आपकी तस्वीरों से करोड़ों कमा रही हैं कंपनियाँ: क्या है प्राइवेसी का यह खेल?
जौनपुर के इंटरनेट और सोशल मीडिया यूज़र्स के लिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि मेटा ने इस बात की पुष्टि की है कि साल 2007 से लेकर अब तक वयस्कों द्वारा फेसबुक और इंस्टाग्राम पर पब्लिक किए गए सभी टेक्स्ट और फोटो को स्क्रैप किया गया है और कंपनी के आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल किया गया है। एक तरफ़ सोशल मीडिया लोगों को जोड़ने का काम कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ यह आपके व्यक्तिगत डेटा और कॉपीराइट सामग्री का उपयोग भी अप्रत्याशित तरीकों से कर रहा है। इंटरनेट की दुनिया में एक रिपोर्ट के मुताबिक़ लगभग 49 प्रतिशत ब्लॉगर्स और सोशल मीडिया यूज़र्स अनजाने में या जानबूझकर कॉपीराइट का उल्लंघन कर चुके हैं।क्या सोशल मीडिया पर पब्लिश किया गया कंटेंट कॉपीराइट के दायरे में आता है?लोगों के बीच यह एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है कि सोशल मीडिया साइट्स पर अपना काम या तस्वीरें अपलोड करने का मतलब है कि आप अपना कॉपीराइट खो देते हैं और यदि कोई आपकी अनुमति के बिना आपके काम का उपयोग करता है तो आप कुछ नहीं कर सकते। हक़ीक़त में ऐसा नहीं है। लगभग हर सोशल मीडिया साइट के नियम और शर्तों के अनुसार, जो व्यक्ति कंटेंट बनाता और अपलोड करता है, वह ही अपने काम का असली कॉपीराइट मालिक बना रहता है। जब कोई विज़ुअल वर्क (जैसे फोटो या वीडियो) बनाया जाता है, तो कॉपीराइट स्वचालित रूप से निर्माता को मिल जाता है। आधिकारिक तौर पर कॉपीराइट प्राप्त करने के लिए किसी तस्वीर को रजिस्टर करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है।भारत में कॉपीराइट अधिनियम 1957 के तहत, किसी भी काम पर कॉपीराइट के मालिक को विशेष अधिकार प्राप्त होते हैं, जैसे कि उस काम का उपयोग करना, उसे वितरित करना, या प्रकाशित करना। इसलिए, किसी भी फोटो या वीडियो का कॉपीराइट मालिक ही उसे किसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अपलोड करने का अधिकार रखता है। यदि कोई और व्यक्ति आपकी अनुमति के बिना आपकी रचना का उपयोग करता है, तो यह कॉपीराइट उल्लंघन माना जाता है। बहुत से लोग यह मानते हैं कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर मौजूद हर चीज़ मुफ़्त है, लेकिन यह सच नहीं है। जब कोई अपना मूल कंटेंट सोशल मीडिया पर पोस्ट करता है, तो वह महज़ एक पब्लिकेशन होता है, ना कि मुफ़्त इस्तेमाल के लिए दिया गया लाइसेंस। "फेयर यूज़" का नियम कुछ विशेष परिस्थितियों (जैसे समीक्षा, समाचार रिपोर्टिंग, या शोध) में अनुमति के बिना काम का उपयोग करने की छूट देता है, लेकिन यह हर परिस्थिति पर लागू नहीं होता।प्लेटफ़ॉर्म के नियमों और प्राइवेसी सेटिंग्स के तहत आपकी ओनरशिप का क्या होता है?जब आप इंस्टाग्राम या फेसबुक पर कोई फोटो, वीडियो, या कैप्शन पोस्ट करते हैं, तो आप कॉपीराइट के मालिक होते हैं, लेकिन यहाँ एक पेंच है। आप अपनी ओनरशिप तो बरकरार रखते हैं, लेकिन आप इंस्टाग्राम को बहुत बड़े स्तर पर उपयोग के अधिकार भी देते हैं। इसका मतलब है कि आप उन्हें अपने कंटेंट को एक ख़ास तरीके से इस्तेमाल करने की अनुमति देते हैं जिसके लिए वे आपको कोई भुगतान नहीं करते। प्लेटफ़ॉर्म के नियमों के तहत आप उन्हें एक नॉन-एक्सक्लूसिव, रॉयल्टी-फ्री और वर्ल्डवाइड लाइसेंस देते हैं। इसका मतलब यह है कि आप अपनी सामग्री को अन्य जगहों पर भी इस्तेमाल कर सकते हैं, इंस्टाग्राम आपको इस इस्तेमाल के लिए पैसे नहीं देगा, और यह अधिकार दुनिया भर में लागू होगा।इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफ़ॉर्म अपनी सर्विस चलाने के लिए आपके कंटेंट का उपयोग कर सकते हैं, उसे वितरित कर सकते हैं, बदल सकते हैं, प्रदर्शित कर सकते हैं और यहां तक कि उससे जुड़े अन्य काम भी बना सकते हैं। जब आप अपना कंटेंट या अकाउंट डिलीट करते हैं तो यह लाइसेंस आम तौर पर समाप्त हो जाता है। लेकिन, यदि किसी अन्य यूज़र ने आपके कंटेंट को शेयर या एम्बेड किया है, और उन्होंने उसे डिलीट नहीं किया है, तो प्लेटफ़ॉर्म का वह लाइसेंस जारी रह सकता है। फेसबुक के नियम यह कहते हैं कि यदि ओरिजिनल यूज़र अपना कंटेंट हटा भी दे, तो भी लाइसेंस तब तक बना रहेगा जब तक कि उस कंटेंट को शेयर करने वाले बाकी सभी लोग उसे डिलीट न कर दें। इस तरह वायरल फोटो या वीडियो के लिए यह लाइसेंस अनिश्चित काल तक चल सकता है। एक्स (पूर्व में ट्विटर) के मामले में तो यह और भी आगे जाता है, जहाँ अकाउंट बंद करने के बाद भी अपलोड किए गए कंटेंट पर उपयोग का लाइसेंस हमेशा के लिए बना रहता है।एआई सिस्टम को कैसे ट्रेन किया जाता है और इसके कॉपीराइट से जुड़े ख़तरे क्या हैं?आजकल जनरेटिव एआई मॉडल, जैसे कि लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) और इमेज जनरेटर, मशीन लर्निंग तकनीकों के माध्यम से विकसित किए जा रहे हैं। इन मॉडल्स की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने के लिए इन्हें बहुत बड़े डेटासेट्स पर ट्रेन किया जाता है। इनमें से कई डेटासेट्स में कॉपीराइट वाला काम शामिल हो सकता है। ट्रेनिंग की प्रक्रिया में कई चरण होते हैं, जिसमें जनरल पैटर्न सीखने के लिए प्री-ट्रेनिंग, और विशिष्ट कार्यों के लिए पोस्ट-ट्रेनिंग या फाइन-ट्यूनिंग शामिल होती है। डेवलपर्स भारी मात्रा में डेटा को स्क्रैप करते हैं, फ़िल्टर करते हैं और इकट्ठा करते हैं, जिस पर एआई मॉडल भविष्यवाणी करना सीखते हैं।ट्रेनिंग डेटासेट्स के लिए कॉपीराइट किए गए कार्यों को डाउनलोड करने, कॉपी करने और मॉडिफाई करने से कॉपीराइट के नियमों पर असर पड़ता है। इसके अलावा, एआई सिस्टम ऐसा कंटेंट आउटपुट कर सकते हैं जो कॉपीराइट किए गए काम की बिल्कुल नकल करता हो या उससे बहुत मिलता-जुलता हो। रिट्रीवल-ऑगमेंटेड जनरेशन (रैग) का उपयोग करके जनरेशन के समय बाहरी कंटेंट को शामिल करना भी उल्लंघन के सवाल खड़े कर सकता है। अमेरिकी कॉपीराइट कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, एआई द्वारा उपयोग में "फेयर यूज़" (उचित उपयोग) एक बचाव हो सकता है, लेकिन यह हर स्थिति में लागू नहीं होता है। यदि एआई का आउटपुट ओरिजिनल काम से प्रतिस्पर्धा करता है या बाज़ार में उसकी जगह लेने लगता है, तो वह फेयर यूज़ के अंतर्गत नहीं आएगा।क्या आप अपना डेटा एआई ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल होने से रोक सकते हैं?सोशल मीडिया कंपनियाँ अक्सर हमारी अनुमति के बिना एआई मॉडल को ट्रेन करने के लिए हमारे डेटा का उपयोग कर रही हैं। यूरोपीय संघ में जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (जीडीपीआर) लागू है, जिसकी वजह से मेटा को यूरोपीय उपभोक्ताओं को एक नोटिस भेजना पड़ा और उन्हें डेटा कलेक्शन से बाहर निकलने (ऑप्ट-आउट) का विकल्प देना पड़ा। लेकिन अमेरिका या कई अन्य देशों में इस तरह का कोई कड़ा राष्ट्रीय कानून नहीं है जो सोशल मीडिया कंपनियों को एआई मॉडल ट्रेनिंग के लिए यूज़र्स का डेटा इस्तेमाल करने से रोक सके। हालाँकि, आप अपनी प्राइवेसी सेटिंग्स बदलकर अपने डेटा को भविष्य में इस्तेमाल होने से कुछ हद तक बचा सकते हैं।इंस्टाग्राम पर अपना डेटा एआई ट्रेनिंग से बचाने का एकमात्र वास्तविक तरीका यह है कि आप अपने अकाउंट को प्राइवेट कर लें। मेटा ने कहा है कि वह प्राइवेट अकाउंट्स से डेटा या जानकारी का उपयोग नहीं करेगा। इसके लिए अपनी प्रोफ़ाइल पर जाएँ, सेटिंग आइकॉन पर क्लिक करें, और 'अकाउंट प्राइवेसी' में जाकर 'प्राइवेट अकाउंट' के स्विच को ऑन कर दें। इसी तरह फेसबुक पर भी आपको अपनी पोस्ट्स की विज़िबिलिटी को 'पब्लिक' से हटाकर 'फ्रेंड्स' पर सेट करना होगा। 'सेटिंग्स एंड प्राइवेसी' में जाकर 'ऑडियंस एंड विज़िबिलिटी' के तहत 'पोस्ट्स' चुनें, और "आपकी भविष्य की पोस्ट कौन देख सकता है?" को 'फ्रेंड्स' कर दें।एक्स (ट्विटर) ने भी नए नियम लागू किए हैं जिसमें यूज़र्स का डेटा 'ग्रोक' (Grok) जैसे एआई को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इसे रोकने के लिए आप सेटिंग्स में जाकर 'प्राइवेसी एंड सेफ्टी' पर क्लिक करें, फिर 'Grok & Third-party Collaborators' को चुनें और बॉक्स को अनचेक कर दें। लिंक्डइन पर भी 'सेटिंग्स एंड प्राइवेसी' में जाकर 'डेटा प्राइवेसी' चुनें, और 'Data for Generative AI Improvement' के स्विच को ऑफ़ कर दें। चैटजीपीटी में भी मुफ़्त अकाउंट वाले यूज़र्स की चैट का डेटा इस्तेमाल होता है। इसे बंद करने के लिए चैटजीपीटी की सेटिंग्स में 'डेटा कंट्रोल्स' पर जाएँ और 'Improve the model for everyone' स्विच को बंद कर दें। याद रखें कि ये सेटिंग्स केवल भविष्य के डेटा को बचाएंगी, आपके पिछले इस्तेमाल हो चुके डेटा को नहीं।संदर्भ 1. https://tinyurl.com/2cklyk36 2. https://tinyurl.com/29gopexr 3. https://tinyurl.com/2d4pul3j 4. https://tinyurl.com/22vmml2f 5. https://tinyurl.com/2xoqnx9y6. https://tinyurl.com/2c9g7g4j
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
जाबुलानी: फीफा विश्व कप 2010 की वह गेंद जिसने गोलकीपरों को चौंका दिया
वर्ष 2010 के फीफा विश्व कप की बात हो और जाबुलानी (Jabulani) गेंद का ज़िक्र न हो, ऐसा संभव नहीं है। एडिडास (Adidas) द्वारा निर्मित यह गेंद दक्षिण अफ्रीका में आयोजित 2010 विश्व कप की आधिकारिक मैच बॉल थी। ज़ुलू भाषा में "जाबुलानी" का अर्थ है "खुश रहो", और इसका नाम विश्व कप के उत्साह और जश्न की भावना को दर्शाने के लिए चुना गया था।जाबुलानी अपने अनोखे डिज़ाइन के कारण चर्चा का विषय बन गई थी। इसमें केवल आठ त्रि-आयामी पैनल लगाए गए थे, जबकि 2006 विश्व कप की गेंद में 14 पैनल थे। इसकी सतह पर विशेष खांचे बनाए गए थे, जिन्हें एडिडास ने "ग्रिप एन ग्रूव" तकनीक का नाम दिया। इसका उद्देश्य गेंद की वायुगतिकी को बेहतर बनाना था। इस गेंद के विकास में ब्रिटेन के लॉफबरो विश्वविद्यालय (Loughborough University) के शोधकर्ताओं का भी योगदान था।हालाँकि, मैदान पर खिलाड़ियों और विशेष रूप से गोलकीपरों का अनुभव कुछ अलग रहा। कई गोलकीपरों ने शिकायत की कि गेंद की उड़ान का अनुमान लगाना बेहद कठिन था। तेज़ गति से चलते समय जाबुलानी अचानक दिशा बदल लेती थी, जिससे उसके रास्ते का अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता था। वैज्ञानिकों ने भी पाया कि इसमें "नकलबॉल प्रभाव" दिखाई देता था, जिसमें गेंद हवा में अप्रत्याशित रूप से हिलती-डुलती हुई आगे बढ़ती है।यही कारण था कि कुछ खिलाड़ियों ने इसे विश्व कप इतिहास की सबसे चुनौतीपूर्ण गेंदों में से एक बताया। फिर भी जाबुलानी फुटबॉल इतिहास का एक यादगार हिस्सा बन गई और आज भी 2010 विश्व कप की सबसे चर्चित पहचान में गिनी जाती है।संदर्भ -https://tinyurl.com/yvwbfeauhttps://tinyurl.com/y3ze5x2jhttps://tinyurl.com/4p6f25d7https://tinyurl.com/52j2cncn
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
कुश्ती में भारत की बढ़ती उपलब्धियों को देखकर, उत्तर प्रदेश में क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
हम, आज कुश्ती के इतिहास को समझेंगे, और पढ़ेंगे कि यह कुछ पुराने लड़ाकू खेलों में से एक के रूप में कैसे विकसित हुआ। फिर, हम यह पता लगाएंगे कि, भारत में कुश्ती कैसे विकसित हुई, और इसका पारंपरिक अखाड़ों से क्या संबंध है। लेख में आगे, हम देखेंगे कि महाभारत जैसे भारतीय महाकाव्यों में कुश्ती किस प्रकार वर्णित की गई है। इसके पश्चात, हम आधुनिक कुश्ती के नियमों और तकनीकों को देखेंगे। जबकि अंत में, हम कुश्ती में भारत की उपलब्धियों और हमारे राज्य उत्तर प्रदेश में इस खेल को बढ़ावा देने हेतु उठाए जा रहे कदमों की जांच करेंगे।कुश्ती की उत्पत्ति, संभवतः हाथों या आमने–सामने की लड़ाई से हुई थी। यह विशेषतः लड़ाई के एक ऐसे खेल के रूप में उभरी, जिसमें प्रतिद्वंद्वी की मृत्यु के बजाय उसे हार स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाता है। 3000 ईसा पूर्व की कुछ कलाकृतियां बेबीलोनिया (Babylonia) और मिस्र (Egypt) में प्रचलित ‘बेल्ट कुश्ती’ को दर्शाती हैं। सुमेरियन गिलगमेश (Sumerian Gilgamesh) महाकाव्य में भी ऐसी कुश्ती का वर्णन है। भारत में 1500 ईसा पूर्व से ही कुश्ती चली आ रही है। 700 ईसा पूर्व के चीनी दस्तावेज़ ‘लूज कुश्ती’ (loose wrestling) का वर्णन करते हैं, जबकि, पहली शताब्दी ईसा पूर्व के जापानी रिकॉर्ड भी ऐसा वर्णन करते हैं। बीसवीं शताब्दी में उत्तरी एवं पूर्वी यूरोप (Europe) तथा जापान में स्थानीय स्तर पर प्रचलित बेल्ट कुश्ती, 2500 ईसा पूर्व में मिस्रवासियों की कुश्ती से मेल खाती थी।कुश्ती, संभवतः प्राचीन यूनानियों (Greeks) का सबसे लोकप्रिय खेल था। यूनानी युवा पुरुष, अपने सामाजिक जीवन के केंद्र बिंदु के रूप में पैलेस्ट्रास (Palaestras) या कुश्ती प्रशिक्षण केंद्रों से संबंधित थे। प्राचीन यूनानी फूलदानों और सिक्कों पर भी लूज कुश्ती के चित्र आम हैं। बाद में, 776 ईसा पूर्व से कुश्ती ओलंपिक खेलों का हिस्सा थी। दूसरी तरफ, कुश्ती यूनानियों की तुलना में रोमनों (Romans) के बीच कम लोकप्रिय थी। रोमन साम्राज्य के पतन के साथ, लगभग 800 ईस्वी तक यूरोप में कुश्ती के संदर्भ गायब हो गए।जब फारस (Persia) के इस्लामी शासकों ने लगभग 800 ईसा पूर्व में तुर्क (Turk) सैनिकों को नियुक्त करना शुरू किया, तो वे सैनिक अपने साथ लूज कुश्ती की एक शैली लेकर आए। इसे कोरेश (Koresh) कहा जाता था। धीरे-धीरे तुर्कों ने पूरे मुस्लिम प्रभुत्व पर कब्ज़ा कर लिया, और वहां उनकी कुश्ती शैली फैल गई। बाद में, तेरहवीं शताब्दी में मंगोलियाई आक्रमणों (Mongolian invasions) से मंगोलियाई कुश्ती की शुरुआत हुई, जिसे शाही संरक्षण प्राप्त हुआ। इस प्रकार, कुश्ती आधुनिक ईरान (Iran) का राष्ट्रीय खेल बन गया।जापानी बेल्ट-कुश्ती शैली - सूमो (Sumo), शाही संरक्षण (710-1185) के तहत एक लोकप्रिय दर्शक खेल था। सत्रहवीं शताब्दी तक सूमो कुश्ती, जापान में एक पेशेवर खेल बन गया था। जूडो (Judo) एक अन्य प्रमुख जापानी कुश्ती शैली है, जो बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में एक अंतरराष्ट्रीय खेल बन गई।मध्य युग में, पूरे यूरोप में कई शैलियों में कुश्ती होती थी। पहला दर्ज इंग्लिश मैच, तेरहवीं सदी की शुरुआत में लंदन (London) में आयोजित किया गया था। इंग्लैंड (England) और ब्रिटनी (Brittany) में ‘जैकेट कुश्ती’ का एक रूप, जिसे ‘कॉर्नवाल व डेवोन (Cornwall and Devon)’ कहा जाता है, चौथी या पांचवीं शताब्दी से प्रख्यात है। रोमन साम्राज्य के शूरवीरों को, एक मार्शल कौशल के रूप में कुश्ती सिखाई जाती थी। मुद्रण की शुरुआत से पहले पांडुलिपियों में और उसके बाद प्रिंट में भी, कुश्ती नियम पुस्तकें दिखाई देती थीं। जबकि, भारत में 1526 की मुगल विजय के बाद, यहां शुरू की गई मंगोलियाई लूज कुश्ती, भारत और पाकिस्तान में ज्ञात है।पहलवानी या कुश्ती, आज इस खेल का भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचलित एक पारंपरिक रूप है। इस खेल ने मुगल साम्राज्य के दौरान आकार लिया, जो फारसी कोष्टी पहलवानी और मल्ल-युद्ध की प्राचीन भारतीय परंपरा के मिश्रण से विकसित हुआ है। सदियों से, पहलवानी एक अनुशासन के रूप में विकसित हुई है। यह न केवल शारीरिक शक्ति और सहनशक्ति की परीक्षा है, बल्कि अनुष्ठान, अनुशासन और सांस्कृतिक विरासत में निहित जीवन का एक तरीका भी है।अखाड़े, न केवल कुश्ती प्रशिक्षण मैदान के रूप में, बल्कि कई युवा पहलवानों के लिए आश्रय के रूप में भी काम करते हैं। लड़के नौ या दस साल की उम्र से ही प्रशिक्षण शुरू कर देते हैं, ताकि भविष्य में वे पेशेवर पहलवान बन सकें। जब छात्र अखाड़े में रहते हैं, तो वे अधिक अनुशासित हो जाते हैं। परंतु आज भारत ने, अखाड़ों की मिट्टी कुश्ती को अंतरराष्ट्रीय मैट कुश्ती में परिवर्तित होतेे देखा है।हाल के वर्षों में, महिलाएं भी इस खेल के केंद्र में रही हैं। साक्षी मलिक, फोगाट बहनें तथा अंतिम पंघाल जैसी महिला कुश्ती खिलाड़ियों का नाम हमने सुना ही हैं।लेकिन, क्या आप जानते हैं कि, भारत में कुश्ती का एक उल्लेख, महाकाव्य महाभारत में, श्री कृष्ण के समय में भी मिलता है। एक बार, भीम, अर्जुन और कृष्ण, ब्राह्मणों के वेश में मगध की राजधानी - राजगृह गए थे। वहां जरासंध राजा ने उनका स्वागत किया, जो कृष्ण के दुश्मन थे। भीम, अर्जुन और कृष्ण ने अपनी असली पहचान बताए बिना, जरासंध को बताया कि भीम उसके साथ कुश्ती करना चाहते थे। दरअसल, भीम जरासंध को मारना चाहते थे। फिर भी, जरासंध ने अपने मेहमानों की तरह उनका शानदार आतिथ्य किया। कुछ दिनों बाद, कुश्ती का मुकाबला शुरू हुआ।जरासंध के मुकाबले, भीम छोटा और कम ताकतवर था, और जरासंध की जान लेने में सक्षम नहीं था। छब्बीस दिनों तक, वे प्रतिदिन तीन घंटे तक युद्ध या कुश्ती करते रहे। तब कृष्ण ने, उस युद्ध को समाप्त करने का सोचा, क्योंकि, उन्हें एहसास हुआ कि वे कुश्ती में जरासंध को नहीं मार सकते। इसलिए उन्होंने गदाओं से युद्ध करने का सुझाव दिया। लेकिन भीम के असंख्य प्रहारों से भी जरासंध नहीं मरा।अमावस्या की रात, जरासंध को अलौकिक शक्तियां प्राप्त होती थी। जब अमावस्या आती है, तो वह अपराजेय होता है। जरासंध भी, भीम को अमावस्या पर मारने का सोच रहा था। इसलिए, कृष्ण ने भीम से उसे अमावस्या के पहले दिन मारने को कहा। उस निर्णायक कुश्ती में, भीम ने जरासंध के पैर को तोड़ा, और उसे विपरीत दिशा में फेंक दिया। अतः जरासंध की मृत्यु हो गई।आधुनिक कुश्ती, दरअसल इन सभी शैलियों से थोड़ी अलग है। एक सामान्य फ्रीस्टाइल कुश्ती मुकाबले को, तीन-तीन मिनट की दो अवधियों में विभाजित किया जाता है और बीच में 30 सेकंड का विराम होता है। आधिकारिक अंडर-15, कैडेटों और अनुभवी प्रतियोगिताओं के लिए, इस अवधि को दो-दो मिनट तक कम कर दिया गया है। दो प्रतिस्पर्धी पहलवान, नौ मीटर व्यास वाली एक चटाई पर एक-दूसरे का सामना करते हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी के कंधों को थोड़े समय के लिए चटाई पर टिकाना होता है, जिससे प्रतिस्पर्धी पहलवान को गिराकर तत्काल जीत मिलती है।चूंकि ऐसी जीत दुर्लभ होती है, इस खेल को अन्य तरीकों से भी जीता जा सकता है। कोई पहलवान, नियम होल्ड (Legal hold), थ्रो (Throw), या टेकडाउन (Takedown) की मदद से प्रतिद्वंद्वी को कुछ सेकंड के लिए, उसे मैट पर पीठ के बल गिराने या रिवर्सल (Reversal) तकनीक अपनाकर, अंक हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं। जबकि, उलटफेर में, रक्षात्मक स्थिति से प्रतिद्वंद्वी की लाभ स्थिति को नकारना और उस स्थिति पर नियंत्रण हासिल करना शामिल है।कुश्ती की चालें, उनकी कठिनाई के अनुसार अंक प्रदान करती हैं। साथ ही, यदि प्रतिद्वंद्वी किसी नियम का उल्लंघन करता है, तो खिलाड़ी ज्यादा अंक प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि, एक मुकाबले के दौरान, तीन चेतावनियां पाने पर दोषी पहलवान को अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।छह मिनट की अवधि के अंत में, कुल अंकों का मिलान किया जाता है, और अधिक अंक वाला पहलवान जीत जाता है। बराबरी की स्थिति में, जिस पहलवान ने एक ही चाल में सबसे अधिक अंक बनाए हैं, उसे विजेता घोषित किया जाता है।आठ ओलंपिक पदक जीतने के बाद, ग्रीष्मकालीन खेलों में, हॉकी के बाद कुश्ती भारत का दूसरा सबसे सफल खेल है। के. डी. जाधव ने भारत को पहला ओलंपिक पदक, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 57 किलो श्रेणी में, हेलसिंकी 1952 (Helsinki 1952) में कांस्य पदक जीतकर दिया था। बीजिंग 2008 (Beijing 2008) में, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 66 किलो श्रेणी में सुशील कुमार ने भी कांस्य पदक जीता था। सुशील कुमार ने ही, समान श्रेणी में लंदन 2012 (London 2012) में रजत पदक पाया। उसी ओलंपिक में, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 60 किलो श्रेणी में योगेश्वर दत्त ने कांस्य पदक जीता।दूसरी ओर, साक्षी मलिक ने रियो 2016 (Rio 2016) में महिलाओं की फ़्रीस्टाइल 58 किलो श्रेणी में कांस्य पदक जीता था। टोक्यो 2020 (Tokyo 2020) के दौरान, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 57 किलो श्रेणी में, रवि कुमार दहिया रजत पदक पाकर जीतते है। उसी ओलंपिक में, बजरंग पुनिया पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 65 किलो श्रेणी में कांस्य पदक जीतते है। जबकि, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 57 किलो श्रेणी में अमन सहरावत ने, हाल ही में पेरिस 2024 (Paris 2024) में कांस्य पदक जीता है।इन्हीं उपलब्धियों के कारण, भारतीय कुश्ती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने हेतु, हमारी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2032 ओलंपिक तक पहलवानों के बुनियादी ढांचे और समर्थन में 170 करोड़ रुपये का निवेश करने की उम्मीद है। भारतीय कुश्ती महासंघ ने हमारी सरकार से यह समर्थन मांगा था। यह प्रायोजन केवल देश के विशिष्ट पहलवानों को ही नहीं, बल्कि कैडेट स्तर के पहलवानों को भी मिलेगा। इससे, राष्ट्रीय चैंपियनों को भी पुरस्कार राशि मिल पाएगी। साथ ही, कैडेट पहलवानों को प्रशिक्षण और प्रदर्शन के लिए विदेश भेजा जा सकता है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/a8xsyz66 2. https://tinyurl.com/3fu7dm5w 3. https://tinyurl.com/4w2r8c29 4. https://tinyurl.com/5cpsajc3 5. https://tinyurl.com/5x8frkzr 6. https://tinyurl.com/yc4rdzwf
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
किस प्रकार ज्ञान की धारा ने किया है हम जौनपुर वासियों को सदैव सशक्त
जौनपुर, आज हम समझेंगे कि मानव प्रगति के लिए, ज्ञान को हमेशा से ही शक्तिशाली और आवश्यक क्यों माना गया है। फिर हम प्राचीन भारतीय ज्ञान की परंपरा और शिक्षा प्रणालियों एवं दर्शन का पता लगाएंगे। बाद में, हम शिक्षा के केंद्र के रूप में जौनपुर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखेंगे। तब हम संस्कृति के विचार को समझेंगे, और जानेंगे कि यह किसी समाज के सांस्कृतिक और बौद्धिक जीवन को कैसे प्रतिबिंबित करती है। और लेख के अंत में, हम देखेंगे कि विभिन्न संस्कृतियां स्थानीय परंपराओं की कहानियों और रूपकों के माध्यम से अपनी संस्कृति को कैसे व्यक्त करती हैं।ज्ञान एक ऐसी शक्ति है, जिसमें हमारे जीवन को बदलने, प्रगति बढ़ाने और भविष्य को आकार देने की शक्ति है। यह व्यक्तियों को सशक्त बनाता है, व्यक्तिगत विकास को सक्षम बनाता है, और सामूहिक उन्नति को बढ़ावा देता है। हालांकि, ऐसी महान शक्ति के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है। समाज और दुनिया पर इसके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, ज्ञान का नैतिक उपयोग करना आवश्यक है। ज्ञान को अपनाकर, जिज्ञासा को बढ़ावा देकर, आलोचनात्मक सोच और नैतिक व्यवहार की संस्कृति को अपनाकर, तथा आजीवन सीखने को बढ़ावा देकर, हम इसकी पूर्ण क्षमता का उपयोग कर सकते हैं। ज्ञान के अधिग्रहण के माध्यम से, व्यक्तियों को अपने विचार एवं बुद्धि को व्यापक बनाने, सूचित निर्णय लेने और अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने का अधिकार मिलता है। सामूहिक रूप से, ज्ञान नवाचार को बढ़ावा देता है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति होती है और जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार होता है। इसलिए, हमें इसका सकारात्मक परिवर्तन के लिए एक शक्ति के रूप में उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि, इसकी शक्ति मानवता को लाभान्वित करती है और सतत विकास को बढ़ावा देती है।भारतीय दर्शन, विचार और चिंतन वे प्रणालियां हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप की सभ्यताओं द्वारा विकसित हुई हैं। उनमें रूढ़िवादी (आस्तिक) प्रणालियां, अपरंपरागत (नास्तिक) प्रणालियां, और दर्शन के वेदांत संप्रदाय शामिल हैं। रूढ़िवादी प्रणालियां, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व-मीमांसा, आदि से बनती हैं। जबकि, अपरंपरागत प्रणालियों में बौद्ध और जैन धर्म शामिल हैं। भारतीय विचार, विभिन्न दार्शनिक समस्याओं पर गौर करता है, जिनमें दुनिया की प्रकृति (ब्रह्मांड विज्ञान), वास्तविकता की प्रकृति (तत्वमीमांसा), तर्क एवं ज्ञान की प्रकृति (ज्ञानमीमांसा), तथा नैतिकता और धर्म का दर्शन, आदि महत्वपूर्ण हैं।इसके अलावा, भारतीय दार्शनिक विचार की आधारशिला तीन बुनियादी अवधारणाओं से बनती है। ये अवधारणाएं, स्वयं या आत्मा, कार्य (कर्म), और मुक्ति (मोक्ष) हैं। चार्वाक संप्रदाय को छोड़कर, संपूर्ण भारतीय दर्शन इन तीन अवधारणाओं और उनके अंतर्संबंधों से संबंधित हैं। इसका मतलब हालांकि यह नहीं है कि, वे इन अवधारणाओं की वस्तुनिष्ठ वैधता को ठीक उसी तरीके से स्वीकार करते हैं। इनमें से कर्म की अवधारणा, सबसे आम तौर पर भारतीय प्रतीत होती है। परंतु, आत्मा की अवधारणा एक निश्चित अर्थ में पारलौकिक या पूर्ण आत्मा की पश्चिमी अवधारणा से मेल खाती है। साथ ही, सर्वोच्च आदर्श की अवधारणा के रूप में, मोक्ष की अवधारणा भी पश्चिमी विचार में रही है। अधिकांश भारतीय दर्शन मानते हैं कि, मोक्ष संभव है, और "मोक्ष की असंभवता" (निर्मोक्ष) को दार्शनिक सिद्धांत को ख़राब करने वाली एक भौतिक भ्रांति के रूप में माना जाता है।भारतीय दर्शन का प्रभाव पूरे भारतवर्ष में देखा जा सकता है। हमारा जौनपुर शहर भी इसमें शामिल है। शर्की राजवंश ने, जौनपुर को दिल्ली के प्रतिद्वंद्वी के रूप में एक शक्तिशाली साम्राज्य में बदल दिया। मलिक सरवर और सुल्तान हुसैन जैसे शासकों के साथ, हमारे जौनपुर क्षेत्र को तैमूर के आक्रमण का तत्काल लाभ मिला। क्योंकि, तब दिल्ली की अराजकता से भाग रहे विद्वानों, कारीगरों और शिल्पकारों को उन शासकों ने जौनपुर में आश्रय दिया। इन प्रभावों ने तुगलक परंपराओं से गहराई से प्रेरित, एक नई वास्तुशिल्प शैली को जन्म दिया। बड़ी दीवारों, स्मारकीय प्रवेश द्वारों और न्यूनतम अलंकरण के साथ मजबूत, सैन्यवादी संरचनाएं जौनपुर में आम होने लगी। इसका उदाहरण भव्य अटाला मस्जिद (1408) में देखा जा सकता है।मध्य गंगा के किनारे जौनपुर की रणनीतिक स्थिति ने, युद्ध-हाथियों जैसे संसाधनों तक पहुंच भी प्रदान की, जो बिहार और बंगाल के जंगलों में घूमते थे। हालांकि, मध्य एशियाई व्यापार मार्गों से इसकी दूरी का मतलब, युद्ध के घोड़ों तक सीमित पहुंच था। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि, शर्की शासकों के अधीन, जौनपुर प्रतिभाशाली व्यक्तियों के लिए एक चुंबक बन गया। संत, सूफ़ी, कवि और विद्वान हमारे शहर में आते रहे, जिससे यह शिक्षा और आध्यात्मिकता का केंद्र बन गया। लोग इसे "पूर्व का शिराज" कहते थे, जो इसके समृद्ध बौद्धिक और कलात्मक जीवन का प्रतीक है। शाह मदार जैसे रहस्यवादियों, संत कबीर सहित भक्ति आंदोलन के नेताओं और महदावी आंदोलन के संस्थापक - सैय्यद मुहम्मद ने हमारे शहर को घर समझा, जिन्होंने इसके जीवंत आध्यात्मिक परिदृश्य को आकार दिया।शर्की राजवंश के पतन के बाद भी, जौनपुर की विरासत जीवित रही। उनके द्वारा प्रवर्तित ज्ञान और संस्कृति की परंपराएं, सदियों तक इस क्षेत्र को प्रभावित करती रहीं। इसके जीवंत बौद्धिक वातावरण ने काजी शिहाब-उद-दीन दौलताबादी और मौलाना ख्वाजगी जैसे दिग्गजों को आकर्षित किया, जिनकी तफ़सीर, फ़िक़्ह और कलाम पर रचनाएं काफी प्रसिद्ध हैं।दर्शन से निकटता से संबंधित एक चीज, ‘संस्कृति' है। ‘संस्कृति’ एक संस्कृत शब्द है, जो किसी समाज या समुदाय के सामूहिक रीति-रिवाजों, परंपराओं और मूल्यों को संदर्भित करता है। भारतीय विरासत के संदर्भ में, संस्कृति पीढ़ियों से चली आ रही समृद्ध और विविध सांस्कृतिक प्रथाओं, भाषाओं, कलाओं और रीति-रिवाजों को समाहित करती है।माना जाता है कि, जिस प्रकार नदी बहती है, उसी तरह ज्ञान और जीवन भी बहता है। ये सभी निरंतरता के सीमाहीन प्रवाह हैं। "गंगा" केवल एक सीमित नदी न होकर, भारतीय संस्कृति में सभी नदियों को संदर्भित करती है। उसी तरह, "सरस्वती" केवल एक देवी नहीं, बल्कि स्वयं ज्ञान का संदर्भ है। जिस प्रकार नदी बहती है और सब कुछ अपने प्रवाह में ले लेती है, उसी प्रकार संस्कृति भी बहती रहती है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय रूपक में संस्कृति अलग-अलग हो सकती है। इस संस्कृति से ‘ज्ञान की धाराएं’ संबंधित हैं, जिनका अर्थ ज्ञान एवं आध्यात्मिकता का प्रसारण है।विश्व भर में संस्कृति, ज्ञान और नदियों की अवधारणाएं :1. एशिया/ऑस्ट्रेलिया की संस्कृतिसंस्कृत धातु "सृ" का अर्थ "बहना” या "प्रवाह करना" है, जिससे सरिता अर्थात नदी निकलती है। सार या सरस्वती सरिता का जल, एशिया से होकर बहता है। इसी सार या पानी के साथ, कुछ ऑस्ट्रेलियाई पौराणिक कथाएं सामने आई। एक कथा इस प्रकार है - दरअसल, एक समय दो भाई रेगिस्तान से उभरे। फिर, उन्होंने धरती को खोदना शुरू किया, जब तक कि वे पानी तक नहीं पहुंच गए। तब उन्होंने नदियों, पहाड़ों, फूलों और पेड़ों की स्थापना की। जब इन भाइयों की मृत्यु हो गई, तो वे पानी के सांपों के रूप में पुनर्जन्म लेते रहे, नदियों में बहते रहे, और इसके पश्चात उनकी आत्माएं बादलों का निर्माण करते हुए आकाश में उड़ गईं। ये बादल बारिश लाते रहते हैं, और उनका पानी एशिया/ऑस्ट्रेलिया की संस्कृति में ज्ञान की धाराओं के माध्यम से बहता रहता है।2. अफ़्रीका की संस्कृतियोरूबा (Yoruba) लोगों के लिए उनके आराध्य - ओरुनमिला (Orunmila), ज्ञान, कुशाग्रता और दूरदर्शिता की ओरिशा (Orisha), अर्थात भौतिक रूप में प्रकट आत्मा है। उनकी पत्नी - ओसुन (Osun) नदी की देवी हैं, जो ताजे पानी, उर्वरता और सुंदरता की आत्मा हैं। जबकि उनका पानी भूमि और लोगों का पोषण करता है, ओरुनमिला शहरों और गांवों में यात्रा करते हैं। वे भविष्यवाणी के माध्यम से लोगों के जीवन को ठीक भी करते हैं। ओरुनमिला की तरह, अफ़्रीका की संस्कृति की धाराएं स्थानों और भाषाओं में बहती हैं, तथा ज्ञान की नदी से अंतर्दृष्टि प्राप्त करती हैं।3. यूरोप की संस्कृतियुद्ध की देवी और शहर की रक्षक – एथेना (Athena), संघर्ष और हिंसा से बढ़कर तर्क और वृत्ति को महत्व देती है। वह शिल्प, साहित्य और कृषि की संरक्षक भी है। उन्होंने बांसुरी का आविष्कार किया था, और उनका प्रतिनिधित्व उल्लू द्वारा किया जाता है। यह उल्लू उनकी बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक है। उनका नेडॉन नदी (Nedon river) पर एक पुण्यस्थान भी है। दूसरी ओर, एथिया (Aethiya) के रूप में, वह जहाज निर्माण और नेविगेशन में कुशल है। यूरोप के शहरों में ज्ञान की कई धाराएं बहती हैं। इनके तटों पर ज्ञानी और देखभाल करने वाली देवी - सोफिया की भी पूजा की जाती है। वह भाग्य की देवता एवं महिला प्रतिनिधि है, तथा समय और स्थान पर राज करती है।एथेना4. चीन की संस्कृतिक्विंगशुई नदी (Qingshui river) के स्रोत पर, माउंट वुताई (Mount Wutai) है, जो चीन के चार पवित्र पहाड़ों में से एक है। यह एक युवा बोधिसत्व - मंजुश्री का निवास है, जो महान ज्ञान का अवतार है, और सौम्य महिमा से देदीप्यमान है। मंजुश्री, अंतर्दृष्टि की एक ज्वलंत शक्ति से अज्ञानता और पीड़ा को दूर करते है। अपने बाएं हाथ से अपने हृदय में, वह एक कमल धारण करते है, जिस पर महान बुद्धि सूत्र लिखा है। जब मंजुश्री के कमल का डंठल, पारलौकिक ज्ञान की ओर ले जाता है, तब चीनी संस्कृति की धाराएं, उसे ज्ञान की महान नदी की ओर ले जाती हैं।5. मध्य पूर्व की संस्कृतिप्राचीन मिस्र की बुद्धि और ज्ञान की देवी – सेशत (Seshat) ने लेखन का आविष्कार किया था। सेशत, थॉट (Thot) की समकक्ष हैं, जो लेखन और ज्ञान के चंद्र देवता हैं। उनके पुस्तकालय की वह मालकिन भी हैं। वह पानी के माध्यम से प्रजनन क्षमता प्रदान करने वाली देवी - आइसिस (Isis) से भी जुड़ी हैं। लेखन के कार्य में चित्रित, वह एकमात्र देवी हैं। वह वास्तुकला, खगोल विज्ञान, ज्योतिष, भवन निर्माण, गणित, इतिहास और सर्वेक्षण की भी देवी हैं। अंतरिक्ष और समय के पार से ज्ञान की ये विविध धाराएं, मध्य पूर्व संस्कृति की नदी में विलीन होती हैं।6. अमेरिका की संस्कृतिक्वेट्ज़ेलकोटल (Quetzelcoatl), सीखने, ज्ञान और लेखन के अमेरिकी देवता हैं। अपने जुड़वां देवता - ज़ोलोटल (Xolotl) के साथ, वह मानव जाति, हवा और बारिश के निर्माता है। मानव जाति के देवता के रूप में वह हमारी आंतरिक ऊर्जा का प्रतीक हैं। अमेरिका की संस्कृति की जीवंतता उसके ज्ञान की धाराओं में है, जो सीमाओं से परे और आगे बढ़ती है। संदर्भ1. https://tinyurl.com/6am8mzpj 2. https://tinyurl.com/yk7ht8ry 3. https://tinyurl.com/ms8pnbsv 4. https://tinyurl.com/3nkyyjn9 5. https://tinyurl.com/bdh5k2hs
आधुनिक राज्य : 1947 ई. से वर्तमान तक
क्या 75 साल पुराना नेटो गठबंधन अब सिर्फ इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा?
दुनिया भर में 32 देशों का एक ऐसा सैन्य गठबंधन चर्चा में है, जो शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के ख़िलाफ़ बना था, लेकिन आज अपने ही सबसे बड़े सदस्य देश अमेरिका की नीतियों की वजह से ऐतिहासिक संकट का सामना कर रहा है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध ने जहां एक तरफ़ इस गठबंधन को अपनी सैन्य ताक़त बढ़ाने पर मजबूर किया है, वहीं अमेरिकी नेतृत्व के नए बयानों और रक्षा ख़र्च की चेतावनियों ने नेटो के भविष्य पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नेटो क्या है और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसे क्यों बनाया गया?नेटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन की स्थापना साल 1949 में अमेरिका, कनाडा और पश्चिमी यूरोप के कई राष्ट्रों द्वारा मिलकर की गई थी। इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य सोवियत संघ के ख़िलाफ़ सामूहिक सुरक्षा प्रदान करना था। यह पहला ऐसा शांतिकालीन सैन्य गठबंधन था जिसमें अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध के बाहर शामिल हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध की भारी तबाही के बाद, यूरोप के देश अपनी चरमराई अर्थव्यवस्थाओं को फिर से बनाने और अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे थे। उस वक़्त युद्ध से तबाह हुए परिदृश्य में उद्योगों को फिर से स्थापित करने और खाद्य उत्पादन को बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता की सख़्त ज़रूरत थी।नेटो का झंडाइसके साथ ही, एक बार फिर से ताक़तवर होते जर्मनी या सोवियत संघ की घुसपैठ के ख़िलाफ़ यूरोप को सुरक्षा आश्वासनों की भी दरकार थी। अमेरिका का मानना था कि पूरे यूरोप में कम्युनिस्ट विस्तार को रोकने के लिए एक आर्थिक रूप से मज़बूत, हथियारों से लैस और एकजुट यूरोप बेहद ज़रूरी है। इसी रणनीति के तहत तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री जॉर्ज मार्शल ने यूरोप को बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता देने का प्रस्ताव रखा। इसे यूरोपीय रिकवरी प्रोग्राम या 'मार्शल प्लान' कहा गया, जिसने न केवल यूरोपीय आर्थिक एकीकरण को सुगम बनाया बल्कि अमेरिका और यूरोप के बीच साझा हितों को भी मज़बूत किया। जब सोवियत संघ ने इस मार्शल प्लान में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया और अपने पूर्वी यूरोपीय सहयोगी देशों को भी यह आर्थिक सहायता लेने से रोक दिया, तो यूरोप में पूर्व और पश्चिम के बीच की खाई और गहरी हो गई। साल 1947 और 1948 के दौरान कई ऐसी भू-राजनीतिक घटनाएं हुईं जिन्होंने पश्चिमी यूरोप के देशों को अपनी भौतिक और राजनीतिक सुरक्षा के प्रति चिंतित कर दिया। ग्रीस में चल रहे गृह युद्ध और तुर्की में बढ़ते तनाव के कारण तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन को यह ऐलान करना पड़ा कि अमेरिका दोनों देशों को आर्थिक और सैन्य सहायता प्रदान करेगा। इसी बीच चेकोस्लोवाकिया में सोवियत समर्थित तख्तापलट हुआ और जर्मनी की सीमाओं पर एक कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में आ गई। साल 1948 के मध्य में सोवियत प्रीमियर जोसेफ स्टालिन ने पश्चिमी देशों के संकल्प को परखने के लिए पश्चिम बर्लिन की नाकेबंदी कर दी, जिससे अमेरिका और सोवियत संघ सीधे टकराव के कगार पर आ गए थे। इन घटनाओं ने ट्रूमैन प्रशासन को पश्चिमी यूरोप की सुरक्षा के लिए एक ठोस यूरोपीय-अमेरिकी गठबंधन बनाने पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया। सामूहिक रक्षा में इसका उद्देश्य क्या है और इसके सदस्य कौन हैं?बढ़ते तनाव और सुरक्षा चिंताओं के जवाब में पश्चिमी यूरोपीय देश सामूहिक सुरक्षा समाधान पर विचार करने के लिए आगे आए। मार्च 1948 में ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्ज़मबर्ग ने ब्रुसेल्स संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि ने सामूहिक रक्षा का आधार तय किया, जिसके तहत यदि इनमें से किसी एक राष्ट्र पर हमला होता है, तो अन्य देश उसकी रक्षा के लिए बाध्य होंगे। महीनों की लंबी बातचीत और अमेरिकी कांग्रेस में कई बहसों के बाद, आख़िरकार 1949 में नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते में यह सहमति बनी कि किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमले को सभी पर हमला माना जाएगा। इस संधि के मूल 12 सदस्य अमेरिका, कनाडा, बेल्जियम, डेनमार्क, फ्रांस, आइसलैंड, इटली, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल और यूनाइटेड किंगडम थे। यह सामूहिक रक्षा व्यवस्था औपचारिक रूप से केवल यूरोप या उत्तरी अमेरिका में होने वाले हमलों पर लागू होती थी और इसमें औपनिवेशिक क्षेत्रों के संघर्षों को शामिल नहीं किया गया था। बाद में कोरियाई युद्ध के छिड़ने से नेटो सदस्यों ने तेज़ी से एक केंद्रीकृत मुख्यालय के ज़रिए अपने रक्षा बलों को एकीकृत और समन्वित करना शुरू कर दिया। साल 1952 में ग्रीस और तुर्की को नेटो में शामिल किया गया और 1955 में पश्चिमी जर्मनी भी इसका हिस्सा बन गया। पश्चिमी जर्मनी के प्रवेश के जवाब में सोवियत संघ ने अपना अलग 'वारसॉ ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन' (वारसॉ पैक्ट) बनाया। 1950 के दशक में नेटो का सैन्य सिद्धांत 'बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई' के इर्द-गिर्द घूमता था, जिसका मतलब था कि किसी भी हमले का जवाब अमेरिका बड़े परमाणु हमले से देगा। शीत युद्ध की ज़रूरतों के लिए बना यह गठबंधन उस संघर्ष के ख़त्म होने के बाद भी न सिर्फ़ क़ायम रहा, बल्कि इसका लगातार विस्तार हुआ है। वर्तमान में नेटो के सदस्यों की संख्या 32 तक पहुंच गई है, जिनमें कई पूर्व सोवियत राज्य भी शामिल हैं। आज यह दुनिया का सबसे बड़ा शांतिकालीन सैन्य गठबंधन है। इसका मुख्यालय ब्रुसेल्स में है और यह आम सहमति पर आधारित गठबंधन है जहां सभी फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। हाल के वर्षों में रूस के बढ़ते ख़तरे को देखते हुए स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों ने भी अपनी पारंपरिक सैन्य गुटनिरपेक्ष नीति को छोड़कर नेटो की सदस्यता हासिल कर ली है। फिनलैंड अप्रैल 2023 में शामिल हुआ, जिससे रूस के साथ नेटो की सीमा दोगुनी हो गई, और तुर्की व हंगरी के राजनीतिक विवादों के सुलझने के बाद मार्च 2024 में स्वीडन भी इसका पूर्ण सदस्य बन गया। रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक सुरक्षा में नेटो की क्या भूमिका है?शीत युद्ध के बाद नेटो ने अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना शुरू किया। 1990 के दशक की शुरुआत में यूगोस्लाविया के विघटन और बोस्निया में जातीय संघर्ष के दौरान नेटो ने पहली बार अहम भूमिका निभाई और अप्रैल 1994 में अपने इतिहास के पहले लड़ाकू अभियान में बोस्नियाई सर्ब विमानों को मार गिराया। इसके इतिहास में पहली और इकलौती बार 'आर्टिकल 5' का इस्तेमाल अमेरिका पर हुए 9/11 के आतंकी हमलों के बाद किया गया था। इसके परिणामस्वरूप अफ़ग़ानिस्तान में एक बड़ा मिशन शुरू हुआ, जिसमें 50 गठबंधन और भागीदार देशों के 130,000 से ज़्यादा सैनिकों ने हिस्सा लिया। यह ऐतिहासिक सैन्य अभियान साल 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के साथ समाप्त हुआ। साल 2022 की शुरुआत में रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए हमले ने यूरोप के पूरे सुरक्षा ढांचे को हिला कर रख दिया। यूक्रेन हालांकि नेटो का सदस्य नहीं है, लेकिन अमेरिका सहित कई नेटो देशों ने उसे अभूतपूर्व मात्रा में सैन्य सहायता प्रदान की है। इसमें टैंक, भारी तोपखाने, सशस्त्र ड्रोन और विमान भेदी प्रणालियां जैसे आधुनिक हथियार शामिल हैं। हालांकि, नेटो नेताओं ने सीधे तौर पर रूस के साथ सीधे संघर्ष में उलझने या 'नो-फ्लाई ज़ोन' लागू करने से बचने की पूरी कोशिश की है। फिर भी, रूस ने कड़ी चेतावनी दी है कि इस सहायता को देकर नेटो सहयोगी परमाणु युद्ध के भड़कने का भारी जोखिम उठा रहे हैं। यूक्रेन लगातार पूर्ण नेटो सदस्यता हासिल करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा होना मुश्किल है। रूसी आक्रामकता ने नेटो को अपनी पूर्वी सीमाओं पर रक्षा प्रणाली मज़बूत करने के लिए विवश कर दिया है। 2014 के बाद से नेटो ने अपने सैन्य अभ्यास काफ़ी बढ़ा दिए हैं और बुल्गारिया, एस्टोनिया, हंगरी, लातविया, लिथुआनिया, पोलैंड, रोमानिया और स्लोवाकिया में नए कमांड सेंटर खोले हैं। 2017 में नेटो ने बाल्टिक राज्यों और पोलैंड में बहुराष्ट्रीय युद्ध समूहों को तैनात करना शुरू किया और रोमानिया में एक नया बहुराष्ट्रीय बल बनाया। इसके अलावा, गठबंधन ने अपनी पूर्वी सीमाओं पर हवाई गश्त में इज़ाफ़ा किया है। जून 2025 में द हेग, नीदरलैंड्स में होने वाले नेटो शिखर सम्मेलन में यह उम्मीद की जा रही है कि भविष्य के हमलों से बचने के लिए वायु और मिसाइल रक्षा प्रणाली में चार सौ प्रतिशत की वृद्धि को मंज़ूरी दी जाएगी। क्या अमेरिका नेटो के भविष्य के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन गया है?जहां एक तरफ़ नेटो रूस से मिल रही सैन्य चुनौतियों का सामना कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ सत्ता में लौटे अमेरिकी प्रशासन के रवैये ने गठबंधन के भीतर एक अभूतपूर्व संकट पैदा कर दिया है। आज यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका ही नेटो के भविष्य के लिए नंबर एक ख़तरा बनकर उभरा है। जनवरी 2025 में कार्यभार संभालने के बाद, डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने यूक्रेन के लिए अपने समर्थन को कमज़ोर कर दिया है, कुछ सैन्य सहायता को अस्थायी रूप से रोक दिया है और मॉस्को के बजाय कीव पर संघर्ष विराम के लिए रियायतें देने का ज़्यादा दबाव बनाया है। फ़रवरी 2025 में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने यूक्रेन के नेटो में शामिल होने की संभावना को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया। रक्षा ख़र्च को लेकर भी अमेरिका और अन्य नेटो सदस्यों के बीच मतभेद चरम पर हैं। ट्रम्प प्रशासन अब नेटो सदस्यों से अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 5 प्रतिशत रक्षा पर ख़र्च करने की मांग कर रहा है, जिसमें से 3.5 प्रतिशत मुख्य रक्षा ख़र्च और 1.5 प्रतिशत रक्षा-संबंधी व्यय होना चाहिए। मार्च 2025 में उन्होंने यहां तक सुझाव दे दिया कि जो सदस्य देश रक्षा ख़र्च में पर्याप्त योगदान नहीं दे रहे हैं, अमेरिका उनकी रक्षा नहीं करेगा। ट्रम्प प्रशासन के इस बदलते रुख और बार-बार दी जा रही चेतावनियों ने यूरोप के देशों में अपनी सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा कर दी है। इसके अलावा, ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति की ताज़ा बयानबाज़ी ने पूरे गठबंधन को गहरे असमंजस में डाल दिया है। वेनेज़ुएला में ऑपरेशन के बाद, अमेरिका ने कथित तौर पर ग्रीनलैंड को अपने अगले हस्तक्षेप के स्थान के रूप में चिह्नित किया है। ग्रीनलैंड अमेरिका, कनाडा और आर्कटिक की रक्षा के लिए एक अहम रणनीतिक स्थिति रखता है और अमेरिकी अंतरिक्ष कमान (स्पेस कमांड) का मुख्य केंद्र भी है। लेकिन अगर अमेरिका वास्तव में ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने के लिए सैन्य आक्रमण करता है, तो यह तकनीकी रूप से नेटो संधि के आर्टिकल 5 को ट्रिगर कर देगा, जिसके तहत सभी सदस्य देशों को डेनमार्क की रक्षा के लिए आना होगा। इस संभावित ख़तरे के जवाब में डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि डेनमार्क ग्रीनलैंड पर किसी भी क़दम का कड़ा विरोध करेगा। डेनिश सेना को 1952 के एक निर्देश की भी याद दिलाई गई है जो उन्हें उच्च कमान के आदेशों का इंतज़ार किए बिना डेनिश क्षेत्र पर किसी भी हमले का तुरंत जवाब देने की शक्ति देता है। आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों के कारण वहां नेटो की मौजूदगी पहले से ही बढ़ रही है। जानकारों का कहना है कि अगर अमेरिका इसी तरह नेटो के उन बहुपक्षीय सिद्धांतों से दूर जाता रहा जिन पर इस गठबंधन की नींव रखी गई थी, तो नेटो को जल्द ही अपनी भविष्य की रणनीति को फिर से परिभाषित करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। संदर्भ 1. https://tinyurl.com/h2oqj3a 2. https://tinyurl.com/2zqqdpcm 3. https://tinyurl.com/29fhngv4 4. https://tinyurl.com/29wmjhvh 5. https://tinyurl.com/28fvhs79 6. https://tinyurl.com/22bk59me
प्रारंभिक मध्यकाल : 1000 ई. से 1450 ई.
1000 साल, 7 शहर और इतने साम्राज्य: क्या आप जानते हैं हमारी राजधानी दिल्ली का यह इतिहास?
जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो दिल्ली की एक बेहद अनोखी तस्वीर सामने आती है। दिल्ली के पुरातात्विक निष्कर्षों और हालिया खुदाइयों ने यह साबित कर दिया है कि यहाँ तीसरी और चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर मुग़ल काल तक सांस्कृतिक परतों की एक निरंतर और अटूट श्रृंखला मौजूद रही है। इतिहासकार और पुरातत्वविद उस समय और भी हैरान रह गए जब यहाँ खुदाई के दौरान मिट्टी के बर्तनों के ऐसे अवशेष (पॉटरी फ्रैगमेंट्स) मिले जिनका समय काल लगभग एक हज़ार से पाँच सौ ईसा पूर्व माना जाता है। ये प्राचीन अवशेष इस बात की गवाही देते हैं कि दिल्ली महज़ कुछ सौ साल पुराना शहर नहीं है, बल्कि यह हज़ारों सालों से मानव सभ्यता और संस्कृति का एक बेहद महत्वपूर्ण और जीवंत केंद्र रहा है। शासक बदलते रहे, लेकिन इस ज़मीन ने हर दौर की संस्कृति को अपने भीतर संजो कर रखा। दिल्ली के सात शहर – गॉर्डन रिस्ले हर्न, 1906दिल्ली के सात शहर:तोमर और चौहान वंश ने दिल्ली के पहले शहर 'लाल कोट' की नींव कैसे रखी?अगर हम दिल्ली के पहले आधिकारिक शहर की बात करें, तो इसका निर्माण ग्यारहवीं शताब्दी में हुआ था। दिल्ली के इस सबसे पहले शहर को 'लाल कोट' के नाम से जाना जाता था, जिसकी स्थापना साल एक हज़ार साठ ईस्वी में तोमर वंश के शासकों द्वारा की गई थी। तोमर वंश ने इस शहर को अपनी सत्ता का एक मज़बूत केंद्र बनाया था। लेकिन बारहवीं शताब्दी के मध्य में इतिहास ने फिर करवट ली और चौहान वंश ने तोमर शासकों को सत्ता से हटाकर इस क्षेत्र पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। चौहान शासकों ने इस शहर को केवल जीता ही नहीं, बल्कि इसका विस्तार भी किया। उन्होंने लाल कोट की पुरानी सीमाओं को और आगे बढ़ाया और इस नई व विस्तारित संरचना को 'क़िला राय पिथौरा' का नाम दिया। यह क़िला आज भी दिल्ली के शुरुआती राजनीतिक और सैन्य इतिहास का एक सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।दिल्ली सल्तनत के दौर में 'सीरी' और 'तुग़लक़ाबाद' का निर्माण कैसे हुआ?दिल्ली ने सही मायनों में एक विशाल साम्राज्य की राजधानी का रूप तब लिया जब यहाँ 'दिल्ली सल्तनत' की स्थापना हुई। इसी दौर में दिल्ली का दूसरा शहर बसाया गया जिसे 'सीरी' के नाम से जाना गया। सत्ता के गलियारों में बदलाव का दौर जारी रहा और ख़िलजी वंश के पतन के बाद सत्ता तुग़लक़ वंश के हाथों में आ गई। साल तेरह सौ बीस से लेकर तेरह सौ चौबीस ईस्वी तक राज करने वाले ग़यासुद्दीन तुग़लक़ इस वंश के पहले शासक थे। अपनी सामरिक और प्रशासनिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने दिल्ली के तीसरे शहर की नींव रखी, जिसे आज हम 'तुग़लक़ाबाद' के नाम से जानते हैं। इसके विशाल और ऊँचे खंडहर आज भी तुग़लक़ वंश की वास्तुकला और उनके भव्य इरादों की गवाही देते हैं।'जहाँपनाह' और 'फ़िरोज़ाबाद' के ज़रिए दिल्ली का भूगोल कैसे बदला गया?तुग़लक़ वंश के शासकों ने दिल्ली के भूगोल और इसके शहरों के निर्माण में सबसे अहम भूमिका निभाई थी। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ के बाद जब मुहम्मद-बिन-तुग़लक़ सत्ता में आए, तो उन्होंने साल तेरह सौ छब्बीस-सत्ताईस ईस्वी में एक बहुत ही अनूठा निर्माण कार्य करवाया। उन्होंने दिल्ली के दो पुराने शहरों, यानी लाल कोट और सीरी को दो विशाल दीवारों के ज़रिए आपस में जोड़ दिया। इस तरह लाल कोट और सीरी के बीच की ज़मीन को सुरक्षित करके दिल्ली का चौथा शहर बसाया गया, जिसे 'जहाँपनाह' नाम दिया गया। इसके बाद साल तेरह सौ इक्यावन से तेरह सौ अट्ठासी तक शासन करने वाले फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने वास्तुकला की इस परंपरा को और आगे बढ़ाया। उन्होंने यमुना नदी के शांत तटों पर दिल्ली के पाँचवें शहर 'फ़िरोज़ाबाद' का निर्माण करवाया। हालांकि, यह भी एक ऐतिहासिक सत्य है कि दिल्ली पर राज करने वाले हर वंश ने अपना कोई नया शहर नहीं बसाया। पंद्रहवीं शताब्दी में राज करने वाले सैय्यद वंश और पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य में राज करने वाले लोधी वंश ने अपने पीछे दिल्ली में कोई विशेष नया शहर या राजधानी नहीं छोड़ी।दिल्ली का नक्शा – मिसेज़ शूस्मिथ का बनाया मज़ेदार कार्टून नक्शा (1930)मुग़ल साम्राज्य ने 'दीनपनाह' और 'शाहजहाँनाबाद' की भव्यता को कैसे तराशा?सोलहवीं शताब्दी के मध्य से लेकर सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक दिल्ली ने मुग़ल साम्राज्य की राजधानी के रूप में एक बहुत ही अस्थिर दौर देखा, जहाँ सत्ता का केंद्र अक्सर बदलता रहता था। मुग़ल बादशाह हुमायूँ ने वास्तुकला के इस ऐतिहासिक सफ़र में अपना योगदान देते हुए साल पंद्रह सौ तैंतीस ईस्वी में 'दीनपनाह' का निर्माण करवाया, जिसे दिल्ली का छठा शहर माना जाता है। लेकिन दिल्ली का सबसे भव्य और ऐतिहासिक रूप तब सामने आया जब मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने सत्ता सँभाली। साल सोलह सौ उनतालीस ईस्वी में बादशाह शाहजहाँ ने मुग़ल साम्राज्य की राजधानी को वापस दिल्ली लाने का एक बड़ा ऐतिहासिक फ़ैसला किया। इसी फ़ैसले के तहत उन्होंने एक पूरी तरह से चारदीवारी से घिरे हुए नए शहर का निर्माण करवाया। इस शहर को 'शाहजहाँनाबाद' का नाम दिया गया, जो मुग़ल वास्तुकला का सबसे बेहतरीन नमूना बना और इसे दिल्ली का सातवाँ शहर कहा गया। अलेक्जेंडर राउज़ (Alexander Rouse), पीडब्ल्यूडी (PWD), दिल्ली का नक्शाअंग्रेज़ों ने अपनी राजधानी के रूप में कलकत्ता छोड़कर आधुनिक 'नई दिल्ली' की रूपरेखा कैसे तैयार की?समय का पहिया घूमता रहा और भारत के राजनीतिक परिदृश्य में एक बहुत बड़ा बदलाव तब आया जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी ताक़त बढ़ानी शुरू की। साल अठारह सौ तीन ईस्वी में अंग्रेज़ों ने मराठों को एक निर्णायक युद्ध में हरा दिया और दिल्ली की ऐतिहासिक ज़मीन पर अपना पूरा कब्ज़ा कर लिया। लंबे समय तक अंग्रेज़ों की राजधानी कलकत्ता ही रही, लेकिन साल उन्नीस सौ ग्यारह ईस्वी में ब्रिटिश साम्राज्य ने एक बहुत ही अहम रणनीतिक फ़ैसला लिया। उन्होंने अपनी राजधानी को कलकत्ता से हटाकर पूरी तरह से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया। प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने और ब्रिटिश सत्ता की भव्यता को दर्शाने के लिए मुग़लों द्वारा बसाए गए पुराने शहर 'शाहजहाँनाबाद' के दक्षिण-पश्चिम इलाके में एक बिल्कुल नया शहर बसाया गया। इस नए और आधुनिक शहर को 'नई दिल्ली' का नाम दिया गया, जो आज भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की गौरवशाली राजधानी के रूप में शान से खड़ा है।दिल्ली को 'सात शहरों' (Seven Cities of Delhi) के रूप में देखने का नज़रिया आखिर मशहूर कैसे हुआ? दरअसल, इस पहचान को लोकप्रिय बनाने का बहुत बड़ा श्रेय गॉर्डन रिस्ले हर्न (Gordon Risley Hearn) को जाता है। सर गॉर्डन रिस्ले हर्न भारत में तैनात एक ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी (इंजीनियर) और कर्नल थे। उनके पिता का नाम चार्ल्स शकबर्ग हर्न (1829–1884) और माता का नाम मार्गरेट मिलर मेगौन (1844–1932) था। उन्होंने अपनी शिक्षा विंचेस्टर कॉलेज, वूलविच मिलिट्री अकादमी और स्कूल ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग से पूरी की। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध किताब 'द सेवन सिटीज़ ऑफ़ दिल्ली' में सबसे पहले इस मुहावरे को गढ़ा था और दिल्ली के इस ऐतिहासिक सफर की तुलना सात पहाड़ियों वाले 'रोम' (Rome) शहर से की थी।हर्न के इस ऐतिहासिक विचार को एक बेहद दिलचस्प और विज़ुअल रूप तब मिला, जब 1931 में 'नई दिल्ली' के औपचारिक उद्घाटन के मौके पर मिसेज शूस्मिथ (Mrs. Shoosmith) ने एक अद्भुत नक्शा तैयार किया। मिसेज शूस्मिथ, दिल्ली के निर्माण से जुड़ी प्रमुख ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स टीम (लुटियंस-बेकर) के एक सदस्य की पत्नी थीं। कॉमिक और मज़ेदार अंदाज़ में हाथ से बनाए गए इस नक़्शे (non-scale map) में दिल्ली के सभी 7 ऐतिहासिक शहरों के सफर को एक ही पन्ने पर बेहद बारीकी से कैद किया गया था। समय के उस दुर्लभ पल को दर्शाने वाले इस शानदार नक़्शे की इकलौती ज्ञात प्रति आज कैम्ब्रिज (Cambridge) में मिसेज शूस्मिथ के लिगेसी बॉक्स में सुरक्षित रखी गई है। संदर्भ 1. https://tinyurl.com/28aadpb62. https://tinyurl.com/2bcg3z3k3. https://tinyurl.com/25bztq5l4. https://tinyurl.com/6d8ewjn9
तितलियाँ और कीट
तितलियों का अद्भुत प्रवास और प्रकृति से उनका गहरा जुड़ाव
तितलियों का प्रवास प्रकृति के सबसे अद्भुत दृश्यों में से एक माना जाता है। हर साल कुछ तितलियाँ मौसम बदलने के साथ कभी कभी हजारों किलोमीटर की यात्रा करती हैं। वे ठंड, भोजन की कमी और बदलते वातावरण से बचने के लिए ऐसे स्थानों की ओर जाती हैं, जहाँ उन्हें फूलों का रस और अपने बच्चों के लिए उपयुक्त पौधे मिल सकें।दुनिया की सभी तितलियाँ प्रवास नहीं करतीं, लेकिन मोनार्क, पेंटेड लेडी और रेड एडमिरल जैसी कुछ प्रजातियाँ लंबी यात्राओं के लिए जानी जाती हैं। ये तितलियाँ मौसम और दिन की अवधि में होने वाले बदलावों को पहचानकर सही दिशा में उड़ान भरती हैं।तितलियों का यह सफर केवल उनका जीवन बचाने के लिए ही नहीं होता, बल्कि यह प्रकृति के संतुलन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। प्रवास के दौरान वे कई फूलों का परागण करती हैं, जिससे पौधों और जंगलों का जीवन चक्र चलता रहता है।तितलियों के प्रवास का अध्ययन वैज्ञानिकों को जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और प्राकृतिक आवासों की स्थिति को समझने में भी मदद करता है। इस तरह तितलियों की ये लंबी यात्राएँ प्रकृति और जीवन के बीच एक सुंदर जुड़ाव को दर्शाती हैं।संदर्भ:https://tinyurl.com/yfn5spw7https://tinyurl.com/y5ussmrf https://tinyurl.com/zmafb44x https://tinyurl.com/332ae3mt
आवास के अनुसार वर्गीकरण
जौनपुर, आज जानिए हिमालय के खुम्बी या मोरेल मशरूम क्यों हैं स्वादिष्ट, महंगे व महत्वपूर्ण?
जौनपुर, आज हम समझेंगे कि मोरेल (morel) मशरूम क्या हैं, जिन्हें हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय रूप से खुम्बी या गुच्ची के नाम से जाना जाता है। हम जानेंगे कि, वे दुनिया में सबसे महंगे क्यों हैं। फिर, हम पता लगाएंगे कि वे कहां पाए जाते हैं। उसके बाद, हम जांचेंगे कि उनकी दुर्लभता और मौसमी प्रकृति के कारण वे महंगे क्यों हैं। हम यह भी देखेंगे कि, इन्हें जंगलों से कैसे एकत्र किया जाता है, और उनकी खेती में क्या चुनौतियां आती हैं। और अंत में, हम स्थानीय समुदायों के लिए उनके आर्थिक महत्व को समझेंगे।मोरेल मशरूम (Morel mushroom), खाद्य कवक की एक प्रजाति है। इन विशिष्ट कवकों के ऊपरी टोपीनुमा भाग पर छत्ते जैसा स्वरूप होता है। इन्हें विशेष रूप से कैटलन (Catalan) और फ्रांसीसी व्यंजनों में बहुत महत्व दिया जाता है। भारत में इन्हें पुलाव, यखनी या रोगनजोश में परोसा जाता है। शादियों में परोसा जाने वाला यह मशरूम, सामाजिक स्थिति का भी प्रतीक है। लेकिन, अगर इसे कच्चा या केवल अर्ध पका खाया जाए, तो यह जहरीला हो सकता है।समशीतोष्ण उत्तरी अमेरिका, तुर्की, चीन, भारत और पाकिस्तान के हिमालय में जंगली मोरेल की व्यावसायिक कटाई, एक बहु-मिलियन डॉलर उद्योग बन गया है। क्योंकि, यहां ये मशरूम बहुतायत में पाए जाते हैं।मोरेल कवक हिमालय की हरी-भरी स्थिति को दर्शाते हैं। इनके बारे में एक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि, इन्हें मानव द्वारा नहीं उगाया जा सकता हैं। क्योंकि इनके पनपने का क्षेत्र, हिमालय के घने जंगलों में मौजूद नम व ठंडी जलवायु का है। इसके अलावा, ये समुद्र तल से 11,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अद्वितीय जलवायु परिस्थितियों और हरे-भरे वन वातावरण में ही उगते हैं। इसी कारण, वे ज्यादातर कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पाए जाते हैं। इनके विकास के लिए उल्लेखनीय क्षेत्रों में, कश्मीर में अनंतनाग, कुपवाड़ा और कंगन की वन श्रृंखलाएं, तथा जम्मू क्षेत्र में डोडा और काश्तीवार हैं। ये कवक, जंगल में ओक, पाइंस और अन्य शंकुधारी पेड़ों के नीचे वसंत ऋतु में उगते हैं। ताजा मोरेल मार्च, अप्रैल और मई के महीने में और बाद में और बाद में सुखाए गए रूप में बाज़ार में उपलब्ध होते हैं।ये विभिन्न आकारों और काले, भूरे और पीले से लेकर क्रीम जैसे रंगों में उपलब्ध हैं। इनकी बनावट नरम और अत्यंत नाजुक है। साथ ही, इनकी गंध और स्वाद सौंधी और अच्छी तरह से परिभाषित है। एंटी-ऑक्सीडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी और विटामिन डी से भरपूर होने जैसे कई स्वास्थ्य लाभों के साथ, इन्हें प्राचीन समय में हकीमों द्वारा निर्धारित पारंपरिक कश्मीरी व्यंजनों और दवाओं में जगह मिलती है। इन पोषक तत्वों के अलावा, दुर्लभ खुम्बी मशरूम प्रोटीन, फाइबर, और विटामिन बी से भरपूर होते हैं। वे लौह, तांबा, फास्फोरस, मैंगनीज, जस्ता और पोटेशियम जैसे खनिज तत्व भी प्रदान करते हैं। इस प्रकार, उनके निम्नलिखित स्वास्थ्य लाभ हैं -1. रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार करना,2. गुर्दों को साफ़ करना,3. बेहतर मौखिक स्वास्थ्य प्रदान करना,4. मधुमेह को प्रबंधित करने में सहायता करना,5. एडेमा (Oedema) और सूजन को रोकना,6. बुढ़ापा रोधक गुण,7. ट्यूमर के प्रभाव को मिटाना,8. स्वस्थ हड्डियों में योगदान देना, 9. वजन प्रबंधन में मदद करना, और10. हृदय रोग के खतरे को कम करना, आदि।इनकी उच्च कीमत, निम्नलिखित कारकों के कारण होती है:1. वे केवल विशिष्ट पर्यावरणीय परिस्थितियों में ही बढ़ते हैं।2. उनको इकट्ठा करने के लिए हिमालय की तलहटी में इन्हें ढूंढना पड़ता है।3. इनके व्यापार के लिए पर्याप्त राशि जुटाने में काफी समय लगता है।4. इन्हें सुखाने की प्रक्रिया इसके स्वाद और दीर्घायु को बढ़ाती है, जिससे लागत और बढ़ जाती है।इस प्रकार, मोरेल मशरूम केवल जंगलों से इकट्ठे किए जाते हैं, क्योंकि उनकी खेती करना काफी कठिन है। उनका विकास जटिल जैविक और पर्यावरणीय कारकों से जुड़ा हुआ है, जिसे आधुनिक कृषि ने केवल हाल ही में समझना शुरू किया है। आम बटन मशरूम के विपरीत, मोरेल में एक बहु-चरण जीवन चक्र होता है। इसमें स्क्लेरोटिया (कठोर भूमिगत पोषक भंडार) शामिल होता है। इन स्क्लेरोटिया (sclerotia) को वास्तविक मशरूम में परिवर्तित करने के लिए, सटीक पर्यावरणीय स्थिति की आवश्यकता होती है, जिन्हें प्रयोगशाला में नहीं दोहराया जा सकता है।इनकी कई प्रजातियां, जीवित रहने के लिए विशिष्ट जीवित पेड़ों (जैसे एश, एल्म, या ओक) की जड़ों के साथ एक भौतिक और रासायनिक साझेदारी बनाती हैं। इस जटिल वन पारिस्थितिकी तंत्र को, एक वाणिज्यिक कृषि में पुनः बनाना लगभग असंभव है। इसके अलावा, मोरेल अप्रत्याशित होते हैं। जंगल में आग लगने के बाद वे हजारों की संख्या में दिखाई दे सकते हैं, लेकिन फिर अगले वर्ष उसी स्थान से पूरी तरह गायब भी हो जाते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि उन्हें बढ़ने के लिए मिट्टी के पीएच (pH) का एक विशिष्ट स्तर चाहिए, जो आग की स्थिति में बदल जाता है।उन्नत सुविधाओं में भी, इनकी खेती अक्सर जीवाणु प्रदूषण की उच्च दर और अस्थिर उपज से ग्रस्त होती है। मोरेल की खेती के प्रयास में दूषितकरण को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता भी शामिल है, क्योंकि इससे पूरी फसल बर्बाद हो सकती है। अतः उनके प्राकृतिक आवास की सटीक स्थितियों की नकल करना, एक कठिन चुनौती साबित होती है। आज वैज्ञानिक अनुसंधान, "परीक्षण और त्रुटि" से उन्नत आणविक और सूक्ष्मजीव प्रबंधन की ओर स्थानांतरित हो रहे हैं। विज्ञान में मोरेल खेती हेतु चल रहे विकास के प्रमुख क्षेत्रों में, निम्नलिखित शामिल हैं:1. बाह्य पोषक तत्व बैग (ईएनबी - Exogenous Nutrient Bag) तकनीक: वर्तमान खेती तरीकों में, मिट्टी के ऊपर पोषक तत्व बैग रखना और फिर मशरूम फलने के लिए उन्हें बाद में हटाना शामिल है। मिट्टी के प्रदूषण को रोकने के लिए, इन थैलियों के समय और संरचना को अनुकूलित किया जा रहा है।2. माइक्रोबायोम इंजीनियरिंग (Microbiome Engineering): शोधकर्ता कुछ बायोमार्कर बैक्टीरिया (Biomarker bacteria) की पहचान कर रहे हैं, जो मशरूम के विकास को बढ़ावा देते हैं। 3. आंतरिक फैक्टरी खेती: जबकि चीन ने बाह्य खेती को विस्तारित किया है, कोपेनहेगन, डेनमार्क और कश्मीर में मिली हालिया सफलताओं ने अंततः अच्छी आंतरिक नियंत्रित-जलवायु खेती हासिल कर ली है।4. आनुवंशिक प्रजनन: मोरेल में जीन संपादन कठिन होता है। इस कारण, आधुनिक अनुसंधान स्थिर एवं रोग-प्रतिरोधी उपभेदों को विकसित करने पर केंद्रित है, जो खेतों की गर्म जलवायु में जीवित रह सकते हैं। सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में, खुम्बी या गुच्ची मशरूम का संग्रह और बिक्री कई ग्रामीण परिवारों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इन्हें स्थानीय लोगों द्वारा वनों में खोजा जाता है, और इकट्ठा किया जाता है। यह खोज सुबह जल्दी शुरू होती है, और शाम तक चलती हैं। इसके संग्रहण में कठिनाई और जोखिम है, क्योंकि इसके लिए महत्वपूर्ण प्रयास, विशेषज्ञता और वन पारिस्थितिकी के साथ परिचितता की आवश्यकता होती है। कटाई की प्रक्रिया शारीरिक रूप से कठिन और कभी-कभी खतरनाक होती है, जिसमें पहाड़ी इलाकों और घने जंगलों में लंबी यात्राएं शामिल हैं। ये मशरूम अक्सर जंगल के कूड़े के बीच अच्छी तरह से छिपे रहते हैं और ऊबड़-खाबड़ इलाकों में उगते हैं। इससे उनका संग्रह श्रम-गहन और अनिश्चित हो जाता है। शायद इसी श्रम गहन प्रक्रिया के कारण, यह दुनिया में सबसे महंगा कवक है, जिसकी कीमत 20,000 से 40,000 रुपये प्रति किलोग्राम तक है।संदर्भ 1. https://tinyurl.com/bdxv3bwv 2. https://tinyurl.com/y6nuwc6t 3. https://tinyurl.com/mvm4fnna 4. https://tinyurl.com/yc3mahk5 5. https://tinyurl.com/3zpd8uus 6. https://tinyurl.com/5368vjms
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
काशी में विश्वनाथ से प्रेरित क्रिकेट स्टेडियम का अर्थव्यवस्था पर मुमकिन प्रभाव
क्या आपको मालूम है कि साल 1983 में जब भारत ने क्रिकेट विश्व कप जीता था, तब खिलाड़ियों को भत्ते के रूप में रोज़ाना केवल 200 रुपये और मैच फ़ीस के तौर पर 1500 रुपये मिलते थे। लेकिन आज यह खेल एक बहु-अरब डॉलर का उद्योग बन चुका है, जहां खिलाड़ियों को 1 से 7 करोड़ रुपये तक का भारी-भरकम भुगतान किया जाता है। भारत में क्रिकेट अब सिर्फ़ एक खेल नहीं बल्कि एक विशाल अर्थव्यवस्था बन चुका है। जौनपुर और पूर्वांचल के खेल प्रेमियों के लिए यह जानना और भी दिलचस्प होगा कि उनके नज़दीक वाराणसी में एक भव्य अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम आकार ले रहा है, ऐतिहासिक ईडन गार्डन्स का महत्व क्या है, जिस पिच पर मैच खेले जाते हैं वह कैसे तैयार होती है, और कैसे दुनिया भर की कंपनियाँ इस खेल में अंधाधुंध पैसा लगा रही हैं। जौनपुर और आस-पास के क्षेत्रों के लिए क्रिकेट के बुनियादी ढांचे में क्या बदलाव आ रहा है? भले ही वर्तमान में जौनपुर शहर में कोई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम नहीं है, लेकिन इसके ठीक बगल में स्थित वाराणसी शहर में एक नए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम का निर्माण कार्य ज़ोरों पर चल रहा है। उम्मीद जताई जा रही है कि यह स्टेडियम मई 2026 तक पूरी तरह से बनकर तैयार हो जाएगा। इसके पूरा होने पर यह कानपुर के ग्रीन पार्क स्टेडियम, लखनऊ के इकाना क्रिकेट स्टेडियम, ग्रेटर नोएडा और इटावा के सैफई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम के बाद उत्तर प्रदेश का पांचवां अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम बन जाएगा। इस स्टेडियम की दर्शक क्षमता 30,000 होगी, जिसे ज़रूरत पड़ने पर 40,000 तक बढ़ाया जा सकेगा। चूंकि यह वाराणसी के पवित्र शहर में बन रहा है, इसलिए इसका वास्तुशिल्प डिज़ाइन भगवान शिव से प्रेरित है। इसमें त्रिशूल के आकार की फ़्लडलाइट्स, अर्धचंद्र के आकार का रूफ़ कवर, घाट की सीढ़ियों जैसी बैठने की व्यवस्था, और मुखौटे पर बेलपत्र के आकार की धातु की चादरें होंगी। इसके अलावा इसका मीडिया सेंटर डमरू के आकार का होगा। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 सितंबर 2023 को सचिन तेंदुलकर, सुनील गावस्कर और रवि शास्त्री जैसे दिग्गजों की मौजूदगी में इस स्टेडियम की आधारशिला रखी थी। मैचों को प्रभावित करने वाली क्रिकेट पिच कैसे बनाई जाती है?क्रिकेट का पूरा खेल मैदान के बीचों-बीच मौजूद 22 गज़ लंबी और 10 फ़ुट चौड़ी पिच पर निर्भर करता है। इसे बनाना एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें काफ़ी धैर्य की आवश्यकता होती है। सबसे पहले ज़मीन से घास, मिट्टी, कंकड़ और अन्य मलबे को हटाकर जगह को साफ़ किया जाता है। इसके बाद मिट्टी को समतल और संकुचित करके एक चिकनी सतह तैयार की जाती है। इस सतह पर अलग-अलग तरह की मिट्टी की परतें बिछाई जाती हैं। सबसे निचली परत में नरम मिट्टी का मिश्रण होता है जो स्थिरता प्रदान करता है, जबकि सबसे ऊपरी परत महीन और अच्छी तरह से ग्रेडेड मिट्टी की होती है, जो खेलने के लिए मुख्य सतह बनाती है। एक अच्छी सतह बनाए रखने के लिए नियमित रूप से पानी देना, घास काटना और रोलिंग करना ज़रूरी होता है। इसके लिए बड़े रोलर्स का उपयोग किया जाता है ताकि सतह को चपटा किया जा सके। पिच कितने प्रकार की होती हैं और खेल पर इनका क्या असर पड़ता है?खेल के दौरान पिच की नमी, दरारें और धूल मैच का रुख़ तय करते हैं। हरी पिच पर घास और नमी होती है जो तेज़ गेंदबाज़ों को फ़ायदा पहुंचाती है। इसके विपरीत फ़्लैट ट्रैक पिच पर घास लगभग नहीं होती और यह बल्लेबाज़ी के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है। सूखी पिच में नमी नहीं होती है और इस पर दरारें आसानी से बन जाती हैं, जो तेज़ गेंदबाज़ों और अनुभवी बल्लेबाज़ों दोनों के लिए मददगार साबित हो सकती हैं। इसके अलावा गीली पिच पर नमी के कारण गेंद अप्रत्याशित रूप से फिसलती और उछलती है, जिससे बल्लेबाज़ों को मुश्किल होती है। धूल भरी पिचें नरम होती हैं और कम रोल की जाती हैं, जिससे स्पिनरों को गेंद घुमाने में काफ़ी मदद मिलती है। भारत जैसे देशों में गर्मी और सूखे के कारण पिचें धीमी होती हैं और स्पिनरों के लिए बहुत फ़ायदेमंद साबित होती हैं। आजकल हाइब्रिड पिचें भी चलन में हैं, जिन्हें सिंथेटिक फ़ाइबर और प्राकृतिक घास को मिलाकर बनाया जाता है ताकि वे लंबे समय तक टिक सकें और जल निकासी बेहतर हो सके। भारत का सबसे पुराना और ऐतिहासिक क्रिकेट स्टेडियम कौन सा है?भारत में क्रिकेट के इतिहास की बात करें तो कोलकाता का ईडन गार्डन्स सबसे ऐतिहासिक मैदान है। साल 1864 में स्थापित यह भारत का सबसे पुराना और नरेंद्र मोदी स्टेडियम के बाद दूसरा सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम है। वर्तमान में इस स्टेडियम की दर्शक क्षमता 68,000 है। इसे भारतीय क्रिकेट का मक्का भी कहा जाता है क्योंकि यह क्रिकेट खेल के लिए आधिकारिक तौर पर बनाया गया भारत का पहला मैदान था। ईडन गार्डन्स ने विश्व कप, वर्ल्ड ट्वेंटी-20 और एशिया कप सहित कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के मैचों की मेज़बानी की है। 1987 में यह विश्व कप फ़ाइनल की मेज़बानी करने वाला दूसरा स्टेडियम बन गया था। 22 नवंबर 2019 को इसी मैदान पर भारत और बांग्लादेश के बीच देश का पहला डे-नाइट टेस्ट मैच खेला गया था। ईडन गार्डन्स को इसके बड़े भावुक दर्शकों के लिए भी जाना जाता है। 1996 के विश्व कप सेमीफ़ाइनल में भारत और श्रीलंका के मैच के दौरान यहां 110,564 दर्शकों की रिकॉर्ड भीड़ देखी गई थी। इस मैदान पर स्टैंड्स का नाम प्रमुख स्थानीय क्रिकेटरों और सैनिकों के नाम पर रखा गया है, और साल 2024 में मशहूर भारतीय महिला तेज़ गेंदबाज़ झूलन गोस्वामी के नाम पर भी एक स्टैंड समर्पित करने का फ़ैसला लिया गया था। विदेशी निवेशक और कंपनियाँ भारतीय क्रिकेट में इतना पैसा क्यों लगा रही हैं?भारत में क्रिकेट अब महज़ एक शगल से विकसित होकर एक प्रमुख आर्थिक ताक़त बन गया है। विशेष रूप से टी-20 प्रारूप और 2008 में शुरू हुई इंडियन प्रीमियर लीग ने क्रिकेट की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बदल दिया है। आईपीएल आज दुनिया की सबसे अमीर और सबसे ज़्यादा देखी जाने वाली क्रिकेट लीगों में से एक है। 2022 की मीडिया नीलामी में डिज़नी स्टार और वायकॉम 18 ने मिलकर टीवी और डिजिटल अधिकार 5.64 बिलियन डॉलर में ख़रीदे, जिससे आईपीएल दुनिया की दूसरी सबसे अमीर खेल लीग बन गई। इस अपार लोकप्रियता और राजस्व को देखते हुए विदेशी निवेशक भारतीय क्रिकेट में भारी निवेश कर रहे हैं। जो देश पारंपरिक रूप से क्रिकेट नहीं खेलते हैं, वे भी अब इस खेल में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। क्रिकेट से भारत की अर्थव्यवस्था और पर्यटन को कैसे बढ़ावा मिल रहा है? विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी केवल प्रसारण अधिकारों तक सीमित नहीं है। वे टी-20 लीगों में फ़्रैंचाइज़ी ख़रीदने में भी काफ़ी रुचि दिखा रहे हैं। उदाहरण के लिए, ब्रिटिश प्राइवेट इक्विटी फ़र्म सीवीसी कैपिटल पार्टनर्स ने अक्टूबर 2021 में 5625 करोड़ रुपये की भारी बोली लगाकर आईपीएल में गुजरात टाइटन्स फ़्रैंचाइज़ी ख़रीदी थी। इसके अलावा, विदेशी निवेशक प्रायोजन, एंडोर्समेंट, क्रिकेट अकादमियों के निर्माण, फ़ैंटेसी क्रिकेट प्लेटफ़ॉर्म और क्रिकेट पर्यटन पैकेजों के माध्यम से भी पैसा लगा रहे हैं। विराट कोहली, रोहित शर्मा और एमएस धोनी जैसे शीर्ष क्रिकेटरों के पास प्रमुख ब्रांड्स के साथ करोड़ों डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट हैं, जो उन्हें देश के सबसे अधिक भुगतान पाने वाले एथलीट बनाते हैं। कोटक सिक्योरिटीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, क्रिकेट विश्व कप 2023 से भारतीय अर्थव्यवस्था में 1.619 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक का योगदान मिलने का अनुमान लगाया गया था, जिसका एक बड़ा हिस्सा यात्रा और आतिथ्य क्षेत्रों से आना था। कुल मिलाकर, क्रिकेट की अर्थव्यवस्था भारत में विकास, रोज़गार और बुनियादी ढांचे के लिए एक मज़बूत स्तंभ साबित हो रही है। संदर्भ https://tinyurl.com/278dcy73https://tinyurl.com/279mqjezhttps://tinyurl.com/2b5ek3tyhttps://tinyurl.com/24kds387https://tinyurl.com/2a2to8vb
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
जौनपुर वासियों, जानें साइबरबुलिंग व एआई उत्पीड़न के बारे में हमें क्यों रहना चाहिए जागरूक?
आज के हमारे लेख में हम देखेंगे कि, साइबर बदमाशी या साइबरबुलिंग (Cyberbullying) और ऑनलाइन उत्पीड़न में एआई का उपयोग कैसे किया जा रहा है। हम समझेंगे कि, साइबरबुलिंग किसी के मानसिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करती है, और यह इतना गंभीर मुद्दा क्यों बनता जा रहा है। बाद में, हम ब्लू व्हेल गेम (Blue Whale Game) जैसे मामलों का पता लगाएंगे, और देखेंगे कि ऑनलाइन सामग्री लोगों को हानिकारक कार्यों की ओर कैसे धकेल सकती है। अंततः हम जानेंगे कि, भारत सरकार जागरूकता और नए उपायों के माध्यम से एआई संचालित उत्पीड़न और डीपफेक (Deepfake) दुरुपयोग से निपटने हेतु क्या कोशिश कर रही हैं।साइबरबुलिंग (Cyberbullying) एक ऐसा मुद्दा है, जो बच्चों और वयस्कों को समान रूप से प्रभावित करता है। यह शब्द उस बदमाशी को संदर्भित करता है, जो सेल फोन (cell phone) और कंप्यूटर (computer) जैसे डिजिटल उपकरणों पर होती है। इसमें गेमिंग कंसोल (Gaming consoles) भी शामिल है। सोशल मीडिया (social media), टेक्स्ट संदेश (text message), ईमेल (Email), ऑनलाइन फ़ोरम (Online Forums) और गेमिंग समुदाय (Gaming community) सबसे आम स्थान हैं, जहां साइबरबुलिंग होती है। एक अनुमान है कि, 30% किशोरों ने साइबरबुलिंग का अनुभव किया है। इसका शिकार होने वाले वयस्कों की बढ़ती संख्या (15%) चिंता का कारण बन रही है।पिछले वर्ष से, जेनरेटिव एआई (Generative AI) का उपयोग करके ऑनलाइन उत्पीड़न और साइबरबुलिंग बढ़ रही है। इसमें झूठी कल्पना बनाना या किसी के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाले लेखन जैसे कई तरीके शामिल हो सकते हैं। एआई-जनित उत्पीड़न इस डिजिटल दुरुपयोग के पारंपरिक उत्पीड़न की तुलना में पीड़ितों पर अधिक दबाव डाल सकता है। यह मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक शोषण को भी बढ़ा सकता है। हेरफेर किए गए मीडिया के ये रूप समस्याग्रस्त हो सकते हैं, क्योंकि पीड़ित के लिए यह साबित करना बहुत मुश्किल हो सकता है कि, वह वास्तव में नकली सामग्री हैं। इससे अतिरिक्त तनाव, भय और चिंता पैदा होती है। जैसे-जैसे यह तकनीक और इसकी क्षमताएं बढ़ती जा रही हैं, एआई-जनित उत्पीड़न के खतरों के बारे में हम निम्नलिखित तथ्य जानते हैं:1. स्वचालित ट्रोल बॉट (Troll bots) के माध्यम से उत्पीड़न काफी हद तक बढ़ जाता है। क्योंकि, इनसे काफ़ी लोगों को सामग्री भेजी जाती है, और यह तेजी से साझा की जाती है।2. एआई-जनित सामग्री व्यक्तिगत डेटा से पहलू सीखकर, हमलों को अधिक व्यक्तिगत बना सकती है।3. यह तकनीक ऐसी सामग्री बना सकती है, जो स्वचालित सामग्री मॉडरेशन सिस्टम (Content moderation systems) से सफलतापूर्वक बच जाती है।4. उत्पीड़न के लिए एआई-जनित सामग्री, सिस्टम को प्रशिक्षित करने हेतु प्रयुक्त डेटा के आधार पर, कोई व्यक्ति घृणास्पद भाषण और नस्लवादी टिप्पणियों के प्रति कितना संवेदनशील है, यह भी जान सकती है।जब ऑनलाइन बदमाशी या साइबरबुलिंग होती है, तो उसका प्रभाव लंबे समय तक रह सकते हैं, और व्यक्ति को निम्नलिखित तरीकों से प्रभावित कर सकते हैं:• मानसिक रूप से – परेशानी, चिंता, घबराहट, डर या गुस्सा महसूस करना।• भावनात्मक रूप से – शर्म महसूस करना या अपनी पसंदीदा चीज़ों में रुचि खोना।• शारीरिक रूप से – थकान आना, नींद की कमी, पेट दर्द या सिरदर्द जैसे लक्षणों का अनुभव करना।धीरे-धीरे लोग आत्मविश्वास खो सकते हैं, और चरम मामलों में, अपनी जान भी ले सकते हैं। साइबरबुलिंग हमें कई तरह से प्रभावित कर सकती है। साइबरबुलिंग का सामना करने पर, लोग हमारे बारे में क्या कहते या सोचते हैं, इसके बारे में हम असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। इससे दोस्तों और परिवार से दूरी बन सकती है, नकारात्मक विचार और आत्म-चर्चा हो सकती है, या हम दोषी महसूस कर सकते हैं। अकेलापन, अभिभूत महसूस करना, बार-बार सिरदर्द, मतली या पेट दर्द भी आम है। आप उन चीज़ों को करने के लिए अपनी प्रेरणा खो सकते हैं, जिन्हें करने में आपको आमतौर पर आनंद आता है, और आप अपने पसंदीदा लोगों से अलग-थलग महसूस कर सकते हैं। इससे नकारात्मक भावनाएं और विचार कायम रह सकते हैं, जो आपके मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।स्कूल छोड़ना साइबरबुलिंग का एक और आम प्रभाव है। यह उन बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है, जो अपने मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दर्द से निपटने के लिए शराब और नशीली दवाओं का सहारा लेते हैं। इसलिए, किसी भरोसेमंद दोस्त, परिवार के सदस्य या स्कूल काउंसलर (Counselor) से बात करना मदद पाने की शुरुआत हो सकती है। इन भावनाओं पर काबू पाया जा सकता है, और लोग अपना आत्मविश्वास और स्वास्थ्य दोबारा हासिल कर सकते हैं।चलिए अब साइबरबुलिंग का एक उदाहरण देखते हैं। ‘ब्लू व्हेल चैलेंज’ (Blue Whale Challenge) एक ऑनलाइन गेम है, जिसने अभिभावकों के मन में डर पैदा कर दिया था। विशेषकर किशोरों में कई आत्महत्याओं के लिए, ब्लू व्हेल चैलेंज को जिम्मेदार ठहराया गया है। इस गेम में प्रतिभागियों को 50 दिनों की अवधि में पूरे करने के लिए कुछ कार्य दिए जाते हैं। प्रतिभागियों को दिया गया अंतिम कार्य आत्महत्या करना, और कार्य के सफल समापन का प्रमाण अपलोड करना है। एक परिकल्पना के अनुसार, जिनमें मृत्यु का भय कम हो गया है या दर्द के प्रति संवेदनशीलता कम हो गई है, केवल वही व्यक्ति यदि उनमें आत्मघाती विचार विकसित होते हैं, तो आत्महत्या के प्रयास करते हैं। इस सिद्धांत को ब्लू व्हेल चैलेंज पर लागू करते हुए, गेम के शुरुआती कार्यों को ऐसे सोचा जा सकता है, जो शारीरिक दर्द सहनशीलता को बढ़ाते हैं और इस प्रकार मृत्यु के भय को कम करते हैं। इस प्रकार, कई कार्य पूरे करने पर यह गेम युवाओं को आत्महत्या करने पर मजबूर करता था। इस गेम की वजह से, कई युवाओं ने अंततः अपनी जान गंवाई है।इन्हीं घटनाओं के चलते, भारत में डीपफेक खतरों के खिलाफ़ निम्नलिखित सुरक्षा रणनीतियां अपनाई जा रही हैं:1. डीपफेक खोज को मजबूत करनासाइबर सुरक्षा विशेषज्ञ उन्नत एआई सुरक्षा उपकरणों में निवेश कर रहे हैं, जो वीडियो और ऑडियो डेटा में विसंगतियों का विश्लेषण करते हैं। व्यापक क्षति पहुंचाने से पहले जोखिमों को कम करने के लिए हमारे देश में डीपफेक का पता लगाना महत्वपूर्ण है।2. डिजिटल फोरेंसिक (Digital Forensics) और खतरों की सूचनाडिजिटल फोरेंसिक विशेषज्ञ डीपफेक वीडियो की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए नए तरीके विकसित कर रहे हैं। दूसरी ओर, खतरों की सूचना भी डीपफेक-संबंधित साइबर अपराधों की निगरानी और भविष्यवाणी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।3. देश में साइबर सुरक्षा नीति को बढ़ानाडीपफेक के दुर्भावनापूर्ण उपयोग को अपराध घोषित करने के लिए, भारत में सुरक्षा नियमों को संशोधित किया जा रहा है। अधिकारी अपराधियों को जिम्मेदार ठहराने और डीपफेक पीड़ितों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून तैयार कर रहे हैं।4. प्रमाणीकरण प्रणालियों को मजबूत करनापहचान धोखाधड़ी (Identity fraud) को रोकने के लिए, कुछ संगठन बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण (Biometric authentication) और एआई-संचालित सत्यापन प्रणाली लागू कर रहे हैं। एआई-जनित प्रतिरूप हमलों का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिए, भारत में प्रमाणीकरण प्रणाली विकसित होनी चाहिए।•सार्वजनिक जागरूकता और डीपफेक रोकथाम के उपाय1. डिजिटल सुरक्षा पर नागरिकों को शिक्षित करनाजोखिमों को कम करने के लिए, डीपफेक के बारे में सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है। सरकारी और साइबर सुरक्षा संगठन भारत में लोगों को डीपफेक वीडियो पहचानने में मदद करने के लिए, जागरूकता अभियान शुरू कर रहे हैं।2. साइबर सुरक्षा में एआई सुरक्षा और मशीन लर्निंग (Machine Learning) लागू करनाकंपनियां मज़बूत एआई सुरक्षा समाधान विकसित करने के लिए, साइबर सुरक्षा में मशीन लर्निंग का लाभ उठा रही हैं। वास्तविक समय में एआई-जनित समस्याओं की पहचान करने के लिए, स्वचालित पहचान प्रणालियों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।3. मीडिया पर विश्वास और सोशल मीडिया सुरक्षा को मज़बूत करनाभारत में मीडिया विश्वास संकट से निपटने के लिए, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एआई-संचालित मॉडरेशन टूल (Moderation tools.) पेश कर रहे हैं। डीपफेक सामग्री के फैलने से पहले, उसका पता लगाने और उसे हटाने के लिए सोशल मीडिया सुरक्षा उपायों को बढ़ाया जा रहा है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/mpkzzhph2. https://tinyurl.com/39wxh7hk3. https://tinyurl.com/bbxpc46a4. https://tinyurl.com/yxtj4yj5
शहरीकरण - नगर/ऊर्जा
भोपाल गैस त्रासदी में टैंक E610 में उस रात क्या हुआ जिसने लाखों जिंदगियां तबाह कर दीं?
साल 1984 की 2 दिसंबर की आधी रात, जब मध्य प्रदेश के भोपाल शहर के लाखों निवासी गहरी नींद में सो रहे थे, तब एक कीटनाशक कारखाने से लगभग 40 टन ज़हरीली मिथाइल आइसोसाइनेट (methyl isocyanate) गैस का रिसाव हुआ। इस भयंकर रिसाव ने तुरंत कम से कम 3,800 लोगों की जान ले ली और आने वाले समय में हज़ारों अन्य लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इस गैस से 5 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए थे, जिस कारण इसे इतिहास की सबसे भीषण औद्योगिक आपदाओं में गिना जाता है। जौनपुर और पूर्वांचल के पाठकों के लिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर एक कारखाने की लापरवाही ने कैसे लाखों ज़िंदगियां तबाह कर दीं, इसके क्या दूरगामी परिणाम हुए और इस एक घटना ने कैसे पूरे भारत के औद्योगिक सुरक्षा कानूनों को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। यूनियन कार्बाइड के कारखाने में उस रात असल में क्या हुआ था?यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (Union Carbide India Limited) का यह कारखाना 1969 में भोपाल में स्थापित किया गया था, जिसका उद्देश्य कीटनाशक बनाना था। इस कारखाने का 50.9 प्रतिशत हिस्सा अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन (Union Carbide Corporation) के पास था, जबकि 49.1 प्रतिशत हिस्सा भारतीय निवेशकों और बैंकों के पास था। साल 1979 में इस कारखाने में मिथाइल आइसोसाइनेट के उत्पादन के लिए एक नई इकाई जोड़ी गई। 1980 के दशक की शुरुआत में कीटनाशकों की मांग कम होने के कारण कारखाने में बिना इस्तेमाल की गई मिथाइल आइसोसाइनेट गैस जमा होने लगी थी। यह कारखाना शहर के घनी आबादी वाले इलाके और रेलवे स्टेशन के ठीक बगल में स्थित था, जो 1975 की भोपाल विकास योजना का सीधा उल्लंघन था। 1982 में ही कंपनी के ऑडिटरों (auditors) ने एक भयानक रासायनिक प्रतिक्रिया (chemical reaction) की चेतावनी दी थी। अक्टूबर 1984 के अंत तक कारखाने के ई610 (E610) नामक टैंक में 42 टन मिथाइल आइसोसाइनेट भरा हुआ था, लेकिन उसमें दबाव बनाने वाली नाइट्रोजन (nitrogen) गैस का रिसाव हो गया था जिससे तरल गैस को बाहर नहीं निकाला जा सकता था। 2 दिसंबर की रात को पाइपों की सफ़ाई के दौरान पानी गलती से इस ई610 टैंक में चला गया। पानी और गैस के मिलने से टैंक का तापमान और दबाव भयानक रूप से बढ़ गया। इस रिसाव को रोकने के लिए लगाए गए सुरक्षा उपकरण जैसे प्रशीतन इकाई (Refrigeration Unit), फ्लेयर टावर (Flair Tower) और वेंट गैस स्क्रबर (Vent Gas Scrubber) या तो बंद पड़े थे या ख़राब थे। नतीजतन रात के समय महज़ 45 से 60 मिनट के भीतर लगभग 30 टन ज़हरीली गैस हवा में फैल गई और पूरे शहर को अपनी चपेट में ले लिया। इस ज़हरीली गैस का लोगों और पर्यावरण पर कितना भयानक असर पड़ा?गैस के संपर्क में आते ही लोगों को खांसी, दम घुटना, आँखों में तेज़ जलन और उल्टी जैसी भयंकर परेशानियां होने लगीं। जान बचाने के लिए लोग बदहवास होकर भागने लगे। मिथाइल आइसोसाइनेट गैस हवा से दोगुनी भारी होती है, इसलिए यह ज़मीन के क़रीब ही रही, जिसकी वजह से कम ऊँचाई वाले बच्चों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ा। अगली सुबह तक हज़ारों लोग दम घुटने और फेफड़ों में पानी भर जाने से मर चुके थे। मध्य प्रदेश सरकार ने गैस रिसाव से 3,787 लोगों की मौत की पुष्टि की थी, जबकि एक अन्य अनुमान के मुताबिक पहले दो हफ़्तों में 8,000 लोग मारे गए और बाद में गैस जनित बीमारियों से 8,000 और लोगों की मौत हुई। सरकार के एक हलफनामे के अनुसार इस रिसाव से 5,58,125 लोग घायल हुए, जिनमें से 3,900 लोग हमेशा के लिए गंभीर रूप से विकलांग हो गए। जो लोग बच गए वे आज भी अंधापन, फेफड़ों की गंभीर बीमारियों, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी और मनोवैज्ञानिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। गर्भवती महिलाओं के गर्भपात की दर कई गुना बढ़ गई और पैदा होने वाले बच्चों में भी गंभीर जन्मजात बीमारियां देखी गईं। पर्यावरण की बात करें तो घटना के कुछ ही दिनों में आस-पास के पेड़ सूख गए और हज़ारों मृत जानवरों को दफ़नाना पड़ा। कारखाने के अंदर आज भी ख़तरनाक रसायनों का कचरा पड़ा हुआ है, जिससे वहाँ की मिट्टी और भूजल बुरी तरह प्रदूषित हो चुके हैं।1 जनवरी 2025 को भारी सुरक्षा के बीच 377 टन ज़हरीले कचरे को भोपाल से पीथमपुर ले जाकर जलाया गया है। त्रासदी के बाद कंपनी का रवैया और कानूनी लड़ाई कैसी रही?हादसे के तुरंत बाद यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन ने अपनी ज़िम्मेदारी से भागने की पूरी कोशिश की। कंपनी ने सारा दोष अपनी भारतीय इकाई पर मढ़ दिया और यह झूठी कहानी भी रची कि यह हादसा किसी असंतुष्ट कर्मचारी या सिख चरमपंथियों की साज़िश का नतीजा था। गैस रिसाव के तुरंत बाद कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी वारेन एंडरसन (Warren Anderson) भोपाल आए, जिन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। लेकिन उन्हें ज़मानत दे दी गई और वे सरकारी विमान से देश छोड़कर अमेरिका भाग गए। भारत सरकार ने उनके प्रत्यर्पण की बहुत कोशिश की, लेकिन अमेरिका ने सबूतों की कमी का हवाला देकर उन्हें भारत को सौपने से इनकार कर दिया। सालों तक चले मुकदमों के बाद 1989 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की मध्यस्थता में यूनियन कार्बाइड ने 470 मिलियन डॉलर का मुआवज़ा देने पर सहमति जताई। यह रक़म बहुत कम थी क्योंकि इसमें लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों और प्रभावित लोगों की असली संख्या को कम आँका गया था। इस समझौते के बाद कंपनी ने अपनी भारतीय इकाई को बेच दिया। सालों बाद 2010 में सात भारतीय अधिकारियों को लापरवाही से मौत के मामले में दोषी ठहराया गया और उन्हें दो साल की जेल व ज़ुर्माने की सज़ा सुनाई गई, लेकिन उन्हें तुरंत ज़मानत भी मिल गई। मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन कभी भारतीय अदालत में पेश नहीं हुए और 2014 में अमेरिका में उनकी मौत हो गई। इस भीषण हादसे ने भारत के औद्योगिक सुरक्षा कानूनों को कैसे बदल दिया?भोपाल गैस त्रासदी से पहले भारत में औद्योगिक सुरक्षा का माहौल बहुत लचर था। तब केवल 1948 का फैक्ट्री अधिनियम लागू था, जिसमें ख़तरनाक रसायनों से निपटने के लिए कोई कड़े नियम नहीं थे। लेकिन इस महाविनाश ने भारत सरकार को नींद से जगा दिया। सबसे बड़ा बदलाव 1986 में आया जब पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू किया गया, जिसने सरकार को पर्यावरण सुरक्षा और ख़तरनाक उद्योगों पर नियंत्रण रखने के लिए भारी अधिकार दिए। इसके बाद 1987 में फैक्ट्री अधिनियम में संशोधन करके ख़तरनाक रसायनों के उपयोग, सुरक्षा ऑडिट (Security Audit) और आपातकालीन योजनाओं को अनिवार्य बना दिया गया। साल 1991 में सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम लाया गया, जिसके तहत ख़तरनाक सामग्री संभालने वाली कंपनियों के लिए बीमा कराना अनिवार्य कर दिया गया ताकि दुर्घटना होने पर पीड़ितों को तुरंत मुआवज़ा मिल सके। साल 1989 में ख़तरनाक कचरे के प्रबंधन और निपटान के लिए भी सख़्त नियम बनाए गए। इन कानूनों को लागू कराने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (State Pollution Control Boards) को बहुत ताक़तवर बनाया गया, जो अब कारखानों का निरीक्षण कर सकते हैं और नियम तोड़ने वालों पर जुर्माना लगा सकते हैं। उद्योगों में भी सुरक्षा को लेकर सोच बदली है। अब ज़्यादातर ख़तरनाक प्रक्रियाओं को स्वचालित कर दिया गया है ताकि इंसानों को कम ख़तरा हो। तापमान और रसायनों के दबाव को मापने के लिए अब कारखानों में रियल टाइम निगरानी प्रणाली लगाई जाती है। यद्यपि आज भारत आर्थिक रूप से बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन भोपाल की इस घटना ने पूरी दुनिया और भारत को यह सिखा दिया है कि बिना सुरक्षा नियमों के किया गया औद्योगिक विकास अंततः महाविनाश ही लाता है। संदर्भ https://tinyurl.com/28k6z64lhttps://tinyurl.com/28k6z64lhttps://tinyurl.com/c2lqplfhttps://tinyurl.com/26hr3g4a
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
आशा भोसले ने 'यूव स्टोलन माई हार्ट' के जरिए आर डी बर्मन को श्रद्धांजलि दी
आशा भोसले (Asha Bhosle) भारतीय सिनेमा की सबसे बहुमुखी और प्रतिष्ठित गायिकाओं में से एक हैं, जिनकी आवाज़ ने दशकों तक संगीत प्रेमियों को बांधे रखा है। उन्होंने केवल फिल्मी गीतों में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी अपनी खास पहचान बनाई।वर्ष 2005 में उन्होंने सैन फ्रांसिस्को (San Francisco) के प्रसिद्ध क्रोनोस क्वार्टेट (Kronos Quartet) के साथ “यूव स्टोलन माई हार्ट” (you've stole my heart) एल्बम में सहयोग किया। यह एल्बम उनके पति और महान संगीतकार राहुल देव बर्मन (Rahul Dev Burman) के संगीत को नए अंदाज़ में प्रस्तुत करता है। इसमें पश्चिमी शास्त्रीय तार वाद्यों और भारतीय ताल वाद्यों का सुंदर मेल सुनाई देता है, जो इसे एक अनोखा संगीत अनुभव बनाता है।इस एल्बम की खास बात यह है कि इसमें आशा भोसले ने उन गीतों को फिर से अपनी आवाज़ दी, जिन्हें उन्होंने पहले भी गाया था, लेकिन इस बार उन्हें एक नए रूप और गहराई के साथ प्रस्तुत किया गया। एल्बम में तबला वादक ज़ाकिर हुसैन जैसे कलाकारों का भी योगदान रहा, जिसने इसके संगीत को और समृद्ध बनाया।“यूव स्टोलन माई हार्ट” को 2006 में ग्रैमी पुरस्कार (Grammy Award) के लिए नामांकित किया गया, जो इसकी वैश्विक सराहना का प्रमाण है। यह एल्बम दर्शाता है कि आशा भोसले की आवाज़ समय और सीमाओं से परे जाकर हर पीढ़ी और हर संस्कृति को जोड़ने की क्षमता रखती है।संदर्भ:https://tinyurl.com/y5sxkw2a https://tinyurl.com/pyb8j9fhttps://tinyurl.com/4tcn6zna
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
27-06-2026 09:26 AM • Jaunpur District-Hindi
आपकी तस्वीरों से करोड़ों कमा रही हैं कंपनियाँ: क्या है प्राइवेसी का यह खेल?
जौनपुर के इंटरनेट और सोशल मीडिया यूज़र्स के लिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि मेटा ने इस बात की पुष्टि की है कि साल 2007 से लेकर अब तक वयस्कों द्वारा फेसबुक और इंस्टाग्राम पर पब्लिक किए गए सभी टेक्स्ट और फोटो को स्क्रैप किया गया है और कंपनी के आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल किया गया है। एक तरफ़ सोशल मीडिया लोगों को जोड़ने का काम कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ यह आपके व्यक्तिगत डेटा और कॉपीराइट सामग्री का उपयोग भी अप्रत्याशित तरीकों से कर रहा है। इंटरनेट की दुनिया में एक रिपोर्ट के मुताबिक़ लगभग 49 प्रतिशत ब्लॉगर्स और सोशल मीडिया यूज़र्स अनजाने में या जानबूझकर कॉपीराइट का उल्लंघन कर चुके हैं।
क्या सोशल मीडिया पर पब्लिश किया गया कंटेंट कॉपीराइट के दायरे में आता है? लोगों के बीच यह एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है कि सोशल मीडिया साइट्स पर अपना काम या तस्वीरें अपलोड करने का मतलब है कि आप अपना कॉपीराइट खो देते हैं और यदि कोई आपकी अनुमति के बिना आपके काम का उपयोग करता है तो आप कुछ नहीं कर सकते। हक़ीक़त में ऐसा नहीं है। लगभग हर सोशल मीडिया साइट के नियम और शर्तों के अनुसार, जो व्यक्ति कंटेंट बनाता और अपलोड करता है, वह ही अपने काम का असली कॉपीराइट मालिक बना रहता है। जब कोई विज़ुअल वर्क (जैसे फोटो या वीडियो) बनाया जाता है, तो कॉपीराइट स्वचालित रूप से निर्माता को मिल जाता है। आधिकारिक तौर पर कॉपीराइट प्राप्त करने के लिए किसी तस्वीर को रजिस्टर करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है।
भारत में कॉपीराइट अधिनियम 1957 के तहत, किसी भी काम पर कॉपीराइट के मालिक को विशेष अधिकार प्राप्त होते हैं, जैसे कि उस काम का उपयोग करना, उसे वितरित करना, या प्रकाशित करना। इसलिए, किसी भी फोटो या वीडियो का कॉपीराइट मालिक ही उसे किसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अपलोड करने का अधिकार रखता है। यदि कोई और व्यक्ति आपकी अनुमति के बिना आपकी रचना का उपयोग करता है, तो यह कॉपीराइट उल्लंघन माना जाता है। बहुत से लोग यह मानते हैं कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर मौजूद हर चीज़ मुफ़्त है, लेकिन यह सच नहीं है। जब कोई अपना मूल कंटेंट सोशल मीडिया पर पोस्ट करता है, तो वह महज़ एक पब्लिकेशन होता है, ना कि मुफ़्त इस्तेमाल के लिए दिया गया लाइसेंस। "फेयर यूज़" का नियम कुछ विशेष परिस्थितियों (जैसे समीक्षा, समाचार रिपोर्टिंग, या शोध) में अनुमति के बिना काम का उपयोग करने की छूट देता है, लेकिन यह हर परिस्थिति पर लागू नहीं होता।
प्लेटफ़ॉर्म के नियमों और प्राइवेसी सेटिंग्स के तहत आपकी ओनरशिप का क्या होता है? जब आप इंस्टाग्राम या फेसबुक पर कोई फोटो, वीडियो, या कैप्शन पोस्ट करते हैं, तो आप कॉपीराइट के मालिक होते हैं, लेकिन यहाँ एक पेंच है। आप अपनी ओनरशिप तो बरकरार रखते हैं, लेकिन आप इंस्टाग्राम को बहुत बड़े स्तर पर उपयोग के अधिकार भी देते हैं। इसका मतलब है कि आप उन्हें अपने कंटेंट को एक ख़ास तरीके से इस्तेमाल करने की अनुमति देते हैं जिसके लिए वे आपको कोई भुगतान नहीं करते। प्लेटफ़ॉर्म के नियमों के तहत आप उन्हें एक नॉन-एक्सक्लूसिव, रॉयल्टी-फ्री और वर्ल्डवाइड लाइसेंस देते हैं। इसका मतलब यह है कि आप अपनी सामग्री को अन्य जगहों पर भी इस्तेमाल कर सकते हैं, इंस्टाग्राम आपको इस इस्तेमाल के लिए पैसे नहीं देगा, और यह अधिकार दुनिया भर में लागू होगा।
इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफ़ॉर्म अपनी सर्विस चलाने के लिए आपके कंटेंट का उपयोग कर सकते हैं, उसे वितरित कर सकते हैं, बदल सकते हैं, प्रदर्शित कर सकते हैं और यहां तक कि उससे जुड़े अन्य काम भी बना सकते हैं। जब आप अपना कंटेंट या अकाउंट डिलीट करते हैं तो यह लाइसेंस आम तौर पर समाप्त हो जाता है। लेकिन, यदि किसी अन्य यूज़र ने आपके कंटेंट को शेयर या एम्बेड किया है, और उन्होंने उसे डिलीट नहीं किया है, तो प्लेटफ़ॉर्म का वह लाइसेंस जारी रह सकता है। फेसबुक के नियम यह कहते हैं कि यदि ओरिजिनल यूज़र अपना कंटेंट हटा भी दे, तो भी लाइसेंस तब तक बना रहेगा जब तक कि उस कंटेंट को शेयर करने वाले बाकी सभी लोग उसे डिलीट न कर दें। इस तरह वायरल फोटो या वीडियो के लिए यह लाइसेंस अनिश्चित काल तक चल सकता है। एक्स (पूर्व में ट्विटर) के मामले में तो यह और भी आगे जाता है, जहाँ अकाउंट बंद करने के बाद भी अपलोड किए गए कंटेंट पर उपयोग का लाइसेंस हमेशा के लिए बना रहता है।
एआई सिस्टम को कैसे ट्रेन किया जाता है और इसके कॉपीराइट से जुड़े ख़तरे क्या हैं? आजकल जनरेटिव एआई मॉडल, जैसे कि लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) और इमेज जनरेटर, मशीन लर्निंग तकनीकों के माध्यम से विकसित किए जा रहे हैं। इन मॉडल्स की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने के लिए इन्हें बहुत बड़े डेटासेट्स पर ट्रेन किया जाता है। इनमें से कई डेटासेट्स में कॉपीराइट वाला काम शामिल हो सकता है। ट्रेनिंग की प्रक्रिया में कई चरण होते हैं, जिसमें जनरल पैटर्न सीखने के लिए प्री-ट्रेनिंग, और विशिष्ट कार्यों के लिए पोस्ट-ट्रेनिंग या फाइन-ट्यूनिंग शामिल होती है। डेवलपर्स भारी मात्रा में डेटा को स्क्रैप करते हैं, फ़िल्टर करते हैं और इकट्ठा करते हैं, जिस पर एआई मॉडल भविष्यवाणी करना सीखते हैं।
ट्रेनिंग डेटासेट्स के लिए कॉपीराइट किए गए कार्यों को डाउनलोड करने, कॉपी करने और मॉडिफाई करने से कॉपीराइट के नियमों पर असर पड़ता है। इसके अलावा, एआई सिस्टम ऐसा कंटेंट आउटपुट कर सकते हैं जो कॉपीराइट किए गए काम की बिल्कुल नकल करता हो या उससे बहुत मिलता-जुलता हो। रिट्रीवल-ऑगमेंटेड जनरेशन (रैग) का उपयोग करके जनरेशन के समय बाहरी कंटेंट को शामिल करना भी उल्लंघन के सवाल खड़े कर सकता है। अमेरिकी कॉपीराइट कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, एआई द्वारा उपयोग में "फेयर यूज़" (उचित उपयोग) एक बचाव हो सकता है, लेकिन यह हर स्थिति में लागू नहीं होता है। यदि एआई का आउटपुट ओरिजिनल काम से प्रतिस्पर्धा करता है या बाज़ार में उसकी जगह लेने लगता है, तो वह फेयर यूज़ के अंतर्गत नहीं आएगा।
क्या आप अपना डेटा एआई ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल होने से रोक सकते हैं? सोशल मीडिया कंपनियाँ अक्सर हमारी अनुमति के बिना एआई मॉडल को ट्रेन करने के लिए हमारे डेटा का उपयोग कर रही हैं। यूरोपीय संघ में जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (जीडीपीआर) लागू है, जिसकी वजह से मेटा को यूरोपीय उपभोक्ताओं को एक नोटिस भेजना पड़ा और उन्हें डेटा कलेक्शन से बाहर निकलने (ऑप्ट-आउट) का विकल्प देना पड़ा। लेकिन अमेरिका या कई अन्य देशों में इस तरह का कोई कड़ा राष्ट्रीय कानून नहीं है जो सोशल मीडिया कंपनियों को एआई मॉडल ट्रेनिंग के लिए यूज़र्स का डेटा इस्तेमाल करने से रोक सके। हालाँकि, आप अपनी प्राइवेसी सेटिंग्स बदलकर अपने डेटा को भविष्य में इस्तेमाल होने से कुछ हद तक बचा सकते हैं।
इंस्टाग्राम पर अपना डेटा एआई ट्रेनिंग से बचाने का एकमात्र वास्तविक तरीका यह है कि आप अपने अकाउंट को प्राइवेट कर लें। मेटा ने कहा है कि वह प्राइवेट अकाउंट्स से डेटा या जानकारी का उपयोग नहीं करेगा। इसके लिए अपनी प्रोफ़ाइल पर जाएँ, सेटिंग आइकॉन पर क्लिक करें, और 'अकाउंट प्राइवेसी' में जाकर 'प्राइवेट अकाउंट' के स्विच को ऑन कर दें। इसी तरह फेसबुक पर भी आपको अपनी पोस्ट्स की विज़िबिलिटी को 'पब्लिक' से हटाकर 'फ्रेंड्स' पर सेट करना होगा। 'सेटिंग्स एंड प्राइवेसी' में जाकर 'ऑडियंस एंड विज़िबिलिटी' के तहत 'पोस्ट्स' चुनें, और "आपकी भविष्य की पोस्ट कौन देख सकता है?" को 'फ्रेंड्स' कर दें।
एक्स (ट्विटर) ने भी नए नियम लागू किए हैं जिसमें यूज़र्स का डेटा 'ग्रोक' (Grok) जैसे एआई को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इसे रोकने के लिए आप सेटिंग्स में जाकर 'प्राइवेसी एंड सेफ्टी' पर क्लिक करें, फिर 'Grok & Third-party Collaborators' को चुनें और बॉक्स को अनचेक कर दें। लिंक्डइन पर भी 'सेटिंग्स एंड प्राइवेसी' में जाकर 'डेटा प्राइवेसी' चुनें, और 'Data for Generative AI Improvement' के स्विच को ऑफ़ कर दें। चैटजीपीटी में भी मुफ़्त अकाउंट वाले यूज़र्स की चैट का डेटा इस्तेमाल होता है। इसे बंद करने के लिए चैटजीपीटी की सेटिंग्स में 'डेटा कंट्रोल्स' पर जाएँ और 'Improve the model for everyone' स्विच को बंद कर दें। याद रखें कि ये सेटिंग्स केवल भविष्य के डेटा को बचाएंगी, आपके पिछले इस्तेमाल हो चुके डेटा को नहीं।
जाबुलानी: फीफा विश्व कप 2010 की वह गेंद जिसने गोलकीपरों को चौंका दिया
वर्ष 2010 के फीफा विश्व कप की बात हो और जाबुलानी (Jabulani) गेंद का ज़िक्र न हो, ऐसा संभव नहीं है। एडिडास (Adidas) द्वारा निर्मित यह गेंद दक्षिण अफ्रीका में आयोजित 2010 विश्व कप की आधिकारिक मैच बॉल थी। ज़ुलू भाषा में "जाबुलानी" का अर्थ है "खुश रहो", और इसका नाम विश्व कप के उत्साह और जश्न की भावना को दर्शाने के लिए चुना गया था।
जाबुलानी अपने अनोखे डिज़ाइन के कारण चर्चा का विषय बन गई थी। इसमें केवल आठ त्रि-आयामी पैनल लगाए गए थे, जबकि 2006 विश्व कप की गेंद में 14 पैनल थे। इसकी सतह पर विशेष खांचे बनाए गए थे, जिन्हें एडिडास ने "ग्रिप एन ग्रूव" तकनीक का नाम दिया। इसका उद्देश्य गेंद की वायुगतिकी को बेहतर बनाना था। इस गेंद के विकास में ब्रिटेन के लॉफबरो विश्वविद्यालय (Loughborough University) के शोधकर्ताओं का भी योगदान था।
हालाँकि, मैदान पर खिलाड़ियों और विशेष रूप से गोलकीपरों का अनुभव कुछ अलग रहा। कई गोलकीपरों ने शिकायत की कि गेंद की उड़ान का अनुमान लगाना बेहद कठिन था। तेज़ गति से चलते समय जाबुलानी अचानक दिशा बदल लेती थी, जिससे उसके रास्ते का अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता था। वैज्ञानिकों ने भी पाया कि इसमें "नकलबॉल प्रभाव" दिखाई देता था, जिसमें गेंद हवा में अप्रत्याशित रूप से हिलती-डुलती हुई आगे बढ़ती है।
यही कारण था कि कुछ खिलाड़ियों ने इसे विश्व कप इतिहास की सबसे चुनौतीपूर्ण गेंदों में से एक बताया। फिर भी जाबुलानी फुटबॉल इतिहास का एक यादगार हिस्सा बन गई और आज भी 2010 विश्व कप की सबसे चर्चित पहचान में गिनी जाती है।
कुश्ती में भारत की बढ़ती उपलब्धियों को देखकर, उत्तर प्रदेश में क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
हम, आज कुश्ती के इतिहास को समझेंगे, और पढ़ेंगे कि यह कुछ पुराने लड़ाकू खेलों में से एक के रूप में कैसे विकसित हुआ। फिर, हम यह पता लगाएंगे कि, भारत में कुश्ती कैसे विकसित हुई, और इसका पारंपरिक अखाड़ों से क्या संबंध है। लेख में आगे, हम देखेंगे कि महाभारत जैसे भारतीय महाकाव्यों में कुश्ती किस प्रकार वर्णित की गई है। इसके पश्चात, हम आधुनिक कुश्ती के नियमों और तकनीकों को देखेंगे। जबकि अंत में, हम कुश्ती में भारत की उपलब्धियों और हमारे राज्य उत्तर प्रदेश में इस खेल को बढ़ावा देने हेतु उठाए जा रहे कदमों की जांच करेंगे।
कुश्ती की उत्पत्ति, संभवतः हाथों या आमने–सामने की लड़ाई से हुई थी। यह विशेषतः लड़ाई के एक ऐसे खेल के रूप में उभरी, जिसमें प्रतिद्वंद्वी की मृत्यु के बजाय उसे हार स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाता है। 3000 ईसा पूर्व की कुछ कलाकृतियां बेबीलोनिया (Babylonia) और मिस्र (Egypt) में प्रचलित ‘बेल्ट कुश्ती’ को दर्शाती हैं। सुमेरियन गिलगमेश (Sumerian Gilgamesh) महाकाव्य में भी ऐसी कुश्ती का वर्णन है। भारत में 1500 ईसा पूर्व से ही कुश्ती चली आ रही है। 700 ईसा पूर्व के चीनी दस्तावेज़ ‘लूज कुश्ती’ (loose wrestling) का वर्णन करते हैं, जबकि, पहली शताब्दी ईसा पूर्व के जापानी रिकॉर्ड भी ऐसा वर्णन करते हैं। बीसवीं शताब्दी में उत्तरी एवं पूर्वी यूरोप (Europe) तथा जापान में स्थानीय स्तर पर प्रचलित बेल्ट कुश्ती, 2500 ईसा पूर्व में मिस्रवासियों की कुश्ती से मेल खाती थी।
कुश्ती, संभवतः प्राचीन यूनानियों (Greeks) का सबसे लोकप्रिय खेल था। यूनानी युवा पुरुष, अपने सामाजिक जीवन के केंद्र बिंदु के रूप में पैलेस्ट्रास (Palaestras) या कुश्ती प्रशिक्षण केंद्रों से संबंधित थे। प्राचीन यूनानी फूलदानों और सिक्कों पर भी लूज कुश्ती के चित्र आम हैं। बाद में, 776 ईसा पूर्व से कुश्ती ओलंपिक खेलों का हिस्सा थी। दूसरी तरफ, कुश्ती यूनानियों की तुलना में रोमनों (Romans) के बीच कम लोकप्रिय थी। रोमन साम्राज्य के पतन के साथ, लगभग 800 ईस्वी तक यूरोप में कुश्ती के संदर्भ गायब हो गए।
जब फारस (Persia) के इस्लामी शासकों ने लगभग 800 ईसा पूर्व में तुर्क (Turk) सैनिकों को नियुक्त करना शुरू किया, तो वे सैनिक अपने साथ लूज कुश्ती की एक शैली लेकर आए। इसे कोरेश (Koresh) कहा जाता था। धीरे-धीरे तुर्कों ने पूरे मुस्लिम प्रभुत्व पर कब्ज़ा कर लिया, और वहां उनकी कुश्ती शैली फैल गई। बाद में, तेरहवीं शताब्दी में मंगोलियाई आक्रमणों (Mongolian invasions) से मंगोलियाई कुश्ती की शुरुआत हुई, जिसे शाही संरक्षण प्राप्त हुआ। इस प्रकार, कुश्ती आधुनिक ईरान (Iran) का राष्ट्रीय खेल बन गया।
जापानी बेल्ट-कुश्ती शैली - सूमो (Sumo), शाही संरक्षण (710-1185) के तहत एक लोकप्रिय दर्शक खेल था। सत्रहवीं शताब्दी तक सूमो कुश्ती, जापान में एक पेशेवर खेल बन गया था। जूडो (Judo) एक अन्य प्रमुख जापानी कुश्ती शैली है, जो बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में एक अंतरराष्ट्रीय खेल बन गई।
मध्य युग में, पूरे यूरोप में कई शैलियों में कुश्ती होती थी। पहला दर्ज इंग्लिश मैच, तेरहवीं सदी की शुरुआत में लंदन (London) में आयोजित किया गया था। इंग्लैंड (England) और ब्रिटनी (Brittany) में ‘जैकेट कुश्ती’ का एक रूप, जिसे ‘कॉर्नवाल व डेवोन (Cornwall and Devon)’ कहा जाता है, चौथी या पांचवीं शताब्दी से प्रख्यात है। रोमन साम्राज्य के शूरवीरों को, एक मार्शल कौशल के रूप में कुश्ती सिखाई जाती थी। मुद्रण की शुरुआत से पहले पांडुलिपियों में और उसके बाद प्रिंट में भी, कुश्ती नियम पुस्तकें दिखाई देती थीं। जबकि, भारत में 1526 की मुगल विजय के बाद, यहां शुरू की गई मंगोलियाई लूज कुश्ती, भारत और पाकिस्तान में ज्ञात है।
पहलवानी या कुश्ती, आज इस खेल का भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचलित एक पारंपरिक रूप है। इस खेल ने मुगल साम्राज्य के दौरान आकार लिया, जो फारसी कोष्टी पहलवानी और मल्ल-युद्ध की प्राचीन भारतीय परंपरा के मिश्रण से विकसित हुआ है। सदियों से, पहलवानी एक अनुशासन के रूप में विकसित हुई है। यह न केवल शारीरिक शक्ति और सहनशक्ति की परीक्षा है, बल्कि अनुष्ठान, अनुशासन और सांस्कृतिक विरासत में निहित जीवन का एक तरीका भी है।
अखाड़े, न केवल कुश्ती प्रशिक्षण मैदान के रूप में, बल्कि कई युवा पहलवानों के लिए आश्रय के रूप में भी काम करते हैं। लड़के नौ या दस साल की उम्र से ही प्रशिक्षण शुरू कर देते हैं, ताकि भविष्य में वे पेशेवर पहलवान बन सकें। जब छात्र अखाड़े में रहते हैं, तो वे अधिक अनुशासित हो जाते हैं। परंतु आज भारत ने, अखाड़ों की मिट्टी कुश्ती को अंतरराष्ट्रीय मैट कुश्ती में परिवर्तित होतेे देखा है।
हाल के वर्षों में, महिलाएं भी इस खेल के केंद्र में रही हैं। साक्षी मलिक, फोगाट बहनें तथा अंतिम पंघाल जैसी महिला कुश्ती खिलाड़ियों का नाम हमने सुना ही हैं।
लेकिन, क्या आप जानते हैं कि, भारत में कुश्ती का एक उल्लेख, महाकाव्य महाभारत में, श्री कृष्ण के समय में भी मिलता है। एक बार, भीम, अर्जुन और कृष्ण, ब्राह्मणों के वेश में मगध की राजधानी - राजगृह गए थे। वहां जरासंध राजा ने उनका स्वागत किया, जो कृष्ण के दुश्मन थे। भीम, अर्जुन और कृष्ण ने अपनी असली पहचान बताए बिना, जरासंध को बताया कि भीम उसके साथ कुश्ती करना चाहते थे। दरअसल, भीम जरासंध को मारना चाहते थे। फिर भी, जरासंध ने अपने मेहमानों की तरह उनका शानदार आतिथ्य किया। कुछ दिनों बाद, कुश्ती का मुकाबला शुरू हुआ।
जरासंध के मुकाबले, भीम छोटा और कम ताकतवर था, और जरासंध की जान लेने में सक्षम नहीं था। छब्बीस दिनों तक, वे प्रतिदिन तीन घंटे तक युद्ध या कुश्ती करते रहे। तब कृष्ण ने, उस युद्ध को समाप्त करने का सोचा, क्योंकि, उन्हें एहसास हुआ कि वे कुश्ती में जरासंध को नहीं मार सकते। इसलिए उन्होंने गदाओं से युद्ध करने का सुझाव दिया। लेकिन भीम के असंख्य प्रहारों से भी जरासंध नहीं मरा।
अमावस्या की रात, जरासंध को अलौकिक शक्तियां प्राप्त होती थी। जब अमावस्या आती है, तो वह अपराजेय होता है। जरासंध भी, भीम को अमावस्या पर मारने का सोच रहा था। इसलिए, कृष्ण ने भीम से उसे अमावस्या के पहले दिन मारने को कहा। उस निर्णायक कुश्ती में, भीम ने जरासंध के पैर को तोड़ा, और उसे विपरीत दिशा में फेंक दिया। अतः जरासंध की मृत्यु हो गई।
आधुनिक कुश्ती, दरअसल इन सभी शैलियों से थोड़ी अलग है। एक सामान्य फ्रीस्टाइल कुश्ती मुकाबले को, तीन-तीन मिनट की दो अवधियों में विभाजित किया जाता है और बीच में 30 सेकंड का विराम होता है। आधिकारिक अंडर-15, कैडेटों और अनुभवी प्रतियोगिताओं के लिए, इस अवधि को दो-दो मिनट तक कम कर दिया गया है। दो प्रतिस्पर्धी पहलवान, नौ मीटर व्यास वाली एक चटाई पर एक-दूसरे का सामना करते हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी के कंधों को थोड़े समय के लिए चटाई पर टिकाना होता है, जिससे प्रतिस्पर्धी पहलवान को गिराकर तत्काल जीत मिलती है।
चूंकि ऐसी जीत दुर्लभ होती है, इस खेल को अन्य तरीकों से भी जीता जा सकता है। कोई पहलवान, नियम होल्ड (Legal hold), थ्रो (Throw), या टेकडाउन (Takedown) की मदद से प्रतिद्वंद्वी को कुछ सेकंड के लिए, उसे मैट पर पीठ के बल गिराने या रिवर्सल (Reversal) तकनीक अपनाकर, अंक हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं। जबकि, उलटफेर में, रक्षात्मक स्थिति से प्रतिद्वंद्वी की लाभ स्थिति को नकारना और उस स्थिति पर नियंत्रण हासिल करना शामिल है।
कुश्ती की चालें, उनकी कठिनाई के अनुसार अंक प्रदान करती हैं। साथ ही, यदि प्रतिद्वंद्वी किसी नियम का उल्लंघन करता है, तो खिलाड़ी ज्यादा अंक प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि, एक मुकाबले के दौरान, तीन चेतावनियां पाने पर दोषी पहलवान को अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।
छह मिनट की अवधि के अंत में, कुल अंकों का मिलान किया जाता है, और अधिक अंक वाला पहलवान जीत जाता है। बराबरी की स्थिति में, जिस पहलवान ने एक ही चाल में सबसे अधिक अंक बनाए हैं, उसे विजेता घोषित किया जाता है।
आठ ओलंपिक पदक जीतने के बाद, ग्रीष्मकालीन खेलों में, हॉकी के बाद कुश्ती भारत का दूसरा सबसे सफल खेल है। के. डी. जाधव ने भारत को पहला ओलंपिक पदक, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 57 किलो श्रेणी में, हेलसिंकी 1952 (Helsinki 1952) में कांस्य पदक जीतकर दिया था। बीजिंग 2008 (Beijing 2008) में, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 66 किलो श्रेणी में सुशील कुमार ने भी कांस्य पदक जीता था। सुशील कुमार ने ही, समान श्रेणी में लंदन 2012 (London 2012) में रजत पदक पाया। उसी ओलंपिक में, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 60 किलो श्रेणी में योगेश्वर दत्त ने कांस्य पदक जीता।
दूसरी ओर, साक्षी मलिक ने रियो 2016 (Rio 2016) में महिलाओं की फ़्रीस्टाइल 58 किलो श्रेणी में कांस्य पदक जीता था। टोक्यो 2020 (Tokyo 2020) के दौरान, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 57 किलो श्रेणी में, रवि कुमार दहिया रजत पदक पाकर जीतते है। उसी ओलंपिक में, बजरंग पुनिया पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 65 किलो श्रेणी में कांस्य पदक जीतते है। जबकि, पुरुषों की फ़्रीस्टाइल 57 किलो श्रेणी में अमन सहरावत ने, हाल ही में पेरिस 2024 (Paris 2024) में कांस्य पदक जीता है।
इन्हीं उपलब्धियों के कारण, भारतीय कुश्ती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने हेतु, हमारी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2032 ओलंपिक तक पहलवानों के बुनियादी ढांचे और समर्थन में 170 करोड़ रुपये का निवेश करने की उम्मीद है। भारतीय कुश्ती महासंघ ने हमारी सरकार से यह समर्थन मांगा था। यह प्रायोजन केवल देश के विशिष्ट पहलवानों को ही नहीं, बल्कि कैडेट स्तर के पहलवानों को भी मिलेगा। इससे, राष्ट्रीय चैंपियनों को भी पुरस्कार राशि मिल पाएगी। साथ ही, कैडेट पहलवानों को प्रशिक्षण और प्रदर्शन के लिए विदेश भेजा जा सकता है।
किस प्रकार ज्ञान की धारा ने किया है हम जौनपुर वासियों को सदैव सशक्त
जौनपुर, आज हम समझेंगे कि मानव प्रगति के लिए, ज्ञान को हमेशा से ही शक्तिशाली और आवश्यक क्यों माना गया है। फिर हम प्राचीन भारतीय ज्ञान की परंपरा और शिक्षा प्रणालियों एवं दर्शन का पता लगाएंगे। बाद में, हम शिक्षा के केंद्र के रूप में जौनपुर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखेंगे। तब हम संस्कृति के विचार को समझेंगे, और जानेंगे कि यह किसी समाज के सांस्कृतिक और बौद्धिक जीवन को कैसे प्रतिबिंबित करती है। और लेख के अंत में, हम देखेंगे कि विभिन्न संस्कृतियां स्थानीय परंपराओं की कहानियों और रूपकों के माध्यम से अपनी संस्कृति को कैसे व्यक्त करती हैं।
ज्ञान एक ऐसी शक्ति है, जिसमें हमारे जीवन को बदलने, प्रगति बढ़ाने और भविष्य को आकार देने की शक्ति है। यह व्यक्तियों को सशक्त बनाता है, व्यक्तिगत विकास को सक्षम बनाता है, और सामूहिक उन्नति को बढ़ावा देता है। हालांकि, ऐसी महान शक्ति के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है। समाज और दुनिया पर इसके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, ज्ञान का नैतिक उपयोग करना आवश्यक है। ज्ञान को अपनाकर, जिज्ञासा को बढ़ावा देकर, आलोचनात्मक सोच और नैतिक व्यवहार की संस्कृति को अपनाकर, तथा आजीवन सीखने को बढ़ावा देकर, हम इसकी पूर्ण क्षमता का उपयोग कर सकते हैं। ज्ञान के अधिग्रहण के माध्यम से, व्यक्तियों को अपने विचार एवं बुद्धि को व्यापक बनाने, सूचित निर्णय लेने और अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने का अधिकार मिलता है। सामूहिक रूप से, ज्ञान नवाचार को बढ़ावा देता है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति होती है और जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार होता है। इसलिए, हमें इसका सकारात्मक परिवर्तन के लिए एक शक्ति के रूप में उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि, इसकी शक्ति मानवता को लाभान्वित करती है और सतत विकास को बढ़ावा देती है।
भारतीय दर्शन, विचार और चिंतन वे प्रणालियां हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप की सभ्यताओं द्वारा विकसित हुई हैं। उनमें रूढ़िवादी (आस्तिक) प्रणालियां, अपरंपरागत (नास्तिक) प्रणालियां, और दर्शन के वेदांत संप्रदाय शामिल हैं। रूढ़िवादी प्रणालियां, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व-मीमांसा, आदि से बनती हैं। जबकि, अपरंपरागत प्रणालियों में बौद्ध और जैन धर्म शामिल हैं। भारतीय विचार, विभिन्न दार्शनिक समस्याओं पर गौर करता है, जिनमें दुनिया की प्रकृति (ब्रह्मांड विज्ञान), वास्तविकता की प्रकृति (तत्वमीमांसा), तर्क एवं ज्ञान की प्रकृति (ज्ञानमीमांसा), तथा नैतिकता और धर्म का दर्शन, आदि महत्वपूर्ण हैं।
इसके अलावा, भारतीय दार्शनिक विचार की आधारशिला तीन बुनियादी अवधारणाओं से बनती है। ये अवधारणाएं, स्वयं या आत्मा, कार्य (कर्म), और मुक्ति (मोक्ष) हैं। चार्वाक संप्रदाय को छोड़कर, संपूर्ण भारतीय दर्शन इन तीन अवधारणाओं और उनके अंतर्संबंधों से संबंधित हैं। इसका मतलब हालांकि यह नहीं है कि, वे इन अवधारणाओं की वस्तुनिष्ठ वैधता को ठीक उसी तरीके से स्वीकार करते हैं। इनमें से कर्म की अवधारणा, सबसे आम तौर पर भारतीय प्रतीत होती है। परंतु, आत्मा की अवधारणा एक निश्चित अर्थ में पारलौकिक या पूर्ण आत्मा की पश्चिमी अवधारणा से मेल खाती है। साथ ही, सर्वोच्च आदर्श की अवधारणा के रूप में, मोक्ष की अवधारणा भी पश्चिमी विचार में रही है। अधिकांश भारतीय दर्शन मानते हैं कि, मोक्ष संभव है, और "मोक्ष की असंभवता" (निर्मोक्ष) को दार्शनिक सिद्धांत को ख़राब करने वाली एक भौतिक भ्रांति के रूप में माना जाता है।
भारतीय दर्शन का प्रभाव पूरे भारतवर्ष में देखा जा सकता है। हमारा जौनपुर शहर भी इसमें शामिल है। शर्की राजवंश ने, जौनपुर को दिल्ली के प्रतिद्वंद्वी के रूप में एक शक्तिशाली साम्राज्य में बदल दिया। मलिक सरवर और सुल्तान हुसैन जैसे शासकों के साथ, हमारे जौनपुर क्षेत्र को तैमूर के आक्रमण का तत्काल लाभ मिला। क्योंकि, तब दिल्ली की अराजकता से भाग रहे विद्वानों, कारीगरों और शिल्पकारों को उन शासकों ने जौनपुर में आश्रय दिया। इन प्रभावों ने तुगलक परंपराओं से गहराई से प्रेरित, एक नई वास्तुशिल्प शैली को जन्म दिया। बड़ी दीवारों, स्मारकीय प्रवेश द्वारों और न्यूनतम अलंकरण के साथ मजबूत, सैन्यवादी संरचनाएं जौनपुर में आम होने लगी। इसका उदाहरण भव्य अटाला मस्जिद (1408) में देखा जा सकता है।
मध्य गंगा के किनारे जौनपुर की रणनीतिक स्थिति ने, युद्ध-हाथियों जैसे संसाधनों तक पहुंच भी प्रदान की, जो बिहार और बंगाल के जंगलों में घूमते थे। हालांकि, मध्य एशियाई व्यापार मार्गों से इसकी दूरी का मतलब, युद्ध के घोड़ों तक सीमित पहुंच था। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि, शर्की शासकों के अधीन, जौनपुर प्रतिभाशाली व्यक्तियों के लिए एक चुंबक बन गया। संत, सूफ़ी, कवि और विद्वान हमारे शहर में आते रहे, जिससे यह शिक्षा और आध्यात्मिकता का केंद्र बन गया। लोग इसे "पूर्व का शिराज" कहते थे, जो इसके समृद्ध बौद्धिक और कलात्मक जीवन का प्रतीक है। शाह मदार जैसे रहस्यवादियों, संत कबीर सहित भक्ति आंदोलन के नेताओं और महदावी आंदोलन के संस्थापक - सैय्यद मुहम्मद ने हमारे शहर को घर समझा, जिन्होंने इसके जीवंत आध्यात्मिक परिदृश्य को आकार दिया।
शर्की राजवंश के पतन के बाद भी, जौनपुर की विरासत जीवित रही। उनके द्वारा प्रवर्तित ज्ञान और संस्कृति की परंपराएं, सदियों तक इस क्षेत्र को प्रभावित करती रहीं। इसके जीवंत बौद्धिक वातावरण ने काजी शिहाब-उद-दीन दौलताबादी और मौलाना ख्वाजगी जैसे दिग्गजों को आकर्षित किया, जिनकी तफ़सीर, फ़िक़्ह और कलाम पर रचनाएं काफी प्रसिद्ध हैं।
दर्शन से निकटता से संबंधित एक चीज, ‘संस्कृति' है। ‘संस्कृति’ एक संस्कृत शब्द है, जो किसी समाज या समुदाय के सामूहिक रीति-रिवाजों, परंपराओं और मूल्यों को संदर्भित करता है। भारतीय विरासत के संदर्भ में, संस्कृति पीढ़ियों से चली आ रही समृद्ध और विविध सांस्कृतिक प्रथाओं, भाषाओं, कलाओं और रीति-रिवाजों को समाहित करती है।
माना जाता है कि, जिस प्रकार नदी बहती है, उसी तरह ज्ञान और जीवन भी बहता है। ये सभी निरंतरता के सीमाहीन प्रवाह हैं। "गंगा" केवल एक सीमित नदी न होकर, भारतीय संस्कृति में सभी नदियों को संदर्भित करती है। उसी तरह, "सरस्वती" केवल एक देवी नहीं, बल्कि स्वयं ज्ञान का संदर्भ है। जिस प्रकार नदी बहती है और सब कुछ अपने प्रवाह में ले लेती है, उसी प्रकार संस्कृति भी बहती रहती है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय रूपक में संस्कृति अलग-अलग हो सकती है। इस संस्कृति से ‘ज्ञान की धाराएं’ संबंधित हैं, जिनका अर्थ ज्ञान एवं आध्यात्मिकता का प्रसारण है।
विश्व भर में संस्कृति, ज्ञान और नदियों की अवधारणाएं :
1. एशिया/ऑस्ट्रेलिया की संस्कृति
संस्कृत धातु "सृ" का अर्थ "बहना” या "प्रवाह करना" है, जिससे सरिता अर्थात नदी निकलती है। सार या सरस्वती सरिता का जल, एशिया से होकर बहता है। इसी सार या पानी के साथ, कुछ ऑस्ट्रेलियाई पौराणिक कथाएं सामने आई। एक कथा इस प्रकार है - दरअसल, एक समय दो भाई रेगिस्तान से उभरे। फिर, उन्होंने धरती को खोदना शुरू किया, जब तक कि वे पानी तक नहीं पहुंच गए। तब उन्होंने नदियों, पहाड़ों, फूलों और पेड़ों की स्थापना की। जब इन भाइयों की मृत्यु हो गई, तो वे पानी के सांपों के रूप में पुनर्जन्म लेते रहे, नदियों में बहते रहे, और इसके पश्चात उनकी आत्माएं बादलों का निर्माण करते हुए आकाश में उड़ गईं। ये बादल बारिश लाते रहते हैं, और उनका पानी एशिया/ऑस्ट्रेलिया की संस्कृति में ज्ञान की धाराओं के माध्यम से बहता रहता है।
2. अफ़्रीका की संस्कृति
योरूबा (Yoruba) लोगों के लिए उनके आराध्य - ओरुनमिला (Orunmila), ज्ञान, कुशाग्रता और दूरदर्शिता की ओरिशा (Orisha), अर्थात भौतिक रूप में प्रकट आत्मा है। उनकी पत्नी - ओसुन (Osun) नदी की देवी हैं, जो ताजे पानी, उर्वरता और सुंदरता की आत्मा हैं। जबकि उनका पानी भूमि और लोगों का पोषण करता है, ओरुनमिला शहरों और गांवों में यात्रा करते हैं। वे भविष्यवाणी के माध्यम से लोगों के जीवन को ठीक भी करते हैं। ओरुनमिला की तरह, अफ़्रीका की संस्कृति की धाराएं स्थानों और भाषाओं में बहती हैं, तथा ज्ञान की नदी से अंतर्दृष्टि प्राप्त करती हैं।
3. यूरोप की संस्कृति
युद्ध की देवी और शहर की रक्षक – एथेना (Athena), संघर्ष और हिंसा से बढ़कर तर्क और वृत्ति को महत्व देती है। वह शिल्प, साहित्य और कृषि की संरक्षक भी है। उन्होंने बांसुरी का आविष्कार किया था, और उनका प्रतिनिधित्व उल्लू द्वारा किया जाता है। यह उल्लू उनकी बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक है। उनका नेडॉन नदी (Nedon river) पर एक पुण्यस्थान भी है। दूसरी ओर, एथिया (Aethiya) के रूप में, वह जहाज निर्माण और नेविगेशन में कुशल है। यूरोप के शहरों में ज्ञान की कई धाराएं बहती हैं। इनके तटों पर ज्ञानी और देखभाल करने वाली देवी - सोफिया की भी पूजा की जाती है। वह भाग्य की देवता एवं महिला प्रतिनिधि है, तथा समय और स्थान पर राज करती है।
एथेना
4. चीन की संस्कृति
क्विंगशुई नदी (Qingshui river) के स्रोत पर, माउंट वुताई (Mount Wutai) है, जो चीन के चार पवित्र पहाड़ों में से एक है। यह एक युवा बोधिसत्व - मंजुश्री का निवास है, जो महान ज्ञान का अवतार है, और सौम्य महिमा से देदीप्यमान है। मंजुश्री, अंतर्दृष्टि की एक ज्वलंत शक्ति से अज्ञानता और पीड़ा को दूर करते है। अपने बाएं हाथ से अपने हृदय में, वह एक कमल धारण करते है, जिस पर महान बुद्धि सूत्र लिखा है। जब मंजुश्री के कमल का डंठल, पारलौकिक ज्ञान की ओर ले जाता है, तब चीनी संस्कृति की धाराएं, उसे ज्ञान की महान नदी की ओर ले जाती हैं।
5. मध्य पूर्व की संस्कृति
प्राचीन मिस्र की बुद्धि और ज्ञान की देवी – सेशत (Seshat) ने लेखन का आविष्कार किया था। सेशत, थॉट (Thot) की समकक्ष हैं, जो लेखन और ज्ञान के चंद्र देवता हैं। उनके पुस्तकालय की वह मालकिन भी हैं। वह पानी के माध्यम से प्रजनन क्षमता प्रदान करने वाली देवी - आइसिस (Isis) से भी जुड़ी हैं। लेखन के कार्य में चित्रित, वह एकमात्र देवी हैं। वह वास्तुकला, खगोल विज्ञान, ज्योतिष, भवन निर्माण, गणित, इतिहास और सर्वेक्षण की भी देवी हैं। अंतरिक्ष और समय के पार से ज्ञान की ये विविध धाराएं, मध्य पूर्व संस्कृति की नदी में विलीन होती हैं।
6. अमेरिका की संस्कृति
क्वेट्ज़ेलकोटल (Quetzelcoatl), सीखने, ज्ञान और लेखन के अमेरिकी देवता हैं। अपने जुड़वां देवता - ज़ोलोटल (Xolotl) के साथ, वह मानव जाति, हवा और बारिश के निर्माता है। मानव जाति के देवता के रूप में वह हमारी आंतरिक ऊर्जा का प्रतीक हैं। अमेरिका की संस्कृति की जीवंतता उसके ज्ञान की धाराओं में है, जो सीमाओं से परे और आगे बढ़ती है।
क्या 75 साल पुराना नेटो गठबंधन अब सिर्फ इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा?
दुनिया भर में 32 देशों का एक ऐसा सैन्य गठबंधन चर्चा में है, जो शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के ख़िलाफ़ बना था, लेकिन आज अपने ही सबसे बड़े सदस्य देश अमेरिका की नीतियों की वजह से ऐतिहासिक संकट का सामना कर रहा है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध ने जहां एक तरफ़ इस गठबंधन को अपनी सैन्य ताक़त बढ़ाने पर मजबूर किया है, वहीं अमेरिकी नेतृत्व के नए बयानों और रक्षा ख़र्च की चेतावनियों ने नेटो के भविष्य पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नेटो क्या है और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसे क्यों बनाया गया? नेटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन की स्थापना साल 1949 में अमेरिका, कनाडा और पश्चिमी यूरोप के कई राष्ट्रों द्वारा मिलकर की गई थी। इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य सोवियत संघ के ख़िलाफ़ सामूहिक सुरक्षा प्रदान करना था। यह पहला ऐसा शांतिकालीन सैन्य गठबंधन था जिसमें अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध के बाहर शामिल हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध की भारी तबाही के बाद, यूरोप के देश अपनी चरमराई अर्थव्यवस्थाओं को फिर से बनाने और अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे थे। उस वक़्त युद्ध से तबाह हुए परिदृश्य में उद्योगों को फिर से स्थापित करने और खाद्य उत्पादन को बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता की सख़्त ज़रूरत थी।
नेटो का झंडा
इसके साथ ही, एक बार फिर से ताक़तवर होते जर्मनी या सोवियत संघ की घुसपैठ के ख़िलाफ़ यूरोप को सुरक्षा आश्वासनों की भी दरकार थी। अमेरिका का मानना था कि पूरे यूरोप में कम्युनिस्ट विस्तार को रोकने के लिए एक आर्थिक रूप से मज़बूत, हथियारों से लैस और एकजुट यूरोप बेहद ज़रूरी है। इसी रणनीति के तहत तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री जॉर्ज मार्शल ने यूरोप को बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता देने का प्रस्ताव रखा। इसे यूरोपीय रिकवरी प्रोग्राम या 'मार्शल प्लान' कहा गया, जिसने न केवल यूरोपीय आर्थिक एकीकरण को सुगम बनाया बल्कि अमेरिका और यूरोप के बीच साझा हितों को भी मज़बूत किया। जब सोवियत संघ ने इस मार्शल प्लान में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया और अपने पूर्वी यूरोपीय सहयोगी देशों को भी यह आर्थिक सहायता लेने से रोक दिया, तो यूरोप में पूर्व और पश्चिम के बीच की खाई और गहरी हो गई।
साल 1947 और 1948 के दौरान कई ऐसी भू-राजनीतिक घटनाएं हुईं जिन्होंने पश्चिमी यूरोप के देशों को अपनी भौतिक और राजनीतिक सुरक्षा के प्रति चिंतित कर दिया। ग्रीस में चल रहे गृह युद्ध और तुर्की में बढ़ते तनाव के कारण तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन को यह ऐलान करना पड़ा कि अमेरिका दोनों देशों को आर्थिक और सैन्य सहायता प्रदान करेगा। इसी बीच चेकोस्लोवाकिया में सोवियत समर्थित तख्तापलट हुआ और जर्मनी की सीमाओं पर एक कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में आ गई। साल 1948 के मध्य में सोवियत प्रीमियर जोसेफ स्टालिन ने पश्चिमी देशों के संकल्प को परखने के लिए पश्चिम बर्लिन की नाकेबंदी कर दी, जिससे अमेरिका और सोवियत संघ सीधे टकराव के कगार पर आ गए थे। इन घटनाओं ने ट्रूमैन प्रशासन को पश्चिमी यूरोप की सुरक्षा के लिए एक ठोस यूरोपीय-अमेरिकी गठबंधन बनाने पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया।
सामूहिक रक्षा में इसका उद्देश्य क्या है और इसके सदस्य कौन हैं? बढ़ते तनाव और सुरक्षा चिंताओं के जवाब में पश्चिमी यूरोपीय देश सामूहिक सुरक्षा समाधान पर विचार करने के लिए आगे आए। मार्च 1948 में ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्ज़मबर्ग ने ब्रुसेल्स संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि ने सामूहिक रक्षा का आधार तय किया, जिसके तहत यदि इनमें से किसी एक राष्ट्र पर हमला होता है, तो अन्य देश उसकी रक्षा के लिए बाध्य होंगे। महीनों की लंबी बातचीत और अमेरिकी कांग्रेस में कई बहसों के बाद, आख़िरकार 1949 में नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते में यह सहमति बनी कि किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमले को सभी पर हमला माना जाएगा। इस संधि के मूल 12 सदस्य अमेरिका, कनाडा, बेल्जियम, डेनमार्क, फ्रांस, आइसलैंड, इटली, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल और यूनाइटेड किंगडम थे।
यह सामूहिक रक्षा व्यवस्था औपचारिक रूप से केवल यूरोप या उत्तरी अमेरिका में होने वाले हमलों पर लागू होती थी और इसमें औपनिवेशिक क्षेत्रों के संघर्षों को शामिल नहीं किया गया था। बाद में कोरियाई युद्ध के छिड़ने से नेटो सदस्यों ने तेज़ी से एक केंद्रीकृत मुख्यालय के ज़रिए अपने रक्षा बलों को एकीकृत और समन्वित करना शुरू कर दिया। साल 1952 में ग्रीस और तुर्की को नेटो में शामिल किया गया और 1955 में पश्चिमी जर्मनी भी इसका हिस्सा बन गया। पश्चिमी जर्मनी के प्रवेश के जवाब में सोवियत संघ ने अपना अलग 'वारसॉ ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन' (वारसॉ पैक्ट) बनाया। 1950 के दशक में नेटो का सैन्य सिद्धांत 'बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई' के इर्द-गिर्द घूमता था, जिसका मतलब था कि किसी भी हमले का जवाब अमेरिका बड़े परमाणु हमले से देगा।
शीत युद्ध की ज़रूरतों के लिए बना यह गठबंधन उस संघर्ष के ख़त्म होने के बाद भी न सिर्फ़ क़ायम रहा, बल्कि इसका लगातार विस्तार हुआ है। वर्तमान में नेटो के सदस्यों की संख्या 32 तक पहुंच गई है, जिनमें कई पूर्व सोवियत राज्य भी शामिल हैं। आज यह दुनिया का सबसे बड़ा शांतिकालीन सैन्य गठबंधन है। इसका मुख्यालय ब्रुसेल्स में है और यह आम सहमति पर आधारित गठबंधन है जहां सभी फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। हाल के वर्षों में रूस के बढ़ते ख़तरे को देखते हुए स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों ने भी अपनी पारंपरिक सैन्य गुटनिरपेक्ष नीति को छोड़कर नेटो की सदस्यता हासिल कर ली है। फिनलैंड अप्रैल 2023 में शामिल हुआ, जिससे रूस के साथ नेटो की सीमा दोगुनी हो गई, और तुर्की व हंगरी के राजनीतिक विवादों के सुलझने के बाद मार्च 2024 में स्वीडन भी इसका पूर्ण सदस्य बन गया।
रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक सुरक्षा में नेटो की क्या भूमिका है? शीत युद्ध के बाद नेटो ने अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना शुरू किया। 1990 के दशक की शुरुआत में यूगोस्लाविया के विघटन और बोस्निया में जातीय संघर्ष के दौरान नेटो ने पहली बार अहम भूमिका निभाई और अप्रैल 1994 में अपने इतिहास के पहले लड़ाकू अभियान में बोस्नियाई सर्ब विमानों को मार गिराया। इसके इतिहास में पहली और इकलौती बार 'आर्टिकल 5' का इस्तेमाल अमेरिका पर हुए 9/11 के आतंकी हमलों के बाद किया गया था। इसके परिणामस्वरूप अफ़ग़ानिस्तान में एक बड़ा मिशन शुरू हुआ, जिसमें 50 गठबंधन और भागीदार देशों के 130,000 से ज़्यादा सैनिकों ने हिस्सा लिया। यह ऐतिहासिक सैन्य अभियान साल 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के साथ समाप्त हुआ।
साल 2022 की शुरुआत में रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए हमले ने यूरोप के पूरे सुरक्षा ढांचे को हिला कर रख दिया। यूक्रेन हालांकि नेटो का सदस्य नहीं है, लेकिन अमेरिका सहित कई नेटो देशों ने उसे अभूतपूर्व मात्रा में सैन्य सहायता प्रदान की है। इसमें टैंक, भारी तोपखाने, सशस्त्र ड्रोन और विमान भेदी प्रणालियां जैसे आधुनिक हथियार शामिल हैं। हालांकि, नेटो नेताओं ने सीधे तौर पर रूस के साथ सीधे संघर्ष में उलझने या 'नो-फ्लाई ज़ोन' लागू करने से बचने की पूरी कोशिश की है। फिर भी, रूस ने कड़ी चेतावनी दी है कि इस सहायता को देकर नेटो सहयोगी परमाणु युद्ध के भड़कने का भारी जोखिम उठा रहे हैं। यूक्रेन लगातार पूर्ण नेटो सदस्यता हासिल करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा होना मुश्किल है।
रूसी आक्रामकता ने नेटो को अपनी पूर्वी सीमाओं पर रक्षा प्रणाली मज़बूत करने के लिए विवश कर दिया है। 2014 के बाद से नेटो ने अपने सैन्य अभ्यास काफ़ी बढ़ा दिए हैं और बुल्गारिया, एस्टोनिया, हंगरी, लातविया, लिथुआनिया, पोलैंड, रोमानिया और स्लोवाकिया में नए कमांड सेंटर खोले हैं। 2017 में नेटो ने बाल्टिक राज्यों और पोलैंड में बहुराष्ट्रीय युद्ध समूहों को तैनात करना शुरू किया और रोमानिया में एक नया बहुराष्ट्रीय बल बनाया। इसके अलावा, गठबंधन ने अपनी पूर्वी सीमाओं पर हवाई गश्त में इज़ाफ़ा किया है। जून 2025 में द हेग, नीदरलैंड्स में होने वाले नेटो शिखर सम्मेलन में यह उम्मीद की जा रही है कि भविष्य के हमलों से बचने के लिए वायु और मिसाइल रक्षा प्रणाली में चार सौ प्रतिशत की वृद्धि को मंज़ूरी दी जाएगी।
क्या अमेरिका नेटो के भविष्य के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन गया है? जहां एक तरफ़ नेटो रूस से मिल रही सैन्य चुनौतियों का सामना कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ सत्ता में लौटे अमेरिकी प्रशासन के रवैये ने गठबंधन के भीतर एक अभूतपूर्व संकट पैदा कर दिया है। आज यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका ही नेटो के भविष्य के लिए नंबर एक ख़तरा बनकर उभरा है। जनवरी 2025 में कार्यभार संभालने के बाद, डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने यूक्रेन के लिए अपने समर्थन को कमज़ोर कर दिया है, कुछ सैन्य सहायता को अस्थायी रूप से रोक दिया है और मॉस्को के बजाय कीव पर संघर्ष विराम के लिए रियायतें देने का ज़्यादा दबाव बनाया है। फ़रवरी 2025 में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने यूक्रेन के नेटो में शामिल होने की संभावना को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया।
रक्षा ख़र्च को लेकर भी अमेरिका और अन्य नेटो सदस्यों के बीच मतभेद चरम पर हैं। ट्रम्प प्रशासन अब नेटो सदस्यों से अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 5 प्रतिशत रक्षा पर ख़र्च करने की मांग कर रहा है, जिसमें से 3.5 प्रतिशत मुख्य रक्षा ख़र्च और 1.5 प्रतिशत रक्षा-संबंधी व्यय होना चाहिए। मार्च 2025 में उन्होंने यहां तक सुझाव दे दिया कि जो सदस्य देश रक्षा ख़र्च में पर्याप्त योगदान नहीं दे रहे हैं, अमेरिका उनकी रक्षा नहीं करेगा। ट्रम्प प्रशासन के इस बदलते रुख और बार-बार दी जा रही चेतावनियों ने यूरोप के देशों में अपनी सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा कर दी है।
इसके अलावा, ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति की ताज़ा बयानबाज़ी ने पूरे गठबंधन को गहरे असमंजस में डाल दिया है। वेनेज़ुएला में ऑपरेशन के बाद, अमेरिका ने कथित तौर पर ग्रीनलैंड को अपने अगले हस्तक्षेप के स्थान के रूप में चिह्नित किया है। ग्रीनलैंड अमेरिका, कनाडा और आर्कटिक की रक्षा के लिए एक अहम रणनीतिक स्थिति रखता है और अमेरिकी अंतरिक्ष कमान (स्पेस कमांड) का मुख्य केंद्र भी है। लेकिन अगर अमेरिका वास्तव में ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने के लिए सैन्य आक्रमण करता है, तो यह तकनीकी रूप से नेटो संधि के आर्टिकल 5 को ट्रिगर कर देगा, जिसके तहत सभी सदस्य देशों को डेनमार्क की रक्षा के लिए आना होगा।
इस संभावित ख़तरे के जवाब में डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि डेनमार्क ग्रीनलैंड पर किसी भी क़दम का कड़ा विरोध करेगा। डेनिश सेना को 1952 के एक निर्देश की भी याद दिलाई गई है जो उन्हें उच्च कमान के आदेशों का इंतज़ार किए बिना डेनिश क्षेत्र पर किसी भी हमले का तुरंत जवाब देने की शक्ति देता है। आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों के कारण वहां नेटो की मौजूदगी पहले से ही बढ़ रही है। जानकारों का कहना है कि अगर अमेरिका इसी तरह नेटो के उन बहुपक्षीय सिद्धांतों से दूर जाता रहा जिन पर इस गठबंधन की नींव रखी गई थी, तो नेटो को जल्द ही अपनी भविष्य की रणनीति को फिर से परिभाषित करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
1000 साल, 7 शहर और इतने साम्राज्य: क्या आप जानते हैं हमारी राजधानी दिल्ली का यह इतिहास?
जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो दिल्ली की एक बेहद अनोखी तस्वीर सामने आती है। दिल्ली के पुरातात्विक निष्कर्षों और हालिया खुदाइयों ने यह साबित कर दिया है कि यहाँ तीसरी और चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर मुग़ल काल तक सांस्कृतिक परतों की एक निरंतर और अटूट श्रृंखला मौजूद रही है। इतिहासकार और पुरातत्वविद उस समय और भी हैरान रह गए जब यहाँ खुदाई के दौरान मिट्टी के बर्तनों के ऐसे अवशेष (पॉटरी फ्रैगमेंट्स) मिले जिनका समय काल लगभग एक हज़ार से पाँच सौ ईसा पूर्व माना जाता है। ये प्राचीन अवशेष इस बात की गवाही देते हैं कि दिल्ली महज़ कुछ सौ साल पुराना शहर नहीं है, बल्कि यह हज़ारों सालों से मानव सभ्यता और संस्कृति का एक बेहद महत्वपूर्ण और जीवंत केंद्र रहा है। शासक बदलते रहे, लेकिन इस ज़मीन ने हर दौर की संस्कृति को अपने भीतर संजो कर रखा।
दिल्ली के सात शहर – गॉर्डन रिस्ले हर्न, 1906
दिल्ली के सात शहर: तोमर और चौहान वंश ने दिल्ली के पहले शहर 'लाल कोट' की नींव कैसे रखी? अगर हम दिल्ली के पहले आधिकारिक शहर की बात करें, तो इसका निर्माण ग्यारहवीं शताब्दी में हुआ था। दिल्ली के इस सबसे पहले शहर को 'लाल कोट' के नाम से जाना जाता था, जिसकी स्थापना साल एक हज़ार साठ ईस्वी में तोमर वंश के शासकों द्वारा की गई थी। तोमर वंश ने इस शहर को अपनी सत्ता का एक मज़बूत केंद्र बनाया था। लेकिन बारहवीं शताब्दी के मध्य में इतिहास ने फिर करवट ली और चौहान वंश ने तोमर शासकों को सत्ता से हटाकर इस क्षेत्र पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। चौहान शासकों ने इस शहर को केवल जीता ही नहीं, बल्कि इसका विस्तार भी किया। उन्होंने लाल कोट की पुरानी सीमाओं को और आगे बढ़ाया और इस नई व विस्तारित संरचना को 'क़िला राय पिथौरा' का नाम दिया। यह क़िला आज भी दिल्ली के शुरुआती राजनीतिक और सैन्य इतिहास का एक सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
दिल्ली सल्तनत के दौर में 'सीरी' और 'तुग़लक़ाबाद' का निर्माण कैसे हुआ? दिल्ली ने सही मायनों में एक विशाल साम्राज्य की राजधानी का रूप तब लिया जब यहाँ 'दिल्ली सल्तनत' की स्थापना हुई। इसी दौर में दिल्ली का दूसरा शहर बसाया गया जिसे 'सीरी' के नाम से जाना गया। सत्ता के गलियारों में बदलाव का दौर जारी रहा और ख़िलजी वंश के पतन के बाद सत्ता तुग़लक़ वंश के हाथों में आ गई। साल तेरह सौ बीस से लेकर तेरह सौ चौबीस ईस्वी तक राज करने वाले ग़यासुद्दीन तुग़लक़ इस वंश के पहले शासक थे। अपनी सामरिक और प्रशासनिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने दिल्ली के तीसरे शहर की नींव रखी, जिसे आज हम 'तुग़लक़ाबाद' के नाम से जानते हैं। इसके विशाल और ऊँचे खंडहर आज भी तुग़लक़ वंश की वास्तुकला और उनके भव्य इरादों की गवाही देते हैं।
'जहाँपनाह' और 'फ़िरोज़ाबाद' के ज़रिए दिल्ली का भूगोल कैसे बदला गया? तुग़लक़ वंश के शासकों ने दिल्ली के भूगोल और इसके शहरों के निर्माण में सबसे अहम भूमिका निभाई थी। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ के बाद जब मुहम्मद-बिन-तुग़लक़ सत्ता में आए, तो उन्होंने साल तेरह सौ छब्बीस-सत्ताईस ईस्वी में एक बहुत ही अनूठा निर्माण कार्य करवाया। उन्होंने दिल्ली के दो पुराने शहरों, यानी लाल कोट और सीरी को दो विशाल दीवारों के ज़रिए आपस में जोड़ दिया। इस तरह लाल कोट और सीरी के बीच की ज़मीन को सुरक्षित करके दिल्ली का चौथा शहर बसाया गया, जिसे 'जहाँपनाह' नाम दिया गया। इसके बाद साल तेरह सौ इक्यावन से तेरह सौ अट्ठासी तक शासन करने वाले फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने वास्तुकला की इस परंपरा को और आगे बढ़ाया। उन्होंने यमुना नदी के शांत तटों पर दिल्ली के पाँचवें शहर 'फ़िरोज़ाबाद' का निर्माण करवाया। हालांकि, यह भी एक ऐतिहासिक सत्य है कि दिल्ली पर राज करने वाले हर वंश ने अपना कोई नया शहर नहीं बसाया। पंद्रहवीं शताब्दी में राज करने वाले सैय्यद वंश और पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य में राज करने वाले लोधी वंश ने अपने पीछे दिल्ली में कोई विशेष नया शहर या राजधानी नहीं छोड़ी।
दिल्ली का नक्शा – मिसेज़ शूस्मिथ का बनाया मज़ेदार कार्टून नक्शा (1930)
मुग़ल साम्राज्य ने 'दीनपनाह' और 'शाहजहाँनाबाद' की भव्यता को कैसे तराशा? सोलहवीं शताब्दी के मध्य से लेकर सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक दिल्ली ने मुग़ल साम्राज्य की राजधानी के रूप में एक बहुत ही अस्थिर दौर देखा, जहाँ सत्ता का केंद्र अक्सर बदलता रहता था। मुग़ल बादशाह हुमायूँ ने वास्तुकला के इस ऐतिहासिक सफ़र में अपना योगदान देते हुए साल पंद्रह सौ तैंतीस ईस्वी में 'दीनपनाह' का निर्माण करवाया, जिसे दिल्ली का छठा शहर माना जाता है। लेकिन दिल्ली का सबसे भव्य और ऐतिहासिक रूप तब सामने आया जब मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने सत्ता सँभाली। साल सोलह सौ उनतालीस ईस्वी में बादशाह शाहजहाँ ने मुग़ल साम्राज्य की राजधानी को वापस दिल्ली लाने का एक बड़ा ऐतिहासिक फ़ैसला किया। इसी फ़ैसले के तहत उन्होंने एक पूरी तरह से चारदीवारी से घिरे हुए नए शहर का निर्माण करवाया। इस शहर को 'शाहजहाँनाबाद' का नाम दिया गया, जो मुग़ल वास्तुकला का सबसे बेहतरीन नमूना बना और इसे दिल्ली का सातवाँ शहर कहा गया।
अलेक्जेंडर राउज़ (Alexander Rouse), पीडब्ल्यूडी (PWD), दिल्ली का नक्शा
अंग्रेज़ों ने अपनी राजधानी के रूप में कलकत्ता छोड़कर आधुनिक 'नई दिल्ली' की रूपरेखा कैसे तैयार की? समय का पहिया घूमता रहा और भारत के राजनीतिक परिदृश्य में एक बहुत बड़ा बदलाव तब आया जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी ताक़त बढ़ानी शुरू की। साल अठारह सौ तीन ईस्वी में अंग्रेज़ों ने मराठों को एक निर्णायक युद्ध में हरा दिया और दिल्ली की ऐतिहासिक ज़मीन पर अपना पूरा कब्ज़ा कर लिया। लंबे समय तक अंग्रेज़ों की राजधानी कलकत्ता ही रही, लेकिन साल उन्नीस सौ ग्यारह ईस्वी में ब्रिटिश साम्राज्य ने एक बहुत ही अहम रणनीतिक फ़ैसला लिया। उन्होंने अपनी राजधानी को कलकत्ता से हटाकर पूरी तरह से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया। प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने और ब्रिटिश सत्ता की भव्यता को दर्शाने के लिए मुग़लों द्वारा बसाए गए पुराने शहर 'शाहजहाँनाबाद' के दक्षिण-पश्चिम इलाके में एक बिल्कुल नया शहर बसाया गया। इस नए और आधुनिक शहर को 'नई दिल्ली' का नाम दिया गया, जो आज भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की गौरवशाली राजधानी के रूप में शान से खड़ा है।
दिल्ली को 'सात शहरों' (Seven Cities of Delhi) के रूप में देखने का नज़रिया आखिर मशहूर कैसे हुआ? दरअसल, इस पहचान को लोकप्रिय बनाने का बहुत बड़ा श्रेय गॉर्डन रिस्ले हर्न (Gordon Risley Hearn) को जाता है। सर गॉर्डन रिस्ले हर्न भारत में तैनात एक ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी (इंजीनियर) और कर्नल थे। उनके पिता का नाम चार्ल्स शकबर्ग हर्न (1829–1884) और माता का नाम मार्गरेट मिलर मेगौन (1844–1932) था। उन्होंने अपनी शिक्षा विंचेस्टर कॉलेज, वूलविच मिलिट्री अकादमी और स्कूल ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग से पूरी की। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध किताब 'द सेवन सिटीज़ ऑफ़ दिल्ली' में सबसे पहले इस मुहावरे को गढ़ा था और दिल्ली के इस ऐतिहासिक सफर की तुलना सात पहाड़ियों वाले 'रोम' (Rome) शहर से की थी।
हर्न के इस ऐतिहासिक विचार को एक बेहद दिलचस्प और विज़ुअल रूप तब मिला, जब 1931 में 'नई दिल्ली' के औपचारिक उद्घाटन के मौके पर मिसेज शूस्मिथ (Mrs. Shoosmith) ने एक अद्भुत नक्शा तैयार किया। मिसेज शूस्मिथ, दिल्ली के निर्माण से जुड़ी प्रमुख ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स टीम (लुटियंस-बेकर) के एक सदस्य की पत्नी थीं। कॉमिक और मज़ेदार अंदाज़ में हाथ से बनाए गए इस नक़्शे (non-scale map) में दिल्ली के सभी 7 ऐतिहासिक शहरों के सफर को एक ही पन्ने पर बेहद बारीकी से कैद किया गया था। समय के उस दुर्लभ पल को दर्शाने वाले इस शानदार नक़्शे की इकलौती ज्ञात प्रति आज कैम्ब्रिज (Cambridge) में मिसेज शूस्मिथ के लिगेसी बॉक्स में सुरक्षित रखी गई है।
तितलियों का अद्भुत प्रवास और प्रकृति से उनका गहरा जुड़ाव
तितलियों का प्रवास प्रकृति के सबसे अद्भुत दृश्यों में से एक माना जाता है। हर साल कुछ तितलियाँ मौसम बदलने के साथ कभी कभी हजारों किलोमीटर की यात्रा करती हैं। वे ठंड, भोजन की कमी और बदलते वातावरण से बचने के लिए ऐसे स्थानों की ओर जाती हैं, जहाँ उन्हें फूलों का रस और अपने बच्चों के लिए उपयुक्त पौधे मिल सकें।
दुनिया की सभी तितलियाँ प्रवास नहीं करतीं, लेकिन मोनार्क, पेंटेड लेडी और रेड एडमिरल जैसी कुछ प्रजातियाँ लंबी यात्राओं के लिए जानी जाती हैं। ये तितलियाँ मौसम और दिन की अवधि में होने वाले बदलावों को पहचानकर सही दिशा में उड़ान भरती हैं।
तितलियों का यह सफर केवल उनका जीवन बचाने के लिए ही नहीं होता, बल्कि यह प्रकृति के संतुलन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। प्रवास के दौरान वे कई फूलों का परागण करती हैं, जिससे पौधों और जंगलों का जीवन चक्र चलता रहता है।
तितलियों के प्रवास का अध्ययन वैज्ञानिकों को जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और प्राकृतिक आवासों की स्थिति को समझने में भी मदद करता है। इस तरह तितलियों की ये लंबी यात्राएँ प्रकृति और जीवन के बीच एक सुंदर जुड़ाव को दर्शाती हैं।
जौनपुर, आज जानिए हिमालय के खुम्बी या मोरेल मशरूम क्यों हैं स्वादिष्ट, महंगे व महत्वपूर्ण?
जौनपुर, आज हम समझेंगे कि मोरेल (morel) मशरूम क्या हैं, जिन्हें हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय रूप से खुम्बी या गुच्ची के नाम से जाना जाता है। हम जानेंगे कि, वे दुनिया में सबसे महंगे क्यों हैं। फिर, हम पता लगाएंगे कि वे कहां पाए जाते हैं। उसके बाद, हम जांचेंगे कि उनकी दुर्लभता और मौसमी प्रकृति के कारण वे महंगे क्यों हैं। हम यह भी देखेंगे कि, इन्हें जंगलों से कैसे एकत्र किया जाता है, और उनकी खेती में क्या चुनौतियां आती हैं। और अंत में, हम स्थानीय समुदायों के लिए उनके आर्थिक महत्व को समझेंगे।
मोरेल मशरूम (Morel mushroom), खाद्य कवक की एक प्रजाति है। इन विशिष्ट कवकों के ऊपरी टोपीनुमा भाग पर छत्ते जैसा स्वरूप होता है। इन्हें विशेष रूप से कैटलन (Catalan) और फ्रांसीसी व्यंजनों में बहुत महत्व दिया जाता है। भारत में इन्हें पुलाव, यखनी या रोगनजोश में परोसा जाता है। शादियों में परोसा जाने वाला यह मशरूम, सामाजिक स्थिति का भी प्रतीक है। लेकिन, अगर इसे कच्चा या केवल अर्ध पका खाया जाए, तो यह जहरीला हो सकता है।समशीतोष्ण उत्तरी अमेरिका, तुर्की, चीन, भारत और पाकिस्तान के हिमालय में जंगली मोरेल की व्यावसायिक कटाई, एक बहु-मिलियन डॉलर उद्योग बन गया है। क्योंकि, यहां ये मशरूम बहुतायत में पाए जाते हैं।
मोरेल कवक हिमालय की हरी-भरी स्थिति को दर्शाते हैं। इनके बारे में एक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि, इन्हें मानव द्वारा नहीं उगाया जा सकता हैं। क्योंकि इनके पनपने का क्षेत्र, हिमालय के घने जंगलों में मौजूद नम व ठंडी जलवायु का है। इसके अलावा, ये समुद्र तल से 11,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अद्वितीय जलवायु परिस्थितियों और हरे-भरे वन वातावरण में ही उगते हैं। इसी कारण, वे ज्यादातर कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पाए जाते हैं। इनके विकास के लिए उल्लेखनीय क्षेत्रों में, कश्मीर में अनंतनाग, कुपवाड़ा और कंगन की वन श्रृंखलाएं, तथा जम्मू क्षेत्र में डोडा और काश्तीवार हैं।
ये कवक, जंगल में ओक, पाइंस और अन्य शंकुधारी पेड़ों के नीचे वसंत ऋतु में उगते हैं। ताजा मोरेल मार्च, अप्रैल और मई के महीने में और बाद में और बाद में सुखाए गए रूप में बाज़ार में उपलब्ध होते हैं।ये विभिन्न आकारों और काले, भूरे और पीले से लेकर क्रीम जैसे रंगों में उपलब्ध हैं। इनकी बनावट नरम और अत्यंत नाजुक है। साथ ही, इनकी गंध और स्वाद सौंधी और अच्छी तरह से परिभाषित है। एंटी-ऑक्सीडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी और विटामिन डी से भरपूर होने जैसे कई स्वास्थ्य लाभों के साथ, इन्हें प्राचीन समय में हकीमों द्वारा निर्धारित पारंपरिक कश्मीरी व्यंजनों और दवाओं में जगह मिलती है। इन पोषक तत्वों के अलावा, दुर्लभ खुम्बी मशरूम प्रोटीन, फाइबर, और विटामिन बी से भरपूर होते हैं। वे लौह, तांबा, फास्फोरस, मैंगनीज, जस्ता और पोटेशियम जैसे खनिज तत्व भी प्रदान करते हैं। इस प्रकार, उनके निम्नलिखित स्वास्थ्य लाभ हैं -
1. रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार करना, 2. गुर्दों को साफ़ करना, 3. बेहतर मौखिक स्वास्थ्य प्रदान करना, 4. मधुमेह को प्रबंधित करने में सहायता करना, 5. एडेमा (Oedema) और सूजन को रोकना, 6. बुढ़ापा रोधक गुण, 7. ट्यूमर के प्रभाव को मिटाना, 8. स्वस्थ हड्डियों में योगदान देना, 9. वजन प्रबंधन में मदद करना, और 10. हृदय रोग के खतरे को कम करना, आदि।
इनकी उच्च कीमत, निम्नलिखित कारकों के कारण होती है:
1. वे केवल विशिष्ट पर्यावरणीय परिस्थितियों में ही बढ़ते हैं। 2. उनको इकट्ठा करने के लिए हिमालय की तलहटी में इन्हें ढूंढना पड़ता है। 3. इनके व्यापार के लिए पर्याप्त राशि जुटाने में काफी समय लगता है। 4. इन्हें सुखाने की प्रक्रिया इसके स्वाद और दीर्घायु को बढ़ाती है, जिससे लागत और बढ़ जाती है।
इस प्रकार, मोरेल मशरूम केवल जंगलों से इकट्ठे किए जाते हैं, क्योंकि उनकी खेती करना काफी कठिन है। उनका विकास जटिल जैविक और पर्यावरणीय कारकों से जुड़ा हुआ है, जिसे आधुनिक कृषि ने केवल हाल ही में समझना शुरू किया है। आम बटन मशरूम के विपरीत, मोरेल में एक बहु-चरण जीवन चक्र होता है। इसमें स्क्लेरोटिया (कठोर भूमिगत पोषक भंडार) शामिल होता है। इन स्क्लेरोटिया (sclerotia) को वास्तविक मशरूम में परिवर्तित करने के लिए, सटीक पर्यावरणीय स्थिति की आवश्यकता होती है, जिन्हें प्रयोगशाला में नहीं दोहराया जा सकता है।
इनकी कई प्रजातियां, जीवित रहने के लिए विशिष्ट जीवित पेड़ों (जैसे एश, एल्म, या ओक) की जड़ों के साथ एक भौतिक और रासायनिक साझेदारी बनाती हैं। इस जटिल वन पारिस्थितिकी तंत्र को, एक वाणिज्यिक कृषि में पुनः बनाना लगभग असंभव है। इसके अलावा, मोरेल अप्रत्याशित होते हैं। जंगल में आग लगने के बाद वे हजारों की संख्या में दिखाई दे सकते हैं, लेकिन फिर अगले वर्ष उसी स्थान से पूरी तरह गायब भी हो जाते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि उन्हें बढ़ने के लिए मिट्टी के पीएच (pH) का एक विशिष्ट स्तर चाहिए, जो आग की स्थिति में बदल जाता है।
उन्नत सुविधाओं में भी, इनकी खेती अक्सर जीवाणु प्रदूषण की उच्च दर और अस्थिर उपज से ग्रस्त होती है। मोरेल की खेती के प्रयास में दूषितकरण को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता भी शामिल है, क्योंकि इससे पूरी फसल बर्बाद हो सकती है। अतः उनके प्राकृतिक आवास की सटीक स्थितियों की नकल करना, एक कठिन चुनौती साबित होती है।
आज वैज्ञानिक अनुसंधान, "परीक्षण और त्रुटि" से उन्नत आणविक और सूक्ष्मजीव प्रबंधन की ओर स्थानांतरित हो रहे हैं। विज्ञान में मोरेल खेती हेतु चल रहे विकास के प्रमुख क्षेत्रों में, निम्नलिखित शामिल हैं:
1. बाह्य पोषक तत्व बैग (ईएनबी - Exogenous Nutrient Bag) तकनीक: वर्तमान खेती तरीकों में, मिट्टी के ऊपर पोषक तत्व बैग रखना और फिर मशरूम फलने के लिए उन्हें बाद में हटाना शामिल है। मिट्टी के प्रदूषण को रोकने के लिए, इन थैलियों के समय और संरचना को अनुकूलित किया जा रहा है।
2. माइक्रोबायोम इंजीनियरिंग (Microbiome Engineering): शोधकर्ता कुछ बायोमार्कर बैक्टीरिया (Biomarker bacteria) की पहचान कर रहे हैं, जो मशरूम के विकास को बढ़ावा देते हैं।
3. आंतरिक फैक्टरी खेती: जबकि चीन ने बाह्य खेती को विस्तारित किया है, कोपेनहेगन, डेनमार्क और कश्मीर में मिली हालिया सफलताओं ने अंततः अच्छी आंतरिक नियंत्रित-जलवायु खेती हासिल कर ली है।
4. आनुवंशिक प्रजनन: मोरेल में जीन संपादन कठिन होता है। इस कारण, आधुनिक अनुसंधान स्थिर एवं रोग-प्रतिरोधी उपभेदों को विकसित करने पर केंद्रित है, जो खेतों की गर्म जलवायु में जीवित रह सकते हैं।
सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में, खुम्बी या गुच्ची मशरूम का संग्रह और बिक्री कई ग्रामीण परिवारों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इन्हें स्थानीय लोगों द्वारा वनों में खोजा जाता है, और इकट्ठा किया जाता है। यह खोज सुबह जल्दी शुरू होती है, और शाम तक चलती हैं। इसके संग्रहण में कठिनाई और जोखिम है, क्योंकि इसके लिए महत्वपूर्ण प्रयास, विशेषज्ञता और वन पारिस्थितिकी के साथ परिचितता की आवश्यकता होती है। कटाई की प्रक्रिया शारीरिक रूप से कठिन और कभी-कभी खतरनाक होती है, जिसमें पहाड़ी इलाकों और घने जंगलों में लंबी यात्राएं शामिल हैं। ये मशरूम अक्सर जंगल के कूड़े के बीच अच्छी तरह से छिपे रहते हैं और ऊबड़-खाबड़ इलाकों में उगते हैं। इससे उनका संग्रह श्रम-गहन और अनिश्चित हो जाता है। शायद इसी श्रम गहन प्रक्रिया के कारण, यह दुनिया में सबसे महंगा कवक है, जिसकी कीमत 20,000 से 40,000 रुपये प्रति किलोग्राम तक है।
काशी में विश्वनाथ से प्रेरित क्रिकेट स्टेडियम का अर्थव्यवस्था पर मुमकिन प्रभाव
क्या आपको मालूम है कि साल 1983 में जब भारत ने क्रिकेट विश्व कप जीता था, तब खिलाड़ियों को भत्ते के रूप में रोज़ाना केवल 200 रुपये और मैच फ़ीस के तौर पर 1500 रुपये मिलते थे। लेकिन आज यह खेल एक बहु-अरब डॉलर का उद्योग बन चुका है, जहां खिलाड़ियों को 1 से 7 करोड़ रुपये तक का भारी-भरकम भुगतान किया जाता है। भारत में क्रिकेट अब सिर्फ़ एक खेल नहीं बल्कि एक विशाल अर्थव्यवस्था बन चुका है। जौनपुर और पूर्वांचल के खेल प्रेमियों के लिए यह जानना और भी दिलचस्प होगा कि उनके नज़दीक वाराणसी में एक भव्य अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम आकार ले रहा है, ऐतिहासिक ईडन गार्डन्स का महत्व क्या है, जिस पिच पर मैच खेले जाते हैं वह कैसे तैयार होती है, और कैसे दुनिया भर की कंपनियाँ इस खेल में अंधाधुंध पैसा लगा रही हैं।
जौनपुर और आस-पास के क्षेत्रों के लिए क्रिकेट के बुनियादी ढांचे में क्या बदलाव आ रहा है? भले ही वर्तमान में जौनपुर शहर में कोई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम नहीं है, लेकिन इसके ठीक बगल में स्थित वाराणसी शहर में एक नए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम का निर्माण कार्य ज़ोरों पर चल रहा है। उम्मीद जताई जा रही है कि यह स्टेडियम मई 2026 तक पूरी तरह से बनकर तैयार हो जाएगा। इसके पूरा होने पर यह कानपुर के ग्रीन पार्क स्टेडियम, लखनऊ के इकाना क्रिकेट स्टेडियम, ग्रेटर नोएडा और इटावा के सैफई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम के बाद उत्तर प्रदेश का पांचवां अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम बन जाएगा। इस स्टेडियम की दर्शक क्षमता 30,000 होगी, जिसे ज़रूरत पड़ने पर 40,000 तक बढ़ाया जा सकेगा। चूंकि यह वाराणसी के पवित्र शहर में बन रहा है, इसलिए इसका वास्तुशिल्प डिज़ाइन भगवान शिव से प्रेरित है। इसमें त्रिशूल के आकार की फ़्लडलाइट्स, अर्धचंद्र के आकार का रूफ़ कवर, घाट की सीढ़ियों जैसी बैठने की व्यवस्था, और मुखौटे पर बेलपत्र के आकार की धातु की चादरें होंगी। इसके अलावा इसका मीडिया सेंटर डमरू के आकार का होगा। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 सितंबर 2023 को सचिन तेंदुलकर, सुनील गावस्कर और रवि शास्त्री जैसे दिग्गजों की मौजूदगी में इस स्टेडियम की आधारशिला रखी थी।
मैचों को प्रभावित करने वाली क्रिकेट पिच कैसे बनाई जाती है? क्रिकेट का पूरा खेल मैदान के बीचों-बीच मौजूद 22 गज़ लंबी और 10 फ़ुट चौड़ी पिच पर निर्भर करता है। इसे बनाना एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें काफ़ी धैर्य की आवश्यकता होती है। सबसे पहले ज़मीन से घास, मिट्टी, कंकड़ और अन्य मलबे को हटाकर जगह को साफ़ किया जाता है। इसके बाद मिट्टी को समतल और संकुचित करके एक चिकनी सतह तैयार की जाती है। इस सतह पर अलग-अलग तरह की मिट्टी की परतें बिछाई जाती हैं। सबसे निचली परत में नरम मिट्टी का मिश्रण होता है जो स्थिरता प्रदान करता है, जबकि सबसे ऊपरी परत महीन और अच्छी तरह से ग्रेडेड मिट्टी की होती है, जो खेलने के लिए मुख्य सतह बनाती है। एक अच्छी सतह बनाए रखने के लिए नियमित रूप से पानी देना, घास काटना और रोलिंग करना ज़रूरी होता है। इसके लिए बड़े रोलर्स का उपयोग किया जाता है ताकि सतह को चपटा किया जा सके।
पिच कितने प्रकार की होती हैं और खेल पर इनका क्या असर पड़ता है? खेल के दौरान पिच की नमी, दरारें और धूल मैच का रुख़ तय करते हैं। हरी पिच पर घास और नमी होती है जो तेज़ गेंदबाज़ों को फ़ायदा पहुंचाती है। इसके विपरीत फ़्लैट ट्रैक पिच पर घास लगभग नहीं होती और यह बल्लेबाज़ी के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है। सूखी पिच में नमी नहीं होती है और इस पर दरारें आसानी से बन जाती हैं, जो तेज़ गेंदबाज़ों और अनुभवी बल्लेबाज़ों दोनों के लिए मददगार साबित हो सकती हैं। इसके अलावा गीली पिच पर नमी के कारण गेंद अप्रत्याशित रूप से फिसलती और उछलती है, जिससे बल्लेबाज़ों को मुश्किल होती है। धूल भरी पिचें नरम होती हैं और कम रोल की जाती हैं, जिससे स्पिनरों को गेंद घुमाने में काफ़ी मदद मिलती है। भारत जैसे देशों में गर्मी और सूखे के कारण पिचें धीमी होती हैं और स्पिनरों के लिए बहुत फ़ायदेमंद साबित होती हैं। आजकल हाइब्रिड पिचें भी चलन में हैं, जिन्हें सिंथेटिक फ़ाइबर और प्राकृतिक घास को मिलाकर बनाया जाता है ताकि वे लंबे समय तक टिक सकें और जल निकासी बेहतर हो सके।
भारत का सबसे पुराना और ऐतिहासिक क्रिकेट स्टेडियम कौन सा है? भारत में क्रिकेट के इतिहास की बात करें तो कोलकाता का ईडन गार्डन्स सबसे ऐतिहासिक मैदान है। साल 1864 में स्थापित यह भारत का सबसे पुराना और नरेंद्र मोदी स्टेडियम के बाद दूसरा सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम है। वर्तमान में इस स्टेडियम की दर्शक क्षमता 68,000 है। इसे भारतीय क्रिकेट का मक्का भी कहा जाता है क्योंकि यह क्रिकेट खेल के लिए आधिकारिक तौर पर बनाया गया भारत का पहला मैदान था। ईडन गार्डन्स ने विश्व कप, वर्ल्ड ट्वेंटी-20 और एशिया कप सहित कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के मैचों की मेज़बानी की है। 1987 में यह विश्व कप फ़ाइनल की मेज़बानी करने वाला दूसरा स्टेडियम बन गया था। 22 नवंबर 2019 को इसी मैदान पर भारत और बांग्लादेश के बीच देश का पहला डे-नाइट टेस्ट मैच खेला गया था। ईडन गार्डन्स को इसके बड़े भावुक दर्शकों के लिए भी जाना जाता है। 1996 के विश्व कप सेमीफ़ाइनल में भारत और श्रीलंका के मैच के दौरान यहां 110,564 दर्शकों की रिकॉर्ड भीड़ देखी गई थी। इस मैदान पर स्टैंड्स का नाम प्रमुख स्थानीय क्रिकेटरों और सैनिकों के नाम पर रखा गया है, और साल 2024 में मशहूर भारतीय महिला तेज़ गेंदबाज़ झूलन गोस्वामी के नाम पर भी एक स्टैंड समर्पित करने का फ़ैसला लिया गया था।
विदेशी निवेशक और कंपनियाँ भारतीय क्रिकेट में इतना पैसा क्यों लगा रही हैं? भारत में क्रिकेट अब महज़ एक शगल से विकसित होकर एक प्रमुख आर्थिक ताक़त बन गया है। विशेष रूप से टी-20 प्रारूप और 2008 में शुरू हुई इंडियन प्रीमियर लीग ने क्रिकेट की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बदल दिया है। आईपीएल आज दुनिया की सबसे अमीर और सबसे ज़्यादा देखी जाने वाली क्रिकेट लीगों में से एक है। 2022 की मीडिया नीलामी में डिज़नी स्टार और वायकॉम 18 ने मिलकर टीवी और डिजिटल अधिकार 5.64 बिलियन डॉलर में ख़रीदे, जिससे आईपीएल दुनिया की दूसरी सबसे अमीर खेल लीग बन गई। इस अपार लोकप्रियता और राजस्व को देखते हुए विदेशी निवेशक भारतीय क्रिकेट में भारी निवेश कर रहे हैं। जो देश पारंपरिक रूप से क्रिकेट नहीं खेलते हैं, वे भी अब इस खेल में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
क्रिकेट से भारत की अर्थव्यवस्था और पर्यटन को कैसे बढ़ावा मिल रहा है? विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी केवल प्रसारण अधिकारों तक सीमित नहीं है। वे टी-20 लीगों में फ़्रैंचाइज़ी ख़रीदने में भी काफ़ी रुचि दिखा रहे हैं। उदाहरण के लिए, ब्रिटिश प्राइवेट इक्विटी फ़र्म सीवीसी कैपिटल पार्टनर्स ने अक्टूबर 2021 में 5625 करोड़ रुपये की भारी बोली लगाकर आईपीएल में गुजरात टाइटन्स फ़्रैंचाइज़ी ख़रीदी थी। इसके अलावा, विदेशी निवेशक प्रायोजन, एंडोर्समेंट, क्रिकेट अकादमियों के निर्माण, फ़ैंटेसी क्रिकेट प्लेटफ़ॉर्म और क्रिकेट पर्यटन पैकेजों के माध्यम से भी पैसा लगा रहे हैं। विराट कोहली, रोहित शर्मा और एमएस धोनी जैसे शीर्ष क्रिकेटरों के पास प्रमुख ब्रांड्स के साथ करोड़ों डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट हैं, जो उन्हें देश के सबसे अधिक भुगतान पाने वाले एथलीट बनाते हैं। कोटक सिक्योरिटीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, क्रिकेट विश्व कप 2023 से भारतीय अर्थव्यवस्था में 1.619 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक का योगदान मिलने का अनुमान लगाया गया था, जिसका एक बड़ा हिस्सा यात्रा और आतिथ्य क्षेत्रों से आना था। कुल मिलाकर, क्रिकेट की अर्थव्यवस्था भारत में विकास, रोज़गार और बुनियादी ढांचे के लिए एक मज़बूत स्तंभ साबित हो रही है।
जौनपुर वासियों, जानें साइबरबुलिंग व एआई उत्पीड़न के बारे में हमें क्यों रहना चाहिए जागरूक?
आज के हमारे लेख में हम देखेंगे कि, साइबर बदमाशी या साइबरबुलिंग (Cyberbullying) और ऑनलाइन उत्पीड़न में एआई का उपयोग कैसे किया जा रहा है। हम समझेंगे कि, साइबरबुलिंग किसी के मानसिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करती है, और यह इतना गंभीर मुद्दा क्यों बनता जा रहा है। बाद में, हम ब्लू व्हेल गेम (Blue Whale Game) जैसे मामलों का पता लगाएंगे, और देखेंगे कि ऑनलाइन सामग्री लोगों को हानिकारक कार्यों की ओर कैसे धकेल सकती है। अंततः हम जानेंगे कि, भारत सरकार जागरूकता और नए उपायों के माध्यम से एआई संचालित उत्पीड़न और डीपफेक (Deepfake) दुरुपयोग से निपटने हेतु क्या कोशिश कर रही हैं।
साइबरबुलिंग (Cyberbullying) एक ऐसा मुद्दा है, जो बच्चों और वयस्कों को समान रूप से प्रभावित करता है। यह शब्द उस बदमाशी को संदर्भित करता है, जो सेल फोन (cell phone) और कंप्यूटर (computer) जैसे डिजिटल उपकरणों पर होती है। इसमें गेमिंग कंसोल (Gaming consoles) भी शामिल है। सोशल मीडिया (social media), टेक्स्ट संदेश (text message), ईमेल (Email), ऑनलाइन फ़ोरम (Online Forums) और गेमिंग समुदाय (Gaming community) सबसे आम स्थान हैं, जहां साइबरबुलिंग होती है। एक अनुमान है कि, 30% किशोरों ने साइबरबुलिंग का अनुभव किया है। इसका शिकार होने वाले वयस्कों की बढ़ती संख्या (15%) चिंता का कारण बन रही है।
पिछले वर्ष से, जेनरेटिव एआई (Generative AI) का उपयोग करके ऑनलाइन उत्पीड़न और साइबरबुलिंग बढ़ रही है। इसमें झूठी कल्पना बनाना या किसी के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाले लेखन जैसे कई तरीके शामिल हो सकते हैं। एआई-जनित उत्पीड़न इस डिजिटल दुरुपयोग के पारंपरिक उत्पीड़न की तुलना में पीड़ितों पर अधिक दबाव डाल सकता है। यह मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक शोषण को भी बढ़ा सकता है। हेरफेर किए गए मीडिया के ये रूप समस्याग्रस्त हो सकते हैं, क्योंकि पीड़ित के लिए यह साबित करना बहुत मुश्किल हो सकता है कि, वह वास्तव में नकली सामग्री हैं। इससे अतिरिक्त तनाव, भय और चिंता पैदा होती है। जैसे-जैसे यह तकनीक और इसकी क्षमताएं बढ़ती जा रही हैं, एआई-जनित उत्पीड़न के खतरों के बारे में हम निम्नलिखित तथ्य जानते हैं:
1. स्वचालित ट्रोल बॉट (Troll bots) के माध्यम से उत्पीड़न काफी हद तक बढ़ जाता है। क्योंकि, इनसे काफ़ी लोगों को सामग्री भेजी जाती है, और यह तेजी से साझा की जाती है।
2. एआई-जनित सामग्री व्यक्तिगत डेटा से पहलू सीखकर, हमलों को अधिक व्यक्तिगत बना सकती है।
3. यह तकनीक ऐसी सामग्री बना सकती है, जो स्वचालित सामग्री मॉडरेशन सिस्टम (Content moderation systems) से सफलतापूर्वक बच जाती है।
4. उत्पीड़न के लिए एआई-जनित सामग्री, सिस्टम को प्रशिक्षित करने हेतु प्रयुक्त डेटा के आधार पर, कोई व्यक्ति घृणास्पद भाषण और नस्लवादी टिप्पणियों के प्रति कितना संवेदनशील है, यह भी जान सकती है।
जब ऑनलाइन बदमाशी या साइबरबुलिंग होती है, तो उसका प्रभाव लंबे समय तक रह सकते हैं, और व्यक्ति को निम्नलिखित तरीकों से प्रभावित कर सकते हैं:
• मानसिक रूप से – परेशानी, चिंता, घबराहट, डर या गुस्सा महसूस करना।
• भावनात्मक रूप से – शर्म महसूस करना या अपनी पसंदीदा चीज़ों में रुचि खोना।
• शारीरिक रूप से – थकान आना, नींद की कमी, पेट दर्द या सिरदर्द जैसे लक्षणों का अनुभव करना।
धीरे-धीरे लोग आत्मविश्वास खो सकते हैं, और चरम मामलों में, अपनी जान भी ले सकते हैं। साइबरबुलिंग हमें कई तरह से प्रभावित कर सकती है। साइबरबुलिंग का सामना करने पर, लोग हमारे बारे में क्या कहते या सोचते हैं, इसके बारे में हम असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। इससे दोस्तों और परिवार से दूरी बन सकती है, नकारात्मक विचार और आत्म-चर्चा हो सकती है, या हम दोषी महसूस कर सकते हैं। अकेलापन, अभिभूत महसूस करना, बार-बार सिरदर्द, मतली या पेट दर्द भी आम है। आप उन चीज़ों को करने के लिए अपनी प्रेरणा खो सकते हैं, जिन्हें करने में आपको आमतौर पर आनंद आता है, और आप अपने पसंदीदा लोगों से अलग-थलग महसूस कर सकते हैं। इससे नकारात्मक भावनाएं और विचार कायम रह सकते हैं, जो आपके मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
स्कूल छोड़ना साइबरबुलिंग का एक और आम प्रभाव है। यह उन बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है, जो अपने मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दर्द से निपटने के लिए शराब और नशीली दवाओं का सहारा लेते हैं। इसलिए, किसी भरोसेमंद दोस्त, परिवार के सदस्य या स्कूल काउंसलर (Counselor) से बात करना मदद पाने की शुरुआत हो सकती है। इन भावनाओं पर काबू पाया जा सकता है, और लोग अपना आत्मविश्वास और स्वास्थ्य दोबारा हासिल कर सकते हैं।
चलिए अब साइबरबुलिंग का एक उदाहरण देखते हैं। ‘ब्लू व्हेल चैलेंज’ (Blue Whale Challenge) एक ऑनलाइन गेम है, जिसने अभिभावकों के मन में डर पैदा कर दिया था। विशेषकर किशोरों में कई आत्महत्याओं के लिए, ब्लू व्हेल चैलेंज को जिम्मेदार ठहराया गया है। इस गेम में प्रतिभागियों को 50 दिनों की अवधि में पूरे करने के लिए कुछ कार्य दिए जाते हैं। प्रतिभागियों को दिया गया अंतिम कार्य आत्महत्या करना, और कार्य के सफल समापन का प्रमाण अपलोड करना है। एक परिकल्पना के अनुसार, जिनमें मृत्यु का भय कम हो गया है या दर्द के प्रति संवेदनशीलता कम हो गई है, केवल वही व्यक्ति यदि उनमें आत्मघाती विचार विकसित होते हैं, तो आत्महत्या के प्रयास करते हैं। इस सिद्धांत को ब्लू व्हेल चैलेंज पर लागू करते हुए, गेम के शुरुआती कार्यों को ऐसे सोचा जा सकता है, जो शारीरिक दर्द सहनशीलता को बढ़ाते हैं और इस प्रकार मृत्यु के भय को कम करते हैं। इस प्रकार, कई कार्य पूरे करने पर यह गेम युवाओं को आत्महत्या करने पर मजबूर करता था। इस गेम की वजह से, कई युवाओं ने अंततः अपनी जान गंवाई है।
इन्हीं घटनाओं के चलते, भारत में डीपफेक खतरों के खिलाफ़ निम्नलिखित सुरक्षा रणनीतियां अपनाई जा रही हैं:
1. डीपफेक खोज को मजबूत करना साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ उन्नत एआई सुरक्षा उपकरणों में निवेश कर रहे हैं, जो वीडियो और ऑडियो डेटा में विसंगतियों का विश्लेषण करते हैं। व्यापक क्षति पहुंचाने से पहले जोखिमों को कम करने के लिए हमारे देश में डीपफेक का पता लगाना महत्वपूर्ण है।
2. डिजिटल फोरेंसिक (Digital Forensics) और खतरों की सूचना डिजिटल फोरेंसिक विशेषज्ञ डीपफेक वीडियो की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए नए तरीके विकसित कर रहे हैं। दूसरी ओर, खतरों की सूचना भी डीपफेक-संबंधित साइबर अपराधों की निगरानी और भविष्यवाणी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
3. देश में साइबर सुरक्षा नीति को बढ़ाना डीपफेक के दुर्भावनापूर्ण उपयोग को अपराध घोषित करने के लिए, भारत में सुरक्षा नियमों को संशोधित किया जा रहा है। अधिकारी अपराधियों को जिम्मेदार ठहराने और डीपफेक पीड़ितों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून तैयार कर रहे हैं।
4. प्रमाणीकरण प्रणालियों को मजबूत करना पहचान धोखाधड़ी (Identity fraud) को रोकने के लिए, कुछ संगठन बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण (Biometric authentication) और एआई-संचालित सत्यापन प्रणाली लागू कर रहे हैं। एआई-जनित प्रतिरूप हमलों का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिए, भारत में प्रमाणीकरण प्रणाली विकसित होनी चाहिए।
•सार्वजनिक जागरूकता और डीपफेक रोकथाम के उपाय
1. डिजिटल सुरक्षा पर नागरिकों को शिक्षित करना जोखिमों को कम करने के लिए, डीपफेक के बारे में सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है। सरकारी और साइबर सुरक्षा संगठन भारत में लोगों को डीपफेक वीडियो पहचानने में मदद करने के लिए, जागरूकता अभियान शुरू कर रहे हैं।
2. साइबर सुरक्षा में एआई सुरक्षा और मशीन लर्निंग (Machine Learning) लागू करना कंपनियां मज़बूत एआई सुरक्षा समाधान विकसित करने के लिए, साइबर सुरक्षा में मशीन लर्निंग का लाभ उठा रही हैं। वास्तविक समय में एआई-जनित समस्याओं की पहचान करने के लिए, स्वचालित पहचान प्रणालियों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।
3. मीडिया पर विश्वास और सोशल मीडिया सुरक्षा को मज़बूत करना भारत में मीडिया विश्वास संकट से निपटने के लिए, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एआई-संचालित मॉडरेशन टूल (Moderation tools.) पेश कर रहे हैं। डीपफेक सामग्री के फैलने से पहले, उसका पता लगाने और उसे हटाने के लिए सोशल मीडिया सुरक्षा उपायों को बढ़ाया जा रहा है।
भोपाल गैस त्रासदी में टैंक E610 में उस रात क्या हुआ जिसने लाखों जिंदगियां तबाह कर दीं?
साल 1984 की 2 दिसंबर की आधी रात, जब मध्य प्रदेश के भोपाल शहर के लाखों निवासी गहरी नींद में सो रहे थे, तब एक कीटनाशक कारखाने से लगभग 40 टन ज़हरीली मिथाइल आइसोसाइनेट (methyl isocyanate) गैस का रिसाव हुआ। इस भयंकर रिसाव ने तुरंत कम से कम 3,800 लोगों की जान ले ली और आने वाले समय में हज़ारों अन्य लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इस गैस से 5 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए थे, जिस कारण इसे इतिहास की सबसे भीषण औद्योगिक आपदाओं में गिना जाता है। जौनपुर और पूर्वांचल के पाठकों के लिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर एक कारखाने की लापरवाही ने कैसे लाखों ज़िंदगियां तबाह कर दीं, इसके क्या दूरगामी परिणाम हुए और इस एक घटना ने कैसे पूरे भारत के औद्योगिक सुरक्षा कानूनों को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।
यूनियन कार्बाइड के कारखाने में उस रात असल में क्या हुआ था? यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (Union Carbide India Limited) का यह कारखाना 1969 में भोपाल में स्थापित किया गया था, जिसका उद्देश्य कीटनाशक बनाना था। इस कारखाने का 50.9 प्रतिशत हिस्सा अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन (Union Carbide Corporation) के पास था, जबकि 49.1 प्रतिशत हिस्सा भारतीय निवेशकों और बैंकों के पास था। साल 1979 में इस कारखाने में मिथाइल आइसोसाइनेट के उत्पादन के लिए एक नई इकाई जोड़ी गई। 1980 के दशक की शुरुआत में कीटनाशकों की मांग कम होने के कारण कारखाने में बिना इस्तेमाल की गई मिथाइल आइसोसाइनेट गैस जमा होने लगी थी। यह कारखाना शहर के घनी आबादी वाले इलाके और रेलवे स्टेशन के ठीक बगल में स्थित था, जो 1975 की भोपाल विकास योजना का सीधा उल्लंघन था। 1982 में ही कंपनी के ऑडिटरों (auditors) ने एक भयानक रासायनिक प्रतिक्रिया (chemical reaction) की चेतावनी दी थी। अक्टूबर 1984 के अंत तक कारखाने के ई610 (E610) नामक टैंक में 42 टन मिथाइल आइसोसाइनेट भरा हुआ था, लेकिन उसमें दबाव बनाने वाली नाइट्रोजन (nitrogen) गैस का रिसाव हो गया था जिससे तरल गैस को बाहर नहीं निकाला जा सकता था। 2 दिसंबर की रात को पाइपों की सफ़ाई के दौरान पानी गलती से इस ई610 टैंक में चला गया। पानी और गैस के मिलने से टैंक का तापमान और दबाव भयानक रूप से बढ़ गया। इस रिसाव को रोकने के लिए लगाए गए सुरक्षा उपकरण जैसे प्रशीतन इकाई (Refrigeration Unit), फ्लेयर टावर (Flair Tower) और वेंट गैस स्क्रबर (Vent Gas Scrubber) या तो बंद पड़े थे या ख़राब थे। नतीजतन रात के समय महज़ 45 से 60 मिनट के भीतर लगभग 30 टन ज़हरीली गैस हवा में फैल गई और पूरे शहर को अपनी चपेट में ले लिया।
इस ज़हरीली गैस का लोगों और पर्यावरण पर कितना भयानक असर पड़ा? गैस के संपर्क में आते ही लोगों को खांसी, दम घुटना, आँखों में तेज़ जलन और उल्टी जैसी भयंकर परेशानियां होने लगीं। जान बचाने के लिए लोग बदहवास होकर भागने लगे। मिथाइल आइसोसाइनेट गैस हवा से दोगुनी भारी होती है, इसलिए यह ज़मीन के क़रीब ही रही, जिसकी वजह से कम ऊँचाई वाले बच्चों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ा। अगली सुबह तक हज़ारों लोग दम घुटने और फेफड़ों में पानी भर जाने से मर चुके थे। मध्य प्रदेश सरकार ने गैस रिसाव से 3,787 लोगों की मौत की पुष्टि की थी, जबकि एक अन्य अनुमान के मुताबिक पहले दो हफ़्तों में 8,000 लोग मारे गए और बाद में गैस जनित बीमारियों से 8,000 और लोगों की मौत हुई। सरकार के एक हलफनामे के अनुसार इस रिसाव से 5,58,125 लोग घायल हुए, जिनमें से 3,900 लोग हमेशा के लिए गंभीर रूप से विकलांग हो गए। जो लोग बच गए वे आज भी अंधापन, फेफड़ों की गंभीर बीमारियों, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी और मनोवैज्ञानिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। गर्भवती महिलाओं के गर्भपात की दर कई गुना बढ़ गई और पैदा होने वाले बच्चों में भी गंभीर जन्मजात बीमारियां देखी गईं। पर्यावरण की बात करें तो घटना के कुछ ही दिनों में आस-पास के पेड़ सूख गए और हज़ारों मृत जानवरों को दफ़नाना पड़ा। कारखाने के अंदर आज भी ख़तरनाक रसायनों का कचरा पड़ा हुआ है, जिससे वहाँ की मिट्टी और भूजल बुरी तरह प्रदूषित हो चुके हैं।1 जनवरी 2025 को भारी सुरक्षा के बीच 377 टन ज़हरीले कचरे को भोपाल से पीथमपुर ले जाकर जलाया गया है।
त्रासदी के बाद कंपनी का रवैया और कानूनी लड़ाई कैसी रही? हादसे के तुरंत बाद यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन ने अपनी ज़िम्मेदारी से भागने की पूरी कोशिश की। कंपनी ने सारा दोष अपनी भारतीय इकाई पर मढ़ दिया और यह झूठी कहानी भी रची कि यह हादसा किसी असंतुष्ट कर्मचारी या सिख चरमपंथियों की साज़िश का नतीजा था। गैस रिसाव के तुरंत बाद कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी वारेन एंडरसन (Warren Anderson) भोपाल आए, जिन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। लेकिन उन्हें ज़मानत दे दी गई और वे सरकारी विमान से देश छोड़कर अमेरिका भाग गए। भारत सरकार ने उनके प्रत्यर्पण की बहुत कोशिश की, लेकिन अमेरिका ने सबूतों की कमी का हवाला देकर उन्हें भारत को सौपने से इनकार कर दिया। सालों तक चले मुकदमों के बाद 1989 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की मध्यस्थता में यूनियन कार्बाइड ने 470 मिलियन डॉलर का मुआवज़ा देने पर सहमति जताई। यह रक़म बहुत कम थी क्योंकि इसमें लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों और प्रभावित लोगों की असली संख्या को कम आँका गया था। इस समझौते के बाद कंपनी ने अपनी भारतीय इकाई को बेच दिया। सालों बाद 2010 में सात भारतीय अधिकारियों को लापरवाही से मौत के मामले में दोषी ठहराया गया और उन्हें दो साल की जेल व ज़ुर्माने की सज़ा सुनाई गई, लेकिन उन्हें तुरंत ज़मानत भी मिल गई। मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन कभी भारतीय अदालत में पेश नहीं हुए और 2014 में अमेरिका में उनकी मौत हो गई।
इस भीषण हादसे ने भारत के औद्योगिक सुरक्षा कानूनों को कैसे बदल दिया? भोपाल गैस त्रासदी से पहले भारत में औद्योगिक सुरक्षा का माहौल बहुत लचर था। तब केवल 1948 का फैक्ट्री अधिनियम लागू था, जिसमें ख़तरनाक रसायनों से निपटने के लिए कोई कड़े नियम नहीं थे। लेकिन इस महाविनाश ने भारत सरकार को नींद से जगा दिया। सबसे बड़ा बदलाव 1986 में आया जब पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू किया गया, जिसने सरकार को पर्यावरण सुरक्षा और ख़तरनाक उद्योगों पर नियंत्रण रखने के लिए भारी अधिकार दिए। इसके बाद 1987 में फैक्ट्री अधिनियम में संशोधन करके ख़तरनाक रसायनों के उपयोग, सुरक्षा ऑडिट (Security Audit) और आपातकालीन योजनाओं को अनिवार्य बना दिया गया। साल 1991 में सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम लाया गया, जिसके तहत ख़तरनाक सामग्री संभालने वाली कंपनियों के लिए बीमा कराना अनिवार्य कर दिया गया ताकि दुर्घटना होने पर पीड़ितों को तुरंत मुआवज़ा मिल सके। साल 1989 में ख़तरनाक कचरे के प्रबंधन और निपटान के लिए भी सख़्त नियम बनाए गए। इन कानूनों को लागू कराने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (State Pollution Control Boards) को बहुत ताक़तवर बनाया गया, जो अब कारखानों का निरीक्षण कर सकते हैं और नियम तोड़ने वालों पर जुर्माना लगा सकते हैं। उद्योगों में भी सुरक्षा को लेकर सोच बदली है। अब ज़्यादातर ख़तरनाक प्रक्रियाओं को स्वचालित कर दिया गया है ताकि इंसानों को कम ख़तरा हो। तापमान और रसायनों के दबाव को मापने के लिए अब कारखानों में रियल टाइम निगरानी प्रणाली लगाई जाती है। यद्यपि आज भारत आर्थिक रूप से बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन भोपाल की इस घटना ने पूरी दुनिया और भारत को यह सिखा दिया है कि बिना सुरक्षा नियमों के किया गया औद्योगिक विकास अंततः महाविनाश ही लाता है।
आशा भोसले ने 'यूव स्टोलन माई हार्ट' के जरिए आर डी बर्मन को श्रद्धांजलि दी
आशा भोसले (Asha Bhosle) भारतीय सिनेमा की सबसे बहुमुखी और प्रतिष्ठित गायिकाओं में से एक हैं, जिनकी आवाज़ ने दशकों तक संगीत प्रेमियों को बांधे रखा है। उन्होंने केवल फिल्मी गीतों में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी अपनी खास पहचान बनाई।
वर्ष 2005 में उन्होंने सैन फ्रांसिस्को (San Francisco) के प्रसिद्ध क्रोनोस क्वार्टेट (Kronos Quartet) के साथ “यूव स्टोलन माई हार्ट” (you've stole my heart) एल्बम में सहयोग किया। यह एल्बम उनके पति और महान संगीतकार राहुल देव बर्मन (Rahul Dev Burman) के संगीत को नए अंदाज़ में प्रस्तुत करता है। इसमें पश्चिमी शास्त्रीय तार वाद्यों और भारतीय ताल वाद्यों का सुंदर मेल सुनाई देता है, जो इसे एक अनोखा संगीत अनुभव बनाता है।
इस एल्बम की खास बात यह है कि इसमें आशा भोसले ने उन गीतों को फिर से अपनी आवाज़ दी, जिन्हें उन्होंने पहले भी गाया था, लेकिन इस बार उन्हें एक नए रूप और गहराई के साथ प्रस्तुत किया गया। एल्बम में तबला वादक ज़ाकिर हुसैन जैसे कलाकारों का भी योगदान रहा, जिसने इसके संगीत को और समृद्ध बनाया।
“यूव स्टोलन माई हार्ट” को 2006 में ग्रैमी पुरस्कार (Grammy Award) के लिए नामांकित किया गया, जो इसकी वैश्विक सराहना का प्रमाण है। यह एल्बम दर्शाता है कि आशा भोसले की आवाज़ समय और सीमाओं से परे जाकर हर पीढ़ी और हर संस्कृति को जोड़ने की क्षमता रखती है।