस्ट लगाती हैं और उन्हें हल्दी के पानी से स्नान कराती हैं। हालांकि दक्षिण भारतीय विवाह में मेहंदी, संगीत और हल्दी समारोह उत्तर भारतीय परंपराओं के समान ही आयोजित किए जाते हैं। विवाह के दिन तमिलनाडु में, दूल्हा और दुल्हन को उनके परिवार की विवाहित महिलाएँ हल्दी, चंदन और सिन्दूर का मिश्रण लगाती हैं और पवित्र जल से स्नान कराती हैं; इसे मंगला स्नानम कहा जाता है। दुल्हन देवी का आशीर्वाद पाने के लिए गौरी पूजा करती है। कर्नाटक में दूल्हे आसपास के सभी मंदिरों में जाते हैं और सभी देवताओं से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
केरल में, दूल्हे को दुल्हन के परिवार की महिलाएं 'थालम' में फूल, अगरबत्ती और दीपक जैसी विभिन्न शुभ वस्तुएं लेकर पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि के साथ मंडप तक ले जाती हैं। वहीं तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक में दूल्हे एक छड़ी, छाता और कुछ भोजन लेकर काशी की ओर भागने का नाटक करते हैं - मानो कि यह उनके कुंवारे रहने का आखिरी मौका है। दुल्हन के पिता उसका पीछा करते हैं, और उसे विश्वास दिलाते हैं कि उनकी बेटी से विवाह करना उसके लिए बेहतर होगा। तेलुगु शादियों में, दुल्हन के पिता और भाई दूल्हे को गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के लिए मनाते हैं। दक्षिण भारतीय विवाह में दुल्हन के विवाह स्थल पर पहुंचने के बाद दुल्हन के परिवार की ओर से पद पूजा समारोह किया जाता है। दुल्हन का परिवार दूल्हे के पैरों को गुलाब जल, पवित्र जल, दूध, चंदन और कुमकुम से धोता है। धोने के बाद पैरों को फूलों की पंखुड़ियों से पोंछा जाता है। यह एक सम्मान है जो दुल्हन का परिवार दूल्हे को देता है। काशी यात्रा और पद पूजा के बाद मलाई मात्रल समारोह होता है जिसमें दूल्हा और दुल्हन एक-दूसरे को फूल माला पहनाते हैं और इस अनुष्ठान को तीन बार दोहराया जाता है।
दक्षिण भारतीय विवाह में दूल्हे को भगवान विष्णु के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है। दूल्हा-दुल्हन को जीवन भर के बंधन में बांधने के लिए, दुल्हन की साड़ी के सिरे को दूल्हे के अंगवस्त्रम के सिरे से बांधा जाता है। दुल्हन की माँ दूल्हे के पैर धोकर दूल्हे की आँखों में काजल लगाती है। फिर दुल्हन के पिता अपनी बेटी का हाथ पकड़कर उन्हें एक नारियल देते हैं जिस पर दुल्हन की मां पवित्र जल डालती है। फिर सप्तपदी की रस्म में दूल्हा-दुल्हन हाथ पकड़ते हैं और वैदिक मंत्रों के जाप के साथ पवित्र अग्नि के चारों ओर सात बार परिक्रमा करते हैं। दक्षिण भारतीय विवाह की वह विशेषता जो उत्तर भारतीय विवाह से पूरी तरह अलग है, वह है दूल्हे और दुल्हन के विवाह के जोड़े। दक्षिण भारतीय विवाह में दूल्हे को क्रीम रंग की रेशमी शर्ट, या कुर्ता, और धोती, या मुंडू पहनाया जाता है। तेलुगु और कन्नड़ दूल्हे कपड़े की पगड़ी पहनते हैं। वही दक्षिण भारतीय दुल्हन विवाह के दिन सोने के आभूषणों, और लाल एवं अन्य जीवंत रंगों की रेशमी साड़ी में पूरी तरह खिल जाती है। कुछ समुदायों में, दूल्हा इस समय दुल्हन को 'पुदावा' या दुल्हन की साड़ियाँ उपहार में देता है। केरल की दुल्हनें आम तौर पर ऑफ-व्हाइट या क्रीम रंग की वेष्टी-मुंडू, या बॉर्डर वाली बनारसी रेशम की साड़ियाँ पहनती हैं। तमिलनाडु में दुल्हन आम तौर पर या तो पारंपरिक 9 गज़ की 'मदिसार' साड़ी या गहना टोन में भारी कांचीपुरम साड़ी पहनती है। तेलुगु और कन्नड़ दुल्हनें पारंपरिक रूप से लाल, हरे, मैरून, बैंगनी जैसे गहरे रंगों वाली साड़ियां पहनती है। काले और सफेद रंग को अशुभ माना जाता है और आमतौर पर दुल्हन इसे कभी नहीं पहनती है। आइए अब जानते हैं कि दक्षिण भारतीय विवाह उत्तर भारतीय विवाह समारोहों से किस तरह भिन्न होते हैं: 1. समारोह और अनुष्ठान: आमतौर पर, दक्षिण भारतीय विवाहों को धार्मिक और पारंपरिक परंपराओं से चिह्नित किया जाता है। शुभ "मुहूर्त" से लेकर मालाओं के आदान-प्रदान और मंगलसूत्र बांधने तक, प्रत्येक रस्म को मंत्रोच्चारण के साथ संपन्न किया जाता है। दूसरी ओर, उत्तर भारतीय विवाहों में हल्दी, संगीत और जूता छुपाई जैसे रीति-रिवाज दक्षिण से पूरी तरह अलग होते हैं। 2. गहने और कपड़े: दक्षिण भारत में दुल्हन आमतौर पर पारंपरिक रेशम की साड़ी और सोने के आभूषण पहनती है। दूसरी ओर, उत्तर भारतीय दुल्हन "पोल्की" और "कुंदन" सेट जैसे अलंकृत सोने के आभूषणों के साथ रंगीन साड़ी या लहंगा पहनना पसंद करती हैं। वही दक्षिण भारतीय दूल्हे सफेद या क्रीम रंग की शर्ट और धोती पहनते हैं तो उत्तर भारतीय दूल्हे जड़ाऊ शेरवानी या सूट पहनना पसंद करते हैं। 3. भोजन: उत्तर और दक्षिण दोनों विवाह समारोहों में प्रत्येक क्षेत्र की विविध पाक परंपराओं को दर्शाया जाता है। दक्षिण भारतीय विवाह में डोसा, इडली, वड़ा जैसे व्यंजन और चावल से बने कई व्यंजन शामिल होते हैं। दूसरी ओर, उत्तर भारतीय विवाह में समृद्ध करी और स्वादिष्ट कबाब से लेकर जलेबी और गुलाब जामुन जैसी समृद्ध मिठाइयों तक विविध प्रकार के भोजन शामिल होते हैं। उत्तरी शादी की दावतों के मुख्य आकर्षणों में स्वादिष्ट बिरयानी और तंदूरी रसोई के व्यंजन भी शामिल हैं। 4. स्थान और सजावट: दोनों क्षेत्रों के बीच विवाह समारोह के माहौल और शैली में बड़ा अंतर है। दक्षिण भारतीय विवाहों में पारंपरिक फूलों की सजावट और रूपांकन आम हैं। आयोजन स्थलों को मुख्य रूप से आम के पत्तों और सुगंधित चमेली के फूलों से सजाया जाता है। दूसरी ओर, उत्तर भारतीय विवाहों में महंगी सजावट, जटिल मंच सेट, जीवंत पर्दे और विस्तृत पुष्प पृष्ठभूमि, आदि पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। 5. नृत्य और संगीत: भारत में किसी भी क्षेत्र में विवाह उत्सव को संगीत और नृत्य के बिना पूरा नहीं माना जाता। दक्षिण भारतीय विवाह में नादस्वरम और मृदंगम जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ भरतनाट्यम जैसे शास्त्रीय नृत्यों और कर्नाटक संगीत का मंच पर आयोजन होता है । वहीं दूसरी ओर, शहनाई और ढोल की आवाज़ के साथ गिद्दा और भांगड़ा जैसे जीवंत लोक नृत्य अक्सर उत्तर भारतीय विवाहों से जुड़े होते हैं। उत्तर भारतीय विवाह समारोहों में मंच पर अक्सर बॉलीवुड संगीत और नृत्य प्रदर्शन शामिल होते हैं। 6. निमंत्रण पत्र: परंपरागत रूप से, अक्सर धार्मिक विषयों, या देवताओं की तस्वीरों के साथ, दक्षिण भारतीय विवाह निमंत्रण पत्र, सुंदर और विनम्र होते हैं, । इनमें विवाह समारोह के प्रमुख तत्वों को सटीक और संक्षिप्त रूप से व्यक्त करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। दूसरी ओर, उत्तरी विवाह निमंत्रण पत्र भव्य और विस्तृत होते हैं, जिनमें समृद्ध डिजाइन, ज्वलंत रंग और फ़ॉइलिंग, एम्बॉसिंग और लेजर-कट विवरण जैसे अलंकरण होते हैं। ये निमंत्रण कला के नमूने होते हैं जो उत्तर भारतीय विवाहों की समृद्धि और भव्यता को दर्शाते हैं। 7. विवाह से पहले और बाद की परंपराएं: उत्तर और दक्षिण क्षेत्रों के विवाह समारोह की पहले और बाद की परंपराएं भिन्न भिन्न होती हैं। जबकि उत्तरी विवाह में संगीत और हल्दी समारोह जैसी विवाह से पहले की रस्में नृत्य, संगीत और मौज-मस्ती से भरपूर होती हैं, दक्षिण भारतीय विवाहों में मेहंदी समारोह और निश्चयार्थम (सगाई) जैसी विवाह से पहले की रस्में, सादगी से की जाती हैं। गृहप्रवेशम समारोह, जो दुल्हन का उसके नए घर में स्वागत को संदर्भित करता है, और सप्तपदी समारोह, जिसमें पवित्र अग्नि के चारों ओर सात फेरे लगाना शामिल है, विवाह के बाद के रीति-रिवाज़ हैं जो जोड़े की एक साथ यात्रा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वास्तव में दोनों क्षेत्रों की विवाह रस्मों एवं परंपराओं में यह अंतर, प्रत्येक क्षेत्र एवं राज्य के विशिष्ट ऐतिहासिक रीति-रिवाज़, पोशाक, भोजन और सांस्कृतिक गतिविधियों के कारण होता है।
प्रयाग के त्रिवेणी संगम पर माघ मेला:आस्था, इतिहास और पवित्र स्नान की पारंपरिक तीर्थ यात्रा
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ! प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) में त्रिवेणी संगम के पावन तट पर लगने वाला माघ मेला भारत की प्रमुख धार्मिक यात्राओं में से एक है। यह मेला हिंदू पंचांग के माघ मास में आयोजित होता है, जो सामान्यतः जनवरी-फ़रवरी के बीच आता है। माघ मेला लगभग 45 दिनों तक चलता है और इसकी शुरुआत पौष पूर्णिमा से होकर महाशिवरात्रि पर संपन्न होती है। गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती नदियों के संगम पर स्नान करना इस मेले का मुख्य धार्मिक आधार माना जाता है। इतिहास के पन्नों में भी माघ मेले के उल्लेख मिलते हैं। सातवीं शताब्दी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) ने प्रयाग में होने वाले धार्मिक आयोजनों का वर्णन किया है। वहीं, मुग़ल काल के एक फ़ारसी ग्रंथ खुलासत-उत-तवारीख में भी यहाँ होने वाले वार्षिक हिंदू धार्मिक स्नानोत्सव का उल्लेख मिलता है, जिसे माघ मेला माना जाता है। यह दर्शाता है कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।
मेले की शुरुआत पौष पूर्णिमा के पहले स्नान से होती है। पूरे आयोजन के दौरान कई पवित्र स्नान तिथियाँ आती हैं, जिनमें मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी, माघ पूर्णिमा जैसी तिथियाँ विशेष महत्व रखती हैं। इन दिनों संगम पर लाखों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं। विशेष रूप से कल्पवास करने वाले श्रद्धालुओं के लिए ये स्नान अनिवार्य माने जाते हैं। कल्पवास के दौरान श्रद्धालु संगम तट पर अस्थायी कुटियों में रहकर संयमित जीवन, पूजा, दान और तप का पालन करते हैं। कल्पवास के समय यज्ञ, हवन और दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। भोजन दान, अनाज दान और तिल दान को अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। साधु-संतों की उपस्थिति, धार्मिक अनुष्ठान और भक्ति का वातावरण पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।
हर चौथे वर्ष माघ मेला कुंभ मेले का रूप ले लेता है और बारहवें वर्ष यह महाकुंभ बन जाता है, जब देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु प्रयागराज पहुँचते हैं। इस प्रकार माघ मेला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और सामूहिक श्रद्धा की जीवंत मिसाल भी है।
कैसे रेडियो के आविष्कार ने बदल दी संचार और मनोरंजन की दुनिया की पूरी कहानी
जौनपुरवासियों, आज के डिजिटल दौर में जब सूचनाएँ मोबाइल स्क्रीन पर पल-पल बदलती रहती हैं और सोशल मीडिया पर आवाज़ें शोर में बदल जाती हैं, ऐसे समय में रेडियो आज भी एक शांत, भरोसेमंद और मानवीय माध्यम बना हुआ है। जौनपुर जैसे शहरों में रेडियो केवल मनोरंजन या ख़बरों का साधन नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक स्वाभाविक हिस्सा रहा है। सुबह की चाय के साथ बजता कार्यक्रम हो, खेत या दुकान पर काम करते समय सुनाई देती आवाज़ हो, या सफ़र के दौरान रास्ते का साथी - रेडियो बिना ध्यान खींचे जीवन के साथ चलता रहता है। हर साल 13 फ़रवरी को विश्व रेडियो दिवस (World Radio Day) मनाया जाता है, जो हमें याद दिलाता है कि तमाम तकनीकी बदलावों के बावजूद रेडियो की प्रासंगिकता क्यों बनी हुई है। यह दिवस सिर्फ़ एक माध्यम का उत्सव नहीं, बल्कि उस भरोसे, आत्मीयता और सांस्कृतिक जुड़ाव का सम्मान है जो रेडियो लोगों के साथ वर्षों से बनाता आया है। रेडियो की खासियत यही है कि यह देखने की नहीं, सुनने और महसूस करने की चीज़ है - एक ऐसी आवाज़ जो अकेलेपन में साथी बनती है और समुदाय में अपनापन जगाती है।
प्राचीन काल से ही मानव ने अपने मनोरंजन के लिये विविध प्रकार के तरीकों को अपनाया। किंतु समय बदलने के साथ ये तरकीबें आविष्कारों में परिवर्तित होने लगीं जिन्होंने लोगों को कई वर्षों तक मनोरंजित किया। रेडियो (Radio) भी इन्हीं आविष्कारों में से एक है। रेडियो का विकास पहले वायरलेस टेलीग्राफी (Wireless Telegraphy) के रूप में शुरू हुआ। किंतु बाद में इसने अपने इतिहास में प्रसारण को भी शामिल कर लिया। तो जानते हैं कि रेडियो है क्या और इसका आविष्कार कैसे हुआ।
वास्तव में रेडियो वह तकनीक है जो रेडियो तरंगों का उपयोग करके संकेत या संचार का माध्यम बनती है। रेडियो तरंगें 30 हर्ट्ज़ (Hertz) और 300 गीगाहर्ट्ज़ (Gigahertz) के बीच की आवृत्ति की विद्युत चुम्बकीय तरंगें हैं। ये तरंगे तब उत्पन्न होती हैं जब एक इलेक्ट्रॉनिक (Electronic) उपकरण जिसे ट्रांसमीटर (Transmitter) कहा जाता है, को एक एंटीना (Antenna) से जोड़ा जाता है जिससे यह तरंगों को प्रसारित करने लगता है। ये तरंगे दूसरे एंटीना से जुड़े एक रेडियो रिसीवर (Receiver) द्वारा प्राप्त की जाती हैं। रेडियो के आविष्कार की प्रक्रिया और विकास ने बहुत समय लिया जिसे लेकर विविध प्रकार के सिद्धांत भी दिए गये।
गुग्लीयेल्मो मार्कोनी (Guglielmo Marconi)
रेडियो संचार के आविष्कार के लिये गुग्लीयेल्मो मार्कोनी (Guglielmo Marconi) को श्रेय दिया गया है। किंतु इसका इतिहास इतना ही नहीं बल्कि बहुत विस्तृत है। दरसल इनसे पहले 1860 में स्कॉटिश भौतिक विज्ञानी जेम्स क्लर्क मैक्सवेल (James Clerk Maxwell) ने रेडियो तरंगों के अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी। 1888 में हेनरिक रुडोल्फ हर्ट्ज़ ने एक प्रयोग में चुम्बकीय तरंगों के वायु में संचरण को निर्णायक रूप से सिद्ध कर मैक्सवेल के विद्युत चुंबकत्व सिद्धांत की पुष्टि की। उन्होंने यह दर्शाया कि विद्युत प्रवाह के तेज़ बदलावों को रेडियो तरंगों के रूप में अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया जा सकता है। इस बीच कई वैज्ञानिकों ने इस पर शोध किया। तत्पश्चात 1894 में इतालवी आविष्कारक गुग्लीयेल्मो मार्कोनी ने एयरबोर्न हर्ट्ज़ियन (Airborne Hertzian) तरंगों (रेडियो प्रसारण) पर आधारित पहला पूर्ण और व्यावसायिक रूप से सफल वायरलेस टेलीग्राफी सिस्टम बनाया। मार्कोनी ने सैन्य और समुद्री संचार में रेडियो के अनुप्रयोग का प्रदर्शन किया और रेडियो संचार सेवाओं और उपकरणों के विकास और प्रसार के लिए एक कंपनी शुरू की।
1920 में फ्रैंक कोनराड (Frank Conrad) ने सरकार की अनुमति से पहली बार रेडियो स्टेशन शुरू किया और इसलिये वे रेडियो ब्रोडकास्टिंग (Radio broadcasting) के जनक कहलाये जाने लगे। इसके बाद कई सारे रेडियो स्टेशन की शुरुआत हुई जिनमें से लन्दन का बीबीसी रेडियो ब्रोडकास्टिंग अति विख्यात हुआ। भारत में ऑल इंडिया रेडियो (All India Radio) की स्थापना 1936 में की गयी जिसे 1957 में आकाशवाणी के नाम से पुकारा जाने लगा।
आपके लिये यह जानना बहुत रोचक होगा कि वास्तव में भारतीय भौतिक वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने भी इस आविष्कार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब हेनरिक हर्ट्ज़ ने विद्युत चुम्बकीय तरंगों के अस्तित्व की पुष्टि की तब बोस कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज (Presidency College) में शामिल हुए थे। हेनरिक हर्ट्ज़ के शोध पर प्रकाशित एक पुस्तक से वे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने रेडियो और सूक्ष्म तरंगों पर अध्ययन करना शुरू किया। यूं तो रेडियो का आविष्कारक मार्कोनी को माना जाता है किंतु वास्तव में इसका आविष्कार बोस ने किया यह कहना भी गलत नहीं होगा क्योंकि मार्कोनी के प्रदर्शन से पहले ही वर्ष 1885 में बोस ने रेडियो तरंगों द्वारा बेतार संचार का प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन में जगदीश चंद्र बोस ने दूर से एक घंटी बजाकर बारूद में विस्फोट कराया, जो तरंगों की ताकत का एक नमूना था। जे. सी. बोस ऐसे प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने एक ऐसे यंत्र का निर्माण किया जो सूक्ष्म तरंगें पैदा कर सकता था। उनका यंत्र इतना छोटा था कि उसे एक छोटे बक्से में कहीं भी ले जाया जा सकता था। उन्होंने दुनिया को उस समय एक बिल्कुल नए तरह की रेडियो तरंग दिखाई जो कि ऐसी थी जिसे आज माइक्रोवेव्स या सूक्ष्म तरंग कहा जाता है। उन्होंने एक बेहद संवेदनशील कोहेरर (Coherer- एक ऐसा यन्त्र जो रेडियो तरंगों को ज्ञान कराता है) का निर्माण किया जिसे मार्कोनी ने अपने प्रदर्शन में उपयोग किया था। इस प्रकार रेडियो आविष्कार में उनके द्वारा दिये गये योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है।
रेडियो की पहुंच अब लगभग सभी जगह हो गयी है। लखनऊ सरकार ने क्षेत्रीय गीतों और मनोरंजन साधन प्रदान करने के लिए एक रेडियो कंपनी के साथ सहयोग किया। यह लखनऊ मेट्रो (Metro) के 8 स्टेशनों पर संगीत, मनोरंजन और सामान्य ज्ञान का प्रसारण करता है। इसने यात्रियों के सफ़र को एक सुखद अनुभव दिया है। कुछ महीनों पहले रेडियो सिटी (Radio City) ने नोएडा यात्रियों के सफ़र अनुभव को भी सुखद बनाने के लिये नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (NMRC- Noida Metro Rail Corporation) के साथ साझेदारी की है।
हालांकि टेलीविज़न (Television) और मोबाइल फोन (Mobile Phone) के कारण इनकी लोकप्रियता कम हो गई है लेकिन आज भी कई लोग रेडियो सुनना पसंद करते हैं क्योंकि यह मोबाइल्स जैसे छोटे उपकरणों पर भी मौजूद है। इन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम आज भी श्रोताओं को लुभा रहे हैं।
सूरजमुखी का सूर्य-अनुसरण: हेलियोट्रोपिज्म, जैविक घड़ी और परागण का विज्ञान
भोर के समय सूर्य के उगने पर, सभी सूरजमुखी फूल, पूर्व की ओर मुड़ जाते हैं। और फिर दिन चढ़ने पर पश्चिम दिशा की ओर सूरज के साथ-साथ अपनी दिशा भी बदलते रहते हैं। एक बार जब सूरज पश्चिमी आकाश में डूब जाता है, तब वे युवा सूरजमुखी रात्रि के दौरान धीरे-धीरे फिर से पूर्व दिशा की ओर मुड़ जाते हैं, और एक बार फिर सूरज के उगने का इंतजार करते हैं। हालांकि, जैसे-जैसे सूरजमुखी के पौधे की उम्र बढ़ती है, यह गतिविधि कम होती जाती है। एक बार जब सूरजमुखी परिपक्व हो जाता है, तो वह सूर्य का अनुसरण करना बंद कर देता है और पूर्व की ओर मुख करके खड़ा रह जाता है। वर्तमान समय में, यह जानने में काफ़ी प्रगति हुई है कि, सूरजमुखी फूल आकाश में सूर्य की गति के हिसाब से कैसे मुड़ते हैं, लेकिन, कुछ वनस्पतिशास्त्री अभी भी इस मुद्दे पर बहस कर रहे हैं।दरअसल, सूरजमुखी के पौधे में एक आंतरिक घड़ी होती है, जिससे सूरज के साथ साथ इस फूल के मुख की दिशा निर्धारित होती है। पौधों को प्रजनन के लिए, फूलों पर सही तापमान प्राप्त करना महत्वपूर्ण है। पौधों के तापमान में वृद्धि पौधों की संरचनाओं द्वारा प्रत्यक्ष सौर विकिरण के अवशोषण और पौधे के आसपास की संरचनाओं के उष्णता विकिरण के माध्यम से हो सकती है। सौर विकिरण के अवशोषण को बढ़ाने का एक प्रभावी तरीका, सूर्य की गति और दिशा के साथ मुड़ना है।
सूर्य की रोशनी में होने के कारण, गर्म हुए फूलों के साथ किए गए, प्रयोगों से पता चला कि, गर्म फूलों की ओर, अधिक परागणक आकर्षित होते हैं। यह परिदृश्य हेलियोट्रोपिज्म (Heliotropism) की व्याख्या के अनुरूप है, जो फूलों को गर्माहट प्रदान करने हेतु, सूर्य की रोशनी का पता लगाता है। इसे सौर ट्रैकिंग (Solar tracking) के रूप में भी जाना जाता है। इससे, वे फूल आने वाले परागणकों के लिए एक आरामदायक स्थान बन जाते हैं।हेलियोट्रोपिज्म पौधों की कई प्रजातियों में पाया जाता है, और प्रकाश संश्लेषण के लिए अवशोषित सूर्य के प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करता है। इसमें सूरजमुखी (Sunflower) या हेलियनथस एनुअस (Helianthus annuus) एक मुख्य एवं सर्वज्ञात उदाहरण है। इसके अलावा, कुछ अन्य कारक भी होते हैं, जो इस गतिविधि के लिए ज़िम्मेदार हैं। यदि सूरजमुखी का फूल पूर्व की ओर होता है, तो वह फूल सुबह के सूरज से रोशन होता है। साथ ही, फूलों के सुनहरे रंग पर पड़ने वाली सूरज की रोशनी द्वारा परागणकों को पौधे के नए खिले एवं युवा फूलों की ओर आकर्षित किया जाता है। फूलों में सिर्फ परागकण ही नहीं, बल्कि कुछ अन्य खाद्य स्रोत भी होते हैं। जैसे कि युवा बीज एवं नेक्टर (Nectar) आदि।इस कारण, फूलों की ओर अवांछित आगंतुक भी आकर्षित हो सकते हैं। पूर्व की ओर मुड़ने से, फूल रात भर जमा होने वाली ओस से जल्द ही सूख जाता है, जिससे कवक तथा अन्य संक्रमण का खतरा कम हो जाता है। साथ ही, दोपहर का समय सुबह की तुलना में अधिक गर्म होता है। उच्च तापमान की इस अवधि के दौरान, पूर्व की ओर मौजूद सूरजमुखी फूल सूर्य से दूर होता है। इसका मतलब यह है कि, फूल के शीर्ष का अधिकांश भाग सूर्य और पराग के बीच होगा, जिससे गर्मी अधिक होने पर, सूर्य की किरणें पराग पर नहीं पड़ती हैं।
कुछ अध्ययन एवं प्रयोग निश्चित रूप से ही, फूलों के सूर्य की ओर मुड़ने हेतु,गर्मी की परिकल्पना का समर्थन करते हैं।लेकिन,संभावना है कि,इसके लिए कुछ अन्य कारण भी, सच हो सकते हैं। दूसरी ओर, वैज्ञानिक स्टैसी हार्मर (Stacey Harmer) के अध्ययन से पता चला है कि, यह घटना इन पौधों की आंतरिक सर्कैडियन घड़ी (Circadian clock) द्वारा नियंत्रित होती है। सुबह पूर्व दिशा की ओर मुड़े फूल, पश्चिम दिशा की ओर मुड़े हुए फूलों की तुलना में, काफी गर्म थे। हार्मर ने कहा है कि, यह गर्माहट सुबह-सुबह भोजन खोजने वाली मधुमक्खियों के लिए, ऊर्जा लाभ लेकर आती है। सीधी धूप फूलों की पंखुड़ियों पर पराबैंगनी निशान भी दिखाती है, जो मधुमक्खियों को तो दिखाई देते है, परन्तु जिन्हें, हम इंसान अपनी आंखों से नहीं देख पाते। पौधों के ऐसे उन्मुखीकरण ने फूलों के विकास और प्रजनन सफलता को भी प्रभावित किया है। पूर्व की ओर मुख वाले पौधे, बड़े और भारी बीज पैदा करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि, ये प्रभाव एवं घटना फूल के शीर्ष के तापमान द्वारा नियंत्रित होते हैं। शोधकर्ताओं ने जब, पश्चिम की ओर मुड़े हुए फूलों को गर्म करने के लिए,एक हीटर का उपयोग किया, तो उन्होंने भी समान परिणाम प्रदर्शित किए। अंत में, वर्जीनिया विश्वविद्यालय (University of Virginia) के एक अध्ययन में पाया गया कि, पूर्व दिशा की ओर रहने वाले पौधों के परागकण, पश्चिम की ओर रहने वाले पौधों की तुलना में, अधिक प्रजनन के लिए जिम्मेदार थे।
दरअसल, युवा सूरजमुखी के तने रात के दौरान, केवल पश्चिम की ओर अधिक बढ़ते हैं, जो सूरजमुखी के सिर को पूर्व की ओर झुकने की अनुमति देते है। जबकि, दिन के दौरान, तने का केवल पूर्वी भाग बढ़ता है, जिसके परिणामस्वरूप,उनकी सूर्य के साथ पश्चिम की ओर गति होती है। इस बात को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता है कि, सूरजमुखी के फूलों का सूर्य प्रेमी होना, केवल हेलियो ट्रोपिज्म एवं सर्कैडियन घड़ी का एक प्रभाव है, वर्तमान साक्ष्य भी इस तथ्य की ओर इशारा करते हैं। सूरजमुखी का पूर्व दिशा की ओर झुकाव और फूलों की शारीरिक रचना, कैसे सुबह के तापमान और परागणकों के लिए दृश्यता को बढ़ाती है और फूलों के सिरों को अत्यधिक सौर विकिरण से कैसे बचाती है, यह भविष्य के शोध के लिए, एक रोमांचक विषय होगा।
कागज़ के वैश्विक मानक आकार: इतिहास, विकास और ISO प्रणाली की दिलचस्प कहानी
201 ईसा पूर्व के आसपास, चीन (China) के हान राजवंश (Han Dynasty) के काल में काग़ज़ का आविष्कार हुआ, जिसके बाद इसका उपयोग धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैलता चला गया। आज काग़ज़ हमारे जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है और इसका प्रयोग लेखन, मुद्रण, पैकेजिंग, शिक्षा और प्रशासन जैसे अनेक क्षेत्रों में किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि काग़ज़ अलग-अलग मानक आकारों में ही क्यों उपलब्ध होता है? दरअसल, अलग-अलग समय और देशों में काग़ज़ के कई मानक आकार प्रचलन में रहे हैं, परंतु वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आईएसओ (ISO) मानक को सबसे अधिक स्वीकार्यता प्राप्त है। इस लेख में हम काग़ज़ के इन्हीं मानकों को विस्तार से समझेंगे।
इतिहासकारों के अनुसार, भारत में काग़ज़ का निर्माण और उपयोग सबसे पहले सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान हुआ। समय के साथ भारत में काग़ज़ का उत्पादन विभिन्न रूपों और आकारों में होने लगा। हालांकि, भारत में काग़ज़ बनाने का पहला संगठित कारख़ाना कश्मीर में सुल्तान जैनुल आबेदीन (1417–1467 ईसवी) के शासनकाल में स्थापित किया गया था। इसके बाद 1870 के आसपास कोलकाता के पास ‘बाली’ नामक स्थान पर हुगली नदी के तट पर प्राचीन तकनीक पर आधारित एक आधुनिक काग़ज़ मिल की स्थापना हुई। आगे चलकर देश के अन्य हिस्सों में भी काग़ज़ उद्योग का तेज़ी से विकास हुआ।
विश्व भर में स्टेशनरी (Stationery), कार्ड और मुद्रित दस्तावेज़ों के लिए प्रयुक्त काग़ज़ की शीट्स अलग-अलग आकारों में मिलती हैं। इन मानक आकारों को आईएसओ मानक काग़ज़ आकार कहा जाता है। वर्ष 1975 में ‘अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन’ (International Organisation for Standardisation – ISO) द्वारा ‘आईएसओ 216’ मानक के अंतर्गत इन्हें औपचारिक रूप से अपनाया गया। ये मानक काग़ज़ की लंबाई और चौड़ाई के बीच एक निश्चित अनुपात पर आधारित होते हैं। इनमें सबसे अधिक प्रचलित आकार A4 है, जिसे अधिकांश कार्यालयी दस्तावेज़ों के लिए डिफ़ॉल्ट माना जाता है। A4 काग़ज़ का माप 210 मिमी × 297 मिमी होता है।
आईएसओ 216 मानक की नींव जर्मन डीआईएन 476 (German DIN 476) प्रणाली पर रखी गई थी। डीआईएन (Deutsches Institut für Normung) जर्मनी का राष्ट्रीय मानकीकरण संस्थान है, जिसका मुख्यालय बर्लिन (Berlin) में स्थित है। इस प्रणाली की खासियत यह है कि किसी भी आकार का काग़ज़ उसी श्रृंखला के अगले बड़े आकार के काग़ज़ के क्षेत्रफल का ठीक आधा होता है। सभी आईएसओ काग़ज़ आकार √2 : 1 (लगभग 1:1.414) के अनुपात पर आधारित होते हैं।
इस अनुपात को पूरी श्रृंखला में बनाए रखा जाता है, जिससे किसी दस्तावेज़ को छोटा या बड़ा करते समय उसका अनुपात नहीं बिगड़ता। A-श्रृंखला का मूल आकार A0 होता है, जिसका क्षेत्रफल ठीक 1 वर्ग मीटर होता है। मिलीमीटर में इसका माप 841 × 1189 मिमी (33.1 × 46.8 इंच) होता है। काग़ज़ के आकारों की कई श्रृंखलाएं होती हैं, जैसे A, B और C। A3, A4, A5, B4 और B5 जैसे आकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप से उपयोग में लाए जाते हैं। ये आकार कैस्केडिंग स्टाइल शीट्स (Cascading Style Sheets – CSS) में भी शामिल हैं, जो HTML या XML में लिखे गए दस्तावेज़ों की प्रस्तुति को नियंत्रित करने के लिए प्रयुक्त होती हैं।
आईएसओ 216 मानक का उपयोग उत्तरी अमेरिका (North America) और लैटिन अमेरिका (Latin America) के कुछ हिस्सों को छोड़कर लगभग पूरी दुनिया में किया जाता है। उल्लेखनीय है कि उत्तरी अमेरिका में एक अलग ‘नॉर्थ अमेरिकन पेपर साइज’ प्रणाली प्रचलित है, जो मिलीमीटर के बजाय इंच पर आधारित होती है। इसके अतिरिक्त, आईएसओ 217 और आईएसओ 269 जैसे पूरक मानक भी हैं, जिनमें आईएसओ 269 की ‘C’ श्रृंखला को प्रायः A और B आकारों के साथ जोड़ा जाता है, खासकर लिफ़ाफ़ों के लिए।
क्या आप जानते हैं कि काग़ज़ के आकार का सबसे पहला दस्तावेजीकृत मानक वर्ष 1389 में इटली के बोलोना (Bologna, Italy) शहर में पत्थर पर अंकित किया गया था? इसमें चार मानक आकारों का उल्लेख मिलता है। A-श्रृंखला को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि किसी शीट को आधा काटने पर उसी अनुपात के दो छोटे आकार प्राप्त हो जाते हैं। गणितीय सूत्र √2 : 1 (लगभग 1.414 : 1) इस संरचना का आधार है।
A-श्रृंखला में A0 से लेकर A10 तक काग़ज़ के आकार उपलब्ध हैं, जिनमें A4 सबसे अधिक प्रचलित कार्यालयी आकार है। आईएसओ प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ यह है कि प्रत्येक आकार अपने पास के आकार से या तो दोगुना बड़ा होता है या आधा। उदाहरण के लिए, A4 काग़ज़ A5 से दोगुना और A3 का आधा होता है। इसके अलावा ‘लेटर’, ‘लीगल’, ‘लेजर’ और ‘टैब्लॉयड’ (Letter, Legal, Ledger, Tabloid) जैसे आकार भी आज तक दैनिक उपयोग में आम तौर पर देखे जाते रहे हैं, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां आईएसओ मानक पूरी तरह लागू नहीं है।
2005 में शुरू हुआ 20–20 क्रिकेट प्रारूप, आज बना खेल का सबसे लोकप्रिय चेहरा
जौनपुरवासियों, क्रिकेट का ज़िक्र आते ही हमारे मन में कभी पाँच दिनों तक चलने वाले टेस्ट मैचों की तस्वीर उभरती है, तो कभी पूरे दिन टीवी के सामने बैठकर एकदिवसीय मुकाबले देखने की यादें ताज़ा हो जाती हैं। लेकिन समय के साथ-साथ न सिर्फ़ हमारी ज़िंदगी की रफ़्तार बदली है, बल्कि क्रिकेट ने भी खुद को उसी रफ़्तार में ढाल लिया है। ऐसे दौर में 20-20 क्रिकेट प्रारूप एक नए अनुभव के रूप में सामने आया, जिसने खेल को छोटा, तेज़ और ज़्यादा रोमांचक बना दिया। जौनपुर जैसे शहर में भी इस बदलाव की झलक साफ़ दिखाई देती है, जहाँ गली-मोहल्लों से लेकर घरों की बैठकों तक टी20 मैचों की चर्चा आम हो गई है। हर ओवर में बदलता खेल, चौके-छक्कों की भरमार और आख़िरी गेंद तक बना रहने वाला रोमांच दर्शकों को पूरी तरह बाँध कर रखता है। अब जब फ़रवरी 2026 से शुरू होने वाले टी20 विश्व कप को लेकर देशभर में उत्साह बढ़ रहा है, तो यह समझना और भी ज़रूरी हो जाता है कि कैसे 20-20 क्रिकेट ने खेल की पहचान ही बदल दी। यह लेख उसी बदलाव, उसी सफ़र और उसी अनुभव को आसान और क्रमबद्ध तरीके से आपके सामने रखने का प्रयास है।
क्रिकेट का इतिहास जितना समृद्ध और लंबा रहा है, उतना ही रोचक इसका निरंतर बदलता स्वरूप भी रहा है। पांच दिवसीय टेस्ट मैचों से लेकर लगभग सात घंटे तक चलने वाले एकदिवसीय मुकाबलों और फिर मात्र तीन घंटे में सिमट जाने वाले 20–20 मैचों तक, समय के साथ क्रिकेट के प्रारूपों में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। बदलती जीवनशैली और दर्शकों की समय-संबंधी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए क्रिकेट ने खुद को ढाला और इसी प्रक्रिया में करीब दो दशक पहले शुरू हुआ 20–20 प्रारूप बेहद कम समय में असाधारण रूप से लोकप्रिय हो गया। शायद इसकी शुरुआत के समय किसी ने भी नहीं सोचा था कि यह प्रारूप इतनी तेज़ी से दुनिया भर में छा जाएगा।
20–20 क्रिकेट की अवधारणा इंग्लैंड (England) और वेल्स क्रिकेट बोर्ड (Wales Cricket Board (ECB)) से जुड़े मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव स्टुअर्ट रॉबर्टसन (marketing executive Stuart Robertson) द्वारा प्रस्तुत की गई थी। उस दौर में क्रिकेट को अक्सर एक अभिजात्य और अपेक्षाकृत बुज़ुर्गों का खेल माना जाता था, जिससे युवा दर्शक इससे दूरी बना रहे थे। वहीं दूसरी ओर, तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में लोगों के लिए टेस्ट मैच के पांच दिन या एकदिवसीय मैच के सात घंटे निकाल पाना कठिन होता जा रहा था। इसी चुनौती का समाधान खोजते हुए रॉबर्टसन ने एक ऐसे छोटे और रोमांचक प्रारूप की कल्पना की, जो कम समय में ज़्यादा मनोरंजन दे सके—और यहीं से 20–20 क्रिकेट का जन्म हुआ।
पुरुषों का पहला टी20 अंतर्राष्ट्रीय मुकाबला 17 फरवरी 2005 को ऑकलैंड (Auckland) में न्यूजीलैंड (New Zealand) और ऑस्ट्रेलिया (Australia) के बीच खेला गया। उस समय के वनडे विश्व कप विजेता ऑस्ट्रेलिया ने 20 ओवरों में 214/5 का विशाल स्कोर खड़ा किया और मैच 44 रनों से जीत लिया। इस ऐतिहासिक मुकाबले को दोनों टीमों ने काफी हल्के-फुल्के और मनोरंजक अंदाज़ में खेला। खिलाड़ियों ने 1980 के दशक की रेट्रो जर्सी पहनीं और कुछ ने तो नकली मूंछें भी लगाईं, जिससे यह मैच किसी प्रदर्शनी मुकाबले जैसा प्रतीत हुआ। ईडन पार्क (Eden Park) में खेले गए इस मैच को देखने के लिए 30,000 से अधिक दर्शक मैदान में मौजूद थे।
20–20 क्रिकेट की असली लोकप्रियता 2007 में आयोजित पहले टी20 विश्व कप के बाद देखने को मिली। इस टूर्नामेंट ने पारंपरिक क्रिकेट खेलने वाले देशों से आगे बढ़कर नए दर्शकों को भी आकर्षित किया और देखते ही देखते यह प्रारूप दुनिया भर में सबसे अधिक खेला जाने वाला बन गया। एक दिलचस्प तथ्य यह है कि आज विश्व की सबसे लोकप्रिय टी20 लीग मानी जाने वाली ‘इंडियन प्रीमियर लीग’ (Indian Premier League (IPL)) ने अपने शुरुआती दौर में इस छोटे प्रारूप को अपनाने को लेकर हिचकिचाहट दिखाई थी।
भारत ने अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय टी20 मुकाबला 1 दिसंबर 2006 को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ जोहान्सबर्ग (Johannesburg) में खेला। यह टी20 अंतर्राष्ट्रीय इतिहास का दसवां मैच था। इस मुकाबले में ग्रीम स्मिथ की कप्तानी में दक्षिण अफ्रीका ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 20 ओवरों में 126/9 का स्कोर बनाया। भारतीय टीम ने यह लक्ष्य आखिरी गेंद पर छह विकेट शेष रहते हासिल कर लिया और इस नए प्रारूप में अपनी पहली जीत दर्ज की।
20–20 क्रिकेट, क्रिकेट का सबसे संक्षिप्त और तेज़ प्रारूप है, जिसने 2003 में नियमों में किए गए बदलावों के बाद खेल में एक नई ऊर्जा भर दी। इसके मूल नियम अन्य प्रारूपों जैसे ही हैं, लेकिन प्रत्येक टीम की पारी 20 ओवरों तक सीमित होती है। एक गेंदबाज़ अधिकतम चार ओवर ही डाल सकता है और बड़े शॉट्स व तेज़ रन गति को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्ररक्षण पर कुछ विशेष प्रतिबंध लगाए जाते हैं। इन्हीं कारणों से यह प्रारूप दर्शकों के बीच बेहद रोमांचक बन गया है, खासकर भारत में, जहां आईपीएल जैसे टूर्नामेंट्स में स्टेडियम खचाखच भरे रहते हैं और करोड़ों लोग टीवी व डिजिटल माध्यमों पर मुकाबले देखते हैं।
अब तक आयोजित टी20 विश्व कप के परिणाम इस प्रकार रहे हैं:
वर्ष
टीम–1
टीम–2
परिणाम
2007
भारत
पाकिस्तान
भारत 5 रनों से जीता
2009
पाकिस्तान
श्रीलंका
पाकिस्तान 8 विकेट से जीता
2010
इंग्लैंड
ऑस्ट्रेलिया
इंग्लैंड 8 विकेट से जीता
2012
वेस्टइंडीज
श्रीलंका
वेस्टइंडीज 36 रनों से जीता
2014
श्रीलंका
भारत
श्रीलंका 6 विकेट से जीता
2016
वेस्टइंडीज
इंग्लैंड
वेस्टइंडीज 4 विकेट से जीता
2021
ऑस्ट्रेलिया
न्यूज़ीलैंड
ऑस्ट्रेलिया 8 विकेट से जीता
2022
इंग्लैंड
पाकिस्तान
इंग्लैंड 5 विकेट से जीता
क्रिकेट का यह तेज़ और लोकप्रिय प्रारूप अब राज्य स्तर पर भी अपनी पहचान बना रहा है। उत्तर प्रदेश में ‘उत्तर प्रदेश टी20 लीग’ (Uttar Pradesh T20 League (UP T20)) का आयोजन किया जाता है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2023 में उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन द्वारा की गई। यह लीग आमतौर पर अगस्त से सितंबर के बीच खेली जाती है और अब इसे हर वर्ष आयोजित करने की योजना है।
इस लीग में राज्य के छह शहरों की फ्रेंचाइज़ी टीमें भाग लेती हैं:
गोरखपुर लायंस, गोरखपुर
कानपुर सुपरस्टार्स, कानपुर
काशी रूद्रास, वाराणसी
नोएडा सुपर किंग्स, नोएडा
लखनऊ फाल्कन्स, लखनऊ
मेरठ मेवरिक, मेरठ
इस तरह, 20–20 क्रिकेट ने न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बल्कि स्थानीय और राज्यीय स्तर पर भी क्रिकेट को एक नई पहचान और नई ऊर्जा प्रदान की है।
उत्तर भारत में सर्दियों का कोहरा: जनजीवन, कृषि प्रभाव और जल संचयन की संभावनाएँ
साल के अंतिम महीनों और नए साल की शुरुआत के साथ जब सर्दी अपने चरम पर पहुँचती है, तब उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में कोहरे की घनी परत छा जाती है। इस दौरान न्यूनतम औसत तापमान अक्सर 6 से 9 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। कोहरे के कारण पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में दृश्यता घटकर लगभग 200 मीटर रह जाती है। कुछ क्षेत्रों में हालात इतने गंभीर हो जाते हैं कि दृश्यता 50 मीटर से भी कम दर्ज की जाती है।
घने कोहरे की स्थिति स्थानीय निवासियों के लिए कई तरह की चुनौतियाँ लेकर आती है। परिवहन सेवाएँ सबसे अधिक प्रभावित होती हैं, जिसके चलते कई बार हवाई उड़ानें और ट्रेनें रद्द करनी पड़ती हैं या उनमें लंबी देरी हो जाती है। इसके साथ ही कोहरा कृषि और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। आइए अब कोहरे के कृषि पर पड़ने वाले प्रभाव और उसके महत्व को समझते हैं। लंबे समय तक कोहरा छाए रहने से पौधों तक पहुँचने वाली सूर्य किरणों की मात्रा कम हो जाती है, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बाधित होती है और पौधों की समग्र वृद्धि प्रभावित होती है। धूप की कमी के कारण फसलों में रोग और कीट लगने की संभावना भी बढ़ जाती है।
लगातार कोहरा बने रहने से सब्जियों और फलों की फसलों पर विशेष रूप से प्रतिकूल असर पड़ता है। सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में रबी की फसलों, खासकर गेहूं के पौधों की पत्तियाँ और उनकी युक्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं। हालांकि कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रभाव अस्थायी होता है और जैसे ही मौसम साफ होता है तथा धूप निकलती है, पौधे दोबारा सामान्य स्थिति में आ जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार सर्दियों में तापमान में अचानक गिरावट और घने कोहरे की स्थिति गेहूं की फसल के लिए कई मायनों में अनुकूल भी मानी जाती है। गेहूं ठंडे वातावरण में बेहतर पनपता है और कोहरा इसके विकास के लिए उपयुक्त नमी प्रदान करता है। कुल मिलाकर ठंडा मौसम गेहूं में बेहतर तलशाखन, यानी प्रति पौधे अधिक अंकुर निकलने में सहायक होता है। यही कारण है कि जितनी अधिक ठंड और कोहरा होता है, गेहूं की फसल उतनी ही भरपूर विकसित होती है। गेहूं की बुआई सामान्यतः अक्टूबर के अंत से दिसंबर की शुरुआत के बीच की जाती है।
हालांकि बुआई से पहले खेतों में पिछली फसल के अवशेष हटाने के लिए कई बार किसान, विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा में, पराली जलाने का सहारा लेते हैं। इससे वातावरण में घने कोहरे के साथ काली धुंध भी छा जाती है, जो वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से खराब कर देती है और लोगों के लिए सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है। वैज्ञानिकों के हालिया अध्ययनों से पता चला है कि उत्तर-पश्चिम भारत में फसल अवशेष जलाने का प्रभाव केवल उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह मध्य और दक्षिणी राज्यों जैसे महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के कुछ हिस्सों तक भी फैल सकता है। जहाँ सामान्य कोहरे में मौजूद जलवाष्प स्थानीय स्तर तक सीमित रहते हैं, वहीं पराली जलाने से उत्पन्न ब्लैक कार्बन उत्तर-पश्चिमी हवाओं के साथ दूर-दराज़ क्षेत्रों तक पहुँच जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि जिस कोहरे के कारण इतनी परेशानियाँ उत्पन्न होती हैं, उसका सकारात्मक उपयोग भी संभव है। कोहरे से विशेष तकनीक के माध्यम से जल संचयन किया जा सकता है। यह तकनीक उन क्षेत्रों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है जहाँ सतही जल, कुएँ या वर्षा जैसे पारंपरिक जल स्रोत पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होते। यह प्रणाली न केवल सरल है, बल्कि लागत प्रभावी भी मानी जाती है। इससे प्राप्त किया गया पानी अच्छी गुणवत्ता का होता है और इसे लंबे समय तक संग्रहित किया जा सकता है।
कोहरा संग्राहक (Fog Collector) एक चौकोर ढाँचा होता है, जिसे ऊर्ध्वाधर रूप से लगाए गए जाल की सहायता से बनाया जाता है। जब कोहरा इस जाल से होकर गुजरता है, तो उसकी सूक्ष्म बूंदें जाल पर जम जाती हैं। ये बूंदें जाल के तारों के सहारे नीचे की ओर बहकर एक नलिका के माध्यम से भंडारण टंकी में एकत्र हो जाती हैं। बड़े कोहरा संग्राहक आमतौर पर 12 मीटर लंबे और 6 मीटर ऊँचे होते हैं, जिनमें ऊपरी 4 मीटर हिस्से पर जाल लगा होता है। एक संग्राहक से प्रतिदिन लगभग 150 से 750 लीटर तक पानी एकत्र किया जा सकता है। हालांकि इस तकनीक को अपनाते समय स्थानीय मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक होता है।
प्रकृति ने जौनपुर शहर को गोमती नदी के रूप में एक अमूल्य और जीवनदायिनी धरोहर प्रदान की है। लेकिन उचित देखरेख के अभाव और मानवीय लापरवाही के कारण यह अनमोल नदी आज गंभीर प्रदूषण की चपेट में आ चुकी है। स्थिति यह है कि गोमती का पानी अब न चाहते हुए भी मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बनता जा रहा है। जौनपुर ज़िले का अधिकांश भूभाग रेतीली, दोमट और चिकनी मिट्टी से घिरा है। यहां औसत वार्षिक तापमान लगभग 44.30 डिग्री सेल्सियस (Celsius) से 44.60 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है, जबकि औसत वार्षिक वर्षा लगभग 987 मिलीमीटर (millimeter) दर्ज की जाती है। गोमती नदी, जो गंगा नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है, उत्तर प्रदेश के पीलीभीत ज़िले के माधोगनी टांडा गाँव के पास गोमठ ताल से निकलती है और जौनपुर शहर के बीचो-बीच से होकर बहती है। आज गोमती में बढ़ता प्रदूषण जौनपुर की सबसे गंभीर समस्याओं में शामिल हो चुका है। यह नदी वाराणसी के पास गंगा नदी में मिलने से पहले लगभग 940 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए उत्तर प्रदेश के नौ ज़िलों से होकर गुजरती है। वर्तमान हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि नदी में स्नान करने या इससे मछली पकड़कर खाने वालों के लिए यह जानलेवा साबित हो सकती है। गोमती नदी के प्रदूषण का मुख्य कारण औद्योगिक अपशिष्ट और अनुपचारित सीवेज डिस्चार्ज (Untreated Sewage Discharge) है। दुर्भाग्यवश, इस समस्या से निपटने के लिए जौनपुर में आज भी कोई ठोस सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (Sewage Treatment Plant) मौजूद नहीं है।
जौनपुर में शाही पुल और सद्भावना पुल के बीच गोमती नदी का प्रदूषण विशेष रूप से चिंता का विषय बन गया है। सीवेज में मौजूद जैविक कचरे के अपघटन के कारण इस क्षेत्र में नदी का पानी काले रंग में बदल गया है। नदी के किनारों पर मानव और पशु अपशिष्ट, प्लास्टिक और अन्य हानिकारक कचरा जमा हो चुका है। हालात ऐसे हो गए हैं कि नदी का पानी न तो मानव उपयोग के योग्य रहा है और न ही जलीय जीवों के लिए सुरक्षित। आसपास के खुले और बंद नालों का प्रदूषित पानी सीधे नदी में छोड़ा जा रहा है। हनुमान घाट के पास नदी किनारे पड़े जंग लगे ऑटोरिक्शा (Auto Rickshaw) बरसात के दिनों में जंग को पानी के साथ नदी में घोल देते हैं। वहीं शाही पुल के पास बना एक छोटा तालाब कचरा डंप और खुले में शौच का केंद्र बन चुका है। नदी को स्वच्छ रखने के लिए लगाए गए साइन बोर्ड (Signboard) और चेतावनियों के बावजूद हालात में कोई ठोस सुधार नहीं दिखता। भारी प्रदूषण के बावजूद कई लोग आज भी गोमती में स्नान करते हैं और इसके किनारे स्थित मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं, बिना यह समझे कि वे अपने स्वास्थ्य के साथ कितना बड़ा जोखिम उठा रहे हैं। मछुआरे, जिनकी आजीविका इसी नदी पर निर्भर है, प्रदूषित पानी में समय बिताने को मजबूर हैं और इसी पानी में पली मछलियों को बेचते हैं।
गोमती नदी का प्रदूषण केवल जौनपुर तक सीमित नहीं है। लखनऊ और सुल्तानपुर जैसे शहरों से भी मानव, कृषि और औद्योगिक कचरे के निर्वहन के कारण नदी की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। गोमती नदी के रासायनिक और जैविक प्रदूषण पर केंद्रित कई अध्ययनों में पानी और तलछट में पारा और सीसा (Mercury and Lead), कीटनाशकों और अन्य हानिकारक प्रदूषकों की उच्च मात्रा पाई गई है।
नदी प्रदूषण के साथ-साथ भूजल संदूषण भी आज एक गंभीर समस्या बन चुका है। भूमि के भीतर मौजूद जल में हानिकारक पदार्थों की मौजूदगी को भूजल संदूषण कहा जाता है। यह समस्या विभिन्न मानवीय गतिविधियों के कारण उत्पन्न होती है, जैसे—
सैप्टिक टैंक और सेसपूल का रिसाव (Leakage Of Septic Tanks And Cesspools),
हानिकारक कचरे का अनुचित निपटान,
कृषि अपवाह,
तेल का रिसाव।
भूजल संदूषण के दुष्प्रभाव दूरगामी होते हैं। इससे स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुँचता है और आर्थिक क्षति भी होती है।
भूजल संदूषण को रोकने के लिए कुछ आवश्यक उपाय अपनाए जा सकते हैं, जैसे—
हानिकारक कचरे का उचित निपटान करना,
कम विषैले कीटनाशकों और उर्वरकों का उपयोग करना,
सेप्टिक टैंक और सेसपूल से होने वाले रिसाव की रोकथाम करना।
इन उपायों के साथ-साथ भारत सरकार और कुछ निजी कंपनियाँ भी नदियों और भूजल की सफाई के लिए प्रभावी तकनीकों के साथ आगे आ रही हैं। बेंगलुरु की कंपनी एल्फेमॅर्स लिमिटेड (Alphamers Ltd.) इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण है। इस कंपनी ने नदियों की सफाई के लिए स्टील (Steel) की जाली और जंजीरों से बने फ्लोटिंग बैरियर (Floating Barrier) की एक अनूठी तकनीक विकसित की है। इसे नदी के बहाव के विपरीत दिशा में लगाया जाता है, जिससे कचरा स्वतः नदी के किनारे इकट्ठा हो जाता है। इसके बाद भूमि आधारित उत्खननकर्ताओं द्वारा इस कचरे को हटाकर ट्रकों के माध्यम से ले जाया जाता है। यह तकनीक नावों के आवागमन को भी बाधित नहीं करती।
यह फ्लोटिंग बैरियर तकनीक भारी मानसून के दौरान भी प्रभावी ढंग से काम करती है और उथली तथा तेज़ बहाव वाली नदियों या नालों में भी तैनात की जा सकती है। इसे देश के आठ भारतीय शहरों में लागू किया जा चुका है और अपने पहले ही वर्ष में इस तकनीक की मदद से नदियों से 2200 टन प्लास्टिक कचरा हटाया गया है। साथ ही यह समाधान लागत प्रभावी भी सिद्ध हुआ है।
भारतीय प्रयासों के साथ-साथ नदियों की सफाई के लिए विदेशों से भी सहयोग मिल रहा है। इस दिशा में डेनमार्क (Denmark) सबसे आगे है, जिसने गंगा नदी की सफाई में भारत की सहायता करने की पेशकश की है। डेनिश (Danish) सरकार इस परियोजना के लिए तकनीकी सहायता और वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराएगी। गंगा नदी सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र मानी जाती है और करोड़ों लोगों के लिए जल का प्रमुख स्रोत भी है, लेकिन आज यह भी औद्योगिक कचरे, सीवेज और कृषि अपवाह से बुरी तरह प्रदूषित हो चुकी है। भारत सरकार वर्षों से गंगा की सफाई के प्रयास कर रही है, हालांकि यह एक जटिल चुनौती बनी हुई है। जल प्रबंधन में डेनमार्क के व्यापक अनुभव और प्रदूषित नदियों की सफाई में उनके सफल ट्रैक रिकॉर्ड (Track Record) को देखते हुए यह सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे न केवल लाखों लोगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, बल्कि पर्यटन उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा। यह पहल भारत और डेनमार्क के बीच मज़बूत होते संबंधों का भी प्रतीक है। प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए सरकारों और व्यवसायों द्वारा उठाए जा रहे कदम इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा हैं। अब समय आ गया है कि इन प्रयासों को और तेज़ किया जाए, सख़्त मानदंड और नीतियाँ अपनाई जाएँ और एक परिपत्र अर्थव्यवस्था की दिशा में ठोस बदलाव लाया जाए।
जनसंख्या (2025)Source:
Census 2011; population projections based on 2011 city growth rates.
221,825
इंटरनेट उपयोगकर्ता
इंटरनेट उपयोगकर्ताSource:
The number of Internet connections was determined by multiplying the number of urban Internet subscribers with the percentage of the District Headquarters (DHQ) population in relation to the total urban population. The value was allocated to DHQs based on population ratio. Urban population is distributed in a 1.5:1 ratio between DHQ and non-DHQ cities. (TRAI September 2025 Report / Number)
281,963
फेसबुक उपयोगकर्ता
फेसबुक उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Facebook Users. (As per Facebook Ad Module, 31 December 2025)
108,300
लिंक्डइन उपयोगकर्ता
लिंक्डइन उपयोगकर्ताSource:
The number of unique member accounts that could be potentially reached in the city. (LinkedIn Ad Module, December 2025)
120,000
ट्विटर उपयोगकर्ता
ट्विटर उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Twitter Users (X Ad Module,December 2025)
6,550
इंस्टाग्राम उपयोगकर्ता
इंस्टाग्राम उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Instagram Users (Instagram Ad Module,December 2025)