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रामपुर और लखनऊ को संदर्भित करता रडयार्ड किपलिंग का प्रसिद्ध उपन्यास ‘किम’

Rudyard Kiplings famous novel Kim refers to Rampur and Lucknow

Lucknow
20-06-2019 11:26 AM

रडयार्ड किपलिंग 19वीं और 20वीं शताब्दी की शुरुआत के ब्रिटिश लेखक और कवि थे। उन्होनें अपने जीवन का अधिकांश भाग भारत में ही बिताया। इस दौरान उन्होनें भारत आधारित कई लघु कथाएं और कविताएं लिखीं जो आज भी लोगों में काफी लोकप्रिय हैं। उनके सबसे ज़्यादा पसंद किये जाने वाले उपन्यासों में ‘किम’ भी एक है। यह उपन्यास एक तेरह वर्षीय बालक किम पर आधारित है जो लाहौर में रहता था तथा जिसका अपहरण एक अफीम मांद के रक्षक द्वारा किया गया था।

किम आयरिश मूल का था तथा उसमें विभिन्न संस्कृतियों में घुल मिल जाने की क्षमता थी। भाषा के लिए उसकी आत्मीयता के कारण उसे ‘फ्रेंड ऑफ ऑल द वर्ल्ड’ (Friend of All the World) के रूप में जाना जाता था। उसकी मुलाकात तिब्बत से आये एक बौद्ध लामा से हुई। बौद्ध लामा ज्ञानोदय हेतु एक पवित्र नदी की तलाश में आए थे। किम ने फैसला किया कि वह भी उस नदी को खोजने में बौद्ध लामा की मदद करेगा। इस नदी का स्थान सभी के लिए एक रहस्य था। किम ने इसकी सूचना अपने दोस्त महबूब अली जो कि ब्रिटिश जासूस था, को दी। इस पर अली ने अम्बाला में एक अंग्रेज को देने के लिए कुछ कागज़ात किम को दिये। जिस दिन वे अपनी यात्रा के लिये निकले, उस रात किम ने दो अजनबियों को अली की चीज़ों को कुरेदते हुए देखा और तब उसे खतरे का आभास हुआ। ट्रेन पर सवार किम और लामा अम्बाला जाते हुए सभी क्षेत्रों के लोगों से मिले जिनके रीति-रिवाज़ और भाषाएं भिन्न-भिन्न थी। अम्बाला पहुंचने पर किम ने उस अंग्रेज़ को खोज लिया जिसके लिये अली ने वे कागज़ात भिजवाये थे। इस दौरान किम को यह आभास हुआ कि वहां कोई युद्ध चल रहा है और उन कागज़ातों का सम्बंध उस युद्ध से ही है।

अम्बाला के निकट एक इलाके में किम और लामा की मुलाकात एक पुराने भारतीय सैनिक से होती है जिसने कई सालों पहले अंग्रेजों के लिये लड़ाई लड़ी थी। वह सैनिक भी किम और लामा की इस यात्रा में शामिल हो जाता है और तीनों ग्रैंड ट्रंक रोड (Grand Trunk Road) की ओर निकल पड़ते हैं। इस दौरान किम को एक अंग्रेजी रेजिमेंट (Regiment) द्वारा बंदी बना लिया जाता है। यह पता चलने पर कि यह लड़का वही आयरिश है जिसके पिता किम्बल ओ'हारा (Kimball O’Hara) ने उनके साथ लड़ाई लड़ी थी, तो रेजिमेंट ने उसे लामा के साथ यात्रा करने से मना कर दिया जिस कारण लामा ने अपनी पवित्र नदी की खोज को अधूरा ही छोड़ दिया।

रेजिमेंट के साथ यात्रा करने वाले फादर विक्टर (Victor) एक पत्र को दर्शाते हैं जिसमें लिखा था कि लामा सेंट ज़ेवियर्स (St. Xavier) जो कि श्वेत लोगों के लिए एक कैथोलिक स्कूल (Catholic School) है, में किम की शिक्षा के लिए भुगतान करेंगे। किम को यह मंज़ूर नहीं था किंतु अली ने किम को समझाया कि सेंट ज़ेवियर्स में शिक्षा ग्रहण करना उसके लिये सबसे अच्छा विकल्प है। रेजीमेंट के कर्नल क्रेयटन किम को एक जासूस के रूप में नियुक्त करना चाहते थे। सेंट ज़ेवियर्स में किम लगभग एक साल व्यतीत करता है और गर्मियों में अली के साथ कार्य करने के लिए खुद को एक हिंदू भिखारी के रूप में प्रदर्शित करता है। किम जानता था कि अली ब्रिटिश सेना का एक जासूस है और वह उसे भी इसी चीज़ के लिये प्रशिक्षित करेगा। किम उन दो अजनबियों के बारे में अली को चेतावनी देता है और उसकी जान बचाता है। इसके बाद क्रेयटन, किम को एक अन्य जासूस लुर्गन साहिब के पास भेजता है ताकि किम के वापस सेंट ज़ेवियर्स जाने से पहले लुर्गन साहिब और चंदरमुखर्जी दोनों किम के जासूसी प्रशिक्षण की देखरेख कर सकें।

सोलह वर्ष का होने पर किम को स्कूल से छुट्टी दे दी गयी और उसे एक बौद्ध पुजारी का भेष दिया गया ताकि वह एक जासूस के रूप में काम करना शुरू कर सके। उसकी मुलाकात पुनः लामा से होती है। किम द्वारा जासूसी नेटवर्क (Network) में किसी शख्स की मदद करने पर लामा को लगता है कि उसके पास कोई जादुई शक्ति है तथा उसे अपने कार्य के लिये ऐसी शक्तियों का इस्तेमाल न करने की चेतावनी देते हैं।

इस उपन्यास में रामपुर का ज़िक्र भी आया है। जब मुखर्जी किम से मिलता है और उसे बताता है कि उत्तरी सीमा से परे स्वतंत्र क्षेत्रों पर शासन करने वाले पांच राजा रूसियों के साथ गठबंधन कर रहे हैं। मुखर्जी ने किम से मदद करने के लिए कहा और इसलिए किम ने लामा को उत्तर की यात्रा करने हेतु आश्वस्त किया। जब मुखर्जी को जासूसों के साथ पकड़ लिया गया, तो उसे पता चला कि वास्तव में उनमें से एक फ्रांसीसी है और उसने यह विश्वास दिलाया कि वे दूत हैं जिन्हें रामपुर के राजा द्वारा उनका स्वागत करने के लिए भेजा गया है। इसी बीच लामा बीमार पड़ जाता है और निर्णय लेता है कि उसे दक्षिण वापस लौटना चाहिए।

किपलिंग ने उपन्यास में लखनऊ के ला मार्टिनियर स्कूल (La Martiniere School) का उल्लेख किया था परन्तु इसका नाम सेंट ज़ेवियर्स दिया गया। निम्न अवतरण से इस बात की पुष्टि की जा सकती है।

व्यापारी ने महबूब से कहा कि, “मैं आप से फिर मिलूंगा यदि आप के पास इस प्रकार का कुछ और बेचने के लिये होगा”। वह किम से कहता है कि, “तुम्हारी किस्मत बन गयी है। कुछ समय में तुम लखनऊ के लिए निकलोगे। मई तुमसे फिर मिलूँगा, शायद एक से ज़्यादा बार”। कर्नल किम को समझाते हैं कि, “तीन दिन में तुम मेरे साथ लखनऊ चलोगे तथा रास्ते में हर समय कई नई चीजें देखने और सुनने मिलेंगी। इसलिए तीन दिन तक तुम्हें तसल्ली से बैठे रहना चाहिए। तुम लखनऊ के स्कूल में जाओगे”। इस पर किम प्रश्न पूछता है कि, “क्या मैं लखनऊ में उस पवित्र व्‍यक्ति (लामा) से मिलूंगा?”
कर्नल किम को समझाता है कि, “अम्बाला की अपेक्षा लखनऊ बनारस से ज़्यादा निकट है और यह बात अच्छी है”।

किम में लखनऊ का वर्णन कुछ इस प्रकार दिया गया है:
When they came to the crowded Lucknow station there was no sign of the lama. Kim swallowed his disappointment, while the Colonel bundled him into a ticca-gharri with his small belongings and despatched him alone to St. Xavier's. 'I do not say farewell, because we shall meet again,' he cried. 'Again, and many times, if thou art one of good spirit. But thou art not yet tried.' 'Not when I brought thee'—Kim actually dared to use the tum of equals—'the white stallion's pedigree that night?' 'Much is gained by forgetting, little brother,' said the Colonel, with a look that pierced through Kim's shoulder-blades as he scuttled into the carriage. It took him nearly five minutes to recover. Then he sniffed the new air appreciatively. 'A rich city,' he said. 'Richer than Lahore. How good the bazars must be. Coachman, drive me a little through the bazars here.' 'My order is to take thee to the school.' The driver used the 'thou,' which is rudeness when applied to a white man. In the clearest and most fluent vernacular Kim pointed out his error, climbed on to the box-seat, and, a perfect understanding being established, drove for a couple of hours up and down, estimating, comparing, and enjoying. There is no city—except Bombay, the queen of all—more beautiful in her garish style than Lucknow, whether you see her from the bridge over the river, or the top of the Imambara looking down on the gilt umbrellas of the Chutter Munzil, and the trees in which the town is bedded. Kings have adorned her with fantastic buildings, endowed her with charities, crammed her with pensioners, and drenched her with blood. She is the centre of all idleness, intrigue, and luxury, and shares with Delhi the claim to talk the only pure Urdu.

उपरोक्त पंक्तियों का हिंदी अर्थ निम्नांकित है:-

जब वे दोनों भीड़-भाड़ वाले लखनऊ स्टेशन पर आए तो किम को लामा का कोई पता नहीं था। किम ने अपनी इस निराशा को निगल लिया और कर्नल ने उसे सेंट ज़ेवियर्स में अकेला छोड़ दिया। किम के अनुसार लखनऊ लाहौर से भी ज्यादा अमीर शहर है। कोई भी शहर (बॉम्बे को छोड़कर) ऐसा नहीं है जो लखनऊ की तुलना में अपनी भव्य शैली में अधिक सुंदर हो, चाहे उसे किसी भी रूप में देखा जाये। राजाओं ने इस शहर को शानदार इमारतों से सजाया है, दान से संपन्न किया है, और खून से सराबोर किया है। यह आलस्य, रोचकता और विलासिता का केंद्र भी है जो दिल्ली के साथ एकमात्र शुद्ध उर्दू पर बात करने का दावा करता है।

संदर्भ:
1. http://www.supersummary.com/kim/summary/
2. https://en.wikisource.org/wiki/Page:Kim_-_Rudyard_Kipling_(1912).djvu/166
3. https://en.wikisource.org/wiki/Page:Kim_-_Rudyard_Kipling_(1912).djvu/173

https://prarang.in/Lucknow/1906203002





कब, कैसे और कहाँ हुई टाई की उत्पत्ति?

When how and where was the origin of tie

Lucknow
19-06-2019 11:06 AM

दुनिया भर में पुरुषों की पोशाक में नेकटाई (Necktie) का एक विशेष स्थान है। विभिन्न स्थानों में इसका उपयोग आज अनिवार्य रूप से किया जाने लगा है। वर्तमान में इसका उपयोग केवल किसी व्यावहारिक उद्देश्य के लिये ही नहीं किया जा रहा बल्कि सजावटी उद्देश्य के लिये भी किया जा रहा है। हज़ारों वर्षों से टाई विभिन्न रूपों में अस्तित्व में रही है। प्राचीन मिस्र में टाई का उपयोग चार हज़ार साल पूर्व से किया जा रहा है। पुरातत्वविदों के अनुसार मिस्र में ममियों (Mummies) के गले में भी टाई को ताबीज़ के रूप में पहनाया जाता था। ओशियनिया (Oceania) में अमेज़न के आदिवासी बहुत कम कपड़े पहनते थे लेकिन उनके जीवन में भी गले के वस्त्रों का बहुत विशेष स्थान था। कहा जाता है कि नेकटाई की शुरूआत यूरोप में तीस साल के युद्ध की उथल-पुथल के दौरान हुई। उस समय इसका उपयोग स्कार्फ (Scarves) के रूप में किया गया। इन स्कार्फ का उपयोग सम्मान के प्रतीक के रूप में केवल सैनिक ही किया करते थे। उस समय आम जनता को इसे पहनने की अनुमति नहीं थी। इन स्कार्फ का उपयोग सबसे पहले टेराकोटा वारियर्स (Terracotta Warriors) ने किया था। बौद्धकाल में भी टाई का प्रचलन काफी अधिक प्रचलित था। टाई का आविष्कारकर्ता क्रोट्स (Croats) को माना जाता है। क्रोट (Croat) शब्द ह्र्रवात (hrvat) से उपजा है, जो अंततः क्रैवेट (Cravat) में विकसित हुआ।

राजा लुईस XIII ने क्रोएशियाई व्यापारियों को नियुक्त किया, जिन्होंने अपनी वर्दी के हिस्से के रूप में अपनी गर्दन के चारों ओर कपड़े का एक टुकड़ा पहना। राजा लुईस को यह काफी पसंद आया और उन्होंने सभी शाही सभाओं के लिए इसे अनिवार्य बना दिया। क्रोएशियाई सैनिकों को सम्मानित करने के लिए उन्होंने इस कपड़े के टुकड़े को "ला क्रैवेट" (La Cravate) का नाम दिया जिसे फ्रेंच में नेकटाई कहा गया। यह शैली पूरे यूरोप में 200 वर्षों तक लोकप्रिय रही।

ब्रूमेल (Brummell’s) के सार्टोरियल (Sartorial) शासन के तहत बारीक गांठ वाला क्रैवेट उस समय हर फैशनेबल (Fashionable) व्यक्ति की पहचान बन गया। इसके बाद रंग-बिरंगे और मुलायम सिल्क (Silk) नेकवियर को काउंट डोरसे (Count d’Orsay) द्वारा पेश किया गया। काउंट डोरसे ने नेकवियर बनाने हेतु टाई की नरम आकृतियों को प्राथमिकता दी। काले कोट और सफेद शर्ट के साथ पहने जाने वाले काले रंग के नेकवियर को उन्होनें ही लोकप्रिय बनाया। नेकटाई के प्रमाण रोमन काल से भी प्राप्त हुए हैं। जब रोमन सम्राट ट्रोजन ने डाकियन्स (Dacians) को हराया, तो अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए एक संगमरमर का स्तंभ बनवाया जिसमें हज़ारों सैनिकों को साहसी चरित्र के प्रतीक के रूप दर्शाने के लिये नेकटाई पहनायी गयी थी।

1920 तक नेकटाई के डिज़ाइनों में बहुत से परिवर्तन किये गये। यह दशक पुरुषों की टाई के लिये महत्वपूर्ण दशक था। इस समय तक पुरुषों के लिए नेकटाई प्रमुख विकल्प बन गई थी क्योंकि औपचारिक रूप से इनका उपयोग बहुत अधिक किया जाने लगा था। 1924 में, अमेरिकी दर्जी जेसी लैंग्सडॉर्फ ने एक टाई बनाने की प्रक्रिया का पेटेंट (Patent) कराया। उनके दर्जी अनुभव ने कर्लिंग (Curling) टाई के चलन को समाप्त कर इसे नया रूप दिया। 1930 के दशक के आर्ट डेको आंदोलन (Art Deco movement) के दौरान नेकटाई और भी अधिक व्यापक हो गई। इसके बाद 1950 के दशक में स्किनी (Skinny) टाई का उद्भव हुआ। यह शैली विशेष रूप से अधिक फिटिंग के कपड़ों के लिये बनवायी गयी थी। 1970 के दशक में अत्यंत विस्तृत ‘किपर टाई’ (Kipper Tie) को अपनाया गया। 1990 के दशक में नेकटाई की चौड़ाई कम करके 3.75-4 इंच कर दी गयी जिसके पुष्प-सम्बन्धी और पैस्ले (Paisley) पैटर्न बहुत लोकप्रिय हुए। सन 2000 से 2010 के बीच यूरोपीय डिज़ाइनरों ने इसे आकर्षक रूप देने के लिये इसकी चौड़ाई को और भी कम कर दिया। आज के युग में इसका चलन भारत सहित कई अन्य देशों में बढ़ रहा है। कई नये पैटर्नों के विकास के साथ इसकी लोकप्रियता और भी अधिक बढ़ती जा रही है।

अगर देखा जाए तो केवल पोशाक को सुंदर रूप देने के लिये ही इसका विकास नहीं किया गया था बल्कि वर्षों पहले यूरोप के बर्फ वाले इलाकों में गर्दन को ठंड से बचाने के लिये भी इनका प्रचलन शुरू किया गया था। आज व्यापारिक दुनिया के भीतर संबंधों की अभिव्यक्ति के लिये इनका उपयोग विशेष रूप से किया जा रहा है। टाई पोशाकों को औपचारिक रूप प्रदान करती है तथा संबद्धता सूचक भी है।

वर्तमान में टाई का चलन केवल पुरूषों में ही नहीं बल्कि महिलाओं में भी व्यापक हो गया है। महिलाओं द्वारा विभिन्न कार्यक्षेत्रों में पहनी जाने वाली वर्दी का यह अब अभिन्न अंग बन चुकी है।

संदर्भ:-
1.https://www.gentlemansgazette.com/evolution-neckwear-tie-cravat-scarf/
2.https://www.tie-a-tie.net/the-evolution-of-the-necktie/
3.https://www.quora.com/Why-do-people-wear-ties-What-is-the-origin-of-this-useless-article-of-clothing
4.https://theuijunkie.com/neck-tie-origin/
5.https://www.pastemagazine.com/articles/2017/06/the-necktie-a-brief-history.html

https://prarang.in/Lucknow/1906192999





तेप्ची कढ़ाई- जो मशीनों के इस दौर में भी हाथ से की जाती है

Tepchi embroidery which is also hand-held in this round of machines

Lucknow
18-06-2019 11:04 AM

कढ़ाई यानी रंग-बिरंगे धागों से सुई की मदद से कुछ ऐसा काढ़ना, जो कपड़े की सुन्दरता को बढ़ा दे। पुराने ज़माने में कढ़ाई हाथों से ही की जाती थी, लेकिन वक्त बदलने के साथ ही आज कढ़ाई मशीनों (Machines) से भी की जाने लगी है। कढ़ाई करना तब भी बारीकी और हुनर का काम था और आज भी है। तो चलिये जानते हैं कि हाथ की कढ़ाई और मशीन की कढ़ाई में क्या अंतर है और कैसे दोनों के बीच पहचान कर सकते हैं। हाथ की कढ़ाई और मशीनों की कढ़ाई में मुख्य अंतर टांके लगाने की प्रक्रिया का है। गुणवत्ता की दृष्टि से, हाथ की कढ़ाई अधिक सपाट और नरम होती है और विभिन्न प्रकार के टांके, धागे द्वारा निर्मित होती है। हस्तनिर्मित कढ़ाई में अद्वितीय शैली, उत्तम डिज़ाइन (Design), कढ़ाई का सावधानीपूर्वक काम, जीवंत सुई का काम, सुरुचिपूर्ण रंग, और मज़बूत स्थानीय विशेषतायें देखने को मिलती हैं।

वहीं मशीन की कढ़ाई की बात करें तो यह पूरे कपड़े पर एक समान होती है और कंप्यूटर (Computer) द्वारा डिज़ाइन की जाती है। इसमें पूर्व-निर्मित पैटर्न (Pattern) एक कंप्यूटर प्रोग्राम (Program) में लगाए जाते हैं जो कढ़ाई मशीन पर कढ़ाई के टांकों को नियंत्रित करता है। साथ ही साथ इससे निर्मित सभी डिज़ाइन एकसमान होते हैं और बिल्कुल एक जैसे दिखते हैं। 1828 में फ्रांस में पहली कढ़ाई मशीन बनाई गई थी। इसके बाद 1863 में स्विस (Swiss) कढ़ाई मशीन बनाई गई जिसे शिफली (Schiffli) नाम दिया गया था। आखिरकार, 1900 की शुरुआत में, सिंगर (Singer) ने कई सिरों के साथ एक कढ़ाई मशीन विकसित की और तब से अब तक कढ़ाई मशीनें हर दौर में विकसित होती आई हैं।

मशीन की कढ़ाई में धागों को विभाजित नहीं किया जा सकता परंतु हस्तनिर्मित कढ़ाई में कारीगर द्वारा धागों को विभाजित किया जा सकता हैं। मशीन कढ़ाई के लिए धागे फाइबर (Fibre) सामग्री से, जैसे रेयान (Rayon), पॉलिएस्टर (Polyester) या धातु आदि से बने होते हैं और जब मशीन कढ़ाई की जाती है, तो यह बहुत तंग होती है। जबकि हस्तनिर्मित कढ़ाई धागा प्राकृतिक रेशम से बना होता है।

हस्तनिर्मित कढ़ाई हाथों से किये जाने की वजह से बहुत धीमी गति से होती है, जबकि मशीनी कढ़ाई बहुत तेज़ी से हो जाती है। इस कारण इनकी कीमतों में भी अंतर होता है। यदि आप एक हस्तनिर्मित कढ़ाई की शॉल खरीदते हैं तो इसकी कीमत आपको मशीन कढ़ाई से निर्मित शॉल से ज्यादा चुकानी पड़ेगी। हस्तनिर्मित कढ़ाई के वस्त्र, मशीन कढ़ाई से निर्मित वस्त्रों की तुलना में अधिक महंगे होते हैं क्योंकि हस्तनिर्मित कढ़ाई के वस्त्रों को बनाने में ज़्यादा समय, मेहनत और लागत लगती है। हस्तनिर्मित कढ़ाई में एक कारीगर अपने विवेक से सुई द्वारा वस्त्र के प्रत्येक हिस्से को कई धागों से सुंदर तरीके से सजाता है। धागों की विभिन्न मोटाई के कारण अधिक डिज़ाइन अच्छे से उभर कर आते हैं। यदि आप हस्तनिर्मित कढ़ाई के वस्त्र लेना चाहते हैं परंतु मशीन कढ़ाई और हाथ कढ़ाई के बीच अंतर का पता नहीं लगा पाते तो निम्न तरीकों से पता लगा सकते हैं:
मशीन की कढ़ाई में एक सतत कढ़ाई की प्रक्रिया द्वारा डिज़ाइन तैयार किये जाते हैं। यदि आप इसके पीछे की तरफ देखेंगे तो आपको बहुत कम धागे लटके हुये नज़र आएंगे। इसके विपरित हाथ की कढ़ाई करते समय शिल्पकार समय-समय पर एक धागे को तोड़कर अन्य नये धागे से जब काम शुरू करता है तो पीछे की तरफ पुराने धागे में गांठ लगा कर छोड़ देता है। इस प्रकार पीछे की तरफ बहुत से लटके हुये धागे नज़र आएंगे।
हाथ की कढ़ाई अच्छी तरह से रंगों के साथ सुव्यवस्थित होती है। जबकि मशीन की कढ़ाई में रंग अतिव्याप्त हो जाते हैं।
आपने अक्सर देखा होगा कि मशीन की कढ़ाई में फूल और पत्तियाँ ज़्यादातर सीधी रेखा में होते हैं जबकि हाथ की कढ़ाई में कुशल हाथों द्वारा घुमावदार डिज़ाइन भी बनाये जा सकते हैं।

हस्तनिर्मित कढ़ाई की बात करें तो लखनऊ की चिकनकारी मशहूर कढ़ाई है। चिकनकारी का अर्थ है चिकन (Chikan) का कार्य। चिकन फारसी शब्द से बना है, जिसका अर्थ मुख्य रूप से जटिल और उत्तम सुई के काम से तैयार किया हुआ कपड़ा है। यह लखनऊ की मशहूर कढ़ाई है, जिसमें लखनवी नज़ाकत देखने को मिलती है। कहा जाता है कि मुगल सम्राट जहांगीर की पत्नी नूरजहां इसे ईरान से सीख कर आई थीं और एक दूसरी धारणा यह है कि नूरजहां की एक बांदी बिस्मिल्लाह जब दिल्ली से लखनऊ आई तो उसने इस हुनर का प्रदर्शन किया। इस कढ़ाई के नमूनों में महीन कपड़े पर सुई-धागे से तरह-तरह के टांकों द्वारा हाथ से पशु-पक्षी, गुलदस्ते, मोर, बेल-बूटे, फूल-पत्ते बनाये जाते हैं। चिकनकारी में सूती में मुर्री, बखिया, जाली तेप्ची, फंदा, आदि टाँकों का प्रयोग किया जाता है। इनमें से सबसे प्रमुख और अत्यंत सरल टांके तेप्ची हैं।

तेप्ची टांके आज भी हाथों द्वारा ही काढ़े जाते हैं। इन्हें तैप्ची या तीप्खी भी कहा जाता है। ये एक विशिष्ट प्रकार के टांके का काम है जो चिकनकारी कढ़ाई में उपयोग किये जाते हैं। इस शैली में, कपड़े को एक बार में एकल पंक्तियों के साथ बुना जाता है। यह शैली चिकनकारी की सबसे बुनियादी शैली है इसलिये चिकनकारी करने के लिये इन्हें सीखना आवश्यक है। हालांकि आज मशीनों से कई प्रकार की कढ़ाई की जाती है परंतु तेप्ची शैली बड़े चिकनकारी परिधान का हिस्सा है इसलिये आज भी कढ़ाई की इस शैली को केवल हाथ से किया जाता है। यह कढ़ाई का सबसे बुनियादी रूप है और आमतौर पर अधिक विस्तृत और जटिल पैटर्न बनाने के लिए उपयोग में लाया जाता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो पूरी तरह से हाथ से और कपड़े के दाईं ओर की जाती है।

संदर्भ:
1. http://blog.delicatestitches.com/embroidery-hand-vs-machine/
2. https://bit.ly/2FePEYo
3. https://bit.ly/31BFM4G
4. https://www.utsavpedia.com/motifs-embroideries/tepchistitch/

https://prarang.in/Lucknow/1906182995





क्या बंदर केवल शाकाहारी होते हैं?

Are monkeys only vegetarian

Lucknow
17-06-2019 11:08 AM

आज लगभग 264 प्रकार के बंदर इस दुनिया में रहते हैं। इनमें से कई प्रजातियां आपने लखनऊ के चिड़ियाघर में देखी ही होंगी। हम सभी को बचपन से बताया गया है कि बंदर हमारे पूर्वज हैं। ऐसा इसलिए माना गया क्योंकि वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में काफी शोध एवं खोजें की हैं। इसके अलावा हम सभी को यह भी बताया गया है कि बंदर केवल शाकाहारी होते हैं। परंतु यह पूरा सच नहीं है, बंदर वैसे तो मुख्यतः अपने खाने में फल, सब्जियां, पत्तियां आदि ही खाते हैं, लेकिन शाकाहार के उपलब्ध न होने पर वे माँसाहार भी करते है। शोध बताते हैं कि बंदर शाकाहारी होने के साथ-साथ मांसाहारी भी होते हैं। ये फल, फूल, पत्ते, पौधे और ज़रूरत पड़ने पर छोटे-मोटे कीड़ों, अण्डों और छिपकली आदि को भी खा जाते हैं, अतः ये सर्वाहारी होते हैं।

पहले ये माना जाता था कि चिंपैंजी शाकाहारी होते हैं, परंतु 1960 के दशक की शुरुआत में, जेन गुडॉल (Jane Goodall) द्वारा पूर्वी अफ्रीकी जंगल में किये गये अध्ययन से पता चला कि चिंपैंजी मांस का सेवन भी करते हैं। कई लोगों द्वारा उन्हें गलत भी बताया गया। यह बात तब तक नहीं मानी गई जब तक कि जंगलो में कई बार इनको शिकार करते हुये नहीं देखा गया। जैविक विज्ञान के प्रोफेसर क्रैग स्टैनफोर्ड बताते हैं कि बाद में पूरे वैज्ञानिक समुदाय ने स्वीकार किया कि मांस खाना चिंपैंजी के व्यवहार का एक मुख्य पहलू है। दुनिया में सबसे बड़े बंदर हैं गोरिल्ला। लेकिन, उनके विशाल आकार के बावजूद, गोरिल्ला शांतिपूर्ण प्राणी हैं जो ज्यादातर फल, तने, पत्तियां, छाल, बेलें, बांस, आदि खाते हैं। अधिकांश गोरिल्ला शाकाहारी होते हैं।

लेकिन यदि गोरिल्ला को भी पर्याप्त मात्रा में फल और सब्जियां नहीं मिले तो वे घोंघे, कीड़े आदि तक खा जाते हैं। परंतु गोरिल्ला और चिंपैंजी के व्यवहार में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये अपनी भूख के मुताबिक ही भोजन करते हैं और कभी भी व्यर्थ में अपने प्राकृतिक आवास के भोजन के स्रोतों का नाश नहीं करते हैं, फिर चाहे वो किसी भी प्रकार का शाकाहारी या मांसाहारी भोजन क्यों न हो। इतना ही नहीं, वे वनस्पति को इस तरह से काटते हैं कि यह फिर से जल्दी से बढ़ जाती है और इस प्रकार उन्हें भोजन की कमी नहीं होती। हम इंसानों को भी बंदरों की इस आदत से कुछ सीखना चाहिये।

वैसे तो भारतीय बंदर (जिन्हे रीसस मकैक (Rhesus macaque) या मकैका मुलाटा (Macaca mulatta) भी कहते हैं) पुरानी दुनिया के बंदरों की सबसे प्रसिद्ध प्रजातियों में से एक हैं और ये शायद ही कभी मांस खाते हैं, परंतु इन्हें भी दीमक, चींटियाँ और कीड़े खाते हुए देखा गया है। यह दक्षिण, मध्य और दक्षिण पूर्व एशिया का मूल निवासी है और इनकी आबादी व्यापक रूप से हर जगह फैली हुई है। इनकी ज्यादातर प्रजातियों को फल आदि पसंद हैं परंतु कुछ प्रजातियों को मांस का सेवन करते हुये देखा गया है। अधिकांश वानर प्रजातियां अवसरवादी होती हैं, जो कुछ भी प्राप्त हो जाने पर उसे खा जाते हैं।

आपने अक्सर देखा होगा कि भारतीय बंदर स्थानीय लोगों के द्वारा दिये जाने वाले खाने को खा लेते हैं, परंतु अध्ययनों में पाया गया है कि ये दयालुता हमारे वन खाद्य जाल और पारिस्थितिकी तंत्र में एक बड़े बदलाव का कारण बन सकती है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज़ (National Institute of Advanced Studies - NIAS) की अस्मिता सेनगुप्ता और उनकी टीम के हालिया अध्ययन में पाया गया है कि मानव द्वारा पूजा स्थलों या अन्य स्थलों पर खाना खिलाने से उन्होंने जंगलों के पेड़ों से प्राप्त फलों का सेवन कम कर दिया है जिस कारण कई फलों की किस्मों के बीजों का फैलाव नहीं हो पा रहा है। इस प्रकार मनुष्यों द्वारा बंदरों को खाना खिलाना प्राकृतिक प्रक्रियाओं के लिए खतरनाक भी साबित होता जा रहा है।

संदर्भ:
1. https://www.quora.com/Do-monkeys-eat-meat
2. https://www.livescience.com/27944-monkeys.html
3. https://bit.ly/2WNWY3g
4. https://bit.ly/2BUzCQY
5. https://animalsake.com/what-do-monkeys-eat
6. https://en.wikipedia.org/wiki/Rhesus_macaque

https://prarang.in/Lucknow/1906172990





समय के साथ स्वाभाविक होते पिता

father becomes open minded over time

Lucknow
16-06-2019 10:30 AM

बदलते ज़माने के साथ पिता का स्वरुप भी बदल गया है और हमेशा गम्भीर और कठोर दिखने वाले पिता की जगह अब अपने बच्चों के संग खेलने और मस्ती करने वाले पिता ने ले लिया है। समय के साथ बदलाव तो स्वाभाविक हैं, लेकिन पिता के कर्त्तव्य में कोई बदलाव नहीं होगा और यही हमारी संस्कृति रही है। बदलते ज़माने और रोजगार की जरूरतों की वजह से आज हम में से कई अपने माता-पिता से दूर हो गए हैं, ऐसे में हम उन बुजुर्ग कदमों को चाह कर भी सहारा नहीं दे पा रहे हैं, उनका अकेलापन नहीं दूर कर पा रहे हैं, तो मन में बस एक टीस भर जाता है अपनों के लिए, जो बेहद बेचैन करता है। हालाँकि, आज संयुक्त परिवारों के बिखंडन से बुजुर्ग माँ-बाप की समस्याएं कहीं ज्यादा विकराल हो गयी है।

तो आइये इस पितृ दिवस धन्यवाद दें उनको जिसने अपनी खुशियाँ भूलकर अपने पुरे जीवन को हमारे लिए कुर्बान कर दिया। प्रारंग की तरफ से सभी पिताओं को दिल से सलाम। इस रविवार हम आपके लिए लेकर आयें हैं पॉकेट फिल्म्स (Pocket Films) द्वारा निर्मित और तरुण द्वारा निर्देशित, पिता के प्रेम और त्याग को प्रदर्शित करने वाली कविता जिसे इस चलचित्र के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है। यह चलचित्र पिता-पुत्री के संबंध का एक मजबूत बंधन दिखाता है। इसकी शुरुआत कथाकार (कवि) से होती है, जो कविता सुनाती है, इसके साथ ही चलचित्र में स्मरण (Flash Back) दिखाया जाता है, जब वो पांच साल की थी तब कैसे प्यार से उसके पिता ने उसका पालन पोषण किया, अब वह 25 साल की है और अपने पिता से दूर है और स्वतंत्र जीवन जी रही है और अकेले ही सभी चुनौतियों का सामना कर रही है, जो उसे उसके पिता के बलिदानों के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर रहा है, कैसे उसके पिता ने उसे इस काबिल बनाया।

सन्दर्भ:-
1. https://www।youtube।com/watch?v=PGblvXeOiTg

https://prarang.in/Lucknow/1906162988





क्या महानगरों में एसी के बिना प्राकृतिक रूप से जीवन यापन करना संभव है?

Is it possible to live in a metro city without ac

Lucknow
15-06-2019 10:55 AM

इस भीषण गर्मी में कोई भी व्यक्ति अपने घर, दफ्तर, दुकान में एसी (AC) के बिना काम करने की कल्पना भी नहीं कर सकता है। लेकिन क्या यह संभव है कि इस तपते मौसम में महानगरों में प्राकृतिक वातावरण से भरपूर जीवनशैली को अपनाकर बिना एसी के रहा जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में चारों ओर हरियाली होने के कारण उस जगह में रहने वाले लोग आधुनिकता के साथ-साथ प्राकृतिक जीवन जीते हैं। वहीं प्राकृतिक तरीके से शहरों में भी आधुनिक जीवन यापन करने के लिए कुछ वैकल्पिक समाधान संभव हैं। यदि हम पश्चिम के तौर तरीकों को भूल कर प्राचीन नीति से जीवन जीएं तो हम भी आधुनिकता के साथ-साथ प्राकृतिक तरीके से जीवन यापन कर सकते हैं।

प्राकृतिक जीवन ज़िन्दगी के हर पहलू को बदलता है। यह अस्वास्थ्यकर व्यवहार और व्यस्त जीवन शैली के साथ जुड़े विषैले तत्वों पर अंकुश लगाता है। प्राकृतिक जीवन शैली को अपनाने से पैसे बचते हैं, तनाव कम होता है और अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त होता है। अब आप सोच रहे होंगे कि इसकी शुरुआत कैसे करें। सर्वप्रथम आप अपने घरेलू उपयोगी चीजों में रसायन की मात्रा को कम करना आरंभ करें। साथ ही स्वास्थ्य बने रहने का सबसे स्वस्थ तरीका है घर में ही कुछ सब्ज़ियाँ उगाएं। इसकी शुरुआत आप रसोई की खिड़की में एक छोटा सा मेथी का पौधा लगाकर कर सकते हैं।

आपको बता दें कि केरल के रहने वाले एक जोड़े ने अपने घर को कुछ इस तरह बनाया हुआ है कि यदि बाहर 40 डिग्री (Degree) का भी तापमान हो तो भी उन्हें पंखे की कोई आवश्यकता नहीं होती है। उन्होंने अपने आस –पास को जंगल की भांती ही खिलने दिया हुआ है। साथ ही घर की दीवारों को मिट्टी से बनाया गया है। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात तो यह है कि पिछले 17 वर्षों में उन्हें कोई दवा नहीं लेनी पड़ी, जिसका कारण यह है कि वे अपने घर के पास ही प्राकृतिक तरीके से फल और सब्ज़ियाँ उगाते हैं।

मध्य प्रदेश के एक वास्तुकार को जब एक परिवार द्वारा एयर कंडीशनिंग (Air Conditioning) के बिना एक ठंडा घर बनाने के लिए कहा गया तो वास्तुकार ने उन्हें सजावटी जाली की दीवार वाला एक घर का सुझाव दिया जिससे वायु-संचार होता रहेगा। इसके परिणामस्वरूप रामबाघ नामक वह घर, हर साल घर के बाहर और अन्दर के तापमान में 6 से 8 डिग्री की भिन्नता को बनाए रखता है।

स्वयं को और अपने घर को ठंडा करने के ये कुछ प्राकृतिक तरीके आपको बिजली के बिल पर पैसे बचाने में भी मदद करेंगे और गर्मी के मौसम में एयर कंडीशनिंग का कम उपयोग करने में भी मदद करेंगे।

सामान्य प्रौद्योगिकी का उपयोग करें :- इसके लिए आपको केवल एक पंखा, बड़ी धातु की कटोरी, और बर्फ चाहिए । पंखे के समीप बर्फ के कटोरे को रख दो और पंखे की हवा कटोरे से होते हुए ठंडी और स्वस्थ हवा प्रदान करेगी।

हवा संचरण के आवगमन :- हवा संचरण के आवगमन को सक्षम करने के लिए विपरीत छोर पर खिड़कियों को खोलने से घर के अंदर हवा का आना बना रहता है। घर में हवा बनाए रखने के लिए हवा संचरण के आवगमन में समय एक महत्वपूर्ण कारक है। गर्मियों के दौरान खिड़कियां खोलने का सबसे अच्छा समय सुबह 5 से 8 बजे के बीच और शाम को 7 से 10 बजे के बीच होता है, क्योंकि इस वक्त शीतल हवा बहती है।

कमरे को खाली रखें :- एक भरा हुआ कमरा काफी गर्म महसूस करवाता है, इसलिए कमरे में हल्के सामानों और जूट से बने पतले आसनों को रखें।

आवश्यकता ना होने पर लाइट को बंद रखें :- कई बल्ब ज्यादा गर्मी को उत्सर्जित करते हैं, इसलिए हो सके तो LED और CFL के बल्बों का उपयोग करें। ये बिजली की खपत भी कम करते हैं और साथ ही ठंडे भी होते हैं।

चावल के तकिए :- गर्मी में बिस्तर को ठंडा रखने के लिए आप चावल के तकिए बना सकते हैं। इन्हें गर्मी में फ्रिज (Fridge) में ठंडा भी किया जा सकता है।

पौधे लगाएं :- युक्तिपूर्वक रूप से पौधों, बेलों को रखने से ये एयर कंडीशनर के रूप में कार्य करते हैं और घर को प्रभावी रूप से ठंडा रखने में मदद करते हैं। सूरज की किरणों को रोकने के लिए घर के पूर्व और पश्चिम की तरफ छायादार पेड़ और पौधे लगाएं।

स्वयं से एक एयर कंडीशनर बनाएं :- आप कई तरह के एयर कंडीशनर खुद घर में बना सकते हैं। इंटरनेट से देख कई प्रकार के अपशिष्ट पदार्थों से आप विभिन्न रचनात्मक एयर कंडीशनर को आसानी से बना सकते हैं।

सफेद रंग करें :- जैसे बर्फ समुद्र के विपरीत पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करने के बजाए प्रतिबिंबित कर देती है, वैसे ही गर्मी में घर की छत पर सफेद चूने की परत लगाने पर घर ठंडा रहता है। हालांकि यह बारिश में धुल जाता है, और गर्मी आने पर इसे दुबारा करना पड़ता है।

संदर्भ :-
1.
http://www.newindianexpress.com/opinions/2018/jun/18/adapt-to-natural-living-for-a-changed-life-1829520.html
2. https://www.thebetterindia.com/57389/energy-efficient-house-natural-farm-medicine-free-life-couple-live-life-closest-nature/
3. https://inhabitat.com/a-modern-home-in-india-stays-naturally-cool-without-ac/
4. https://www.thebetterindia.com/92798/summer-simple-ecofriendly-hacks-air-conditioner-keep-home-cool/
5. https://www.quora.com/Can-you-live-without-air-conditioning-in-your-life-Is-it-a-need-or-just-a-want

https://prarang.in/Lucknow/1906152981





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