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ईद उल-अज़हा (Eid-al-Adha) मुस्लिम समुदाय के लोगों का एक अद्भुत पर्व है, जिसे बलिदान के पर्व के रूप में भी जाना जाता है। दुनिया भर के लाखों मुसलमानों द्वारा पैगंबर इब्राहिम की कुर्बानी को याद करने के लिए इस दिन भव्य रूप से उत्सव मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन पैगंबर इब्राहिम ने अल्लाह के लिए अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी दी थी। किंतु अल्लाह इब्राहिम की कुर्बानी से खुश हुए और उन्होंने इस्माइल को एक भेड़ से बदल उसे पुनः जीवित कर दिया। बस तब से ही यह त्यौहार दुनिया भर में विविध परंपराओं और तरीकों से मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा मनाया जाता है। अमेरिकी मुसलमान इस दिन की शुरुआत प्रार्थना के साथ करते हैं, दोस्तों और परिवार से मिलते हैं तथा एक दूसरे को उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं। इसके अलावा वे मेमनों का बलिदान देते हैं और उसके मांस को जरूरतमंद लोगों के साथ साझा करते हैं। मक्का में यह त्यौहार वार्षिक तीर्थयात्रा के अंत का प्रतीक है, जिसे 4 दिन तक मनाया जाता है। यहां इस दिन हलाल मांस के साथ उपहारों, प्रार्थनाओं और दावतों का आयोजन किया जाता है। अमीर मुस्लिम द्वारा वित्त पोषित इस्लामी केंद्र, पार्टियों को भी प्रायोजित करते हैं, जहां जरूरतमंद लोगों को भोजन और उपहार दिए जाते हैं। यूरोप में बर्मिंघम(Birmingham) मुसलमानों का सबसे बड़ा सम्मेलन केंद्र है। 2017 में ईद-उल फितर के दिन यहां 106,000 मुस्लिमों ने कार्यक्रम में भाग लिया था। इसे ब्रिटेन का पाकिस्तान भी कहा जाता है। मिस्र में, ईद उल-अज़हा को ईद अल-किब्र के नाम से भी जाना जाता है। उत्सव के दिनों के दौरान, यहां मुसलमान प्रातः जल्दी जाग जाते हैं और अपनी ‘सलह’ (प्रार्थना) के लिए स्थानीय मस्जिदों में जाते हैं। इसके बाद उपदेश दिये जाते हैं, जिसके उपरांत लोग अपने दोस्तों और प्रियजनों से मिलते हैं और एक दूसरे की खैरीयत या सलामती की कामना करते हैं। मोरक्को (Morocco) में इस दिन अल्लाह के प्रति समर्पण के रूप में गाय, भेड़ आदि की बली दी जाती है और उसका मांस गरीब लोगों में बांट दिया जाता है। यहां त्यौहार के दिनों में प्रार्थना सेवाओं और धर्मोपदेशों के लिए लोग अपने निकटतम मस्जिदों में जाते हैं, जिसके बाद लोग एक-दूसरे के घरों में जाते हैं और एक साथ भोजन करते हैं। अन्य देशों से अलग, ईद उल-अज़हा यहां तीन दिवसीय उत्सव के रूप में मनाया जाता है। बांग्लादेश में इस पर्व को 'कुर्बानिर ईद' के नाम से भी जाना जाता है। त्यौहार से लगभग एक महीने पहले ही ईद उल-अज़हा की तैयारी शुरू हो जाती है। यहां कुर्बानी या पशु बलि को सुन्नी मुस्लिमों द्वारा एक अनिवार्य धार्मिक प्रदर्शन माना जाता है। वध किए जाने के लिए चुने गए जानवरों को एक विशेष उम्र का होना आवश्यक है। यदि पशु को कोई हानि होती है, तो बलिदान को अपूर्ण माना जायेगा। यहां गायों, बकरियों और भैंसों को आम तौर पर संस्कार के लिए चुना जाता है। इसके अलावा कुछ ऊंट भी बांग्लादेशियों द्वारा विशेष रूप से आयात किए जाते हैं। बलिदान का समय ईद उल-अज़हा के पहले दिन की नमाज़ के ठीक बाद शुरू होता है और अगले दो-तीन दिनों के सूर्यास्त तक जारी रहता है। पाकिस्तान में, ईद उल-अज़हा चार दिवसीय कार्यक्रम होता है। त्यौहार के दिन ज्यादातर स्थानीय व्यापारिक घराने और दुकानें बंद रहती हैं। इस अवसर की शुरुआत एक छोटी प्रार्थना के बाद होती है। प्रत्येक पाकिस्तानी जो पशु खरीद सकता है, सर्वशक्तिमान के सम्मान में उसकी बलि देता है, तथा मांस को अपने दोस्तों, परिवार और गरीबों में वितरित करता है। यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में, मुसलमान आमतौर पर नाश्ता छोड़ देते हैं और ईद की नमाज़ और ईद के उपदेश के लिए सीधे अपनी स्थानीय मस्जिद जाते हैं। बाद में, वे परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों के साथ विस्तृत भोजन के लिए घर लौटते हैं।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में भी ईद उल-अज़हा को मनाने के विविध तरीकें हैं। नवाबों और कबाबों के शहर, लखनऊ में लोग यहां के प्रसिद्ध डाइनिंग स्पॉट (Dining spot) पर पहुंचते हैं और प्यार से पकाए जाने वाले मटन व्यंजनों को खाते हैं। निज़ामों के शहर, हैदराबाद में पर्व को मनाने की परंपरा गहराई से निहित है और यही वह समय है जब आप शहर के असली स्वादों का अनुभव कर सकते हैं। पूरा शहर, विशेष रूप से सिकंदराबाद, मसाब टैंक आदि खूबसूरती से सजाया जाता है। इस दिन चारमीनार में शाम को प्रार्थना सभाएं आयोजित की जाती हैं, जहां अनेकों लोग एकत्रित होते हैं। पुरानी दिल्ली या पूरा चांदनी चौक क्षेत्र इस दिन ईद उल-अज़हा का गवाह बनता है। जामा मस्जिद के आसपास के प्राचीन उपनगर, जो चांदनी चौक के केंद्र में स्थित है, शहर के सर्वश्रेष्ठ मुगलई व्यंजनों को परोसने वाले कुछ प्रामाणिक रेस्तरां से गुलजार हो उठते हैं। इसी प्रकार मुंबई में हाजी अली दरगाह के आसपास के क्षेत्र में उन भक्तों की एक बड़ी कतार देखने को मिलती है, जो यहाँ नमाज़ अदा करने आते हैं।
वर्तमान समय में जहां पूरा विश्व कोरोना संकट से जूझ रहा है, वहीं कई उत्सवों पर भी इसका असर स्पष्ट रूप से देखने को मिला है। सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए इस वर्ष अन्य त्यौहारों की भांति बकरीद को मनाने का तरीका एक नया रूप ले सकता है। पहले जहां पारंपरिक बकरी बाजारों में इन दिनों लोगों का जमावड़ा लगा होता था, वहीं संकट के इस दौर में पारंपरिक बकरी बाजार गायब हैं। कई मौलवियों और धार्मिक संस्थानों ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर भौतिक बिक्री को फिर से खोलने की अनुमति मांगी है। पत्र में पशु बाजार और बली सुविधाओं को फिर से खोलने की अनुमति मांगी गयी है। इसके अलावा उत्सव के दौरान सामुदायिक नमाज के लिए भी अनुमति मांगी गयी है।
हालांकि इस समय पारंपरिक बकरी बाजार स्थानीय बाजार से गायब हैं, लेकिन पशुओं या बकरियों की बिक्री ऑनलाइन (Online) माध्यम से अपने चरम पर है। इसके लिए व्हाट्सएप ग्रुप (Whatsapp group) से लेकर कई वेबसाइटों (Websites) तक का निर्माण किया गया है, जहां जानवर 8,000 रुपये से शुरू होकर दो लाख रुपये तक की कीमतों पर उपलब्ध हैं। बकरियों की शारीरिक बिक्री पर प्रतिबंध के कारण व्यापारियों की मांग को पूरा करने के लिए साइबर (Cyber) दुनिया में तेजी से झुकाव हो रहा है। खरीदारों का कहना है कि उन्हें ऑनलाइन सस्ती दर पर गुणवत्ता वाले जानवर मिल रहे हैं। इसके अलावा एक्सचेंज और रिफंड (Exchange and Refunds) की अनुमति भी दी जा रही है। यहां देसी किस्म 8,000-18,000 रुपये में उपलब्ध है, जबकि बेहतर गुणवत्ता वाली जमुनापारी बकरी 10,000-35,000 रुपये में बिकती है।
सबसे महंगी अजमेरी किस्म है, जो विभिन्न वेबसाइटों पर 30,000-40,000 रुपये में बिक रही है। ऑनलाइन उपलब्ध बकरियां पारंपरिक बाजार की तुलना में 10-15% सस्ती हैं, क्योंकि इनमें कोई मध्यस्थ नहीं है।
चित्र सन्दर्भ:
मुख्य चित्र में इंग्लैंड (England) के बर्मिंघम (Birmingham) में ईद उल अजः की प्रार्थना को दिखाया गया है। (Pexels)
दूसरे चित्र में अमेरिका (America) के दियानत केंद्र (Diyanet Center) मस्जिद में ईद की प्रार्थना का दृश्य है। (Youtube)
तीसरे चित्र में बांग्लादेश का ईद मिलन दिखाया गया है। (Youtube/Al-zazeera)
चौथे चित्र में पाकिस्तान की बादशाही मस्जिद में ईद की प्रार्थना दृश्यांवित है। (Wikipedia)
अंतिम चित्र में लखनऊ की ईदगाह में ईद की नमाज का चित्रण है। (Prarang)
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