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समाज को चुनौती देती प्रेमचंद की निर्मला

Rampur
20-09-2018 01:38 PM

लेखन एक ऐसी कला है जिसका समाज के ऊपर एक गहरा प्रभाव होता है और हमारे समाज में ऐसे कई महान लेखक हुए हैं, जिनकी लेखन शक्ति द्वारा समाज की सोच सकारात्मक दिशा में ले जाई गयी है। ऐसे महानतम महान लेखकों में मुंशी प्रेमचन्द (1880- 1936) का भी नाम आता है, जिनके साहित्य और उपन्यास में योगदान को देखते इन्हें ‘उपन्यास सम्राट’ भी कहा जाता है।

प्रेमचन्द का वास्तविक नाम धनपतराय श्रीवास्तव था लेकिन इन्हें मुंशी प्रेमचन्द और नवाब राय के नाम से ज्यादा जाना जाता है। प्रेमचन्द ने अपना पूरा जीवन लेखन के प्रति समर्पित कर दिया था। प्रेमचन्द के उपन्यास इतने प्रसिद्ध हुए कि उनके प्रसिद्ध उपन्यास, जैसे: गोदान, कर्मभूमि, गबन, रंगभूमि पर हिंदी फ़िल्में भी बन चुकी हैं। वहीं उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘निर्मला’ को अक्टूबर 2004 में दूरदर्शन पर प्रसिद्ध निर्देशक गुलज़ार द्वारा अनुकूलित कर अपनी टी.वी. सीरियल (T.V. Serial) पर प्रसारित किया गया।

यह सीरियल और उपन्यास एक 15 साल की लड़की के संघर्ष और दहेज प्रथा के दुष्प्रभाव और पूर्व स्वतंत्र भारत में महिलाओं द्वारा सहे जाने वाले कष्टों को दर्शाता है। इसकी कहानी कुछ इस प्रकार है:

निर्मला की 15 साल की उम्र में भुवन मोहन सिन्हा से शादी तय कर दी गयी, किन्तु तभी निर्मला के पिता उदयभानु लाल की उनके एक प्रतिद्विंदी द्वारा हत्या कर दी गयी। हत्या के उपरान्त भुवन और उसके पिता ने बड़ा दहेज मिलने का सपना टूटता देख लालच में आकर शादी से इंकार कर दिया और निर्मला की माँ कल्यानी को उसका विवाह निर्मला से 20 साल बड़े मुंशी तोतारम के साथ मजबूरन करना पड़ा, जिनके खुदके 3 लड़के पहले से थे। तोताराम का बड़ा बेटा मंसाराम निर्मला से एक वर्ष छोटा था। निर्मला पहले बेटे के साथ मित्रवत रूप से रहने लगती है, लेकिन वह इतनी मासूम थी कि वह यह समझ नहीं पाती कि इसका परिणाम उसके पति के दिमाग में शक का बीज बो रहा है। निर्मला का चरित्र बिल्कुल निर्मल होता है, परन्तु शक के कारण तोताराम अपने बेटे मंसाराम को छात्रावास भेज देता है। जहाँ के माहौल में उसका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। और अंततः मंसाराम की टी.बी. (ट्यूबरक्लोसिस) से मृत्यु हो जाती है। उसके बाद उसके दोनों छोटे बेटों की भी मृत्यु हो जाती है। साथ ही परिवार अपनी सारी संपत्ति खो देता है। उधर भुवन मोहन निर्मला को अपने प्रेम में फाँसने की चेष्टा करता है और असफल होने पर आत्महत्या कर लेता है। निर्मला के जीवन में घुटन के सिवाय और कुछ नहीं रह जाता। अंत में स्वास्थ्य बिगड़ने से उसकी मृत्यु हो जाती है। इस प्रकार उपन्यास का अंत करूणापूर्ण है और घटना-प्रवाह में अत्यंत तीव्रता है।

कुट्टी कृष्ण इस सिरियल के कार्यकारी निर्माता थे। गुलज़ार द्वारा पटकथा, संवाद, और दिशा दी गयी थी। रूप कुमार राठोड द्वारा मुख्य गीत गाया गया और राजा सी. कोठारी द्वारा छायांकन का निर्देशन किया गया। 3.5 करोड़ रुपये के बजट में यह सिरियल बनाया गया था। निर्मला की यह कहानी दूरदर्शन के ‘तहरीर... मुंशी प्रेमचंद की’ में 6 एपिसोड के माध्यम से दर्शायी गयी थी जिसका पहला एपिसोड आप ऊपर दिए गए वीडियो में देख सकते हैं, तथा उसके अगले 5 एपिसोड भी।

निर्मला की यह कहानी कुत्सित सामाजिक प्रथा को जड़ से उखाड़ने के लिए एक भारी चुनौती देती है।

संदर्भ:
1. https://en.wikipedia.org/wiki/Nirmala_(novel)
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Premchand
3. http://www.nettv4u.com/about/Hindi/tv-serials/nirmala

http://prarang.in/Rampur/1809201848





क्या अलग-अलग पहचान है ऋषि, मुनि, तपस्वी, योगी और संन्यासी की

Rampur
19-09-2018 01:35 PM

सामान्यतः लोग ऋषि, मुनि, तपस्वी, योगी और संन्यासी की परिभाषा या अर्थ एक ही समझते हैं, जो कि संसार की सब मोह माया त्याग कर, लोगों को ज्ञान बांटता चले, और जनमानस की भलाई के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दे। जिनके जटा-जूट हो, रूद्राक्ष की माला डाली हो या जिसके पास कमंडल हो और बड़ी-बड़ी दाढ़ी मूंछ हो। परंतु ऐसा नहीं है। आईए जानते हैं हिंदू और जैन परंपरा में धार्मिक गुरूओं (ऋषि, मुनि, तपस्वी, योगी और संन्यासी) का वर्गीकरण:


ऋषि:


‘ऋषि’ वैदिक-संस्कृत भाषा का शब्द है। यह शब्द अपने आप में एक वैदिक परंपरा का भी ज्ञान देता है। ऋषि का स्थान तपस्वी और योगी की तुलना में उच्चतम होता है। अमरसिंहा द्वारा संकलित प्रसिद्ध संस्कृत समानार्थी शब्दकोश में सात प्रकार के ऋषियों का उल्लेख है: ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि। वैदिक काल में ये सात प्रकार के ऋषिगण होते थे। वहीं अमरकोष अन्य प्रकार के संतों (संन्यासी, परिव्राजक, तपस्वी, मुनि, ब्रह्मचारी, यती इत्यादि) से ऋषियों को अलग करता है।

हमारे पुराणों में सप्त ऋषि- केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ तथा भृगु हैं। ऐसी ही एक सप्त ऋषि की सूची संध्यावन्दनम में भी प्रयोग की जाती है, जिसमें सप्त ऋषि अत्रि, भृगु (ऋषि भृगु चित्र में दर्शाए गए हैं), कौत्सा, वशिष्ठ, गौतम, कश्यप और अंगिरस हैं और दूसरी सूची के अनुसार कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नी, भारद्वाज सप्त ऋषि है।


मुनि:

‘मुनि’ शब्द का अर्थ मौन (शांति) है अर्थात जो थोड़ा या कम बोलते हैं उन्हें मुनि कहा जाता है। अर्थात एक ऋषि या साधु, विशेष रूप से मौन को पूरा करने की शपत लेते हैं, या जो बोलते भी हैं तो वो बहुत कम बोलते हैं, एक मुनि कहलाते हैं। एक वे भी मुनि होते हैं जो हमेशा ईश्‍वर (नारायण) का जाप करते हैं या भगवान का ध्यान करते हैं जैसे कि नारद मुनि।

मुनी मंत्रों का मनन करते हैं और अपने चिंतन से ज्ञान के एक व्यापक भण्डार की उत्पत्ति करते हैं। वे शास्त्रों का लेखन भी करते हैं। कर्म साधना के माध्यम से आत्म-प्राप्ति के मार्ग पर चलने वाले मुनियों में से सबसे प्रमुख मुनि वेदव्यास (उन्होंने वेद को चार भागों में विभाजित किया तथा वे महाभारत और अठारह पुराणों के लेखक हैं) और महर्षि वाल्मिकी (उन्होंने रामायण की रचना की थी) हैं। ऊपर दिया गया चित्र मुनि वेदव्यास का है। एक बौद्ध भिक्षु भी अनिवार्य रूप से मुनि ही होते हैं। उनके लिए भगवान उनमें ही बसते हैं, उनका हृदय ही सब कुछ है।


संन्यासी:

‘संन्यासी’ वह है जो त्याग करता है। त्यागी ही संन्‍यासी है। संन्यासी बिना किसी संपत्ति के एक अविवाहित जीवन जीता है तथा योग ध्यान का अभ्यास करता है या अन्य परंपराओं में, अपने चुने हुए देवता या भगवान के लिए प्रार्थनाओं के साथ भक्ति, या भक्ति ध्यान करता है। हिन्दू धर्म में संन्‍यासियों को तीन भागों में बांटा गया है:

1. परिव्राजक: वह संन्यासी जो सदा भ्रमण करता रहे जैसे शंकराचार्य (शंकराचार्य को ऊपर चित्र में दर्शाया गया है), रामानुजाचार्य व अन्य।
2. परमहंस: यह संन्यासी की उच्चतम श्रेणी है। इसके अंतर्गत शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, रामकृष्ण परमहंस और अन्य आते हैं।
3. यती: यह शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘वह जो उद्देश्य की सहजता के साथ प्रयास करता है’। इसके उदाहरण यती शंकराचार्य, यती रामानुजाचार्य, यती पूज्य राघवेंद्र और अन्य हैं।


तपस्वी:

‘तपस्वी’ यह शब्द संस्कृत भाषा के तपस्या से लिया गया है, इसका शाब्दिक अर्थ ‘ऊष्मा’ से है, इसमें एक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए, शारीरिक और मानसिक प्रलोभनों से बचने में अनुशासन और कष्ट-सहिष्णुता के लिये धैर्य और संयम की आवश्यकता पड़ती है। इस शब्द का उल्लेख सबसे पुराने संदर्भ ऋग्वेद- 8.82.7, बौधायन- धर्म शास्त्र, कात्यायन- श्रोत-सूत्र, पाणिनि- 4.4.128 आदि में पाया गया है, जहां इसका अर्थ दर्द या पीड़ा से संबंधित है।

तपस्या पतंजलि के योग सूत्रों में वर्णित नियमों (स्वयं नियंत्रण का पालन) में से एक है। तपस्या का मतलब एक आत्म-अनुशासन या तपस्या में स्वेच्छा से शारीरिक तीव्र इच्छा को रोकना और सक्रिय रूप से जीवन में एक उच्च उद्देश्य की प्राप्ति करना होता है। तपस्या के माध्यम से, एक योगी आध्यात्मिक विकास की ओर एक मार्ग का समाशोधन कर सकता है तथा नकारात्मक ऊर्जा के संचय को रोक सकता है।

हिंदू, सिख और जैन धर्म में भिक्षु और गुरु तपस्या के माध्यम से भगवान की शुद्ध भक्ति करते हैं तथा धार्मिक जीवनशैली का अभ्यास करते हैं और मोक्ष, या आध्यात्मिक मुक्ति पाने के साधन के रूप में अभ्यास करते हैं।

प्राचीन हिंदू पुराणों में कई तपस्वियों का वर्णन मिलता है जैसे विश्वामित्र (जिन्हें ऊपर दिए चित्र में दर्शाया गया है) हजारों सालों से एक ब्राह्मणी श्री गुरु वशिष्ठ के बराबर बनने के लिए भारी तपस्या, उपवास और ध्यान करते हैं, तथा भागीरथ एक प्राचीन भारतीय राजा थे, जिन्होंने गंगा नदी को धरती पर लाने के लिये तपस्या की थी।


योगी:

शिव-संहिता पाठ योगी को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है जो जानता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड अपने शरीर के भीतर स्थित है, और योग-शिखा-उपनिषद दो प्रकार के योगियों का वर्णन करता है: पहले वो जो विभिन्न योग तकनीकों के माध्यम से सूर्य (सूर्या) में प्रवेश करते हैं और दूसरे वो जो योग के माध्यम से केंद्रीय नलिका (सुषुम्ना-नाड़ी) तक पहुंचते हैं तथा अमृत का सेवन करते हैं। योग के सन्दर्भ में नाड़ी वह मार्ग है जिससे होकर शरीर की ऊर्जा प्रवाहित होती है। योग में यह माना जाता है कि नाड़ियाँ शरीर में स्थित नाड़ीचक्रों को जोड़ती हैं।

योगी शब्द पुरुष के लिये प्रयोग किया जाता है, जो व्यायाम करते हैं, या योग में महारत हासिल करते हैं। योगिनी शब्द महिलाओं के लिए प्रयोग किया जाता है।

कुछ योगी:
श्री अरविन्द घोष
गौड़पाद
स्वामी योगानंद गिरि
स्वामी रामदेव
स्वामी सच्चिदानंद
स्वामी शिवानंद
स्वामी राम तीर्थ (ऊपर दिए गए चित्र में दर्शाए गए)
स्वामी महेश योगी
स्वामी परमहंस योगानंद और कई अन्य।

संदर्भ:
1. https://in.answers.yahoo.com/question/index?qid=20091107011709AA4lR8r
2. https://ipfs.io/ipfs/QmXoypizjW3WknFiJnKLwHCnL72vedxjQkDDP1mXWo6uco/wiki/Rishi.html
3. https://www.quora.com/What-is-the-difference-between-Rishi-and-Muni
4. https://goo.gl/YXk9cc

http://prarang.in/Rampur/1809191844





विकलांगता को हाराते हुए दिव्यांग

Rampur
18-09-2018 02:10 PM

मनुष्य इस संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी माना जाता है। उसके पास सोचने, समझने और करने की जो क्षमताएं हैं वह अन्य किसी जीव में नहीं होती हैं। परंतु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो शारीरिक व मानसिक रूप से विकलांग होते हैं या कहिये ‘दिव्यांग’होते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की खास पहल के कारण अब हमारे देश में शारीरिक रूप से कुछ कमी वाले व्यक्तियों को दिव्यांग कहा जाता है। अक्सर देखा गया है कि शारीरिक रूप से कमी वाले व्यक्तियों में बहुत से ऐसे अद्भुत गुण या प्रतिभाएं होती हैं, जो इनकी कमियों को ढक देती हैं, इसी कारण इन्हें हमारे देश में दिव्यांग कहा जाता है।

भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार, 121 करोड़ की आबादी में से लगभग 2.68 करोड़ लोग दिव्यांग हैं, जो कुल आबादी का 2.21% हिस्सा है। नीचे दिये गये आंकड़ो में आप देख सकते हैं कि 2.68 करोड़ की इस आबादी में दिव्यांग लोग किन भिन्न शारीरिक और मानसिक विकलांगता से ग्रस्त हैं।


परन्तु कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने विकलांगता को अपने साहस और दृढ़ निश्चय से हराया है। वे दिव्यांग आज अपनी अद्भुत क्षमता के साथ लाखों लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। ऐसी ही एक महिला चित्रकार हैं, जिन्होंने कभी भी विकलांगता के कारण जिंदगी से हार न मानी।

चित्रकला के क्षेत्र में महिलाओं के नाम बहुत कम आते हैं। यदि आप जगतप्रसिद्ध महिला चित्रकारों के नाम खोजें तो ‘फ्रीडा काहलो’ के अतिरिक्त कोई भी नाम नहीं मिलता। फ्रीडा का जन्म करीब 110 साल पहले मेक्सिको में हुआ था। छोटी सी फ्रीडा (2 वर्षीय) को पोलियो हुआ और दाँयीं टाँग पर उसका असर पड़ा। 18 साल की फ्रीडा को एक बस दुर्घटना में बहुत चोट लगी और कई हड्डियाँ भी टूट गयीं। इतना सब होने के बाद भी फ्रीडा ने हार नहीं मानी और अपने दुख को उन्होंने बहुत से चित्रों में उतार दिया। ऊपर दर्शाया गया चित्र भी उन्हीं की बनाई एक पेंटिंग का हिस्सा है। हर किसी के पास न ऐसा जज़्बा होता है न ही हुनर। फ्रीडा ने अधिकतर चित्र नारीवाद पर आधारित बनाये और उनकी बहुत सी तस्वीरों में वे स्वयं ही चित्र का प्रमुख पात्र होती थीं। आज इनकी पेंटिंग हजारों दिव्यांग लोगों को जीने की प्रेरणा देती हैं। फ्रीडा काहलो के नाम से एक अन्य महिला चित्रकार अमृता शेरगिल की याद आ जाती है। अमृता शेरगिल ने कैनवस (Canvas) पर भारत की एक नई तस्वीर उकेरी। इनके अधिकतर चित्र भी नारीवाद पर आधारित हैं।

आज कुछ चित्रकार अपने मुंह या पैरों के साथ कला बनाने की अद्भुत क्षमता के साथ दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। ये कलाकार जीवित सबूत हैं कि किसी भी चुनौती या विकलांगता को दूर किया जा सकता है और खराब से खराब परिस्थितियों से भी उभर कर जीया जा सकता है। वे ही जिंदगी के सच्चे नायक और नायिका हैं जो हर रोज़ साबित करते हैं कि असंभव कुछ भी नहीं है! एम.एफ.पी.ए. (माउथ एंड फुट पेंटिंग आर्टिस्ट्स (Mouth and Foot Painting Artists Association)) के 800 से अधिक कलाकार जो जन्मजात या दुर्घटना या बीमारी के कारण हाथों को खो बैठे थे, वे आज लाखों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उनकी अद्भुत पेंटिंग बस देखते ही बनती हैं।

भारत में ऐसे कई माउथ एंड फुट पेंटिंग आर्टिस्ट्स के उदाहरण हैं, जो दिव्यांग लोगों के लिए एक मिसाल हैं। जैसे: स्वप्ना औगस्तीन, एक कलाकार जो अपने पैरों से तस्वीरें बनाती है। स्वप्ना 42 वर्ष की महिला हैं जो कि अपने पैरों और मुँह से तस्वीरें बना सकती हैं। स्वप्ना बिना हाथों के पैदा हुई थीं परन्तु कुछ करने का जज़्बा हो तो आप अपनी मंजिल तक पहुँच ही जाते हैं। ऐसी ही एक प्रेरणात्मक कहानी है स्वप्ना की। स्वप्ना ने मुश्किलों से आगे बढ़कर, वो कर दिखाया जो कर पाना आसान बात नहीं थी। शीला शर्मा, श्रीकांत दुबे, सी.वी. सुरेन्द्रन, विपुल मित्तल आदि ऐसे कलाकार हैं, जिन्होंने कभी भी अपने रास्ते में विकलांगता को नहीं आने दिया है।

इस सूची में और नाम हैं अमिता दत्ता, जिन्हें कक्षा 9 के बाद स्कूल से निकाल दिया गया, क्योंकि स्कूल में बधिर बच्चों को पढ़ाने की सुविधा नहीं थी। लेकिन अमिता ने नेशनल ओपन स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और इंटीरियर डिज़ाइन (Interior Design) में डिप्लोमा किया।

हम लोग बहुत सारे बहाने दे कर खुद को सीमित कर देते हैं, वहीं कुछ दिव्यांग हिम्मत और इच्छाशक्ति से कार्य करते हैं। इनका कार्यक्षेत्र सिर्फ कलाकारी तक ही सीमित नहीं है परन्तु ये वो इंसान हैं जो कि भिन्न-भिन्न चीजों में शामिल हो कर समाज के लिए भी कार्य करते हैं। वे अन्य लोगों के लिए प्रेरणा के बहुत बड़े स्रोत हैं।

संदर्भ:
1.https://www.thebetterindia.com/45443/india-artists-specially-challenged-deaf-dumb-art-exhibition/
2.http://mospi.nic.in/sites/default/files/publication_reports/Disabled_persons_in_India_2016.pdf
3.http://www.barcroft.tv/disabled-artist-no-arms-paints-with-feet-kerala-india
4.https://www.imfpa.org/
5.चित्र स्रोत: www.fridakahlo.org
6.https://www.firstpost.com/living/frida-kahlo-femininity-and-feminism-why-the-painter-is-an-icon-for-so-many-women-3782365.html
7.https://www.telegraph.co.uk/culture/10087130/The-Indian-Frida-Kahlo.html

http://prarang.in/Rampur/1809181841





कमल के औषधीय गुण

Rampur
17-09-2018 02:46 PM

पौधे का कोई भी हिस्सा जैसे फल, बीज, तना, छाल, फूल, पत्ती, घास या जड़ ‘हर्ब (Herb) या जड़ी-बूटी’ कहलाता है जिनका उपयोग उनके औषधीय और स्वास्थ्य बढ़ाने वाले गुणों के लिए किया जाता है। पीढ़ियों से कुशल हर्बल चिकित्सकों, शोधकर्ताओं और विद्वानों ने जड़ी-बूटियों के इस विशाल विज्ञान को परिष्कृत करने के साथ-साथ इस पर कई परीक्षण भी किये हैं, और हमारे लिये हजारों पौधे पर आधारित सुरक्षित और प्रभावी उपचार तैयार किये हैं।

दुनिया के लगभग हर हिस्से और कई अलग-अलग संस्कृतियों में प्राचीन काल से ही इन जड़ी बूटियों का भोजन और औषधीयों में प्रयोग किया जा रहा है। हालांकि भारत में हम जड़ी बूटी विज्ञान को ‘आयुर्वेद’ के नाम से जानते हैं, परंतु यूरोप और यू.एस.ए. की पश्चिमी दुनिया में, ग्रीक और रोमियों द्वारा उपयोग की जाने वाली पुरानी लैटिन भाषा में इसे ‘मटेरिया मेडिका’ (मटेरिया मेडिका शरीर के उपचार के लिए उपयोग किए जाने वाले किसी भी पदार्थ के उपचारात्मक गुणों के बारे में एकत्रित ज्ञान है) नाम से जाना जाता है।

प्राचीन सभ्यता में भारत औषधीय पौधों के समृद्ध भंडार के रूप में जाना जाता था। इस भंडार में से आज हम आपको एक ऐसी जड़ी-बूटी के बारे में बताएंगे जिसके बारे में आधिकांश लोग सिर्फ ये जानते हैं कि इनका उपयोग केवल पूजा अर्चना में ही किया जाता है।

कमल हमारी सांस्कृतिक परंपरा का पौधा है। इसके साथ ही इसमें अनेक औषधीय गुण भी पाए जाते हैं। इसके बीज, तना, फूल, तथा जड़ सभी औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। औषधीय रूप से, कमल, विटामिन बी (Vitamin B), आयरन (Iron), विटामिन सी (Vitamin C), फॉस्फोरस (Phosphorous), मैंगनीज (Manganese), पोटेशियम (Potassium), सोडियम (Sodium) और फाइबर (Fibre) जैसे आवश्यक तत्वों समृद्ध होता है। इसी कारण पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों जैसे यूनानी, आयुर्वेद और चीनी चिकित्सा में कमल का नियमित रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है। कफ, पित्त, खून सम्बंधित बीमारी, जलन, फोड़ा, मन मिचलना, दस्त, पेचिश, मूत्र रोग, त्वचा रोग, बुखार, कमज़ोरी, रक्तस्राव आदि में इसका प्रयोग लाभकारी होता है।

विभिन्न रोगों के औषधीय उपचार

1. दस्त से राहत:
ये पारंपरिक चीनी चिकित्सा में कमल के सबसे आम उपयोगों में से एक है। इसके लिए, कमल के बीज को कुछ घंटों तक गर्म पानी में भिगो दें और बाद में शक्कर तब तक मिलाएं जब तक कि इसका स्वाद आपको पसंद न आए। कमल की जड़ों का उपयोग भी दस्त और पेचिश से राहत के लिये किया जाता है, और कमल की जड़ को पानी में पीसकर लेप करने से दाद तथा अन्य त्वचा रोगों का उपचार होता है।

2. सिर दर्द व त्वचा (दाद) उपचार:
कमल की पत्तियों से सिर दर्द के साथ-साथ तीव्र बुखार में राहत मिलती है। त्वचा के रोग और मूत्र रोग के लिये भी कमल की पत्तियां लाभकारी होता है।

3. वमन (उल्टी):
कमल के बीजों से उल्टी बंद होती है, और ये बच्चों में मूत्र प्रवाह बढ़ाने में भी सहायक है।

4. रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिये:
कमल की जड़ में फाइबर और जटिल कार्बोहाइड्रेट होते हैं। ये दो घटक आपके शरीर के कोलेस्ट्रॉल और रक्त शर्करा को कम करने में मदद करते हैं।

5. सूजन से छुटकारा:
हाल के शोध से पता चलता है कि लाल और सफेद कमल दोनों किस्मों के बीज सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं।

*ऊपर दिए गए सभी उपचार शैक्षिक उद्देश्य के लिए हैं ना कि आज़माने लायक सिद्ध उपचार हैं। गलत खुराक इलाज के बजाय, आपको दुष्प्रभाव और नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए कोई भी उपचार अपनाने से पहले योग्य और प्रशिक्षित आयुर्वेदिक और एलोपैथिक डॉक्टरों से सलाह ज़रूर करें।

कमल का वानस्पतिक नाम नेलम्बो न्यूसिफ़ेरा (Nelumbo nucifera) है, और अलग अलग भाषाओं में इसे अलग-अलग नाम से जाना जाता है:

संस्कृत- अब्ज
असमी- पोदुम
बंगाली- कोम्बोल
गुजराती- सूर्यकमल
कन्नड़- कमल
कोंकणी- कमल
फारसी- निलुफा
तमिल- अम्बल
तेलुगु- कलुंग
उर्दू- नीलूफर
पंजाबी- पम्पोश
उड़िया- पदम
सिंधी- पब्बान
मलयालम- तमारा
मराठी- कमल

संदर्भ:
1. अंग्रेज़ी पुस्तक: Kurian, J. C. (1995) Plants that Heal, Oriental Watchman Publishing House
2. http://www.medicinehunter.com/about-plant-medicines
3. https://en.wikipedia.org/wiki/Materia_medica
4. https://www.healthline.com/health/8-uses-for-lotus#diarrhea
5. https://gardencollage.com/heal/botanical-medicine/medicinal-wonders-lotus-flower/

http://prarang.in/Rampur/1809171836





भारत की शुरुआती टॉकीज़ की अछूत कन्या

Rampur
16-09-2018 01:43 PM

महान लोग हमेशा वे नहीं होते जो व्यवस्था और तंत्र के विरूद्ध जाते हैं तथा बाकी सबके लिए पथ बनाते हैं, कई बार वे ऐसे भी लोग होते हैं जो अपने पीछे एक छाप छोड़ जाते हैं जो समय के साथ धुंधली तो हो जाती है पर उसका प्रभाव आम हो जाता है। उन्हीं में से एक थे जर्मनी के फ्रान्ज़ ऑस्टेन। उनके द्वारा किया गया भिन्न संस्कृतियों का जोड़ आज दुनिया भुला चुकी है परन्तु आपको ये भी बता दें कि उनके बिना भारत का सिनेमा जगत वर्तमान स्थिति से बिलकुल अलग हो सकता था।

सही मायने में फ्रान्ज़ हिंदी फिल्मों के खोजकर्ता थे जिन्होंने सन 1940, 1950 और कुछ हद तक 1960 की सबसे बड़ी और मशहूर फ़िल्में निर्मित की थीं। सन 1924 में फ्रान्ज़ एक लन्दन में रहने वाले भारतीय वकील से मिले जिनका नाम था हिमांशु राय। उस समय राय फ्रान्ज़ की जन्मभूमि म्युनिक आये हुए थे। उनके म्युनिक आने का लक्ष्य था विश्व के धर्मों पर आधारित अपनी फिल्मों की एक श्रृंखला के लिए कुछ साथी ढूंढना और वहाँ उन्होंने साथी के रूप में हाथ मिलाया फ्रान्ज़ के भाई पीटर की कंपनी के साथ।

इसके बाद फ्रान्ज़ द्वारा फ़िल्में बनाने का सिलसिला शुरू हुआ। ऑस्टेन ने शुरुआत की ‘लाइट ऑफ़ एशिया’ (1925) की शूटिंग से। उस समय इसके जैसी काफी और भी फ़िल्में भिन्न निर्माताओं द्वारा बनाई जा रही थीं पर एक विशेषता जो इस फिल्म को सबसे अलग बनाती थी वह ये थी कि ‘लाइट ऑफ़ एशिया’ की शूटिंग भारत में हुई थी जिससे फिल्म और भी वास्तविक लगती थी। यह फिल्म यूरोप में काफी प्रसिद्ध हुई तथा इसके बाद ऑस्टेन और राय की जोड़ी ने ऐसी दो और फ़िल्में बनाईं, ‘शिराज़’ (1928) जो ताज महल की कहानी पर आधारित थी और ‘प्रपंच पाश’ (1929) जो महाभारत पर आधारित थी।

सिनेमा में मौन से आवाज़ों के तकनीकी सफ़र की वजह से ऑस्टेन और राय की साझेदारी थम गयी क्योंकि जर्मन बोलते हुए भारतीय फिल्मों में अटपटे लगते। परन्तु ये उनकी साझेदारी का अंत नहीं था। 1934 में बॉम्बे टॉकीज़ की नींव रखने के बाद राय ने फ्रान्ज़ को दोबारा संपर्क किया और इसके बाद इन्होंने काफी फ़िल्में साथ बनाईं जिनमं् से एक थी ‘अछूत कन्या’ (1937) जिसने मशहूर भारतीय अभिनेता अशोक कुमार को प्रसिद्धी की सीढ़ी पर चढ़ाया। यह पूरी फिल्म आप ऊपर दिए गए विडियो में देख सकते हैं।

हालांकि ऑस्टेन को हिंदी का एक शब्द भी समझ नहीं आता था, फिर भी उन्होंने इतनी ख़ास फिल्मों का निर्माण किया जिन्हें आज तक फिल्म जगत की सबसे बेहतरीन रचनाओं में गिना जाता है, इससे समझ आता है कि फ्रान्ज़ को अपनी कला की पूरी पूरी समझ थी तथा शायद वे ना होते तो आज भारतीय सिनेमा जगत इतनी प्रगति न कर पाता।

संदर्भ:
1.https://swarajyamag.com/culture/the-many-ways-cinema-forgot-franz-osten
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Franz_Osten

http://prarang.in/Rampur/1809161834





मशहूर जियो सिम उत्पादक रिलायंस का सफर

Rampur
15-09-2018 02:26 PM

आज भारत के सर्वश्रेष्‍ठ उद्योगपतियों के बारे में बात हो तो सर्वप्रथम दिमाग में अंबानी परिवार आता है। विश्‍व स्‍तर पर कार्य करने वाली भारत की पहली सर्वश्रेष्‍ठ रिलायंस कंपनी का सफर काफी संघर्षपूर्ण और रूचिकर रहा है। इस कंपनी की नींव 1960 के दशक में गुजरात के मध्‍यम वर्गीय परिवार में जन्‍में धीरू भाई अंबानी द्वारा रिलायंस टेक्‍सटाइल्‍स इंडस्‍ट्री प्राइवेट लिमिटेड के रूप में मुंबई (महाराष्‍ट्र) में रखी गयी थी।

भजिया बेचकर अपना सफर शुरू करने वाले धीरू भाई 16 साल की उम्र में मैट्रिक पास कर एडेन, यमन चले गए। वहां उन्होंने ए. बेस्सी एंड कंपनी (A. Besse & Co.) में 300 रुपये महीने में काम किया। 1958 में, वह 50,000 रुपये के साथ भारत लौटे और अपने चचेरे भाई चंपकलाल दमानी के साथ ‘मैजिन’ नाम की कपड़ा व्यापार कंपनी की स्थापना की। लेकिन 1965 में आपसी मतभेद के चलते, ये दोनों भाई अलग हो गए। 1966 में उन्होंने अपनी रिलायंस टेक्सटाइल्स इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की और पहले चरण में पॉलिएस्टर कपड़े आयात और मसालों का निर्यात शुरू किया। 1970-80 के दशक में उनके ‘विमल’ के ब्रांड ने काफी लोकप्रियता हासिल की, जिसके बाद उन्होंने पॉलिएस्टर व्यवसाय का विस्तार किया और पॉलिएस्टर बनाने के लिए आवश्यक चीजों (पेट्रोकेमिकल्स) का उत्पादन भी शुरू किया।

कुछ आलोचकों के अनुसार इनकी इतनी तीव्रता से प्रसिद्धि के पीछे का कारण राजनीतिक सहयोग और अपनी चतुराई से लोगों द्वारा काम लेने की कला थी साथ ही उन्‍होंने बॉम्बे डाइंग (वस्‍त्र उद्योग) कंपनी जो इनकी सबसे बड़ी प्रतिद्वंदी थी, के मालिक नुस्ली वाडिया के मुकाबले भी व्यवसाय में बढ़त हासिल कर ली थी। उसके बाद से रिलायंस को भारत में तीव्र सफलता मिलनी प्रारंभ हो गयी। इन्‍होंने सर्वप्रथम भारत के खुदरा निवेशकों को शेयर बाज़ार की ओर आकर्षित किया। आज रिलायंस कंपनी के तीन लाख से भी अधिक शेयर धारक हैं।

2002 में इनकी मृत्‍यु के बाद इनके बच्‍चों (मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी) ने रिलायंस की बागडोर संभाली। किंतु 2006 में मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी के मध्‍य गहरे मतभेद के कारण रिलायंस ग्रुप का विभाजन हो गया। आज रिलायंस कंपनी बहुमुखी क्षेत्रों (पेट्रोरसायन, वस्‍त्र और संचार उद्योग, बिजली उत्‍पादन और वितरण आदि) में व्‍यवसाय कर रही है। चलिए जानें रिलायंस की कुछ उपलब्धियां:

1. 2001-2002 में रियलांयस इन्‍डस्‍ट्री और रिलायंस पेट्रोलियम (भारत की सबसे बड़ी कंपनी) एक साथ मिल गयी।
2. कृष्‍णा गोदावरी बेसिन में गैस खोजने के पश्‍चात, वर्ष 2002 में विश्‍व की सबसे बड़ी गैस खोजक कंपनियों में से एक होने की घोषणा की।
3. RIL (रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड) ने वर्ष 2002-03 में भारत सरकार की दूसरी सबसे बड़ी पेट्रोकेमिकल कंपनी IPCL (इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड) में भारी हिस्‍सेदारी को खरीद लिया तथा 2008 में यह RIL के साथ मिल गयी।
4. वर्ष 2010 में IBSL (इंफोटेल ब्रॉडबैंड सर्विसेज लिमिटेड) को खरीदने के पश्‍चात, रिलायंस ने ब्रॉडबैण्‍ड सेवा बाज़ार में प्रवेश किया। जिसमें इन्‍होंने 4G सेवा प्रदान शुरू किया।
5. 2017-18 में RIL ने रूसी कंपनी सिबुर के साथ संयुक्‍त व्‍यवसाय के रूप में जामनगर (गुजरात) में ब्‍युटाइल रबर संयंत्र स्‍थापित करने की योजना बनाई है।
6. फॉर्च्यून ग्लोबल की 500 विश्‍व की सबसे बड़ी कंपनियों की सूची में RIL को 203वां स्‍थान प्राप्‍त हुआ।
7. RIL की जामनगर रिफाइनरी स‍बसे बड़ी रिफाइनरीयों में से है, जो दनिया के कई देशों को रिफाइनरी तेल उपलब्‍ध कराती है।

अपनी इस अप्रतिम सफलता के लिए RIL को अनेक राष्‍ट्रीय और अंतराष्‍ट्रीय पुरूस्‍कारों से सम्‍मानित किया गया है। आज RIL लाखों लोगों को व्‍यवसाय देने के साथ ही, भारतीय आर्थिक विकास में बहुत बड़ा योगदान दे रही है। आज रिलायंस का बाज़ार पूंजीकरण 7.5 लाख करोड़ के करीब है, जो तीव्रता से आगे बढ़ रहा है।

बाज़ार पूंजीकरण (Market Capitalization) = कंपनी के शेयरों का बाजार मूल्‍य × कंपनी के आउटस्टैंडिंग शेयरों की संख्‍या।
(आउटस्टैंडिंग शेयर- कंपनी के वे सभी शेयर जो वर्तमान में निवेशकों, कंपनी अधिकारियों और अंदरूनी सूत्रों के अधिकार में हैं।)

संदर्भ:
1.https://www.quora.com/How-was-Dhirubhai-Ambani-able-to-build-his-enormous-empire-without-any-entrepreneurship-background-at-all
2.https://topyaps.com/dhirubhai-ambani-rags-to-riches
3.https://en.wikipedia.org/wiki/Reliance_Industries
4.http://www.ril.com/TheRelianceStory.aspx

http://prarang.in/Rampur/1809151828





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