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महाशिवरात्री

रुद्र यत्ते दक्षिणमुखं
तेन मां पाहि नित्यं
(हे रुद्र! अपने इस प्रसन्न मुख द्वारा आप हमारी सदा रक्षा करो)


भगवान शिव के दो स्वरूप हैं-रुद्र और भद्र। रुद्र स्वरूप से तांडव के ताल पर महाविनाश होता है और भद्र स्वरूप में हलाहल विष का पान करके इस विश्व को बचाने का कार्य भगवान शिव के द्वारा होता है। विनाश और सृजन के इन दोनों स्वरूपों में शिवतत्व, कल्याणकारी तत्व तो है ही, पर मनुष्य उनके सौम्य और सुंदर स्वरूप के दर्शन करने के लिए सदा उत्सुक रहता है। भगवान् कृष्ण के विराट रूप के दर्शन से तो महावीर अर्जुन भी भयभीत हो गए थे और उन्होंने उस सहस्त्रज विश्वमूर्ति भगवान् से फिर अपने उसी शांत चतुर्भुज रूप को धारण करने की प्रार्थना की थी। परंतु भगवान् के भद्र स्वरूप की महिमा उनका विराट रूप या रद्र रूप को देखें बिना समझ में नहीं आती। इसलिए जीवन में पग पग पर हम रुद्र को शीश नवाते हुए भद्र के दर्शन पाते हैं। जीवन के इंझावातों से गुजरे बिना घर को छाया में सुरक्षित जीवन व्यतीत करते हुए मनुष्य के जीवन में वह तेज प्रकट नहीं हो सकता तपस्या और तितिक्षा की कठिन परीक्षा से जो गुजरता है, उसी के जीवन में प्रसन्नता के फूल खिलते हैं।


हम प्रतिवर्ष माघ के महीने में महाशिवरात्रि का महापर्व मनाते हैं। आज के दिन पूरे भारत में महाशिवरात्री का पर्व मनाया जाता है। किसी मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी ‘शिवरात्रि’ कही जाती है, किन्तु माघ (फाल्गुन, पूर्णिमान्त) की चतुर्दशी सबसे महत्त्वपूर्ण है और महाशिवरात्रि कहलाती है। गरुड़पुराण, स्कन्दपुराण, पद्मपुराण, अग्निपुराण आदि पुराणों में उसका वर्णन है। कहीं-कहीं वर्णनों में अन्तर है, किंतु प्रमुख बातें एक सी हैं। सभी में इसकी प्रशंसा की गई है। जब व्यक्ति उस दिन उपवास करके बिल्व पत्तियों से शिव की पूजा करता है और रात्रि भर ‘जारण’ (जागरण) करता है, शिव उसे नरक से बचाते हैं और आनन्द एवं मोक्ष प्रदान करते हैं और व्यक्ति स्वयं शिव हो जाता है। दान, यज्ञ, तप, तीर्थ यात्राएँ, व्रत इसके कोटि अंश के बराबर भी नहीं हैं। चित्र में बटेशर मंदिर श्रृँखला को दर्शाया गया है जो शिव मंदिरों के लिये विख्यात है। अन्य चित्र में ममलेश्वर मंदिर (ओंकारेश्वर खंडवा) का शिव लिंग दिखाया गया है।

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2. https://goo.gl/mut5zB

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