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विश्व पृथ्वी दिवस पर जानें, क्या अंटार्कटिका को पर्यटन के लिए खुला होना चाहिए या नहीं?

should Antarctica be open for tourism or not

Meerut
22-04-2024 09:59 AM

आप सभी ने अंटार्कटिका (Antarctica) का नाम तो सुना ही होगा! दरअसल, इस महाद्वीप के बारे में जानने की इच्छा हर किसी को होती है और कुछ लोग तो यहां घूमने के बारे में भी सोचते हैं। हालाँकि, यहाँ जाना इतना आसान नहीं है, क्योंकि अंटार्कटिका पृथ्वी पर मौजूद सभी सात महाद्वीपों में से सबसे ठंडा महाद्वीप है। दक्षिणी ध्रुव पर स्थित इस महाद्वीप पर तेज़ ठंडी हवाएँ चलती हैं, यहाँ का तापमान हमेशा चार डिग्री से नीचे रहता है, जिससे लोगों का यहाँ रहना या घूमना बेहद मुश्किल है। तो आइए आज पृथ्वी दिवस के मौके पर अंटार्कटिका में पर्यटन की संस्कृति के बारे में जानते हैं। इसके साथ ही पर्यटन के कारण अंटार्कटिका के लिए उत्पन्न ख़तरे के विषय में भी जानते हैं। और यह भी समझते हैं कि क्या वहां की यात्रा करना पर्यावरण के लिए नैतिक है या नहीं? 1950 के दशक के उत्तरार्ध में, अंटार्कटिका में पर्यटन की शुरुआत संभवतः 500 यात्रियों द्वारा दक्षिण शेटलैंड द्वीप समूह (Shetland Islands) की भुगतान यात्रा के साथ हुई। इसके बाद 1966 में लार्स-एरिक लिंडब्लैड (Lars-Eric Lindblad) द्वारा शैक्षणिक उद्देश्य से अंटार्कटिका के लिए एक यात्री अभियान का मार्गदर्शन किया गया। 1960 के दशक में अंटार्कटिका में प्रायद्वीप को देखने का प्रमुख तरीका समुद्री पर्यटन था। वास्तव में, 1969 में लिंडब्लैड द्वारा यक़ीनन दुनिया के पहले अभियान जहाज़ के निर्माण के साथ अभियान क्रूज़ उद्योग की शुरुआत की गई।
1970 के दशक से ऑस्ट्रेलिया (Australia) और न्यूजीलैंड (New Zealand) से अंटार्कटिका में दर्शनीय स्थलों की हवाई उड़ानें शुरू हो गईं। पर्यटन की शुरुआत से पहले, अंटार्कटिका में केवल शुरुआती खोजकर्ताओं द्वारा और सील तथा व्हेलों के शिकार उद्योग के उद्देश्य से ही महाद्वीप की यात्रा की जाती थी। 1800 के दशक की शुरुआत से ही सीलों का शिकार शुरू हो गया था और 1830 तक फर सील लगभग नष्ट हो गई थी। इसके बाद 1904 में दक्षिण जॉर्जिया के ग्रिटविकेन (Grytviken, South Georgia) में व्हेलिंग स्टेशन के निर्माण के साथ व्हेल का शिकार शुरू हो गया। बाद में 1986 में, अंतर्राष्ट्रीय व्हेलिंग आयोग (International Whaling Commission) ने वाणिज्यिक रूप से सभी प्रकार के व्हेल शिकार को निलंबित कर दिया। वास्तव में शुरुआत में अंटार्कटिका में पर्यटन वहाँ के परिदृश्य के रहस्यों से प्रेरित था। अंटार्कटिका पर किसी भी देश का स्वामित्व नहीं है और अंटार्कटिका में पर्यावरण की रक्षा और वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए 1961 में अंटार्कटिक संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। वैसे तो, अंटार्कटिका में पर्यटन के लिए वीज़ा की आवश्यकता नहीं होती है लेकिन अनुमति की आवश्यकता होती है। 1991 में, सात अंटार्कटिका यात्रा संचालक एक एकल संगठन - इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ अंटार्कटिका टूर ऑपरेटर्स (International Association of Antarctica Tour Operators (IAATO) के रूप में एक साथ आए। इस समूह द्वारा अंटार्कटिका में पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा दिया जाता है और उसका अभ्यास किया जाता है। IAATO के गठन के बाद से, अंटार्कटिका में यात्रा कार्यक्रम का रिकॉर्ड रखा गया है। इस रिकॉर्ड से पता चलता है कि 1989 के बाद से अंटार्कटिक प्रायद्वीप क्षेत्र में 200 स्थलों का दौरा किया गया है। हालांकि अंटार्कटिका में पर्यटन इनमें से 35 से भी कम स्थलों पर केंद्रित है।
अंटार्कटिका में पर्यटन के लिए अधिकांशतः समुद्री यात्रा के लिए अर्जेंटीना के उशुआइया (Ushuaia in Argentina) से प्रस्थान किया जाता है। इस यात्रा की अवधि आमतौर पर 10 से 21 दिनों के बीच होती है। अंटार्कटिका में पर्यटन हर साल नवंबर और मार्च के बीच जारी रहता है। यह गर्मी का मौसम होता है जब तापमान अधिक होता है और समुद्री बर्फ़ इतनी पिघल जाती है कि क्रूज़ जहाजों की अंटार्कटिका तक पहुंच संभव हो जाती है। हालांकि अब केवल समुद्री यात्रा के द्वारा ही नहीं, बल्कि हवाई यात्रा के द्वारा भी अंटार्कटिका का दौरा किया जा सकता है। इन हवाई यात्रियों के दौरान आप अंटार्कटिका के किसी हिस्से पर भी उतर सकते हैं या उसी हवाई यात्रा से पूरे महाद्वीप का भ्रमण करके वापस आ सकते हैं। अंटार्कटिका के लिये हवाई यात्रा की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया से 1977 में हुई थी। ये उड़ानें बिना रुके महाद्वीप के ऊपर से उड़ान भरती हैं और वापस प्रस्थान हवाई अड्डे पर उतरती हैं। इन उड़ानों में लगभग 14 घंटे लगते हैं, जिसमें 4 घंटे अंटार्कटिका के ऊपर उड़ान भरी जाती है। पिछले कुछ वर्षों में संपूर्ण विश्व से पूरी तरह पृथक अंटार्कटिका के जंगल, और चरम जलवायु सभी ने इसकी बढ़ती लोकप्रियता में योगदान किया है। 1999-2000 के दशक में, अनुमानित 15,000 आगंतुकों ने समुद्री यात्राओं पर अंटार्कटिका की यात्रा की। जबकि 2009-2010 के दशक में, यह आंकड़ा दोगुना से भी अधिक हो गया। और वर्ष 2018 में अंटार्कटिका में यात्रा करने वाले लोगों की संख्या 37,000 तक पहुँच गई। 2019-2020 के बीच 73,670 आगंतुकों के साथ यहाँ आने वाले यात्रियों की संख्या में लगभग 44 प्रतिशत की वृद्धि हुई, और 2022-2023 में IAATO द्वारा अंटार्कटिका में आने वाले लोगों की संख्या 106,006 होने का अनुमान लगाया गया। 2021 तक, आगंतुक एयरबस A340 (Airbus A340) पर केवल 3 घंटे में दक्षिण अफ्रीका से अंटार्कटिका के लिए उड़ान भर सकते हैं, रनवे से बर्फ़ पर उतर सकते हैं और उड़ान भर सकते हैं।
हालांकि इससे पर्यटन उद्योग को तो बढ़ावा मिलता है, लेकिन एक वैश्विक चिंता उत्पन्न हो गई है। अंटार्कटिका में अधिक आगंतुकों के आगमन का अर्थ है अधिक प्रदूषण। जहाजों से अधिक काला कार्बन निकलता है जो बर्फ़ पर जम जाता है। इससे बर्फ़ के पिघलने की गति बढ़ जाती है। यदि देखा जाए तो यहाँ आने वाला प्रत्येक आगंतुक समय से पहले सैकड़ों टन पिघलने वाली बर्फ़ के लिए ज़िम्मेदार है। वर्ष 2022 की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रत्येक पर्यटक के आगमन से औसतन 83 टन बर्फ़ की हानि होती है। इसके अलावा एक अन्य चिंता जैव अवरोध की भी है। अंटार्कटिका में आने वाले जहाजों के पतवारों से और यात्रियों के सामान एवं कपड़ों से वन्यजीव चिपके रहते हैं। चूँकि यहाँ दुनिया भर से पर्यटक आते हैं, अंटार्कटिका का पारिस्थितिकी तंत्र, जिसमें हाल तक कोई ज्ञात आक्रामक प्रजाति मौजूद नहीं थी, इस प्रकार के हानिकारक परिवर्तनों के प्रति संवेदनशील है। आक्रामक प्रजातियाँ विशेष रूप से ख़तरनाक हैं क्योंकि अधिकांश पर्यटन बर्फ़ मुक्त तटीय क्षेत्रों में केंद्रित है जहां महाद्वीप की सबसे बड़ी स्थलीय जैव विविधता है। जलवायु गर्म होने पर गैर-देशी पौधों के वहाँ दृढ़ता से स्थापित होने की संभावना है।
हालाँकि अंटार्कटिका के अधिकांश दौरे IAATO द्वारा निर्धारित सख्त प्रोटोकॉल के तहत संचालित होते हैं, बढ़ते पर्यटन से नियमों के टूटने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। पिछले साल पहली बार अंटार्कटिका में ताज़ी गिरी बर्फ़ में प्लास्टिक की खोज की गई थी। और जलवायु परिवर्तन के कारण, अंटार्कटिका बाकी दुनिया की तुलना में पांच गुना तेजी से गर्म हो रहा है। इस स्थिति में प्रश्न उठता है कि नैतिक रूप से अंटार्कटिका की यात्रा करना कितना सही है? क्रूज़ मैपर (Cruise Mapper) द्वारा अंटार्कटिका पर की गई वास्तविक समय की ट्रैकिंग से पता चलता है कि महाद्वीप के उत्तरी सिरे पर क्रूज़ जहाज़ बर्फ़ के पिस्सू की तरह मोटे जमा हुए हैं। अंटार्कटिक पारिस्थितिकीविदों से लेकर समुद्री वैज्ञानिकों तक यहाँ बढ़ती मानव उपस्थिति के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों के बारे में चेतावनी दे रहे हैं। अंटार्कटिका में प्रति यात्री औसत CO2 उत्सर्जन 4.14 टन है जो कि एक मनुष्य द्वारा लगभग पूरे वर्ष में उत्पन्न किए जाने वाले कार्बन प्रदूषण के बराबर है। अभी तक IAATO द्वारा आगंतुकों की संख्या पर कोई सीमा लगाने का क़दम नहीं उठाया गया है। हालांकि यहाँ के लिए पर्यटन नीति में बदलाव अंटार्कटिक संधि पर हस्ताक्षर करने वाले सभी 55 सदस्य देशों को करना होगा, जो वास्तव में पर्यटन उद्योग पर प्रतिबंध, फिर चाहे वह स्वस्थ प्रतिबंध ही क्यों न हो, लगाने के किसी भी प्रयास के कारण एक अत्यंत जटिल कार्य है। अंटार्कटिका की सुंदरता इसकी शुद्धता से है। इस स्थान के अविश्वसनीय परिदृश्य तभी क़ायम रह सकते हैं जब इन पर कोई पदचिह्न न हो। यदि यहां पर्यटन को जारी रखना है, तो इस पर विचार और नियंत्रण रहना चाहिए और कोई पदचिन्ह शेष न रहें।

संदर्भ
https://rb.gy/zivvc3
https://rb.gy/pwx4ec
https://shorturl.at/euWX8

चित्र संदर्भ
1. अंटार्कटिका में पर्यटकों को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
2. अंटार्कटिका में विशाल हिमखंड को संदर्भित करता एक चित्रण (needpix)
3. पेंगुइन की तस्वीर लेती पर्यटक को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
4. अर्जेंटीना के उशुआइया को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
5. अंटार्कटिका में पिघलती हुई बर्फ को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
6. अंटार्कटिका के वृहंगम दृश्य को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)

https://prarang.in/Meerut/24042210330





ये हैं देश-दुनिया के सबसे सुंदर पक्षी, जिनकी एक झलक ही मन मोह लेती है

most beautiful bird in the world

Meerut
21-04-2024 10:10 AM

क्या आप जानते हैं, कि इस दुनिया का सबसे खूबसूरत पक्षी कौन सा है? यह सवाल अक्सर आपके मन में ज़रूर  उठता होगा और शायद ही कोई ऐसा होगा जो इस सवाल का जवाब नहीं दे पाएगा क्योंकि इस दुनिया में सभी पक्षी खूबसूरत होते हैं। लेकिन हमारे पास ऐसी अनेकों प्रजातियां हैं, जिनमें निश्चित रूप से असाधारण विशेषताएं देखने को मिलती हैं। ये असाधारण विशेषताएं उन्हें अन्य पक्षियों से अलग करती हैं। तो आइए आज जानते हैं दुनिया और हमारे देश भारत के उन चुनिंदा पक्षियों के बारे में जिनकी सुंदरता अद्भुत और अनोखी है। अपनी विशेषताओं और रंग-बिरंगी संरचना के कारण ये प्रजातियां विश्व प्रसिद्ध हैं। ये पक्षी इतने खूबसूरत हैं कि इनके बारे में जानने के बाद आपका मन करेगा कि इन्हें जीवन में एक बार ज़रूर देखना चाहिए।





संदर्भ:

https://tinyurl.com/4nnwpt4z

https://tinyurl.com/4u7crksy

https://tinyurl.com/js9aff8j

https://tinyurl.com/4cmw6bem

https://prarang.in/Meerut/24042110326





महावीर ने कैसे साबित किया कि क्षमादान ही है, महादान

How did Mahavir prove that forgiveness is great charity

Meerut
20-04-2024 10:07 AM

महावीर जयंती, जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है, जिसे जैन समुदाय के 24वें तीर्थंकर के रूप में प्रतिष्ठित "भगवान महावीर" के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। हमारे मेरठ शहर में, भी इस दिन को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दौरान मेरठ के श्री दिगंबर जैन शांतिनाथ मंदिर तीरगरान से शारदा रोड तक एक भव्य रथ यात्रा भी निकाली जाती है। संसार में दया और क्षमा का संदेश देने वाले महापुरुषों में महावीर को अग्रणी माना जाता है। उनके द्वारा दिए गए संदेश, आज भी दुनिया भर के समुदायों में सार्वभौमिक रूप से गूंजते है। आइए आज इस महावीर जयंती के शुभ अवसर पर, क्षमा के संदर्भ में दी गई उनकी गहन शिक्षाओं पर ग़ौर करें। साथ ही आज हम जैन धर्म और बौद्ध धर्म के बीच के प्रमुख अंतरों को समझने का भी प्रयास करेंगे। जैन धर्म के अंतिम और चौबीसवें तीर्थंकर, भगवान महावीर का जन्म भले ही एक मनुष्य के रूप में हुआ था, लेकिन अंततः उन्होंने ध्यान और आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से परम ज्ञान “केवल्य” प्राप्त कर लिया था, और परमात्मा के साथ एक हो गए थे। जैन समुदाय में उन्हें देवता के रूप में पूजा जाता है, और उन्हें अरिहंत या जिन के नाम से भी जाना जाता है।
तीर्थंकर एक धार्मिक शिक्षक की भांति होते हैं। जैन समुदाय में अरिहंत, आध्यात्मिकता के शिखर पर पहुंच चुके व्यक्ति को कहा जाता है, जिसने क्रोध और अहंकार जैसी आंतरिक जटिलताओं पर काबू पा लिया है।
599 ईसा पूर्व भारत के बिहार में एक राजकुमार के रूप में जन्मे महावीर ने 30 साल की उम्र में, भिक्षु बनने के लिए अपना शाही जीवन और सांसारिक संपत्ति त्याग दी। अगले बारह साल उन्होंने अपनी इच्छाओं और भावनाओं पर काबू पाते हुए गहन ध्यान में बिताए। उन्होंने कठोर तपस्या की, अक्सर लंबे समय तक उपवास किया, और इस बात को लेकर सजग रहे कि किसी भी जीवित प्राणी को नुकसान न पहुंचे। उनकी आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण धारणा, ज्ञान, शक्ति और आनंद की प्राप्ति में परिणत हुई, जिसे केवल-ज्ञान (कैवल्य) के रूप में जाना जाता है। अगले तीस वर्षों तक, महावीर ने पूरे भारत में नंगे पैर यात्रा की और उन शाश्वत सत्यों का प्रचार किया, जिनकी अनुभूति उन्होंने स्वयं की थी। उन्होंने राजाओं से लेकर आम लोगों, पुरुषों और महिलाओं, स्पृश्यों और अस्पृश्यों तक समाज के सभी वर्गों के लोगों को आकर्षित किया।
उन्होंने अपने अनुयायियों को चार भागों में संगठित किया:
1. भिक्षु (साधु),
2. नन (साध्वी),
3. आम आदमी (श्रावक),
4. आम महिला (श्राविका)
बाद में यही अनुयायी "जैन" कहलाये।
महावीर स्वामी के जीवन की कई कहानियाँ हमें सच्ची खुशी और सफलता प्राप्त करने का मार्ग प्रदर्शित करती हैं। उनके जीवन से जुड़ी एक ऐसी ही घटना "क्षमा के महत्व" पर भी प्रकाश डालती है। किवदंती के अनुसार एक बार महावीर स्वामी एक गाँव के पास जंगल में ध्यान कर रहे थे। वहीँ पर कुछ ग्रामीण भी अपनी गायों को चराने के लिए आये हुए थे। उन्होंने महावीर को गहरे ध्यान में देखा। लेकिन वे लोग तपस्या और ध्यान की अवधारणाओं से अपरिचित थे और महावीर स्वामी को पहचानने में असफल रहे। उन्होंने महावीर को भी एक साधारण मनुष्य समझ लिया, और महावीर का मज़ाक उड़ाना और उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया।
लेकिन उन लोगों के कई प्रयासों के बावजूद भी महावीर स्वामी अविचलित रहे और अपने ध्यान में गहराई से डूबे रहे। इस अपमानजनक व्यवहार को देखकर वहां के कुछ अन्य शिक्षित ग्रामीण, महावीर स्वामी को बचाने के लिए दौड़ पड़े।
उन्होंने स्वामी को पहचान लिया था और तुरंत ही अज्ञानी ग्रामीणों के कृत्य के लिए माफ़ी मांगी। महावीर स्वामी ने शांति से अपनी आँखें खोलीं और ध्यान से उनकी बातें सुनीं। बाद में उन्हें परेशान करने वाले ग्रामीणों ने भी अपनी गलती को स्वीकार करते हुए, महावीर स्वामी से माफ़ी मांगी और उनके लिए शांति से ध्यान करने के लिए एक कमरा बनाने की पेशकश की, और वादा किया कि उनकी साधना में कोई और बाधा नहीं आएगी। इसके जवाब में, महावीर स्वामी ने कहा कि वे चरवाहों को अपने बच्चों के रूप में देखते हैं। जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों द्वारा अनजाने में उन्हें नुकसान पहुँचाने पर क्रोधित नहीं होते, उसी प्रकार उनके मन में भी गाँव वालों के प्रति कोई क्रोध नहीं था। उन्होंने एक कमरे की पेशकश को अस्वीकार कर दिया, और सुझाव दिया कि धन का उपयोग गरीबों के कल्याण के लिए किया जाए। महावीर के जीवन से जुड़ी यह अहम् किवदंती हमें "क्षमा का महत्व" सिखाती है। महावीर स्वामी हमें सिखाते हैं कि दूसरों की गलतियों पर क्रोध नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, हमें शांति से उन्हें सुनना चाहिए, उनकी गलतियों को माफ़ करना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए।
महावीर की शिक्षाओं का मूल उद्देश्य लोगों को मुक्ति (मोक्ष) की ओर मार्गदर्शित करना तथा शाश्वत आनंद की स्थिति की ओर ले जाना और जन्म, जीवन तथा मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाना है। उन्होंने सिखाया कि प्रत्येक आत्मा अपने अच्छे या बुरे कर्मों से संचित कर्म परमाणुओं के कारण जटिल बंधनों में उलझी हुई है। यह बंधन आत्मा को भौतिक संपत्तियों की ओर खींचता है, जिसके परिणामस्वरूप आत्म-केंद्रित विचार, कर्म, क्रोध, घृणा, लालच और अन्य बुराइयां उत्पन्न होती हैं। और इस तरह एक व्यक्ति कर्मों में ही उलझ कर रह जाता है।
महावीर ने उपदेश दिया कि मुक्ति सही विश्वास (सम्यक-दर्शन), सही ज्ञान (सम्यक-ज्ञान), और सही आचरण (सम्यक-चरित्र) के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है।
सही आचरण के केंद्र में पांच महान व्रत हैं:
1. अहिंसा - किसी भी जीवित प्राणी को नुकसान नहीं पहुँचाना।
2. सत्यवादिता (सत्य) - केवल हानिरहित सत्य बोलना।
3. चोरी न करना (अस्तेय)
4. शुद्धता (ब्रह्मचर्य) - कामुक सुख से बचना।
5. अपरिग्रह - लोगों, स्थानों और भौतिक चीजों से पूर्ण अलगाव की स्थिति में रहना। जैन समुदाय के लोग इन प्रतिज्ञाओं के अनुसार जीने का प्रयास करते हैं। जैन भिक्षु और भिक्षुणियाँ इनका सख्ती से पालन करते हैं, जबकि आम लोग भी अपनी जीवनशैली के अनुसार इनका पालन करते हैं।
527 ईसा पूर्व में 72 वर्ष की आयु में भगवान महावीर ने पूर्ण मुक्ति की प्राप्ति कर ली थी। वह एक सिद्ध, एक शुद्ध चेतना, एक मुक्त आत्मा बन गए, और पूर्ण आनंद की स्थिति में हमेशा के लिए अमर हो गए। बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि दीपावली के दिन ही उन्होंने भी आत्मज्ञान प्राप्त किया था।
महावीर ने धर्म को सरल बनाया, इसे प्राकृतिक और जटिल अनुष्ठानों से बचाया, और भौतिक संसार के बजाय आत्मा की आंतरिक सुंदरता और सद्भाव पर ज़ोर दिया।
उन्होंने सिखाया कि एक जीवित शरीर केवल अंगों और मांस के संयोजन से कहीं अधिक है। यह आत्मा का निवास स्थान है, जिसमें पूर्ण धारणा (अनंत-दर्शन), पूर्ण ज्ञान (अनंत-ज्ञान), पूर्ण शक्ति (अनंत-वीर्य), और पूर्ण आनंद (अनंत-सुखा) की क्षमता है। महावीर ने मोक्ष के मार्ग के रूप में देवी-देवताओं की पूजा को अस्वीकार कर दिया, इसके बजाय मानव जीवन की सर्वोच्चता और सकारात्मक जीवन दृष्टिकोण के महत्व को बढ़ावा दिया। बुद्ध के विपरीत, महावीर एक नई धार्मिक व्यवस्था के संस्थापक की तुलना में मौजूदा धार्मिक व्यवस्था के सुधारक और प्रचारक अधिक थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती तीर्थंकर पार्श्वनाथ के सुस्थापित पंथ का पालन किया, लेकिन अपने समय के अनुरूप जैन धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों को पुनर्गठित किया। भारत से उत्पन्न दो महत्वपूर्ण दर्शन (बौद्ध धर्म और जैन धर्म), दोनों ही यह बात को स्वीकार करते हैं कि कर्म (हमारे कार्य) और अस्वास्थ्यकर मानसिक स्थिति, विशेष रूप से अज्ञानता ही हमें पीड़ा के चक्र में बांधती है। हालांकि इनमें से जैन और बौद्ध धर्म काफी हद तक समान नजर आते हैं, किंतु दोनों में ही कुछ मूलभूत अंतर भी हैं। जैसे कि जैन धर्म का प्रमुख लक्ष्य अहिंसा और अकर्म के माध्यम से आत्मा की मुक्ति यानी मोक्ष प्राप्त करना होता है। दूसरी ओर, बौद्ध धर्म का प्राथमिक लक्ष्य "मन को मुक्त करना" माना जाता है।
बौद्ध धर्म में ऐसा तीन उच्च प्रशिक्षणों के माध्यम से पूरा किया जा सकता है:
1. सिला (नैतिक आचरण),
2. समाधि (ध्यान की एकाग्रता),
3. पन्ना (बुद्धि)
इसलिए, एक ओर जहां जैन धर्म का प्राथमिक लक्ष्य कर्म (क्रियाओं) से मुक्ति पाना है, तो वहीं बौद्ध धर्म का मुख्य उद्देश्य अज्ञानता पर विशेष ज़ोर देने के साथ अस्वास्थ्यकर मानसिक स्थितियों (अज्ञानता) को खत्म करना है।
दार्शनिक मान्यताओं के संदर्भ में, जैन धर्म आत्मा या जीव के अस्तित्व को स्वीकार करता है। इसके बिल्कुल विपरीत, बौद्ध धर्म आत्मा की अवधारणा को मान्यता नहीं देता है। बौद्ध धर्म में आत्मा की जन्मजात और अर्जित दोनों धारणाओं को अज्ञानता का रूप माना जाता है, जो आत्मज्ञान प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न करता है। बौद्ध धर्म और जैन धर्म कई अन्य भारतीय दर्शनों के साथ, श्रमण परंपराओं का हिस्सा रहे हैं। ये गैर-ब्राह्मणवादी सन्यासी आंदोलन थे जो भारत के हिंदू धर्म जैसे वैदिक धर्मों के समानांतर, लेकिन अलग मार्ग पर चल रहे थे। श्रमण परंपरा में मुख्य रूप से जैन धर्म, बौद्ध धर्म और आजीविका जैसे अन्य धर्म शामिल हैं।

संदर्भ
https://tinyurl.com/4nt4uv3p
https://tinyurl.com/9zfxzzzb
https://tinyurl.com/4vbvkuzh
https://tinyurl.com/2s38zd32

चित्र संदर्भ
1. एक ब्राह्मण को अपना आधा वस्त्र भिक्षा में देते हुए, तीर्थंकर महावीर को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
2. अहिंसा स्थल, महरौली, नई दिल्ली में महावीर की 16 फुट, 2 इंच की पत्थर की मूर्ति को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
3. ध्यानस्थ मुद्रा में महावीर को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
4. महावीर के कैवल्य या सर्वज्ञता प्राप्त करने के दृश्य को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
5. जैन पाण्डुलिपि कल्पसूत्र को दर्शाता एक चित्रण (look&learn)
6. जैन धर्म में आत्मा को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
7. जैन दर्शन के अनुसार छः शाश्वत द्रव्यों को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
8. जैन धर्म में अहिंसा को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)

https://prarang.in/Meerut/24042010300





वाराणसी के एक अंग्रेज मानचित्रकार जेम्स प्रिंसेप ने किया था ब्राह्मी लिपि का गूढ़वाचन

James Prinsep an English cartographer from Varanasi deciphered the Brahmi script

Meerut
19-04-2024 09:41 AM

क्या आप जानते हैं कि, एक अंग्रेज विद्वान ने हमारे देश में उत्पन्न हुई, ब्राह्मी लिपि को पढ़ने का संकल्प किया था। और, केवल इसी के परिणामस्वरुप, भारतीय इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा गया। आइए आज जानते हैं कि, भारत की सबसे पुरानी भारतीय लिपि का, इस अंग्रेज विद्वान – जेम्स प्रिंसेप के साथ क्या संबंध है तथा इसका परिणाम क्या रहा। साथ ही, यह भी जानते हैं कि, गूढ़ाक्षरों को स्पष्ट की जा सकने वाली लिपियों और स्पष्ट नहीं की जा सकने वाली लिपियों के बीच क्या अंतर है।
प्राचीन लिपियों को, ‘समझने’ या उसके ‘गूढ़ाक्षरों को स्पष्ट करने’ का अर्थ अलग-अलग विद्वानों के लिए अलग-अलग होता है। एक तरफ, हर कोई इस बात से सहमत है कि, ‘मिस्र की चित्रलिपि’ को समझ लिया गया है, क्योंकि, प्रत्येक प्रशिक्षित मिस्रविज्ञानी किसी दिए गए चित्रलिपि शिलालेख के लगभग हर शब्द का एक ही अर्थ निकालता है। हालांकि, उनके व्यक्तिगत अनुवाद तब भी भिन्न हो सकते हैं, जैसा कि सभी स्वतंत्र अनुवाद करते हैं। दूसरी ओर, लगभग हर कोई इस बात से सहमत है कि, सिंधु घाटी सभ्यता और ईस्टर द्वीप (Easter Island) की लिपियां आज भी अनिर्धारित हैं। क्योंकि, कोई भी विद्वान अन्य विशेषज्ञों के बहुमत की संतुष्टि के लिए, उनके शिलालेखों का अर्थ नहीं समझ सकता है। इन चरम सीमाओं के बीच, विचारों का एक विशाल क्रम निहित है। दरअसल, किसी भी लिपि का गूढ़वाचन करने हेतु, तीन चरणों की आवश्यकता है। एक, सभी उपलब्ध शिलालेखों में संकेतों, शब्दों और संदर्भों का एक विस्तृत विश्लेषण; दूसरा, वर्तनी प्रणाली, अर्थ और भाषा संरचना के बारे में हर संभव सुराग निकालना; और तीन, ध्वन्यात्मक मूल्यों का एक प्रयोगात्मक प्रतिस्थापन देने के लिए किसी ज्ञात या प्रचलित भाषा में संभावित शब्द और विभक्तियां स्पष्ट करना। जबकि, किसी भी अज्ञात लिपि के दो तत्व आमतौर पर अपने रहस्य प्रकट कर देते हैं। पहला तत्व है कि, लिखने की दिशा: बाएँ से दाएँ या दाएँ से बाएँ; ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर; कैसी है।
दूसरा तत्व गिनती की प्रणाली यह है। अंक अक्सर चित्रात्मक रूप से बाकी पाठ से अलग दिखते हैं, खासकर यदि उनका उपयोग गणना के लिए किया जाता है।
दूसरी ओर, एक अन्य 2000 साल पुरानी भारतीय ब्राह्मी लिपि का एक अंग्रेज द्वारा, गूढ़वाचन किया गया, और इस कारण, भारतीय इतिहास में एक नया आकर्षक अध्याय जोड़ा गया। दरअसल, ब्राह्मी लिपि के अध्ययन से हमें सम्राट अशोक के बारे में पता चला, जो भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन करने वाले सबसे महान राजाओं में से एक थे। इस गूढ़वाचन से हमें प्राचीन राजा की कहानी पता चली है, जिसने पूरे भारत में चट्टानों और पत्थर के खंभों पर अपनी राजाज्ञाएं वर्णित की थी। इस अध्ययन को पूरा करने वाले अंग्रेज विद्वान, जेम्स प्रिंसेप(James Prinsep) नामक थे। वह इन प्राचीन शिलालेखों में कही गई बातों को पढ़ने के लिए कृतसंकल्प थे। इस प्रकार, सबसे पुरानी पठनीय भारतीय लिपि और अधिकांश आधुनिक भारतीय लिपियों की मातृ लिपि – ब्राह्मी के गूढ़वाचन से हमें हमारे इतिहास के बारे में पता चला है। एक दिन, प्रिंसेप ने दिल्ली स्थित फ़िरोज़ शाह कोटला के स्तंभ को देखा, और वह उससे प्रभावित हुए। उस स्तंभ के शिलालेखों में कौन से रहस्य छिपे थे, यह कोई नहीं जानता था। इसलिए, प्रिंसेप ने उन सभी शिलालेखों की सावधानीपूर्वक जांच करना शुरू किया। धीरे-धीरे प्रिंसेप ने उस शिलालेख की लिपि में एक पैटर्न ढूंढा। उन्होंने पाया कि, एक शब्द कई शिलालेखों में दोहराया गया है। वह शब्द था ‘दानम्’, जिसका अर्थ ‘दान’ था। तब प्रिंसेप को एहसास हुआ कि, इन शिलालेखों में एक राजा के बारे में बताया गया है, जो दानशूर था। और, एक बार जब उसे यह शब्द समझ में आ गया, तो उसने शेष लिपि को भी धीरे-धीरे समझ लिया।और इस तरह, भारत को ब्राह्मी वर्णमाला का ज्ञान हुआ। दरअसल, उन शिलालेखों में राजा को “देवानामपिया पियादसी” कहा गया है। इस नाम के अनुसार, प्रिंसेप ने सोचा कि, वह श्रीलंका का एक राजा था। जबकि, बाद में प्रिंसेप को पता चला कि, श्रीलंका के लोग अशोक नामक एक महान भारतीय राजा को जानते थे, जिसे “देवानामपिया पियादासी” की उपाधि से जाना जाता था। और, इस प्रकार हमें सम्राट अशोक के बारे में पता चला।
इसी विद्वान का संबंध कोलकाता और हमारे राज्य के धार्मिक शहर – वाराणसी से भी है। प्रिंसेप घाट कोलकाता की सबसे रोमांचक जगहों में से एक है। खूबसूरत हुगली नदी के किनारे पर स्थित यह स्मारक, जेम्स प्रिंसेप की याद में बनाया गया था। इसके ऊपर बना विद्यासागर सेतु इसके आकर्षण को और भी बढ़ा देता है। प्रिंसेप घाट हुगली नदी के किनारे फोर्ट विलियम(Fort William) के वॉटर गेट और सेंट जॉर्ज गेट के बीच स्थित है। यह स्मारक कोलकाता में औपनिवेशिक वास्तुकला के बेहतरीन उदाहरणों में से एक है।
जेम्स प्रिंसेप को कलकत्ता टकसाल में ‘सहायक परख मास्टर(Assistant Assay Master)’ नियुक्त किया गया था, और वह 15 सितंबर 1819 को शहर पहुंचे थे। जेम्स प्रिंसेप ने विज्ञान पढ़ा था, और उन्होंने वास्तुकला और रसायन विज्ञान का अध्ययन किया था। बाद में वर्ष 1820 में, वह बनारस की ओर स्थानीय रूप से ‘बजरा’ के नाम से प्रसिद्ध ‘बुडगेरो(Budgerow)’ (केबिन वाला एक बजरा) का कामकाज संभालने लगे। तब उन्होंने अपने उपकरण और किताबें दूसरी नाव पर लाद दिए थे। बाद में वह बनारस में टकसाल के परख मास्टर बन गए। वहां उनका काम सिक्कों में प्रयुक्त धातुओं के अनुपात और गुणवत्ता का परीक्षण करना था। टकसाल में अपने नियमित कर्तव्यों के अलावा, उन्होंने काफी निःशुल्क कार्य भी किया। वर्ष 1822 में उन्होंने बनारस(वर्तमान वाराणसी) शहर के दो सटीक मानचित्र बनाए थे। एक मानचित्र प्रशासन के लिए रोमन लिपि में था, और दूसरा स्थानीय लोगों के लिए देवनागरी लिपि में था। उन्होंने बनारस की सभी महत्वपूर्ण इमारतों को इस मानचित्र पर अंकित किया था। वह शहर के आधुनिक बुनियादी ढांचे के अग्रदूत थे। उन्होंने आलमगीर मस्जिद की मीनारों की मरम्मत भी करवाई थी। जेम्स ने खरोष्ठी लिपि को भी पढ़ा था, जो आधुनिक पाकिस्तान और अफगानिस्तान के क्षेत्रों के सिक्कों में दिखाई देती थी।

संदर्भ
https://tinyurl.com/mwr5t4v3
https://tinyurl.com/2p9zysbv
https://tinyurl.com/4en8raj6

चित्र संदर्भ
1. जेम्स प्रिंसेप और ब्राह्मी लिपि को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
2. जानवरों के साथ सिंधु लिपि के पात्रों वाली तीन स्टांप सीलों को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)
3. दिल्ली-टोपरा स्तंभ पर अलग-अलग समय में लिखे गए दो शिलालेख हैं। पहले को सम्राट अशोक के शासनकाल के दौरान तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है। दूसरे शिलालेख को 16वीं सदी के दौरान देवनागरी लिपि में लिखा गया है, जिसे इब्राहिम लोदी ने लिखवाया था। इन दोनों शिलालेखों में लगभग 1800 वर्षों का अंतराल हैं, को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)
4. जेम्स प्रिंसे द्वारा बनारस के दृश्य को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)

https://prarang.in/Meerut/24041910282





विश्वभर के संकटग्रस्त प्राकृतिक व् सांस्कृतिक विरासत स्थल, तथा इनके संरक्षण का महत्त्व

Why are some of our heritage sites endangered today

Meerut
18-04-2024 09:46 AM

हमारे देश भारत का इतिहास दुनिया में बहुत प्राचीन है। विभिन्न आक्रमणकारियों के हमलों के बाद भी, यहां का इतिहास आज भी सुरक्षित है। उत्खनन के दौरान मिले कुछ साक्ष्यों से पता चलता है कि, हमारी संस्कृति और इतिहास कितना समृद्ध और गौरवशाली रहा है। लेकिन, देश में कुछ ऐतिहासिक जगहें ऐसी भी हैं, जो समय के साथ संकटग्रस्त हो गई हैं। तो आज जब हम विश्व धरोहर दिवस मना रहे हैं, तो आइए इनके संकटग्रस्त होने का कारण जानने का प्रयास करते हैं। इसके साथ ही, आइए यह भी जानें कि, भारत और दुनिया की कौन-कौन सी धरोहरें खतरे में हैं? आज, बदलती जलवायु हमारे सामने सबसे गंभीर और सार्वभौमिक चिंता का विषय है। इसके परिणामस्वरूप होने वाले प्रभाव बुनियादी ढांचे, पारिस्थितिकी तंत्र और सामाजिक प्रणालियों पर भारी पड़ रहे हैं, जो समुदायों को आवश्यक लाभ और जीवन की गुणवत्ता प्रदान करते हैं। इसलिए, इस उभरते हुए संकट के लिए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है। विरासत के बिना, लोगों में जुड़ाव, पहचान एवं समुदाय की भावना का अभाव होता है। और, इसलिए जब जलवायु परिवर्तन उन बंधनों को ढीला करता है, तो यह हमारे समुदाय को भी ढीला कर देता है।
हमारे देश के कुछ सबसे प्रसिद्ध प्राकृतिक और मानव निर्मित आश्चर्य भी आज, संकटग्रस्त हैं। इसलिए, इससे पहले कि ये धरोहर हमेशा के लिए खतरे का सामना करें, इन जगहों को जल्द से जल्द संरक्षित करने की ज़रुरत बढ़ गई है। यहां ऐसी ही कुछ जगहों की सूची दी गई हैं। •आगरा का भव्य ताज महल: यमुना नदी के सूखने से ताज महल की नींव को खतरा पैदा हो गया है। इस ऐतिहासिक स्मारक की नींव विशाल लकड़ी के खंभों पर बनी है। और, स्मारक को अपनी जगह पर बनाए रखने के लिए, इन्हें नदी के पानी से मिलने वाली नमी की आवश्यकता होती है। जल प्रवाह में कमी के कारण, पिछले कुछ वर्षों में लकड़ी की नींव सिकुड़ गई हैं। पानी की कमी के कारण शैवाल और कीड़े भी इस नींव पर कब्ज़ा कर लेते हैं, और इसे नष्ट कर देते हैं। इसलिए, ताज महल के अस्तित्व के लिए यमुना नदी का पानी आवश्यक है। •असम का माजुली द्वीप: विश्व के कुछ सबसे बड़े नदी द्वीपों में से एक, माजुली द्वीप पहले 1200 वर्ग किमी तक फैला हुआ था। यह द्वीप 260 से अधिक पक्षी प्रजातियों का घर है, और यह एक जैव विविधता केंद्र था। आज, दुर्भाग्य से, यह तेजी से लुप्त हो रहे द्वीपों में से एक बन गया है। और इसका क्षेत्रफल 400 वर्ग किमी ही रह गया है। बड़े पैमाने पर मिट्टी के कटाव और भयानक बाढ़ के कारण द्वीप जलमग्न हो रहा है। ब्रह्मपुत्र नदी में नियमित बाढ़ से मिट्टी का क्षरण होता है, गांव बह जाते हैं और निवासी विस्थापित हो जाते हैं। इस द्वीप के कटाव की दर इतनी विनाशकारी है कि, अगले 15-20 वर्षों में पूरे द्वीप के जलमग्न होने की संभावना है। •सुंदरबन डेल्टा: सुंदरबन मैंग्रोव वनों के दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्र है, और इसमें कई लुप्तप्राय प्रजातियां रहती हैं। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और वनों की कटाई के कारण यहां के समुद्र का स्तर बढ़ गया है, जिससे सुंदरबन का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। साथ ही, कंक्रीट के जंगल बनाने के लिए अवैध कटाई, बढ़ती आबादी, अवैध शिकार और जीवाश्म ईंधन के लिए अतिक्रमण ने भी सुंदरबन को एक लुप्तप्राय जंगल बना दिया है। वास्तव में, सुंदरी नामक वृक्ष प्रजाति, जिसके नाम पर इस जंगल का नाम रखा गया है, वह खतरे में है। •किला महमूदाबाद की कोठी: 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, किला महमूदाबाद की कोठी को अंग्रेजों ने पूरी तरह से तोड़ दिया था और उसके तुरंत बाद इसे फिर से बनाया गया था। जबकि, आज यह कोठी बेहतरीन दर्जे की उर्दू और अरबी किताबों को संग्रहित किए हुए है। दुनिया भर से साहित्य, कला और कविता के विद्वान यहां आते हैं। लेकिन इस 67,650 वर्ग फुट क्षेत्र को कठोर उपेक्षा, पुराना हो जाने और भूकंपीय झटकों का सामना करना पड़ा है।
•शिमला नगर केंद्र: 19वीं सदी की शुरुआत में, शिमला नगर काफ़ी आकर्षक और सुंदर टाउन हॉल(Town hall) था। लेकिन, इस क्षेत्र में रखरखाव की कमी और अनियोजित शहरी विकास के कारण इस शहर की ऐतिहासिक सुंदरता में गिरावट आई। •हेमिस राष्ट्रीय उद्यान: यह उद्यान हिम तेंदुओं के आवास के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। वास्तव में ऐसा माना जाता है कि, हेमिस राष्ट्रीय उद्यान में दुनिया के किसी भी संरक्षित क्षेत्र की तुलना में, इन प्राणियों का घनत्व सबसे अधिक है। दुर्भाग्य से, इस राष्ट्रीय उद्यान में हिम तेंदुओं की संख्या पिछले कुछ वर्षों में घट रही है। इसलिए, जिस तरह यह प्राणी लुप्तप्राय है, उसी तरह यह उद्यान भी भारत में एक संकटग्रस्त स्थल बन गया है।
एक तरफ, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों(UNESCO World Heritage Sites) को उनके उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य के लिए सम्मानित किया जाता है। लेकिन दुख की बात यह है कि, मानवता की सामूहिक विरासत का प्रतिनिधित्व करने वाले ये अमूल्य सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर स्थल भी विभिन्न कारकों के कारण तेजी से खतरे में हैं। बड़े पैमाने पर शहरीकरण, अनियंत्रित विकास, औद्योगीकरण, जलवायु परिवर्तन और कभी-कभी आतंकवाद और युद्ध इन स्थलों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियां पैदा करते हैं। प्रदूषण, वनों की कटाई, आवास विनाश, और अस्थिर पर्यटन प्रथाएं इस खतरनाक स्थिति को और बढ़ा देती हैं। ऐसे ही कुछ स्थलों की सूची निम्नलिखित है। १.बामियान घाटी(Bamiyan Valley): विशाल हिंदू कुश पहाड़ों के बीच स्थित, बामियान घाटी सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्व की समृद्ध टेपेस्ट्री का दावा करती है। प्रतिष्ठित विशाल बुद्ध प्रतिमाओं का घर, जिसे 2001 में तालिबान द्वारा दुखद रूप से नष्ट कर दिया गया था, यह स्थल सदियों के बौद्ध प्रभाव और अफगान इतिहास का गवाह है।
२.ओकापी वन्यजीव अभ्यारण्य(Okapi Wildlife Reserve), कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य(Democratic Republic of the Congo): ओकापी वन्यजीव अभ्यारण्य जैव विविधता और प्राकृतिक आश्चर्य का एक अभयारण्य है। आज यह अवैध शिकार और वनों की कटाई के खतरों का सामना कर रहा है।
३.विरुंगा राष्ट्रीय उद्यान(Virunga National Park), कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य: विरुंगा राष्ट्रीय उद्यान, अफ्रीका का सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान, एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है जो अपने लुभावने परिदृश्य और समृद्ध जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। इस उद्यान को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिसमें अवैध शिकार, अवैध खनन और सशस्त्र संघर्ष शामिल हैं, जिससे इसके नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय समुदायों की आजीविका को खतरा है। ४.अबू मेना(Abu Mena), मिस्र(Egypt): मिस्र में अलेक्जेंड्रिया के पास स्थित अबू मेना, एक शहीद रोमन सैनिक सेंट मेनस को समर्पित एक समृद्ध ईसाई तीर्थ स्थल था। जलजमाव और नमक अतिक्रमण सहित पर्यावरणीय कारकों के कारण साइट का धीरे-धीरे पतन हो गया, जिसके कारण यह स्थान समाप्त हो गया। ५.सुमात्रा(Sumatra) के उष्णकटिबंधीय वर्षावन विरासत: सुमात्रा की उष्णकटिबंधीय वर्षावन विरासत में इंडोनेशियाई द्वीप सुमात्रा पर तीन राष्ट्रीय उद्यान शामिल हैं। यह क्षेत्र अवैध कटाई, आवास विखंडन और अतिक्रमण से महत्वपूर्ण खतरों का सामना कर रहा है, जो संरक्षण कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता को उजागर करता है।
६.अत्सिनानाना(Atsinananaa) के वर्षावन: मेडागास्कर के पूर्वी तट पर स्थित, अत्सिनाना के वर्षावनों में छह संरक्षित क्षेत्र शामिल हैं जो द्वीप की असाधारण जैव विविधता और विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र को प्रदर्शित करते हैं

संदर्भ
https://tinyurl.com/5n8aek9s
https://tinyurl.com/mr3wtarm
https://tinyurl.com/3zjn9c22
https://tinyurl.com/4czpbk4r

चित्र संदर्भ
1. सुंदरबन डेल्टा को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
2. विश्व धरोहर के लोगो को संदर्भित करता एक चित्रण (flickr)
3. ताजमहल को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
4. असम का माजुली द्वीप को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
5. सुंदरबन डेल्टा को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
6. किला महमूदाबाद की कोठी को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
7. हेमिस राष्ट्रीय उद्यान को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
8. बामियान घाटी को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
9. अबू मेना को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
10. सुमात्रा को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)

https://prarang.in/Meerut/24041810309





राम नवमी विशेष: कई समानताओं के बावजूद चैत्र और शारदीय नवरात्रि में होते हैं, बड़े अंतर

Despite many similarities and Chaitra and Shardiya Navratri occur

Meerut
17-04-2024 09:37 AM

इस वर्ष, चैत्र नवरात्रि 9 अप्रैल, 2024 से शुरू हो चुकी है और 17 अप्रैल, 2024 के दिन राम नवमी का भव्य उत्सव मनाया जाएगा। हिंदू परंपरा में, राम नवमी और नवरात्रि दोनों का ही विशेष महत्व है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रामनवमी और चैत्र नवरात्रि के बीच में क्या संबंध है? और चैत्र नवरात्रि, शरद नवरात्रि से किस प्रकार भिन्न है? चलिए आज, रामनवमी के अवसर पर, इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं और नवरात्रि के दौरान आदिशक्ति के नौ रूपों की पूजा करने की परंपरा के बारे में भी जानते हैं। नवरात्रि, एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार, जिसे साल में दो बार मनाया जाता है। दोनों पर्वों का अपना अनूठा महत्व होता है। पहला, पर्व जिसे चैत्र नवरात्रि के रूप में जाना जाता है, हिंदू नव वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है। दूसरी, शारदीय नवरात्रि, आश्विन माह में होती है। बंगाल में शारदीय नवरात्रि को दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त, आश्विन माह की नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है। वही पौष और आषाढ़ माह में नवरात्रि का त्यौहार आता हैं। जिसे गुप्त नवरात्रि कहा जाता है, लेकिन उस नवरात्रि में तंत्र साधना की जाती है, गृहस्थों और पारिवारिक सदस्यों के लिए केवल चैत्र और शारदीय नवरात्रि ही सर्वोत्तम मानी जाती है। चैत्र नवरात्रि:
चैत्र नवरात्रि नौ दिवसीय हिंदू त्योहार होता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।
महत्व: हिंदू संस्कृति में चैत्र नवरात्रि का बड़ा ही महत्व है। यह अवधि नवीनीकृत ऊर्जा, सकारात्मकता और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक मानी जाती है। इस दौरान सभी भक्त देवी दुर्गा से आशीर्वाद मांगते हैं, जिनकी दिव्य शक्तियाँ सुरक्षा, शक्ति और समृद्धि का प्रतिनिधित्व करती हैं।
उपवास: नवरात्रि के दौरान उपवास करना आम बात है। इस दौरान भक्त अपने शरीर और मन को शुद्ध करने के लिए कुछ खाद्य पदार्थों (विशेषतौर पर मांसाहार) से परहेज करते हैं।
पूजा: चैत्र नवरात्रि के दैनिक अनुष्ठानों में देवी की मूर्ति या छवि के सामने फूल, फल, धूप चढ़ाना और दीपक जलाना शामिल है। साथ ही इस दौरान देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतिनिधित्व करने वाली युवा बालिकाओं को भी भोग लगाया जाता है। इस दौरान उनके पैर धोए जाते हैं और उनसे आशीर्वाद मांगा जाता है। गरबा और डांडिया रास भी इस अवधि के प्रमुख आकर्षण रहते हैं। नवरात्रि का प्रत्येक दिन एक विशिष्ट रंग से मेल खाता है
शारदीय नवरात्रि: शारदीय नवरात्रि, नौ दिनों तक चलने वाला एक भव्य उत्सव है। शारदीय नवरात्रि, आश्विन-शुक्ल पक्ष के बीच पड़ती है और इसे पूरे भारत में मनाया जाता है।
महत्व: यह त्यौहार माँ दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक चली लड़ाई का प्रतीक है, जिसकी परिणति दसवें दिन महिषासुर का सिर काटने के साथ हुई। इसी घटना के बाद माँ दुर्गा को 'महिषासुरमर्दिनी' की उपाधि मिली। इस दौरान भक्त भी माँ के नौ रूपों की पूजा करते हैं, जिनमें दुर्गा, भद्रकाली, जगदंबा और अन्य देवियाँ शामिल हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार, स्वयं भगवान राम ने भी रावण को हराने के लिए देवी दुर्गा के सभी नौ रूपों की पूजा की थी। दसवें दिन (विजयादशमी) भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी। चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि, दोनों ही अलग-अलग रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों के साथ मनाए जाते हैं। चैत्र नवरात्रि के दौरान कठोर ध्यान और उपवास पर ज़ोर दिया जाता है, और इसे मुख्य रूप से महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में मनाया जाता है। यह त्यौहार भगवान राम के जन्म के उपलक्ष्य में राम नवमी के साथ समाप्त होता है।
इसके विपरीत, शारदीय नवरात्रि के अवसर पर सात्विक साधना, नृत्य और उत्सव आयोजित किये जाते हैं,और इसे गुजरात और पश्चिम बंगाल में प्रमुखता से मनाया जाता है। यह त्यौहार महानवमी के साथ समाप्त होता है, जिसके बाद विजय दशमी आती है, जो महिषासुर पर माँ दुर्गा की और रावण पर भगवान राम की विजय का प्रतीक है। इस अवधि के दौरान, बंगाल में शक्ति पूजा के रूप में दुर्गा पूजा मनाई जाती है, और गुजरात में गरबा कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
माना जाता है कि चैत्र नवरात्रि मानसिक स्थिति को मजबूत करती है और आध्यात्मिक आकांक्षाओं को पूरा करती है। वहीं शारदीय नवरात्रि सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति से जुड़ी है। हालांकि अपने मतभेदों के बावजूद, दोनों ही त्योहार दिव्य स्त्री शक्ति, का सम्मान करते हैं, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। माँ आदिशक्ति, हिंदू त्रिमूर्ति, त्रिमूर्तियों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) के लिए मौलिक ऊर्जा स्रोत मानी जाती हैं। त्रिमूर्तियों की संयुक्त शक्ति उनके आध्यात्मिक विकास के शिखर का प्रतिनिधित्व करती है।
ईश्वर के सार के रूप में, यह ऊर्जा, देवी माँ का प्रतीक मानी जाती है। वैदिक परंपराओं के अनुसार, प्रकृति, या प्राकृतिक ऊर्जा, अहंकार चेतना के माध्यम से आत्म-जागरूकता को बढ़ावा देती है। यह अहंकार तीन गुणों से आकार लेता है:
- पवित्रता (सत्व),
- गतिविधि (रजस),
- जड़ता (तमस)
नवरात्रि को पूरे भारत में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। पूर्व में, मुख्य रूप से माँ काली की पूजा की जाती है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु के सातवें अवतार भगवान राम का जन्म चैत्र माह के शुक्ल पक्ष के दौरान चैत्र नवरात्रि के नौवें दिन (नवमी तिथि) को हुआ था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि चैत्र नवरात्रि, देवी माँ को समर्पित त्योहार के रूप में भगवान राम के जन्म से पहले भी मनाया जाता था। हालाँकि, जब भगवान राम का जन्म चैत्र माह में हुआ, तो देवी के साथ उनकी पूजा करने की परंपरा भी शुरू हुई। इसी कारण, दोनों त्योहारों को जोड़ते हुए, चैत्र नवरात्रि रामनवमी पर समाप्त होती है। एक तरह से चैत्र नवरात्री का यह अंतिम दिन, देवी के विभिन्न रूपों के पूजन के पश्च्यात, भगवान विष्णु के सातवें अवतार, एक उत्कृष्ट आचरण वाले सर्वश्रेष्ठ पुरुष भगवान श्री राम के जन्म को चिंहित करता है। वह प्रभु श्री राम, जिनका नाम और जीवन स्वयं में ही आध्यात्मिक विकास और देवी की परम शक्ति के शिखर को आत्मसात करता है।
सनातन धर्म में नवरात्रि को एक भव्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जहां भक्त नौ दिनों तक देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा धरती पर अवतरित होती हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं।

संदर्भ
https://tinyurl.com/2cb6fp4c
https://tinyurl.com/3xe2hdka
https://tinyurl.com/5eepsf8b

चित्र संदर्भ
1. चैत्र और शारदीय नवरात्रि के मूल अंतर को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia, snl)
2. नवरात्री उत्सव को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
3. माँ दुर्गा के 'महिषासुरमर्दिनी' स्वरूप को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
4. माँ दुर्गा को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
5. गरबा नृत्य को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)
6. राजा दशरथ के साथ प्रभु श्री राम और उनके भाइयों को दर्शाता एक चित्रण (getarchive)

https://prarang.in/Meerut/24041710292





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