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रामायण की उर्मिला पर केंद्रित कविता साकेत

Meerut
20-09-2018 04:54 PM

भारतीय समाज के भूत, वर्तमान और भविष्‍य की छवि को अपनी कल्‍पना शक्ति के माध्‍यम से श्री मैथिलीशरण गुप्‍त ने समाज के मध्‍य प्रस्‍तुत किया। जिसने आम जनमानस के मध्‍य देशभक्ति की भावना को तीव्रता से जागृत किया अर्थात स्‍वतंत्रता के लिए उत्‍तेजित किया। इनकी प्रसिद्ध रचनाओं में से एक थी साकेत, जिसने रामायण के उस पात्र की ओर लोगों का ध्‍यान आकर्षित किया जिसे शायद आज तक अन्‍य लेखकों द्वारा गौण रखा जाता था।

1932 में लिखी गई साकेत राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की वह अमर रचना है, जो उनकी व्यक्तिगत भक्ति के साथ-साथ पात्रों के भावनात्मक चरित्र को उनकी अंतर्दृष्टिपूर्ण समझ के साथ प्रभावित करती है।

यह कविता रामकथा पर आधारित है, यद्यपि 'साकेत' में राम, लक्ष्मण और सीता के वन गमन का मार्मिक चित्रण है, किन्तु इसका केन्द्र लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला है। लगभग सभी लेखकों द्वारा रामायण में, इनका सिर्फ सांकेतिक वर्णन ही किया गया है। लेकिन इस रचना में उर्मिला के विरह का जो चित्रण गुप्त जी ने प्रस्तुत किया है, वह अत्यधिक मार्मिक और गहरी मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं से ओत-प्रोत है। राम के साथ सीता तो वन चली जाती हैं, परन्तु उर्मिला लक्ष्मण के साथ वन नहीं जा पाती है। तभी वह अपने मन-मंदिर में अपने पति की प्रतिमा स्थापित करके उर्मिला विरह की अग्नि में जलते हुए खुद आरती की ज्योति बन गईं। आँखों में प्रिय की मूर्ति बसाकर सभी मोह-माया को त्याग कर उनका जीवन एक योगी के जीवन से भी ज्यादा कठिन और कष्टदायक हो जाता है। दिन-रात स्वामी के ध्यान में डूबने के कारण वे स्वयं को भी भूल गईं। इस कारण उनके मन में विरह की जो पीड़ा निरंतर प्रवाहित होती है, उसका एक करुण चित्रण राष्ट्रकवि ने किया है, वैसा चित्रण अत्यंत दुर्लभ है।

“प्राण न पागल हो तुम यों, पृथ्वी पर वह प्रेम कहाँ..
मोहमयी छलना भर है, भटको न अहो अब और यहाँ..
ऊपर को निरखो अब तो बस मिलता है चिरमेल वहाँ..
स्वर्ग वहीं, अपवर्ग वहीं, सुखसर्ग वहीं, निजवर्ग जहाँ..”

इन करूण पंक्तियों को पढ़कर, पाठक की आंखें बरबस ही नम हो जाती हैं साथ ही कवि की अतुलनीय लेखन क्षमता के प्रति सम्‍मान की भावना जागृत हो उठती है। गुप्त जी को उर्मिला के प्रति सहानुभूति है, परन्तु यह सहानुभूति किसी नारीवादी आन्दोलन के कारण नहीं बल्कि एक वैष्णव कवि की सहज और स्वाभाविक अनुभूति का परिणाम है।

साकेत में भारतीय आज़ादी से 15 साल पूर्व ही इसकी आज़ादी की भविष्यवाणी दी गयी थी। उस समय तक देश महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन कर रहा था। एक कवि के रूप में गुप्त ने गांधी के विचारों को व्यक्त किया। गांधी जी ने एक स्वतंत्र भारत के लिए अपने सपने के रूप में लगातार ‘राम राज्य’ या राम के शासन की अवधारणा को व्‍यक्‍त किया था। इस राजनीतिक संदर्भ के प्रकाश में साकेत को समझना ज़रूरी है।

संदर्भ:
1.https://dukespace.lib.duke.edu/dspace/bitstream/handle/10161/16612/Shivam%20Dave_AMES%20Honors%20ThesisNumbered.pdf?sequence=1
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Maithili_Sharan_Gupt

http://prarang.in/Meerut/1809201851





बौद्ध धर्म के अनुयायियों की भिन्न पहचान

Meerut
19-09-2018 04:08 PM

भगवान बुद्ध के बाद बौद्धों में मतभेद उभरकर सामने आने लगे थे। द्वितीय बौद्ध परिषद के दौरान थेरवाद भिक्षुओं से मतभेद रखने वाले भिक्षुओं को संघ से बाहर निकाल दिया। अलग हुए इन भिक्षुओं ने उसी समय अपना अलग संघ बनाकर स्वयं को 'महासांघिक' और जिन्होंने निकाला था उन्हें 'हीनसांघिक' नाम दिया जिसने कालांतर में महायान और हीनयान का रूप धारण कर लिया। बौद्ध धर्म मूल रूप से पाली में पढ़ाया जाता था, जो कि उस समय के लोगों की भाषा थी। हीनयान (इसे थेरवाद, स्थिरवाद भी कहते हैं) भी पाली भाषा में लिपिबद्ध किया गया था और लगभग 3-4 शताब्दियों के बाद संस्कृत लिपि के प्रभाव के चलते महायान संस्कृत में लिपिबद्ध किया गया था। आइये इन दोनों धार्मिक ग्रंथों में कुछ भिन्नताओं को जानते हैं।

बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और महान दर्शन है। ईसा पूर्व 6ठी शताब्दी में गौतम बुद्ध द्वारा बौद्ध धर्म की स्थापना हुई है। इस धर्म को बचाए रखने और इसका संचालन करने के लिए, कुछ प्रमुख संन्यासी या गुरू तथा अनुयायी होते हैं। जिन्‍हें प्रायः भिक्षु, बोधिसत्व, बुद्ध, अरहंत, देव आदि कहा जाता है। चलिए एक नज़र डालें इनके मध्य अंतर में:

बुद्ध:
बुद्ध एक पूरी तरह आत्मनिर्भर व्यक्ति है (बिना किसी अन्य बुद्ध की प्रत्यक्ष या परोक्ष मदद से)।

बोधिसत्व (थेरवाद में):
ज्ञान के रास्ते पर जा रहा व्याक्ति बोधिसत्व है। बौद्ध धर्म में, बोधिसत्व सत्त्व के लिए प्रबुद्ध (शिक्षा दिये हुये) को कहते हैं।

बोधिसत्व (महायान में):
एक जागृत व्यक्ति, जिसने दूसरों के लिए संसार में अनिश्चित काल तक सेवा करने की कसम खाई है। पारम्परिक रूप से महान दया से प्रेरित, बोधिचित्त जनित, सभी संवेदनशील प्राणियों के लाभ के लिए सहज इच्छा से बुद्धत्व प्राप्त करने वाले को बोधिसत्व माना जाता है।

अरहंत (थेरवाद में):
एक पूरी तरह से प्रबुद्ध व्यक्ति को कहा जाता है। अरहंत ‘संपूर्ण मनुष्य’ को कहते हैं जिसने अस्तित्व की यथार्थ प्रकृति का अंतर्ज्ञान प्राप्त कर लिया हो और जिसे निर्वाण की प्राप्ति हो चुकी हो।

अरहंत (महायान में):
वह व्यक्ति है जिसने स्वयं के लिए शांति (ज्ञान का) प्राप्त किया है, लेकिन दूसरों के लिए इसे देने को तैयार नहीं है।

देव:
ये मानव आंखों के लिए अदृश्य दिव्य प्राणी होते हैं जिन्होंने अतीत में अच्छे कर्म किए हैं और परिणामस्वरूप स्वर्ग में पैदा हुए हैं। वे आमतौर पर एक लंबे जीवन काल का आनंद लेते हैं। मनुष्यों के विपरीत, वे बीमार नहीं मरते।

भिक्खु:
बौद्ध संन्यासियों या गुरूओं को भिक्षु (संस्कृत) या भिक्खु (पाली) कहते हैं। ये अपना जीवनयापन ‘दान या भिक्षा’ पर करते हैं।

संदर्भ:
1.https://www.quora.com/What-is-the-difference-between-Mahayana-Hinayana-and-Theravada-Buddhism
2.https://buddhism.stackexchange.com/questions/3057/buddhas-vs-bodhisattvas-vs-arhats-vs-devas-vs-brahmas
3.https://en.wikipedia.org/wiki/Arhat
4.https://en.wikipedia.org/wiki/Bhikkhu
5.https://dharmawheel.net/viewtopic.php?t=14816
6.https://www.buddhanet.net/e-learning/snapshot02.htm
7.https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8
8.https://en.wikipedia.org/wiki/Paritta
9.https://goo.gl/QEbXco
10.https://goo.gl/M5GxPT

http://prarang.in/Meerut/1809191846





दिव्यांगता बाधा नहीं, एक अवसर है खुद को अलग साबित करने का

Meerut
18-09-2018 02:58 PM

आमतौर पर भारत में दिव्यांगों के प्रति दो तरह की धारणाएं देखने को मिलती हैं। पहली कि जो व्यक्ति दिव्यांग है उसने कोई बुरे कर्म किए होंगे तो वह उनकी सज़ा झेल रहा है या उनका जन्म ही कठिनाइयों को सहने के लिए हुआ है। उल्लेख करने की ज़रूरत नहीं है कि ये बातें काफी मूर्खता भरी हैं। लेकिन आज जन जागरूकता में वृद्धि और शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण में सुधार के कारण समाज के लोगों की सोच में काफी परिर्वतन हुआ है। आइए आपको बताते हैं कुछ ऐसे दिव्यांगों के बारे में जो अपनी काबिलियत से समाज में कई दिव्यांगों और समाजिक लोगों के समक्ष एक प्रेरणा का स्रोत बने हैं।

हम में से अधिकांश लोगों ने मशहूर ‘हेलेन केलर’ का नाम सुना होगा। यह पहली महिला थी जिसने दृष्टिहीनता एवं बधिरता जैसी दोहरी दिव्यांगता के बावजूद न केवल अपना जीवन सफल बनाया, बल्कि अपने जैसे लाखों लोगों के लिए भी कार्य कर उनके लिए प्रेरक मिसाल बनीं। इन्होंने दृष्टिहीन एंव बधिर होने के बावजूद लेखक, कार्यकर्ता, व्याख्याता, शांतिवादी, कट्टरपंथी समाजवादी, और जन्म नियंत्रण समर्थकता जैसे क्षेत्रों में अद्भुत मिसाल कायम की जो किसी साधारण व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। वह 22 वर्ष की उम्र में अपनी जीवनी "द स्टोरी ऑफ माई लाइफ" लिखने वाली पहली दृष्टिहीन एंव बधिर व्यक्ति थीं। 1953 में हेलेन केलर भारत आईं, तब उन्होंने प्रधान मंत्री नेहरू, डा. राधा कृष्णन और दिल्ली के नेत्रहीन नागरिकों से मुलाकात की और उन लोगों को प्रेरणादायक भाषण भी दिया।

वहीं महाराष्ट्र के एक गांव में रह रही रीमा प्रजापति की दो बेटियां (ज्योति और आरती) सुन नहीं सकती। रीमा को आपनी बेटियों को पढ़ाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। अपनी दोनो बेटियों को शिक्षा प्रदान करने के लिए वह मुंबई भी चली गईं क्योंकि भारत में दिव्यांगों के लिए सिर्फ 388 विद्यालय हैं।

नई दिल्ली में मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के शोध के अनुसार, लगभग 6.3 प्रतिशत आबादी में सुनने में कुछ ना कुछ समस्या देखने को मिलती है।

विभिन्न भाषाओं वाले देश भारत ने एक आधिकारिक, मानकीकृत साइन लैंग्वेज (Sign Language) को अपनाने के लिए काफी संघर्ष किए हैं, जैसे 1960 के दशक में अमेरिका ने अमरीकी साइन लैंग्वेज (ए.एस.एल.) को अपनाने के लिए किए थे। भाषाओँ का गढ़ होने के कारण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में साइन लैंग्वेजों में काफी भिन्नताएं हैं। जैसे भारत-पाकिस्तानी साइन लैंग्वेज (आई.पी.एस.एल.) को दक्षिण एशिया में इस्तेमाल किया जाने वाला प्रमुख प्रकार माना जाता है तथा भारतीय साइन लैंग्वेज के कई प्रकार हैं जैसे, दिल्ली साइन लैंग्वेज, बॉम्बे साइन लैंग्वेज, कलकत्ता साइन लैंग्वेज, और बैंगलोर-मद्रास साइन लैंग्वेज आदि और इन सबकी अपनी विशिष्ट वाक्य रचना और व्याकरण हैं।

आज भारत में राष्ट्रीय, राज्य और क्षेत्रीय स्तर पर बधिरों के लिए कई महत्वपूर्ण संगठन हैं। लेकिन भारत में केवल 2% बधिर बच्चे स्कूल जाते हैं। यह समूह हर सितंबर में बधिरों के वार्षिक दिवस जैसे अभियानों और महत्वपूर्ण सेवाओं का आयोजन करते हैं।

कुछ प्रमुख संगठन :-
• नेशनल एसोसिएशन ऑफ़ दी डेफ (नई दिल्ली)
• अली यवार जंग नेशनल इंस्टीटूशन फॉर द हियरिंग हैंडीकैप्ड (मुंबई)
• आल इंडिया फेडरेशन ऑफ़ दी डेफ (नई दिल्ली)
• बिहार एसोसिएशन ऑफ द डेफ (पटना)
• डेफ कैन एसोसिएशन (भोपाल)
• दिल्ली एसोसिएशन ऑफ द डेफ (नई दिल्ली)
• दिल्ली फाउंडेशन फॉर डेफ वूमेन (नई दिल्ली)
• वेस्ट बंगाल सोसायटी फॉर द डेफ (कोलकाता)
• मद्रास एसोसिएशन ऑफ द डेफ (चेन्नई)
• तमिलनाडु स्टेट फेडरेशन ऑफ़ द डेफ (चेन्नई)
• आल इंडिया स्पोर्ट्स कॉउन्सिल ऑफ़ द डेफ (नई दिल्ली)

कुछ प्रमुख शैक्षणिक संस्थाएं :-
• सोसाइटी फॉर द एजुकेशन ऑफ़ द डेफ एंड ब्लाइंड (आंध्र प्रदेश)
• वेलफेयर सेंटर फॉर हियरिंग एंड स्पीच हैंडीकैप्ड (हरियाणा)
• सेंट्रल सोसाइटी फॉर द एजुकेशन ऑफ़ द डेफ (महाराष्ट्र)
• एजुकेशन ऑडियोलॉजी एंड रिसर्च सोसाइटी (महाराष्ट्र)
• ओरल एजुकेशन फॉर द हियरिंग इम्पेएरड (महाराष्ट्र)
• बाधित बाल विकास केंद्र (राजस्थान)

क्या आप जानते हैं, विकलांग व्यक्तियों की सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश (15.5%) राज्य में है। वहीँ महाराष्ट्र में 11.05%, बिहार में 8.69%, आंध्र प्रदेश में 8.45% और पश्चिम बंगाल में 7.52% व्यक्ति विकलांग हैं। उत्तर प्रदेश राज्य विकलांग बच्चों की संख्या (0-6 साल) में सबसे आगे है।

भारत में अक्षम आबादी पर एक नज़र डालें:

संदर्भ-
1.https://www.verywellhealth.com/deaf-community-india-1048923
2.https://www.npr.org/sections/goatsandsoda/2018/01/14/575921716/a-mom-fights-to-get-an-education-for-her-deaf-daughters
3.http://www.playrific.com/z/20548
4.http://www.playrific.com/m/20548/helen-keller-visits-india
5.https://www.indiatoday.in/education-today/gk-current-affairs/story/helen-keller-lesser-known-facts-11692-2016-06-27
6.http://mospi.nic.in/sites/default/files/publication_reports/Disabled_persons_in_India_2016.pdf

http://prarang.in/Meerut/1809181842





मक्‍के का भी इस्तेमाल हो सकता है औषधि के रूप में

Meerut
17-09-2018 02:47 PM

‘मक्‍के दी रोटी और सरसों दा साग’ पंजाब में काफी प्रसिद्ध है। यह मक्‍का मात्र स्‍वाद में ही नहीं वरन् स्‍वास्‍थ्‍य लाभ की दृष्टि से भी अत्‍यंत उपयोगी है। मोटे अनाज के रूप में मक्‍के (रोटी, पोपकॉर्न, भुट्टा, उबले हुए मक्‍के के रस) का उपभोग लगभग संपूर्ण भारत में किया जाता है। चलिए जानें इसके प्रमुख स्‍वास्‍थ्‍य लाभ के बारे में।

मकई के स्वास्थ्य लाभ-

1. भुट्टे में पाए जाने वाले फ़ास्फ़रोस (Phosphorous), मैग्नीशियम (Magnesium), मैंगनीज (Manganese), जिंक (Zinc), आयरन (Iron), कॉपर (Copper) आदि शरीर के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व प्रदान करते हैं।

2. यह कम रक्तचाप की समस्या और मधुमेह जैसी बीमारी से रोकथाम के लिए भी प्रयोग किया जाता है।

3. यह गर्भवती महिलाओं के लिए भी अत्यंत लाभदायक है, इसलिये गर्भवती महिलाओं को इसे अपने आहार में ज़रुर शामिल करना चाहिये। इसमें फोलिक एसिड (Folic Acid) पाया जाता है, जिसकी कमी से होने वाला बच्चा कम वजन का हो सकता है और कई अन्य बीमारियों से पीड़ित भी।

4. इसका प्रयोग वज़न बढ़ाने के लिए भी किया जाता है क्योंकि 100 ग्राम मकई में लगभग 342 कैलोरी पाई जाती हैं|

5. कॉर्नेल विश्वविद्यालय में किए गए अध्ययनों के अनुसार, मकई एंटीऑक्सीडेंट (Antioxidant) का एक समृद्ध स्रोत है जो कैंसर पैदा करने वाले मुक्त कणों से लड़ता है। बैंगनी मक्का में पाए जाने वाले एंथोसायनिन (Anthocyanin), कैंसर पैदा करने वाले मुक्त कणों के शिकारी के रूप में कार्य करते हैं।

6. मकई विटामिन की कमी से होने वाले एनीमिया को रोकने में मदद करता है। 7. पीला मक्का बीटा कैरोटीन (Beta-Carotene) का एक समृद्ध स्रोत है, जो शरीर में विटामिन ए (Vitamin A) बनाता है और अच्छी दृष्टि और त्वचा के रखरखाव के लिए आवश्यक है।

इसको विभिन्न भाषाओं में विभिन्न नामों से जाना जाता है:

तेलुगु – मोक्‍का जान्ना
तमिल – मक्‍का चोलम
मलयालम – चोलम
कन्‍नड़ – मेक्केजोला
गुजराती – मक्‍करी
मराठी – मका
बंगाली – जानर
असमी – गोम्धन
उड़िया – बूटा
संस्कृत – यावानाला
सिन्धी – मकई

मकई में फैटी एसिड की बड़ी मात्रा होती है, इसलिए उन लोगों के लिए इसका अधिक सेवन काफी खतरनाक साबित हो सकता है जो पहले से ही हृदय रोगों से ग्रस्त हैं। यह ज्यादा मोटापे का कारण भी बन सकता है, इसलिए इसका कम मात्रा में उपयोग किजिए। साथ ही इसका ज्यादा सेवन आपके रक्त शर्करा के स्तर पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। इसलिए इसका उचित मात्रा में उपयोग ही लाभदायक होता है।

संदर्भ:
1. अंग्रेज़ी पुस्तक: Kurian, J. C. (1995) Plants that Heal, Oriental Watchman Publishing House
2. https://www.botanical-online.com/english/maize_medicinal_properties.htm
3. https://www.organicfacts.net/health-benefits/cereal/health-benefits-of-corn.html

http://prarang.in/Meerut/1809171837





महाभारत पर आधारित थी ये 1929 की फिल्म

Meerut
16-09-2018 01:51 PM

महान लोग हमेशा वे नहीं होते जो व्यवस्था और तंत्र के विरूद्ध जाते हैं तथा बाकी सबके लिए पथ बनाते हैं, कई बार वे ऐसे भी लोग होते हैं जो अपने पीछे एक छाप छोड़ जाते हैं जो समय के साथ धुंधली तो हो जाती है पर उसका प्रभाव आम हो जाता है। उन्हीं में से एक थे जर्मनी के फ्रान्ज़ ऑस्टेन। उनके द्वारा किया गया भिन्न संस्कृतियों का जोड़ आज दुनिया भुला चुकी है परन्तु आपको ये भी बता दें कि उनके बिना भारत का सिनेमा जगत वर्तमान स्थिति से बिलकुल अलग हो सकता था।

सही मायने में फ्रान्ज़ हिंदी फिल्मों के खोजकर्ता थे जिन्होंने सन 1940, 1950 और कुछ हद तक 1960 की सबसे बड़ी और मशहूर फ़िल्में निर्मित की थीं। सन 1924 में फ्रान्ज़ एक लन्दन में रहने वाले भारतीय वकील से मिले जिनका नाम था हिमांशु राय। उस समय राय फ्रान्ज़ की जन्मभूमि म्युनिक आये हुए थे। उनके म्युनिक आने का लक्ष्य था विश्व के धर्मों पर आधारित अपनी फिल्मों की एक श्रृंखला के लिए कुछ साथी ढूंढना और वहाँ उन्होंने साथी के रूप में हाथ मिलाया फ्रान्ज़ के भाई पीटर की कंपनी के साथ।

इसके बाद फ्रान्ज़ द्वारा फ़िल्में बनाने का सिलसिला शुरू हुआ। ऑस्टेन ने शुरुआत की ‘लाइट ऑफ़ एशिया’ (1925) की शूटिंग से। उस समय इसके जैसी काफी और भी फ़िल्में भिन्न निर्माताओं द्वारा बनाई जा रही थीं पर एक विशेषता जो इस फिल्म को सबसे अलग बनाती थी वह ये थी कि ‘लाइट ऑफ़ एशिया’ की शूटिंग भारत में हुई थी जिससे फिल्म और भी वास्तविक लगती थी। यह फिल्म यूरोप में काफी प्रसिद्ध हुई तथा इसके बाद ऑस्टेन और राय की जोड़ी ने ऐसी दो और फ़िल्में बनाईं, ‘शिराज़’ (1928) जो ताज महल की कहानी पर आधारित थी और ‘प्रपंच पाश’ (1929) जो महाभारत पर आधारित थी। प्रपंच पाश को अंग्रेजी में ‘अ थ्रो ऑफ़ डाइस’ के नाम से जाना जाता था जिसका अर्थ हुआ पासा फेंकना जो महाभारत का मुख्य हादसा था। इस फिल्म की शूटिंग उदयपुर के सुन्दर शहर में हुई थी तथा आप इसे ऊपर दिए गए विडियो में देख सकते हैं।

सिनेमा में मौन से आवाज़ों के तकनीकी सफ़र की वजह से ऑस्टेन और राय की साझेदारी थम गयी क्योंकि जर्मन बोलते हुए भारतीय फिल्मों में अटपटे लगते। परन्तु ये उनकी साझेदारी का अंत नहीं था। 1934 में बॉम्बे टॉकीज़ की नींव रखने के बाद राय ने फ्रान्ज़ को दोबारा संपर्क किया और इसके बाद इन्होंने काफी फ़िल्में साथ बनाईं जिनमें से एक थी ‘अछूत कन्या’ (1937) जिसने मशहूर भारतीय अभिनेता अशोक कुमार को प्रसिद्धी की सीढ़ी पर चढ़ाया। यह पूरी फिल्म आप ऊपर दिए गए विडियो में देख सकते हैं।

हालांकि ऑस्टेन को हिंदी का एक शब्द भी समझ नहीं आता था, फिर भी उन्होंने इतनी ख़ास फिल्मों का निर्माण किया जिन्हें आज तक फिल्म जगत की सबसे बेहतरीन रचनाओं में गिना जाता है, इससे समझ आता है कि फ्रान्ज़ को अपनी कला की पूरी पूरी समझ थी तथा शायद वे ना होते तो आज भारतीय सिनेमा जगत इतनी प्रगति न कर पाता।

संदर्भ:
1.https://swarajyamag.com/culture/the-many-ways-cinema-forgot-franz-osten
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Franz_Osten

http://prarang.in/Meerut/1809161835





1975 की इमरजेंसी और मारुति सुज़ूकी की शुरुआत

Meerut
15-09-2018 02:25 PM

भारत में कुछ ब्रांड के नाम ऐसे हैं जिनका नाम लेते ही हमारे दिमाग में उनके उत्पाद की छवि उभर कर आ जाती है। ऐसे में अगर वाहन उद्योग की बात करें, तो शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा, जिसने मारूति सुज़ूकी का नाम न सुना हो। आज हम आपको मारूति सुज़ूकी के इतिहास से जुड़ी कुछ रोचक बातें बताने जा रहे हैं, परंतु उससे पहले थोड़ा सा मारूति सुज़ूकी के बारे में जान लेते हैं।

मारुति सुज़ूकी इंडिया लिमिटेड को पहले मारुति और इससे पूर्व मारुति उद्योग लिमिटेड के नाम से जाना जाता था। यह संगठन भारत में एक बड़ा मोटर निर्माता है। यह जापानी मोटरगाड़ी एवं मोटरसाईकिल निर्माता सुज़ूकी की एक सहायक कंपनी है। आकड़ों के आनुसार जुलाई 2018 तक, भारतीय यात्री कार बाज़ार में इस कंपनी की हिस्सेदारी 53% थी। शेयर बाज़ार से जुड़ी बात करें तो पहले मार्केट कैपिटलाइज़ेशन समझना ज़रूरी है। मार्केट कैपिटलाइज़ेशन एक कंपनी के आउटस्टैंडिंग शेयरों (कंपनी के वे सभी शेयर जो वर्तमान में निवेशकों, कंपनी अधिकारियों और अंदरूनी सूत्रों के अधिकार में हैं) की संख्या को बाज़ार मूल्य से गुणा करके प्राप्त की जाती है। मारुती सुज़ूकी का मार्केट कैपिटलाइज़ेशन 260,781 करोड़ (14 सितम्बर 2018 को) है। आज मारूति सुज़ूकी प्रवेश स्तर हैचबैक में ऑल्टो, रिट्ज़ से लेकर स्विफ्ट, वैगन आर और सेडान वर्ग में डिज़ायर, सिआज़ और बड़े वाहनों में ईको, ओम्नी, ग्रांड विटारा आदि बेचती है।

आईए अब आपको बताते हैं मारुति सुज़ूकी से संजय गांधी किस प्रकार जुड़े हुए हैं:
संजय गाधी ने ब्रिटेन में रॉल्स रॉयस में प्रशिक्षण हासिल किया था। उनको कारों को लेकर हमेशा से बहुत लगाव था। वह सन 1968 में वापस भारत लौटे और सरकार तथा योजना आयोग दोनों इस नतीजे पर पहुंच गए कि निजी क्षेत्र में छोटी कार का निर्माण एक अच्छा विचार है। संजय ने दिल्ली के ट्रक चालकों की एक पसंदीदा जगह गुलाबी बाग (दिल्ली) में छोटी कार के नमूने के निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी।

सरकार ने सितंबर 1970 में आशय पत्र जारी कर दिया। इस पत्र के ज़रिये संजय गांधी को यह अनुमति दे दी गई कि वह एक वर्ष में 50,000 तक कारें बना सकें। फिर 1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक ऐसी ‘गाड़ी' के निर्माण का प्रस्ताव दिया, जिसे आम आदमी खरीद सके, तो अगस्त 1971 में ‘मारूति मोटर्स लिमिटेड' नाम से एक कंपनी बनाई गई और बिना किसी तजुर्बे, नेटवर्क और डिज़ाइन (Design) के ही इसके प्रबंधक निदेशक संजय गांधी बने।

मारुति द्वारा बनाया गया छोटी कार का नमूना परीक्षण में विफल हो गया। इसका सीधा तात्पर्य था कि यह वाहन सड़क पर उतारे जाने लायक नहीं था। कई लोगों द्वारा इस समय मारुती पर सियासी पहुँच का फायदा उठाने के इलज़ाम लगाये गए, किन्तु 1971 के युद्ध ने विरोध की आवाजों को दबा दिया। हालांकि संजय ने जर्मन कंपनी फोक्सवैगन से भी संपर्क किया, परंतु इस फैसले के साथ क्या हुआ, कोई नहीं जानता। लेकिन इसके बावजूद जुलाई 1974 में मारुति को 50,000 कारें बनाने का औद्योगिक लाइसेंस प्रदान कर दिया गया।

1974 में, सरकार के खिलाफ एक विपक्षी विद्रोह ने देश में व्यापक परेशानी पैदा की, जिसने अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया। संजय की मां, इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय आपातकाल (1975) घोषित किया, सैनिक कानून लागू किया, प्रेस की आज़ादी को नियंत्रित कर दिया और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर ऐसे कई विशेषाधिकारों को निलंबित कर दिया। इस समय संजय का सम्पूर्ण ध्यान इस समस्या को हल करने की ओर आवश्यक था और इसलिए मारुती की योजना पर एक विराम लग गया।

1977 के आम चुनावों के दौरान ‘जनता दल' की जब सरकार बनी तो मारुति को समाप्त कर दिया गया था। अंतत: मारुति दिवालिया हो गई। इसके बाद 1980 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद इसे पुननिर्मित किया गया, संजय गांधी की मौत के एक साल बाद जून सन 1980 में सरकार ने इंदिरा गांधी के आदेश पर मारुति को उबारा और उसके लिए एक विदेशी साझेदार की तलाश शुरू की। अंतत: जापानी कंपनी सुज़ूकी के रूप में उसे अपना साझेदार मिला।

इस प्रकार भारतीय कम्पनी मारूति सुज़ूकी ने कई परिस्थितियों से जूझते हुए नम्बर 1 बनने का सफऱ तय किया था, और आज इसने भारतीय बाजार में एक बड़ा मुकाम हासिल किया है।

संदर्भ:
1.https://www.motoroids.com/features/maruti-and-sanjay-gandhi-the-history-of-an-illicit-extraordinary-love-affair/
2.http://www.rediff.com/business/special/special-the-brazen-story-of-sanjay-gandhis-car-project/20150710.htm
3.https://en.wikipedia.org/wiki/Maruti_Suzuki

http://prarang.in/Meerut/1809151829





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