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चाईनीज़ चेकर से मिलता जुलता भारतीय सुरबग्घी का खेल

Similar to the Chinese checker game of Chinese checker

Lucknow
19-09-2019 11:56 AM

आपने अपने बचपन में विविध प्रकार के खेल खेले होंगे जिनमें से कुछ लोगों की खेलों की सूची में ‘सुरबग्घी’ का खेल भी शामिल रहा होगा। मोबाइल फोन (Mobile Phone) के बढ़ते चलन के कारण यह खेल समय के साथ-साथ अपनी पहचान खोता जा रहा है। पहले के समय में फर्श के बीचों-बीच सुरबग्घी की चौकोर बिसात बनाई जाती थी जो कुछ हद तक चाईनीज़ चेकर (Chinese Checker) और शतरंज खेलों से मिलती जुलती थी। चाईनीज़ चेकर एक स्ट्रेटेजी बोर्ड गेम (Strategy board game) है जिसे दो, तीन, चार या छह लोग व्यक्तिगत रूप से या भागीदारी में खेल सकते हैं। यह खेल मुख्य रूप से जर्मन मूल का है। इसके नियम सरल हैं जिस कारण इसे छोटे बच्चे भी खेल सकते हैं।

सुरबग्घी खेल में 32 गोटियों ज़रूरत पड़ती हैं, जिसमें 16 गोटियां एक खिलाड़ी के पाले में होती हैं और बाकी 16 दूसरे खिलाड़ी के पास होती हैं। दोनों पक्षों की गोटियों का रंग अलग होता है। इसे जीतने के लिए दिमाग को तेज़ी से दौड़ाना पड़ता है क्योंकि आपकी एक गलत चाल आपको हरा सकती है और इसलिए खेल खेलने वाले खिलाड़ियों को इसे बड़े ध्यानपूर्वक खेलना पड़ता है। इस खेल में बनाई गई चौकौर बिसात में प्वाइंटों (Points) के सहारे एक पंक्ति पर गोटियाँ चली जाती हैं। मान लीजिए कि आपकी और आपके विपक्षी खिलाड़ी की गोटी अगल-बगल है और तीसरा प्वाइंट खाली है। आपकी गोट बीच में है और अब चाल अगले खिलाड़ी की है। अगर विपक्षी खिलाड़ी आपकी गोटी को काट कर आगे के प्वाइंट पर अपनी गोटी रख देता है, तो आपकी गोटी कट जाएगी और दूसरा खिलाड़ी बाज़ी जीत जाएगा। सुरबग्घी का खेल न सिर्फ हमारी मानसिक शक्ति को बढ़ाने का काम करता है, बल्कि खाली समय में यह खेल मनोरंजन के अच्छे साधन की तरह भी काम करता है। पुराने समय में ग्रामीण सजावट के तौर पर लोग सुरबग्घी को अपने घर की ज़मीन या फिर दीवारों पर बनवाते थे। इससे घर के बच्चों के साथ-साथ महिलाएं भी खाली समय में यह खेल खेला करती थी।

2009 में लखनऊ के पास ग्रामीण ओलम्पिक (Olympic) खेलों का आयोजन किया गया था। इस आयोजन में कई खेल जैसे भैंस दुहना, साइकिल दौड़, नहर में तैरना, कबड्डी, वॉलीबाल (Volleyball), पतंगबाजी, रस्साकशी, शतरंज आदि का आयोजन किया गया था जिनमें सुरबग्घी भी शामिल था। इस प्रतियोगिता में उत्तर भारत के सात राज्यों ने भाग लिया तथा पुरस्कार के रूप में पदक के बजाय देसी घी के डिब्बे दिये गये। राजस्थान, उत्तराखंड, हरियाणा, जम्मू और कश्मीर, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के लगभग 500 प्रतिभागियों ने ग्रामीण ओलंपिक खेल में भाग लिया। यह पहली बार था जब किसी गाँव में इस तरह के पैमाने पर राष्ट्रीय ग्रामीण खेलों का आयोजन किया गया था।

यह खेल काफी पुराना है, इतना पुराना कि इस खेल के साक्ष्य अकबर के शासन काल से भी प्राप्त होते हैं। अकबर और उसके अधिकारी, भीतर खेले जाने वाले खेलों के बहुत शौकीन थे। शतरंज खेलना उन्हें बहुत पसंद था। व्यक्तिगत रूप से अकबर ‘चंदल-मंदल’ और ‘पच्चीसी’ के खेल के बहुत शौकीन थे। उस समय ग्रामीण क्षेत्रों के लोग कबड्डी और सुरबग्घी खेलना बहुत पसंद करते थे। हालांकि सुरबग्घी आज अपनी लोकप्रियता खोता जा रहा है किंतु बौद्धिक विकास के लिए यह आज भी उतना ही लाभकारी है जितना पहले था।

संदर्भ:
1.
https://bit.ly/2QUobzn
2. https://bit.ly/2mo99aJ
3. https://en।wikipedia।org/wiki/Chinese_checkers
4. https://bit.ly/2mnoR5P
चित्र सन्दर्भ:
1.
https://www.youtube.com/watch?v=tk8fzs-LhaE
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Bagh-Chal#/media/File:Pic1146710_lg.jpg

https://prarang.in/Lucknow/1909193383





चंद्रमा की सतह पर अभी भी जीवित हैं टार्डिग्रेड्स

Tardigrades still alive on the lunar surface

Lucknow
18-09-2019 11:05 AM

हमारी पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु पाये जाते हैं। कुछ विशाल हैं तो कुछ बहुत ही सूक्ष्म। टार्डिग्रेड्स (Tardigrades) भी इन्हीं सूक्ष्म जीवों में से एक हैं जिन्हें पृथ्वी पर किसी भी स्थान पर, यहां तक कि लखनऊ में भी पाया जाता है। ये सूक्ष्मजीव काई और ठंडे इलाकों में रहना पसंद करते हैं और इन्हें आम तौर पर पानी के भालू (वाटर बियर - Water bear) भी कहा जाता है, इनके आठ पैर होते हैं। इनका ज़िक्र पहली बार 1773 में जर्मन जीव-विज्ञानी जोहान अगस्त एफ्राइम गोएज़ ने किया था।

टार्डिग्रेड्स प्रायः हर जगह पाये जाते हैं। ये पर्वतों से लेकर गहरे समुद्रों तक, उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों से लेकर अंटार्कटिक तक यहां तक कि ज्वालामुखी की मिट्टी में भी पाये जाते हैं। इनकी अलग-अलग प्रजातियां अत्यधिक तापमान, अत्यधिक दबाव (उच्च और निम्न दोनों), वायु में कमी, विकिरण, निर्जलीकरण वाले स्थानों में भी आसानी से जीवित रह पाने में सक्षम होती हैं। पूरी तरह से विकसित टार्डिग्रेड आमतौर पर लगभग 0.5 मिमी (0.02 इंच) लंबे होते हैं जो दिखने में छोटे और मोटे होते हैं। इनके पैरों की संख्या आठ होती है। ये अक्सर लाइकेन (Lichen) और शैवालों (काई) पर पाए जाते हैं तथा अधिकतर गीले वातावरण में रहना पसंद करते हैं। किसी भी तापमान और परिस्थितियों के लिए ये जीव अनुकूलित होते हैं। एक शोध में पाया गया कि टार्डिग्रेड -200 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक ठंडे तापमान का सामना कर सकते हैं। इनमें क्रिप्टोबायोसिस (Cryptobiosis) नामक एक क्षमता होती है जिसमें जीव लगभग मृत्यु जैसी स्थिति में चला जाता है। यह अवस्था उन्हें जीवित रहने में मदद करती है। क्रिप्टोबायोसिस में, टार्डिग्रेड्स की चयापचय गतिविधि सामान्य स्तर से 0.01% तक चली जाती है और उनके अंगों को एक शर्करा जेल (Gel) द्वारा संरक्षित किया जाता है जिसे ट्रेहलोज़ (Trehalose) कहा जाता है। वे एक बड़ी मात्रा में एंटीऑक्सिडेंट (Antioxidant) भी बनाते हैं, जो उनके महत्वपूर्ण अंगों की रक्षा करता है। ये एक प्रोटीन (Protein) का उत्पादन भी करते हैं जो उनके डीएनए (DNA) को हानिकारक विकिरण से सुरक्षित रखता है। जीवित रहने के लिए टार्डिग्रेड तरल पदार्थों का सेवन करते हैं तथा शैवाल और लाइकेन का रस चूसते हैं। इनकी कुछ प्रजातियां मांसाहारी भी हैं जो अपने भोजन के लिये अन्य टार्डिग्रेड्स का शिकार कर सकती हैं। यह लैंगिक तथा अलैंगिक दोनों माध्यम से प्रजनन करते हैं तथा एक बार में एक से 30 अंडे तक दे सकते हैं।

किसी भी जीव को जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन (Oxygen) तथा पानी की आवश्यकता होती है किंतु अंतरिक्ष, जहां पानी और ऑक्सीजन का कोई साधन नहीं होता, में 2007 में एक प्रयोग किया गया जिसमें टार्डिग्रेड बिना पानी, ऑक्सीजन तथा उच्च विकिरण में दस दिनों तक जीवित रहा। ये कई वर्षों तक बिना खाये-पिये रह सकते हैं और ऐसा होने पर ये अपने शरीर की हर गतिविधि को रोक देते हैं। अगर इन्हें थोड़ा पानी मिल जाये तो ये वापस अपनी पूर्व स्थिति में आ जाते हैं।

अभी कुछ समय पहले भारत ने चंद्रमा पर अपना चंद्रयान II भेजा किंतु इससे भी पहले चंद्रमा पर यह जीव पहुंच चुका था। दरअसल चंद्रयान II से पूर्व इज़राएल के आर्च मिशन फाउंडेशन (Arch Mission Foundation) ने चंद्रमा पर अपना एक स्पेस-क्राफ्ट (Space craft) भेजा किंतु कुछ तकनीकी खराबी के कारण यह चंद्रमा पर ठीक से उतर नहीं पाया और क्रैश (Crash) हो गया। यह स्पेस-क्राफ्ट अकेला नहीं था, इसमें एक लूनर लाइब्रेरी (Lunar Library) बनायी गयी थी जिसमें टार्डिग्रेड्स और मानव डीएनए को संग्रहीत किया गया था। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वहाँ टार्डिग्रेड्स अब भी जीवित हैं क्योंकि ये चंद्रमा के तापमान को आसानी से झेल सकते हैं। इसके अतिरिक्त वे निर्जलीकरण की अवस्था में ले जाए गए थे जिससे उन्हें पानी की भी कोई ज़रुरत नहीं है। टार्डिग्रेड्स चंद्रमा में विकिरण का सामना भी आसानी से कर सकते हैं और इसीलिए बहुत अच्छी सम्भावना है कि वे चंद्रमा पर अब भी जीवित हैं।

संदर्भ:
1.
https://en।wikipedia।org/wiki/Tardigrade
2. https://www।livescience।com/57985-tardigrade-facts।html
3. https://www।bbc।com/news/newsbeat-49265125
4. https://bit।ly/2ZGfSLB
चित्र सन्दर्भ:
1.
https://www.flickr.com/photos/petervonbagh/15994168283/in/photostream/
2. https://www.flickr.com/photos/28502132@N05/8301054965

https://prarang.in/Lucknow/1909183379





लखनऊ में हुई थी दम बिरयानी की उत्पत्ति

Dum Biryani originated in Lucknow

Lucknow
17-09-2019 11:06 AM

भारतीय संस्कृति में हर्षोल्लास की अभिव्यक्ति का पहला माध्‍यम भोजन होता है अर्थात जीवन की हर खुशी जैसे जन्म, विवाह इत्‍यादि के जश्‍न में खाना, दावत के अतिरिक्‍त अन्य कोई अपेक्षा नहीं की जाती है। भोजन हमारी संस्‍कृति की अभिव्‍यक्ति का भी सबसे बड़ा माध्‍यम है। इसका प्रत्‍यक्ष प्रमाण है हमारे देश के विभिन्‍न क्षेत्रों के प्रसिद्ध व्‍यंजन जैसे गुजरात का ढोकला, मुंबई की पावभाजी, राजस्‍थान की दाल बाटी इत्‍यादि।

भारतीय भोजन के इतिहास की बात की जाए तो यह विभिन्न संस्कृतियों की आवश्यकता और विरासत के समय पर किए गए आविष्कारों से जुड़ी हुई है। जैसे कि कुछ व्यंजनों का आविष्कार जनता के लिए किया गया जबकि कुछ अन्य को भौगोलिक क्षेत्रों से लिया गया था। भारतीय भोजन के कई ऐसे रोचक इतिहास अभी भी अनसुने हैं। तो चलिए जानते हैं लखनऊ में उत्पन्न हुई दम बिरयानी या अवध की बिरयानी के इतिहास के बारे में।

इसकी उत्पत्ति के बारे में कई कहानियां है, लेकिन सबसे लोकप्रिय कहानी नवाब असफ-उद-दौला (1700 के दशक के अंत में अवध के वज़ीर या शासक) से जुड़ी हुई है। 1784 के दौरान अवध प्रान्त में लोग भुखमरी से मर रहे थे, जिसकी वजह से स्थिति इतनी गंभीर हो गयी थी कि किसी के पास भी खाने के लिये कुछ नहीं था। तब असफ-उद-दौला ने स्थिति को सुधारने तथा लोगों को रोज़गार देने के लिए बड़ा इमामबाड़ा की इमारत का निर्माण प्रारंभ करवाया।

लोगों को दिन और रात में खाना खिलाने के लिए, रसोइयों ने दम पुख्त की विधि को नियोजित किया, जिसमें मांस, सब्जियां, चावल और मसालों को एक साथ बड़े बर्तनों में ढक कर धीमी आंच पर पकाया गया। खाना पकाने की इस सुविधाजनक प्रक्रिया की मदद से अत्यधिक मसाले का उपयोग किए बिना बड़ी संख्या में श्रमिकों को स्वादिष्ट भोजन प्रदान किया गया था। वहीं इस प्रक्रिया को ‘दम’ के नाम से जाना जाने लगा।

एक दिन इस व्यंजन के पकते समय नवाब को इसकी खुशबू आई तथा उन्होंने अपने शाही बावर्चियों को वही व्यंजन शाही रसोई में बनाने का निर्देश दिया। शाही बावर्चियों ने इसी तकनीक का इस्तेमाल करके तथा कुछ शाही तरीके इसमें मिश्रित करके व्यंजन तैयार किया तथा उसके बाद दम बिरयानी शाही दरबारों और उच्च वर्ग के लोगों के बीच भी लोकप्रिय हुई। इसके बाद इसे हैदराबाद, कश्मीर, भोपाल आदि की शाही रसोइयों में भी बनाया गया।

दम बिरयानी को बनाने की प्रक्रिया काफी सरल होती है
इसके लिए प्याज़ को हल्का सुनहरा होने तक भूनें। हरी मिर्च और अदरक को काट लें। मलाई और मक्खन को गरम करें (2 मिनट के लिए) और इसे एक तरफ रख दें। अब दही के साथ घी, अदरक-लहसुन का पेस्ट (Paste), जावित्री, साबुत मसाले, पीली मिर्च पाउडर (Powder), धनिया और जीरा पाउडर और प्याज़ का उपयोग करके मटन को पकाएं। इसमें हरी इलायची पाउडर, कटा हुआ पुदीना, अदरक और हरी मिर्च और क्रीम-मक्खन का मिश्रण मिलाएं।

चावल पकाने के लिए, थोड़ा सा घी, और 1 या दो टुकड़े लौंग, दालचीनी, इलायची, तेज़ पत्ता, पुदीना के पत्ते और नमक डालें। इसे 50% तक पकाएं। इसके बाद मटन के आधे हिस्से को पहली परत के रूप में रखें, दूसरी परत के रूप में आधे चावल डालें। इसी तरह, शेष मटन को तीसरी परत के रूप में और शेष मटन को चौथी परत के रूप में रखें। अब, मलाई-मक्खन के मिश्रण के साथ केसर मिलाएं और इसे फैलाएं। ढक्कन लगाकर इसे गेहूं के आटे के लेप से बंद कर दें। अंतः धीमी आंच पर इसे पकाएं।

संदर्भ:
1.
http://www.grmrice.com/origin-of-dum-biryani/
2. https://www.indianeagle.com/travelbeats/indian-food-history/
3. https://bit.ly/2kk7LF9

https://prarang.in/Lucknow/1909173375





जीन में फेरबदल कर बन सकते हैं डिज़ाइनर बच्चे

Designer children can be made by altering the genes

Lucknow
16-09-2019 01:31 PM

इन दिनों विश्व भर में इस बात पर काफ़ी बहस हो रही है कि क्या इंसानों के जीन (Gene) में फेरबदल द्वारा 'डिज़ाइनर (Deisgner) बच्चे' बनाए जाने चाहिए? यहाँ डिज़ाइनर का मतलब ये है कि आप अपने बच्चे में जो ख़ूबियां देखना चाहते हैं, उन्हें जीन में फेरबदल करके उनमें डलवा सकते हैं। जीन का इस फेरबदल के लिए सी.आर.आई.एस.पी.आर. (CRISPR - Clustered regularly interspaced short palindromic repeats) तकनीक एक सरल लेकिन शक्तिशाली उपकरण है। यह शोधकर्ताओं को डीएनए अनुक्रमों को आसानी से बदलने और जीन के कार्यों को संशोधित करने की अनुमति देता है। इसके उपयोग में आनुवांशिक दोषों को ठीक करना, इलाज करना और बीमारियों के प्रसार को रोकना और फसलों में सुधार करना शामिल है।

सी.आर.आई.एस.पी.आर. तकनीक को बैक्टीरिया (Bacteria) और आर्किया (Archaea - एकल-कोशिका वाले सूक्ष्मजीवों के डोमेन) के प्राकृतिक रक्षा तंत्र से अनुकूलित किया गया था। ये जीव वायरस (Virus) और अन्य बाह्य निकायों द्वारा किए गए हमलों को नाकाम करने के लिए सी.आर.आई.एस.पी.आर.-प्राप्त आरएनए (RNA) और कैस 9 (Cas 9) सहित विभिन्न कैस प्रोटीन (Protein) का उपयोग करते हैं। साथ ही यह एक बाह्य आक्रमणकारी के डीएनए को काटकर नष्ट कर देते हैं। जब इन घटकों को अन्य, अधिक जटिल, जीवों में स्थानांतरित किया जाता है, तो यह जीन में हेरफेर, या ‘संपादन’ के लिए अनुमति देता है।

विभिन्न जीवों के जीनोम (Genome) उनके डीएनए अनुक्रमों के भीतर संदेशों और निर्देशों की एक श्रृंखला को सांकेतिक शब्दों में बदलते हैं। जीनोम संपादन में उन अनुक्रमों को बदलना शामिल है, जिससे संदेश बदलते हैं। अलग-अलग समूहों द्वारा किए गए अध्ययनों ने निष्कर्ष निकाला है कि कैस 9 को डीएनए के किसी भी क्षेत्र को काटने के लिए निर्देशित किया जा सकता है। एक बार जब डीएनए कट जाता है, तो कोशिका की प्राकृतिक सुधार तंत्र अंदर आ जाती है और जीनोम में परिवर्तन या अन्य परिवर्तन को शुरू करने के लिए कार्य करने लगती है।

सी.आर.आई.एस.पी.आर. का इस्तेमाल हाल ही में चीन द्वारा दो जुड़वां बच्चियों में किया गया। 25 नवंबर, 2018 को शेनज़ेन में दक्षिणी विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में ही जियानकुई के नेतृत्व में ‘द बॉम्बशैल’ (The bombshell) नामक टीम द्वारा पहले जीन-संपादित शिशुओं को बनाने की तैयारी शुरू की गई। उन्होंने बच्चे को एचआईवी, चेचक और हैजा के प्रतिरोधी बनाने के लिए CCR5 जीन को हटाने की योजना बनाई। उनके द्वारा सात भ्रूण को बदलने का दावा किया गया, जिसके परिणामस्वरूप केवल एक सफल जुड़वा लड़कियों का जन्म हुआ। इस बात के खुलासे के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई ने नाराज़गी जताई और कई वैज्ञानिकों ने, ही के इस कार्य की निंदा भी की। साथ ही चीनी अधिकारियों ने ही और उनके सहयोगियों की शोध गतिविधियों को निलंबित करने का आदेश दिया और उन पर चीनी कानूनों और विज्ञान नैतिकता का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया। वहीं कुछ नए शोध से पता चलता है कि ही के द्वारा CCR5 जीन को हटाने का प्रयास अनजाने में लड़कियों के मस्तिष्क को बदल सकता था जो अनुभूति और स्मृति को प्रभावित करता।

सी.आर.आई.एस.पी.आर. तकनीक के कई संभावित अनुप्रयोग जीनोम के साथ छेड़छाड़ की नैतिक खूबियों और परिणामों के बारे में कुछ सवालों को उठाते हैं। 2014 के विज्ञान लेख में, ओए और सहकर्मी जीन ड्राइव (Gene Drive) के उपयोग करने से कुछ संभावित पारिस्थितिक प्रभाव को इंगित करते हैं। उनके अनुसार यदि कोई ऐसा जीव जिसका जीन बदला गया हो, वो आगे क्रॉसब्रीडिंग (Crossbreeding) करे, तो इससे यह बदलाव दूसरी प्रजातियों में भी फ़ैल सकता है। साथ ही जीन ड्राइव किसी जीव की आनुवंशिक विविधता को भी कम कर सकता है।

भले ही सी.आर.आई.एस.पी.आर. का उपयोग विभिन्न समस्याओं को हल करने के लिए मुख्य रूप से संशोधित जीवों का उत्पादन करने के लिए किया गया हो, लेकिन क्या होगा अगर ये कोई समस्या को हल करने के बजाय उसे और बढ़ा दे? एक अध्ययन से पता चला है कि सी.आर.आई.एस.पी.आर. डीएनए में अनपेक्षित म्यूटेशन (Mutations) का कारण बनता है, तथाकथित ऑफ-टारगेट (Off-target) प्रभाव, जो समस्या को और अधिक बढ़ा भी सकता है।

संदर्भ:
1.
https://www.livescience.com/58790-crispr-explained.html
2. https://www.technologyreview.com/s/613007/chinas-crispr-twins-a-timeline-of-news/
3. https://www.genome.gov/about-genomics/policy-issues/Genome-Editing/ethical-concerns
4. https://nuclineers.com/dark-side-of-crispr/

https://prarang.in/Lucknow/1909163371





जे. सी. बोस का भारतीय अभियांत्रिकी और विज्ञान में अमूल्य योगदान

Invaluable contribution to Indian engineering and science by J C Bose

Lucknow
15-09-2019 02:14 PM

भारतीय वैज्ञानिक प्रोफेसर जगदीश चंद्र बोस बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। जिन्होंने रेडियो और माइक्रोवेव ऑप्टिक्स के अविष्कार तथा पेड़−पौधों में जीवन सिद्धांत के प्रतिपादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रतिभा का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भौतिक वैज्ञानिक होने के साथ-साथ वो जीव वैज्ञानिक, वनस्पति वैज्ञानिक, पुरातत्वविद और लेखक भी थे।

जे सी बोस ऐसे समय पर कार्य कर रहे थे जब देश में विज्ञान शोध कार्य लगभग नहीं के बराबर थे। ऐसी परिस्थितियों में भी बहुमुखी प्रतिभा के धनी बोस ने विज्ञान के क्षेत्र में मौलिक योगदान दिया। रेडियो विज्ञान के क्षेत्र में उनके अद्वितीय योगदान और शोध को देखते हुए ‘इंस्टिट्यूट ऑफ इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर’ (आईईईई Institute Of Electrical And Electronics Engineering) ने उन्हें रेडियो विज्ञान का जनक में से एक माना। हालांकि रेडियो के अविष्कारक का श्रेय इतालवी (Italian) अविष्कारक मार्कोनी (Marconi) को चला गया, परन्तु बहुत से भौतिक शास्त्रियों का कहना है कि प्रोफेसर जगदीश चंद्र बोस ही रेडियो के असली अविष्कारक थे।

जेसी बोस के अनुसंधानों और कार्यों का उपयोग आधुनिक समय में किया गया। आज का रेडियो, टेलिविजन, भुतलीय संचार रिमोट सेन्सिग (Earth Communications Remote Sensing), रडार, माइक्रोवेव अवन (Microwave Oven) और इंटरनेट, जगदीश चन्द्र बोस के कृतज्ञ हैं।

सन्दर्भ:-
1.
https://bit.ly/2kgeoIB
2. https://www.youtube.com/watch?v=od0wR1kte3k

https://prarang.in/Lucknow/1909153367





अवध और लॉर्ड वैलेस्ली की सहायक संधि

Subsidiary treaty of Awadh and Lord Vallesli

Lucknow
14-09-2019 10:05 AM

भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने हेतु अंग्रेजों के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण थी किन्तु इसकी संप्रुभता को पूरे भारत में फैलाने के लिए यह आवश्यक था कि वे भारत की रियासतों को अपने साथ मिला पाएं और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने भारत में मैत्री संधि या सहायक संधि का विस्तार किया। इसके विस्तार के लिये लॉर्ड वैलेस्ली, जो 1798-1805 के बीच बंगाल के गवर्नर जनरल (Governor General) थे, को उत्तरदायी माना जाता है।

वैलेस्ली भारत में अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद का विस्तार करना चाहते थे और इसलिए भारत को ब्रिटेन के साम्राज्य में बदलने के लिए उन्होंने खुद को भारत में स्थापित किया। इस संधि का एक मुख्य उद्देश्य यह भी था कि वे भारत से फ्रांसीसी प्रभाव को पूर्णतः नष्ट करना चाहते थे। इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए वैलेस्ली ने भारत के राजाओं की उत्सुकता का लाभ उठाते हुए एक नीति, जिसे सहायक संधि या सब्सिडियरी एलायंस (Subsidiary alliance) कहा जाता है, का विस्तार किया। इस नीति का मुख्य उद्देश्य राज्यों को पूरी तरह से अंग्रेजों पर निर्भर बनाना था। संधि के कुछ नियम निम्नलिखित थे:
• सहायक गठबंधन करने वाले शासक किसी अन्य शक्ति या सत्ता के खिलाफ युद्ध की घोषणा करने के लिए स्वतंत्र नहीं होंगे। उन्हें अन्य शक्तियों के साथ आपसी बातचीत करने की अनुमति अंग्रेजों से प्राप्त करनी होगी।
• जिन शासकों के राज्य तुलनात्मक रूप से अधिक मज़बूत और शक्तिशाली थे, उनकी सेनाओं को ब्रिटिश अधिकारियों के अधीन रखा जायेगा।
• सहायक गठबंधन में प्रवेश करने वाले राजाओं के प्रभुत्व की सुरक्षा अंग्रेज़ी सेना की ज़िम्मेदारी होगी, लेकिन अंग्रेज़ी सेना की देखरेख में आने वाले खर्चों का वहन राजाओं को करना होगा।
• कंपनी ने सेनाओं को संरक्षित राज्यों की सीमा के पास रखा और उनसे नकदी एकत्रित की।
• कंपनी ने अपनी सेनाओं को राज्यों की सीमा के भीतर स्थापित किया तथा उसके अंतर्गत आने वाले प्रदेशों को भी अपने अधीन किया।

इस नीति का पहला शिकार हैदराबाद के निज़ाम बने। 1801 में अवध के नवाब सआदत अली खान ने भी लॉर्ड वैलेस्ली के प्रभाव से इस गठबंधन में प्रवेश किया जिसके फलस्वरूप अवध के आधे हिस्से को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया। संधि के लिए जब वैलेस्ली कलकत्ता से लखनऊ आये तो वे अपने साथ चार्ल्स डी ओयली को भी ले आये। डी ओयली ने नवाब और वैलेस्ली की मुलाकात के कई चित्र बनाये और उन्हें जल-रंगों से सुशोभित किया। उनकी इस मुलाकात का ज़िक्र डी ओयली द्वारा लिखित किताब ‘द यूरोपियन इन इंडिया’ (The european in india) में भी किया गया है। संधि के बाद अवध का आधे से भी अधिक उपजाऊ भाग ब्रिटिश सेना के अधीन हुआ। इस क्षेत्र की वार्षिक राजस्व आय 135 लाख रुपये थी जो संधि के बाद ब्रिटिश सेना के अधीन हो गयी थी। इस संधि के लिए नवाब ने अपनी अनुशासित सेना को बेहद महंगी ब्रिटिश सेना के साथ एकीकृत कर दिया था। संधि के बाद ब्रिटिश कम दरों पर अवध के विशाल खज़ाने का उपयोग करने में सक्षम हो गये थे। उन्हें अवध के सशस्त्र बलों को चलाने का भी राजस्व प्राप्त हुआ। अवध के साथ सहायक गठबंधन ने ब्रिटिशों को रणनीतिक लाभ प्राप्त करने में सहायता प्रदान की। अवध के नवाब को अपनी सुरक्षा के लिए कंपनी को प्रतिवर्ष एक निर्धारित राशि का भुगतान करना पड़ता था। यह राशि प्रति वर्ष 76 लाख रुपये निर्धारित की गई थी।

अवध के नवाब सआदत अली खान के साथ हुई इस संधि ने अवध को ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिये एक सहायक गठबंधित राज्य बनाया और अंततः भारत के अधिकांश हिस्सों को अपने नियंत्रण में लिया।

सन्दर्भ:
1.
http://vkpeek.blogspot.com/2012/05/lucknow-gentleman.html
2. http://vkpeek.blogspot.com/2012/05/lucknow-series.html
3. https://bit.ly/2m8kuv8
4. https://www.gktoday.in/gk/subsidiary-alliance-system-by-lord-wellesley/
5. http://www.historydiscussion.net/british-india/wellesley-aims-policy-and-estimate/5939

https://prarang.in/Lucknow/1909143363





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