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त्यौहार के दिनों में कैसे रहें मिलावटी मिठाइयों से सुरक्षित?

Meerut
20-10-2018 01:50 PM

भारतियों के सबसे बड़े त्यौहारों में से एक दिवाली जल्द ही आने वाली है और दिवाली के साथ ही घरों में पटाखों और मिठाईयों की एक कतार सी लग जाती है। लेकिन आज कल हर चीज़ इतनी उत्साह पूर्वक नहीं होती, क्योंकि कई चीजों में मिलावट होने लगी है। समय के साथ-साथ हर साल मिठाईयों में मिलावट भी बढ़ती जा रही है। इसमें सबसे पहले जानने वाली बात यह है कि दुकानदार ऐसा क्यों करते हैं? और इससे आप अपने परिवार के सदस्यों को सुरक्षित कैसे रख सकते हैं।

दिवाली पर ही बाज़ार में मिठाईयों की सबसे ज्यादा खपत होती है, भले ही ब्रांडेड गिफ्ट पैक (Branded Gift Pack) इस मिठाई की जगह ले चुके हों, लेकिन बहुत बड़े सामाजिक वर्ग में अभी भी खुली मिठाई का चलन है। जिसके कारण लोभी दुकानदार कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए मिठाईयों में मिलावट करते हैं। ऐसे ही मेरठ की सरधना तहसील में मिठाईयों की मिलावट का धंधा काफी तेजी से पनप रहा है। ये मिलावटी मिठाई शुद्ध मिठाई के मुकाबले तीन गुना तक सस्ती होती हैं। रसगुल्ला और मिल्क केक थोक में लगभग 75 रुपये, सोनपापड़ी लगभग 60 रुपये और मावा मात्र 100 रुपये किलो में सप्लाई किया जाता है। जिस कारण मेरठ के अलावा आस-पास के जिलों और दिल्ली में भी इसकी काफी मांग है। हरियाणा में भी यहां से तैयार मिठाई और मावा को सप्लाई किया जाता है।

वे मिठाईयाँ जिनमें सबसे ज्यादा मिलावट की जाती है:

1. खोये की बर्फी
अधिकांश मिठाईयाँ खोये से बनती हैं और इसलिए खोये में सबसे ज्यादा मिलावट की जाती है। ऐसा माना जाता है कि कुछ लोभी विक्रेता इसकी मात्रा बढ़ाने के लिए इसमें गेहूं या चावल के आटे को मिला देते हैं। यदि आप भले ही घर में खोये से मिठाई बना रहें हो, तो पहले इसकी शुद्धता की जांच करें।

2. मोतीचूर के लड्डू
अधिकांश उपभोक्ता अच्छे स्वाद और रंग की मिठाईयाँ लेना पसंद करते हैं। यही कारण है कि विक्रेता उज्ज्वल और हानिकारक रंगों का उपयोग करते हैं। ये रंग कम महंगे, अधिक स्थिर और लंबे समय तक चलने वाले होते हैं और उत्पाद को आकर्षक और चमकदार रंग देते हैं। इसलिए मोतिचूर लड्डू को विश्वसनीय विक्रेताओं से ही खरीदना चाहिए।

3. काजू कतली
काजू कतली में चांदी का वरक़, इसे लोकप्रिय पारंपरिक मिठाई बनाता है। भारतीय नियमों के अनुसार, अगर खाद्य पदार्थ के रूप में चांदी का उपयोग किया जाता है तो चांदी 99.9% शुद्ध होनी चाहिए। हालांकि, चांदी एक महंगी धातु है तो विक्रेता इसके बदले पतले एल्यूमीनियम फोइल (Aluminium Foil) का उपयोग करते हैं जो चांदी के वरक़ की तरह दिखती है।

4. काजू पिस्ता रोल
यदि आपको लगता है कि आप वास्तविक पिस्ता और काजू का उपयोग करके मिठाई खा रहे हैं, तो आप गलत सोच रहे हैं। मिठाइयों में असली मेवा का इस्तेमाल नहीं किया जाता है, उसमें ज्यादातर कृत्रिम या बनावटी फ्लेवर का इस्तेमाल किया जाता है। चूंकि पिस्ता और काजु काफी महंगे होते हैं, इसलिए विक्रेता लागत में कटौती करने और मिठाई को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए इनका इस्तेमाल करते है।

5. पनीर बर्फी
पनीर बर्फी बनाने के लिए उपयोग किए जाने वाले पनीर में दूध के स्थान पर अत्यधिक कॉर्न स्टार्च (Corn Starch) का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ मामलों में, हानिकारक रसायनों और यूरिया को भी मिश्रित किया जाता है। इसलिए इसे किसी विश्वसनीय विक्रेता से खरीदना या घर में बनाना उचित रहेगा।

मिठाई (या उनकी कच्ची सामग्री) में मिलावट का पता लगाने के लिए कुछ वैज्ञानिक तरीके:

कैसे मिश्रित दूध का पता लगाया जा सकता है?

I. पानी :- दूध की कुछ बूंदें लें और उन्हें एक पतली, चिकनी सतह पर रखें। शुद्ध दूध धीरे-धीरे एक निशान पीछे की ओर छोड़ते हुए गिरेगा, जबकि मिश्रित दूध बहुत तेजी से बिना निशान छोड़े तेजी से गिर जाएगा।

II. यूरिया :- मिलावट करने में सबसे ज्यादा उपयोग की जाने वाली वस्तु यूरिया है। एक कप में दो चम्मच दूध लें और दूध में एक चम्मच सोया पाउडर या तुअर दाल पाउडर मिलाएं, और पूरी तरह मिश्रित होने तक हिलाएं। फिर इसमें लिटमस पेपर (Litmus Paper) डालें। यदि पेपर लाल से नीले रंग में बदल जाता है, तो दूध में यूरिया की उपस्थिति को इंगित किया जा सकता है।

III. डिटर्जेंट :- थोड़े से दूध को एक बोतल में लें और उसे जोर से हिलाएं, यदि इसमें झाग बनता है तो इसमें डिटर्जेंट मिश्रित है। यदि ऐसा होता है तो स्थानीय एफ.डी.ए. में इसकी शिकायत करें।

कैसे मिश्रित मावा की जांच कर सकते हैं?

स्टार्च: थोड़े से मावे को उबालें, फिर उसे ठंडा होने दें, उसके बाद इसमें आयोडीन की कुछ बूंदें डालें। यदि यह नीला रंग का हो जाता है, तो यह नीला रंग स्टार्च की उपस्थिति को इंगित करता है।

एक सरल उपाय से भी आप इसका पता लगा सकते हैं। थोड़ा सा खोया लें और उसे हाथ में रगड़ें। यदि वो हाथ में चिकनाई छोड़ता और थोड़ा सा मीठा स्वाद देता है, तभी उसे खरीदें।

कैसे करें वरक़ की जांच?

शुद्ध वरक़ मिठाई की सतह पर असानी से फैल जाता है। इसकी पुष्टि करने के लिए अपनी उंगलियों के बीच इसे थोड़ा सा रगड़ें, यदि वह घुल जाता है तो वह शुद्ध है अन्यथा यदि वह दाने के रूप में घूमने लगता है तो वह एल्यूमीनियम है।

कैसे मिलावटी घी का पता लगाया जा सकता है?

घी में थोड़ी सी चीनी और थोड़ा हाइड्रोक्लोरिक एसिड (Hydrochloric Acid) मिलाएं। यदि ये गहरा लाल रंग का हो जाता है तो यह शुद्ध नहीं है।

संदर्भ:
1.https://food.ndtv.com/food-drinks/diwali-2017-5-diwali-sweets-that-may-be-adulterated-1762668
2.https://fit.thequint.com/health-news/enjoy-mawa-and-mithai-without-milawat-this-diwali-adulteration-vark-milk-fda-ghee-sweets-2
3.https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/meerut/synthetic-desserts-preparation-for-deepawali-is-going-to-spoil-health?pageId=1

http://prarang.in/Meerut/1810201971





माँ दुर्गा और इटली की माता सिबेल में हैं कई समानताएं

Meerut
19-10-2018 01:47 PM

विभिन्‍न सभ्‍यताओं के आरंभ होने के साथ ही मनुष्‍यों द्वारा अपने अराध्‍यों की पूजा अर्चना करना भी प्रारंभ कर दिया गया था। इन अराध्‍यों में देवी देवता दोनों शामिल थे। देवियों की पूजा करने का प्रचलन मात्र हिन्‍दू धर्म में ही नहीं वरन् अन्‍य धर्मों में भी देखने को मिलता है। इसका प्रत्‍यक्ष उदाहरण इटली/ग्रीक की सिबेल (Cybele) हैं, जो हमारी शेरावाली माँ से अनेक समानताएं रखती हैं। जैसे माँ दुर्गा को शेर पर सवार दिखाया जाता है, ठीक उसी प्रकार ग्रीस की सिबेल माता को भी शेर पर सवार दिखाया गया है। कहा जाता है कि भारत में दुर्गा माता की मूर्ति के साथ शेर को दर्शाने की प्रथा ग्रीक से ली गयी थी।

हिन्‍दू धर्म में ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश को शक्ति का केंद्र माना जाता है। इन्‍होंने अपनी शक्ति से माँ दुर्गा का सृजन किया, जिन्‍हें विभिन्‍न अस्‍त्र-शस्‍त्र से सजाया गया। आज हमारे द्वारा इनके विभिन्‍न स्‍वरूपों की पूजा की जाती है। उत्‍खनन में कुषाण काल के दौरान माँ दुर्गा की जो प्रतिमाएं मिली हैं, उनमें शेर नहीं दर्शाया गया है।

गुप्‍त वंश (700 ईस्‍वी के आसपास) में माँ दुर्गा को युद्ध की देवी के रूप में पूजा जाने लगा। इनकी प्रतिमाओं में इन्‍हें राक्षसों के साथ युद्ध करते हुए दर्शाया गया है। यह वो समय था जब भारत में कला, साहित्य और व्यापार अपने चरम पर थे। और इसी के चलते माँ दुर्गा की प्रतिमा में भी कई परिवर्तन आये। इस समय के आस-पास माँ दुर्गा को 8,10,12, और यहाँ तक कि 16 हाथों के साथ भी दर्शाया गया। जैसे-जैसे उनके प्रति श्रद्धा बढ़ती गयी, वैसे-वैसे उनकी प्रतीकात्मकता भी विकसित हुई। साथ ही गुप्‍त काल में इनकी विभिन्‍न मुद्राओं को भी पूजा जाने लगा। इसी दौरान माँ को शेर पर विराजमान हुए भी दर्शाया गया। शेर एक शाही जानवर है, उसका अयाल सभी पशुओं में से अनोखी रचना है।

रोम में युद्ध (लगभग 600 ईस्‍वी के आसपास) के दौरान भविष्‍यवाणी की गयी कि माँ सिबेल के रोम में आगमन के बाद ही आक्रमणकारियों को यहां से भगाया जा सकता है। इन्‍हें अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्‍न नामों से जाना गया, जिसमें सिबेल माता ही प्रमुख थी। यहां से सिबेल माता की मूर्ति की पूजा का प्रचलन प्रारंभ हो गया। वेटिकन (हिंदी के ‘वाटिका’ से लिया गया शब्द) की पहाड़ियों में माता का 200 फुट लंबा मंदिर बनाया गया, जिसे तैयार होने में 13 वर्ष का समय लगा। ईसाई धर्म के विस्‍तार के साथ ही यहां मूर्ति पूजा का प्रचलन समाप्‍त हो गया। तथा यह कहा जा सकता है कि करीब 6-12वीं शताब्दी के करीब माँ दुर्गा को सिबेल से उनका शेर प्राप्त हुआ। ऊपर दिए गए चित्र में बाईं ओर सिबेल को और दाईं ओर माँ दुर्गा को दर्शाया गया है।

संदर्भ:
1.https://atlantisrisingmagazine.com/article/goddess-in-the-vatican/
2.http://www.merinews.com/article/the-lion-of-durga-is-a-gift-from-a-greek-goddess/126919.shtml

http://prarang.in/Meerut/1810191968





जीवों का एक आनोखा खेल, छुपन-छुपाई अर्थात अनुकरण

Meerut
18-10-2018 04:21 PM

प्रकृति में विभिन्‍न रंग रूप आकार वाले अनेक जीव उपस्थित हैं। इनमें से कई जीव ऐसे भी होते हैं जो एक दूसरे के जैसे दिखते हैं। कई तो ऐसे होते हैं जो पेड़-पौधे, फूल, पत्तियों के अनुरूप लगते हैं या उनका रूप धारण कर लेते हैं, जिसे छद्मावरण या कामौफ्लाज (Camouflage) कहा जाता है। छद्मावरण विशेषकर कीट-पतंगों द्वारा किया जाता है। इसका उपयोग वे स्‍वयं को बचाने और अपने भोजन के लिए करते हैं। छद्मावरण करने वाले जीव अपने शिकारियों और शिकार को भ्रमित करने में माहिर होते हैं। ये जीव अपने आस पास के वातावरण या अपने शिकारी को अरूचिकर लगने वाले जीव का रूप धारण कर उसके अनुसार व्‍यवहार करते हैं। परिणामस्‍वरूप शिकारी उनसे ध्‍यान हटा देता है और वे बच जाते हैं।

अनुकरण को निम्न भागों में वर्गीकृत किया गया है:

रक्षात्मक अनुकरण:- रक्षात्मक या सुरक्षात्मक अनुकरण तब किया जाता है जब जीव दुश्मनों से छुप रहा हो या धोखा देकर खतरनाक मुठभेड़ से बच रहा हो।

आक्रमक अनुकरण:- आक्रमक अनुकरण तब किया जाता है जब शिकारी जीव अपने शिकार को भ्रमित करके उस पर एकदम से प्रहार करना चाहता हो।

प्रजनन अनुकरण:- यह तब होता है जब नकल की क्रिया प्रजनन में सहायता करती है। यह भ्रामक फूलों वाले पौधों में आम है।

ऑटो-अनुकरण:- इस तरह की नकल अनुकरण का ही एक रूप है जहां जीव के शरीर का एक हिस्सा दूसरे हिस्से की भांति दिखता है। उदाहरण के लिए, कुछ सांपों की पूंछ उनके सिर की तरह होती है।

छद्मावरण या अनुकरण करने वाले जीव अनुकृत जीवों के रूप, रंग, ध्‍वनि को ग्रहण कर लेते हैं, जिसे देख कोई भी जीव आसानी से भ्रमित हो जाता है। इसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं:

1. डेड लीफ मेंटिस (Dead Leaf Mantis)
यह लीफ मेंटिस देखने में ऐसा लगता है कि जैसे मृत पत्तियों से ही बना हो। इसका स्वरूप मृत पत्तियों से इतना मिलता है कि ये उन्हीं का एक हिस्सा नज़र आता है। ये अपने इस स्वरूप से शिकारियों से तो बचता ही है, साथ ही अपने शिकार को भ्रम में डाल कर उन पर प्रहार करने के लिये भी तैयार रहता है। डेड लीफ तितली में भी इसी प्रकार का छद्मावरण पाया जाता है, ये भी मृत पत्तियों की भांति ही दिखती हैं।

2. लीफ कैटीडिड (Leaf katydid)
लीफ कैटीडिड का छद्मावरण इतना प्रभावी होता है कि ये पत्ते की हर बारीकी की नकल कर लेता है। लीफ कैटीडिड को अक्सर ‘बुश क्रिकेट’ (Bush Cricket) भी कहा जाता है।

3. आर्किड मेंटिस (Orchid mantis)
ये आर्किड फूल के जैसा दिखने वाला चमकदार तथा शिकारी प्रवृत्ति का है। वे अपनी नक़ल का उपयोग कर के अपने शिकार से छुपने के लिए एक फूल पंखुड़ी की नकल करता है। जब मक्खियां और अन्य परागणक जीव फूल के संपर्क में आते हैं, तो ऑर्किड मेंटिस उन पर हमला कर देता है।

4. सैंड ग्रासहॉपर (Sand Grasshopper)
इन्हें ‘टिड्डा’ भी कहा जाता है। इनका ये नाम सिर्फ रेतीले आवास के कारण ही नहीं हैं। ये अक्सर अपने रूप से रेतीले मिट्टी के अनुकूल भूरे रंग की घास के बीच फुदका करते हैं।

संदर्भ:
1.https://en.wikipedia.org/wiki/Mimicry
2.http://www.brisbaneinsects.com/brisbane_insects/Mimicry.htm
3.https://www.mnn.com/earth-matters/animals/photos/11-amazing-examples-of-insect-camouflage/blending-in#top-desktop
4.https://explorable.com/camouflage-and-mimicry

http://prarang.in/Meerut/1810181965





मेरठ के विश्वप्रसिद्ध धार्मिक चित्रकरों की कला हो सकती है आपके घर में

Meerut
17-10-2018 04:02 PM

मेरठ दो पवित्र नदियों गंगा और यमुना के बीच बसा हुआ है और वैदिक काल से ही मानवीय क्रियाकलापों का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। यहां के कोने-कोने में बसते हैं कलाकार। यहां आपको कलाकारों की विविध विधाओं का अनूठा संगम देखने को मिलेगा, वो कलाकार, जिन्होंने भगवान को आकृति दी। जी हाँ! आज जो आप पने घरों की दीवारों पर धार्मिक चित्रों के कैलेंडर लटकाते हैं, संभावना है कि उनमें से कई मेरठ के नामचीन धार्मिक चित्रकला के कलाकारों द्वारा बनाए गए हों।

धार्मिक कैलेंडर चित्रकला के रूप में जिन कलाकारों ने अपनी पहचान बनाई, वे हैं- योगेंद्र रस्तोगी, एच.आर. राजा, जे.पी. सिंघल, एस.एम. पंडित आदि जिनमें से कुछ मेरठ सरज़मीं से उभर कर आये हैं। आइए जानते हैं इन सभी की कला का एक संक्षिप्त वर्णन:

1. योगेंद्र रस्तोगी:

मेरठ के योगेंद्र रस्तोगी उत्तर भारत के सबसे प्रसिद्ध कैलेंडर चित्रकला के चित्रकारों में से एक हैं। वह हिंदू देवताओं के चित्रों के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी मृत्यु 29 अगस्त, 2015 को 76 वर्ष की आयु में हो गई। परंतु उनके द्वारा बनाई गई तस्वीर आज भी सभी घरों मे देखने को मिलती है। 76 साल के योगेंद्र सभी धर्मों की तस्वीर बनाने में निपुण थे। यही नहीं, साल 1964 में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें प्रशस्ति पत्र और ट्रॉफी देकर सम्मानित किया था। 1963 में जब चीन युद्ध चल रहा था, तो उन्होंने एक चित्र बनाया 'लैंड टू डिफेंड'। इस चित्र के लिए उन्हें त्रिमूर्ति भवन, दिल्ली बुलाया गया, वहां पं. जवाहर लाल नेहरू ने यह चित्र 5000 रुपये में खरीदा, जो कोलोनेशन लिथोप्रेस शिवकाशी से प्रकाशित हुआ।


उन्हें बचपन से चित्रकारी का शौक था। उन्होंने 1959 में महात्मा गांधी का पहला चित्र बनाया था। शुरुआती दौर में वे ऑयल (Oil), वाटर कलर (Water Colour) और एक्रेलिक (Acrylic) माध्यम से चित्र बनाते थे। आज भी कई बड़ी कंपनियां अपने कैलेंडर में योगेंद्र की तस्वीरों का इस्तेमाल करती हैं। योगेंद्र रस्तोगी का मेरठ में बुढ़ाना गेट पुलिस चौकी के पास स्टूडियो भी था। उनकी ख्याति देश में ही नहीं वरन् विदेश में भी थी, 2005 में इंग्लैंड के गोलका बुक्स प्रकाशन में उनके चित्र छपे। इसके प्रकाशक उन्हें इंग्लैंड से दिल्ली और दिल्ली से खोजते-खोजते मेरठ आ गये थे। वे एक किताब के चित्र बनवाने के संदर्भ में रस्तोगी जी के पास आए थे।

2. एच.आर. राजा:

ये भी मेरठ के प्रसिद्ध चित्रकारों में से एक हैं। एच.आर. राजा और योगेंद्र रस्तोगी काफी लंबे समय से मित्र रहे, उन्होंने साइन पेंटर्स के रूप में मिलकर काम किया था। जब योगेंद्र रस्तोगी ने कैलेंडर कलाकार के रूप में सार्वजनिक प्रशंसा हासिल कर ली थी, उसके कुछ समय बाद उन्होंने राजा को सहायक के रूप में काम पर रख लिया, राजा ने उनके लिए पृष्ठभूमि के रंगों को तैयार किया। राजा के कामों में ज्यादातर धार्मिक डिज़ाइन (महावीर, गुरु नानक, और कृष्णा उनकी विशेषताओं में से हैं) देखने को मिलते हैं।


3. जे.पी. सिंघल:

जयंती प्रसाद सिंघल का जन्म 24 अक्टूबर 1934 को मेरठ (यूपी) में हुआ था। उनका नाम भारत में कैलेंडर आर्ट के प्रसिद्ध नामों में से एक है। लोगों के समक्ष उनका शानदार कार्य तब सामाने आया जब उन्होंने 20 वर्ष की आयु में धर्मयुग में पहली बार एक पेंटिंग की थी। इसके चार साल बाद, उनका पहला कैलेंडर प्रकाशित हुआ। उनके कैलेंडर की सफलता ने उन्हें मुंबई आने के लिए मजबूर कर दिया। और फिर उन्होंने 35 से अधिक वर्षों के लिए कैलेंडर डिज़ाइन की दुनिया पर शासन किया। वे अपने काम में उत्कृष्टता के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्तकर्ता भी रहे हैं।


राज कपूर हमेशा से जेपी सिंघल की पेंटिंग, विशेष रूप से आदिवासियों और मनमोहक सौंदर्य तराशे हुए जो पेंटिंग्स हैं, के प्रशंसक थे। यहाँ तक कि राज कपूर ने उन्हें ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ में ज़ीनत अमान को एक आदिवासी रूप देने के लिए आमंत्रित किया। कैलेंडर की दुनिया में नाम बनाने के बाद, सिंघल ने अपना ध्यान फोटोग्राफी (Photography) में स्थानांतरित किया और संजय दत्त, सनी देओल, अनिल कपूर, राज बब्बर और माधुरी दीक्षित सहित कई सितारों के फोटो को लॉन्च (Launch) किया। मकबूल फिदा हुसैन ने उन्हें फिर से पेंटिंग करने के लिए प्रेरित किया और इस बार, उन्होंने भावनात्मक कला पर अपना ध्यान केंद्रित किया। जहांगीर आर्ट गैलरी में उनकी पहली प्रदर्शनी ने एक बड़ी सफलता भी प्राप्त की थी।

4. एस.एम. पंडित:

डॉ एस.एम. पंडित (सम्बानंद मोनप्पा पंडित, 25 मार्च 1916 - 30 मार्च 1993 (कर्नाटक)) अपने समय के सबसे लोकप्रिय चित्रकारों में से एक थे। उनके अधिकांश विषय शास्त्रीय भारतीय साहित्य की घटनाओं और रामायण, महाभारत, पुराण, और उनके समय के समकालीन सिनेमा जगत पर आधारित थे। उन्होंने राधा-कृष्णा, नल-दमयन्ती, और विश्वमित्र-मेनका जैसे पात्रों के साथ-साथ हिंदी सिनेमा के कई नायकों और नायिकाओं का चित्रण भी किया था।


साथ-साथ उन्होंने कई लोकप्रिय फिल्म पोस्टर (Film Poster), फिल्म पत्रिकाएं और कई अन्य प्रकाशनों को भी चित्रित किया जो सामूहिक रूप से कैलेंडर कला के रूप में ही माना जाता है। आज भी उनके काम बेहद लोकप्रिय हैं। उनकी पौराणिक चित्रकला और हिंदू पौराणिक कथाओं के विषयों के यथार्थवादी चित्रण के लिए उन्हें भारतीय कैलेंडर वर्ल्ड में भी व्यापक रूप से माना जाता है।

संदर्भ:
1.https://en.wikipedia.org/wiki/Yogendra_Rastogi
2.https://www.bhaskar.com/uttar-pradesh/meerut/news/up-meer-famous-calendar-art-painter-yogendra-rastogi-died-in-meerut-5101689-pho.html
3.http://adhan-anhad.blogspot.com/2011/09/blog-post_9816.html
4.https://sites.google.com/site/javedhashmi786/biography
5.https://goo.gl/ow7nAV
6.http://jpsinghal.com/jpsinghal.html
7.https://www.indiapages.in/jp-singhal-remembered-7277.html
8.https://en.wikipedia.org/wiki/S._M._Pandit

http://prarang.in/Meerut/1810171961





1819 में कोई कर गया मेरठ से लन्दन तक सफ़र

Meerut
16-10-2018 04:03 PM

ब्रिटिश शासन में कई उच्च आधिकारियों द्वारा सुरक्षा और राजनैतिक कारणों से कई यात्राएं की जाती थीं। इन यात्राओं ने भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन यात्राओं के कारण भारत से जुड़े उस काल के कई तथ्य सामने आये हैं। इन्हीं में से एक है 1819 और 1820 के दौरान की ब्रिटिश लेफ्टिनेंट थॉमस लम्सडेन द्वारा की गई दुर्लभ यात्रा। उनकी इस रिपोर्ट (“अरब, फारस, आर्मेनिया, जॉर्जिया, रूस, ऑस्ट्रिया, स्विट्ज़रलैंड और फ्रांस से होते हुए भारत के मेरठ से लंदन तक की एक यात्रा”) को 1822 में लंदन में प्राकाशित किया गया, जिसमें उनके द्वारा बनाया गया यात्रा का भ्रमण संबंधी एक मानचित्र भी शामिल है। इस किताब का नाम “भारत से ब्रिटेन तक की यात्रा” से जाना जाता है।

लेखक थॉमस लम्सडेन का जन्म 1789 में हुआ था, और 08 दिसंबर, 1874 को उनकी मृत्यु हो गई। उन्होंने सन 1821 में हे बर्नेट से विवाह किया था। उन्होनें इस यात्रा का प्रारम्भ मेरठ से कलकत्ता तक की यात्रा से किया था। उन्होंने बताया कि भारत में ग्यारह साल की सेवा करने के बाद उन्हें अपने मूल देश में जाने का मौका मिला था। इस यात्रा की शुरुआत मेरठ से रविवार 3 अक्टूबर 1819 को सुबह दो बजे हुई थी। थॉमस लम्सडेन ने बताया कि मेरठ (जो कि एक बड़ी सैन्य छावनी है) से उन्होंने मऊ गांव के लिये छोटी गाड़ियों में यात्रा की, जहां उनके घोड़े उनके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। वहां से वे नौ मील दूर शाहजहांपुर गांव में चले गए, और कुछ खूबसूरत आम के पेड़ों की छाया के नीचे कैंप (Camp) डाला।

जब वे शाजहांपुर से लगभग दस मील दूर राजसी नदी के तट पर पहुंचे, तब प्रत्येक व्याक्ति उस नाव को देखने गया जहां उसके लिये सुविधा प्रदान करने के लिये नौकर पहले से ही तैयार थे। इसका भार लगभग बीस टन था, और लम्बाई चालीस फीट थी। यहां से थॉमस ने कलकत्ता में नाव के उपयोग के लिए कुछ पैसों का भुगतान किया और 1200 मील की दूरी पर स्थित कलकत्ता तक की अपनी यात्रा पूरी की।

उसके बाद उन्होंने नाव से अरब खाड़ी तक, और ज़मीन पर फ़ारस, कौकेसस और दक्षिणी रूस का सफ़र तय किया। साथ ही उन्होंने रस उल-खैमाह के खिलाफ ब्रिटिश नौसेना के विवादास्पद 1819 अभियान के तुरंत बाद मस्क़त से बुशेहर तक खाड़ी के माध्यम से अपनी यात्रा का वर्णन भी किया है।

इस तरह की यात्रा के दौरान विवरण करने वाला अपने जीवन को अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित कर देता है। वे यात्रा के दौरान दिन-प्रतिदिन हर परिस्थिति के बारे में, यात्रा कार्यक्रम, विभिन्न चरणों की स्थिति, एक स्थान की दूसरे से दूरी, जिनमें वे स्थित हैं उन स्थानों का नाम, दौरे की संबंधित तिथियां आदि का सही-सही वर्णन करते हैं। ताकि भविष्य में अन्य यात्रियों के लिए जितना संभव हो सके पूरे मार्ग के मानचित्र के साथ अच्छा काम किया जा सके।

संदर्भ:
1.http://www.sothebys.com/en/auctions/ecatalogue/lot.82.html/2017/travel-atlases-maps-l17405
2.https://goo.gl/HuuSRS
3.http://catherineclarke6.wixsite.com/myers/lumsden-family
4.https://www.abebooks.com/first-edition/Journey-Merut-India-London-Arabia-Persia/22823673980/bd

http://prarang.in/Meerut/1810161957





मैकडॉनल्ड्स की यात्रा और भारत में इसका प्रवेश

Meerut
15-10-2018 02:48 PM

मैकडॉनल्ड्स (McDonald’s) का नाम सुनते ही दिमाग में स्‍वादिष्‍ट फास्‍ट फूड (वेज बर्गर (Veg Burger), चीज़बर्गर (Cheese Burger), फ्रेंच फ्राइस (French Fries), चिकन उत्पाद, सॉफ्ट ड्रिंक्स (Soft Drinks), मिल्कशेक (Milkshake), मिठाईयां आदि) की तस्‍वीरें उभरकर सामने आने लगती हैं। मैकडॉनल्ड्स को अपनी यह छवि बनाने के लिए एक लम्‍बा सफर तय (1940 से) करना पड़ा। जिसके परिणामस्‍वरूप आज इसने विश्‍व स्‍तर पर रेस्तरां की श्रृंखला तैयार कर दी है।

1940 के दौर में रिचर्ड और मौरिस मैकडॉनल्ड द्वारा कैलिफोर्निया में मैकडॉनल्ड की नींव रखी गयी, जिसे इन्‍होंने अपने पिता के हॉट डॉग के फूड स्‍टेंड को स्‍थानांतरित करते हुए "मैकडॉनल्ड्स बार-बी-क्‍यू " के नाम से खोला। यहाँ इन्‍होंने लगभग 25 प्रकार के खाद्य की सूची तैयार की जिसमें बारबेक्यू (Barbecue) प्रमुख थी। 1948 में रेस्‍तरां का नाम मैकडॉनल्ड्स रखा गया। अब तक दोनों भाईयों को एहसास हो गया था कि इन्‍हें हैमबर्गर में ज्‍यादा फायदा हो रहा है। अतः इन्‍होंने अपनी खाद्य सू‍ची में कुछ परिवर्तन किये जिसमें इन्‍होंने कुछ नये खाद्य पदार्थों को जोड़ा तथा कुछ को हटा दिया। साथ ही इन्‍होंने अपने रेस्‍तरां में भी कुछ आवश्‍यक और व्‍य‍वस्थित परिवर्तन किये।

1952 में इनके द्वारा अपने व्‍यवसाय को बढ़ाने और मज़बूत करने के उद्देश्‍य से एक नई इमारत बनाने का निर्णय लिया गया। 1953 में इन्‍होंने अपने लिए फ्रैन्चाइज़ी की खोज प्रारंभ कर दी जिसमें इनके पहले फ्रैन्चाइज़ी पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन के वितरक नील फॉक्स बने। धीरे-धीरे इनके फ्रैन्चाइज़ों की संख्‍या में वृद्धि हुयी और इनके रेस्‍तरां विश्‍व के विभिन्‍न भागों (वर्तमान समय में लगभग 180 देश) में फैले।

1960 के दशक में इन्‍होंने अपने खाद्य पदार्थों को विज्ञापन के माध्‍यम से बेचना प्रारंभ किया। साथ ही यह 22.50 डॉलर में एक शेयर के दाम पर सार्वजनिक भागीदारी (1965) के लिए खोल दिया गया। इसी दौरान इन्‍होंने पहली बार गोल्‍डन आर्च (Golden Arch, सुनहरा महराब) (1962) को अपने प्रतीक चिन्ह के रूप में उपयोग किया। मैकडॉनाल्ड का वर्तमान प्रतीक चिन्‍ह 1968 में अस्तित्‍व में आया जिसे मैकडॉनाल्ड के ‘M’ से लिया गया। 1980 में मैकडॉनाल्ड्स कॉर्पोरेशन उच्‍चतर औद्योगिक औसत वाली 30 कंपनियों में शामिल हुआ। 1990 में इसने चीन में प्रवेश किया।

मैकडॉनाल्ड्स द्वारा अमेरिका में पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई गयी अर्थात इनके द्वारा प्‍लास्टिक के उपयोग में कमी लायी गयी। साथ ही इन्‍होंने 2018 में घोषणा की कि यह पेय पदार्थ को पीने के लिए प्‍लास्टिक (Plastic) के स्‍ट्रॉ (Straw) का उपयोग नहीं करेंगे। 1997 तक इसके विश्‍व में 23,000 रेस्‍तरां खोल दिये गये थे, जिनकी संख्‍या आज लगभग 36,899 है। 1995 में मैकडॉनाल्ड्स ने दो सहयोगी अमित जाटिया और विक्रम बक्शी के साथ भारत में प्रवेश किया। 20वीं सदी के अंत से 21वीं सदी के प्रारंभ का दौर इसके लिए थोड़ा कठिन रहा। इनके द्वारा बनाए गये कुछ नये उत्‍पाद विफल हुए। सा‍थ इनके विरूद्ध कानूनी कार्यवाही भी की गयी। जिसके परिणाम स्‍वरूप इनके खाद्य पदार्थों में अनेक स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक उत्‍पाद शामिल किये गये।

मैकडॉनल्ड्स की फ़्रैंचाइज़ी व्यवस्था के तहत इसमें निवेश के रास्‍ते खोल दिये गये। यह एक प्रकार से लाइसेंस का कार्य करता है। निवेश से प्राप्‍त राशि को रेस्‍तरां के विस्‍तार और विकास में उपयोग किया जाता है। ये फ़्रैंचाइज़ आवधिक होती हैं, जो लगभग बीस वर्ष के लिए होती हैं। मैकडॉनल्ड्स का सबसे बड़ा सहयोगी जापान है जहां लगभग 3,300 रेस्‍तरां हैं। कंपनी और इसके फ्रैंचाइज़ स्‍वतंत्र आपूर्तिकर्ताओं से खाद्य वस्‍तुएं, उपकरण आदि खरिदते हैं जिसकी गुणवत्‍ता का कंपनी द्वारा विशेष ध्‍यान दिया जाता है। ये फ्रैंचाइज़ कंपनी के जोखिम और लाभ के भी समान भागीदार होते हैं।

भारत में मैकडॉनल्ड्स की फ़्रैंचाइज़ी खरीदना थोड़ा कठिन है पर असंभव नहीं। भारत में इसकी फ़्रैंचाइज़ी दो उद्यमी हार्डकैसल रेस्टोरेंट प्राइवेट लिमिटेड के उपाध्‍यक्ष अमित जाटिया (उत्‍तर-पूर्वी भारत) और कनौट प्लाजा रेस्टोरेंट प्राइवेट लिमिटेड के विक्रम बक्शी (दक्षिणी-पश्चिमी भारत) के हाथ में है।

इसकी फ़्रैंचाइज़ी खरीदने के लिए इसके दस्‍तावेजों, जिसमें मैकडॉनल्ड्स के फ़्रैंचाइज़ी धारकों के अधिकारों और जिम्मेदारियों का वर्णन है, को देखने की आवश्‍यकता है। साथ ही इसमें आधार लागत, क्षेत्रफल, प्रशिक्षण, संचालन और विकास खर्चों के बुनियादी सिद्धांत शामिल किये गये हैं। इसमें व्‍यवसायिक शर्तों के साथ कानूनी शर्तों को भी रखा गया है। अतः आपको फ़्रैंचाइज़ी खरीदने से पहले इसको गहनता से समझना आवश्‍यक है। जिसके लिए आप गूगल की सहायता भी ले सकते हैं।

1. मैकडॉनल्ड्स के फ्रैंचाइज़ी में 5 करोड़ रुपये की तरल पूंजी के साथ 6.6 करोड़ रुपये से 14 करोड़ रुपये तक का कुल निवेश आवश्यक है।
2. फ्रैंचाइज़ी शुल्क 30 लाख रुपये है।
3. फ्रेंचाइज़ी के रूप में, आपसे कुल विक्रय का 4% शुल्क लिया जाएगा।

इस वर्ष भारत के उत्‍तर पूर्वी भाग में मैकडॉनल्ड्स का सबसे अधिक विक्रय दर्ज किया गया है। भारत में भी इसने अनेक उतार चढ़ाव देखे किंतु फिर भी इसका व्‍यवसाय भारत में तीव्रता से बढ़ता जा रहा है।

संदर्भ:
1.https://en.wikipedia.org/wiki/History_of_McDonald%27s
2.http://time.com/money/4602541/the-founder-mcdonalds-movie-accuracy/
3.https://marketrealist.com/2013/12/franchise-mcdonalds-franchise-agreements-work/
4.https://www.quora.com/How-much-does-it-cost-to-open-a-McDonalds-franchise-in-India-What-are-the-returns-if-it-doesnt-work
5.https://www.businessinsider.in/How-to-open-a-McDonalds-Franchise-in-India-How-much-will-it-cost-who-to-contact/articleshow/54525662.cms

http://prarang.in/Meerut/1810151951





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