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क्यों ली थी आयरिशों ने मेरठ में पनाह?

Meerut
13-08-2018 02:46 PM

प्रवास आज से कई सौ साल से हो रहा है जिसके लिए विभिन्‍न कारण उत्‍तरदायी होते हैं। जिनमें से एक है 'अकाल'। इस शब्द से ही इसकी भयावहता का आकलन किया जा सकता है, विश्व ने कई तरह के अकालों का सामना किया है। तो इसी संदर्भ में बात करें 1845 में आयरलैंड में आये अकाल की जिसने लोगों को यूरोप से भारत तक आवास के लिए मजबूर कर दिया। औपनिवेशिक काल के दौरान आयरलैंड के कृषकों को ब्रिटिश बाजार में खाद्य आपूर्ति के लिए संघर्ष करना पड़ा। 19वीं शताब्दी तक आयरलेंड में कृषि के लिए उपलब्ध भूमि पर प्रमुख रूप से आलू का उत्पादन किया जाता था। विभिन्न पौष्टिकता से भरपूर आलू की फसल के लिए आयरिश मिट्टी काफी उपजाऊ थी।

दुर्भाग्यवश इस फसल पर ‘पोटेटो ब्लाईट’ (Potato blight: ब्लाईट का अर्थ, एक पौधों की बीमारी, जो कि विशेष रूप से एक कवक के कारण होती है) नामक बीमारी फैल गयी। जिसका सामना करने या इलाज ढूंढ़ने में यहाँ के लोग सक्षम नहीं थे, और ना ही इसके नुकसान की भरपाई के लिए तैयार थे। 1845 में अमेरिका से फैली फायटोप्थोरा (Phytopthora: पौधीय बीमारी) आयरलैंड तक पहुंची और उस वर्ष आयरलैंड असामान्य रूप से ठंडा नम मौसम झेल रहा था जिसके कारण ब्लाईट को पनाह मिली, जिसने आलू की फसल नष्ट कर दिया। यह सिलसिला 1846-1849 तक चलता रहा। और क्योंकि यहाँ की प्रमुख फसल आलू थी, इस कारण यहाँ के लोगों को भुखमरी का सामना करना पड़ा।

हालांकि ग्रेट ब्रिटेन के प्रधान मंत्री सर रॉबर्ट पील ने आयरलैंड से अनुपयोगी अनाज के निर्यात की अनुमति जारी रखी, परन्तु साथ ही उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका से उनके लिए मक्का के आयात को अधिकृत कर भुखमरी से राहत प्रदान करने के लिये अपना संपूर्ण योगदान दिया। परन्तु इस अकाल से छुटकारा पाने के लिए ब्रिटिश सरकार के प्रयास अपर्याप्त हो रहे थे।

अकाल के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में, 1844 में आयरलैंड की लगभग 84 लाख की आबादी, 1851 तक 66 लाख हो गई थी। इस दौरान लगभग दस लाख लोग भूख, टाइफस और अन्य अकाल से संबंधित बीमारियों से मारे गए, और अधिकांश लोग (करीब 10 लाख) आश्रय और काम के लिए विदेश में प्रवासित हुए, तथा इस दौरान मेरठ कैंट में भी कई आयरिश प्रवासियों का तांता देखा गया था। कितने ही ऐसे परिवार थे जो उस समय भारत में मेरठ में आकर बस गए तथा उनकी आगे की पीढ़ियों ने भी कई साल यहीं गुज़ारे। 1921 में जब आयरलैंड ने आजादी हासिल की, तब तक इसकी आबादी 1840 के दशक की शुरुआत के मुकाबले आधी हो चुकी थी।

संदर्भ :
1.https://www.britannica.com/event/Great-Famine-Irish-history
2.https://www.irishcentral.com/news/new-facts-about-great-famine-emigration-out-of-ireland-revealed-139540423-237788421
3.https://en.wikipedia.org/wiki/Great_Famine_%28Ireland%29
4.https://en.wikipedia.org/wiki/Irish_Indians


90 वर्षों से सिंचाई की आपूर्ति करती आ रही मेरठ की नहरें

Meerut
12-08-2018 10:55 AM

90 वर्षों के इतिहास को समेटे हुए है हमारा मेरठ शहर, आप पूछेंगे भला कैसे? आईए हम आपको बताते हैं मेरठ के प्रमुख ब्रिटिश काल में निर्मित सुचारू रुप से चलने वाली सिंचाई प्रणालीयों के बारे में जो आज भी यहां के बिजली उत्पादन और कृषि समृद्धि के मुख्य स्रोत हैं। इसमें से प्रमुख है, भोला की झाल।

यह एक महत्वपूर्ण बांध है जो मेरठ के भोला गांव में स्थित है। इसके द्वारा यहां के अधिकांश क्षेत्र को बिजली मिलती है तथा ये गंगाजल और सिंचाई परियोजनाओं का पर्याय भी हैं। बांध के आसपास के क्षेत्रों को शहर के प्रमुख पिकनिक (Picnic) स्थलों में भी गिना जाता है। शहर की भागदौड़ भरी ज़िंदगी से राहत प्राप्त करने के लिये बड़ी संख्या में पर्यटक और स्थानीय लोग प्राकृतिक सुंदरता और शांतिपूर्ण वातावरण से मोहित होकर यहां आते हैं। इसका निर्माण 1930 के दशक में ब्रिटिश काल के दौरान हुआ था। भोला में 7 स्वीडिश मशीनों में से 2 आज भी काम कर रही हैं, भले ही वे 90 वर्ष पुरानी हों। यह 640 किलोवाट बिजली उत्पन्न करता है। बांध से मेरठ को पीने के पानी की आपूर्ति सहित कई नहरों का उत्सर्जन भी होता है।

इसी समय 1854 में हरिद्वार में गंगा नहर का निर्माण शुरू हुआ। यह मेरठ की ही नहीं बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में से एक है और यही वजह है कि भारत में इंजीनियरों की कमी के चलते अंग्रेजों ने हरिद्वार से कम दूरी पर स्थित रुड़की में भारत के पहले इंजीनियरिंग कॉलेज को स्थापित किया।

गंगा नहर, एक नहर प्रणाली है जिसका उपयोग गंगा नदी और यमुना नदी के बीच के दोआब क्षेत्र की सिंचाई के लिए किया जाता है और साथ ही कुछ हिस्सों में इसका इस्तेमाल मुख्यतः नौवहन हेतु भी किया जाता है। इस प्रणाली में 272 मील और लगभग 4,000 मील लंबी वितरण चैनलों की मुख्य नहर शामिल हैं। इस नहर प्रणाली से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के दस जिलों की लगभग 9000 किमी उपजाऊ कृषि भूमि सींची जाती है। नहर पर कुछ छोटे जलविद्युत संयंत्र हैं, जो कि अपनी पूर्ण क्षमता पर चलने से 33 मेगा वाट बिजली उत्पन्न करने में सक्षम हैं। ये निर्गाजिनी, चित्तौड़ा, सलावा, भोला, जानी, जौली और डासना में हैं। नहर की कुछ शाखाओं के साथ हरिद्वार से अलीगढ़ तक ऊपरी गंगा नहर, और अलीगढ़ से नीचे की शाखाओं को निचली गंगा नहर में विभाजित किया जाता है।

संदर्भ:
1.https://www.atlasobscura.com/articles/160yearold-ganges-canal-superpassages-are-an-engineering-marvel
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Ganges_Canal
3.http://idup.gov.in/post/en/ce-ii-ganga-meerut-about
4.https://www.hindi.nyoooz.com/news/meerut/-this-is-such-a-picnic-spot-that-gives-electricity-to-the-city-and-water-too_128064/
5.https://timesofindia.indiatimes.com/city/meerut/Ganga-water-supply-may-be-delayed/articleshow/48820771.cms


मेरठ के विश्वप्रसिद्ध पीतल वाद्ययंत्र

Meerut
11-08-2018 11:07 AM

वर्तमान समय में आपने भारत ही नहीं वरन अन्य देशों में भी विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अक्सर बैंड का उपयोग होते हुए देखा होगा। क्या आपको कभी यह जानने कि जिज्ञासा हुई है कि इनका निर्माण कहाँ, कैसे, और किसके द्वारा किया जाता है। चलिए तो इसके बारे में जानने के लिए चलते हैं दिल्ली से लगभग 70 किलोमीटर दूर, हमारे मेरठ की एक धूलदार गली, जली कोठी, में जहाँ ‘नादिर अली एंड कंपनी’ का एक कारखाना है जहाँ लगभग 100 से अधिक वर्षों से बैंड वाद्ययंत्र का निर्माण हो रहा है। 1885 में नादिर अली (जो कि ब्रिटिश सेना में एक बैंड मास्टर थे) द्वारा अपने चचेरे भाई के साथ बैंड वाद्ययंत्र के आयात का व्यापार मेरठ में शुरु किया गया था तथा कुछ समय पश्चात ही उन्होंने भारत में ही इसका निर्माण भी प्रारम्भ कर दिया।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, उन्होंने पीतल की रद्दी से उपकरण बनाना शुरू कर, सबसे पहले पहरेदारों के लिए पीतल की सीटी बनाई और फिर बिगुल का निर्माण किया। ऊपर दी गयी वीडियो में यूनाइटेड किंगडम की रॉयल मरीन और रॉयल नेवी (HM Royal Marines and Royal Navy) के बैंड की एक प्रस्तुति को देखा जा सकता है। 1947 तक, सियालकोट ने मेरठ को वाद्य यंत्रों के निर्माता के रूप में प्रतिद्वंद्वी बना रखा था, लेकिन विभाजन के बाद नादिर अली ने सम्पूर्ण भारतीय बाजार पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया।

भारत का प्रमुख पारंपरिक समारोह शादी बिना बैंड के अधूरा लगता है, बैंड की आनंदमय शहनाई के बिना बड़े से बड़े व्यय वाली शादी भी पूरी नहीं होती है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि, भारत की 90% शादियों के बैंड उपकरणों का निर्माण जली कोठी कारखाने में किया जाता है। जली कोठी में बैंड उपकरणों के साथ-साथ बैंडवालों के लिये आकर्षक पोशाक बनाने का कार्य भी भरपूर किया जाता है। प्रस्तुत वीडियो में देखिये जबलपुर के मशहूर ‘इंटरनेशनल श्याम ब्रास बैंड’ की एक खूबसूरत प्रस्तुति:


पीतल के ये बैंड अभी भी दुनिया भर में संगीत की रंगभूमि में एक लोकप्रिय और प्रसिद्ध घटक बने हुए हैं। इसको बजाने की शैली और संगीत के प्रदर्शन ने लोगों के बीच पीतल बैंड की ओर रुचि पैदा कर दी है। जैसे-जैसे बैंड अपनी शैलियों को विकसित कर रहा है, युवा पीढ़ी में उसे सीखने की जिज्ञासा बढ़ती जा रही है तथा साथ ही यह हमारे पारंपरिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शोभा बढ़ाता आया है और आगे भी बढ़ाता रहेगा।

संदर्भ:
1.https://www.hindustantimes.com/photos/india-news/making-post-war-musical-instruments-for-uk-s-royal-navy-in-meerut/photo-B0bsdvZdi7VWiTk8K6BK7K.html
2.http://www.natgeotraveller.in/leader-of-the-brass-band-130-years-of-musical-history-in-meerut/


मेरठवासियों के लिए अनमोल जानकारी इन लेखों में

Meerut
10-08-2018 02:02 PM

यूं ही कट जाएगा सफ़र साथ चलने से, कि मंजिल आएगी नज़र साथ चलने से। प्रारंग का यह सफ़र भी कुछ ऐसा ही है जो अपने पाठकों के प्रोत्साहन के साथ चलता जा रहा है और दिन प्रतिदिन और भी मनोरंजक होता जा रहा है। हर दिन हमारे इस प्रारंग परिवार में कुछ नए सदस्य जुड़ते जा रहे हैं। तो आज हम कुछ समय निकालेंगे 2018 के अब तक के सफ़र की समीक्षा करने में।

आज की तारीख है 10 अगस्त 2018 तथा आज इस वर्ष का 222वां दिन है। इन 222 दिनों में प्रारंग अपने परिवार के मेरठवासियों तक 218 लेख पहुंचा चुका है तथा यह लेख 219वां लेख होगा। यदि ध्यान दें तो लगभग हर दिन प्रारंग ने मेरठ को समर्पित एक लेख आप तक पहुँचाया है। प्रारंग के अनूठे वर्गीकरण में यदि इन लेखों को देखा जाए तो संस्कृति से जुड़े 169 लेख तथा प्रकृति से जुड़े 49 लेख अब तक इस वर्ष में प्रस्तुत किये गए हैं। और यदि संस्कृति और प्रकृति के भीतर वर्गीकरण की बात करें तो लेखों का वितरण कुछ इस प्रकार है:

प्रकृति:
• समयसीमा- 22
• मानव व उसकी इन्द्रियाँ- 82
• मानव व उसके आविष्कार- 65

संस्कृति:
• भूगोल- 12
• जीव-जंतु- 19
• वनस्पति- 18

इन लेखों को प्रारंग के मेरठ पोर्टल (http://meerut.prarang.in/), फेसबुक (https://www.facebook.com/prarang.in/), ट्विटर (https://twitter.com/prarang_in?lang=en) तथा प्रारंग की एंड्राइड मोबाइल एप्लीकेशन (https://play.google.com/store/apps/details?id=com.riversanskiriti.prarang&hl=en_IN) द्वारा आप तक पहुँचाया गया। इनमें से मेरठवासियों की सबसे अधिक प्रतिक्रिया फेसबुक पर देखने को मिली।

यदि बात करें फेसबुक लाइक्स (Facebook Likes) की तो वर्ष 2018 में मेरठ के लेखों को करीब 6000 बार लाइक किया गया तथा उनपर कमेंट (Comment) के रूप में पाठकों द्वारा 114 बार टिप्पणी की गयी। आज प्रारंग के साथ फेसबुक पर करीब 43,000+ पाठक जुड़े हुए हैं जिनमें से 10,000+ पाठक मेरठ से हैं। साथ ही प्रारंग की एंड्राइड मोबाइल एप्लीकेशन के 1000 से भी अधिक डाउनलोड (Download) हो चुके हैं जिनमें से मेरठ से करीब 300 डाउनलोड हैं।

प्रारंग द्वारा प्रकाशित किये गए प्रस्तुत 5 लेख मेरठवासियों में सबसे अधिक लोकप्रिय रहे। हर लेख के नाम पर क्लिक कर आप उसे पढ़ सकते हैं:

1. मेरठ में कार्यस्थल तक के सफ़र का संघर्ष
2. 
धार्मिक कट्टरता हो सकती है जानलेवा
3.
परीक्षितगढ़ के राजा परीक्षित की कहानी
4. 
मेरठ के आलमगीरपुर में मिले सिन्धु सभ्यता के साक्ष्य
5. 
मेरठ की अनोखी भाषा पर हास्य

साथ ही हम आप सभी से आग्रह करना चाहेंगे कि हर लेख पर कमेंट और लाइक के रूप में अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर ज़ाहिर करें। अंत में प्रारंग अपने सभी मेरठ के पाठकों को हमारे साथ बने रहने के लिए धन्यवाद कहना चाहेगा क्योंकि यह आप लोगों का निरंतर प्रोत्साहन ही है जो हमें हर दिन बेहतर से बेहतर कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।


आज से 73 साल पहले हुए हिरोशिमा-नागासाकी हमले पर गांधीजी की प्रतिक्रिया

Meerut
09-08-2018 02:03 PM

विश्व के इतिहास में काले अक्षरों से लिखे वो दिन जिनके बारे में हम आज भी पढ़ कर सहम जाते हैं, वो दिन जब मानव अपनी इंसानियत को भूल गया था। हिरोशिमा के लोगों के लिए यह दिन भी हर सुबह जैसा ही था। लोग अपने रोज़मर्रा के कामों को निपटा रहे थे, इस बात से अंजान कि वहाँ सब कुछ चंद पलों में ही ख़त्म होने वाला है। उस दिन कैलेण्डर में तारीख थी 6 अगस्त 1945। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने एक बेहद गोपनीय अभियान में जापान के हिरोशिमा पर अमेरिकी वायु सेना द्वारा परमाणु बम "लिटिल बॉय" (Little Boy) गिरवाया था। साथ ही 9 अगस्त 1945 को अमरीका ने दोबारा नागासाकी पर "फ़ैट मैन" (Fat Man) परमाणु बम गिराया। इस हमले में लाखों लोग मारे गए थे। उसके बाद जापान ने समर्पण किया। परमाणु हमलों की त्रासदी के बाद से जापान परमाणु हथियारों का विरोध करता रहा है।

जब गांधी जी ने खबर सुनी कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान में परमाणु बम का इस्तेमाल किया, तो उन्होंने कहा कि "मैं अपने शरीर को हिला भी नहीं पाया जब मैंने पहली बार सुना कि परमाणु बम ने हिरोशिमा को नष्ट कर दिया। इसके विपरीत, मैंने खुद से कहा कि यदि अब भी इस दुनिया ने अहिंसा को नहीं अपनाया, तो सम्पूर्ण मानव जाति आत्महत्या के मंत्र में बंध जाएगी।"

जब उनसे पूछा गया कि क्या इस घटना से अहिंसा में उनका विश्वास डगमगाया है, तो उन्होंने कहा कि ऐसा विश्वास ही एकमात्र चीज है जो परमाणु बम से भी नष्ट नहीं हो सकती है। साथ ही साथ उन्होनें हमें याद दिलाया कि काउंटर-बम (Counter Bomb) इस घटना के दुःख को नष्ट नहीं कर सकता बस इस पर शर्मिंदा हो सकता है, केवल प्यार ही हमें इससे उभरने की ताकत दे सकता है। हिंसा से हिंसा नष्ट नहीं हो सकती है। द्वेष केवल नफरत की गहराई को बढ़ाता है। मानव जाति को केवल अहिंसा के माध्यम से हिंसा से बाहर निकलना है। नफरत को केवल प्यार से दूर किया जा सकता है।

1945 में, संयुक्त राज्य अमरीका परमाणु हथियारों का एकमात्र निर्माता था। आज दुनिया में ऐसे घातक हथियारों के साथ नौ देश हैं - USA, रूस, फ्रांस, UK, चीन, इज़राइल, भारत, पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया। अगर दुनिया की इन बड़ी ताकतों के बीच परमाणु युद्ध हो जाए तो इससे सीधे तौर पर दुनिया की लाखों की आबादी समाप्‍त हो जाएगी। यही नहीं, इसके बाद पृथ्वी पर निम्न तापमान और सूखे का असर सैकड़ों सालों तक रहेगा। गांधी जी द्वारा बताए गये आहिंसा के मार्ग पर चलने से ही आज लोगों के दिलों में मानवता की भावना उजागर हो सकती है। हमें ध्यान रखना होगा कि परमाणु-शक्ति का शांतिपूर्ण उपयोग हो, वह विनाश का हथियार नहीं वरन विकास का औज़ार बने।

संदर्भ:
1.https://mettacenter.org/daily-metta/gandhi-and-the-atom-bomb-daily-metta/
2.https://www.quora.com/What-was-the-reaction-s-of-Mahatma-Gandhi-after-the-twin-Atom-Bomb-blast-on-Japan-in-August-1945
3.https://www.huffingtonpost.in/sudheendra-kulkarni/hiroshimas-message-nuclea_b_7948732.html


दीर्घकालीन गृह ऋण का कैसे करें संचालन?

Meerut
08-08-2018 12:04 PM

आज के समय में लगभग सभी बैंक एक आम नागरिक की मूलभूत आवश्यकता “मकान” को पूर्ण करने के लिए गृह ऋण की अच्छी 'स्कीम्स' (schemes) अथवा योजनाएं प्रदान करते है। गृह ऋण योजना के अंतर्गत ऋण धारक को एक निश्चित समयावधि के बाद एक पूर्वनिर्धारित आंशिक राशि (क़िस्त या EMI) बैंक को चुकानी पड़ती है।

मुद्रास्फीति या मंदी के दौर में जब मुद्रा का अवमूल्यन होता है, तो इसका प्रत्यक्ष प्रभाव मुद्रा के लेन-देन पर पड़ता है अर्थात बैंक की ब्याज दर पर भी पड़ता है। इस स्थिति में केंद्रीय बैंक (भारतीय रिज़र्व बैंक) रेपो रेट बड़ा देता है। अब प्रश्न उठता है कि यह रेपो रेट है क्या और यह गृह ऋण तथा ऋण धारक को किस प्रकार प्रभावित करता है।

“रेपो रेट” (Repo Rate) वह दर है जिस दर पर केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों को ऋण देता है। रेपो दर के बढ़ने से बैंक, केंद्रीय बैंक को ब्याज की अधिक राशि अदा करने के लिए बाध्य हो जाते हैं। परिणामस्वरूप वाणिज्यिक बैंक गृह ऋण की ब्याज दर में भी वृद्धि कर देते हैं, जिसका सीधा प्रभाव ऋण धारक की क़िस्त चुकाने की क्षमता पर पड़ता है।

आज के समय में जब महंगाई की मार देश भर में व्याप्त है, दीर्घकालीन अवधि तक गृह ऋण के बोझ तले जीवनयापन करना “नाकों तले चने चबाने से काम नहीं है” इस समस्या से बचने के लिए लिए हमें निम्न बातों पर ध्यान देना होगा।

व्यक्ति को ऋण लेने से पूर्व ही अपनी नियमित आय का कुछ भाग पूँजी निवेश में लगाना चाहिए, ताकि वह ऋण का भार वहन कर सके। इससे एक निश्चित अवधि के बाद निवेश के अच्छे रिटर्न्स (returns) प्राप्त हो सकते हैं और ऋण का बोझ भी कम किया जा सकता है, इसके लिए आवश्यक है की आप अपने वित्तीय सलाहकार से राय लें और अपनी क्षमता के अनुसार निवेश का उचित विकल्प चुनें।

निवेश के अन्य विकल्प जैसे सावधि जमा, आवर्ती जमा तथा म्यूच्यूअल फंड्स (mutual funds) का चुनाव भी कर सकते हैं। यह विकल्प आपके ऋण को समय से पूर्व ही भुगतान करने में मदद करेगा। आप कोई भी नीति अपनाए किंतु यह सुनिश्चित कर लें की वह आपके पोर्टफोलियो (portfolio) के अनुरूप हो ताकि ऋण का लाभ अर्जित करने के लिए आपको अतिरिक्त ऋण का भार न उठाना पड़े।

संदर्भ:
1.चित्र: Designed by Freepik
2.http://www.forbesindia.com/blog/finance/how-to-deal-with-a-rise-in-home-loan-interest-rates/
3.https://www.quora.com/What-are-the-different-types-of-home-loans-in-India
4.https://economictimes.indiatimes.com/wealth/personal-finance-news/home-loans-set-to-get-costlier-as-rbi-hikes-repo-rate/articleshow/65212959.cms
5.https://www.quora.com/Why-does-the-RBI-increase-the-repo-rate-during-inflation-and-decrease-it-during-deflation


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