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जानलेवा चाइनीज़ मांझा असल में है भारतीय

Rampur
20-10-2018 01:51 PM

भारत में पतंगबाजी का खेल बहुत ही लोकप्रिय है। पंतग से संबंधित एक मज़ेदार किस्सा आप मुंशी प्रेमचंद की ‘बड़े भाई साहब’ कहानी में देख सकते है। वैसे तो पंतग बारामास ही उड़ाई जा सकती है परन्तु भारत में कुछ विशेष त्यौहार पर पंतग उड़ाना अनिवार्य माना जाता है जैसे 'मकर संक्रांति' और '15 अगस्त'। इन दिनों देश के आसमान में चारों ओर पतंगें ही पतंगें दिखाई देती हैं। अलग-अलग रंगों की ये पतंगें भिन्न-भिन्न धागों से बंधी हुई होती हैं। किसी का धागा कच्चा है तो किसी का मजबूत। यदि डोर कच्ची हो तो पंतग टूटकर नीचे आ गिरती है। इसी कच्ची डोर को समय के साथ मजबूत बनाते-बनाते इतना खतरनाक बना दिया गया है कि लोगों को जान तक की हानि हो जाती है।

पहले जब आपकी पतंग आकाश की ऊंचाई छुने लगती थी तो पेच लड़ाना तो स्वभाविक होता ही था और कभी-कभी पेच लड़ाते समय मांझे को तेजी से घसीटने के चक्कर में ऊंगली कट जाती थी। परंतु आज, लोकप्रिय होता जा रहा ‘चाइनीज़ मांझा’ उंगली तो क्या, आपकी जिंदगी की डोर भी काट सकता है। असल में जैसे-जैसे पतंगबाज़ी का जूनून बढ़ता जा रहा है, वैसे ही हर कोई इसमें सबसे श्रेष्ठ होना चाहता है। सबसे श्रेष्ठ वही होगा जो सबसे अधिक पतंगें काटेगा। और इसी जूनून का फायदा उठा रहे हैं ये चाइनीज़ मांझे के उत्पादक। शुरुआत में इस धागे पर कांच के चूरे की एक परत चढ़ाई जाती थी ताकि इसे मज़बूत बनाया जा सके। पर समय के साथ उच्च मुनाफे के लोभ में इस पर अब लोहे जैसे धातुओं का चूरा भी चढ़ाया जाने लगा है जो अत्यंत घातक है।

चाइनीज़ मांझा, ये नाम सुनते ही आपके मन में यही आया होगा कि इसे भारत के बाहर से मंगवाया जाता है। किंतु ऐसा नहीं है। यह पूरी तरह से भारत में निर्मित सूती मांझे का नवीनीकृत रूप है। दो कारणों से इसे चाइनीज़ मांझा नाम मिला है:

1. सबसे पहला तो ये है कि ये नायलॉन के धागे से निर्मित होता है इसलिए इसे ये नाम मिला। नायलॉन से बने होने के कारण ये मजबूत तो होता ही है परंतु इसमें धार भी काफी होती है।

2. यह सूती मांझे की तुलना में सस्ता भी होता है जैसे कि हर चाइनीज़ चीज़ (जिन्हें भारत में चाइना द्वारा भेजा जाता है) होती है। उदाहरणतः सूती मांझों की 12 रीलों की कीमत गुणवत्ता के आधार पर लगभग 1,150 रुपये होती है, वहीं चाइनीज़ मांझे की 12 रीलों की कीमत 350 से 500 रुपये ही होती है। हालांकि इस पर हाईकोर्ट की पाबंदी है परंतु फिर भी ये अवैध रूप से बेचे जा रहे हैं।

इस पर केंद्र सरकार और व्यापार कानून कहता है कि चूंकि पतंगों के लिए उपयोग किये जाने वाले इस धागे के लिए कोई विशिष्ट आयात-निर्यात (EXIM) कोड भारतीय व्यापार वर्गीकरण, 2012 के तहत मौजूद नहीं है और साथ ही इस धागे के बारे में कोई अन्य संबंधित जानकारी भी उपलब्ध नहीं है, इसलिये यह मांझा आवश्यक रूप से चीन से आयात नहीं किया जा सकता है। यह एक गलतफहमी है कि चाइनीज़ मांझा चीन से आयात किया जाता है।

रामपुर के सिविल लाइन थाना क्षेत्र में चाइनीज़ मांझे की चपेट में आकर एक बच्चा घायल हो गया। जिसे तुरंत जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। चाइनीज़ मांझे से दो साल के भीतर छह लोगों की जान जा चुकी है। साथ ही 20 से ज्यादा लोग घायल हो चुके हैं। इसके अलावा अक्सर पक्षियों के भी इस तरह के सिन्थेटिक (Synthetic) माझें में फंसने से घायल होने की खबरें आए दिन देखने-सुनने को मिलती हैं। हाईकोर्ट की पाबंदी के बाद भी जिले में चाइनीज़ मांझे की बिक्री रुकी नहीं है। रामपुर की पुलिस का कहना है कि चाइनीज़ मांझे की बिक्री को रोकने के लिए हर समय जगह-जगह छापेमारी की जा रही है। चाइनीज़ मांजे की बिक्री करते हुए पाए जाने पर सख्त कार्रवाई भी की जाती है। परंतु पुलिस इसकी बिक्री को रोक पाने में सफल नहीं हो पा रही है, जिसका खामियाजा मासूम जनता को झेलना पड़ता है।

जिले में मदर टेरेसा वेलफेयर सोसाइटी के सदस्यों ने चाइनीज़ मांझे पर लगी रोक को सख्ती से लागू कराने की मांग को लेकर सिटी मजिस्ट्रेट को ज्ञापन दिया। डीएम को संबोधित इस ज्ञापन में कहा गया कि चाइनीज़ मांझे पर पहले से ही प्रतिबंध लगा हुआ है। फिर भी जिले भर में मांझे की बिक्री कैसे हो रही है।

जुलाई 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने देशभर में पतंग उड़ाने के लिए उपायोग किये जाने वाले नायलॉन और चाइनीज़ मांझे की खरीद, संचयन और इस्तेमाल पर दिल्ली समेत पूरे देश में सख्ती से रोक की बात कही। यह आदेश खास तौर पर लगातार चाइनीज़ मांझे से घायल होने वाले लोगों को देखते हुए दिया गया था और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का ये बैन पूरे देश पर लागू है। यह रोक ग्लास कोटिंग (Glass Coating) और कॉटन (Cotton) मांझे पर भी लगायी गई थी। एन.जी.टी. ने अपने आदेश में सिर्फ सूती धागे से ही पतंग उड़ाने की इजाज़त दी है। इस आदेश का पालन सभी राज्य गंभीरता से करें तो मांझे से घायल होने वाले लोगों और पक्षियों की जान को बचाया जा सकता है।

संदर्भ:
1.https://www.firstpost.com/india/chinese-manja-kite-flying-thread-that-delhi-banned-has-nothing-to-do-with-china-2966320.html
2.https://aajtak.intoday.in/story/ngt-final-ban-on-chinese-manjha-kites-1-940559.html
3.https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/rampur/child-injured-from-chinees-thread-in-rampur
4.https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/rampur/41539717153-rampur-news

http://prarang.in/Rampur/1810201970





रावण की नगरी श्रीलंका में भगवान शिव के अद्भुत मंदिर

Rampur
19-10-2018 01:48 PM

रामायण की कथा से तो हम सभी वाकिफ हैं। जिसमें हम सब जानते हैं सिता माँ को वापस लाने के लिए भगवान राम और रावण के बीच बहुत बड़ा युद्ध हुआ था। युद्ध जीतने के बाद जब राम ने अयोध्या वापस जाने की यात्रा शुरू की, तो उन्हें अहसास हुआ की उन पर एक ब्राह्मण हत्या दोष लग गया है। तभी मुनेश्वरम में, उन्होंने भगवान शिव की प्रार्थना करके उनसे इसका समाधान मांगा। भगवान शिव ने उन्हें दोष से छुटकारा पाने के लिए मनावरी, थिरुकोनेश्वरम, तिरुकेतेश्वरम और रामेश्वरम में चार शिव लिंगों को स्थापित करने और उनसे प्रार्थना करने की सलाह दी।

सबसे पहले हम आपको बताते है मुन्नेश्वरम मंदिर परिसर में कई छोटे मंदिर स्थित हैं, जिनमें मुख्य मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यहाँ पर एक अनोखी प्रथा का पालन किया जाता है, यहाँ भगवान को चढ़ावे में तरबूज, पपीता, नारंगी, केले, सेब व अन्य कई फलों को चढ़ाया जाता है।

भगवान राम द्वारा पहला शिवलिंग यहीं स्थापित किया गया था, चूंकि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं भगवान राम ने की थी, इसलिए इसे रामलिंगम भी कहा जाता है।

तिरुकेतीश्वरम मंदिर मन्नार राजमार्ग पर स्थित है, किंवदंतियों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण रावण के ससुर माया अथवा मायासुर ने किया था। वे एक कुशल वास्तुकार थे, जिन्होंने इन्द्रप्रस्थ के मायासभा का भी निर्माण किया था। यहां भगवान राम ने दूसरा शिवलिंग स्थापित किया था।

त्रिंकोमाली स्थित कोनेश्वरम मंदिर का उल्लेख रामायण व महाभारत दोनों महाकाव्यों में किया गया है। यह मंदिर चोलवंशी राजाओं के संरक्षण में काफी विकसित हुआ और यह एक विशाल गोपुरम और हजार स्तंभों का मंदिर बन गया। लेकिन इसे सन 1622 में पुर्तगालियों द्वारा नष्ट कर दिया गया था। जिसका पुनःनिर्माण सन 1974 में भगवान शिव, पार्वती और गणेश जी की मूर्तियों की खोज के उपरांत किया गया था। यहां भगवान राम द्वारा तीसरा शिवलिंग स्थापित किया गया था और साथ ही उन्होंने यहाँ ब्राह्मण हत्या दोश हेतु पूजा अर्चना भी की थी। इसे दक्षिण का कैलाश भी कहा जाता है, क्योंकि यह उसी देशांतर पर स्थित है जिस पर कैलाश पर्वत स्थित है।

सबसे अंतिम शिवलिंग भगवान राम ने रामेश्वरम में स्थापित किया था। यह वो स्थान है जहाँ रामसेतु का निर्मान हुआ था। हम सभी जानते हैं रामसेतु का निर्माण सिता माँ तक पहुंचने के लिए किया गया था। आज तलैमन्नार में स्थित पुराने प्रकाश स्तम्भ के समीप तट से श्रीलंका नौकासेवा उपलब्ध कराती है जो इस सेतु के दर्शन हेतु अति उपयुक्त है।

संदर्भ :-

1.https://www.inditales.com/ramayana-places-to-see-sri-lanka/
2.fbid=10153745803031239&set=a.10150426417856239&type=3&theater
3.http://kataragama.org/sacred/koneswaram.htm
4.https://www.youtube.com/watch?v=PibAqsHTlXY

http://prarang.in/Rampur/1810191969





दीमकों का दिलचस्प जीवन

Rampur
18-10-2018 03:03 PM

दीमक इतने घातक होते हैं कि मज़बूत से मज़बूत फर्नीचर (Furniture) को भी कुछ ही दिनों में चट कर जाते हैं। कई बार तो ये दिखाई दे जाते हैं लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि ये अंदर ही अंदर फर्नीचर खाते रहते हैं और पता भी नहीं चल पाता है।

दीमक को हम में से अधिकांश लोग सफेद चींटियाँ भी कहते हैं, क्योंकि वे फीके रंग और चींटियों की तरह की भौतिक समानताओं के होते हैं। हालांकि ये चींटियों से काफी भिन्न होते हैं, जैसे चींटियों की संकीर्ण कमर होती है जो उसे दो भागों में विभाजित करती है, जो दीमकों में नहीं होती है। साथ ही चींटियों में मुड़े हुए एंटीना होते हैं, जबकि दीमकों में सीधा एंटीना होता है। सन्तानोत्पत्ति करने वाली चींटियों और दीमकों में पंख होते हैं, लेकिन चींटियों के आगे के पंख और पीछे के पंखों में आकार का अंतर होता है, और वहीं दीमकों में दोनों के आकार एक समान होते हैं।

अधिकांश दीमक की प्रजातियां उष्णकटिबंध क्षेत्र में पायी जाती हैं। ये लकड़ी और पौधों की सामग्री से पोषक तत्व प्राप्त करते हैं, लेकिन वे अपने भोजन को सिम्बियोटिक प्रोटोज़ोआ (Symbiotic Protozoa) और बैक्टीरिया (Bacteria) की मदद से पचाते हैं, जो लकड़ी और पौधों के फाइबर (Fibre) को तोड़ने में मदद करता है। सभी प्रजातियों की दीमकों के बारे में दिलचस्प बात ये है कि वे समूह में रहते हैं और साथ ही वे सभी एक जाति व्यवस्था का पालन करते हैं, जो इस प्रकार है:

श्रमिक:
दीमक की अधिकांश प्रजातियों में, एक श्रमिक दीमक अपने लार्वा चरण में एक कीट जैसा दिखता है। एक श्रमिक दीमक का बाहरी हिस्सा नरम होता है और सफेद, पीले या भूरे रंग का होता है। श्रमिक घोंसला बनाने, भोजन ढूंढने और युवाओं की देखभाल करने का कार्य करते हैं। ड्राईवुड टर्माइट (Drywood Termite) में एक विशिष्ट श्रमिक जाति नहीं होती है, वे इसके बजाय निम्फ़ (Nymph) पर निर्भर रहते हैं।

सैनिक:
जाति व्यवस्था में सैनिक अगला है। सैनिकों का भी श्रमिकों की तरह ही बाहरी हिस्सा नरम होता है, लेकिन इनका सर काफी बड़ा और कठोर होता है तथा जबड़े अच्छी तरह से विकसित होते हैं।

एलेट्स (Alates):
एलेट्स दीमक उड़ने वाली चींटियों की तरह लगती है। ये परिपक्व समूह में आते हैं। एलेट्स दीमक गरम मौसम में अपना स्थान बनाते हैं। साथ ही जब प्राथमिक सन्तानोत्पत्ति अपने पंख खो देते हैं तो वे नए समूह के राजा और रानी बन जाते हैं।

दीमकों के कई परिवार होते हैं, और प्रत्येक की अलग-अलग जीवनशैली होती है।

सबटेरेनियन दीमक (Subterranean Termite)
सबटेरेनियन दीमक घरों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाती हैं। फॉर्मोसन सबटेरेनियन दीमक काफी तेजी से फैलती हैं। सबट्ररेनियन दीमक मिट्टी में पौधों के पदार्थों को विघटित करते हैं।

डैम्पवुड दीमक (Dampwood Termite)
डैम्पवुड दीमक को नमी की आवश्यकता होती है और जंगलों में वे घुमावदार पेड़ों और अन्य लकड़ियों में जगह बदलती रहती हैं।

ड्राईवुड दीमक (Drywood Termite)
ड्राईवुड दीमक सूखने के लिए कम संवेदनशील होती हैं तथा उन्हें इतनी नमी की आवश्यकता नहीं होती। ये ज्यादातर मृत पेड़ों या इमारतों में रहना पसंद करती हैं।

चूंकि दीमक अंधे होते हैं, वे कंपन और फेरोमोन (रासायनिक सन्देश) के माध्यम से संवाद करते हैं। ये दीमक अपने घोंसले के साथी की गंध से एक दूसरे को पहचानते हैं। प्रत्येक समूह के दीमक की अपनी एक अलग गंध होती है। वे फेरोमोन की सहायता से भोजन के रास्ते तक या खतरे का एक संकेत छोड़ सकते हैं।

जैसा कि हमने आपको पहले ही बताया है कि दीमक सेलूलोज़ (Cellulose) युक्त सामग्री को खाते हैं, लेकिन हर प्रजातियों का आहार भिन्न होता है। प्रजातियों की नमी की आवश्यकता के आधार पर वे मृत पौधों और पेड़ों को और साथ ही इमारतों की सामग्री, कालीन, प्लास्टिक, कपड़े या पशु मल आदि खाते हैं। अपने पाचन तंत्र में मौजूद प्रोटोज़ोआ और बैक्टीरिया की मदद से ये सेल्यूलोज को शर्करा में तोड़ती है।

संदर्भ:
1.https://en.wikipedia.org/wiki/Termite
2.https://www.nwf.org/Educational-Resources/Wildlife-Guide/Invertebrates/Termites
3.https://www.orkin.com/termites/facts/characteristics/

http://prarang.in/Rampur/1810181962





रामपुर के क्षेत्र में पाए जाने वाले सबसे पुराने सिक्के, पांचाल सिक्के

Rampur
17-10-2018 01:23 PM

सिक्के या मुद्रा हमेशा से इतिहास, राजनीति और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में अहम भूमिका अदा करने के साथ-साथ शासक की मनोवृत्ति या व्यक्तित्व को दर्शाते आए हैं। प्राचीन काल में जब कोई राजा कोई जीत हासिल करता तो उसके उपलक्ष्य में नया सिक्का जारी कर देता था, या किसी राज्य में विजय प्राप्त करने के बाद अपने सिक्कों को राज्य में लागू कर देता था। ऐसे ही पांचाल साम्राज्य के सिक्कों का इतिहास काफी पुराना और अनोखा है।

मौर्य साम्राज्य के ध्वस्त होने के बाद इसके खंडहरों से कई नए साम्राज्य उभरे, जिसमें उभरने वाला एक साम्राज्य पांचाल भी था। यह बुद्ध की अवधि के दौरान 16 महान महाजनपदों में से एक रहा, जो कानपुर से वाराणसी के बीच के गंगा के मैदान में फैला हुआ था। इसकी दो शाखाएँ - उत्तर पांचाल की राजधानी ‘अहिक्षेत्र’ और दक्षिण पांचाल की राजधानी ‘कांपिल्य’ थी।

वहीं छठी शताब्दी ईसा पूर्व की पहली छमाही में उत्तर पांचाल पर कुरु ने विजय प्राप्त कर ली और केवल दक्षिण पांचाल ही स्वतंत्र बना रहा। जिसे बाद में मगध द्वारा अवशोषित कर लिया गया था, लेकिन मित्रा राजाओं के तहत इसे पुनर्निर्मित किया गया, जिनके द्वारा सिक्कों की सबसे रोचक और दीर्घकालिक श्रृंखला जारी की गयी।

लगभग सभी पांचाल सिक्कों पर ब्रह्मी अक्षरों में सिक्कों को प्रकाशित करने वाले राजा का नाम होता था। सिक्कों में मुखभाग में आम तौर पर देवताओं की छवी होती थी, प्रायः प्रकाशित करने वाले राजा के मिलते जुलते देवता होते थे, और पिछले भाग में राजा के नाम के साथ उपरोक्त पांचाल साम्राज्य के तीन प्रतीक होते थे। उदाहरण के लिए, अग्निमित्र के सिक्के अग्नि (अग्नि के देवता) को दर्शाते हैं। लेख के सबसे ऊपर दिया गया चित्र अग्निमित्र के सिक्के का है जिसमें अग्नि देव को ज्वलंत बालों के साथ दिखाया गया है। इसी प्रकार इंद्रमित्र के सिक्के में देवता इंद्र को दर्शाया गया है। भानुमित्र का एक बहुत ही रोचक सिक्का वह है जिसमें भानु (सूर्य) को किरणों के उत्पन्न होने का स्रोत बताते हुए एक चक्र के रूप में दर्शाया गया है, जिसे एक हार से नवाज़ा भी गया है।

कभी-कभी देवता के अलावा उनके शस्त्रों का वर्णन करने वाले प्रतीकों को भी दर्शाया जाता है। उदाहरण के लिए, रुद्रगुप्त के सिक्कों पर भगवान शिव के शस्त्र त्रिशूल और कुल्हाड़ी दिखाए गये हैं। पांचाल सम्राज्य के आखरी शासक अच्युता के सिक्कों में पहिये के स्पोक (Spoke) और नाम ‘अच्यू’ देखने को मिलता है।

संदर्भ:
1.https://www.mintageworld.com/media/detail/4420--the-beauty-of-panchala-coins/
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Panchala
3.https://www.academia.edu/31023620/Tin-bronze_alloy_Panchala_coins_75-50_BCE_with_Indus_Script_hypertext_ranku_ayo_kamma%E1%B9%ADa_sippi
4.http://coinindia.com/galleries-panchala.html
5.http://coinindia.com/galleries-panchala-kingdom.html

http://prarang.in/Rampur/1810171959





जब हुई वॉरेन हेस्टिंग्स की सुनवाई रोहिलखंड के सिलसिले में

Rampur
16-10-2018 02:19 PM

1774 में वॉरेन हेस्टिंग्स द्वारा रोहिलखंड में किए गये हमले का संपूर्ण वृतांत ब्रिटिश लेखक सर जॉन स्ट्रैची द्वारा अपनी पुस्तक ‘हेस्टिंग्स एंड दी रोहिल्ला वॉर’ (Hastings and The Rohilla War) में किया गया है, जो इस प्रकार है:

रोहिल्ला अफगानी थे, जिन्होंने 18वीं शताब्दी में मुग़ल साम्राज्य के पतन के दौरान भारत में प्रवेश किया था और रोहिलखंड पर नियंत्रण प्राप्त किया था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद, रोहिलखंड एक स्वतंत्र राज्य बनना चाहता था। इसलिए रोहिलखंड के शासक हाफिज रहमत खान ने अपने राज्य को शक्तिशाली और समृद्ध बना दिया। लेकिन दूसरी तरफ मराठों की रोहिलखंड पर नज़र थी। इस कारण हाफिज रहमत खान ने अवध के नवाब से संधि कर ली कि अगर मराठों ने हमला किया तो अवध उनकी सहायता करेगा, जिसके फलस्वरूप हाफिज रहमत खान, नवाब को चालीस लाख रुपये देगा। मराठों ने 1773 में रोहिलखंड पर हमला किया लेकिन माधव राव पेशवा की अचानक मौत के कारण युद्ध किए बिना वापस चले गए। हालांकि, जब अवध के नवाब ने संधि के मुताबिक 40 लाख रुपये मांगे तो हाफिज रहमत खान ने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि युद्ध तो हुआ ही नहीं।

उसके बाद अवध के नवाब ने ब्रिटिशों से रोहिलखंड पर हमला करने में मदद के लिए अनुरोध किया और वादा किया कि वे सेना का खर्चा और 40 लाख रुपय का भुगतान भी करेंगे। वॉरेन हेस्टिंग्स ने इस प्रस्ताव को स्वीकार लिया और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने 1774 में रोहिल्लाओं को हरा दिया। हाफिज रहमत खान और कुछ 20,000 रोहिल्ला को देश से हटा दिया गया, और रोहिलखंड को अवध से जोड़ दिया गया। इस घटना में रोहिलखंड के गांव को जलाने के साथ बच्चों और महिलाओं को भी मार दिया गया। इंग्लैंड में वॉरेन हेस्टिंग्स द्वारा किये गये इस कार्य की काफी निंदा हुई।

नंद कुमार एक प्रभावशाली बंगाली जमींदार थे, जो हेस्टिंग्स के विरोधी थे। कुछ परिषद के सदस्य, जो हेस्टिंग्स के प्रति शत्रुता रखते थे, ने साजिश रच नंद कुमार की मदद से हेस्टिंग्स के खिलाफ मामला दर्ज करवा दिया। 1775 में नंद कुमार ने हेस्टिंग्स के खिलाफ विधवा मीर जाफर से 3.5 लाख रुपये लेने का आरोप लगाया। हेस्टिंग्स पर लगे आरोप सिद्ध होने पर परिषद का बहुमत उनके खिलाफ था, जिस कारण उन्होंने परिषद को भंग कर दिया। हालांकि, परिषद ने उन्हें कंपनी के खजाने में धन जमा करने के लिए कहा। इसके बाद, हेस्टिंग्स ने सुप्रीम कोर्ट में नंद कुमार के खिलाफ काउंटर चार्ज (Counter charge) दर्ज कराया, जिसमें उसने नंद कुमार पर जालसाज़ी का आरोप लगाया, क्योंकि नंद कुमार उसके खिलाफ रिश्वत का आरोप साबित नहीं कर सका था। नंद कुमार के खिलाफ जालसाज़ी के आरोप सिद्ध हो गए और उसे फांसी की सज़ा सुना दी गयी। इस सुनवाई और निष्पादन को वॉरेन हेस्टिंग्स के आलोचकों ने न्यायिक हत्या कहा, क्योंकि भारत के किसी भी कानून में जालसाज़ी के लिए फांसी की सज़ा नहीं थी।

और वहीं ब्रिटिशों द्वारा रामपुर में एक छोटे से संरक्षित रोहिल्ला राज्य की स्थापना की गयी, जिसमें फैजुल्ला खान को नवाब बनाया। 1793 में, फैजुल्ला खान की मृत्यु हो गई जिसके परिणामस्वरूप उनके बेटे रामपुर का नवाब बनने के लिए आपस में लड़ने लग गये। इस कारण, जनरल एबरक्रॉम्बी के नेतृत्व में फिर से ब्रिटिशों ने दखल देना शुरु कर दिया। जिसके कारण 1794 में दूसरा रोहिला युद्ध हुआ, जिसमें रोहिल्ला हार गए और करीब 25,000 रोहिल्ला सैनिकों को मार दिया गया। युद्ध के बाद, रोहिल्ला युद्ध स्मारक का निर्माण सेंट जॉन चर्च, कलकत्ता के परिसर में ब्रिटिश द्वारा किया गया।

स्वतंत्रता के बाद रोहिल्ला की विशाल बहुमत पाकिस्तान में बस गयी, और जो भारत में रहे वे रोहिलखंड, उत्तर प्रदेश राज्य में बस गए।

संदर्भ:
1.https://www.gktoday.in/gk/warren-hastings/
2.https://www.mapsofindia.com/history/battles/rohilla-war.html
3.http://archive.spectator.co.uk/article/2nd-april-1892/20/hastings-and-the-rohillas-sin-john-strachey-in-his
4.https://archive.org/details/hastingsrohillaw00strauoft/page/n5

http://prarang.in/Rampur/1810161954





विदेशी कंपनी हिंदुस्तान यूनीलीवर का सफ़र

Rampur
15-10-2018 02:44 PM

यूनीलीवर एक ब्रिटिश-डच (British-Dutch) अंतर्राष्ट्रीय उपभोक्ता वस्तु कंपनी है, जिसका मुख्यालय लंदन, यूनाइटेड किंगडम और नीदरलैंड्स के रॉटरडैम में है। इसके उत्पादों में खाद्य और पेय पदार्थ, सफाई करने के उत्पाद और व्यक्तिगत देखभाल के उत्पाद शामिल हैं। 2016 में यह राजस्व द्वारा मापी गयी दुनिया की सबसे बड़ी उपभोक्ता वस्तु कंपनी थी। यूनीलीवर के आज 400 से अधिक ब्रांड हैं, जिनका 2016 में कुल कारोबार 52.7 बिलियन यूरो और 2017 में 53.7 बिलियन यूरो रहा।

यूनीलीवर ने 1890 में लीवर ब्रदर्स नाम की ब्रिटिश साबुन निर्माता कंपनी से शुरुआत की, जिसमें उन्होंने सनलाइट साबुन का व्यापार शुरु किया। इसे खोलने का विचार लीवर ब्रदर्स के संस्थापक विलियम हेस्केथ लीवर का था। इस उत्पाद ने पूरे ब्रिटेन में सफलता प्राप्त की और इसकी मदद से व्यवसाय दुनिया भर में फैलाया गया। 1925 में विलियम लीवर की मृत्यु के बाद, लीवर ब्रदर्स के अध्यक्ष फ्रांसिस डी’आर्सी कूपर बने। कूपर ने लीवर ब्रदर्स के लिए कई फायदे किए, और विभिन्न कंपनियों का नेतृत्व करते हुए लीवर ब्रदर्स को एंग्लो-डच (Anglo-Dutch) कंपनियों में शामिल किया। साथ ही 1930 में, लीवर ब्रदर्स मार्जरीन यूनी के साथ विलीन हो गए, जिससे कंपनी का नाम "यूनीलीवर" बन गया।

यूनीलीवर के गठन को ज्यादा समय नहीं हुआ था कि उनके कच्चे माल में 30% से 40% तक का घटाव हो गया। यूनीलीवर कंपनी के उत्पाद : लिपटन और ब्रूक बॉण्ड चाय, डाल्डा वानस्पति तेल, वॉल आइस क्रीम, किसान जेम, सर्फ वॉशिंग पाउडर, पोंड्स क्रीम, वैसलीन, रेक्सोना, लक्स, डव, और लाइफबॉय साबुन, पेपसोडेन्ट टूथपेस्ट, सनसिल्क शैम्पू और कई अन्य उत्पाद हैं।

यूनीलीवर द्वारा 1933 में भारत में लीवर ब्रदर्स के रूप में कंपनी की स्थापना की गयी। जो बाद में (1956) लीवर ब्रदर्स, हिंदुस्तान वनस्पति मैन्युफैक्चरिंग कंपनी लिमिटेड और यूनाइटेड ट्रेडर्स लिमिटेड के बीच विलय के परिणामस्वारूप ‘हिंदुस्तान लीवर लिमिटेड’ के नाम से जाना जाने लगा। यह 16,000 से अधिक श्रमिकों को रोज़गार देता है, साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से 65,000 से अधिक लोगों के रोजगार को सुविधाजनक बनाने में मदद करता है। वहीं जून 2007 में कंपनी का नाम बदलकर ‘हिंदुस्तान यूनीलीवर लिमिटेड’ कर दिया गया था। विदेशी सहायक कंपनियों में से यह सबसे पहली कंपनी थी जिसने भारतीय जनता को अपनी इक्विटी (Equity) का 10% प्रस्ताव दिया।

1937 में इन्होंने घी की एवज़ में डालडा को प्रस्तुत किया। लेकिन इसका विपणन शुरु होने से पहले ही खत्म हो गया, क्योंकि भारतीय जनता को विश्वास नहीं हो रहा था कि घी का भी कोई अन्य विकल्प हो सकता है। तब लीवर कंपनी ने इसको लोगों के समक्ष विज्ञापन के द्वारा पेश किया। डालडा का कोई भी अन्य प्रतिद्वंद्वी नहीं था, लेकिन वह एक विवाद का शिकार हो गया। 1950 के दशक में इसे बंद करने का यह विवाद उठा कि डालडा देसी घी का एक मिलावटी रूप था, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक था। तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रव्यापी राय सर्वेक्षण की मांग की, जो अनिश्चित साबित हुई। घी में मिलावट को रोकने के तरीकों का सुझाव देने के लिए सरकार द्वारा एक समिति की स्थापना की गई थी। लेकिन उस से भी कुछ नहीं हुआ। 1990 के दशक तक डालडा को काफी झुकाव देखना पड़ा क्योंकि तब तक उसे अपने प्रतिद्वंद्वी तेल या परिष्कृत वनस्पति तेल का सामना करना पड़ा। वहीं 2007 में डालडा के तहत खाद्य तेल का निर्माण किया गया था।

1984 में ब्रुक बॉन्ड एक अंतरराष्ट्रीय अधिग्रहण के माध्यम से यूनीलीवर से जुड़ गया।

1986 में चेसेब्रो पोंड्स लिमिटेड भी यूनीलीवर में शामिल हो गयी।

1993 में टाटा ऑयल मिल्स कंपनी भी इसके साथ विलय हो गयी।

एच.यू.एल. (HUL) ने 1994 में अमेरिका स्थित किम्बर्ली क्लार्क कॉर्पोरेशन (हगीज़ डायपर और कोटेक्स सेनेटरी पैड का विपणन करता है) के साथ 50:50 संयुक्त उद्यम का गठन किया।

1996 में एक अन्य टाटा कंपनी और लेक्मे लिमिटेड ने 50:50 संयुक्त उद्यम का गठन किया। और 1998 में लेक्मे लिमिटेड ने अपने ब्रांड एच.यू.एल. को बेच दिए।

2000 में एक ऐतिहासिक कदम में सरकार ने आधुनिक खाद्य पदार्थों में एच.यू.एल. को 74% इक्विटी देने का फैसला किया। गेहूं व्यवसाय के रणनीतिक विस्तार के बाद एच.यू.एल. ने ब्रेड बनाना शुरू किया।

2008 में ब्रूक बॉण्ड और सर्फ एक्सेल ने उसी वर्ष 1,000 करोड़ रुपये का विक्रय किया, साथ ही व्हील ने 2,000 करोड़ रुपये का विक्रय किया।

जनवरी 2010 में, एच.यू.एल. का प्रमुख कार्यालय लीवर हाउस, मुंबई से मुंबई के अंधेरी (ई.) में स्थानांतरित हो गया।

संदर्भ:
1.https://en.wikipedia.org/wiki/Unilever
2.https://www.ukessays.com/essays/commerce/history-and-background-of-unilever-company-commerce-essay.php
3.https://www.hul.co.in/about/who-we-are/our-history/
4.https://en.wikipedia.org/wiki/Hindustan_Unilever
5.https://www.business-standard.com/article/management/40-years-ago-and-now-how-dalda-built-and-lost-its-monopoly-115030501153_1.html

http://prarang.in/Rampur/1810151950





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