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प्रदेश का प्रमुख करदाता और हालात से मजबूर शहर मेरठ

Meerut
11-03-2018 08:43 AM

मेरठ भारत के उत्तरप्रदेश राज्य का एक जिला है वैसे देखने में यह जिला कई कल कारखानों से भरा दिखाई देता है। यह जिला प्रदुषण के मामले भी काफी अग्रणी है यहाँ की धुल से भरी सड़के, बजबजाती हुयी नालियां, पानी की किल्लत और न जाने क्या-क्या इस जिले को समस्याओं से जूझते हुए शहर के रूप में प्रदर्शित करती हैं। परन्तु यदि यहाँ के आर्थिक आंकड़े पर नज़र डालें तो सामने आने वाले आंकड़े चौका देने योग्य हैं। यह शहर भारत के 10 शीर्ष कर दाता शहरों की फेहरिस्त में 9 वें स्थान पर आता है।

आयकर विभाग द्वारा संकलित आंकड़ों के मुताबिक 2007-08 में मेरठ ने राष्ट्रीय खाते को 10,098 करोड़ रुपए का योगदान दिया था, जिसमें जयपुर, भोपाल, कोच्चि और भुवनेश्वर जैसे बड़े शहर भी शामिल थे। मेरठ शहर राज्य की राजधानी लखनऊ से भी बेहतर था। मुंबई और दिल्ली क्रमशः 114,161 करोड़ रुपये और 46,865 करोड़ रुपये के कर के साथ में शीर्ष पर कब्जा किये हुए थे।

2005-06 में, मेरठ ने पांचवें स्थान पर कब्जा कर लिया था और प्रत्यक्ष कर संग्रह में 10,306 करोड़ रुपये का योगदान दिया था। यह 2006-07 में छः नंबर पर आ गया था, जब राजस्व संग्रह 11,203 करोड़ रुपये था, जो 13,627 करोड़ रुपये के लक्ष्य से 18 फीसदी कम था। पिछले वर्ष में कोई सुधार नहीं हुआ था और इसके साथ ही यह संग्रह 10,098 करोड़ रूपए से अधिक हो गया, लक्ष्य से 28 फीसदी कम है। मेरठ टैक्स ज़ोन में नोएडा और गाजियाबाद शामिल हैं।

उपरोक्त दिए आंकड़ों के अनुसार मेरठ की तुलना यदि अन्य 9 शहरों से की जाये तो यहाँ पर कचरे से लेकर अन्य कई समस्याएं हैं जिनपर ध्यानाकर्षण करने की आवश्यकता है। तथा यदि मेरठ के औद्योगिक विकास पर ध्यान दिया जाये तो यह रोजगार उत्पन्न करने की क्षमता को बढ़ा सकने में सहायक हो सकता है।

1.http://timesofindia.indiatimes.com/India/Meerut_9th_in_top_10_tax-paying_cities/articleshow/3182693.cms
2.http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/38690/
9/11_chapter%205.pdf


क्यूँ होती है फूलों में खुशबू….

Meerut
09-03-2018 02:33 PM

फूल हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा हैं। धार्मिक एवं आध्यात्मिक काम, उत्सव, त्यौहार, सजावट, श्रृंगार, औषधी आदि के लिए हम फूलों का इस्तेमाल करते हैं। फूलों का सबसे महत्वपूर्ण अंग है उनकी प्रसन्नता प्रदान करने वाली खुशबू। हर अलग फूल अलग प्रकार की खुशबू देता है, एक ही गण के फूल भी बहुत बार विभिन्न खुशबू बाँटते हैं। आखिर इस खुशबू के पीछे क्या राज़ छुपा है?

फूलों की खुशबु असल में उनके प्रजनन एवं अलग कार्यों को पूर्ण करने का मार्ग है। फूलों की खुशबु परागण अथवा खाद्य को आकर्षित करने का विकासवादी तंत्र है। विभिन्न फूल अलग-अलग प्रकार की गंध देते हैं, हर प्रकार की गंध का कार्य अलग रहता है। फूल उनके हितेषी परागण को आकर्षित करने के लिए एक विशिष्ट प्रकार की खुशबू फैलाते हैं वो भी समय के हिसाब से, इसीलिए कुछ फूल सुबह सुगंध देते हैं तो कुछ शाम या कुछ रात में और कुछ हर पल, बस उसकी तीव्रता बदलती है। कुछ फूलों के अपने परागण होते हैं जो बस उसी फूल के इर्द-गिर्द मंडराते हैं जैसे ऑर्किड (orchid) इस फूल की खुशबू कम-से-कम 100 रसायनों से बनी होती है तथा इतनी विशिष्ट कि एक और सिर्फ एक ही जाति का कीड़ा इस फूल की एक जाति पर बैठेगा।

फूलों की गंध उनकी पंखुड़ियों से एक रासायनिक तैल के रूप में निकलती है, इन्हें शास्त्रज्ञ उदवायी यौगिक कहते हैं। फूलों में कम से कम 7-10 अथवा ज्यादा से ज्यादा 100 प्रकार के रसायनिक तैल होते हैं। मान्यता है कि इब्न सीना, इस फ़ारस के चिकित्सक ने कुछ 1200 साल पहले गुलाबों से पहली बार इत्र तैयार किया था। परागण फूलों पर बैठते हैं तब उनके पैरों में अथवा उनके शारीर की लव में उस फूल के पराग अटक जाते हैं जो फिर इस तरीके से फूलों के प्रजनन में मदद करते हैं, पराग को एक जगह से दूसरी जगह ले जाकर, मानो जैसे परागन इन फूलों के यातायात के अनोखे साधन हैं।

कुछ फूल मांसाहारी होते हैं जो उनके खाने योग्य कीटकों को आकर्षित करने के लिए सड़े-गले मांस अथवा ऐसी कुछ गन्दी बदबू भरे गंध फैलाते हैं। कुछ फूल उन्हें नुकसान पहुंचाने वाले कीटकों को दूर रखने के लिए उन कीटकों के लिए रोषकारक गंध फैलाते हैं।

यह कारण है कि फूलों में इतनी विभिन्न प्रकार की खुशबू रहती है, कुछ अच्छी कुछ बुरी, प्रकृति की एक अनोखी योजना जो इन्हें सुरक्षित रख सके और प्रजनन में मदद करे।

1. एडवांसेस इन इन्सेक्ट केमिकल इकोलॉजी: एडिटेड- कार्डे रिंग, जोसेलीन मिल्लर https://books.google.co.in/books?id=066fXjl_1wC&pg=PA151&dq=why+do+flowers+smell?&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwjxvqqmdrZAhUT4o8KHccPDjwQ6AEIKDAA#v=onepage&q=why%20do%20flowers%20smell%3F&f=false
2. द हिडन पॉवर ऑफ़ स्मेल: हाउ केमिकल्स इन्फ्लुएंस अवर लाइव्ज़ एंड बिहेविअर- पॉल मूर https://books.google.co.in/books?id=XlJ1CgAAQBAJ&pg=PA49&dq=why+do+flowers+smell?&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwjxvqqmdrZAhUT4o8KHccPDjwQ6AEIMzAC#v=onepage&q=why%20do%20flowers%20smell%3F&f=false
3. http://scienceline.org/2013/01/making-scents-the-aromatic-world-of-flowers/
4. बायोलॉजी ऑफ़ फ्लोरल सेंट-: एडिटेड- नतालिया दुड़ारेवा, एरन पिचरस्की https://books.google.co.in/books?id=wd3mlhZGLAMC&printsec=frontcover&dq=how+do+flowers+produce+scen&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwjq8r_MmdrZAhUDPI8KHeNnCcUQ6AEIKDAA#v=onepage&q=how%20do%2flowers%20produce%20scent&f=false
5. पोलिनेशन बायोलॉजी: बायोडायवर्सिटी कोन्सेर्वेशन एंड एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन- धरम अब्रोल https://books.google.co.in/books?id=clwm8CSIIdIC&pg=PA51&dq=how+do+flowers+produce+scent&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwjq8r_MmdrZAhUDPI8KHeNnCcUQ6AEIPDAE#v=onepage&q=how%20do%20flowers%20produce%20scent&f=false


पत्थर की नक्काशी का समय के साथ विकास

Meerut
08-03-2018 01:22 PM

मानव के प्राकृतिक मित्रों में से धरती और लकड़ी के बाद पत्थर ही आता है। पत्थर मानव के विकास और उपकरण प्रयोग में बढ़ती कुशलता का भी एक प्रतीक हैं। इस काल को मानव की एक बड़ी उपलब्धि पाने के काल के रूप में माना जाता है तथा ऐतिहासिक रूप से इस काल का नाम भी पत्थर के ऊपर ही पड़ा – पाषाण काल।

पत्थर न केवल एक खुदाई का औज़ार था बल्कि मानव ने उसका प्रयोग छुरी, शिकार के लिए भाले की नोक और एक हथियार के रूप में भी किया तथा बाद में पूजा-अर्चना और साज-सज्जा के कार्यों के लिए भी प्रयोग किया। खुदाई में मिले नक्काशीदार पत्थरों को 3,000 वर्ष पुराना माना गया है। यह बात बहुत रोमांचक है कि समय के साथ आयी नयी घरेलू सामग्री को अपनाने के बावजूद भी मनुष्य के जीवन में पत्थर आज भी एक अहम हिस्सा है।

खुदाई में निकले पत्थरों से पता चलता है कि इनका इस्तेमाल कई रूप में किया गया। शुरुआती दौर में पत्थरों का इस्तेमाल तराजू में वज़न की तुलना के लिए किया गया। फिर आये कोल्हू, चक्की, ओखली आदि जिस समय भोजन बनाने की प्रक्रिया और विकसित हो चुकी थी। मिट्टी के मुकाबले पत्थर को हिन्दुओं द्वारा ज़्यादा शुद्ध माना गया और इसलिए पत्थर को रसोई एवं भोजन कक्ष में भी स्थान मिला।

भारत कई भिन्न प्रकार के पत्थरों से समृद्ध है। पत्थर की मूर्तियों को पूजनीय माने जाने के कारण मानव के मस्तिक्ष पर भी इसका काफी प्रभाव पड़ा। पत्थर से जुड़ी एक आकर्षक कथा यह भी है कि एक समय तक पत्थर एवं पर्वतों को पंछियों की भाँती पर लगे थे अतः वे जहाँ चाहे उड़ सकते थे परन्तु इस बात से धरती माँ ने परेशान होकर इंद्र से अपने बचाव का आग्रह किया इसलिए इंद्र ने उनके पर काट दिए और तबसे वे एक स्थान पर ही रहे।

पत्थर का काम करना एक ऐसी कला है जहाँ कारीगर को बहुत कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं क्योंकि यह प्रक्रिया उत्खनन की प्रक्रिया से शुरू होती है और तकनीकी विकास के साथ भी उसमें ज़्यादा बदलाव नहीं आ पाए हैं। साथ ही नक्काशी के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले औज़ार भी काफी महंगे होते हैं इसलिए सब कारीगर कुछ छोटे औज़ार खरीदते हैं और आपस में मिल बाँट के प्रयोग करते हैं। परिश्रम इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि पत्थर निकालने के लिए कारीगर को धरती की गहराई तक जाना पड़ता है क्योंकि सतह का पत्थर नक्काशी के लिए काफी नाज़ुक होता है। पत्थर को निकालने के लिए कम से कम 2 से 5 व्यक्ति लगते हैं।

भारत में पत्थर के स्मारक काफी सामान्य रूप से पाए जाते हैं। ये इमारतें अपनी सुन्दर वास्तुकला और मूर्तिकला के साथ बनी भव्य संरचनाएं हैं। ज़ाहिर है कि पत्थर की नक्काशी आज काफी घट गयी है क्योंकि आज आलीशान महलों या मंदिरों का निर्माण बहुत ही कम देखने को मिलता है। परन्तु यह कला आज भी जीवित है और आवश्यकता के समय पत्थर के नक्काशों को नियुक्त करने पर अत्यधिक सुन्दर एवं संतुष्ट करने वाला काम प्राप्त होता है। परन्तु व्यवसाय के रूप में पत्थर की नक्काशी आज कम ही की जाती है।

1. हैंडीक्राफ्ट्स ऑफ़ इंडिया, कमलादेवी चट्टोपाध्याय


मृद्भांड और धर्म का सम्बन्ध

Meerut
07-03-2018 11:26 AM

मेरठ भारत का एक अत्यंत प्राचीन शहर माना जाता है। तथा धार्मिक रूप से भी मेरठ एक बहुत प्रभावशाली शहर है। मेरठ में शुरुआत से किये जाने वाले व्यवसायों में से एक है मृद्भांड निर्माण का व्यवसाय। तो चलिए आज बात करते हैं मृद्भांड और धर्म के अटूट सम्बन्ध की। मृद्भांड को अपनी अनूठी विशेषताओं के कारण विश्व भर में सबसे ख़ास प्रकार का हस्तशिल्प माना जाता है। परन्तु धर्म के साथ मृद्भांड का सम्बन्ध उसे एक गहरा महत्त्व प्रदान करता है। मिट्टी के बर्तनों से कई धार्मिक कहानियाँ जुड़ी हैं जिनमें से कुछ आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं।

मृद्भांड के मूल को स्पष्ट करते हुए एक काफी रंगीन उपाख्यान है जो बताता है कि जब देवताओं ने अमृत बनाने के लिए समुद्र को मथा, तब उन्हें उस अमृत को इकठ्ठा करके रखने के लिए एक बर्तन की आवश्यकता पड़ी। इसलिए शिल्पकार रुपी भगवान विश्वकर्मा ने मिट्टी के एक घड़े का निर्माण किया। उस समय से लेकर आज तक पानी से भरा मिट्टी का घड़ा एक अच्छे शगुन का प्रतीक है तथा उसके बिना कोई भी धार्मिक क्रिया सम्पूर्ण नहीं होती। यदि पूजा अर्चना के समय ईश्वर की कोई मूर्ती उपलब्ध ना हो, तब भी यह पानी से भरा घड़ा इस कर्तव्य को पूरा करता है और इसीलिए इसे ‘मंगलघट’ भी कहा जाता है जिसका सरल अनुवाद हुआ अच्छा शगुन।

कई प्रकार की मिट्टी से बनी वस्तुएं धार्मिक क्रियाओं में प्रयोग होती हैं जैसे दीये, फूलदान, संगीत वाद्ययंत्र आदि। एक सामान्य मृद्भांड बिलकुल साधारण होता है। अतः भारत में बिना किसी दिखावे के मृद्भांड की दिव्यता को बरक़रार रखने में विश्वास रखा जाता है। मृद्भांड की दिव्यता को दर्शाता हुआ एक और उपाख्यान है जो इसका इश्वर के साथ सम्बन्ध स्पष्ट करता है। कहते हैं कि जब भगवान शिव माँ पारवती से विवाह के लिए तैयार हो रहे थे तब उन्होंने देखा कि उनके पास संस्कार-सम्बन्धी पानी का घड़ा नहीं था। यह देख वे निराश हो गए। इस कारण उन्होंने एक मनके से एक मनुष्य का सृजन किया और उससे घड़ा बनाने के लिए कहा। वह मनुष्य कुछ मांग पूरी होने पर घड़े का निर्माण करने को तैयार हो गया। उसकी मांगें थी – शिव के बैठने वाला गोलाकार पत्थर जिसे वह अपने पहिये की तरह इस्तेमाल करे, उनकी ओखली जिससे वह पहिये को घुमाता रहे, उनका सिलबट्टा जिसमें वह पानी रखे, और शिव की माला से एक धागा जिसकी मदद से वह घड़े को पहिये से अलग करे।

इन सभी चीज़ों की मदद से वह मनुष्य कुम्भ का निर्माण करता है जिस वजह से मृद्भांड के निर्माता को कुम्हार का नाम मिला। इस कारण कई कुम्हार परंपरागत रूप से अपने विधाता के सम्मान में हर सवेरे एक दीया जलाते हैं।

1. हैंडीक्राफ्ट्स ऑफ़ इंडिया, कमलादेवी चट्टोपाध्याय


मेरठ का कवक जगत

Meerut
06-03-2018 11:47 AM

आधुनिक वर्गीकरण प्रणाली के पिता कार्ल लिन्नेयस ने प्रकृति को पादप और जंतुजगत में वर्गीकृत किया था। कवक उसमें से पादप में गिने जाते थे लेकिन आगे चलकर व्हिटेकर नाम के शास्त्रज्ञ ने जीव जगत को पांच जगत प्रणाली में बांटा जिसमें से एक कवक जगत भी था।

कवक अथवा फफूंद जीवों का एक विशाल समुदाय है जो ससीमकेंद्रकी (युकार्योटिक: Eukaryotic) जीव समूह में शामिल हैं। इनमें बहुतायता से परजीवी तथा मृत पदार्थों पर भोजन के लिए निर्भर होने वाले जीव शामिल हैं क्योंकि इनमें पर्णहरित नहीं होता। इनकी कोशिका भित्ति में मिलने वाले काईटीन की वजह से इन्हें अलग जगत में वर्गीकृत किया गया क्यूंकि आम तौर पर पादप जगत के जीवों की कोशिका भित्ति सेल्यूलोस की बनी होती है। इनमें ख़मीर, फफूंद एवं कुकुरमुत्ता और उनके प्रकार शामिल हैं। इनकी काय सरंचना बहुकोशिक अथवा अदृढ़ ऊतक होती है तथा इनके कोशिकाओं में केन्द्रक झिल्ली उपस्थित होती है। बहुत बार फफूंद सेहत के लिए घातक होते हैं लेकिन इनका सही इस्तेमाल करने पर ये उपयोगी भी साबित होते हैं।

ख़मीर का इस्तेमाल किण्वन प्रक्रिया में पावरोटी बनाने के लिए होता है तथा कुकुरमुत्ते के कुछ प्रकार खाने के लिए भी इस्तेमाल होते हैं। कुकुरमुत्ता विटामिन बी एवं ड का एक अच्छा स्त्रोत है तथा इसमें 92% पानी एवं सिर्फ 1% मेद होता है। कुकुरमुत्ते जागतिक स्तर पर बहुत से परम्परागत पाककला का हिस्सा है तथा उसके कुछ मनोसक्रिय प्रकार देशी धार्मिक तथा अलौकिक अनुष्ठानों में भी इस्तेमाल किये जाते हैं। कुकुरमुत्ते की जग भर में बहुत मांग होती है।

मेरठ के कृषि विज्ञानं केंद्र और मेरठ की राज्य सरकार कुकुरमुत्ते की खेती के लिए किसानों को बढ़ावा दे रही है। इसकी कृषि कोई भी कर सकता है तथा इसके लिए ना ज्यादा पैसा लगता है और ना ही ज्यादा जगह, घर के पीछे या किसी कोने में भी आप इसकी कृषि कर सकते हैं और इससे कमाई भी काफी अच्छी होती है। सरकार द्वारा कुकुरमुत्ते की खेती करने के लिए आर्थिक मदद भी मिलती है।

1. मेरठ सी डेप 2007
2. जीवजगत का वर्गीकरण, एनसीईआरटी https://biologyaipmt.files.wordpress.com/2016/06/ch-23.pdf
3. रिफ्रेशर कोर्स इन बॉटनी: सी एल सॉवह्ने
4. https://hi.wikipedia.org/wiki/फफूंद
5. http://meerut.kvk4.in/collaboration.html


गिद्ध- रामायण के जटायु से लेकर अब तक

Meerut
05-03-2018 11:53 AM

जब रावण सीता को हरण कर ले जा रहा था तब जटायु नामक गिद्ध ने उसे रोकने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। रावण ने उसके पर काट दिए जिससे वो जमीन पर आ गिरा, मरते मरते उसने प्रभु श्री राम को रावण द्वारा किये सीता हरण के बारे में बताया। प्रभु राम ने जटायु को अपने सीने से लगाया और उसी वक़्त जटायु को स्वर्ग प्राप्ति हुई।

इस जटायु को भले ही भगवान राम ने सीने से लगाया हो परन्तु इंसान आज भी इसके वंशजों को घृणा की दृष्टि से देखता है। इसकी सूरत, खान पान की आदतें एवं इसके बदन से आती दुर्गन्ध की वजह से इस पक्षी को अशुभ माना जाता है। अगर वे घर आदि पर बैठे दिख गए तो उस घर को त्याग दिया जाता है अथवा उसकी पूजा पाठ द्वारा शुद्धि की जाती है।

गिद्ध ज्यादातर खुले क्षेत्र में, जैसे शमशान, जहाँ इंसान अथवा पशु-पक्षी के शव हों वहाँ दिखते हैं क्यूंकि यह इनका मुख्य अन्न है। गिद्ध की दृष्टी बड़ी पैनी होती है तथा सूंघने की शक्ति भी काफी तीक्ष्ण होती है। इसकी वजह से वे बहुत ऊपर से और दूर से ही मुर्दों को ढूंढ लेते हैं। गिद्ध मेहतर प्रजाति का पक्षी है जो पृथ्वी पर संतुलन और स्वच्छता बनाए रखने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह मुर्दाखोर अगर ऐसा आहार ना करे तो दुर्गंधमय और सड़े गले मुर्दे की वजह से सब जगह भयंकर रोग-महामारी आदि फैल जायेगी। गोबर-गिद्ध उपजाति मुर्दा नहीं खाते बल्कि मल-मूत्र का भक्षण करते हैं।

भारतीय गिद्ध का वैज्ञानिक नाम जिप्स इंडिकस (लैटिन: Gyps Indicus) है। यह जंतु जगत के रज्जुकी संघ से है तथा इसका गण फ़ैल्कनीफ़ॉर्मीस ( लैटिन: Falconiformes) है। भारत में गिद्ध की कई उपजातियां पायी जाती हैं जैसे राजगिद्ध, चमर-गिद्ध, गोबर-गिद्ध आदि। उत्तर भारत में सिर्फ जाड़ों में एक ख़ास प्रकार का गिद्ध पाया जाता है जो राख जैसे भूरे रंग का होता है और जिसका कद बड़ा होता है। यह मजबूत पंखो वाला दीर्घायु पक्षी जाड़ों में घोसला बनाकर अंडे देता है। प्रजनन की अवस्था में गिद्ध 5 वर्ष में आते हैं और एक बार में सिर्फ एक या दो अंडे ही देते हैं। अगर परभक्षी इनके अंडे खा लें तो यह अगले साल अंडे नहीं देते, ये भी इनकी संख्या कम होने का एक कारण है। राजगिद्ध जोड़ा बांध कर रहता है लेकिन बाकी सब गोल बांधकर रहते हैं।

भारतीय गिद्ध गंजे सर वाला होता है जिसकी पूंछ बहुत छोटी होती है और पंख बहुत चौड़े। यह गिद्ध और उसकी उपजातियां पहले पूरे भारत भर में देखने को मिलती थी लेकिन आज शायद ही कहीं देखे जाते हैं क्यूंकि यह विलुप्तता की कगार पर पहुँच गए हैं। कुछ सालों पहले किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार गिद्ध के शिकार पशु आदि के शव में मिलने वाली डाइक्लोफिनॅक (diclofenac) दवा की वजह से उनके गुर्दे बंद हो जाते हैं और वे मर जाते हैं। अब इस दवाई पर रोक लगा दी गयी है तथा गिद्ध का प्रजनन बढ़ाने के लिए कोशिश की जा रही है। आशा है कि आने वाले कुछ सालों में इनकी संख्या में इजाफा होगा।

मेरठ में जहाँ कभी सफ़ेद गिद्ध, लाल सिर वाला गिद्ध, भारतीय गिद्ध, बंगाल का गिद्ध आदि उपजातियां दिखती थीं आज वो पूरी तरह से विलुप्त हो चुकी हैं।

1. भारत के पक्षी: राजेश्वर प्रसाद नारायण सिंह
2. https://hi.wikipedia.org/wiki/भारतीय_गिद्ध
3. अविफौना ऑफ़ सीसीएस यूनिवर्सिटी कैंपस, मेरठ, उत्तर प्रदेश: निशा राणा, रोहित पांडे और संजय भारद्वाज, 2013
4. अ पिक्टोरिअल गाइड टू द बर्ड्स ऑफ़ द इंडियन सबकॉनटीनेंट: सलीम अली और एस. डीलन रिप्ले
5. http://avibase.bsc-eoc.org/checklist.jsp?region=INggupme&list=howardmoore


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