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रामपुर में रह रहे तुर्की मूल के निवासी

Rampur
13-08-2018 02:46 PM

विश्‍व में लगभग 197 देश हैं, प्रत्‍येक की अपनी संस्‍कृति, परंपराएं तथा भाषाएं हैं। किंतु भिन्‍नताओं के गढ़ भारत में आज भी अपनी संस्‍कृतियों के साथ-साथ वर्षों पूर्व विभिन्‍न देशों से लायी गईं संस्‍कृ‍तियों, परंपराओं और यहां तक कि भाषाओं का भी अनुसरण हो रहा है। जिनमें से एक है ‘तुर्की’। इनका संबंध भारत में आज से नहीं वरन् कई सौ सालों पुराना है, ये दक्षिण भारत तथा उत्‍तरी भारत के रामपुर, रोहिलखण्‍ड और संभल के लगभग 900 गाँवों में बसे हुए हैं। उत्‍तर भारत में ही इनकी तादात 15 लाख के आसपास है।

चलिए इनके विषय में गहनता से जानने के लिए इतिहास के कुछ पन्ने पलटते हैं। भारतीय इतिहास में नया अध्‍याय लिखने वाले महमूद गज़नवी तथा मुहम्मद गौरी द्वारा यहां तुर्की शासन की नींव डाली गयी, जो आगे चलकर मुग़ल साम्राज्‍य के लिए आधार स्‍तंभ बनी। गज़नवी तो भारत से धन संपदा लूट के वापस चला गया, किंतु गौरी ने तुर्की साम्राज्‍य स्‍थापित किया। गौरी इस तुर्की साम्राज्य की देख रेख अपने विश्‍वसनीय पात्र कुतुबद्दीन ऐबक को सौंपकर वापस चला गया तथा इन्‍होंने ही यहां तुर्की साम्राज्‍य का विस्‍तार कर, इसे स्‍थायित्‍व प्रदान किया। बाद में इनके संबंधियों (इल्‍तुत्मिश, बलबन आदि) ने इसे आगे बढ़ाया। इनके द्वारा ही तुर्की भारत आये तथा साथ ही भारत आयी इनकी संस्‍कृति, परंपरांए और भाषा जिसकी छवि आज भी भारत में देखने को मिलती है। सर्वप्रथम इन्‍होंने ही दिल्‍ली को अपनी राजधानी बनाया, जो आगे चलकर सत्‍ता का केंद्र बनी। रोहिलखंड में तुर्कियों का प्रवेश इल्‍तुत्मिश द्वारा हुआ, जो आज तक यहाँ बसे हुए हैं।

भारत में बसे तुर्की आज भी भारत और तुर्की के रिश्‍ते को मज़बूती प्रदान कर रहे हैं। विगत कुछ वर्षों में तुर्की के राजदूत हसन गोगस (2005) मुरादाबाद के एक गैर सरकारी संगठन (NGO) के निमंत्रण पर अपनी संस्‍कृति को बढ़ावा देने हेतु भारत आये किंतु वे भी यहां स्थित तुर्कियों की आबादी देख अचंभित रह गये। आज भी ये लोग जो भाषा बोलते हैं, वह पूर्णतः तुर्की की तो नहीं रही किंतु, उसमें प्रयोग होने वाले अधिकांश शब्‍द तुर्की भाषा के ही हैं। साथ ही ये लोग तुर्की परंपरा के अनुसार त्‍यौहारों में एक साथ एक थाली में खाना खाते हैं, यहां की महिलाएं घर पर ईख की टोकरियां बनाती हैं, जो घरेलू कार्यों में उपयोग की जाती हैं। इसी प्रकार की अनेक छोटी-बड़ी गतिविधियों के माध्‍यम से इन्‍होंने अपनी परंपराओं को जीवित रखा है।

साथ ही हाल ही में इस क्षेत्र के युवाओं ने भी अपनी जड़ों को बेहतर तरीके से जानने में रूचि दिखाई है। इनमें से कई तो अपने मूल के बारे में जानने के लिए विदेश यात्रा भी कर रहे हैं। इसी रूचि को देखते हुए रामपुर के कुछ कॉलेज भी अब तुर्की भाषा को अपने पाठ्यक्रम में जोड़ने पर विचार विमर्श कर रहे हैं।

संदर्भ:
1.http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/49263392.cms?utm_source=contentofinterest&utm_medium=text&utm_campaign=cppst
2.https://timesofindia.indiatimes.com/city/bareilly/Istanbul-opens-its-eyes-to-Rohilkhands-11-lakh-Turks-/articleshow/49263392.cms
3.https://en.wikipedia.org/wiki/Turks_in_India
4.http://www.historydiscussion.net/history-of-india/establishment-of-turkish-rule-in-india-indian-history/6544


आधुनिक घरों के निर्माण में ग्रीन गोल्ड 'बांस' की भूमिका

Rampur
12-08-2018 10:55 AM

आधुनिकता के इस दौर में अक्सर लोग घर बनाते समय उसमें कुछ अलग करने के लिए प्राकृतिक स्रोतों का चयन करते हैं, जिनकी ओर दुनिया बरबस ही खींची चली आती है। इन्हीं प्राकृतिक स्रोतों में हम जानते हैं, ग्रीन गोल्ड कहे जाने वाले बांस के विषय में जिसे विश्व में आज बहुमुखी व्यसाय जैसे घर बनाने, फर्नीचर बनाने, किचन के बर्तन बनाने तथा घर की सज्जा सामग्री बनाने इत्यादि के रूप में चयनित किया जा रहा है। लेकिन जैसे कहा जाता है, 'जहां नाक है वहाँ सोना नहीं और जहां सोना है वहाँ नाक नहीं'। यही दृश्य है रामपुर बरेली के विश्व प्रसिद्ध बांस का, यहां बांस का उत्पादन तो बड़े पैमाने पर होता है पर इस स्थान के लोग इसका उपयोग इतने बड़े स्तर तक नहीं कर पा रहे हैं।

प्रकृति के दोहन को कम करने के लिए लोग आज प्रयास कर रहे हैं कि वे जिस वस्तु का उत्पादन करें या जिस घर में रहें वह प्रकृति के अनुकूल हो। इसमें अपने प्रत्येक भाग की उपयोगिता के कारण बांस सबसे ज्यादा सहायक सिद्ध हो रहा है। इसकी लगभग 1500 प्रजाति विलुप्त होने के पश्चात भी आज विश्व में बांस की अनेक प्रजातियां उपलब्ध हैं। यह अन्य वृक्षों की तुलना में सबसे तीव्र विकास करता है तथा ऑक्सीजन का 35% भाग उत्पादित करता है।

असम, आंध्र प्रदेश जैसे राज्य बांस के माध्यम से आधुनिक घरों का निर्माण करने की ओर अग्रसर हो रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, खास करके जापान जैसे देशों में, इस प्रकार के घर बनाने को बढ़ावा दिया जा रहा है, क्योंकि यह पर्यावरण के पूर्णतः अनुकूल तथा भूकंपीय क्षेत्रों में सुरक्षा की दृष्टि से भी सहायक सिद्ध होता है। बरेली शायद अभी भी इस क्षेत्र में पीछे है हालांकि यहां के लोग बांस के माध्यम से पतंग बनाने, घर की सज्जा सामग्री बनाने आदि का कार्य कर रहे हैं। प्रस्तुत वीडियो में बरेली में किये जाने वाले बांस के इस कार्य को दर्शाया गया है:


पटना की शगुन सिंह ने उत्तराखण्ड की पहाड़ियों से लगभग 25 किमी दूर वातावरण के अनुकूल बांस और मिट्टी के घर बनाए जो आज प्रमुख पर्यटन स्थल भी बने हुए हैं। साथ ही ये लोगों को इसका प्रशिक्षण भी देती हैं।

इस प्रकार बांस को बिना प्रकृति को नुकसान पहुंचाए, आय के एक अच्छे विकल्प के रूप में चुना जा सकता है। यह अपनी खूबसूरती के कारण प्रकृति को भी एक मनमोहक दृश्य प्रदान कर रहा है।

संदर्भ:
1. http://www.bamboohouseindia.org/why-bamboo-houses/
2. https://www.greenbiz.com/news/2009/07/09/growing-future-bamboo-products
3. https://www.youtube.com/watch?v=hY1P9z-YxhY
4. https://eshe.in/2018/07/10/shagun-singh-geeli-mitti/amp/


हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का रामपुर सहसवान घराना

Rampur
11-08-2018 11:00 AM

भारत में प्रचलित शास्त्रीय संगीत एक प्राचीन एवं समृद्ध कला है, जो विभिन्न राजाओं और शासकों के संरक्षण में जन साधारण के बीच फ़ली-फ़ूली। शास्त्रीय संगीत का जन्मदाता ‘सामवेद’ को माना जाता है। संगीत के कई मुखौटे हैं, इसकी दिव्यता और प्रभावशीलता एक वरदान की तरह है। भारतीय शास्त्रीय संगीत ने सभी संगीत शैलियों में अपना अनुकरणीय स्थान सदियों से बनाए रखा है। इस संगीत ने पूरी दुनिया को सम्मोहित कर रखा है, इसलिए भारतीय संस्कृति में ‘संगीत’ शब्द का अर्थ दुनिया के अन्य अर्थों की तुलना में अधिक शक्तिशाली है।

अब हम आपको हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को संजो के रखने वाले सहसवान घराने के बारे में बताते हैं, जो कि रामपुर और सहसवान के कस्बों में स्थित है। इसके संस्थापक उस्ताद इनायत हुसैन खान (1849-1919) थे। घराने का विकास उस्ताद मेहबूब खान द्वारा किया गया, जो रामपुर राज्य के शाही दरबार में मुख्य खयाल गायक थे। उनकी इस परंपरा को उनके बेटे उस्ताद इनायत हुसैन खान ने आगे बढ़ाया। उनके साथ उनके भाइयों ने भी इसका अनुगमन किया। उस्ताद इनायत हुसैन ने अपने बेटे सबीर हुसैन व दामाद मुश्ताक हुसैन खान (सन 1957 में पद्म भूषण पुरस्कार के प्राप्तकर्ता) को भी प्रशिक्षित किया। उनके परिवार ने इस शानदार पारिवारिक विरासत को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार सभी गायक एक-दूसरे से जुड़े हुए थे और इसलिए घराने का नाम उनके पूर्वजों के स्थान, सहसवान, के नाम पर रखा गया है। वर्तमान में यह घराना बदायूं ज़िले में स्थित हैं। रामपुर घराने के इतिहास को ऊपर दिए गए वीडियो में भी समझाया गया है।

रामपुर-सहसवान गायकी ग्वालियर घराने से संबंधित है, जो कि मध्यम धीमी ताल, पूर्ण कंठ की आवाज़ और जटिल तालबद्ध क्रीडा जैसी विशेषतओं को प्रकट करता है। इस घराने की शैली अपनी विविधता और तान की जटिलता (तेजी से विस्तार), व तराना गायन के लिए जानी जाती है। सहसवान घराने की गायकी की कुछ विभिन्न विशेषताएं हैं जैसे कि, "बहलावा" इस घराने की विशिष्ट शैली है। गौड़ सारंग, मियां मल्हार, छायानट, गौड़ मल्हार, केदार हमीर, तिलककामोद आदि इस घराने के प्रमुख राग हैं। इसमें गम्भीर प्रकृति के रागों की जगह चंचल प्रकृति के रागों का प्रयोग अधिक किया जाता है।

आधुनिकता के इस दौर में शास्त्रीय संगीत ने हमें ऐतिहासिकता से जोड़कर रखा, जो अपनी विभिन्न विषेशताओं से आज भी संगीत की दुनिया में विख्यात है तथा विभिन्न घरानों की शान बना हुआ है।

संदर्भ:
1. https://indianraga.wordpress.com/2010/12/02/gharana-tradition-rampur-sahaswan/comment-page-1/
2. https://www.youtube.com/watch?v=i3b3DgPkh4c
3. https://www.pumhka.com/phk/about/
4. रानी, डॉ. संध्या. 2005. उत्तर प्रदेश के रुहेलखण्ड क्षेत्र की संगीत परम्परा: एक विवेचनात्मक अध्ययन, रामपुर रज़ा लाइब्रेरी.


आज ही देखिये, रामपुर से जुड़े 220 महत्वपूर्ण लेख

Rampur
10-08-2018 02:04 PM

अच्छी संगत के साथ सफ़र कहाँ बीत जाता है पता ही नहीं चलता। प्रारंग का यह सफ़र भी कुछ ऐसा ही है जो अपने पाठकों के प्रोत्साहन के साथ चलता जा रहा है और दिन प्रतिदिन और भी मनोरंजक होता जा रहा है। हर दिन हमारे इस प्रारंग परिवार में कुछ नए सदस्य जुड़ते जा रहे हैं। तो आज हम कुछ समय निकालेंगे 2018 के अब तक के सफ़र की समीक्षा करने में।

आज की तारीख है 10 अगस्त 2018 तथा आज इस वर्ष का 222वां दिन है। इन 222 दिनों में प्रारंग अपने परिवार के रामपुरवासियों तक 219 लेख पहुंचा चुका है तथा यह लेख 220वां लेख होगा। यदि ध्यान दें तो लगभग हर दिन प्रारंग ने रामपुर को समर्पित एक लेख आप तक पहुँचाया है। प्रारंग के अनूठे वर्गीकरण में यदि इन लेखों को देखा जाए तो संस्कृति से जुड़े 167 लेख तथा प्रकृति से जुड़े 52 लेख अब तक इस वर्ष में प्रस्तुत किये गए हैं। और यदि संस्कृति और प्रकृति के भीतर वर्गीकरण की बात करें तो लेखों का वितरण कुछ इस प्रकार है:

प्रकृति:
• समयसीमा- 21
• मानव व उसकी इन्द्रियाँ- 83
• मानव व उसके आविष्कार- 63

संस्कृति:
• भूगोल- 16
• जीव-जंतु- 17
• वनस्पति- 19

इन लेखों को प्रारंग के रामपुर पोर्टल (http://rampur.prarang.in/), फेसबुक (https://www.facebook.com/prarang.in/), ट्विटर (https://twitter.com/prarang_in?lang=en) तथा प्रारंग की एंड्राइड मोबाइल एप्लीकेशन (https://play.google.com/store/apps/details?id=com.riversanskiriti.prarang&hl=en_IN) द्वारा आप तक पहुँचाया गया। इनमें से रामपुरवासियों की सबसे अधिक प्रतिक्रिया फेसबुक पर देखने को मिली।

यदि बात करें फेसबुक लाइक्स (Facebook Likes) की तो वर्ष 2018 में रामपुर के लेखों को करीब 6500 बार लाइक किया गया तथा उनपर कमेंट (Comment) के रूप में पाठकों द्वारा 85 बार टिप्पणी की गयी। आज प्रारंग के साथ फेसबुक पर करीब 43,000+ पाठक जुड़े हुए हैं जिनमें से 10,000+ पाठक रामपुर से हैं। साथ ही प्रारंग की एंड्राइड मोबाइल एप्लीकेशन के 1000 से भी अधिक डाउनलोड (Download) हो चुके हैं जिनमें से रामपुर से करीब 300 डाउनलोड हैं।

प्रारंग द्वारा प्रकाशित किये गए प्रस्तुत 5 लेख रामपुरवासियों में सबसे अधिक लोकप्रिय रहे। हर लेख के नाम पर क्लिक कर आप उसे पढ़ सकते हैं:

1. रामपुर में ज़रदोज़ी की चमक
2.
रामपुर बना पूरे राज्य का प्रेरणास्रोत
3.
रामपुर का भोजन बंगाल में मचा रहा धूम
4.
रामपुर का पड़ोसी अमरोहा
5. 
कोठी ख़ास बाग़ में मौजूद है एक जापानी बाग़

साथ ही हम आप सभी से आग्रह करना चाहेंगे कि हर लेख पर कमेंट और लाइक के रूप में अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर ज़ाहिर करें। अंत में प्रारंग अपने सभी रामपुर के पाठकों को हमारे साथ बने रहने के लिए धन्यवाद कहना चाहेगा क्योंकि यह आप लोगों का निरंतर प्रोत्साहन ही है जो हमें हर दिन बेहतर से बेहतर कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।


क्यों मानी जाती है कागज़ की सारस शान्ति का प्रतीक?

Rampur
09-08-2018 02:35 PM

विश्व में लोगों द्वारा विभिन्न परंपराओं का अनुसरण किया जाता है। जापान में भी लोगों द्वारा एक अनोखी परंपरा को माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जापानी ओरिगामी (Origami: "ओरी" जिसका अर्थ है "मोड़ना" और "गामी" जिसका अर्थ है "काग़ज़") की कला 6ठी शताब्दी में शुरू हुई थी और कागज की उच्च लागत के कारण, ओरिगामी का इस्तेमाल केवल धार्मिक, औपचारिक उद्देश्यों के लिए किया जाता था। यहाँ पर सारस एक रहस्यमय पंछी है और माना जाता है कि यह एक हजार साल तक जीते हैं। नतीजतन, जापानी, चीनी और कोरियाई संस्कृति में, सारस एक अच्छे भाग्य और दीर्घायु का प्रतिनिधित्व करता है और साथ ही वे इसे ‘खुशी की चिड़िया’ के रूप में संदर्भित करते हैं। परंपरागत रूप से, यह माना जाता था कि यदि एक व्यक्ति कागज़ की 1000 ओरिगामी सारस को बना देता है, तो उसकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है। इस प्रकार यह उम्‍मीद का एक प्रतीक बन गया।

लेकिन जब यह सिर्फ़ एक परंपरा है तो इसे शांति का प्रतीक क्यों माना जाता है? कागज़ की बनी सारस और शांति के बीच के संबंध को हिरोशिमा में परमाणु बम विस्फोट से पीड़ित लड़की ‘सदाको सासाकी’ की कहानी के माध्यम से बताया जा सकता है।

सदाको सासाकी केवल दो साल की थी जब 6 अगस्त, 1945 को उसके घर के सामने हिरोशिमा में अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिरा दिया गया। धमाका इतना तेज़ था कि वह खिड़की से बाहर उड़ गयी। यद्यपि वह बम से बच गई, लेकिन 12 साल की उम्र में वह ल्यूकेमिया (Leukemia) की शिकार हो गयी। उसे उसके पिता द्वारा 1000 सारस की परंपरा का पता चला तो उसने कागज़ से 1000 सारस तैयार करने का फैसला किया, इस उम्मीद से कि उसकी जिंदगी जीने की इच्छा पूरी हो जाएगी। दुर्भाग्यवश, वह मरने से पहले केवल 644 सारसों को बनाने में सक्षम रही थी। उसके सहपाठियों ने उसके सम्मान में बाकी की सारस को बनाना जारी रखा और उसके सपनों का सम्मान करने के लिए उसे 1000 सारसों की पुष्पांजलि के साथ दफनाया गया। हिरोशिमा पीस पार्क (Hiroshima Peace Park) में सदाको की एक मूर्ति है, जिसमें वह अपने हाथों को फैलाये हुए खड़ी है। हर साल, कागज़ की बनी सारस की हज़ारों पुष्पांजलि उसकी मूर्ति पर चढ़ाई जाती हैं। तभी इसे शान्ति के प्रतीक के रूप में जाना जाता है तथा यह लोगों को अहिंसा का पालन करने के लिए प्रोत्‍साहित करता है।

प्रस्तुत वीडियो में कागज़ से सारस बनाने की प्रक्रिया को बखूबी दर्शाया गया है। परन्तु यह सारस बनाकर आप करेंगे क्या? जैसा कि हमने आपको बताया कि हर वर्ष कई हजारों की मात्रा में कागज़ की सारस हिरोशिमा के पीस पार्क में अर्पित होती हैं, ये सारस या तो व्यक्ति स्वयं रखकर जाते हैं या फिर इन्हें डाक के ज़रिये भी भेजा जा सकता है। विश्व शान्ति आन्दोलन में अपना सहयोग दिखाने का यह एक बहुत ही सुन्दर तरीका है। अपनी सारस पहुँचाने के लिए इस लिंक पर दिए गए फॉर्म को भरें- http://www.city.hiroshima.lg.jp/shimin/heiwa/registerform_e.pdf। सारस भेजने का पता निम्न है:

Peace Promotion Division
The City of Hiroshima
1-5 Nakajima-cho Naka-ku,
Hiroshima 730-0811 Japan

वीडियो पर क्लिक करें और आज ही एक सारस बनाएं: 


संदर्भ:
1.https://www.telegraph.co.uk/news/worldnews/asia/japan/10323614/Crane-made-by-Hiroshima-girl-who-died-of-cancer-given-to-US-museum.html
2.http://www.city.hiroshima.lg.jp/shimin/heiwa/crane.html


आज के समय में अपनी कार रखने की लागत

Rampur
08-08-2018 11:57 AM

भारत, जो अन्य देशों से 90% से अधिक पेट्रोल/डीज़ल आयात करता है, में कार का बाज़ार काफी बड़ा है। नई चमचमाती कारों को देखते ही अधिकांश भारतीयों के मन में उसे खरीदने का ख्याल आने लगता है, और वे कुल लागत की तुलना करे बिना ही उसे खरीदने की तैयारी शुरू कर देता है। लेकिन कई बार कार खरीदने का वास्‍तविक खर्च हमारी सोच से कहीं ज़्यादा होता है। यदि आप किसी तरह इस खर्च का प्रबंध कर भी लेते हैं, तब भी आगे चलकर आपको इसकी देख रेख के लिए कई आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

अगर आपने कार खरीदने का मन बनाया है, तो सबसे पहले उसकी कुल कीमत पता करें। अखबार, टीवी या होर्डिंग (hoarding) आदि पर दिखाए जा रहे इश्तेहारो में अक्सर कार का एक्स-शोरूम प्राइस (ex-showroom price) ही दिखाया जाता है, अर्थात जिस दाम पर आप विक्रेता से खरीदते हैं। जबकि कार की कुल कीमत में एक्स शोरूम प्राइस के अलावा मसलन सेल्स टैक्स (sales tax), रजिस्ट्रेशन फीस(registration fees), इंश्योरेंस (insurance) आदि तमाम चीजें भी शामिल होती हैं। साथ ही यदि आप कार के लिए कुछ अतिरिक्त चीजें जैसे ऐक्सेसरीज़ (accessories) खरीद रहे हैं तो उसके लिए भी आपको अलग से पैसे देने होते हैं। साथ ही साथ आगे की सर्विस और रखरखाव में अलग खर्च होता है।

उदाहरणता यदि आप मारुति स्विफ्ट जैसी कम रखरखाव वाली हैचबैक (hatchback) कार खरीदने के बारे में विचार कर रहे हैं तो इसका खरीद मूल्य लगभग 5 लाख रुपए है; इस पर सालाना अतिरिक्त व्यय (इंधन लागत (15,724), ब्याज (13,912), बीमा (13,912), अवांछित या वांछित सर्विस(2,046) आपको लगभग 99,157 रूपये तक पड़ सकता है।

यदि आप ये सोच रहे हैं कि अपनी कार खरीदने में लगाने वाली कुल लागत की तुलना में उबर (uber) या ओला (ola) कैब (cab) ज्यादा सस्ती और किफायती हैं, तो हम आपको बता दें की आप कैब बुक करके तीन साल की अवधि में लगभग 98000 से 1.86 लाख रुपए तक बचत कर सकते हैं, परन्तु आपकी खुद की कार खरीदने की स्वामित्व की भावना की संतुष्टि अन्य कोई कार या कैब नहीं कर सकती है। अपनी कार से बुकिंग की कोई परेशानी नहीं होती है और गाड़ियों की प्रतीक्षा भी नहीं करनी पड़ती है। आप आपातकालीन स्थिति में जैसे यदि अस्पताल जाना हो, जल्दी जाने के लिए आपकी कार के साथ निश्चित समय पर आसानी से पहुंच सकते हैं।

उपर्युक्त जानकारी से यह स्पष्ट है कि उबर या ओला को बुक करने से आपकी जेब पर थोड़ा कम फर्क पड़ता है, परतुं जो सुविधाएं आपको अपनी कार खरीदने से मिलती है, वो अन्य कैब या कार में नहीं मिलती। इसलिए, कार खरीदने के निर्णय लेने से पहले लाभ और हानियों की अच्छी तरह से तुलना कर लें। बचत करने का एक और विकल्प है कार पट्टे पर लेना, जिसमे आप कार के लिए मासिक शुल्क देकर खुद उसे चला सकते हैं।

संदर्भ:
1.चित्र: Background image created by Xb100 - Freepik.com
2.https://www.mycarhelpline.com/index.php?option=com_easyblog&view=entry&id=496&Itemid=91
3.http://www.rediff.com/business/report/buying-a-car-vs-leasing-it-the-pros-and-cons/20180403.htm
4.https://economictimes.indiatimes.com/wealth/spend/should-you-buy-a-car-in-the-age-of-uber-and-ola/articleshow/49698867.cms
5.https://auto.ndtv.com/research/cost-to-own


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