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अगस्त 1942 में आज़ादी की बिगुल

Rampur
15-08-2018 11:04 AM

आज की दिनांक 15 अगस्त को सम्पूर्ण भारतवर्ष में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है तथा आज हमारा 72वां स्वतंत्रता दिवस है। परन्तु क्या आप जानते हैं कि इस स्वतंत्रता आन्दोलन का असली बिगुल कब बजा था?

बात है 8 अगस्त सन 1942 की, जब मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान (जिसे बाद में अगस्त क्रान्ति मैदान बोला जाने लगा) में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (All India Congress Committee) की बैठक रखी गयी। यही वह बैठक थी जब अंग्रेजों के खिलाफ भारत की पूर्ण आज़ादी के लिए ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की शुरुआत हुई और अगस्त में होने के कारण इस आन्दोलन को अगस्त क्रांति के नाम से भी जाना जाता है। आज भी अगस्त क्रांति मैदान में इस दिन को समर्पित एक स्मारक खड़ा है।

यही वह आन्दोलन था जब गांधीजी ने सभी भारतवासियों को ‘करो या मारो’ का मंत्र सिखाया था। गांधीजी का भाषण इतना प्रभावशाली था कि भाषण के कुछ घंटों बाद ही पूरी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को बिना किसी सवाल-जवाब के जेल में डाल दिया गया। महात्मा गाँधी, अब्दुल कलाम आज़ाद, जवाहर लाल नेहरु और सरदार पटेल जैसे कई राष्ट्रीय नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था।

सभी मुख्य नेताओं की गिरफ्तारी के बाद अरुणा असफ अली ने कांग्रेस समिति के सत्र को संभाला। सार्वजनिक प्रक्रियाओं और सभाओं पर प्रतिबंध लगाने के लिए पुलिस की चेतावनियों और सरकारी नोटिसों के बावजूद, मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में एक बड़ी भीड़ इकट्ठा हुई जहां अरुणा असफ अली ने ध्वज फहराया।

अंग्रेज़ों ने विश्व युद्ध के ख़त्म होने से पहले भारत को मुक्त न करने का फैसला लिया। और अंत में सन 1947 में भारत ने अपनी स्वतंत्रता हासिल की।

संदर्भ:
1.http://www.freepressjournal.in/webspecial/quit-india-movement-all-you-need-to-know-in-10-points/1118275
2.चित्र: Flames of ’42: विथल एस. झवेरी, भानुशंकर एम. याग्निक


रामपुर और खिलाफत आंदोलन

Rampur
03-04-2018 11:39 AM

भारत के स्वतंत्रता के तरफ बढ़ाये गए कदमों में खिलाफत आंदोलन एक ठोस कदम था। यह धर्म प्रतीकों का इस्तेमाल कर राजकीय संगठन को स्वतंत्रता संग्राम की तरफ ले जाने वाला एक लम्बा आंदोलन था जो सन 1919 से लेकर 1924 तक (5 साल) चला। यह राजनैतिक मुस्तद्दी का भी एक अलग प्रमाण था। गांधीजी ने और अली भाईयों ने खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन को एक साथ जोड़ दिया था ताकि हिन्दू और मुस्लिम तथा सारे भारतवासी इस में शामिल हो एकता का प्रदर्शन करें और ब्रितानी शासकों पर दबाव ला सकें।

खिलाफत आंदोलन के सबसे प्रभावशाली और मुख्य नेता थे दो भाई मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली जौहर। यह दोनों भी काफी पढ़े लिखे थे और इस आंदोलन के दरमियाँ उन्होंने पश्चिमी तालीम में पढ़े-लिखे मुस्लिम बांधवों को और उलेमा के अंतर्गत पढ़े मुस्लिम बंधवो को तथा राष्ट्रवादी लोगों को एक साथ लाने का काम किया। इन दोनों का जन्म रामपुर रियासत में हुआ था। उनके पिताजी रामपुर रियासत के जमींदार थे जो महिना 1,250 रुपये कमाते थे तथा उनके सभी भाई रामपुर दरबार में अलग अलग हौदे पर काम करते थे।

जब मोहम्मद अली 5 साल के थे तब उनके पिता का देहांत हो गया लेकिन परिस्थिती से ना डरते हुए उन्होंने अपनी शिक्षा पूर्ण की। लिंकन कॉलेज, ऑक्सफ़ोर्ड से शिक्षा पूर्ण करने पर वे रामपुर में आकर बसे तथा यहाँ पर रामपुर राज्य के शिक्षा निदेशक का कार्यभार संभाला। उनके भाई मौलाना शौकत अली, जिन्हें मान्यता है कि गांधीजी राजनीती में लाये, असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए अपने समर्थन (1919-1922) के लिए गिरफ्तार कर लिये गये थे और वे सन 1923 तक कैद में थे। मोहम्मद अली जौहर की पत्नी अमजादी बानो बेगम भी खिलाफत आंदोलन में सक्रीय रीति से शामिल थी।

खिलाफत आंदोलन की शुरुवात और मकसद तुर्क के ओटोमन खलीफा के पद की पुनर्स्थापना के लिए अंग्रेजों पर दबाव लाना था और साथ ही पूरे भारत के मुस्लिम समाज को एक साथ लाना भी। इसके अलावा गांधीजी और अली भाईयों के संगठन के अनुसार इसे राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में भी देखा गया जहाँ असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन को एक साथ कर दिया गया जिसके तहत दोनों ने एक दूसरे के कार्य में भरपूर सहकार्य किया। सन 1921 में ब्रितानी शासकों ने खिलाफत और असहयोग आंदोलन के कार्यकताओं पर बड़े पैमाने पर बेरहमी से कार्यवाही की जिसके चलते दोनों आंदोलन बंद किये गए। सन 1922 में तुर्की राष्ट्रवादियों ने ओटोमन राज और खलीफा का पद सन 1924 में बंद कर दिया जिसकी वजह से खिलाफत आंदोलन ने पूरी तरह दम तोड़ दिया।

यह बड़ी अनूठी बात है कि जो रामपुर भारत के आज़ादी की लड़ाई में कभी सक्रीय नहीं था उसने देश को धर्म और राजनैतिक बंधन में संगठित करने वाले दो भाई दिए।

1. https://encyclopedia.1914-1918-online.net/article/khilafat_movement
2. द खिलाफत मूवमेंट: रिलीजियस सिम्बोलिज्म एंड पोलिटिकल मोबिलाइजेशन इन इंडिया- गेल मिनौल्ट
3. सेपरेटिज्म अमोंग इंडियन मुस्लिम्स: द पॉलिटिक्स ऑफ़ यूनाइटेड प्रोविन्सेस मुस्लिम्स 1860-1923- फ्रांसिस रोबिनसन


रामपुर में अंग्रेजों की वापसी

Rampur
25-03-2018 09:53 AM

रामपुर की स्वतंत्रता के प्रति उदासीनता और मुरादाबाद पर अंग्रेजों का अधिकार होने के पश्चात रूहेलखंड पर अधिकार करने का रास्ता खुल गया था। अंग्रेज इसी प्रकार की घटना की अपेक्षा कर रहे थे और उन्होंने अपनी कूटनीति से पूरे स्वतंत्रता संग्राम समर को सफलता पूर्ण तरीके से अंजाम दिया। इस कारण नैनीताल में शरण लिए सभी अंग्रेज मैदान में उतर गए थे। रामपुर के नवाब युसुफ अली खान ने रामपुर के उत्तराधिकारी कल्बे अली खान को कालाढोंगी भेजा जहाँ पर अंग्रेज रुके हुए थे। कल्बे अली खान अपनी सेना लेकर वहां पहुंचे और वहां से सारे अंग्रेज रामपुर रियासत की सेना की सुरक्षा में मुरादाबाद के लिए निकले बाद में सेना में नवाब खुद भी शामिल हुए और उन सबने अंग्रेजों को सुरक्षित रामपुर पंहुचा दिया।

इस कृत्य के लिए अंग्रेजों ने नवाब पर खुल के मेहरबानियाँ की। गवर्नर जनरल ने बीस हजार रूपए का पुरस्कार प्रदान किया और जहाँ अभी तक रामपुर 11 तोपों की सलामी तक सीमित था को बाधा कर 13 तोपों की सलामी निश्चित कर दिया।

146 गावों जिनकी आय 5,27,281 रूपए चार आने थी, की जागीर “फरजंद-ए-दिल पजीर” की तहसील शाहबाद, मिलक, तथा बिलासपुर में शामिल हो गयी। इतना ही नहीं अपितु मुरादाबाद की मालगुजारी की जो रकम नवाब रामपुर के कब्जे में थी उसे भी अंग्रेजों ने नहीं वापस लिया। इस प्रकार से रामपुर व रूहेलखंड पर अंग्रेजों की वापसी हो गयी जो फिर 1947 में ही हटी।

1. रूहेलखंड 1857 में, ज़ेबा लतीफ़


1857 का रामपुर

Rampur
19-03-2018 11:32 AM

1857 वह दौर था जब भारत में आजादी की लड़ाई का पहला शंखनाद हुआ था। भारत भर में जगह-जगह पर क्रांति की लड़ाई शुरू हो गयी थी। मेरठ, लखनऊ, दिल्ली, इलाहबाद, कानपुर आदि स्थानों पर स्वतंत्रता की लड़ाई ने विशाल रूप लेना शुरू कर दिया था। मुरादाबाद, बुलंदशहर आदि स्थानों पर भी विद्रोह की घटनाएँ तेज़ होने लगी थी। 1857 के समय में रामपुर में नवाब युसुफ अली खान का शासन था, नवाब युसुफ अंग्रेजों के विश्वासपात्र थे। इस कारण रूहेलखंड के स्वतंत्रता संग्राम को गहरी क्षति का सामना करना पड़ा था। कई बार यह कहा जाता है की नवाब के अंग्रेजों के विश्वासपात्र होने के कारण रामपुर रियासत में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष नहीं हुआ था जबकि रामपुर रियासत में स्वतंत्रता संघर्ष के लिए क्रांतिकारियों ने भाग लिया था। परन्तु क्रांतिकारी रामपुर शहर में क्रांति का बिगुल फूक पाने में असफल रहे।

1857 की क्रांति के दौरान रामपुर में कई प्रकार की गतिविधियाँ हुयी थी जिनकी नीवं लाल डांग संधि (17 अक्टूबर 1774) से भी जुड़ी थी। इस दौर में फैजुल्लाह खान द्वारा 17,000 रोहेल्लाओं को रियासत से बाहर निकाल दिया गया था तथा ऐसी ही कई अन्य घटनाओं ने रामपुर की स्थिति को विभिन्न स्थानों से पेचीदा बना दिया था। उपरोक्त दिए कारणों से नवाब युसूफ अली खान को रोहेलों से भय था जो उनकी रियासत में रहते थे। उपरोक्त राजनीतिक स्थितियों पर नजर डालने से पता चलता है की जिस प्रकार से फैजुल्लाह खान ने रोहेलों से रियासत बचाने के लिए सुजा-उद-दौला से अंग्रेजों की ज़मानत के साथ लाल डांग संधि की थी। इसी तरह नवाब युसुफ अली खान ने अपनी रियासत रूहेला पठानों से बचाने के लिए अंग्रेजों का साथ दिया। यह तथ्य भारत के कई रियासतों से अलग था जैसे कि झाँसी, लखनऊ आदि।

नवाब युसुफ अली खान ने कमिश्नर रूहेलखंड से मुरादाबाद की निजामत (प्रशासन) की सनद प्राप्त कर ली थी। इस सनद से रामपुर रियासत का मुरादाबाद पर अधिकार हो गया था । 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई को कुचलने और मुरादाबाद पर अधिकार करने की कार्यवाही रामपुर रियासत ने की। इसके अलावा रामपुर के नवाब ने नैनीताल में शरण लिये अंग्रेजों की मदद की और कई सैनिक कार्यवाही कराइ जिससे अंग्रेजों की नजर में रामपुर के नवाब की वफ़ादारी साबित हो गयी। उपरोक्त घटनाओं के कारण रूहेलखंड के स्वतंत्रता संग्राम को हार का सामना करना पड़ा। इस प्रकार रामपुर में कोई विद्रोह नहीं हुआ। वहीँ मुरादाबाद में ब्रितानी सरकार के खिलाफ काफी विद्रोह हुए। रामपुर के सन्दर्भ में मौजा गिनतीपुतरिया, जो कि भावर के क्षेत्र में है, में खूनखराबा हुआ था जो कि उल्लेखनीय है।

1. रूहेलखंड 1857 में, ज़ेबा लतीफ़


बीते समय का रामपुर

Rampur
21-02-2018 12:56 PM

सही कहा गया है कि समय को रोका नहीं जा सकता। परन्तु बीते समय को याद ज़रूर किया जा सकता है। और बीते समय की यादों को ताज़ा करने का कार्य चित्रों से बेहतर कोई नहीं कर सकता। प्रस्तुत चित्र रामपुर के इतिहास के एक प्रभावशाली पहर के हैं। इन चित्रों को सन 1911 में एक अनजान फोटोग्राफर द्वारा खीचा गया था। तो आइये इन चित्रों के मध्यम से देखें रामपुर के कुछ ऐतिहासिक दृश्य।


आज़ादी के संघर्ष में मुहम्मद अली जौहर का योगदान

Rampur
26-01-2018 09:11 AM

मुहम्मद अली जौहर का जन्म रामपुर में हुआ था। वे एक बहुमुखी पुरुष थे- कवि, देशभक्त, पत्रकार, वक्ता और राष्ट्रीय प्रसिद्धि के राजनीतिक नेता। भारत की आज़ादी के लिए वे कई बार जेल भी गए। महात्मा गाँधी के प्रोत्साहन के साथ उन्होंने भारत में ख़िलाफ़त आन्दोलन की शुरुआत की। और जहाँ तक बात है उनकी काव्यात्मक प्रतिभा की, तो वे मशहूर उर्दू शायर दाग़ देहलवी के कवि शिष्य थे।
रामपुर में संरक्षित चार बैत की काव्यात्मक संस्कृति के बीच पले बड़े मुहम्मद अली जौहर शब्दों के कारीगर थे। चार बैत 17वीं शताब्दी में मध्य-पूर्व में उत्पन्न हुआ, जहां एक आदिवासी सरदार एक प्रतिभाशाली सेना को गीतात्मक ललकार (चुनौती) लगाता था। एक तरह से यह कवियों के बीच रोमांस से राजनीति तक के मुद्दों पर गठित एक त्वरित हाज़िर जवाबी की प्रतियोगिता होती थी। चार बैत 1870 के दशक में रोहिल्ला के साथ अफगानिस्तान से भारत आया और रामपुर के दरबारों में अपना केंद्र स्थापित किया।
इस कवि परम्परा और अलीगढ़ विश्वविद्यालय (जो भारत के युवा मुसलमानों के लिए बौद्धिक वाद-विवाद का केंद्र बन चुका था) में निखरे मोहम्मद अली जौहर ने अब अंग्रेजी भाषा पर बेमिसाल पकड़ के साथ अंग्रेजी में तीक्ष्ण, उत्तेजक और शक्तिशाली भाषण और लेखन जारी रखा। एच.जी. वेल्स ने उनके बारे में लिखा: "मुहम्मद अली को मैकॉले की कलम, बर्क की जुबान और नेपोलियन का ह्रदय प्राप्त था”।
रद्द-ए-सहर ताकत-ए-परवाज़ ही जब खो चुके, फिर हुआ क्या गर हुए भी पर खुले। चाक कर सीने को, पहलू चीर डाल, यूंही कुछ हाल-ए-दिल-ए-मुज़तिर खुले। लो वो आ पहुंचा जुनून का काफ़िला, पाँव ज़ख़्मी, खाख मुंहपर, सर खुले। अब तो किश्ती के मुवाफिक है हवा, ना ख़ुदा, क्या देर है, लंगर खुले। ये नज़र-बंदी तो निकली रद्द-ए-सहर, दीदाहे होश अब जा कर खुले। फैज़ से तेरे ही, ऐ क़ैद-ए-फिरंग, बाल-ओ-पर निकले, क़फ़स के दर खुले। जीतेजी तो कुछ ना दिखलाया मगर, मर के जौहर आपके जौहर खुले।
प्रस्तुत चित्र मुहम्मद अली जौहर के जनाज़े का है। जौहर को जेरूसलम में दफनाया गया था क्योंकि उन्होंने उस भारत में दफन होने से इंकार कर दिया था जहाँ ब्रिटिश ध्वज लहरा रहा हो।


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