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आख़िर 22 अप्रैल को ही क्यों मनाया जाता है ‘विश्व पृथ्वी दिवस?

why is World Earth Day celebrated only on 22 April

Lucknow
22-04-2024 10:05 AM

आकाश में सैकड़ों आकाशगंगाएँ हैं जिनमें हजारों-लाखों ग्रह मौजूद हैं। आकाशगंगा में हमारी पृथ्वी ही एक मात्र ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन संभव है। दुनिया भर में प्रत्येक वर्ष 22 अप्रैल को ‘विश्व पृथ्वी दिवस’ (World Earth Day) के रूप में मनाया जाता है। पृथ्वी दिवस हमारे ग्रह को समर्पित एक अंतर्राष्ट्रीय दिवस है। यह पर्यावरण की ओर ध्यान आकर्षित करता है और इसके संरक्षण और स्थिरता को प्रोत्साहित करता है। इस वर्ष ‘विश्व पृथ्वी दिवस’ का यह 54वां उत्सव होगा। तो आइए इस मौके पर जानते हैं कि विश्व पृथ्वी दिवस क्यों मनाया जाता है, और इस दिवस को मनाने के पीछे का इतिहास और उद्देश्य क्या हैं। इसके साथ ही यह भी जानते हैं कि अप्रैल माह की 22 तारीख को ही इस दिन के लिए क्यों चुना गया? प्रत्येक वर्ष 22 अप्रैल को 'विश्व पृथ्वी दिवस' 1970 के आधुनिक पर्यावरण आंदोलन की वर्षगांठ के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य पर्यावरणीय मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाना और हमारे ग्रह की रक्षा के लिए संरक्षण प्रयासों को बढ़ावा देना है। यह दिवस हमें हमारे पृथ्वी ग्रह की देखभाल करने और भावी पीढ़ियों के लिए इसकी एवं इसकी प्रजातियों की रक्षा करने के हमारे उत्तरदायित्व की याद दिलाता है। यह दिवस हमें यह भी याद दिलाता है कि एक सुरक्षित एवं पर्यावरणीय अनुकूल दुनिया के निर्माण के लिए व्यक्तियों, व्यवसायों और सरकारों को एक साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है। जलवायु संकट के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने और पर्यावरण की रक्षा के लिए लोगों के व्यवहार में नीतिगत बदलाव को प्रेरित करने के उद्देश्य से हर साल 22 अप्रैल को, दुनिया भर में लगभग 1 अरब लोग इस दिन को कार्रवाई के दिन के रूप में पृथ्वी दिवस पर भाग लेते हैं। अब इसे दुनिया में सबसे व्यापक रूप से मनाए जाने वाले धर्मनिरपेक्ष अनुष्ठान के रूप में मान्यता प्राप्त है। पहली बार 'विश्व पृथ्वी दिवस' वर्ष 1970 में मनाया गया था और तब से यह 190 से अधिक देशों में मनाया जाने वाला एक वैश्विक कार्यक्रम बन गया है। पृथ्वी पर सबसे बड़े नागरिक कार्यक्रम के रूप में, इस दिवस की शुरुआत पर्यावरण की रक्षा के लिए किए गए पहले आंदोलन के साथ हुई। नदियों के जल के गंभीर रूप से प्रदुषित होने एवं तेल रिसाव, और धुंध के कारण निरंतर आग लगने की घटनाओं से पर्यावरण के लिए उत्पन्न संकट के प्रति ‘पृथ्वी दिवस’ एक सामूहिक प्रतिक्रिया थी। उस दौरान अमेरिका की आबादी का लगभग 10% अर्थात बीस मिलियन अमेरिकी पर्यावरणीय अज्ञानता का विरोध करने के लिए 22 अप्रैल, 1970 को सड़कों, कॉलेज परिसरों और बाज़ारों में उतर आए। इन प्रदर्शनों के बीच, प्रदर्शनकारियों ने न्यूयॉर्क (New York) शहर के आमतौर पर हलचल वाले फिफ्थ एवेन्यू (Fifth Avenue) को पूरी तरह बंद कर दिया, जबकि बोस्टन (Boston) में छात्रों ने लोगान हवाई अड्डे (Logan Airport) पर "डाई-इन" (die-in) आयोजित किया। युद्धोपरांत तेल रिसाव, फैक्ट्री प्रदूषण और अन्य पारिस्थितिकी ख़तरे बढ़ रहे थे, उन्हें रोकने के लिए कोई क़ानून नहीं था। इस प्रकार के विरोध प्रदर्शनों से अमेरिकी जीवन के सभी क्षेत्रों के लोग पर्यावरण की रक्षा के लिए एक साथ सामने आये। अनियंत्रित पर्यावरणीय विनाश के बढ़ते स्तर के बारे में चिंतित, विस्कॉन्सिन (Wisconsin ) के जूनियर सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन (Gaylord Nelson) ने पर्यावरणीय खतरों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए 1969 में पूरे अमेरिका में विश्वविद्यालय परिसरों में इस विषय में शिक्षण की एक श्रृंखला का सुझाव दिया। शिक्षण आयोजित करने के लिए नेल्सन के साथ कांग्रेसी पीट मैक्लोस्की (Pete McCloskey) और डेनिस हेस (Denis Hayes) भी शामिल हुए, और शीघ्र ही यह कार्यक्रम छात्र आबादी से परे व्यापक हो गया। पृथ्वी दिवस के प्रदर्शनों ने अमेरिकी नीति पर एक अमिट छाप छोड़ी। 1970 के अंत तक, ‘अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी’ (US Environmental Protection Agency) का गठन हो गया और पर्यावरण की रक्षा के उद्देश्य से कई कानूनों का गठन किया गया। इनमें राष्ट्रीय पर्यावरण शिक्षा अधिनियम, व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य अधिनियम तथा स्वच्छ वायु अधिनियम शामिल हैं। पानी की गुणवत्ता और लुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा और हानिकारक रसायनों और कीटनाशकों के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए भी क़ानून पेश किए गए। 1990 में पृथ्वी दिवस अमेरिका से आगे बढ़ गया। 141 देशों के लगभग 200 मिलियन लोग उस वर्ष दुनिया भर में पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने के प्रयासों में शामिल हुए। इसके बाद 1992 में ब्राज़ील के रियो डी जनेरियो (Rio de Janeiro, Brazil) में पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा "पृथ्वी शिखर सम्मेलन", का आयोजन किया गया। 2016 में, संयुक्त राष्ट्र (United Nations) ने 22 अप्रैल को ‘पृथ्वी दिवस’ के रूप में चुना जब जलवायु परिवर्तन पर ऐतिहासिक ‘पेरिस समझौते’ (Paris Agreement) पर हस्ताक्षर किए गए थे। आज 'विश्व पृथ्वी दिवस' के माध्यम से दुनिया भर के नागरिक और कार्यकर्ता ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) और नवीकरणीय ऊर्जा जैसी पर्यावरणीय चिंताओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने और कार्रवाई करने के लिए एक मंच पर एक साथ सामने आते हैं। आज, ‘पृथ्वी दिवस नेटवर्क’ (Earth Day Network (EDN) के माध्यम से साल भर 190 देशों में 20,000 से अधिक भागीदार और संगठन एकजुट होकर कार्य करते हैं। यह मिशन इस आधार पर स्थापित किया गया है कि जाति, लिंग, आय या भूगोल की परवाह किए बिना सभी लोगों को एक स्वस्थ, टिकाऊ वातावरण का नैतिक अधिकार है। पृथ्वी दिवस नेटवर्क शिक्षा, सार्वजनिक नीति और सक्रियता अभियानों के माध्यम से इस मिशन को आगे बढ़ाता है।
पृथ्वी दिवस नेटवर्क निम्नलिखित मुख्य लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए कार्य करता है:
- जलवायु परिवर्तन, हरित विद्यालय और पर्यावरणीय पाठ्यक्रम, हरित नौकरियाँ और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे मुद्दों को शामिल करके पर्यावरण के अर्थ को व्यापक बनाना;
- दुनिया भर में स्थानीय, राज्य, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर नागरिक सहभागिता के अवसर प्रदान करके आंदोलन में विविधता लाना। यह मानते हुए कि जलवायु परिवर्तन हमारे सबसे कमज़ोर नागरिकों को सबसे पहले और सबसे गंभीर रूप से प्रभावित करता है, EDN अक्सर कम आय वाले समुदायों के साथ उनकी आवाज़ और मुद्दों को आंदोलन में लाने के लिए काम करता है।
- सभी नागरिकों को पर्यावरण आंदोलन में सक्रिय होने के अवसर प्रदान करने के लिए भागीदार संगठनों के साथ काम करके समुदायों को संगठित करना। इस वर्ष के पृथ्वी दिवस का वैश्विक विषय 'ग्रह बनाम प्लास्टिक' ('Planet vs. Plastics') निश्चित किया गया है, जिसका उद्देश्य मानव स्वास्थ्य के लिए प्लास्टिक के ख़तरे को पहचान कर इसके उपयोग में कटौती लाना है। इसके माध्यम से 2040 तक प्लास्टिक के उत्पादन में 60% की कटौती की मांग की जा रही है। इस वर्ष 23 अप्रैल से 29 अप्रैल 2024 तक, दुनिया भर की सरकारें और गैर सरकारी संगठन 'संयुक्त राष्ट्र वैश्विक प्लास्टिक संधि' (United Nations Global Plastic Treaty) की शर्तों पर बातचीत करने के लिए ओटावा (Ottawa) में एकत्र होने वाले हैं।

संदर्भ
https://rb.gy/9h7zvt
https://rb.gy/x2fhm3
https://rb.gy/iou3mm

चित्र संदर्भ
1. विश्व पृथ्वी दिवस को संदर्भित करता एक चित्रण (Needpix)
2. विश्व पृथ्वी दिवस लेख को संदर्भित करता एक चित्रण (प्रारंग चित्र संग्रह)
3. प्रदूषण फैलाते कारखाने को संदर्भित करता एक चित्रण (getarchive)
4. अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के झंडे को दर्शाता एक चित्रण (studentsforlifeaction)
5. विश्व पृथ्वी दिवस को मनाते नासा के अधिकारीयों को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
6. प्लास्टिक प्रदूषण को संदर्भित करता एक चित्रण (flickr)

https://prarang.in/Lucknow/24042210329





भारत और दुनिया के कुछ दुर्लभ व अनोखे पक्षी, जो आसानी से सबको नहीं दीखते

rare and unique birds of India and the world

Lucknow
21-04-2024 10:26 AM

हम जानते हैं कि दुनिया भर में पक्षियों की कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं। अगर कुल प्रजातियों की बात करें तो पूरी दुनिया में 9,000 से ज्यादा पक्षियों की प्रजातियां मौजूद हैं। इनमें से 1,000 से भी अधिक पक्षी प्रजातियां केवल भारत में ही मौजूद हैं। ये प्रजातियां विभिन्न प्रकार की जैव विविधता के साथ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पाई जाती हैं। इन पक्षियों को देखने के लिए हर साल बड़ी संख्या में पक्षी प्रेमी देश के अलग-अलग राज्यों में पहुंचते हैं। कुछ पक्षियों की प्रजातियाँ भारत में मौजूद हैं, जबकि कुछ पक्षी प्रवासी पक्षियों के रूप में विदेशों से यहाँ पहुँचते हैं। तो आइए आज हम भारत और दुनिया के कुछ दुर्लभ पक्षियों को देखें और खोजें जिन्हें हममें से कई लोगों ने पहले कभी नहीं देखा होगा।







संदर्भ:

https://tinyurl.com/yckmnzcu

https://tinyurl.com/mr3k2npz

https://tinyurl.com/txassesy

https://tinyurl.com/bdhzfdu7

https://prarang.in/Lucknow/24042110327





आज महावीर जयंती के अवसर पर जैन धर्म की गूढ़ शिक्षाओं को अंगीकार करते हैं

Today on the occasion of Mahavir Jayanti we embrace the esoteric teachings of Jainism

Lucknow
20-04-2024 10:13 AM

भगवान महावीर को समर्पित महावीर जयंती, पूरे भारत देश के साथ हमारे लखनऊ में भी हर्षोल्लास और भव्यता के साथ मनाई जाती है। इस दौरान इंदिरा नगर के जैन मंदिर से चांदी के रथ पर सवार भगवान महावीर की एक भव्य शोभा यात्रा शुरू होती है। हालाँकि, यह हमारे शहर में आयोजित होने वाला एकमात्र जुलूस नहीं है। इसी तरह की शोभा यात्रा चारबाग, डालीगंज, यहियागंज, गोमतीनगर, गुडम्बा, आशियाना चौक और सहादतगंज सहित शहर के विभिन्न हिस्सों में भी आयोजित की जाती हैं। अपनी कठोर तपस्या के लिए जाने जाने वाले, भगवान महावीर ने अपनी इंद्रियों पर काबू पाया और मुक्ति प्राप्त की। लेकिन उन्होंने इस सबसे कठिन काम को कैसे पूरा किया? हम उनकी यात्रा से क्या सीख सकते हैं? और भगवान महावीर हम सबके लिए कौन सा सार्वभौमिक संदेश और सिद्धांत छोड़ गये? ये सभी प्रश्नों के उत्तर जानना वाकई में दिलचस्प हैं। दुनिया भर में जैन समुदाय के लोग हर वर्ष महावीर जयंती के अवसर को बड़े ही उत्साह के साथ मनाते हैं। आज ही के दिन जैन धर्म के अंतिम और 24वें तीर्थंकर (प्रबुद्ध शिक्षक) भगवान महावीर का जन्म हुआ था। यह दिवस धर्म, विश्व शांति और सद्भाव कायम रखने की प्रेरणा देता है। साथ ही आज का दिन जैन दर्शन का पालन करते हुए सभी जीवित प्राणियों को कम से कम नुकसान पहुंचाने के लिए भी प्रेरित करता है। इस पवित्र अवसर पर, जैन समुदाय के लोग कई स्थानों में आयोजित होने वाली जुलूस (रथयात्रा) में भाग लेते हैं, मंदिरों में जाते हैं, अभाग्यशाली लोगों को दान देते हैं, ध्यान करते हैं और भगवान महावीर के सम्मान में भजन गाते हैं।
हालांकि भगवान महावीर के बारे में माना जाता है कि वह प्राचीन साम्राज्य वैशाली में राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के घर पैदा हुए थे, लेकिन उनकी वास्तविक जन्मतिथि हमेशा से विवादित मानी जाती है। श्वेतांबर जैन मानते हैं कि महावीर का जन्म 599 ईसा पूर्व में हुआ था, जबकि दिगंबर जैनों के अनुसार महावीर का जन्म 615 ईसा पूर्व में हुआ था। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, उनका जन्म चैत्र महीने के 13वें दिन हुआ था। महावीर ने 30 साल की आयु में, अपनी सांसारिक संपत्ति त्याग दी और एक भटकते हुए तपस्वी के रूप में आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया। किंवदंतियों के अनुसार गृह त्याग करने के मात्र 12 साल के बाद ही उन्होंने कैवल्य या सर्वज्ञता हासिल कर ली थी।
भगवान् महावीर ने अपने पूरे जीवनकाल में अहिंसा, सत्य, चोरी न करने, शुद्धता और अपरिग्रह को बढ़ावा दिया। उन्होंने सिखाया कि प्रत्येक जीवित प्राणी में प्रेम, करुणा और सम्मान की पात्र आत्मा होती है। उन्होंने सरल, शांतिपूर्ण जीवन के गुणों पर ज़ोर दिया।
जैन धर्म के अनुयायियों के लिए, हिंदू धर्म में रोशनी के त्योहार के रूप में जानी जाने वाली "दीपावली" भी विशेष महत्व रखती है। ऐसा इसलिए है क्यों कि जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर "भगवान महावीर" को आज ही के दिन मोक्ष अर्थात पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्राप्त हुई थी। इस अवसर पर भक्त, जैन मंदिरों में इकट्ठा होते हैं, अपने देवता के सम्मान में उन्हें लड्डू चढ़ाते हैं और दीये जलाते हैं। परंपरा के अनुसार, भगवान महावीर ने अपना अंतिम उपदेश "जिसे उत्तराध्ययन के नाम से जाना जाता है।" दिवाली की रात तक दिया था। आधी रात को, उन्होंने अपना नश्वर शरीर छोड़ दिया और मोक्ष की प्राप्ति कर ली। जैनियों में दीपावली को लेकर एक दिलचस्प मान्यता है, जिसके अनुसार उनके मोक्ष के समय उनके निकट 18 उत्तरी भारतीय राजा उपस्थित थे। उन सभी ने सामूहिक रूप से दीपक जलाकर अपने गुरु के ज्ञान का प्रतीक बनाने का निर्णय लिया, जिस कारण इस महत्वपूर्ण अवधि का नाम "दीपावली" पड़ा।
जैन धर्म में दीपक जलाने का कार्य अपने आप में गहरा दार्शनिक अर्थ रखता है। यह लोगों को भगवान महावीर द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर अपनी आंतरिक दृष्टि को जागृत करने के लिए प्रेरित करता है। हिंदुओं के समान, जैन व्यवसायी भी दिवाली के दिन अपने वार्षिक खाते बंद कर देते हैं और नई खाता पुस्तकों के लिए एक साधारण पूजा (अनुष्ठान पूजा) करते हैं। इस प्रकार महावीर के जीवन और मृत्यु दोनों से ही हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। लेख में आगे महावीर द्वारा प्रदत्त कुछ बहुमूल्य शिक्षाओं की सूची दी गई है:
आत्मा और कर्म में विश्वास:
भगवान् महावीर का मानना था कि इस संसार में सभी चीजें भौतिक और आध्यात्मिक तत्वों का मिश्रण है। हालांकि प्रत्येक भौतिक इकाई अस्थायी है, जबकि आध्यात्मिक इकाई शाश्वत यानी अमर है। उन्होंने सुझाव दिया कि आत्मा कर्मों से बंधी हुई है, लेकिन कर्म बल से मुक्त हुआ जा सकता है। जैसे-जैसे कर्मों का ह्रास यानी कर्मों में कमी आती है, वैसे-वैसे आत्मा का अंतर्निहित मूल्य भी स्पष्ट हो जाता है। जब आत्मा अनंत महानता तक पहुँचती है, तो अनंत ज्ञान, शक्ति और आनंद से युक्त एक शुद्ध आत्मा, परमात्मा बन जाती है।
निर्वाण : महावीर के अनुसार जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य ही "मोक्ष" है। उन्होंने पाँच प्रतिज्ञाओं के प्रति जोर दिया:
1. अहिंसा
2. सच्चाई (सत्य)
3. अस्तेय
4. शुद्धता (ब्रह्मचर्य)
5. अपरिग्रह
ईश्वर में अविश्वास: महावीर, ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे या इस बात पर विश्वास नहीं करते थे कि ईश्वर ने दुनिया बनाई है। उनका मानना था कि ब्रह्मांड शाश्वत है और पदार्थ बस अपना रूप बदलता है। उनका मानना था कि मानव मुक्ति किसी बाहरी सत्ता पर निर्भर नहीं है और मनुष्य स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता हैं। उन्होंने पीड़ा और दुःख को कम करने के लिए तपस्या और आत्म-पीड़ा के जीवन की वकालत की, तथा त्याग को ही मोक्ष का सर्वोत्तम मार्ग माना।
वेदों की अस्वीकृति: जैन धर्म ने वेदों के अधिकार को अस्वीकार कर दिया और हिंदुओं के बलि अनुष्ठानों की उपेक्षा की।
अहिंसा: महावीर ने अहिंसा के सिद्धांत पर बहुत ज़ोर दिया। उनका मानना था कि जानवरों, पौधों और यहां तक कि पत्थरों और चट्टानों जैसी निर्जीव वस्तुओं सहित सभी प्राणियों में जीवन होता है। हमें किसी को भी विचार, शब्द या कर्म से हानि नहीं पहुंचानी चाहिए।
महिलाओं को स्वतंत्रता: महावीर ने महिलाओं की स्वतंत्रता की वकालत की और माना कि उन्हें भी निर्वाण प्राप्त करने का अधिकार है। जैन संघ में महिलाओं को अनुमति दी गई, और कई सरमिनी और श्राविका बन गईं।

संदर्भ
https://tinyurl.com/pxfzm2de
https://tinyurl.com/43x2jtxt
https://tinyurl.com/2cur7m96

चित्र संदर्भ
1. महावीर एवं जैन धर्म के गूढ़ संदेशों को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
2. कल्पसूत्र में महावीर के जन्म के दृश्य को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
3. महावीर के कैवल्य या सर्वज्ञता प्राप्त करने के दृश्य को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
4. जैन प्रतीक को दर्शाता एक चित्रण (worldhistory)
5. जैन मंदिर में अहिंसा के प्रतीक चित्र को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)

https://prarang.in/Lucknow/24042010299





क्या प्राचीन भारतीय ‘सिंधु लिपि’ से ही हुई है, ‘ब्राह्मी लिपि’ की उत्पत्ति?

Did Brahmi script originate from the ancient Indian Indus script

Lucknow
19-04-2024 09:45 AM

क्या आप जानते हैं कि, भारतीय उपमहाद्वीप पर सबसे पहली ज्ञात लेखन प्रणाली ‘सिंधु लिपि’ है। इसका निर्माण सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान हुआ था। दूसरी ओर, हम प्राचीन लेखन प्रणाली के तौर पर ‘ब्राह्मी लिपि’ का भी नाम सुनते हैं। तो क्या ब्राह्मी और सिंधु लिपियों का एक दूसरे से कोई संबंध है? या फिर, क्या ‘सिंधु लिपि’ से ही ‘ब्राह्मी लिपि’ की उत्पत्ति हुई है? आइए, आज इस लेख के माध्यम से जानते हैं।
सिंधु लिपि, जिसे हड़प्पा लिपि के रूप में भी जाना जाता है, सिंधु घाटी सभ्यता द्वारा निर्मित कुछ लेखन प्रतीकों का एक संग्रह है। सिंधु लेखन के उदाहरण मुहरों और मुहर छापों, मिट्टी के बर्तनों, कांस्य उपकरणों, पत्थर से बनी चूड़ियों, हड्डियों, सीपियों, करछुल, हाथी के दांत और स्टीटाइट(Steatite), कांस्य या तांबे से बनी छोटी टिकियों पर पाए गए हैं। वर्गाकार स्टांप सीलें(Stamp seals) भी सिंधु लेखन साधनों का प्रमुख रूप हैं। वे आम तौर पर एक इंच वर्ग (2.54 सेंटीमीटर) के होते हैं, जो शीर्ष पर लिपि और केंद्र में एक पशु आकृति प्रदर्शित करते हैं। वे मुख्य रूप से स्टीटाइट से बने होते हैं। उनमें से कुछ सीलों में चिकनी कांच जैसी दिखने वाली सामग्री की एक परत शामिल होती है। लेकिन, चांदी, फ़ाइनेस(Faience) और कैल्साइट(Calcite) से बनी मुहरों के भी उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं।
कुछ अनुमानों के अनुसार, तब कुछ मुहरों का उपयोग ताबीज या तावीज़ के रूप में किया गया होगा। लेकिन, पहचान के लिए एक चिन्ह के रूप में उनका व्यावहारिक कार्य भी था। चूंकि, प्राचीन काल में लेखन, आम तौर पर लेनदेन को रिकॉर्ड करने और नियंत्रित करने की कोशिश करने वाले अभिजात वर्ग से जुड़ा होता है, इसलिए यह भी माना जाता है कि, सिंधु लिपि का उपयोग एक प्रशासनिक उपकरण के रूप में किया जाता था। व्यापारियों के बीच व्यापार किए जाने वाले सामानों के गठ्ठो से जुड़े मिट्टी के टैग पर भी इस लिपि का उपयोग किए जाने के उदाहरण हैं। इनमें से कुछ मिट्टी के टैग सिंधु घाटी के बाहर, मेसोपोटामिया क्षेत्र(Mesopotamia region) में भी पाए गए हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि, प्राचीन काल में कितनी व्यापक वस्तुओं की आवाजाही होती थी। सिंधु लिपि का उपयोग ‘कथा चित्रण’ के संदर्भ में भी किया गया था। इन छवियों में मिथकों या कहानियों से संबंधित दृश्य शामिल थे, जहां इस लिपि को सक्रिय मुद्रा में चित्रित मनुष्यों, जानवरों और/या काल्पनिक प्राणियों की छवियों के साथ जोड़ा गया था। यह अंतिम उपयोग धार्मिक और साहित्यिक उपयोग जैसा दिखता है, जो अन्य लेखन प्रणालियों में अच्छी तरह से प्रमाणित है।
चूंकि, सिंधु लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है, इसलिए, इसका उपयोग निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। और हम जो कुछ भी सोचते हैं, वह केवल पुरातात्विक साक्ष्यों पर आधारित है। इन प्रतीकों वाले अधिकांश शिलालेख बेहद छोटे हैं। इस कारण, यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि, क्या ये प्रतीक किसी भाषा को रिकॉर्ड करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली, लिपि का गठन करते हैं या नहीं; या फिर, यहां तक कि, एक लेखन प्रणाली का प्रतीक है भी या नहीं। अनेक प्रयासों के बावजूद अभी तक इस ‘लिपि’ को समझा नहीं जा सका है, लेकिन, इसके प्रयास जारी हैं। दूसरी ओर, सिंधु लिपि को समझने में मदद करने के लिए, कोई ज्ञात द्विभाषी शिलालेख मौजूद नहीं है। और समय के साथ इस लिपि में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन भी नहीं दिखता है। इस लिपि की प्रकृति को लेकर भाषाविदों और भारतविदों के बीच गहरी असहमति है। भारतविदों का दावा है कि, सिंधु लिपि बिल्कुल भी भाषाई नहीं रही होगी। जबकि, कुछ भाषाविदों का कहना है कि, यह काफी हद तक भाषाई थी, और संभवतः द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित थी। एक तरफ, कई विद्वानों ने कहा है कि, ब्राह्मी और सिंधु दोनों लिपियों के बीच एक संबंध है। ब्राह्मी लिपि, सिंधु लिपि के बाद भारत में विकसित सबसे प्रारंभिक लेखन प्रणाली है। यह सबसे प्रभावशाली लेखन प्रणालियों में से एक है। सभी आधुनिक भारतीय लिपियां और दक्षिण पूर्व तथा पूर्वी एशिया में पाई जाने वाली सैकड़ों लिपियां ब्राह्मी से ली गई हैं। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, जॉर्ज बुहलर(Georg Bühler) ने इस विचार को आगे बढ़ाया था कि, ब्राह्मी सेमेटिक लिपि(Semitic script) से ली गई थी। जबकि, ब्राह्मण विद्वानों द्वारा इसे संस्कृत और प्राकृत के ध्‍वनिविज्ञान के अनुरूप अनुकूलित किया गया था। छठी शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान, भारत सेमेटिक लेखन के संपर्क में आया था, जब फ़ारसी अचमेनिद साम्राज्य(Achaemenid Empire) ने सिंधु घाटी पर नियंत्रण कर लिया। जबकि, सिंधु लिपि बनी रही, तथा धीरे-धीरे रैखिक हो गई। और अंततः यह ब्राह्मी लिपि के रूप में विकसित हो गई। परंतु, कुछ विद्वान इस सिद्धांत में विश्वास नहीं करते हैं। उनके अनुसार, सिंधु लिपि लगभग 1500 ईसा पूर्व के बाद अस्तित्व में थी। जबकि, ब्राह्मी लिपि के सबसे पुराने निर्विवाद उदाहरण लगभग 300 ईसा पूर्व, राजा अशोक के समय के हैं।
ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति को और भी प्राचीन, अर्थात, पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व के मध्य में भारत-गंगा या लौह युग सभ्यता की शुरुआत तक माना जा सकता है। क्योंकि, अशोक ने ब्राह्मी लिपि का आविष्कार करने का दावा नहीं किया है, इसलिए इसकी संभावना अधिक है कि, ब्राह्मी लिपि उनसे पहले ज्ञात थी। इसका उपयोग कई बार, और शायद व्यापारियों द्वारा व्यावसायिक रूप से उपयोग किया जाता था। यह असंभव नहीं है, लेकिन फिर भी, ब्राह्मी लिपि की शुरुआत और सिंधु लिपि के पूर्ण पतन से पहले कम से कम 1,000 वर्षों का अंतर है।

संदर्भ
https://tinyurl.com/y7cn26x7
https://tinyurl.com/2ekpd53f
https://tinyurl.com/4z7w7fnn
https://tinyurl.com/2h7k5jxf

चित्र संदर्भ

1. 'सिंधु लिपि’ और ‘ब्राह्मी लिपि को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
2. सिंधु लिपि में लिखी गई गिनती को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
3. जानवरों के साथ सिंधु लिपि के पात्रों वाली तीन स्टांप सीलों को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)
4. ब्राह्मी लिपि को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)
5. तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व और पहली शताब्दी ईस्वी के बीच ब्राह्मी लिपि सुलेख को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)

https://prarang.in/Lucknow/24041910281





विश्व धरोहर दिवस पर जानें इसका महत्व व देखें लखनऊ की शान जहाज वाली कोठी व तारामंडल

Lucknow pride ship mansion and planetarium

Lucknow
18-04-2024 09:53 AM

हम जानते हैं कि, हमारे शहर लखनऊ में कई धरोहरें हैं, जिनका अपना एक दिलचस्प इतिहास है। बड़ा इमामबाड़ा से लेकर ब्रिटिश रेजीडेंसी जैसी धरोहरों की उपस्थिति के साथ, लखनऊ अपनी समृद्ध ऐतिहासिक जीवंतता के कारण उत्तर प्रदेश की विरासत का भी एक घटक है। अतः आज विश्व धरोहर दिवस के मौके पर, आइए समझते हैं, विरासत का वास्तविक अर्थ क्या है और यह क्यों मायने रखता है? इसके साथ ही, आइए हम अपने शहर की जहाज वाली कोठी और तारामंडल जैसी कुछ आधुनिक अनोखी इमारतों को भी देखें, जो कम ख्याति प्राप्त हैं। विश्व धरोहर स्थलों के महत्व और भावी पीढ़ियों में जागरूकता बढ़ाने के लिए, प्रतिवर्ष 18 अप्रैल अर्थात आज के दिन, विश्व धरोहर दिवस मनाया जाता है। विश्व धरोहर स्थल हमारी साझा सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत का एक मूल्यवान हिस्सा हैं, और उनकी सुरक्षा और संरक्षण करना हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी है।
वर्ष 1982 में, अंतर्राष्ट्रीय स्मारक और स्थल परिषद (ICOMOS) ने विश्व धरोहर दिवस मनाने की अवधारणा का प्रस्ताव रखा था, जिसे बाद में 1983 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इसे अनुमोदित किया गया। 1982 में जब यूनेस्को (UNESCO) द्वारा विश्व सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत के संरक्षण से संबंधित सम्मेलन को अपनाया, तब 18 अप्रैल के दिन को इसका गौरव करने हेतु इस उत्सव की तारीख के रूप में चुना गया। विश्व धरोहर दिवस का उत्सव पूरी दुनिया में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। आम तौर पर इसमें विभिन्न प्रकार की रोमांचक गतिविधियां शामिल होती हैं। इनमें विभिन्न क्षेत्रों की अनूठी सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को प्रदर्शित करने वाली प्रदर्शनियां आयोजित होती है। स्थानीय समुदायों की परंपराओं और रीति-रिवाजों को उजागर करने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ विरासत स्थलों के निर्देशित दौरे भी इसमें शामिल हैं, जो आगंतुकों को इन प्रतिष्ठित स्थानों के इतिहास और महत्व का पता लगाने का मौका देते हैं। वास्तव में, हमारी धरोहर वह होती है, जो हमें हमारे अतीत से विरासत में मिली है। ऐसी धरोहर को वर्तमान में महत्व दिया जाना चाहिए और उसका आनंद लिया जाना चाहिए, तथा भविष्य की पीढ़ियों को इसे संरक्षित करना चाहिए। हमारी पहचान को आकार देते हुए, हमारी विरासत हमारे अस्तित्व का ही हिस्सा बन जाती हैं। साथ ही, विरासत हमारे अतीत और हमारा समाज कैसे विकसित हुआ था, इसका सुराग देती है। यह हमें अपने इतिहास और परंपराओं की जांच करने में मदद करता है, और हमें अपने बारे में जागरूकता विकसित करने में भी सक्षम बनाता है। यह हमें समझाने में मदद करता है कि, हम जैसे हैं वैसे क्यों हैं। विरासत हमारी संस्कृति का मूलमंत्र भी है, जो हमारी राजनीति, समाज, व्यापार और विश्व दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पिछले कुछ वर्षों में, हमारे शहर लखनऊ का अनगिनत नए उन्नयनों के साथ विस्तार हुआ है। विलासी आवासीय इमारतों से लेकर वाणिज्यिक गगनचुंबी इमारतों तक, शहर का क्षितिज एक लंबी ड्राइव के लिए आदर्श स्थान बन गया है। लेकिन, यहां कुछ इमारतें ऐसी भी हैं, जो अपनी वास्तुकला में विशेष रूप से अद्वितीय हैं। हम इन्हें लखनऊ की आधुनिक विरासत कह सकते हैं। आइए, जानते हैं। •जहाज वाली कोठी: पूरे भारत में अपनी तरह की एकमात्र इमारत मानी जाने वाली जहाज वाली कोठी वहां से गुजरने वाले हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। यह आवासीय इमारत काफ़ी लोकप्रिय है। इसके शीर्ष पर एक हवाई जहाज की आकृति बनी है, जो इसे आकर्षक बनाती है। •इंदिरा गांधी तारामंडल: 2003 में जनता के लिए खोली गई यह इमारत, अपने पांच वृत्तों के साथ शनि ग्रह जैसी दिखती है। इसके अलावा, चारों ओर से पानी से घिरी होने के कारण, यह तैरती हुई भी प्रतीत होती है। •इमामबाड़ा: 1784 में निर्मित, बड़ा इमामबाड़ा आज भी लखनऊ के शीर्ष आकर्षणों में से एक है। यह स्मारक अपने आप में अनोखा है क्योंकि, वास्तुकला के इस चमत्कार को बनाने में किसी भी लकड़ी या धातु का उपयोग नहीं किया गया है। इसके अलावा, इस स्थान पर दुनिया का सबसे बड़ा गुंबददार कक्ष भी है। •पुलिस मुख्यालय: जब हम शहीद पथ से गुजरते हैं, तो लखनऊ का क्षितिज देखना मनमोहक होता है। और, पुलिस मुख्यालय इस नज़ारे को और भी अद्भुत बनाता है! लखनऊ की यह अनूठी इमारत कई सुविधाओं से भरपूर है, और इसकी शानदार वास्तुकला इसे सौंदर्यशास्त्र के मामले में भी अलग बनाती है।
•जय प्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय केंद्र: लखनऊ में कई लोग जय प्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय केंद्र को स्टार्क टावर(Stark tower) कहते हैं। हाल ही में, गोमती नगर में इमारतें कितनी भी ऊंची क्यों न हो गई हों, यह केंद्र आज भी इस क्षेत्र में हमेशा की तरह सबसे ऊंचा खड़ा है!
•ऑरेंज कैसल: यह एक बहुत विलासी आवासीय परियोजना है, जो भव्य बंगलों और पेंटहाउस(penthouses) के साथ-साथ सिम्प्लेक्स(simplexes) और डुप्लेक्स(duplexes) निवास प्रदान करता है। गोमती नदी के किनारे स्थित, यह नया आवासीय भवन एक “सपनों का घर” ही प्रतित होता है।
•पुराने लखनऊ में मकान: अगर कोई एक जगह है जो लखनऊ को अलग करती है, तो वह पुराने लखनऊ की नवाबी विरासत है। एक शताब्दी या उससे भी पहले निर्मित, ये अद्वितीय घर आज भी मौजूद हैं। इन घरों में सुरुचिपूर्ण वास्तुकला, जिसमें फ़ारसी स्पर्श के साथ नाजुक ‘जाली’ का काम भी शामिल है, इन संरचनाओं में केवल आकर्षक पहलुओं में से एक है।

संदर्भ
https://tinyurl.com/nahjhu57
https://tinyurl.com/4ukytjey
https://tinyurl.com/2ya9rmfh
https://tinyurl.com/2dme3487

चित्र संदर्भ
1. लखनऊ की शान जहाज वाली कोठी व तारामंडल को संदर्भित करता एक चित्रण (YouTube)
2. यूनेस्को के लोगो को संदर्भित करता एक चित्रण (needpix)
3. विश्व धरोहर के रूप में स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
4. जहाज वाली कोठी को संदर्भित करता एक चित्रण (YouTube)
5. लखनऊ तारामंडल को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
6. बड़ा इमामबाड़ा को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
7. लखनऊ के पुलिस मुख्यालय को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)

https://prarang.in/Lucknow/24041810308





राम नवमी विशेष: एक आदर्श के रूप में स्थापित प्रभु श्री राम अंततः कहाँ गए?

Where did Lord Shri Ram ultimately go

Lucknow
17-04-2024 09:41 AM

राम नवमी का उत्सव हुमारे लखनऊ में बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है! शहर के ऐतिहासिक ऐशबाग रामलीला मैदान में राम जन्मोत्सव का आयोजन कई दिनों तक चलता है। व्यापक रूप से यह माना जाता है कि, भगवान श्री राम पृथ्वी पर स्वयं भगवान नारायण के दिव्य अवतार थे। केवल दो अक्षरों के नाम "राम" में गहरे और गूढ़ अर्थ समाहित हैं। आइये आज राम नवमी के इस शुभ अवसर पर, राम नाम के सार और महत्व के बारे में समझने की कोशिश करते हैं। इसके अतिरिक्त, आज हम श्री राम के जीवन और दुनिया से उनके प्रस्थान के प्रतीकात्मक पहलुओं का भी पता लगाएंगे। भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में प्रतिष्ठित भगवान राम, हिंदू परंपरा में अत्यंत पूजनीय देवता हैं। उनका समस्त जीवन, धार्मिकता और भक्ति के गुणों का साक्षात् उदाहरण माना जाता है। नैतिक मूल्यों के प्रतिमान के रूप में, भगवान राम की विरासत सैकड़ों वर्षों से पूरी दुनिया भर के अनगिनत भक्तों का मार्गदर्शन करती आ रही है।
भगवान राम के जीवन दर्शन से हम भी कई मूल्यवान शिक्षाएँ ग्रहण कर सकते हैं:
1. धर्म (धार्मिकता): भगवान राम का जीवन "धर्म की वास्तविक परिभाषा" का एक प्रमाण था, क्योंकि उन्होंने निरंतर न्याय, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा का पालन किया।
2. भक्ति: कर्तव्य और माता-सीता के प्रति उनकी अटूट भक्ति को, विश्वास और आध्यात्मिक समर्पण की शक्ति का एक जीवंत उदाहरण माना जाता है।
3. संबंधों का सम्मान: पारिवारिक और सामाजिक बंधनों के प्रति उनकी दृढ़ निष्ठा, प्रेम और विश्वास के महत्व को उजागर करती है।
4. समानता और सम्मान: सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित होने के बावजूद, भगवान राम का सभी के प्रति समान व्यवहार, उनके दयालु स्वभाव को रेखांकित करता है।
क्या आप जानते हैं कि भगवान राम और उनके तीनों भाई, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न, जीवन के चार मार्गदर्शक सिद्धांतों के प्रतीक माने जाते हैं, जिन्हें "पुरुषार्थ" के रूप में जाना जाता है। भगवान राम की महाकाव्य कहानी, (रामायण) को, प्राचीन पवित्र ग्रंथ वेदों की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि वेदों ने बुराई का नाश करने और धार्मिकता को जीवन देने में मदद करने के लिए रामायण का ही रूप लिया था।
प्रभु श्री राम और उनके भाइयों को चारों वेदों का मानव अवतार माना जाता है। स्वयं भगवान राम यजुर्वेद का प्रतिनिधित्व करते हैं! यह वेद मनुष्य के अधिकारों और कर्तव्यों को रेखांकित करता है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने धर्म की स्थापना करने के लिए मानव रूप धारण किया। एक आदर्श के रूप में प्रभु श्री राम की जीवन यात्रा को आमतौर पर अनदेखा कर दिया जाता है। लेकिन वास्तव में वह एक अनुकरणीय व्यक्ति हैं, जिनके चरित्र के सभी गुण और सद्गुण, हमारे आत्म-सुधार हेतु मार्गदर्शक के रूप में काम कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने सर्वशक्तिमान होने के बावजूद, किसी भी आम व्यक्ति की भांति, जीवन की सभी कठिनाइयों और निराशाओं को सहन किया! उन्होंने यह साबित किया कि “सुख केवल दुखों के बीच थोड़ी सी राहत का क्षण है और दुख एक चुनौती, एक परीक्षा और एक सबक है।” उन्होंने अपने जीवन दर्शन से परिवार के सदस्यों, मित्रों, सहयोगियों, दुश्मनों और यहां तक कि मनुष्य और जानवर के बीच भी आदर्श संबंधों का उदाहरण दिया।
रामायण यह भी दर्शाती है कि किसी के संचित कर्मों के कारण, उसके भाई-बहनों का चरित्र और नियति भी विपरीत हो सकती है। ऐसा हमें (बाली और सुग्रीव) तथा (रावण और विभीषण) के चरित्रों में देखने को मिलता, जो सभी भाई थे।
दूसरे दृष्टिकोण से, राम और उनके चारों भाई मनुष्य के चार प्राथमिक लक्ष्यों, पुरुषार्थ का प्रतिनिधित्व करते हैं।
प्रभु श्री राम: धर्म (धार्मिकता) का प्रतीक हैं!
लक्ष्मण: अर्थ (समृद्धि) का प्रतीक हैं!
भरत: काम (इच्छा) का प्रतीक हैं!
शत्रुघ्न: मोक्ष (मुक्ति) का प्रतीक हैं।
राजा दशरथ, उस मनुष्य का प्रतीक हैं, जिसके पास पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच कर्मेंद्रियां हैं, जो अभेद्य शहर अयोध्या (वह हृदय जहां भगवान निवास करते हैं) पर शासन करते हैं। उक्त चारों लक्ष्य प्रत्येक मनुष्य की संतान हैं।
इन चार लक्ष्यों को दो जोड़ियों (धर्म-अर्थ और काम-मोक्ष) में सरलीकृत किया गया है। मनुष्य को धार्मिक तरीकों से समृद्धि प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए, और इस प्रकार अर्जित समृद्धि का उपयोग धर्म को बनाए रखने के लिए किया जाना चाहिए।
महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखित, रामायण की मनोरम किंवदंतियों और कालातीत पाठों से तो हम सभी परिचित हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यदि प्रभु श्री राम ने आम इंसानों की भांति जीवन व्यतीत किया तो इसका मतलब यह हुआ कि उन्होंने “मृत्यु को भी आम इंसानों की भांति स्वीकार किया होगा!” लेकिन क्या आपने कभी यह जानने की जिज्ञासा दिखाई है, कि अंततः राम कहाँ गए? दिलचस्प बात यह है कि मूल रामायण में प्रभु श्री राम की मृत्यु का उल्लेख ही नहीं मिलता है। यह महाकाव्य, भगवान राम के जीवन, उनके मूल्यों और गुणों का वर्णन करता है, जो अपने पाठकों के लिए एक नैतिक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है।
यह व्यापक रूप से माना जाता है कि वनवास से अयोध्या लौटने के बाद, भगवान राम ने कई शताब्दियों तक भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन किया था। मूल रामायण, श्री राम के अयोध्या लौटने के बाद की घटनाओं का कोई और संदर्भ दिए बिना, ही श्री राम की रावण पर विजय के साथ समाप्त हो जाती है! यद्यपि रामायण में राम के निधन के बारे में कोई साक्ष्य नहीं मिलता है, किंतु अन्य प्राचीन ग्रंथ इस पर कुछ प्रकाश डालते हैं। उदाहरण के तौर पर पद्म पुराण की एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान राम अपने दरबार में थे, तब उनसे एक बुजुर्ग संत मिलने आये, जिन्होंने श्री राम से निजी तौर पर मिलने का आग्रह किया। इस बात पर सहमति जताते हुए, भगवान राम और ऋषि अपनी चर्चा के लिए एक एकांत कक्ष में चले गए।
कमरे के बाहर भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण जी पहरा दे रहे थे। भगवान राम ने उन्हें किसी को भी कमरे में प्रवेश करने से रोकने का निर्देश दिया हुआ था, और चेतावनी दी थी कि किसी भी घुसपैठिये को मृत्युदंड का सामना करना पड़ेगा।
लक्ष्मण, जो अपने भाई के प्रति निष्ठा और समर्पण के लिए जाने जाते हैं, ने ईमानदारी से कक्ष की सुरक्षा की और यह सुनिश्चित किया कि भगवान राम और संत के बीच बातचीत में कोई बाधा न आए।
अपनी निजी बातचीत के दौरान, संत ने समय के देवता, काल देवता के रूप में अपना असली रूप प्रकट किया। वह भगवान राम को यह सूचित करने के लिए वैकुंठ से आए थे कि “पृथ्वी पर उनका समय समाप्त होने वाला है तथा उन्हें अपने अवतार के उद्देश्य को पूरा करने के बाद, अपने दिव्य निवास पर लौटने की तैयारी करनी चाहिए।” इस दौरान ऋषि दुर्वासा भी भगवान राम से तत्काल मिलने की मांग करते हुए कक्ष के निकट पहुंच गए। महर्षि के इस अचानक आगमन से आश्चर्यचकित होने के बावजूद, लक्ष्मण ने अपने वचन के प्रति सच्चे रहते हुए, ऋषि दुर्वासा के प्रवेश अनुरोध को विनम्रता से अस्वीकार कर दिया। अपनी क्रोधित प्रकृति के लिए जाने जाने वाले ऋषि दुर्वासा ने लक्ष्मण के इस व्यवहार से क्रोधित होकर उन्हें चेतावनी दे दी कि “यदि उन्हें प्रवेश न करने दिया गया तो वे भगवान राम को श्राप दे देंगे।” इस कठिन परिस्थिति का सामना करते हुए, लक्ष्मण ने अपने अग्रज को दुर्वासा के क्रोध से बचाने के लिए मृत्युदंड का खतरा होने के बावजूद, स्वयं ही उस कक्ष में प्रवेश करने का फैसला किया।
कक्ष में लक्ष्मण के अप्रत्याशित प्रवेश होने पर भगवान राम भी आश्चर्यचकित रह गए, लेकिन वह तुरंत समझ गए कि लक्ष्मण ने ऐसा उन्हें दुर्वासा के श्राप से बचाने के लिए हस्तक्षेप किया है। लेकिन चूंकि वहां पर लक्ष्मण ने आदेश की अवहेलना की थी, इसलिए काल देव ने सुझाव दिया कि लक्ष्मण को राज्य से निर्वासित कर दिया जाए, यह सजा मौत से भी बदतर मानी जाती थी। परिणामस्वरूप, भगवान राम ने लक्ष्मण को राज्य छोड़ने का आदेश दे दिया।
लेकिन लक्षमण, भगवान राम के बिना अपने जीवन की कल्पना करने में भी असमर्थ थे, इसलिए उन्होंने जल समाधि में प्रवेश करने का मार्ग चुना, जो एक तरह से पानी में पूरी तरह डूबकर अपने नश्वर शरीर को छोड़ने की प्रथा है। काल देव ने लक्ष्मण को सूचित किया कि “ माता सीता भी भगवान राम के आगमन की प्रतीक्षा करने के लिए पहले ही वैकुंठ के लिए रवाना हो चुकी हैं। वैकुंठ में भगवान राम की सेवा के लिए खुद को तैयार करने की कतार में लक्ष्मण आगे थे। लक्ष्मण के चले जाने के बाद भगवान राम भी बहुत अकेले पड़ गए। राम राज्य की स्थापना करने और अपनी सभी प्रजा को न्याय देने के बाद, उन्हें भी पृथ्वी पर रहने का कोई कारण नहीं दिखाई दे रहा था तो उन्होंने फैसला किया कि अब प्रस्थान करने का समय आ गया है। भगवान राम के आसन्न प्रस्थान की खबर पूरे राज्य में घोषित की गई थी।
जैसे ही वह महल छोड़ने के लिए तैयार हुए, उनकी प्रजा भी बड़ी संख्या में उनके चारों ओर इकट्ठा हो गई और उसके साथ चलने की विनती करने लगी। भगवान राम उन्हें सरयू नदी के सबसे गहरे हिस्से तक ले गए, और उन्हें मोक्ष, परम मुक्ति प्रदान की। इस प्रकार अपने-अपने समय और तरीके से, भगवान राम, लक्ष्मण और सीता सभी अपने दिव्य निवास पर लौट आए, और अंततः एक पूरे युग का अंत हो गया!

संदर्भ
https://tinyurl.com/43a75h7f
https://tinyurl.com/mr397zzs
https://tinyurl.com/22kbx89j
https://tinyurl.com/35ejjjch

चित्र संदर्भ

1. नदी में श्री राम को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
2. अपने छोटे भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ वन में निर्वासित हो गये श्री राम, को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
3. विश्वामित्र के साथ राम और लक्ष्मण की यात्रा को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
4. श्री राम के वनवास के दृश्य को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
5. श्री राम के परिवार को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)
6. श्री राम और लक्षमण की भेंट को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)
7. श्री राम की जल समाधि को दर्शाता एक चित्रण (youtube)

https://prarang.in/Lucknow/24041710291





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