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कुछ आखिरी बचे जंगलों में रामपुर का समीपवर्ती जिम कॉर्बेट

Rampur
18-06-2018 12:24 PM

रामपुर आज वर्तमान में भारत के सबसे बड़े जंगलों में से एक जिम कोर्बेट के पास स्थित है। यह एक मध्यकाल में बसाया गया शहर है जो कि एक ऐसे क्षेत्र में बसा है जो एक समय में एक गहन जंगल हुआ करता था। यह क्षेत्र हिमालय के तराई क्षेत्र में आता है तथा गंगा के मैदान से भी यह क्षेत्र सटा हुआ है जिस कारण यह क्षेत्र अत्यंत उर्वर हो जाता है। यहाँ का वातावरण सघन जंगल के लिए अत्यंत उपयुक्त स्थान है। यही कारण है कि यहाँ पर गहन जंगल हुआ करता था। रामपुर और इसके आस-पास के क्षेत्रों में मानव की गतिविधियाँ करीब 2000 ईसा पूर्व के करीब शुरू हुयी थी जिसके साक्ष्य यहाँ की पुरातात्विक खुदाइयों से मिल जाता है। 2000 ईसा पूर्व के पहले विश्व की आबादी 2 करोड़ 70 लाख थी तथा वर्तमान काल में रामपुर की आबादी 31 लाख है जो यह प्रदर्शित करती है कि उस काल में इस क्षेत्र की आबादी अत्यंत कम थी जिस कारण यहाँ पर जंगल भी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ करता था।

कोर्बेट राष्ट्रीय उद्यान का फैलाव उस काल में बड़ी दूरी तक था। कोर्बेट राष्ट्रीय उद्यान हिमालय के तराई क्षेत्र से लेकर शिवालिक पर्वतमाला तक फैला हुआ है। इस वन का कटान मध्यकाल में बड़ी जोर से किया गया था तथा यह वन जहाँ रामपुर और आस-पास के क्षेत्रों तक कभी फैला हुआ था वर्तमान के छोटे स्थान तक सिमट कर रह गया। मानव की बढ़ती आबादी और कारखाने इस वन के काटे जाने का प्रमुख कारण थे। यह वन अपने जीवों के लिए जाना जाता है। यहाँ पर रीछ, हाथी, बाघ, तेंदुआ, हिरण आदि बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। इस वन का फैलाव क्षेत्र ज्यादा होने के कारण यहाँ के जैव-जगत में हम विविधिता देख पाते हैं।

जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान का इतिहास अत्यंत मनोरम है। यहाँ पर 488 किस्म की वनस्पतियां पायी जाती हैं जो यहाँ की वन परंपरा को प्रदर्शित करता है। जिम कोर्बेट राष्ट्रीय उद्यान कुल 520.8 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस उद्यान का संरक्षण 19वीं शब्ताब्दी में मेजर रामसे द्वारा शुरू किया गया था जो यहीं पर कार्यरत थे। इस क्षेत्र के संरक्षण का पहला कदम सन 1868 में उठाया गया था जब यहाँ पर ब्रितानी सरकार ने खेती आदि करने से लोगों को रोक दिया था। सन 1879 में यह संरक्षित जंगल के रूप में उभर कर सामने आया। 1900 के करीब इ. आर. स्टीवन और इ. ए. स्म्य्थिएस ने इसको राष्ट्रीय उद्यान बनाने का सुझाव दिया। 1907 में ब्रितानी सरकार ने यहाँ शिकार खेलने का संरक्षित स्थान बनाने का सोचा। परन्तु 1930 ही वह दौर था जब जिम कोर्बेट के सानिध्य में इस वन का आकार बनाया गया। उस वक्त यह जंगल हेली राष्ट्रीय उद्यान के रूप में उभर कर सामने आया था (हेली संयुक्त प्रान्त के गवर्नर थे)। यह वन एशिया का पहला राष्ट्रीय वन उद्यान या वन अभ्यारण्य था। इस वन में किसी भी प्रकार का शिकार वर्जित था तथा उस समय इसका क्षेत्र 323.75 वर्ग किलोमीटर ही था। 1954-55 में इस वन का नाम बदल कर रामगंगा राष्ट्रीय उद्यान रख दिया गया था पर फिर 1955-56 में इसका नाम कोर्बेट राष्ट्रीय उद्यान रख दिया गया जो आज भी है। इसका नाम जिम कोर्बेट के ऊपर रखा गया है जो कि एक वन संरक्षक थे तथा जिन्होंने इस राष्ट्रीय उद्यान को बचाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस वन को बड़ी मात्रा में क्षति हुयी थी। इस वन ने बाघों के संरक्षण में अहम् भूमिका का निर्वहन किया है जिसका फल यह है कि आज भारत भर में बाघों की संख्या अन्य देशों से बहुत अधिक है।

संधर्भ
1. http://www.corbettnationalpark.in/ctr_revealed_habitat.htm
2. https://www.corbett-national-park.com/topography-of-corbett.html
3. https://en.wikipedia.org/wiki/Jim_Corbett_National_Park
4. http://corbettonline.uk.gov.in/
5. http://www.worldhistorysite.com/population.html


रविवार कविता

Rampur
17-06-2018 11:33 AM

अकबर इलाहाबादी का जन्म 16 नवंबर, 1846 में इलाहाबाद में हुआ था। अकबर इलाहाबादी विद्रोही स्वभाव के थे। वे रूढ़िवादिता एवं धार्मिक ढोंग के सख्त खिलाफ थे और अपने शेरों में ऐसी प्रवृत्तियों पर तीखा व्यंग्य (तंज) करते थे। उन्होंने 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम देखा था और फिर गांधीजी के नेतृत्व में छिड़े स्वाधीनता आंदोलन के भी गवाह रहे।आइये पेश ह उनकी ये छोटी सी कविता

कोई हँस रहा है कोई रो रहा है
कोई पा रहा है कोई खो रहा है

कोई ताक में है किसी को है गफ़लत
कोई जागता है कोई सो रहा है

कहीँ नाउम्मीदी ने बिजली गिराई
कोई बीज उम्मीद के बो रहा है

इसी सोच में मैं तो रहता हूँ 'अकबर'
यह क्या हो रहा है यह क्यों हो रहा है

संदर्भ

1. https://goo.gl/vht54F


क्यों हो जाता है बारिश में ट्रैफिक असहनीय?

Rampur
16-06-2018 10:59 AM

अक्सर हम देखते हैं कि बारिश के दौरान सड़कों पर अत्यंत भीड़ लग जाती है। रामपुर शहर की सड़कों पर अक्सर हम भीड़ देखते हैं पर बारिश के दौरान यह भीड़ अत्यंत ज्यादा हो जाती है। यह भी जानने योग्य है कि बारिश के दौरान ही बड़े पैमाने पर सड़कें उखड जाती हैं, ऐसा क्यों होता है? बारिश के बाद सड़कें ख़राब होने के कारण लोगों को कई समस्याएं आती हैं। यदि सड़कों को बारिश के दौरान खराब होने की धारणा को देखा जाये तो निम्न कुछ बिन्दुएँ महत्वपूर्ण हैं। यदि विशेषज्ञों के अनुसार देखा जाए तो विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है- सड़क बनाने की प्रक्रिया, उसकी गुणवत्ता की पहचान करना, सड़क पर जुटने वाली भीड़ आदि। जैसा कि माना जाता है कि बारिश के दौरान सड़क पर जल की समस्या बढ़ जाती है और जगह-जगह पर पानी भरने लगता है, ऐसे में सड़क पर होने वाले आवागमन पर प्रभाव पड़ता है और वह धीरे हो जाता है जिस कारण सड़कें उखड़ने लग जाती है।

सड़कों के बनाने की गुणवत्ता भी अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु है सड़कों के उखड़ने में। सड़कें अक्सर बारिश में इस लिए भी उखड़ने लग जाती हैं क्यूंकि इस मौसम में सड़क पर गर्मी पड़ती रहती है और अचानक से जब इस पर पानी पड़ता है तो सड़क जो कि गर्मी की वजह से फैली रहती है अचानक वह सिकुड़ जाती है जिस कारण वह उखड़ने लग जाती है। सड़क के उखड़ने के कारण भी कई समस्याएं आती हैं जिन में से कुछ समस्याएं सड़क पर होने वाली दुर्घटनाओं से भी जुड़ी हैं। रामपुर ही नहीं बल्कि पूरे भारत भर में यह समस्या बहुत ही गंभीर है तथा बारिश के दौरान हम यह भी पाते हैं कि सड़कों का निर्माण बहुत कम ही होता है जिस कारण से भी बारिश में सड़कें ख़राब हो जाती हैं। शहरों में होने वाली जल निकासी भी एक महत्वपूर्ण बिंदु है। सही जल निकासी न होने के कारण भी शहर में जल भराव की समस्या हो जाती है जिस कारण से भी सड़क पर कई प्रभाव पड़ते हैं।

बढ़ती हुयी जनसंख्या का प्रभाव भी सड़कों पर देखने को मिलता है जैसा कि हम जानते हैं कि जनसंख्या बढ़ने से सड़क पर ज्यादा दबाव पड़ता है और इस प्रकार से सड़कें दबाव न सह पाने के कारण टूटने लग जाती हैं, वर्तमान काल मे भी सड़कों का निर्माण पारम्परिक विधि से किया जाता है जो कि पुराने समय की जनसँख्या एवं वाहनों को नज़र में रखते हुए बनाई गयी थी। विधि के बदलाव से सड़कों को और मजबूत बनाया जा सकता है जिससे कि सड़कों को टूटने से बचाया जा सकता है। सभी जल निकासी के नालों की अच्छी तरह से सफाई करने से भी जल की निकासी हो जाती है जिससे सड़कों पर पानी नहीं भरता है, सड़क पर जल जमा ना होने से भी सड़कों की उम्र में इजाफा होता है।

1. http://www.thehindu.com/news/cities/chennai/Why-our-roads-fail-to-withstand-rain/article12082512.ece
2. https://www.ircwash.org/sites/default/files/Gupta-2005-Drainage.pdf
3. https://www.quora.com/Why-does-traffic-become-crazy-in-Bengaluru-when-it-rains


क्यों है यह किताब इतनी विश्वप्रसिद्ध और कौन थे इसके लेखक?

Rampur
15-06-2018 12:35 PM

ईद उल फितर का त्यौहार एक ऐसा त्योहार है जिसे पूरे विश्व में मुस्लिमों द्वारा मनाया जाता है। ईद रमज़ान के महीने के खत्म होने के बाद आता है, जैसा कि पूरे विश्व भर में मुस्लिम संप्रदाय के लोग पूरे एक महीना रोज़ा रखते हैं तथा उसके बाद ईद आती है जिससे ईद की महत्ता और भी बढ़ जाती है। ईद प्रोफेट मुहम्मद से जुड़ा हुआ है। तो आइए आज बात करते हैं एक 1923 की छपी किताब की जिसने पूरे विश्व भर में तहलका मचा दिया था। यह किताब मुस्लिमों ही नहीं बल्कि पूरे विश्व भर में लोगों द्वारा पढ़ी व स्वीकारी गयी।

इस पुस्तक का शीर्षक है ‘द प्रोफेट’। यह पुस्तक खलील जिब्रान द्वारा लिखी गयी थी। इस पुस्तक में जीवन से संबंधित 26 कथन और कविताएँ हैं जो कि जीवन के विभिन्न स्तरों को दर्शाती हैं। खलील जिब्रान विश्वक भर के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखकों में से एक हैं। इनकी कविताएँ मनुष्य को जीवन का पाठ पढ़ाने में सक्षम हैं। द प्रोफेट पुस्तक विश्वभर में करीब 50 से ज्यादा भाषाओं में अनुवादित की गयी है। यह पुस्तक कई लाख की संख्या में लोगों द्वारा खरीदी गयी है जो कि इस किताब को दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों की श्रेणी में खड़ा कर देता है।

विश्वद का मशहूर बैंड बीटल्स, कैनेडी और इंदिरा गांधी इस किताब से प्रभावित थे। यह किताब ऐसी प्रतीत होती है जैसे कि यह लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करती हो। जिसका प्रमुख कारण है इसको लिखने का तरीका और शब्दों का उपयुक्त चयन। इस पुस्तक को विभिन्न कार्यों में भी प्रयोग किया जाता है जैसे विवाह, दफनाने के दौरान, राजनैतिक गतिविधियां आदि में। यह किताब 1930 के दशक में पूरी दुनिया के प्रसिद्धि प्राप्त करती है तथा 1960 के पुनः यह किताब अति लोकप्रिय हो जाती है। खलील जिब्रान ने यह दर्शाया है कि एक विद्वान जिसका नाम अल-मुस्तफा है वह जीवन के विभिन्न पड़ावों के विषय में लोगों को प्रवचन देते हैं। यहाँ तक कि जिब्रान ने एक बार अपने सपने में अल मुस्तफा को देखा भी था और उसके बाद उन्होंने उनका चित्र बनाया जो ऊपर दिए गए चित्र में बाईं ओर दर्शाया गया है। भारत भर के विभिन्न पुस्तकालयों में इस पुस्तक की हिन्दी और अन्य प्रतियां उपलब्ध हैं।

1.https://www.bbc.com/news/magazine-17997163
2.https://www.achhikhabar.com/2012/10/15/khalil-gibran-quotes-in-hindi/
3.http://www.booksforyou.co.in/Books/Jeevan-Sandesh-(Hindi-Translation-of-The-Prophet)
4.https://www.scribd.com/doc/51138104/%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A4-The-Prophet-Hind


चलाना सीखिए BHIM और घर बैठे करिए बैंकिंग

Rampur
14-06-2018 06:04 PM

भारत इंटरफेस फॉर मनी (BHIM) एक भुगतान ऐप है जो आपको यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यू.पी.आई.) का उपयोग करके सरल, आसान और त्वरित लेनदेन करने देता है। आप यू.पी.आई. पर किसी भी व्यक्ति की यू.पी.आई. आईडी का उपयोग करके या BHIM ऐप के साथ अपने क्यू.आर. कोड (QR कोड) स्कैन करके लेन-देन कर सकते है। आप यू.पी.आई. की आई.डी. द्वारा ऐप के माध्यम से किसी अन्य व्यक्ति से पैसे का अनुरोध भी कर सकते हैं। भारत के राष्ट्रीय भुगतान निगम (एन.पी.सी.आई.) द्वारा विकसित, BHIM को भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 दिसंबर 2016 को लांच किया था। इसका मुख्य उद्देश्य समाज को डिजिटल रूप से सशक्त करना था।

एन.पी.सी.आई. क्या है – एन.पी.सी.आई. भारत में खुदरा भुगतान और निपटान प्रणाली के संचालन के लिए एक प्रमुख संगठन है। यह भारतीय रिजर्व बैंक (आर.बी.आई.) और भारतीय बैंक संघ (आई.बी.ए.) की भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 के प्रावधानों के तहत एक पहल है। इसका मुख्य लक्ष्य भारत में एक मजबूत भुगतान और निपटान बुनियादी ढांचा बनाना है।

BHIM ऐप का पहली बार इस्तेमाल करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया का पालन करें-

1. अगर आप एंड्राइड फ़ोन का इस्तेमाल करते हैं तो प्ले स्टोर (Play Store) पर जाकर BHIM का ऐप डाउनलोड कीजिये और यदि आप आइ.ओ.एस. (IOS/Apple) का इस्तेमाल करते हैं तो एप्पल ऐप स्टोर से इसे डाउनलोड कीजिये।
2. डाउनलोड होने क बाद ऐप को खोलिए और अपनी भाषा चुनें।
3. भाषा चुनने के बाद जो मोबाइल नंबर आपके बैंक खाते से जुड़ा हुआ है या दर्ज है, उसे चुनें।
4. उसके बाद आपना 4 अंको का ऐप PIN बनायें और उसे हमेशा याद रखें क्यूंकि हर बार अपना भीम ऐप चलाने के लिए आप से यह PIN पूछा जाएगा।
5. आपना बैंक अकाउंट चुनें।
6. आपना UPI पिन बनायें। UPI पिन बनाने के लिए आपके ए.टी.एम./डेबिट कार्ड (ATM/DEBIT CARD) के सामने की तरफ लिखे गए आखरी 6 अंक और एक्सपायरी डेट डालें।
7. इसके बाद आप BHIM ऐप इस्तेमाल करने के लिए तैयार हैं।

पैसे कैसे भेजें या प्राप्त करें -


मोबाइल नंबर या भुगतान पते के माध्यम से दोस्तों, परिवार और ग्राहकों आदि को पैसा भेजें या प्राप्त करें। आई.ऍफ़.एस.सी. (IFSC) या एम.एम.आई.डी. (MMID) का उपयोग कर गैर यू.पी.आई. समर्थित बैंकों को भी पैसा भेजा जा सकता है। यदि आवश्यक हो तो आप अनुरोध भेजकर पैसे वापस भी ले सकते हैं।

1. https://www.bhimupi.org.in/what-we-do


बंटवारे की यादें हैं आज भी जिंदा, सिनेमा के माध्यम से

Rampur
13-06-2018 01:54 PM

सन् 1947 में भारत का विभाजन एक भूकंपीय घटना थी। असंख्य भाषाओं और धर्मों का एक क्षेत्र भारत, अंग्रजी शासन से आजादी हासिल करने के बाद देश में धार्मिक तनाव को कम करने के लिए दो हिस्सों में बांट दिया गया और इस तरह पाकिस्तान का निर्माण हुआ। एक बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ। भारतीय मुसलमानों ने पश्चिम में नव निर्मित पाकिस्तान के लिए नेतृत्व किया और भारतीय हिन्दुओं ने भारत में ही रहना पसन्द किया। दोनों पक्षों ने पैतृक भूमि, जड़ें और सम्पत्ति खो दीं, लेकिन इस सब में एक बहुत बड़ी संख्या में नरसंहार हुआ। खून से लथपथ लाशों के ढेर लग गए।

रामपुर पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा था। कई परिवार बिखर गए, एकदम से कुछ लोग अनजान हो गए। और आज 71 साल बाद वो सारी बातें और यादें पीढ़ी दर पीढ़ी धुंधली होती जा रही हैं। विभाजन के इतिहास की इस विनाशकारी घटना ने सामाजिक विज्ञान, इतिहास, नागरिक शास्त्र, भूगोल और अर्थशास्त्र के सभी पहलुओं को प्रभावित किया और फिल्में इस सामाजिक दुर्दशा को व्यक्त करने का एक शक्तिशाली माध्यम बनीं। आजादी के बाद कई भारतीय फिल्म बनाई गईं जिनकी कहानियां 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन पर आधारित है। दोनों देश एक काले इतिहास के साथ एक-दूसरे से अलग हो गये, जिसका चित्रण कई फिल्मों में किया गया है।

भारतीय सिनेमा में ‘छलिया’ (1960), ‘धर्मपुत्र’ (1961), ‘गर्म हवा’ (1973), ‘तमस’- टीवी मिनी सीरीज़ (1988), ‘सरदार’ (1993), ‘1947 अर्थ’ (1998), ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ (1998), ‘हे राम’ (2000), ‘गदर- एक प्रेम कथा’ (2001), पिंजर (2003), ‘पार्टीशन’ (2007)। क्योंकि भारतीय उपमहाद्वीप को 1947 में विभाजित किया गया था, इसलिए पश्चिम और पूर्व पाकिस्तान के मिलन से गठित राष्ट्र ने बड़ी कठिनाई से फिल्म उद्योग का पुननिर्माण किया। भारत में बम्बई, पूना, कलकत्ता और मद्रास फिल्म निर्माण के मुख्य केन्द्र थे और इसके विपरीत पाकिस्तान में सिर्फ एक लाहौर था। हांलाकि, रुप कुमार शोरी और दलसुख पंचोली नाम के दो प्रमुख स्टूडियो लाहौर में थे, जिनके मालिक हिन्दू थे, लेकिन सम्प्रादायिक दंगों के चलते दोनों स्टूडियो को बंद करना पड़ा और साथ ही साथ शोरी और पंचोली को लाहौर छोड़ना पड़ा और भारत को अपना नया घर बनाने पर मजबूर होना पड़ा। प्राण, ओम प्रकाश और कुलदीप कौर जैसे हिन्दू कलाकार लाहौर में बड़े पैमाने पर काम कर रहे थे, लेकिन दंगों के माहौल के चलते उन्हें भी लाहौर छोड़ना पड़ा और भारत में शरण लेनी पड़ी।

फिल्म लोक के कई हिन्दू कलाकार लाहौर छोड़कर भारत आ गये थे, वहीं दूसरी तरफ बम्बई फिल्म जगत के मुस्लिम कलाकारों ने नए राष्ट्र पाकिस्तान के लिए भारत नहीं छोड़ा। तत्कालीन प्रसिद्ध गायक नूर जहां के लिए अपनी जड़ों की तरफ वापस लौटने का स्वयं का एक व्यक्तिगत निर्णय था। अपने जन्मस्थल ‘कसूर’ को जब उन्होंने पाकिस्तान में पाया, तो उन्होंने वहीं बसने का फैसला किया। निस्संदेह, फिल्म उद्योग की धर्म-निरपेक्ष प्रकृति पहले से ही भारत में अच्छी तरह स्थापित थी, जिसने कई मुस्लिम कलाकारों को यहां बसने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने करियर को फिर से शुरुवात करने की उम्मीद में पाकिस्तान चले गये कई लोग नीचे गिरते चले गये या अपने करियर बचाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे थे। हालांकि उनका उठाया गया यह कदम उनमें से अधिकांश लोगों के लिए काम नहीं कर रहा था। यह केवल चमकता सितारा नूर जहां और अभिनेता-निर्माता-निर्देशक पति-पत्नी की जोड़ी नाजीर और स्वर्णलता थे, जो पाकिस्तान जाने के बाद भी सफलता पा रहे थे। आने वाले वर्षों में पाकिस्तानी फिल्म उद्योग पर शासन करने वाली अधिकांश प्रतिभा संतोष कुमार, सबीहा खानम और मुसरत नाज़ीर जैसे स्वदेशी नवागंतुक या अपरिचित थे, क्योंकि अधिकांश सत्तरूढ़ सितारों, फिल्म निर्माताओं और गीतकारों ने भारत में रहने का फैसला किया था। पाकिस्तान के कुछ प्रमुख प्रवासियों में फिल्म निर्माता - वहीदुद्दीन ज़ियाउद्दीन अहमद, लेखक सआदत हसन मानतो और संगीत निर्देशक गुलाम हैदर और फिरोज़ निज़ामी शामिल थे।

7 अगस्त, 1948 को काफी संघर्ष के बाद पहली पाकिस्तानी फिल्म रिलीज़ हुई थी। दाउद चंद निर्मित ‘तेरी याद’ फिल्म में आशा पॉस्ली और दिलीप कुमार के छोटे भाई नासीर खान ने मुख्य भूमिका निभाई थी।

दुनियाभर में मशहूर शायर मिर्ज़ा असद उल्ला खां गालिब का रामपुर से बहुत गहरा नाता रहा है, भले ही उनकी पैदाइश आगरा की हो। वे रामपुर के दो शासक 1860 में नवाब यूसुफ अली खां और नवाब कल्बे अली खां के शिक्षक रहे थे। जिसके लिए उन्हें सौ रुपये प्रतिमाह वज़ीफ़ा मिलता था। फिल्म जगत की फिल्मों में रामपुरी चाकू का अच्छा-खासा बोलबला है

1. http://lwlies.com/articles/films-about-the-partition-of-india/
2. http://www.amitwrites.com/movies-partition-india-pakistan/
3. https://thewire.in/cinema/partition-films-made-in-pakistan


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