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भारत के भिन्न राज्यों में ऐसे मनाया जाता है विश्व पृथ्वी दिवस, व देखें इसका प्रभाव

how World Earth Day is celebrated in different states of India

Jaunpur District
22-04-2024 09:49 AM

दुनिया भर में प्रत्येक वर्ष 22 अप्रैल को ‘विश्व पृथ्वी दिवस’ (World Earth Day) के रूप में मनाया जाता है। पृथ्वी दिवस हमारे ग्रह को समर्पित एक अंतर्राष्ट्रीय दिवस है। यह पर्यावरण की ओर ध्यान आकर्षित करता है और इसके संरक्षण और स्थिरता को प्रोत्साहित करता है। इस वर्ष ‘विश्व पृथ्वी दिवस’ का यह 54वां उत्सव मनाया जायेगा। 1969 में पहली बार जूलियन कोनिंग (Julian Koning) नामक एक व्यक्ति द्वारा 'पृथ्वी दिवस' शब्द को लोगों के बीच प्रस्तुत किया गया था। तब से लेकर आज तक पूरी दुनिया में विभिन्न देशों में अलग अलग तरीकों से पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। हमारे देश भारत में भी पृथ्वी दिवस बहुत ही अनोखे तरीके से मनाया जाता है।
तो आइए आज पृथ्वी दिवस के मौके पर देखते हैं कि हमारे भारत के हर राज्य में इसे अलग-अलग तरीके से कैसे मनाया जाता है। इसके साथ ही आइए यह भी समझते हैं कि पृथ्वी दिवस, जो 50 वर्षों से अधिक समय से मनाया जा रहा है, इसका समाज और पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा है, इसकी वर्तमान स्थिति क्या है और भविष्य में इसको लेकर क्या संभावनाएँ हैं? 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस के मौके पर देश के विभिन्न राज्यों बिहार, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में कई समवर्ती गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं। इनमें से कुछ राज्यों में दूर- दराज़ और अक्सर उपेक्षित समूहों में रहने वाली जनसांख्यिकी से बच्चों और समुदायों को एक साथ लाने के लिए पूरे सप्ताह आयोजन किए जाते हैं। पृथ्वी दिवस की इन गतिविधियों द्वारा लोगों में प्रकृति और धरती माता के संरक्षण के लिए उनकी भूमिका और जिम्मेदारियों के बारे में जागरूकता उत्पन्न की जाती है।
बिहार में, 17 से 24 अप्रैल तक पूरे एक सप्ताह के लिए स्कूली छात्रों और समुदायों द्वारा पृथ्वी दिवस सप्ताह मनाया जाता है। विद्यालय एवं कार्यालय परिसरों की सफ़ाई और सामुदायिक सफ़ाई गतिविधियाँ जैसे नदी तट की सफाई, सड़कों की सफ़ाई, एवं पर्यावरण पर जागरूकता अभियान और स्कूलों और समुदायों में निबंध लेखन प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। विभिन्न पृष्ठभूमि के छात्रों द्वारा इस पर निबंध लेखन प्रतियोगिता में सक्रिय रूप से भाग लिया जाता है एवं विभिन्न स्वयं सेवी संस्थाओं के माध्यम से कई 'क्लीनअप ड्राइव' (Cleanup Drive) जैसी गतिविधियों में भाग लिया जाता है। इसके अतिरिक्त, पृथ्वी दिवस पृष्ठभूमि के आधार पर बच्चों और युवाओं के बीच कला प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं। उदाहरण के लिए, गत वर्ष विभिन्न पृष्ठभूमि के 190 से अधिक छात्रों ने 'हमारी प्रजातियों की रक्षा करें' विषय पर निबंध लेखन प्रतियोगिता में सक्रिय रूप से भाग लिया। बिहार राज्य की राजधानी पटना के जमसुआत, आशापुर, सबरीनगर, गोनपुरा, नोगामा और पचुकिया गांवों में 'महान सामुदायिक अभियान' (Great Community Drive) चलाया गया। समुदाय के सदस्यों और कार्यकर्ताओं ने सफ़ाई अभियान में सक्रिय रूप से भाग लिया, जिसमें बच्चे और युवा स्वयंसेवक के रूप में शामिल हुए। इसी प्रकार बिहार के भागलपुर जिले के समुदाय के सदस्यों द्वारा 'ग्रेट गंगा क्लीन अप' (Great Ganga clean up) का संचालन किया गया, जिसमें सभी उम्र के लोगों को एकजुट किया गया था।
इसी प्रकार, बंगाल में छात्रों, बाल क्लबों के सदस्यों और बाल संरक्षण कार्यकर्ताओं द्वारा 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। उदाहरण के लिए, गत वर्ष उत्तर बंगाल में, कलिम्पोंग, सिलीगुड़ी और बीरपारा जिलों में विभिन्न गतिविधियों एवं कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। कलिम्पोंग में, चंद्रमाया हाई स्कूल के 163 से अधिक स्कूली छात्रों ने 'हमारी प्रजातियों की रक्षा' विषय पर जागरूकता सत्र में भाग लिया और 'ग्रेट कैंपस क्लीन-अप' (Great Campus Clean-up) में भाग लिया। बीरपारा में बच्चों के लिए "पौधे-आधारित आहार अपनाने और कीटनाशकों और जड़ी-बूटियों का उपयोग बंद करने" विषय पर जागरूकता सत्र आयोजित किया गया, इसके बाद बाल क्लब के सदस्यों द्वारा "हमारी पृथ्वी की रक्षा करें" पर नुक्कड़ नाटक किया गया। सिलीगुड़ी में, 78 बाल क्लब सदस्यों, स्वयंसेवकों और बाल संरक्षण कार्यकर्ताओं द्वारा एक साथ "पर्यावरण बचाओ" पर जागरूकता सत्र आयोजित किया गया, जिनमें से सभी ने पृथ्वी और पर्यावरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के प्रतीक के रूप में एक-एक पेड़ लगाया। इसी तरह तमिलनाडु राज्य की राजधानी चेन्नई में चिलचिलाती गर्मी और गर्मी की छुट्टियां भी विश्व पृथ्वी दिवस के मौके पर स्कूली छात्र-छात्राओं के उत्साह को कम नहीं कर पाती है। गत वर्ष यहाँ के छात्रों द्वारा 'हमारी प्रजातियों की रक्षा' पर निबंध लेखन प्रतियोगिता में बढ़ चढ़कर भाग लिया गया। इसी तरह हमारे अपने राज्य उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में पृथ्वी दिवस पर 'सेंट अल्फोंसा स्कूल, आगरा' के विकलांग बच्चों द्वारा अपने विचारों को चित्रित किया गया। प्रतियोगिता में भाग लेने वाले 25 बच्चों ने बड़ी ही खूबसूरती से अपनी चित्रकला में दर्शाया कि कैसे कई प्रजातियाँ अब विलुप्त होने के कगार पर हैं, और तेज़ी से शहरीकरण ने कई प्रजातियों के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर दिया है। इसी तरह राजस्थान में बाड़मेर जिले में स्कूलों में कैंपस क्लीन क्लीन-अप और निबंध लेखन प्रतियोगिताएं आयोजित की गई।
1970 में शुरुआत के बाद से ही पृथ्वी दिवस का चलन काफी बढ़ गया है। बीस साल बाद, 1990 में यह दिवस संयुक्त राज्य अमेरिका से भी आगे बढ़ गया और इसे अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त हुई। 1990 में एक सौ चालीस से अधिक देशों में लगभग दो करोड़ लोग पृथ्वी दिवस कार्यक्रमों में शामिल हुए। 2000 में, पृथ्वी दिवस का विस्तार कुल 1184 देशों तक हुआ और इसे लगभग पाँच हजार पर्यावरण न्याय समूहों का समर्थन प्राप्त हो गया। इसके आयोजकों द्वारा ग्लोबल वार्मिंग और स्वच्छ ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित करते हुए अधिक केंद्रीकृत संदेश दिया गया। 2020 में पृथ्वी दिवस की 40वीं वर्षगांठ के मौके पर 225,000 अमेरिकी पर्यावरण के लिए रैली करने के लिए वाशिंगटन डी.सी. में एकत्र हुए। ‘अर्थ डे नेटवर्क’ (Earth Day Network) द्वारा कार्बन उत्सर्जन के प्रभाव को रोकने में मदद के लिए एक अरब पेड़ लगाने की योजना की भी घोषणा की गई और 2012 तक उस लक्ष्य को पूरा कर लिया गया। 2016 में, पृथ्वी दिवस पर ग्रह को दो डिग्री सेल्सियस से अधिक गर्म होने से रोकने के लिए देशों से अपने उत्सर्जन को सीमित करने का आह्वान करने के उद्देश्य से 175 देशों द्वारा पेरिस जलवायु समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस वर्ष, पृथ्वी दिवस कार्यक्रमों में एक अरब से अधिक लोगों के भाग लेने की उम्मीद है।
'विश्व पृथ्वी दिवस' लोगों को पर्यावरण पर उनके कार्यो के प्रभाव, उनके अवलोकन मूल्यों और भविष्य में पर्यावरण को होने वाले नुकसान और पर्यावरण को बचाने के लिए वे क्या कर सकते हैं, इसके बारे में गहराई से सोचने के लिए प्रोत्साहित करता है। गत वर्षों में आयोजित पृथ्वी दिवसों और उसके बाद की गई कार्रवाई पर विचार करने से वर्तमान पीढ़ियों को भी इसी तरह की कार्रवाई करने के लिए प्रेरणा मिल सकती है।
सामाजिक परिवर्तनों के अलावा, समाज पर पृथ्वी दिवस के सबसे महत्वपूर्ण प्रभावों में से एक व्यक्ति द्वारा पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को प्रकाश में लाना है। पृथ्वी दिवस का इतिहास हमें सिखाता है कि पक्ष समर्थन और सक्रियता के द्वारा पर्यावरण में सुधार के लिए आवश्यक कार्रवाई की जा सकती है और व्यवस्था परिवर्तन को गति दी जा सकती है। पृथ्वी दिवस के माध्यम से लोगों, वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए बनाए गए विनियमों, नीतियों और प्रोत्साहन कार्यक्रमों का पिछले 50 वर्षों में मापनीय प्रभाव पड़ा है। लेकिन "दशकों की पर्यावरणीय प्रगति के बावजूद, हम आज भी जैव विविधता के नुकसान एवं जलवायु परिवर्तन से लेकर प्लास्टिक प्रदूषण तक और भी अधिक गंभीर, लगभग अस्तित्वगत, वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जिसके लिए सरकार के सभी स्तरों पर कार्रवाई की आवश्यकता है। हमें आज जलवायु परिवर्तन के रूप में जिस संकट का सामना करना पड़ रहा है, उससे निपटने के लिए बड़े पैमाने पर सामाजिक और पारिस्थितिक परिवर्तनों में तेज़ी लाने की आवश्यकता है। पृथ्वी दिवस 2024 के लिए दुनिया को हमारी और हमारे कार्यों की आवश्यकता है। वार्षिक पृथ्वी दिवस उत्सव और कार्रवाई का आह्वान लोगों और संगठनों की एक विस्तृत श्रृंखला को परिवर्तन को प्रेरित करने और साल भर के काम का जश्न मनाने के लिए एक साथ आने के लिए एक सकारात्मक और भविष्य-उन्मुख कार्यक्रम प्रदान करता है। अतः निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों के नेताओं द्वारा इसका पालन करने का आह्वान किया जाना चाहिए और पर्यावरणीय और सामाजिक रूप से कर्तव्यनिष्ठ मूल्यों के अनुरूप रहने और कार्य करने के लिए व्यक्तिगत कार्यों को तुरंत संतुलित किया जाना चाहिए। साथ ही राष्ट्रीय और स्थानीय दोनों स्तरों पर समुदायों को उनकी उच्चतम क्षमता तक पहुंचने में सक्षम बनाने के लिए बड़े पैमाने पर नीतियों के निर्माण की आवश्यकता है।

संदर्भ
https://shorturl.at/bgDMR
https://shorturl.at/rBGW6
https://shorturl.at/cvDOQ

चित्र संदर्भ
1. विश्व पृथ्वी दिवस पर एक स्कूल में आयोजित कार्यक्रम को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
2. जूलियन कोनिंग को संदर्भित करता एक चित्रण (newyorktimes)
3. विश्व पृथ्वी दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में प्रतिभाग करते बच्चो को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
4. घूम रही पृथ्वी को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
5. पेड़ लगाते स्कूली छात्रों को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
6. जंगल में हिरन को संदर्भित करता एक चित्रण (flickr)

https://prarang.in/Jaunpur_District/24042210328





इन पक्षियों का अस्तित्व ख़तरे में, जल्द ही देश-दुनिया से हो जायेंगे विलुप्त

The existence of these birds is in danger they will soon become extinct from the world

Jaunpur District
21-04-2024 09:27 AM

पिछले 500 वर्षों में, पक्षियों की लगभग 183 प्रजातियाँ विलुप्त हो चुकी हैं। इन विलुप्त हो चुकी प्रजातियों में पैसेंजर पिजन (Passenger Pigeon) और आइवरी-बिल्ड वुडपेकर (Ivory-billed Woodpecker) शामिल हैं, जिन्हें हम ब्लैक एंड वाइट तस्वीरों में देख सकते हैं। इन पक्षियों का विलुप्त होना भले ही अतीत की बात है, लेकिन मौजूदा पक्षी प्रजातियों के लिए खतरा अभी टला नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि सभी ज्ञात पक्षी प्रजातियों के लगभग आठवें हिस्से जिनकी संख्या लगभग 1,469 के आस-पास है, पर अब विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। इनमें से 222 को गंभीर रूप से संकटग्रस्त घोषित किया गया है तथा इन्हें संरक्षण की बहुत अधिक आवश्यकता है। कुछ मामलों में, केवल कुछ दर्जन पक्षी ही जीवित बचे हैं। एक या दो पक्षी ऐसे हैं, जिनकी स्थिति बहुत खराब है। तो आइए आज हम भारत और दुनिया के उन पक्षियों के बारे में जानते हैं, जो विलुप्त होने की कगार पर हैं।


संदर्भ:

https://tinyurl.com/32f794ab

https://tinyurl.com/vj4j962x

https://tinyurl.com/3ewc36tb

https://tinyurl.com/8uwhwf2a

https://prarang.in/Jaunpur_District/24042110324





महावीर जयंती पर जानिए जैन महाभारत में कितने दिलचस्प हो जाते हैं, श्री कृष्ण

How interesting Shri Krishna becomes in Jain Mahabharata

Jaunpur District
20-04-2024 09:52 AM

हमारे जौनपुर में पूरे उत्साह के साथ मनाई जाने वाली “महावीर जयंती” को न केवल भारत, बल्कि विश्व स्तर पर भी अलग-अलग मान्यताओं के साथ मनाया जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि जैन धर्म में भी रामायण और महाभारत जैसे हिंदू महाकाव्य, महत्वपूर्ण माने जाते हैं। जैन धर्म में महाभारत के अपने कई संस्करण हैं, हालांकि ये संस्करण मूल महाभारत से काफी भिन्न हैं। चलिए आज महावीर जयंती के शुभ अवसर पर जानने की कोशिश करते हैं कि जैन और हिंदूओं की महाभारत के संस्करणों के बीच क्या अंतर हैं? इसके अतिरिक्त, आज हम जैन साहित्य में भगवान श्री कृष्ण की भूमिका के बारे में भी विस्तार से जानेंगे। जैन अनुयाई, प्रत्येक तीर्थंकर (तीर्थंकर वह व्यक्ति हैं जिन्होनें पूरी तरह से क्रोध, अभिमान, छल, इच्छा, आदि पर विजय प्राप्त की हो) के जीवन में घटित पाँच महत्वपूर्ण घटनाओं का स्मरण करते हैं:
1. गर्भाधान
2. जन्म
3. त्याग
4. ज्ञानोदय
5. मृत्यु (मोक्ष)
इन घटनाओं में महावीर जयंती, “महावीर के जन्म” का प्रतीक है, जबकि दीपावली, उनके “मुक्ति या निर्वाण प्राप्ति” के उपलक्ष में मनाई जाती है। महावीर जयंती के दिन पूरे भारत में राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया जाता है। हालांकि अमेरिका में, इस दिन राष्ट्रीय अवकाश नहीं होता है, लेकिन यह दिवस वहां रहने वाले जैन समुदाय के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अवसर पर दोनों देशों में आयोजित होने वाले विविध समारोहों में स्नात्र पूजा की जाती है, जिस दौरान बच्चे महावीर की छवि को स्नान कराते हैं। यह दिन संघर्ष-ग्रस्त दुनिया में महावीर की शिक्षाओं की प्रासंगिकता पर जोर देता है। दीपावली, महावीर के “ज्ञानोदय” की याद दिलाती है, क्यों दिवाली पर ही उन्होने अपनी मानव देह का त्याग कर निर्वाण प्राप्त किया था। इस दौरान जैन समुदाय के लोग दीपक जलाते हैं, मंत्रों का जाप करते हैं और भजन गाते हैं। इस त्योहार के दिन सैन फ्रांसिस्को (san francisco) में, बच्चे एक नृत्य-नाटिका का मंचन करते हैं, जिसमें भगवान महावीर की माँ द्वारा उनके जन्म से पहले देखे गए चौदह सपनों को प्रदर्शित किया जाता है। उत्तरी कैरोलिना (North Carolina) में भी बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। इनके अलावा, मियामी (Miami), फोर्ट मायर्स (Fort Myers) और जैक्सनविले (Jacksonville) सहित विभिन्न शहरों से जैन समुदाय के लोग सामूहिक उत्सव के लिए फ्लोरिडा (Florida) के कोरल स्प्रिंग के रैम्बलवुड मिडिल स्कूल (Ramblewood Middle School of Coral Spring School) में इकट्ठा होते हैं।
हिंदू धर्म की भांति जैन धर्म भी खुद को 'सनातन यानी शाश्वत धर्म के रूप में पहचानता है।’ ऐतिहासिक रूप से, जैन धर्म की उत्पत्ति लगभग 2500 साल पहले बौद्ध धर्म और उपनिषद के समानांतर ही हुई थी। यह काल सिकंदर के आगमन और मौर्य साम्राज्य के उदय से पहले का माना जाता है। बौद्ध धर्म की भांति, जैन धर्म में भी मठवासी जीवन शैली का पालन किया जाता है। इस धर्म में सर्वोच्च ईश्वर (परम-आत्मा) की अवधारणा को अस्वीकार किया जाता है। हालाँकि, बौद्धों के विपरीत, जैन समुदाय के लोग एक व्यक्तिगत आत्मा (जीव-आत्मा) के अस्तित्व में विश्वास करते हैं। जैन धर्म में रामायण और महाभारत जैसे, हिंदू महाकाव्य भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं, जो इसकी साझा सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं। जैन धर्म में महाभारत के अपने कई संस्करण हैं, हालांकि ये संस्करण मूल महाभारत से भिन्न हैं। उदाहरण के तौर पर महाभारत में जैन संस्करण (जिनसेना का हरिवंश) में पांडवों के बजाय श्री कृष्ण और जरासंध के बीच चले संघर्ष पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है। इसमें श्री कृष्ण के पिता, वासुदेव को एक आकर्षक व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है। जैन महाभारत के वर्णन के अनुसार श्री कृष्ण की माता देवकी ने आठ पुत्रों को जन्म दिया। पहले छह पुत्रों को एक व्यापारी की पत्नी के मृत बच्चों से बदल दिया जाता है, जो बाद में जैन भिक्षु बन जाते हैं। सातवें और आठवें पुत्रों को चरवाहे के रूप में पाला गया।
इसमें वर्णित एक किवदंती के अनुसार श्री कृष्ण के चचेरे भाई, (22वें तीर्थंकर) नेमिनाथ, अपने विवाह की दावत में वध के लिए लाए जा रहे, जानवरों की आवाज़ सुनने के बाद द्रवित हो गए और भिक्षु बन गए। जैन महाभारत में द्रौपदी का विवाह केवल अर्जुन से हुआ है। जैन महाभारत में द्रौपदी, युधिष्ठिर और भीम (जो अर्जुन से बड़े हैं) को अपने पिता के रूप में तथा नकुल और सहदेव को अपने पुत्रों के रूप में मानती हैं। हालांकि वह अर्जुन के गले में जो माला पहनाती है, उसमें से कुछ फूल अन्य चार भाइयों पर गिर जाते हैं, जिसके बाद यह अफवाह फैल जाती है, कि उनका विवाह सभी पांच भाइयों के साथ हो गया है। इस महाभारत में आयोजित जुए में कौरवों से अपना राज्य हारने के बाद, पांडवों को 12 साल के वनवास और उसके बाद 13वें साल राजा विराट के महल में नौकरों के रूप में भेष बदलकर रहना पड़ा। इस दौरान भीम, कीचक को भी दंडित करते हैं, जिसने द्रौपदी के साथ अभद्रता करने का प्रयास किया था। उल्लेखनीय रूप से, कीचक भी बाद में जैन भिक्षु बन गया, और अंततः मुक्ति प्राप्त की।
भारतीय जैनियों को श्री कृष्ण के करिश्माई व्यक्तित्व ने विशेष रूप से प्रभावित किया है, जिससे उन्हें अपनी विचारधाराओं के अनुरूप श्री कृष्ण की पौराणिक कथाओं की पुनर्व्याख्या करने के लिए प्रेरित किया गया है।
जैनियों ने श्री कृष्ण की कहानी की भी अपनी मान्यताओं के अनुरूप पुराणों से पुनर्व्याख्या की। उन्होंने अपने आदर्शों के अनुरूप उनके चरित्र के विभिन्न पहलुओं पर ज़ोर दिया। जैनियों ने न केवल कृष्ण की अवधारणा को अपनाया बल्कि उन्हें अपनी धार्मिक प्रथाओं में भी शामिल किया। जैनियों ने श्री कृष्ण को देहाती गोपाल कृष्ण के बजाय, द्वारका के भगवान के रूप में कृष्ण पर अधिक ध्यान केंद्रित किया।
जैन समुदाय के लोग श्री कृष्ण की वंशावली, उनके बचपन और बलराम के साथ उनके संबंधों पर पुराणों से सहमत हैं। हालांकि, यहां पर श्री कृष्ण के पूर्वजों और वंशजों की जानकारी अलग तरह से दी गई है। जैन मत के अनुसार जरासंध की हत्या भीम ने नहीं बल्कि श्री कृष्ण ने की थी। जैन महाभारत में श्री कृष्ण के सौतेले भाई जरा कुमार ही उनका वध कर देते हैं। जैन महाभारत में भी श्री कृष्ण की 16,000 पत्नियों को स्वीकार किया गया है। श्री कृष्ण और उनके भाई बलराम जैनियों के 63 महान विभूतियों में शामिल हैं, जिन्हें "शलाका पुरुष" के नाम से जाना जाता है। कृष्ण को वासुदेव के पुत्र वासुदेव केशव के नाम से जाना जाता है। जैनियों ने कृष्ण गाथा के साथ तालमेल बिठाने के लिए अपने 22वें तीर्थंकर, अरिष्टनेमि को श्री कृष्ण के यदुवंश का राजकुमार और कृष्ण का चचेरा भाई घोषित किया। जैन परंपरा में कृष्ण को गीता के उपदेशक और द्वारका के भगवान के रूप में सम्मानित किया जाता है।

संदर्भ

https://tinyurl.com/3w8paevb
https://tinyurl.com/5n8fuw28
https://tinyurl.com/yc6b2bm4
https://tinyurl.com/3xr3cf3f

चित्र संदर्भ
1. चरवाहे के रूप में श्री कृष्ण को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
2. अहिंसा स्थल में महावीर की प्रतिमा को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
3. उपदेश देती जैन साध्वियों को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
4. एक ब्राह्मण को अपना आधा वस्त्र भिक्षा में देते हुए, तीर्थंकर महावीर को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
5. पार्श्वनाथ मंदिर, तिजारा में नेमिनाथ के चित्रण को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)
6. जैन धर्म में कृष्ण और नेमिनाथ चचेरे भाई थे, नेमिनाथ जैन धर्म के बाइसवें तीर्थंकर थे! नेमिनाथ को श्री कृष्ण का शंख बजाते हुए संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)

https://prarang.in/Jaunpur_District/24042010298





प्राचीन भारतीय पाली व खरोष्ठी लिपियां साझा करती हैं, एक गहन इतिहास

Ancient Indian Pali and Kharosthi scripts share a deep history

Jaunpur District
19-04-2024 09:30 AM

हम जानते ही हैं कि, प्राचीन भारतीय लिपियों में संस्कृत, पाली और खरोष्ठी सहित विभिन्न प्रकार की कुछ अन्य भाषाएं शामिल हैं। हालांकि, ये भाषाएं अब व्यापक रूप से नहीं बोली जाती हैं। फिर भी, इन भाषाओं एवं लिपियों को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन लिपियों में इन भाषाओं में दर्ज कहानियों के मूल्यवान सबक शामिल हैं, जो अब इतिहास में खो गए हैं। इन कहानियों का भारतीय संस्कृति, देवी-देवताओं और पौराणिक कथाओं से भी कुछ संबंध है। आइए, आज दो महत्त्वपूर्ण लिपियों – पाली और खरोष्ठी की उत्पत्ति पर चर्चा करें।
पाली ‘थेरवाद बौद्ध धर्म’ यानी कि, पाली कैनन(Pāli Canon) या पाली भाषा में ‘टिपिटका’, के धर्मग्रंथों की भाषा है। ये ग्रंथ पहली शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान श्रीलंका में लिखे गए थे। पाली को विभिन्न प्रकार की लिपियों में लिखा गया है, जिसमें ब्राह्मी, देवनागरी और अन्य इंडिक लिपियां शामिल हैं। साथ ही, इसमें पाली टेक्स्ट सोसाइटी(Pāli Text Society) के टी. डब्ल्यू. राइस डेविड्स(T. W. Rhys Davids) द्वारा तैयार की गई, लैटिन वर्णमाला (Latin alphabet) के एक संस्करण का भी उपयोग किया गया है। दरअसल, पाली नाम का अर्थ है – “पंक्ति” या “(धर्मवैधानिक) पाठ”, और यह शब्द संभवतः टिप्पणी परंपराओं से आया है, जिसमें “पाली” (उद्धृत मूल पाठ की पंक्ति के अर्थ में) को, पांडुलिपि पृष्ठ पर आने के बाद, टिप्पणी या स्थानीय भाषा से अलग किया गया था। आज पाली का अध्ययन मुख्य रूप से उन लोगों द्वारा किया जाता है, जो मूल बौद्ध धर्मग्रंथों को पढ़ना चाहते हैं, और अनुष्ठानों में अक्सर इसका उच्चारण किया जाता है। पाली में ऐतिहासिक और चिकित्सा ग्रंथों सहित गैर-धार्मिक पाठ हैं। वर्तमान समय के मुख्य क्षेत्र जहां पाली भाषा का अध्ययन किया जाता है, वे म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड(Thailand), लाओस(Laos) और कंबोडिया(Cambodia) हैं।
दूसरी ओर, खरोष्ठी लिपि, जिसे ‘इंडो-बैक्ट्रियन(Indo-Bactrian)’ लिपि के रूप में भी जाना जाता है, वह एक लेखन प्रणाली थी। यह मूल रूप से वर्तमान उत्तरी पाकिस्तान में चौथी और तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के बीच विकसित हुई थी। खरोष्ठी को एक इंडो-आर्यन भाषा(Indo-Aryan) – प्राकृत के एक रूप का प्रतिनिधित्व करने के लिए निर्मित किया गया था। इसका उत्तरी पाकिस्तान, पूर्वी अफगानिस्तान, उत्तर पश्चिम भारत और मध्य एशिया(Asia) में व्यापक लेकिन अनियमित वितरण था। खरोष्ठी के शुरुआती पहचाने जाने योग्य उदाहरण गांधार (उत्तरी पाकिस्तान) के क्षेत्र में पाए गए हैं, जो सम्राट अशोक के शिलालेखों (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य) में मनसेहरा और शाहबाजगढ़ी शहरों में दर्ज हैं। भारतीय उत्तरपश्चिम क्षेत्र के बाहर, अशोक के शिलालेख प्राकृत में थे, जो ब्राह्मी लिपि में लिखे गए थे। लेकिन, गांधार क्षेत्र की ओर ये शिलालेख खरोष्ठी लिपि का उपयोग करके लिखे गए हैं। साथ ही, वे प्राकृत भाषा में या कभी-कभी सीधे अरामी(Aramaic) या ग्रीक(Greek) भाषाओं में भी अनुवादित किए गए हैं। वास्तव में, यह आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि खरोष्ठी की उत्पत्ति फारसियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली, सेमेटिक लिपि(Semitic script) के प्रभाव में हुई थी। जब ईसा पूर्व 6वीं शताब्दी के अंत और 5वीं शताब्दी की शुरुआत के बीच, अचमेनिद फारसियों (Achaemenid Persians) ने गांधार और सिंधु पर नियंत्रण कर लिया, तो वे अपने साथ यहां अरामी भाषा लाए। तब अरामी भाषा को आधिकारिक रिकॉर्ड के लिए, संचार के मानक साधन के रूप में नियोजित किया गया था। लिखित स्तर पर, अरामी को उत्तरी सेमेटिक लिपि का उपयोग करके दर्शाया गया था। खरोष्ठी इस उत्तरी सेमेटिक लिपि का एक रूपांतर है, जिसे गांधारी के ध्‍वनिविज्ञान के अनुरूप अनुकूलित किया गया है। गांधारी भाषा जो गांधार और उसके आसपास के क्षेत्र में इस्तेमाल की जाने वाली एक प्राकृत बोली है। क्या आप जानते हैं कि, सरकारी संग्रहालय और आर्ट गैलरी, चंडीगढ़ में ‘हरिति’ नामक एक सुंदर मूर्ति प्रदर्शित की गई है। यह बौद्ध देवता – ‘हरिति’, गांधारन कला का एक अच्छा उदाहरण है। इस देवता की मूर्ति, मूर्तिकला क्षेत्र में ग्रीक या हेलेनिस्टिक(Greek or Hellenistic) सांस्कृतिक प्रभाव को दर्शाती है, और इसमें खरोष्ठी लिपि में एक शिलालेख है।

संदर्भ
https://tinyurl.com/3wamebbw
https://tinyurl.com/c6udyv9c
https://tinyurl.com/3bv6e2he

चित्र संदर्भ

1. पाली व खरोष्ठी लिपियों को संदर्भित करता एक चित्रण (World History Encyclopedia,wikimedia)
2. पाली पाण्डुलिपि को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
3. संस्कृत और पाली पाण्डुलिपि को दर्शाता एक चित्रण (PICRYL)
4. इंडो-ग्रीक राजा आर्टेमिडोरोस अनिकेटोस के सिक्के पर खरोष्ठी लिपि को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)
5. खरोष्ठी लिपि में लिखित पाण्डुलिपि को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)

https://prarang.in/Jaunpur_District/24041910280





प्राचीन समय में यात्रियों का मार्गदर्शन करती थी, कोस मीनारें , इसलिए है हमारी धरोहर

Kos minarets used to guide travelers in ancient times hence they are our heritage

Jaunpur District
18-04-2024 09:28 AM

पहले, जब हम मोटर वाहनों से लंबी दूरी की यात्रा करते थे, तो गंतव्य की दिशा के लिए, मील के पत्थर हमारे लिए मुख्य संकेतक के रूप में कार्य करते हैं। जबकि, कुछ वर्ष पहले से हम गूगल मैप जैसी सुविधाजनक तकनीकी प्रणालियों पर निर्भर रहे हैं। हालांकि, राजाओं के दिनों में, ‘कोस मीनार’ हमारे गूगल मानचित्र के रूप में कार्य करते थे। लेकिन, आधुनिक समय में ये कोस मीनारें लुप्त होती जा रही हैं। तो आज, विश्व धरोहर दिवस के मौके पर आइए, मध्यकालीन भारत के कोस मीनार, इसके इतिहास और इनका विकास कैसे हुआ इसके बारे में जानते हैं। साथ ही, आइए यह भी जानें कि, आज के आधुनिक मील के पत्थर अलग-अलग स्थानों के लिए अलग-अलग रंग के क्यों होते हैं? हम सब जानते ही हैं कि, ‘कोस’, दूरी मापने की एक प्राचीन भारतीय इकाई है। यह लगभग 3.22 किलोमीटर (2 मील) का प्रतिनिधित्व करती है, और एक योजन का ¼ होती है, जो दूरी का एक वैदिक माप है। योजन का उपयोग प्राचीन वैदिक ग्रंथों से मिलता है, और इसका उपयोग अशोक ने अपने प्रमुख शिलालेख संख्या 13 में पाटलिपुत्र और बेबीलोन(Babylon) के बीच की दूरी का वर्णन करने के लिए किया था। दूसरी ओर, मीनार का अर्थ ‘स्तंभ’ होता है। इसलिए, कोस मीनार का अनुवाद ‘मील स्तंभ’ है। दिलचस्प बात यह है कि, भारतीय उपमहाद्वीप के कई ग्रामीण इलाकों में बुजुर्ग लोग आज भी आस-पास के इलाकों की दूरी कोस में बताते हैं।
भारत में दूरी तथा मार्गों को विशेष रूप से दर्शाने के लिए, किसी चीज़ का उपयोग करने का पहला दर्ज प्रमाण तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से मिलता है। सम्राट अशोक ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र को ढाका, काबुल और बल्ख से जोड़ने वाले मार्गों की स्थापना की थी। और तब, मिट्टी के खंभों, पेड़ों और कुओं के रूप में मानक चिन्हों ने यात्रियों को मार्गदर्शन करने और उनके गंतव्य की दूरी का पता लगाने में मदद की। अधिकांश मामलों में, ये स्थलचिह्न पहले से ही परिदृश्य में मौजूद थे। परंतु, आज हम जिन कोस मीनारों को देख सकते हैं, उनमें से कई मीनारों का श्रेय संभवतः अकबर के समय को दिया जा सकता है। अबुल फजल ने ‘अकबर नामा’ (अकबर के शासनकाल का आधिकारिक इतिहास) में दर्ज किया है कि, वर्ष 1575 में अकबर ने एक आदेश जारी किया था कि, आगरा से अजमेर के रास्ते में प्रत्येक कोस पर, लोगों की सुविधा के लिए एक स्तंभ या मीनार खड़ी की जाए। 1615 और 1618 के बीच, अकबर के शासनकाल के तुरंत बाद, भारत के शुरुआती यूरोपीय यात्री उनके द्वारा देखे गए, कोस मीनारों की विस्तृत रिपोर्ट वापस लाए। हालांकि, आज इन मीनारों का अस्तित्व खतरे में हैं। शायद इसी वजह से, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने, उनके ‘कम राष्ट्रीय महत्व’ का हवाला देते हुए, 18 केंद्रीय संरक्षित स्मारकों को अपनी रजिस्ट्री से हटाने की योजना की घोषणा की है। यह निर्णय केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय द्वारा पहचाने गए और पिछले साल एक संसदीय समिति को प्रस्तुत किए गए, 24 ‘अनुसरणीय’ स्मारकों की सूची से लिया गया है।
इस सूची से हटाने के लिए निर्धारित स्मारकों में हरियाणा से कोस मीनार नंबर 13, झांसी से गनर बर्किल का मकबरा, दिल्ली का बाराखंबा कब्रिस्तान, लखनऊ के गऊघाट का कब्रिस्तान और वाराणसी से तेलिया नाला बौद्ध खंडहर जैसे उल्लेखनीय स्थल शामिल हैं। इन स्मारकों को सूची से हटाने से यह संस्था प्रभावी रूप से उनकी सुरक्षा के दायित्व से मुक्त हो जाती है, जिससे, उनके आसपास नियमित निर्माण और शहरी विकास गतिविधियों की अनुमति मिलती है। परंतु, यह हमें सोचना हैं कि, ऐसी धरोहरों का संरक्षण कितना महत्त्वपूर्ण है।
दूसरी ओर, सड़क के किनारे ‘मील का पत्थर’ दिखना हमारे लिए एक दैनिक घटना है। लेकिन आपके मन में कभी ना कभी एक बात जरूर आई होगी कि, ये पत्थर अलग-अलग रंगों में क्यों आते हैं? आइए जानते हैं। नारंगी रंग से रंगा हुआ मील का पत्थर दर्शाता है कि, आप ग्रामीण सड़क पर यात्रा कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और जवाहर रोजगार योजना जैसी महत्वाकांक्षी पहलों के तहत निर्मित, ऐसी ग्रामीण सड़कें 3.93 लाख किमी की लंबाई में फैली हुई हैं। पीले रंग का मील का पत्थर दर्शाता है कि, आप राष्ट्रीय राजमार्ग पर यात्रा कर रहे हैं। वर्ष 2021 के आंकड़ों के अनुसार, वे विभिन्न शहरों और राज्यों को एकीकृत करते हैं, और 151,019 किमी की लंबाई में फैले हैं। काली या नीली और सफेद पट्टियों वाले मील के पत्थर दर्शाते हैं कि, आप किसी शहर या जिले की सड़क पर यात्रा कर रहे हैं। वर्तमान में भारत में जिला सड़कों का 5,61,940 किमी लंबा नेटवर्क है।
राज्य राजमार्गों पर हरे रंग वाले मील पत्थरों को देखा जाता है। वे एक राज्य के विभिन्न शहरों को जोड़ते हैं, और 2016 में जारी आंकड़ों के अनुसार 176,166 किमी की लंबाई में फैले हुए हैं।
जीरो माइल केंद्र: 
ब्रिटिश काल के दौरान नागपुर शहर को, भारत में जीरो माइल केंद्र के रूप में पहचाना जाता था। यह वह स्थान था, जिसका उपयोग अन्य सभी प्रमुख शहरों की दूरी मापने के लिए संदर्भ बिंदु के रूप में किया जाता था।

संदर्भ
https://tinyurl.com/y47ck29k
https://tinyurl.com/35sxb62y
https://tinyurl.com/4zr3dytk

चित्र संदर्भ
1. कोस मीनार को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
2. हरियाणा में ग्रैंड ट्रंक रोड के किनारे पलवल में कोस मीनार को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
3. राष्ट्रीय प्राणी उद्यान दिल्ली में कोस मीनार को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
4. मील के पत्थर को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)

https://prarang.in/Jaunpur_District/24041810307





राम नवमी विशेष: जानें महाकाव्य रामायण की विविधताओं और अंतर्राष्ट्रीय संस्करणों का मेल

Know the fusion of variations and international versions of the epic Ramayana

Jaunpur District
17-04-2024 09:28 AM

क्या आप जानते हैं, मुगल बादशाह अकबर द्वारा पवित्र हिंदू ग्रंथ “रामायण” का फ़ारसी में अनुवाद करवाया गया था। अकबर के बाद हमीदा बानो बेगम, रहीम और जहाँगीर ने भी अपने लिये रामायण का अनुवाद करवाया था। यह तथ्य धार्मिक सौहार्द से कहीं अधिक, रामायण की वैचारिक उपलब्धि को उजागर करता है। रामायण की महत्ता का अंदाज़ा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि, आज भारत सहित कई देशों की अपनी-अपनी खुद की रामायण के संस्करण मौजूद हैं।
हालांकि अलग-अलग देशों में इन रामायणों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है, लेकिन इसकी मूल भारतीय कथा में थोड़े-बहुत बदलावों को छोड़कर रामायण का मूल विचार सभी में सुसंगत रहता है। दुनिया भर में रामायण पर आधारित कई पुस्तकें पाई जाती हैं। इस विषय के अलावा आज हम उन पात्रों के बारे में भी जानेंगे जो रामायण और महाभारत दोनों में मौजूद हैं। महर्षि वाल्मिकी रचित रामायण और रामचरितमानस, दोनों ही महान भारतीय महाकाव्य हैं। दोनों में ही हमें पृथ्वी पर भगवान विष्णु के अवतार प्रभु श्री राम की जीवन यात्रा के बारे में बताया गया है। हालाँकि, रामायण और रामचरितमानस में कई अंतर भी हैं।
चलिए इनमें से कुछ महत्वपूर्ण अंतरों पर ग़ौर करते हैं।
1. लेखकत्व और समय: रामायण की रचना, महर्षि वाल्मिकी ने त्रेता युग के दौरान संस्कृत में की थी। भगवान राम और महर्षि वाल्मिकी एक ही युग में रहते थे। दूसरी ओर, रामचरितमानस को अवधी कवि “गोस्वामी तुलसीदास” जी के द्वारा कलियुग के दौरान 15वीं शताब्दी ईसवी में अवधी भाषा में लिखा गया था।
2. शीर्षकों का अर्थ: 'रामायण' शब्द 'राम' और ' अयनम् ' (कहानी) का एक संयोजन है, जिसका अनुवाद 'राम की कहानी' होता है। दूसरी ओर 'रामचरितमानस' में 'राम', 'चरित्र' (अच्छे कर्म) और 'मानस' (झील) का मिश्रण है, जिसका अर्थ 'राम के अच्छे कर्मों की झील' होता है।
3. संरचना: दोनों ही महाकाव्य सात अध्यायों में विभाजित हैं। हालाँकि, रामचरितमानस में, तुलसीदास ने 'युद्ध कांड' का नाम रामायण से बदलकर 'लंका कांड' कर दिया।
4. प्रारूप और सामग्री: रामायण में भगवान राम की मूल कहानी, 'श्लोक' में लिखी गई है, जबकि रामचरितमानस में रामायण का एक पुनर्कथन, 'चौपाई' में लिखा गया है। हालांकि तुलसीदास ने अपनी पुस्तक में वाल्मिकी के योगदान को स्वीकार किया है। 5. राजा दशरथ की पत्नियाँ: रामायण में, राजा दशरथ की 350 से अधिक पत्नियाँ थीं, जिनमें तीन प्रमुख पत्नियाँ - कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा थीं। रामचरितमानस में केवल इन्हीं तीन पत्नियों का उल्लेख है।
6. भगवान हनुमान का चित्रण: रामायण में भगवान हनुमान को वानर जनजाति के एक मानव के रूप में चित्रित किया गया है, जिसमें 'वानर' का तात्पर्य वन में निवास करने वाली जनजातियों से है। लेकिन रामचरितमानस में उन्हें एक वानर के रूप में दर्शाया गया है, जहां 'वानर' उनकी प्रजाति को संदर्भित करता है।
7. माता सीता का स्वयंवर : रामायण में वर्णन मिलता है कि, राजा जनक ने माता सीता के लिए स्वयंवर का आयोजन नहीं किया था। इसके बजाय, उन्होंने शक्तिशाली आगंतुकों को शिव का धनुष दिखाया और उन्हें इसे उठाने के लिए कहा। जब श्री राम ने यह धनुष उठा लिया तो उनका विवाह माता सीता से हो गया। लेकिन रामचरितमानस में, एक स्वयंवर का आयोजन किया गया था, और माता सीता ने शिव के धनुष को उठाने और न तोड़ने की क्षमता के आधार पर अपने पति को चुना। राम ने धनुष उठाया और तोड़ दिया, जिससे परशुराम क्रोधित हो गए।
8. सीता का अपहरण: रामायण में, माता सीता का अपहरण और पीड़ा, वास्तविक थी, और उन्हें बचाए जाने के बाद अग्नि परीक्षा के माध्यम से अपनी पवित्रता साबित करने के लिए कहा गया था। लेकिन रामचरितमानस के अनुसार, “असली माता सीता का कभी अपहरण नहीं किया गया था, बल्कि उनकी एक प्रति यानी हुबहू प्रति को बनाया गया था, जिसका अपहरण रावण ने किया था। वहीँ वास्तविक माता सीता, अग्नि देव की आश्रय में चली गई था। रामचरितमानस में अग्नि परीक्षा, वास्तव में वास्तविक माता सीता और उनकी प्रति बदलने के लिए बनाई गयी एक योजना थी।
9. रावण के युद्ध: रामायण में रावण और राम के दो बार युद्ध होने का उल्लेख है। लेकिन रामचरितमानस में अंत में केवल एक युद्ध का उल्लेख मिलता है।
10. राम का चित्रण: रामायण में राम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' के रूप में दर्शाया गया है, जो उत्कृष्ट आचरण वाले सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति हैं, जो उन्हें असाधारण गुणों वाले “मनुष्य” के रूप में दर्शाते हैं। लेकिन रामचरितमानस में श्री राम को एक सर्वोच्च व्यक्ति, भगवान के अवतार के रूप में चित्रित किया गया है। आपको जानकर हैरानी होगी कि” महर्षि वाल्मिकी की रामायण के कई देशों में और अलग-अलग भाषाओँ में लगभग 300 से अधिक संस्करण हैं।” इनमें से अधिकांश संस्करण दक्षिण पूर्व एशिया में निर्मित किये गए। हालांकि 12वीं और 13वीं शताब्दी के आसपास विकसित हुए इन रूपांतरणों में उन देशों की स्थानीय लोककथाओं और सांस्कृतिक मान्यताओं को शामिल किया गया है। इनमे से कई संस्करण मूल रामायण में प्रचलित ब्राह्मणवादी मूल्यों का पालन नहीं करते हैं। रामायण के भारतीय संस्करण (विशेषकर जैन ग्रंथों) में नए पात्रों को भी स्थान दिया गया है। रामायण की बौद्ध संस्करण (दशरथ जातक) कुछ मायनों में भिन्न है, क्यों कि इसमें राजा दशरथ, (प्रभु श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण) को सजा देकर नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा हेतु जंगल में भेजते हैं। साथ ही इसमें माता सीता का अपहरण भी नहीं होता है। कंबोडिया, थाईलैंड और बर्मा में, (जहां थेरवाद बौद्ध धर्म अधिक प्रचलित है) वहां पर महायान बौद्ध धर्म से पहले हिंदू धर्म का ही बोलबाला था। दक्षिण पूर्व एशिया में इन धर्मों को उड़िया और तमिल समुद्री व्यापारियों ने सामान के साथ कहानियाँ साझा करते हुए वहां पर फैलाया था। कुछ दक्षिण पूर्व एशियाई संस्करणों में, हनुमान को एक चालबाज़ , आकर्षक और चालाक चरित्र के रूप में चित्रित किया गया है। हालांकि इनमे भी वह श्री राम ही प्रिय चरित्र बने हुए हैं। कंबोडिया का रामायण संस्करण, " रीमकर (रामकेरती-राम + कीर्ति/महिमा)" में अच्छे और बुरे के संतुलन को दर्शाने के लिए हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म के तत्वों को आपस में जोड़ा गया है। यहां प्रभु श्री राम को फ़्रीह रीम (Phreah Ream) और माता सीता को नेंग सेडा (Neang Seda) कहा जाता है। इसके अलावा नोम पेन्ह (Phnom Penh) के शाही महल परिसर और 12वीं सदी के अंगकोरवाट खंडहरों (Angkor Wat ruins) की दीवारों पर भी रामायण के भित्ति चित्र सुशोभित हैं।
अतीत में, थाईलैंड के राजा, जिन्हें पहले सियाम (Siam) के नाम से जाना जाता था, राम के वंशज होने का दावा करते थे और उनका नाम भी अपने नाम के साथ जोड़ते थे। उनकी राजधानी का नाम तक “अयुत्या” रखा गया, जो अयोध्या के समान प्रतीत होता है। 18वीं सदी में, बर्मी आक्रमण के बाद, राजा ने अपना नाम राम प्रथम रख लिया और महाकाव्य रामकियेन का थाई संस्करण लिखा, जो अब वहां का राष्ट्रीय महाकाव्य है।
म्यांमार का अनौपचारिक राष्ट्रीय महाकाव्य यामायन है, जिसे 11वीं शताब्दी ईसवी में राजा अनावरथ के शासनकाल के दौरान पेश किया गया था। यहां राम, सीता और रावण को क्रमशः यम, थिदा और यवाना के नाम से जाना जाता है।
मलय साहित्य का हिकायत सेरी राम (Hikayat Seri Rama) भी मूल संस्कृत महाकाव्य से बारीकी से मेल खाता है। इंडोनेशिया में भी रामायण के विभिन्न प्रकार के संस्करण मौजूद हैं। बाली में, इसे रामकवाका (Ramakawaka), जावा में काकाविन या योगेश्वर रामायण (Kakawin or Yogeshwar Ramayana) और सुमात्रा इसे स्वर्णद्वीप के रूप में पहचाना जाता है।
रामायण के बारे में एक और दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इसके कई चरित्र आपको महाभारत जैसे महाकाव्यों में भी देखने को मिल जाएंगे। जैसे कि भगवान् विष्णु रामायण में राम और महाभारत में कृष्ण के रूप में अवतार लेते हैं, और दोनों कथाओं को जोड़ते हैं। भगवान् विष्णु के एक अन्य अवतार, परशुराम, भी दोनों महाकाव्यों में नज़र आते हैं। मूल रूप से उनका नाम भार्गव वंश का राम था। उन्होंने अत्याचारी राजा कार्तवीर्य अर्जुन को अपनी कुल्हाड़ी से मारने के बाद, परशुराम, या 'एक तरह की कुल्हाड़ी “परशु वाले राम' नाम अर्जित किया। रामायण में, परशुराम का नाम सुनते ही भ्रष्ट, लालची क्षत्रिय राजा कांप जाया करते थे।
- परशुराम के अलावा रामायण और महाभारत दोनों में देखें जाने वाले कुछ अन्य अवतारों में शामिल हैं:
- हनुमान (संकटमोचन): महाभारत में भीम द्वारा हनुमान की पूँछ न उठाए जा सकने का वर्णन मिलता है।
- जामवन्त: जामवन्त एक बुजुर्ग भालू थे, जो रामायण में हनुमान जी की सहायता करते हैं, और महाभारत में श्री कृष्ण से कुश्ती लड़ते हैं।
- विभीषण: विभीषण रामायण में रावण के छोटे भाई और लंका के राजा थे। महाभारत में युधिष्ठिर के राज्याभिषेक में शामिल हुए थे। उक्त सभी चरित्रों के अलावा भगवान् शिव भी दोनों महाकाव्यों में विद्यमान हैं। रामायण में भगवान् राम सहित रावण द्वारा भी उनकी पूजा की जाती है। वहीँ महाभारत में, वह अर्जुन से मिलने के लिए किरात के रूप में प्रकट होते हैं। इन सभी के अलावा रामायण के एक प्रमुख चरित्र “माता सीता” और “द्रौपदी” को शक्ति का रूप माना जाता है। रामायण में माता सीता को शक्ति के रूप में देखा जाता है जो स्वयं रावण को हरा सकती थीं। वहीँ महाभारत में द्रौपदी को शक्ति अम्मा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है और वह अपने दम पर कौरवों को हराने में सक्षम हैं।

संदर्भ
https://tinyurl.com/bdk26vz2
https://tinyurl.com/4jjj88bu
https://tinyurl.com/bdfxmpja

चित्र संदर्भ

1. रामायण के अंतर्राष्ट्रीय संस्करणों को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
2. रामचरित मानस को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
3. महर्षि वाल्मीकि को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
4. भरहुत का स्तूप: तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में बौद्ध कथाओं (दशरथ जातक) और इतिहास को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
5. अंगकोर वाट में लंका युद्ध के भित्ति चित्र में प्रीह रीम ( श्री राम) को हनुमान जी के ऊपर खड़ा दिखाया गया है! को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)
6. रीमकर (रामायण पर आधारित खमेर महाकाव्य) के दृश्यों को दर्शाने वाली पेंटिंग। को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)
7. काकाविन रामायण के एक संस्करण को दर्शाता एक चित्रण (wikipedia)
8. परशुराम को दर्शाता एक चित्रण (lookandlearn)
9. हिन्दू धर्म के पवित्र चार धाम तीर्थस्थलों में से एक रामेश्वरम में भगवान शिव की पूजा करते श्री राम और लक्ष्मण को दर्शाता एक चित्रण (picryl)

https://prarang.in/Jaunpur_District/24041710290





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