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जब हुई वॉरेन हेस्टिंग्स की सुनवाई रोहिलखंड के सिलसिले में

Rampur
16-10-2018 02:19 PM

1774 में वॉरेन हेस्टिंग्स द्वारा रोहिलखंड में किए गये हमले का संपूर्ण वृतांत ब्रिटिश लेखक सर जॉन स्ट्रैची द्वारा अपनी पुस्तक ‘हेस्टिंग्स एंड दी रोहिल्ला वॉर’ (Hastings and The Rohilla War) में किया गया है, जो इस प्रकार है:

रोहिल्ला अफगानी थे, जिन्होंने 18वीं शताब्दी में मुग़ल साम्राज्य के पतन के दौरान भारत में प्रवेश किया था और रोहिलखंड पर नियंत्रण प्राप्त किया था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद, रोहिलखंड एक स्वतंत्र राज्य बनना चाहता था। इसलिए रोहिलखंड के शासक हाफिज रहमत खान ने अपने राज्य को शक्तिशाली और समृद्ध बना दिया। लेकिन दूसरी तरफ मराठों की रोहिलखंड पर नज़र थी। इस कारण हाफिज रहमत खान ने अवध के नवाब से संधि कर ली कि अगर मराठों ने हमला किया तो अवध उनकी सहायता करेगा, जिसके फलस्वरूप हाफिज रहमत खान, नवाब को चालीस लाख रुपये देगा। मराठों ने 1773 में रोहिलखंड पर हमला किया लेकिन माधव राव पेशवा की अचानक मौत के कारण युद्ध किए बिना वापस चले गए। हालांकि, जब अवध के नवाब ने संधि के मुताबिक 40 लाख रुपये मांगे तो हाफिज रहमत खान ने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि युद्ध तो हुआ ही नहीं।

उसके बाद अवध के नवाब ने ब्रिटिशों से रोहिलखंड पर हमला करने में मदद के लिए अनुरोध किया और वादा किया कि वे सेना का खर्चा और 40 लाख रुपय का भुगतान भी करेंगे। वॉरेन हेस्टिंग्स ने इस प्रस्ताव को स्वीकार लिया और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने 1774 में रोहिल्लाओं को हरा दिया। हाफिज रहमत खान और कुछ 20,000 रोहिल्ला को देश से हटा दिया गया, और रोहिलखंड को अवध से जोड़ दिया गया। इस घटना में रोहिलखंड के गांव को जलाने के साथ बच्चों और महिलाओं को भी मार दिया गया। इंग्लैंड में वॉरेन हेस्टिंग्स द्वारा किये गये इस कार्य की काफी निंदा हुई।

नंद कुमार एक प्रभावशाली बंगाली जमींदार थे, जो हेस्टिंग्स के विरोधी थे। कुछ परिषद के सदस्य, जो हेस्टिंग्स के प्रति शत्रुता रखते थे, ने साजिश रच नंद कुमार की मदद से हेस्टिंग्स के खिलाफ मामला दर्ज करवा दिया। 1775 में नंद कुमार ने हेस्टिंग्स के खिलाफ विधवा मीर जाफर से 3.5 लाख रुपये लेने का आरोप लगाया। हेस्टिंग्स पर लगे आरोप सिद्ध होने पर परिषद का बहुमत उनके खिलाफ था, जिस कारण उन्होंने परिषद को भंग कर दिया। हालांकि, परिषद ने उन्हें कंपनी के खजाने में धन जमा करने के लिए कहा। इसके बाद, हेस्टिंग्स ने सुप्रीम कोर्ट में नंद कुमार के खिलाफ काउंटर चार्ज (Counter charge) दर्ज कराया, जिसमें उसने नंद कुमार पर जालसाज़ी का आरोप लगाया, क्योंकि नंद कुमार उसके खिलाफ रिश्वत का आरोप साबित नहीं कर सका था। नंद कुमार के खिलाफ जालसाज़ी के आरोप सिद्ध हो गए और उसे फांसी की सज़ा सुना दी गयी। इस सुनवाई और निष्पादन को वॉरेन हेस्टिंग्स के आलोचकों ने न्यायिक हत्या कहा, क्योंकि भारत के किसी भी कानून में जालसाज़ी के लिए फांसी की सज़ा नहीं थी।

और वहीं ब्रिटिशों द्वारा रामपुर में एक छोटे से संरक्षित रोहिल्ला राज्य की स्थापना की गयी, जिसमें फैजुल्ला खान को नवाब बनाया। 1793 में, फैजुल्ला खान की मृत्यु हो गई जिसके परिणामस्वरूप उनके बेटे रामपुर का नवाब बनने के लिए आपस में लड़ने लग गये। इस कारण, जनरल एबरक्रॉम्बी के नेतृत्व में फिर से ब्रिटिशों ने दखल देना शुरु कर दिया। जिसके कारण 1794 में दूसरा रोहिला युद्ध हुआ, जिसमें रोहिल्ला हार गए और करीब 25,000 रोहिल्ला सैनिकों को मार दिया गया। युद्ध के बाद, रोहिल्ला युद्ध स्मारक का निर्माण सेंट जॉन चर्च, कलकत्ता के परिसर में ब्रिटिश द्वारा किया गया।

स्वतंत्रता के बाद रोहिल्ला की विशाल बहुमत पाकिस्तान में बस गयी, और जो भारत में रहे वे रोहिलखंड, उत्तर प्रदेश राज्य में बस गए।

संदर्भ:
1.https://www.gktoday.in/gk/warren-hastings/
2.https://www.mapsofindia.com/history/battles/rohilla-war.html
3.http://archive.spectator.co.uk/article/2nd-april-1892/20/hastings-and-the-rohillas-sin-john-strachey-in-his
4.https://archive.org/details/hastingsrohillaw00strauoft/page/n5

http://prarang.in/Rampur/1810161954





रज़ा पुस्तकालय में अकबर का पसंदीदा तिलिस्म

Rampur
10-10-2018 03:48 PM

रामपुर का रज़ा पुस्तकालय भारतीय इस्लामी शिक्षा का अनमोल खज़ाना है। इसमें दुर्लभ पांडुलिपियों, ऐतिहासिक दस्तावेजों, खत्ताती के नमूनों, लघुचित्रों तथा अनेक पुस्तकों को संगृहित किया गया है। आज के समय में रज़ा पुस्तकालय कला, काव्य कैलीग्राफी (Calligraphy) तथा विद्या का प्रमुख केंद्र बन गया है। रामपुर रज़ा पुस्तकालय मंगोल, फारसी, मुगल दक्कानी, राजपूत, पहाड़ी, अवधी और पेंटिंग के ब्रिटिश स्कूलों का प्रतिनिधित्व करने वाली दुर्लभ लघु चित्रों और सचित्र पांडुलिपियों को संग्रहित करने का एकमात्र समृद्ध स्थान है।

पुस्तकालय में व्यक्तियों के चित्रों और लघु चित्रों की 35 एल्बम (Album) हैं जिनमें ऐतिहासिक महत्व के लगभग पाँच हज़ार चित्र शामिल हैं। अकबर के शासन काल के प्रारंभिक वर्षों की एक अद्वितीय एल्बम 'तिलस्म' (हमज़ानामा) नाम से है जिसमें विभिन्न तबके के जीवन के 157 लघुचित्र चित्रित है।

'हमज़ानामा' मुग़ल चित्रकला की प्रथम महत्त्वपूर्ण कृती है, इसे 'दास्ताने-अमीर-हम्ज़ा' भी कहा जाता है। दरअसल हमज़ानामा हजरत मोहम्मद के एक चाचा अमीर हमज़ा (उन्होंने इस्लाम के लक्ष्यों के लिए कई लडाइयां लड़ीं और दुनिया-जहान की यात्राएं कीं।) का वर्णन करती है। यह वीरगाथाओं और रासलीलाओं, तिलिस्म और चालबाज़ी की आश्चर्यचकित कर देने वाली दंतकथा से बनी है। इन दास्तानों के संग्रह को हमज़ानामा कहा जाता है।


हमज़ानामा के अधिकांश पात्र काल्पनिक हैं। इसमें 46 खंड हैं और लगभग 48,000 पृष्ठ हैं। ऐसा कहा जाता है कि दास्ताने-अमीर-हम्ज़ा गजनी के महमूद के युग में लिखी गयी थी और 1562 में बादशाह अकबर ने इन्हें चित्रबद्ध भी करवाया और यहीं से लघु चित्रकारी के क्षेत्र में भारत में एक नये युग का सूत्रपात हुआ। अकबर, जिन्होंने चौदह वर्ष की उम्र में सिंहासन को संभाल लिया था, ने अपने शासनकाल की शुरुआत में हमज़ानामा की सचित्र पांडुलिपि बनवाने का कार्य शुरू करवाया जिसे पूरा करने के लिए लगभग 14 वर्ष (1562 से 1577) लगे। इसमें असामान्य रूप से बड़े आकार के 1400 पूर्ण मुगल लघुचित्र पृष्ठ शामिल थे।

1883–1893 सदी के मध्य में इसी हमज़ानामा से 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' ने जन्म लिया। आठ हजार पृष्ठ में फैली तिलिस्म-ए-होशरुबा की कहानियों को 19वीं सदी के आखिरी दशकों में मुहम्मद हुसैन और अहमद हुसैन नाम के दो दास्तान कहने वालों ने लिखा। तिलिस्मे होशरूबा का कथानक इतना दिलचस्प है कि सुनने वाले इस तिलिस्म का हिस्सा बन जाते हैं। इसमें अमीर हमज़ा का मुकाबला जादूगरों के शहंशाह अफरासियाब से है।


हमज़ानामा के अलावा रज़ा पुस्तकालय में ज्योतिष और जादुई अवधारणाओं को दर्शाती कई एल्बम हैं। एक शाही झंडों में क़ुरान की पंक्तियां हैं और इस प्रतीकात्मक तिमुरिद झंडे में शेर और सूरज भी चित्रित हैं। एल्बम में अवध नवाबों की मुहरें भी हैं जो कि उनके स्वामित्व का सकेंत देती हैं। पुस्तकालय संग्रह में रागमाला (एक बहुत ही मूल्यवान एल्बम है) तथा साधु और सूफीयों के चित्रों वाली भी एक एल्बम है।

इनमें से कुछ शाही चित्रकार, जिनके कार्य पुस्तकालय में संरक्षित हैं, वे- अबुल हसन नादिर-उज़-ज़मन, असी क़हार, बिछित्र, भवानी दास, छित्रमैन, डाल चन्द, रामदास, सौला, फारूख चेला, फतेह चन्द,कान्हा, गोवर्धन, लाल चन्द, लेख राज, मनोहर, मोहम्मद आबिद, नरसिंह, ठाकुर दास, मोहम्मद अफ़ज़ल, मोहम्मद हुसैन, मोहम्मद युसुफ, गुलाम मुर्तज़ा हैं।

संदर्भ:
1.http://razalibrary.gov.in/MiniaturePaintings.html
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Hamzanama
3.https://www.tor.com/2015/04/08/hoshruba-introduction/
4.https://www.livemint.com/Leisure/5H6y0jHdjrq8IGuHwQO8aO/Very-queer-qissas.html

http://prarang.in/Rampur/1810101932





"रबी" और "खरीफ"की फसलों का मुगलों से संबंध

Rampur
29-08-2018 11:44 AM

भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में कृषि आज से ही नहीं वरन् विभिन्‍न एतिहासिक साम्राज्‍यों के दौरान से ही बहुत बड़ा प्रभाव डाल रही है, उनमें से एक मुगल साम्राज्‍य भी था। वर्तमान समय में भारत की कृषि में दो शब्‍द काफी प्रसिद्ध हैं "खरीफ" और "र‍बी"। इन शब्‍दों से भारतीय, मुगल साम्राज्‍य के दौरान अवगत हुए। खरीफ और र‍बी की फसलों में अलग अलग तापमान और आर्द्रता की आवश्‍यकता होती है। मुगलों द्वारा भारतीय कृषि में बड़े बड़े परिवर्तन लाए गये जो आज भी भारतीय कृषि में प्रत्‍यक्ष रूप से दिखाई देते हैं। कुछ फसलों को इन्‍होंने बढ़ावा दिया, तो कुछ नई फसलों का आगमन भारत में हुआ।

मुगलों के आगमन के दौरान भारत की जनसंख्‍या का बहुत बड़ा भाग ग्रामीण क्षेत्र में रहता था तथा जीवन यापन के लिए कृषि पर ही निर्भर था। अतः इन्‍होंने कृषि में विभिन्‍न तकनीकों (सिंचाई, जुताई इत्‍यादि के लिए) का प्रयोग करना भी प्रारंभ कर दिया था। ये लोग सामान्‍यतः आहार वाली फसलें उगाते थे, किंतु मुगल काल में जिन्‍स-ए-कामिल (सर्वोत्‍तम फसलों) में कपास (मध्‍य भारत और दक्षिण का पठार) और गन्‍ने (बंगाल) जैसी फसलें भी शामिल थीं। इस दौरान आगरा में 39 और दिल्‍ली में 43 फसलें तथा बंगाल में चावल की 50 किस्‍में उगाई जाती थीं। तिलहन तथा दलहन का भी अच्‍छा उत्‍पादन किया जाता था। ये लोग उच्‍च वर्षा वाले क्षेत्रों में खरीफ की फसल (चावल) तथा न्‍यून वर्षा वाले क्षेत्र में रबी की फसल (गेंहु, बाजरा) का उत्‍पादन करते थे। भारत में मक्‍का (अफ्रिका), टमाटर, आलू, अननास,पपीता इसी दौरान आये। इस काल में तंबाकू और भांग की खेती का विस्‍तार भी तेजी से हुआ, हांलांकि औरंगजेब द्वारा इसे पूरी तरह बंद करवा दिया गया। शिमला मिर्च और केसर का इन्‍हें कोई ज्ञान ना था तथा नील की खेती का प्रचलन इस दौरान काफी बड़ा। मुगल काल में मसालों का उत्‍पादन भी वाणिज्‍य की दृष्टि से काफी प्रसिद्ध हुआ।

मुगलों द्वारा कृषि को प्रमुखतः चार भागों रबी (वसंत), खरीफ (शरद ऋतु), सेफ (ग्रीष्‍म) और शेता (शीत) की फसलों में बांटा गया, जो अरेबिक(Arabic) शब्‍द हैं तथा मुगल काल के दौरान भारत आये इन शब्‍दों में से आज के किसानों द्वारा सामान्‍य रूप से रबी और खरीफ को ही जाना जाता है। खासकर खरीफ और रबी की फसलों के उत्‍पादन और कटाई का समय मुगल काल के समान ही है।

संदर्भ :

1.https://www.indianetzone.com/50/major_crops_mughal_india.htm
2.https://iasexamportal.com/courses/ias-mains/history/mughal-economy/agriculture
3.https://www.vivekanandacollegeforwomen.org/library/synopsis/Geography/Principal_synopsis/AGRICULTURE%20DURING%20MUGHALS.pdf

http://prarang.in/Rampur/1808291759





ज़रूर देखिएगा रामपुर का यह प्राचीन नक्शा

Rampur
30-06-2018 03:35 PM

रामपुर का गौरवशाली इतिहास कौन नहीं जानता, और बेशक यहाँ के हर नागरिक को अपनी जड़ों का इतिहास पता होना चाहिए। इतिहास है ही ऐसा विषय जिसके बारे में यदि चर्चा शुरू हो जाए तो फिर आप जितना चाहे पीछे जा सकते हैं। तो आज थोड़ी बात करते हैं भौगोलिक इतिहास की।

आज हम आपके सामने एक नायाब नक्शा पेश करने जा रहे हैं। चित्र में दिखाया गया नक्शा बनाया गया था सन 1770 में। इसके रचयिता थे फ़्रांसीसी कर्नल जीन-बैप्टिस्ट-जोसफ-जेंटील। कर्नल जेंटील ने भारत में काफी समय बिताया था। प्रस्तुत नक्शा एक 21 नक्शों के समूह में से एक है जो उन्होंने फैज़ाबाद में रहते हुए 1770 में बनाये थे। सभी नक्शे आधारित थे अबुल फज़ल द्वारा बादशाह अकबर के लिए बनाये गए ऐन-ए-अकबरी पर जिनका अध्ययन कर्नल जेंटील ने अवध में रहते हुए किया था। साथ ही उन्होंने डी एंविल द्वारा बनाये गए नक्शों की भी मदद ली थी। 18वीं शताब्दी के नक्शों में से किसी नक्शे में इतने स्थानों का नाम मौजूद नहीं था जितना कि कर्नल जेंटील के नक्शों में था। ऐसा कहा जाता है कि भौगोलिक दृष्टि से ये नक्शे इतने सटीक नहीं थे क्योंकि उस समय विश्व के बहुत कम स्थानों का सर्वेक्षण हुआ था। उस समय के भारत के ज़्यादातर नक्शे कही-सुनी-लिखी-पढ़ी बातों पर ही आधारित होते थे।

नक्शे में हम रामपुर का नाम नहीं देख सकते हैं क्योंकि 1770 तक रामपुर की स्थापना नहीं हुई थी लेकिन हम उस भूगोल को ज़रूर देख सकते हैं जहाँ रामपुर मौजूद था, जैसे अमरोहा, संभल आदि को साफ़ साफ़ देखा जा सकता है। और यदि इस स्थान से थोड़ा ऊपर की ओर दायें में देखा जाये तो हम एक शेर का चित्र देख सकते हैं जो यहाँ इनकी मौजूदगी को चिह्नित करता है। नक्शे की बायीं और दायीं ओर ऊपर और नीचे कुछ फ़्रांसीसी लिखावट और कुछ चिह्न हमें दिखते हैं। ऊपरी बाएं भाग में लिखा है ‘मुग़ल साम्राज्य की प्रतिष्ठा’, और दायें भाग में लिखा है ‘संगीत के वाद्य यंत्र’, निचले दायें भाग में कुछ चिह्न हैं जो सिर्फ सम्राट के पद के लिए हैं जैसे सम्राट की गद्दी, उनके आभूषण और उनके नौकर। निचले बाएं भाग में दिए गए चित्र एक हिन्दू मंदिर और हिन्दू देवी-देवताओं को दिखाते हैं।

संदर्भ

1. मैप्स ऑफ़ मुग़ल इंडिया – सूसन गोल

http://prarang.in/Rampur/1806301495





रामपुर में ज़रदोज़ी की चमक

Rampur
06-04-2018 05:17 PM

प्राचीन काल से ही कला के कई प्रकार लोगों के जीवन का हिस्सा रहे हैं, जैसे की चित्रकारी, मूर्तिकला, मृदभांड बनाना इत्यादि। इन सबके बीच कपड़ों की अहमियत को मानव जीवन काल में अनदेखा नहीं किया जा सकता। जैसे सोने चाँदी की चमक इंसानों को मोहने में कभी पीछे नहीं रहती, वैसे ही ज़रदोज़ी की चमक प्राचीन काल से ले कर अब तक लोगों के बीच प्रचलित है। सोने का इस्तेमाल कपड़ों में काफी विभिन्न तरीकों से हुआ है। अगर हम ज़रदोज़ी की कारीगरी की बात करें तो हमे इसके काफी ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं जैसे -

1. ऋग्वेद में कपड़ों में सोने के काम की तुलना सूर्य के किरणों से की गयी है।
2. महाभारत के आदिपर्व और सभापर्व में भी सोने की कढ़ाई की हुई कपड़ों का वर्णन है।
3. 13 वी सदी से भी इसके प्रमाण मिले है जहाँ कपड़ों के साथ-साथ ऊन और चमड़े पर भी कढ़ाई की जाती थी।
4. इसकी चर्चा ग्रीक (यूनानी) यात्रियों ने भी की है (4 थी शताब्दी ई.पूर्व)।
5. मुग़लों के शासन काल में ज़रदोज़ी को खास प्राथमिकता मिली जिसका सीधा प्रमाण मुग़ल काल के कारखानों से मिलता है।
6. अकबर के शासन काल में फ़ारसी कारीगरों को बुलाया जाता था ताकि वो अपनी तकनीक यहाँ के कारीगरों को सिखा सकें।
7. आइन-ए-अकबरी; कढ़ाई, कारीगरों और तकनीक के बारे में विस्तृत जानकारी देती है। अकबर के राज के अंतर्गत कारखानों की स्थापना हुई थी जहाँ कारीगरों को काफी प्रोत्साहन मिला।
8. शाहजहाँ के कार्यकाल में भी इस कला को बड़ी प्राथमिकता मिली।

15 वीं शताब्दी के अंत में हुए व्यापारिक रास्ते की खोजों ने यूरो-एशियन व्यापार को बढ़ाया और पुर्तगाली ज़रदोज़ी के एक महत्वपूर्ण निर्यातक बन गए। ब्रिटिशों के राज के अंतर्गत 16 वी शताब्दी में भी ज़रदोज़ी के काम को काफी प्रोत्साहन मिला लेकिन इसके साथ ही कई बाधाएँ आई जैसे – यह कार्य शाही संरक्षण के अंतर्गत नहीं रहा और कारीगरों को मजबूर किया जाता था की वे अपने काम के लिए नए बाज़ारों की खोज करें और वहां उन्हें बेचे।

ज़रदोज़ी की कढ़ाई से बनी चीजों को 3 हिस्सों में बाट कर समझा जा सकता है -
1. घर (सजाने) का सामन और उससे सम्बंधित चीजें – तम्बू, तख्तपोश(कालीन), दरी, चादर (ओढ़ने और बिस्तर के लिए), छाता (अफ्ताब्गिर), खानपोश (खाना ढकने के लिए) इत्यादि
2. कपड़े, पोशाक और उससे सम्बंधित चीजें – महैरीबी, पटका, शॉल, चुनर, दुपट्टा, साडी, कमरबंध, जुती, मुकुट, बटुआ, कडा इत्यादि
3. अलग-अलग प्रकार की दूसरी चीजें – वर्दी, बैनर, झंडे इत्यादि
इनको बनाने की तकनीक और औजार, इनकी रचनाओं के प्रकार इत्यादि के बारे में अगली चिठ्ठी में पढ़े।

1. ज़रदोज़ी- ग्लिटरिंग गोल्ड एम्ब्रायडरी – चारू स्मिता गुप्ता
2. तानाबाना- टेक्सटाइल्स ऑफ़ इंडिया, मिनिस्ट्री ऑफ़ टेक्सटाइल्स, भारत सरकार
3. हेंडीक्राफ्ट ऑफ़ इंडिया – कमलादेवी चट्टोपाध्याय
4. टेक्सटाइल ट्रेल इन उत्तर प्रदेश (ट्रेवल गाइड) – उत्तर प्रदेश टूरिज्म

http://prarang.in/Rampur/1804061134





रोहिलखंड का इतिहास

Rampur
04-04-2018 01:19 PM

वैसे तो रोहिलखंड का इतिहास करीब चार हज़ार वर्ष तक जाता है परन्तु रोहिलखंड नाम कब से पड़ा और इस क्षेत्र में घटी घटनाएँ इस क्षेत्र व इस काल खंड को महत्वपूर्ण बनाती हैं। शुरूआती दौर में यह क्षेत्र रोहिलखंड के नाम से नहीं जाना जाता था। 12 वीं शताब्दी ई० से 18 वीं शताब्दी ई० तक यह क्षेत्र ' कठेर ' अथवा ' कठेहर ' के नाम से प्रचलित रहा था। कठेर की दक्षिण-पश्चिमी सीमा पर गंगा नदी, उत्तरी सीमा पर कुमायूँ का पहाड़ी क्षेत्र तथा पूर्वी सीमा पर अवध का क्षेत्र था। इसके अन्तर्गत वर्तमान रुहेलखण्ड का लगभग पूरा क्षेत्र आता था। यह क्षेत्र राजनैतिक रूप से अत्यंत मजबूत था। यही कारण था कि लोगों की निगाह इस क्षेत्र पर आधिपत्य पाने की थी।

18 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में एक वह दौर आया जब मुग़ल शासक औरंगजेब की मृत्यु हो गयी। इस वक़्त तक मुग़ल साम्राज्य कमजोर हो चुका था और वे अपने आधिपत्य क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करने लायक नहीं बचें। मुगलों द्वारा बसाये गए जमींदारों, जागीरदारों आदि पर भी उनका नियन्त्रण घटने लगा। यह वो दौर था जब कठेर क्षेत्र में भी अराजकता फैल गयी तथा यहाँ के जमींदार स्वतन्त्र हो गये। 18 वीं शताब्दी में पहली बार रुहेला पठानों ने कठेर क्षेत्र (वर्तमान रुहेलखण्ड) में प्रवेश किया। रोहेला अफगानिस्तान में रोह नामक क्षेत्र से आये थे जिसका विवरण विभिन्न पुस्तकों आदि में हमें मिल जाता है। इनके आने वाले स्थान जो कि रोह नाम से जाना जाता था के कारण ही इन्हें रुहेला पठान कहा गया। दाऊद खाँ सर्वप्रथम 1707 ई० में रोह से इस कठेर क्षेत्र में आये। दाऊद खाँ ने इस कठेर क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित कर लिया तथा यहाँ पर रोहेलाओं की वंशानुगत शासन प्रणाली की शुरुआत हुयी। दाऊद खाँ के बाद उनके अन्य उत्तराधिकारियों ने यहाँ शासन किया तथा रुहेलों द्वारा इस क्षेत्र पर शासन करने के परिणामस्वरुप 1730 ई० से यह क्षेत्र (जो पूर्व में पंचाल व कठेर था) "रुहेलखण्ड" के नाम से जाना जाने लगा।

भारत में अंग्रेजों के आगमन के बाद 1763 से रुहेला सरदारों द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध शुजाउद्दौला को सहायता देने के साथ ही रुहेलों का स्वर्णकाल समाप्त हो गया तथा 1774 से 1801 ई० तक यह रुहेलखण्ड क्षेत्र अवध के नवाब शुजाउद्दौला के अधीन हो गया।

नवम्बर 1801 ई० में रुहेलखण्ड पर अंग्रेजों (ईस्ट इण्डिया कम्पनी) का अधिकार हो गया तथा उन्होंने रुहेलखण्ड को कमिश्नरी बनाया। 1857 एक महत्वपूर्ण दौर था जब रामपुर इस क्षेत्र के एक उभरते हुए राज्य के रूप में उदित हुआ था। एक दौर के बाद यह क्षेत्र रामपुर के अधीन हो गया और भारत के आज़ादी के दौरान ही रामपुर प्रिन्सिली स्टेट में शामिल हो उत्तर प्रदेश का एक अंग बना।

1. रूहेलखंड 1857 में, ज़ेबा लतीफ़
2. रोहेला इतिहास (इतिहास एवं संस्कृति) 1707-1774, डॉ डब्लू. एच. सिद्दीकी, रामपुर रज़ा लाइब्रेरी
3. http://www.ignca.nic.in/coilnet/ruh0002.htm

http://prarang.in/Rampur/1804041122





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