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क्या आपने देखा है रोहिलखंड का यह पांचाल संग्रहालय?

Rampur
04-07-2018 02:23 PM

संग्रहालय मानव के अतीत को एक संरक्षित तरीके से दिखाने का कार्य करते हैं तथा ये किसी एक स्थान के सम्पूर्ण इतिहास को भी प्रदर्शित करते हैं। भारत भर में कई संग्रहालयों की रचना की गयी है जिनमें राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली, भारतीय संग्रहालय कलकत्ता, सलारजंग संग्रहालय हैदराबाद, इलाहबाद संग्रहालय इलाहबाद, छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय मुंबई आदि प्रमुख हैं। संग्रहालय किसी एक विद्यालय का ही रूप होते हैं जो कि मानव जीवन से सम्बंधित उपलब्धियों, इतिहास व कला को प्रदर्शित करते हैं जिन्हें देखकर व्यक्ति अपनी धरोहरों और इतिहास के प्रति गर्वान्वित महसूस करता तथा उनके बारे में और गहरे रूप से जानकारी प्राप्त करता है।

जैसा कि ज्ञात हो कि रामपुर रोहिलखंड में आता है तथा रोहिलखंड का इतिहास अति प्राचीन काल तक जाता है। यह प्राचीन क्षेत्र पंचाल का क्षेत्र हुआ करता था। यहाँ पर धरोहरों की अति उपलब्धता है जिसे देश के कई नामी संग्रहालयों में प्रदर्शित किया गया है। पंचाल ग्रीक और ईरानी बसाव के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान था तथा यहाँ से कुषाणों के काल की वृहद् मूर्तियाँ और पुरावस्तुवों की प्राप्ति हुयी है। रामपुर के नज़दीक ही बसा अहिक्षेत्र पंचाल राज्य की राजधानी हुआ करता था जो कि अब टीलों के रूप में यहाँ पर उपस्थित है। इसकी खुदाई से अनेकों पुरासम्पदाओं की प्राप्ति हुयी है। जैसे रोहिल्खंड के इतिहास से जुड़ी हुयी पुरासम्पदाओं और लेखों को रामपुर के रजा पुस्तकालय और संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है तो वहीं रोहिलखंड विश्वविद्यालय में एक ऐसा संग्रहालय भी है जो कि पंचाल की पुरावस्तुओं को प्रदर्शित करने का कार्य करता है।

रोहिलखंड विश्वविद्यालय में सन 1985 में प्राचीन इतिहास और पुरातत्व के विभाग की स्थापना की गयी थी और इस विभाग ने कई खुदाइयाँ और आख्यान करवाए जिसका प्रतिफल यह रहा कि विभाग में कई पुरासम्पदाओं की उपलब्धता हो गयी। यहाँ पर पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना की गयी जिसमें इन सभी पुरासम्पदाओं को दिखाने का कार्य किया जा रहा है। सन 2013-14 में इस संग्रहालय को बड़ा और विकसित बनाने की कवायद शुरू हुयी जिसका प्रतिफल यह हुआ कि यहाँ पर बड़े स्थान पर पुरस्थालों को प्रदर्शित करने का कार्य हुआ। पंचाल संग्रहालय के बारे में कम लोगों को पता है, जिसे सभी को देखना चाहिए क्यूंकि यहाँ पंचाल और रोहिलखंड के इतिहास और पुरातत्व का समुचित प्रदर्शन उपलब्ध है।

संदर्भ:
1.
http://mjpru.ac.in/department_ancient_history.html
2.https://timesofindia.indiatimes.com/city/bareilly/Panchala-museum-to-be-open-to-public-from-July/articleshow/47320648.cms
3.https://goo.gl/Wv7Hrc


फारस, अरब और यूरोप में पंचतंत्र के दो हजार वर्षों में प्रभाव

Rampur
06-05-2018 11:37 AM

पंचतंत्र की कहानियां भारत ही नहीं बल्कि विश्वभर में प्रचलित हैं, इनका नाम विभिन्न स्थानों पर अलग है परन्तु ये कहानियां एक ही हैं। पंचतंत्र भारतीय साहित्य की एकमात्र किताब है जिसे कई भाषाओँ में विश्वभर में अनुवादित किया गया है। ये कहानियां 3सरी शताब्दी ईसा पूर्व में श्री विष्णु शर्मा द्वारा लिखी गईं थी। प्राचीन काल में विश्व भर से कई विदेशी भारत में व्यापार करने के लिए आते रहे हैं और यही कारण है कि यह कहानियां व्यापारियों द्वारा विश्व के अलग-अलग देशों में पहुंची। पंचतंत्र की किताबों को विभिन्न भाषाओँ में छापा व पाण्डुलिपि के रूप में तैयार किया गया था। इन पांडुलिपियों में कई चित्रों आदि को भी बनाया जाता था जिससे व्यक्ति इनको देखकर भी समझ जाये।

रामपुर की रज़ा लाइब्रेरी में भारत के मध्ययुगीन राजाओं की कई खूबसूरत (और सचित्र) पांडुलिपियाँ फारसी में संग्रहित हैं। इनमें से पशु कथाओं की दुर्लभ पांडुलिपियां भी हैं, जो संस्कृत पंचतंत्र से प्रेरित हैं। पंचतंत्र, संस्कृत संस्करण से लगभग अपरिवर्तित हैं और आज भी फारसी भाषी देशों (ईरान / अफगानिस्तान) में अनवर-ए-सुहेली (कैनोपस की रोशनी) के रूप में लोकप्रिय है। अरब में, "कलिला वा दीमन" के रूप में, जहां कालीलाह और दीमन वास्तव में पहली पंचतंत्र कथा-'कार्तका और दमनका' में दो लोमड़ी के संस्कृत नाम हैं। यूरोप में, यूनानी एसोप के तथ्यों में कम से कम 14 पंचतंत्र कथाएं शामिल हैं। यह काम छठी शताब्दी से आज तक कई अलग-अलग संस्करणों और अनुवादों से गुजर चुका है। मूल भारतीय संस्करण का पहली बार बोर्ज़ुया द्वारा 570 ईसा पूर्व में एक विदेशी भाषा में अनुवाद किया गया था, फिर 750 में अरबी में अनुवाद किया गया था। इस अरबी संस्करण का अनुवाद सिरीक, ग्रीक, फारसी, हिब्रू और स्पेनिश समेत कई भाषाओं में किया गया था, और इस प्रकार 1787 में संस्कृत हितोपदेश चार्ल्स विल्किन्स द्वारा अंग्रेजी अनुवाद किया गया।

इस प्रकार से हम देख सकते हैं कि किस प्रकार से भारत से निकले पंचतंत्र ने विश्व भर के साहित्य में अपना स्थान बना लिया। रामपुर में रखी प्रति कई चित्रों को अपने में समाहित किये हुए है जिसे देख कर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस कहानी को किस प्रकार से महत्ता से सजाया व संवारा गया था।

1.https://ipfs.io/ipfs/QmXoypizjW3WknFiJnKLwHCnL72vedxjQkDDP1mXWo6uco/wiki/Panchatantra.html
2.https://books.google.co.in/books?id=Ucz06oE4YyEC&printsec=frontcover&dq=panchtantra&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwijxbXYouXaAhWBPY8KHYI6CZMQ6AEIMTAB#v=onepage&q&f=false


रामपुर का इतिहास निर्धारण

Rampur
18-01-2018 01:20 PM

रामपुर के इतिहास के विषय में कई परतों को देखा जा सकता है, हलांकी यह कहा जा सकता है कि रामपुर शहर की स्थापना 18वीं शताब्दी में हुई पर रामपुर के इतिहास व तिथि निर्धारण को समझने के लिये आस-पास के क्षेत्रों का अध्ययन आवश्यक है। रामपुर के आस-पास के क्षेत्रों का इतिहास करीब 1500 ई.पू. तक जाता है जिसके कई अवशेष यहाँ से प्राप्त हुये हैं। रामपुर के पास ही स्थित अहिक्षेत्र 16 महाजनपदों में से एक पांचाल की राजधानी थी। यहाँ पर किये गये विभिन्न उत्खननों से चित्रित धूसर मृदभाँड की प्राप्ति हुई है जो यहाँ के तिथि को बहुत पहले तक ढकेलने का कार्य करती है। चित्रित धूसर मृदभाँड अपने में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रकार का मृदभाँड है जो कुछएक स्थान से प्राप्त होता है। इसके अलाँवा कृष्ण लेपित मृदभाँड, कृष्ण मृदभाँड, लाल चित्रित मृदभाँड आदि की प्राप्ति अहिक्षेत्र व इसके आस-पास के पुरास्थलों से हुआ है।

वर्तमान में अहिक्षेत्र टीला व किला अपने स्वर्णिम इतिहास का वाचन करते हैं। यहाँ पर गुप्तों के साथ-साथ कुषाणों ने भी बड़ी संख्या में निर्माण किया है। राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली में भारत की सबसे बेहतरीन व उत्तम, मिट्टी की बनी गंगा और यमुना की मूर्ती की प्राप्ति अहिक्षेत्र से ही हुई है। वर्तमान काल में यहाँ पर दो पिरामिडाकार संरचनायें उपस्थित हैं जिसके विषय में कई विद्वानों में कई प्रकार के मतभेद हैं। ये संरचनायें पकी हुई मिट्टी के ईंट से बनवाये गये हैं। रामपुर व इसके आस-पास क्षेत्र में पत्थर के बने हुये प्राचीन संरचनायें नाममात्र के मिलते हैं जिसका प्रमुख कारण है यहाँ पर पत्थरों का अभाव। अहिक्षेत्र का विवरण महाभारत में विधिवत् किया गया है।

अहिक्षेत्र व आस-पास के इतिहास व तिथि के आधार पर रामपुर का तिथि निर्धारण किया जा सकता है। क्युँकी इतने बड़े क्षेत्र में फैले होने और ऐसी महत्वपूर्ण व बड़ी पुरातात्विक स्थलों की उपलब्धता इस पर संकेत देती है कि रामपुर उस वक्त तक मानव बसाव व उसके आवागमन का अनुभव ले चुका था। अभी तक किसी प्रकार का उत्खनन इस जिले मे नही हो सका है जिससे किसी प्रकार का पुरातात्विक तिथि यहाँ से नही मिल पायी है।

1. हिस्ट्री ऑफ़ अर्ली स्टोन स्कल्पचर एट मथुराः सीए. 150 बी.सी.ई-100 सी.ई., सोन्या रे क्विंटानिल्ला
2. इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ ऐन्सियन्ट इंडियन जियोग्राफी, वाल्युम 1, एडिटेड बाय- सुबोध कपूर
3. आर्केयोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया, भाग 1, कनिंघम
4. पाँचाल और उनकी राजधानी अहिच्छत्र, बी.सी. लॉ
5. ऐंशिऐंट इंडिया, भाग 1, के.सी. पाणिग्राही


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