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ब्रितानी शासन के अत्याचार का प्रतीक: भारत की विशाल मेड और दांडी यात्रा का संबंध

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10-04-2018 08:13 PM

आज से 88 साल पहले 6 अप्रैल 1930 में राष्टपिता महात्मा गाँधी द्वारा शुरू किये गये असहयोग आंदोलन का समापन हुआ था जिसकी शुरुआत दांडी में नमक उठाकर की गयी थी।

उन्होंने नमक को इस आंदोलन के प्रतीक के रूप में क्यों चुना? आखिर इस आज़ादी की यात्रा की शुरुवात नमक उठाकर क्यों की गई?

इसका जवाब शायद हम सभी जानते हैं- सन 1835 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का नमक पर लगाया हुआ कर जो सन 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रितानी शासकों को हुए सत्ता हस्तांतरण के बाद भी कम न हुआ। लेकिन क्या आप इसके पीछे का भयानक सच जानते हैं जिस वजह से वो हमारी आज़ादी के तरफ बढ़ने वाला पहला कदम बना?

भारत का मौसम एवं जलवायु ऐसी है कि यहाँ के हर मनुष्य को प्रतिदिन किमान एक तोल नमक की जरुरत होती है, अगर नमक ना मिले तो इंसान की तबियत ख़राब हो उसके जान पर भी बात आ सकती है। प्रकृति में, नमक मुक्त तौर पर उपलब्ध है और भारत का लंबा-चौड़ा समुद्र तट नमक का असीमित स्त्रोत है। भारतीय बिना किसी मोल भाव के बिना किसी शुल्क के नमक बना कर इस्तेमाल कर सकते थे लेकिन इतिहास में हमें चन्द्रगुप्त मौर्य के काल से (अर्थशास्त्र) नमक-कर के साक्ष्य मिलते हैं क्यूंकि नमक को धन माना जाता था और परिरक्षा आदि कार्य के लिए उसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होता था। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अंतर्गत जब कुछ नमक के खेत आये तथा पूरा बंगाल और ओड़िसा एवं बिहार के कुछ हिस्से जब उनके शासन के अंतर्गत आये तब उन्होंने नमक के ऊपर कर बढाया। जब पूरा भारत ब्रिटिश ताज के अधीन हो गया तब नमक के ऊपर का कर कम ना हुआ। रोबर्ट क्लाईव, वारन हेस्टिंग्स आदि ने नमक के व्यापर को ईस्ट इंडिया कंपनी के बड़े अफसरों के एकाधिकार के नीचे लाया, उन्होंने नमक का शुल्क-कर इतना बढ़ाया कि वो एक किसान के दो महीने के वेतन समान था।

मगर ब्रितानी शासन के सबसे बड़े अन्याय का नमूना अभी बाकी था। नमक की तस्करी की रोकथाम करने का कारण देते हुए उन्होंने रावलपिंडी के तोरबेला से लेकर कलकत्ता तक 3,700 कि.मी. लम्बी, 10 फीट ऊँची और 14 फीट चौड़ी नागफनी से एक मेड खड़ी की जिसकी सुरक्षा के लिए उन्होंने तक़रीबन 14,000 सैनिक तैनात किये। ज्यादातर भारतीय बेर के इस्तेमाल से बनी सन 1840 से खड़ी ये मेड लेइ-मुल्तान-फजिल्का (आज पाकिस्तान में) से हिस्सार- दिल्ली- मथुरा- आगरा से फिर ईटावाह-पालीघर-एरिच-चम्बल-झाँसी-खैलार-बबीना-सागर-खंडवा-बुरहनपुर-इटारसी से होते हुए महराष्ट्र के चंद्रपुर से फिर कलकत्ता के तरफ मुड़ जाती थी। इतनी बड़ी मेड सिर्फ नमक की तस्करी रोकने के लिए। इस नमक-व्यापार का एकाधिकार सिर्फ पैसे-फायदे के बारे में सोचने वाले ब्रितानी शासकों ने अकाल के दौरान भी कम ना किया। नमक-व्यापार के एकाधिकार के साथ-साथ ये मेड ईस्ट इंडिया कंपनी का अंतर्देशीय सीमा शुल्क जमा करने का बहुत बड़ा जरिया थी लेकिन इस बात पर हमारे इतिहास में कोई ज्ञात जानकारी नहीं है और ना ही गोवा में स्थित भारतीय सीमा शुल्क इतिहास संग्रहालय में इस बारे में कोई जानकारी उपलब्ध है जबकि इटावाह में बागवानी से जुड़े प्रयोग हुए थे। अफ्रीका में चाय-बागान चलाने वाले रॉय मोक्सहैम ने इस मेड को तीन साल के अविथक प्रयत्नों के बाद पूरी दुनिया के सामने ला रखा जो सन 1879 में संपूर्ण भारत में आई नमक-कर की एकरूपता की वजह से बंद हो गयी थी।

ब्रितानी शासकों के घिनौने शोषण का यह सबसे बड़ा नमूना था। हमारी इतिहास की किसी भी किताब में इसके बारे में बताया नहीं जाता, जो भी इतिहास 18 से 19वी शती में लिखा गया उसमें इस विशाल मेड के बारे में बहुतायता से चुप्पी है। भारत के स्वन्तंत्रा संग्राम की शुरुआत जो एक चुटकी नमक के साथ शुरू हुई थी उसके पीछे ब्रितानी शासकों के शोषण से बनी यह विशालकाय नमक-कर की मेड थी।

1. टैक्समेन्स हेज –दिलीप चिंचलकर
2. http://www.roymoxham.com/the-great-hedge-of-india
3. https://www.theguardian.com/world/2001/feb/12/wto.aids
4. https://www.mapsofindia.com/personalities/gandhi/dandi-march.html
5. https://en.wikipedia.org/wiki/History_of_the_British_salt_tax_in_India

https://prarang.in/India-Hindi/1804101152





रंगों का त्यौहार - होली

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02-03-2018 10:08 AM

रंगों के त्यौहार होली की हार्दिक शुभकामनाएं।

रंगों के इस त्यौहार पर बात करते हैं नवरंग की। भारतीय श्रेण्य ‘नाट्यशास्त्र’ में ललित कलाओं को दृश्य-काव्य कहा गया है। शताब्दियों से भारतीय नाटककार व् अभिनेता भरत मुनि रचित नाट्यशास्त्र में वर्णित नाटकीय शब्दावली के चाक्षुष अर्थों का कूटानुवाद करने का प्रयास कर रहे हैं। रस भाव दर्शन में शब्दों के सजीव चित्रण का प्रयास किया गया है तथा समकालीन जीवन में रस और भाव के अनोखे सिद्धांतों को प्रतिबिंबित किया गया है।

भरत मुनि ने तीसरी शताब्दी में 9 वर्ग वर्णित किये और अभिनवगुप्त ने दसवीं शताब्दी में इसमें 2 वर्ग और जोड़कर कुल 11 वर्ग स्पष्ट किये। भरत मुनि द्वारा वर्णित 9 वर्ग एवं अभिनवगुप्त द्वारा वर्णित 2 अन्य वर्ग चित्र में प्रस्तुत किये गए हैं।

https://prarang.in/India-Hindi/180302989





बिजली वाहन (ई-वी) का बोलबाला

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21-02-2018 11:49 AM

2017 में भारत सरकार ने इलेक्ट्रिक व्हीकल, ई-वी (बिजली से चलने वाली गाड़ियाँ) को लेकर भविष्य के लिए एक नीति की घोषणा की थी। नीति के अनुसार सन 2030 से भारत में बिकने वाली हर गाड़ी ईंधन के रूप में बिजली का प्रयोग करेगी। इस नीति के प्रस्ताव का कारण था बढ़ता वायु प्रदूषण और प्राकृतिक ऊर्जा के स्रोतों (जिनका नवीकरण संभव नहीं है) में गिरावट। यदि 2030 तक भारत में चलने वाले सभी वाहन बिजली द्वारा चलने लगे तो भारत में हो रहे तेल आयत पर 20 लाख करोड़ रूपए की बचत की जा सकेगी और साथ ही साथ एक गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन भी रोका जाएगा।
सरकार की इस नीति को नज़र में रखते हुए 2018 ऑटो एक्सपो में बिजली से चलने वाली गाड़ियों का बोलबाला रहा। महिंद्रा, टोयोटा, टाटा और मारुती सुज़ुकी जैसी धुरंधर कंपनियों के साथ साथ कई स्टार्टअप ने भी अपनी ई-वी गाड़ियाँ प्रस्तुत की। इनमें से कई गाड़ियाँ कंसेप्ट गाड़ियाँ थी जो अभी भी बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तैयार नहीं हैं परन्तु कई गाड़ियाँ सड़कों पर उतरने के लिए भी तैयार हैं। आज भारत के कुल वाहनों में से ई-वी वाहन सिर्फ 1% हैं जिनमें से भी दुपहिया वाहन ही 95% हैं।
परन्तु सरकार की इस नीति पर मर्सडीज़ के चीफ एग्जीक्यूटिव, रोलैंड फोल्जर का मानना था कि यह एक जल्दबाज़ी में लिया गया फैसला था। उनके अनुसार यदि सरकार सिर्फ ई-वी गाड़ियों को बढ़ावा देगी तो कुछ समय में बाकी देश बिजली से भी बेहतर ईंधन जैसे हाइड्रोजन पर दौड़ रहे होंगे और भारत कभी उन दूसरे ऊर्जा स्रोतों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित ही नहीं कर पाएगा। साथ ही उन्होंने कहा कि यदि मान भी लें कि सभी गाड़ियाँ बिजली पर चलेंगी तो क्या इतनी बिजली उत्पादित करने के लिए ज़्यादा कोयला प्रयोग नहीं होगा? और यदि ऐसा हुआ तो जिस समस्या का निवारण करने के लिए इस नीति को लाया जा रहा है, वह समस्या तो पुनः जीवित हो जाएगी।
15 फरवरी को हुए एक पत्रकार सम्मलेन में सड़क परिवहन मंत्री, श्री नितिन गडकरी ने कहा कि भारत को फिलहाल ऐसी किसी नीति की आवश्यकता नहीं है। वहीँ नीति आयोग के सी.ई.ओ. श्री अमिताभ कान्त ने उनके समर्थन में कहा कि हमें अभी आवश्यकता है तो सिर्फ योजनाओं की क्योंकि रोज़ाना नई तकनीक बाज़ार में आ रही हैं। प्रौद्योगिकी हमेशा नियमों से आगे रहती है और भारत में नियमों को बदलना बहुत मुश्किल हो जाता है, इसलिए फिलहाल सिर्फ योजना करें। बेशक सरकार के इस फैसले से ई-वी पर काम करने वाली कम्पनियों और स्टार्टअप को थोड़ी कठिनाइयाँ झेलनी पड़ेंगी परन्तु जल्दबाज़ी में फैसला लेने से बेहतर सोच समझ कर कदम उठाना ही देश के हित में होगा।
प्रथम चित्र - मारुती सुज़ुकी ई-सर्वाइवर कंसेप्ट द्वितीय चित्र - हौंडा स्पोर्ट्स ई-वी कंसेप्ट
1. https://auto.economictimes.indiatimes.com/news/passenger-vehicle/cars/plan-for-all-electric-cars-by-2030-not-viable-says-mercedes-chief/62232287 2. https://www.cartoq.com/electric-vehicle-ev-policy-not-needed-for-india-says-niti-aayog-ceo-amitabh-kant/

https://prarang.in/India-Hindi/180221950





महाशिवरात्री

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13-02-2018 02:32 PM

रुद्र यत्ते दक्षिणमुखं तेन मां पाहि नित्यं (हे रुद्र! अपने इस प्रसन्न मुख द्वारा आप हमारी सदा रक्षा करो) भगवान शिव के दो स्वरूप हैं-रुद्र और भद्र। रुद्र स्वरूप से तांडव के ताल पर महाविनाश होता है और भद्र स्वरूप में हलाहल विष का पान करके इस विश्व को बचाने का कार्य भगवान शिव के द्वारा होता है। विनाश और सृजन के इन दोनों स्वरूपों में शिवतत्व, कल्याणकारी तत्व तो है ही, पर मनुष्य उनके सौम्य और सुंदर स्वरूप के दर्शन करने के लिए सदा उत्सुक रहता है। भगवान् कृष्ण के विराट रूप के दर्शन से तो महावीर अर्जुन भी भयभीत हो गए थे और उन्होंने उस सहस्त्रज विश्वमूर्ति भगवान् से फिर अपने उसी शांत चतुर्भुज रूप को धारण करने की प्रार्थना की थी। परंतु भगवान् के भद्र स्वरूप की महिमा उनका विराट रूप या रद्र रूप को देखें बिना समझ में नहीं आती। इसलिए जीवन में पग पग पर हम रुद्र को शीश नवाते हुए भद्र के दर्शन पाते हैं। जीवन के इंझावातों से गुजरे बिना घर को छाया में सुरक्षित जीवन व्यतीत करते हुए मनुष्य के जीवन में वह तेज प्रकट नहीं हो सकता तपस्या और तितिक्षा की कठिन परीक्षा से जो गुजरता है, उसी के जीवन में प्रसन्नता के फूल खिलते हैं। हम प्रतिवर्ष माघ के महीने में महाशिवरात्रि का महापर्व मनाते हैं। आज के दिन पूरे भारत में महाशिवरात्री का पर्व मनाया जाता है। किसी मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी 'शिवरात्रि' कही जाती है, किन्तु माघ (फाल्गुन, पूर्णिमान्त) की चतुर्दशी सबसे महत्त्वपूर्ण है और महाशिवरात्रि कहलाती है। गरुड़पुराण, स्कन्दपुराण, पद्मपुराण, अग्निपुराण आदि पुराणों में उसका वर्णन है। कहीं-कहीं वर्णनों में अन्तर है, किंतु प्रमुख बातें एक सी हैं। सभी में इसकी प्रशंसा की गई है। जब व्यक्ति उस दिन उपवास करके बिल्व पत्तियों से शिव की पूजा करता है और रात्रि भर 'जारण' (जागरण) करता है, शिव उसे नरक से बचाते हैं और आनन्द एवं मोक्ष प्रदान करते हैं और व्यक्ति स्वयं शिव हो जाता है। दान, यज्ञ, तप, तीर्थ यात्राएँ, व्रत इसके कोटि अंश के बराबर भी नहीं हैं। चित्र में बटेशर मंदिर श्रृँखला को दर्शाया गया है जो शिव मंदिरों के लिये विख्यात है। अन्य चित्र में ममलेश्वर मंदिर (ओंकारेश्वर खंडवा) का शिव लिंग दिखाया गया है। 1. https://goo.gl/Xczd7k 2. https://goo.gl/mut5zB

https://prarang.in/India-Hindi/180213911





सिंधु सभ्यता की रहस्यमयी लिपि

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10-02-2018 08:46 AM

जब पहली बार अंग्रेज़ भारत आये तो उनको यह ज्ञात नही था की भारत प्राचीन सभ्यताओं की जननी है। उनका मकशद था यहाँ पर व्यापार करना तथा यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना परन्तु समय के साथ-साथ उनको यहाँ के पुरातत्व का कुछ ज्ञान हुआ तथा वे यहाँ पर कई सर्वेक्षण करना शुरू किये। वक्त था करीब सन् 1850 का जब किसी को भी कानो कान खबर ना थी की भारत में एक ऐसी सभ्यता दफ्न है जो कई हजारों साल के इतिहास को अपनें में दबा कर रखी है। कई युरोपी भारत में अन्वेशण आदि का काम कर रहे थें उन्ही अन्वेशणकर्ताओं में एक थे अलक्झेंडर कनिंघम जो 1872-73 मे हड़प्पा में खुदाई करवा रहे थे उनको खुदाई में एक युनीकार्न का सील मिला जिसपर कुछ अजीब लिपि में कुछ लिखा गया था बहरहाल उन्होने उस बिंदु पर इतना ध्यान नही दिया और उसे 1873 के सर्वे रिपोर्ट में छपवा दिया। इस सील के प्राप्ती के 50 साल तक किसी को हड़प्पा सभ्यता के बारे में कोई खबर तक ना थी। 1900 के बाद फादर हेनरी हेरास ने इस लिपि को पढने कि कोशिश विश्व के अन्य लिपियों कि मदद से करने कि कोशिश कि परन्तु उनकी कोशिश कोई भी ठोस प्रमाण ना दे पायी। आज सम्पूर्ण विश्व में इस सभ्यता को लाखों लोग जानते हैं तथा इस सभ्यता से सम्बन्धित हजारों पुरास्थल हैं परन्तु है क्या इस लिपि में जो लोग कोशिश करने के बावजूद भी नही पढ पा रहे हैं। कुछ पुरातत्वशास्त्री यह भी अन्दाजा लगाये बैठे हैं कि शायद कल को कहीं से रोसेटा स्टोन की तरह कुछ मिल जाये जिसपर इस लिपि से सम्बन्धित वृहद जानकारी उपलब्ध हो। धौलाविरा से इस लिपि मे लिखा एक साइनबोर्ड मिला है जो कि कई प्रकार के प्रश्न हमारे समक्ष लाता है। भारत के कई भाषा वैज्ञानिक इस भाषा को भारत की कई भाषाओं से जोड़ कर पढने की कोशिश कर रहे हैं जैसे कि कुछ विद्वान गोण्ड भाषा से इसको पढने की बात करते हैं परन्तु एक मतलब व अक्षरों के कई अर्थ निकलकर सामने आते हैं जो इसकी सत्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाने का कार्य करते हैं। एस. आर. राव ने भी सिन्धु लिपि को पढने की कोशिश की है तथा उन्होने कई तथ्यों का भी प्रस्तुतिकरण किया है परन्तु उनकी तकनीकि तथा सटीकता पर प्रश्नचिन्ह है। यह लिपि आज तक एक बड़ी रहस्य बनकर हमारे सामने प्रस्तुत हैं, कितने ही विद्वान इस लिपि को पढने का असफल प्रयत्न कर चुके हैं परन्तु आज तक यह लिपि पढी ना जा सकी। अब तो यह प्रतीत होता है कि रोसेटा स्टोन जैसी कोई पुरासामग्री मिले जिसमें इस लिपि और कुछ अन्य लिपियों का अंकन हो तो ही इस लिपि को पढ पाना सम्भव होगा। एलचिन की पुस्तक राइज आफ सिविलाइजेशन इन इंडिया एण्ड पाकिस्तान सिन्धु सभ्यता पर गहन प्रकाश डालता है। भारतीय विद्वानों जैसे कि- संकालिया, राव, वसंत शिंदे, केटी दलाल, व कई अन्य ने शिन्धु सभ्यता के कई गूढ रहस्यों से पर्दा उठाया है। 1- राइज आफ सिविलाइजेशन इन इंडिया एण्ड पाकिस्तान, एलचिन। 2- प्री हिस्ट्री एण्ड प्रोटोहिस्ट्री ऑफ इंडिया एण्ड पाकिस्तान, संकालिया। 3- इंडियाज़ एंसियन्ट पास्ट, आर एस शर्मा। 4- स्टडीज़ इन प्रोटो-इंडो-मेडिटेरेनियन कल्चर, फादर हेनरी हेरास।

https://prarang.in/India-Hindi/180210892





महात्मा गाँधी का दिल्ली में आखिरी कुछ दिन

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30-01-2018 05:11 PM

जनवरी 30, 1948, 17:12 बजे, नई दिल्ली- यह वह दिन था जब महत्मा गाँधी को मुसलमानों का पक्ष लेने के लिये गोली मार दि गयी थी। महात्मा गाँधी ने देश में होने वाले लड़ाईयों को रोकने की कोशिश की थी जो कुछ लोगों को लगा कि वे मुसलमानों का समर्थन कर रहे हैं। महात्मा गाँधी ने दिल्ली में उनके जीवन के आखिरी दिनों को 12 वीं सदी में कुतुब मीनार के निकट मेहरौली में सुफी दरगाह पर पर किया था जिसे पाकिस्तान से आने वाले लोग तोड़ने लगे थें। बापू को समर्पित एक गान विश्व के मशहूर गायक ने लिखा था यह गान लिनॉर्ड कोहिन का आखिरी गाना था उनके मृत्यु के पहले। लिनॉर्ड कोहिन महात्मा गाँधी से अत्यन्त प्रभावित थें तथा वे सन् 1997-2005 तक मुम्बई में रहें। अभी कल ही उन्हे इस गाने के लिये ग्रैमी पुरस्कार मिला। उनके गाने का हिन्दी रुपान्तरण निम्नवत् है- "जैसा कि वह मनुष्यों को पवित्र बनाने के लिए मर गया, हमें चीजों को सस्ते बनाने के लिए मरना चाहिए,, अपने रास्ते पर चलो, हे मेरे दिल, हालांकि मुझे पूछने का कोई अधिकार नहीं है, एक के लिए जो कभी नहीं था, कार्य के बराबर कभी नहीं,, कौन जानता है कि उसे दोषी ठहराया गया है, कौन जानता है कि उसे गोली मार दी जाएगी,, साल वर्ष, महीने दर महीने, दिन-दर-दिन, विचार से सोचा,, वे अभी भी कानाफूसी करते हैं, घायल पत्थर और बहते हुए पहाड़ रोते हैं,, जैसे ही वह पुरुषों को पवित्र बनाने के लिए मर गया, हमें चीजों को सस्ते बनाने के लिए मरना चाहिए,, और मेरा कल्प कहो, जो आप धीरे-धीरे भूल गए, साल वर्ष, महीने दर महीने, दिन-दर-दिन,, विचार से सोचा " सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के दरगाह की पत्थर की जालियां (खुदी हुई खिड़कियां) टूट गईं थी और 1947 में पाकिस्तान से हिंदू और सिख बचे हुये लोगों द्वारा स्मारक पर हमला किया जा रहा था, जिन्होंने अपने घरों और परिवार को खो दिया था, और वहां शीत में आश्रय लिया था। भीड़ से बिना डरे, 78 वर्षीय गांधी ने कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के महत्व के बारे में भीड़ से बात की और वे हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए काकी का क्या महत्व था ये भी बताये। अपने अंतिम कार्य में, गांधी ने व्यक्तिगत तौर पर यह सुनिश्चित किया था कि हिंदुओं और सिखों ने दरगाह की टूटी हुई दीवारों को पुनर्निर्माण करें। गांधी की हत्या के एक सप्ताह बाद, नेहरू ने उस दरगाह का दौरा किया और तभी से, एक दीया (मार्जिन तेल दीपक, दरगाह सूफी द्वारा बनाए रखा जाता है) मौके पर बार जलता रहता है, और गाँधी के बलिदान को चिह्नित करता है। नेहरू ने यह भी सुनिश्चित किया कि हिंदू-मुस्लिम एकता की वार्षिक शरद ऋतु त्योहार, "फुलवालोन की सईर" (फूलों की पैदल चलना), 1812 में एक मुगल रानी द्वारा शुरू की लेकिन अंग्रेजों ने प्रतिबंधित किया, इस क्षेत्र में पुनर्जीवित किया गया। यह परंपरा आज भी अनवरत चली चली आ रही है। (साल दर साल, महीने से महीने, दिन प्रति दिन) मुफ़्त "काक" (रोटी / रोटी) को भूखे और सुंदर सूफी संगीत को वितरित किया जाता है। (विशेष रूप से गुरुवार) दरगाह पर भी मुफ्त में। यदि इनमें से कोई भी आपको एक भारतीय या दिल्ली के निवासी या सूफी संगीत प्रेमी के रूप में या विश्व शांति के प्रेमी के रूप में आश्चर्यचकित करता है, तो अपने आप को कुछ प्रश्न पूछने का समय है - (ए) गांधी भारतीय विकास एवं विकास के लिए निर्णायक हिंदू-मुस्लिम एकता के बारे में क्यों सोचते हैं? (बी) गांधीजी (जो कि "हिंदू धर्म" पर एक पुस्तक भी लिखी है) हिंदू की तरह पढ़ते दैनिक-गीता का पाठ करते थें, भारत में मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों की रक्षा करने के आगे निकलते हैं? (सी) हम सभी जानते हैं कि WW1 सैनिकों के लिए इंडिया गेट पर बारहमासी ज्योति जलती हुई है, लेकिन दरगाह पर गांधी के लिए एक के बारे में नहीं पता है? (डी) अपने सभी व्यस्त सक्रियता कार्यक्रमों और यात्रा के बावजूद, गांधी ने भारतीय इतिहास के माध्यम से जाने और लोगों और स्थानों को भारतीय एकता के लिए महत्वपूर्ण पाया, लेकिन इंटरनेट के युग में, हम क्यों नहीं? (ई) हम एक बॉलीवुड फिल्म के बारे में क्यों सोचते हैं जब हम "सिलसिला" शब्द सुनते हैं और भले ही हम दिल्ली के निजामुदिन औलिया और अमीर खुसरो, पंजाब के बाबा फरीद और अजमेर के चिस्ती के बारे में सुना हो, हम क्यों नहीं जानते मेहरौली के कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी का, जो मूल "सिलसिला" में उनके बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है (अरबी में संतों की सूफी श्रृंखला / संस्कृत / हिंदी शब्द "सूत्र" के समतुल्य है)? चलो आज अंतिम प्रश्न के उत्तर के साथ आज की शुरुआत करें - कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी पैगंबर के प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी थे। मध्य एशिया में फिरघाना घाटी में जन्मे, वह अजमेर के सूफी संत चिश्ती से प्रेरित हो दिल्ली में बस गए, इस तरह 12 वीं सदी में एक सिलसिला स्थापित किये, जो उस दिन से अटूट रहता है, बिखरे हुए को अक्सर भूल जाते हैं। "कुतुब मीनार" इल्तुतममिश द्वारा पूरा किया गया था और "कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी" को समर्पित था। संभवतः, उस पर नाम दिया गया और उसे दिया जाने वाला शीर्षक (कुतुबुद्दीन - "सर्वश्रेष्ठ / सर्वोच्च / इंसान / पुरुष"), शासक कुतुब उद दीन ऐबक नहीं। 1. http://www.thehindu.com/.../a-heritage-wal.../article7568849.ece)

https://prarang.in/India-Hindi/180130840





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