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कब और किसके द्वारा शुरू हुई भारत में वैज्ञानिक वानिकी

Meerut
18-06-2018 12:39 PM

वनों का महत्व मानव जीवन में अत्यधिक है। यह पृथ्वी के जीवों के उद्भव के काल से लेकर वर्तमान समय तक सभी जीवों को प्राणवायु देते आ रहे हैं। वन पृथ्वी के वायुमंडल को बनाये रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं। पाषाण कालीन मानव इन्हीं जंगलों और पर्वतों की कंदराओं में अपना जीवन यापन करता था तथा उसके लिए प्रचुर मात्रा में आहार की उपलब्धता इन्हीं जंगलों से होती थी। वर्तमान मेरठ जिस स्थान पर बसा हुआ है वह स्थान एक समय में अत्यंत सघन वन हुआ करता था। यहाँ पर स्थित हस्तिनापुर जो कि वर्तमान काल में एक छोटा सा जंगल है, कभी वह एक बड़े क्षेत्र में फैला हुआ करता था। हस्तिनापुर का वर्णन हमें महाभारत में मिलता है जहाँ पर इस स्थान को एक अत्यंत सघन जंगल होने का प्रमाण मिलता है।

करीब 2000 ईसा पूर्व में विश्व की आबादी करीब 27 मिलियन थी (2 करोड़ 70 लाख)। इस अनुसार देखा जाए तो आज उत्तर प्रदेश की आबादी कुल 20 करोड़ है और मेरठ की जनसंख्या करीब 35 लाख है जो यह प्रदर्शित करती है कि विश्व भर की आबादी आज किस स्तर पर बढ़ी है। जनसँख्या ज्यादा होने के कारण लोगों ने जंगलों को काटना शुरू कर वहां पर बसना शुरू किया और ऐसा समय आया जहाँ पर हर जगह जंगल हुआ करता था वहां जंगल या तो ख़त्म हो गया या तो एक छोटे क्षेत्र में सिमट कर रह गया है। मानवों द्वारा पेड़ों का संहार बड़े पैमाने पर किया गया चाहे वो खेत बनाने के लिए या फिर उन लकड़ियों से घरों का निर्माण करने के लिए हो। उद्योगों की स्थापना ने जंगलों को समेटने में बड़ी भूमिका निभायी। मेरठ जो कभी जंगल से गुलजार हुआ करता था तथा जहाँ कभी हाथी, बाघ, जंगली सूअर, तेंदुआ और अन्य कई प्रकार के जानवर चला करते थे वो एक छोटे से इलाके में तब्दील हो गया और यहाँ के जानवर तो मानो विलुप्त से हो गए। यहाँ पर जानवरों का शिकार भी बड़े पैमाने पर किया गया। जंगली सूअरों को भाले से मारने का खेल यहाँ पर बड़ी उत्सुकता द्वारा अंग्रेजों द्वारा खेला जाता था।

भारत में जंगलों के संरक्षण और उनके अध्ययन का कार्य ह्यूग फ्रांसिस क्लार्क क्लेगहॉर्न ने किया था। इनका जन्म मद्रास में 1820 में हुआ था। उन्होंने 1841 में एडिनबरा में चिकित्सा में स्नातक की उपाधि प्राप्त की और वहाँ के रॉयल बॉटनिकल गार्डन में रॉबर्ट ग्राहम के सानिध्य में वनस्पति विज्ञान में प्रशिक्षण प्राप्त किया। क्लेगहॉर्न 1842 में ईस्ट इंडिया कंपनी के अंतर्गत मद्रास चिकित्सा विभाग में शामिल हुए और 1852 में उन्होंने वनस्पति विज्ञान में रूचि दिखाना शुरू किया। 1852 में उन्होंने वानस्पतिक सर्वेक्षण कोयम्बटूर का गठन किया। वनों का पेशेवर तरीकों से संरक्षित करने पर उनकी रिपोर्ट भारत भर में वन विभागों की स्थापना के लिए मील का पत्थर साबित हुयी। 1855 में भारत का पहला वन विभाग मद्रास में बनाया गया जहाँ पर क्लेगहॉर्न को वन का पहला संरक्षक बनाया गया। इन्हीं सभी कारकों के चलते भारत के जंगलों का संरक्षण शुरू हुआ और मेरठ के आस-पास के जंगलों का भी संरक्षण इन्हीं कारकों से शुरू हुआ। मेरठ के पास स्थित सहारनपुर वानस्पतिक उद्यान का एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है मेरठ और आस-पास के क्षेत्रों के जंगलों के संरक्षण में। चित्र में दिखाया गया देहरादून का वन शोध संस्थान अपनी तरह का इकलौता संस्थान है भारत में जो वनों के संरक्षण और उनके वैज्ञानिक तरीके से किये जाने वाले फैलाव व बसाव पर कार्य करता है।

संधर्भ

1. https://www.quora.com/What-is-scientific-forestry
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Forest_Research_Institute_(India)
3. http://www.thehindu.com/lf/2005/02/01/stories/2005020100810200.htm
4. https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_forest_research_institutes_in_India
5. http://www.worldhistorysite.com/population.html


रविवार कविता

Meerut
17-06-2018 08:01 AM

यह कविता भारत भूषण जी की लिखी हुई है. भारत भूषण का जन्म उत्तरप्रदेश के मेरठ में हुआ था। इन्होंने हिन्दी में स्नातकोत्तर शिक्षा अर्जित की और प्राध्यापन को जीविकावृत्ति के रूप में अपनाया। एक शिक्षक के तौर पर करियर की शुरुआत करने वाले भारत भूषण बाद में काव्य की दुनिया में आए और छा गए।आये पड़ते है उनकी ये कविता
परिवार के या प्यार के या गीत के या देश के
यह तो कहो किसके हुए

कन्धे बदलती थक गईं सड़कें तुम्हें ढोती हुईं
ऋतुएँ सभी तुमको लिए घर-घर फिरीं रोती हुईं
फिर भी न टँक पाया कहीं टूटा हुआ कोई बटन
अस्तित्व सब चिथड़ा हुआ गिरने लगे पग-पग जुए --

संध्या तुम्हें घर छोड़ कर दीवा जला मन्दिर गई
फिर एक टूटी रोशनी कुछ साँकलों से घिर गई
स्याही तुम्हें लिखती रही पढ़ती रहीं उखड़ी छतें
आवाज़ से परिचित हुए गली के कुछ पहरूए ---

हर दिन गया डरता किसी तड़की हुई दीवार से
हर वर्ष के माथे लिखा गिरना किसी मीनार से
निश्चय सभी अँकुरान में पीले पड़े मुरझा गए
मन में बने साँपों भरे जालों पुरे अन्धे कुएँ
यह तो कहो किसके हुए ---

संदर्भ

1.http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%B7%E0%A4%A3_/_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%AF
2https://goo.gl/djYBka


डिप्रेशन

Meerut
16-06-2018 11:03 AM

वर्तमान काल में एक बड़ी समस्या हमारे समक्ष उभर कर आई है और यह समस्या हमारे स्वास्थ्य और समाज से जुड़ी है। अक्सर हम खिन्नता (Depression) और आघात के विषय में बात करने से कतराते हैं परन्तु यह एक ऐसा विषय है जिसपर हमें आज बात करने की आवश्यकता है। प्रत्येक वर्ष अकेले भारत में करीब 4,00,000 लोग आघात से मारे जाते हैं। आघात मन में दबी खिन्नता से आता है जो कि एक जानलेवा समस्या बन कर सामने उभर जाता है। चिंता चिता समान है और जब कोई चिंता या खिन्नता मनुष्य के दिमाग में घर बना लेती है तो यह आघात का रूप ले लेती है। यह महत्वपूर्ण विषय है कि खिन्नता या चिंता आदि के विषय में ज्यादा से ज्यादा आकार पर सोचा या विचारा जाए।

विगत कुछ वर्षों से इन विषयों के उपर भारत में विचार विमर्श होना शुरू हुआ है और यह जरूरी भी है। दुनिया भर में खिन्नता एक आम बीमारी है जिस से 300 मिलियन से ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं। पुरुषों (3.6%) की तुलना में महिलाओं (5.1%) के बीच खिन्नता सबसे आम है। दुनिया भर में खिन्नता से पीड़ित लोगों की कुल संख्या 322 मिलियन से अधिक है। इन पीड़ित लोगों में से लगभग आधे दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में रहते हैं जिसमें चीन और भारत जैसे अति जनसँख्या वाले देश भी शामिल हैं। वर्तमान में भारत की करीब 4.5% आबादी मानसिक खिन्नता से पीड़ित है। चीन में खिन्नता से पीड़ित लोगों की संख्या वहाँ की कुल आबदी का करीब 4.2% है। भारत में चिंता से पीड़ित लोगों की संख्या कुल 38 मिलियन है जो प्रतिशत के अनुसार 3% है। यदि इन दोनों आंकड़ों को मिला कर देखा जाए तो यह दर्शाता है कि भारत की करीब 7.5% जनसँख्या मानसिक बीमारियों से जूझ रही है तथा इसके कारण ही आघात से होने वाली मौतों का आंकड़ा बढ़ रहा है।

विश्व विकलांगता के आंकड़े में सबसे बड़ा योगदानकर्ता के रूप में डब्ल्यू.एच.ओ. द्वारा चिंता को स्थान दिया गया है। यह आत्महत्या का भी एक प्रमुख कारण है जो प्रति वर्ष 8,00,000 के करीब है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 2005 से 2015 तक चिंता का प्रसार 18 प्रतिशत बढ़ गया है। यह प्रदर्शित करता है कि क्यों चिंता एक प्रमुख समस्या है और यह किस प्रकार से समय दर समय बढ़ रही है। इस समस्या के समाधानों की जांच करना एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है तथा चिंता या कुंठा को मन में दबा कर रखने के अलावा उसको उजागर करना एक महत्वपूर्ण बिंदु है। अतः यदि आप कभी खिन्नता महसूस करें तो अपने करीबियों से चर्चा करें और यदि आपके आस-पास कभी कोई ऐसा महसूस करे तो ज़रूर उससे बात कर उसकी सहायता करें। याद रखें, डिप्रेशन एक बहुत ही गंभीर मुद्दा है और इसके बारे में चर्चा करना कोई शर्म वाली बात नहीं है।

1.https://www.dailyo.in/lifestyle/depression-mental-disorder-anxiety-healthcare/story/1/22165.html
2.https://timesofindia.indiatimes.com/life-style/health-fitness/health-news/Are-you-depressed-and-dont-know-it/articleshow/51596721.cms
3.https://timesofindia.indiatimes.com/life-style/health-fitness/health-news/depression-causes-signs-symptoms-prevention/articleshow/61487507.cms


ईद उल फ़ितर का अर्थ एवं महत्त्व

Meerut
15-06-2018 12:30 PM

ईद-उल-फ़ितर दुनिया-भर में मुसलमानों द्वारा मनाया जाने वाला एक मुबारक (शुभ) त्यौहार है। यह अवसर रमज़ान के इस्लामी पवित्र महीने के रोज़े (उपवास) का अंत है। ऐसी मान्यता है कि इस महीने में पैगम्बर मुहम्मद को पवित्र कुरान की पहली श्रुति (प्रकाशन) मिली। उत्सव की तारीख़ नए चंद्रमा की दृष्टि के संयोजन के साथ-साथ खगोलीय गणना पर भी निर्भर करती है। इसके अलावा, ईद की शरूवात इस बात पर भी निर्भर करती है कि एक व्यक्ति दुनिया में कहां स्थित है । ईद का उत्सव केवल चंद्रमा देखने के बाद ही शुरू होता है।

ईद-उल-फ़ितर का अर्थ है ‘रोज़े (उपवास) को तोड़ना’, जो एक महीने तक चलते हैं। यह जश्न तीन दिनों तक मनाया जाता है और इसे ‘छोटी ईद’ भी कहा जाता है। सुन्नत के अनुसार, रोज़े के समय प्रत्येक मुसलमान सुबह जल्दी उठता है, अपने सलात-उल-फ़ज (दैनिक प्रार्थना) का जप करता है, स्नान करता है और इत्र लगाता है। लोगों द्वारा सिर झुकाकर विशेष सामूहिक प्रार्थना करने से पहले एक हार्दिक नाश्ता खाना एक पंरपरा है।

इस्लाम विश्वास रखता है कि अमीर और गरीब के बीच की असमानता को दूर करने के लिए एक पुल की जरूरत है। इस्लाम के अनुसार ज़कात देना, मतलब दान देना अनिवार्य है। हर मुस्लिम को अपनी वार्षिक कमाई का 2.5% दान करना होता है और यह पूरे साल में कभी भी किया जा सकता है, लेकिन अधिकतर लोगों द्वारा यह पवित्र रमज़ान के महीने में किया जाता है।

रमजान महीने के अंत में यह त्यौहार प्रत्येक मुस्लिम द्वारा एक समान रूप से मनाया जाता है। यह जश्न मनाना एक मुस्लिम के लिए तब तक उचित नहीं है, जब तक उसका गरीब पड़ोसी भी जश्न मनाने के काबि़ल न हो। इस प्रकार ईद-उल-फ़ितर में ‘फ़ितर’ वह दान है, जो दान करने में सक्षम मुस्लिम द्वारा अपने गरीब पड़ोसी या जरूरतमंद मुस्लिम को दिया जाता है, ताकि दोनों एक समान रूप से त्यौहार मना सकें।

ईद-उल-फ़ितर की शुरूवात ‘शव्वल महीने’ के पहले दिन से होती है, जो उस महीने का एकमात्र दिन है जब मुसलमानों को रोज़ा रखने की अनुमति नहीं होती है। ईद महीने का पहला दिन किसी भी चंद्र हिजरी महीने पर निर्भर करता है। इस मौके पर एक विशेष ‘सलात’ (इस्लामी प्रार्थना) होती है, जो दो ‘रकातों’ (इकाइयों) से मिलकर बनती है। आम तौर पर एक बड़े गोले या खुले मैदान में प्रार्थना की जाती है। प्रार्थना, केवल एक जनसमूह में की जाती है। प्रार्थना में छह तकबीर होते हैं; जिसमें दोनों हाथों को उपर उठाकर कानों तक लाया जाता है और ‘अल्लाह-हू-अकबर’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि ‘ईश्वर महान है’।

1.http://indianexpress.com/article/lifestyle/life-style/eid-ul-fitr-2018-know-the-importance-and-significance-of-eid-ul-fitr-ramdan-and-why-we-celebrate-eid-ul-fitr-5214551/
2.https://www.quora.com/What-is-the-meaning-of-Eid-ul-Fitr-Why-is-the-holy-month-called-Ramzan


आखिर कौन था वो आबू लेन वाला आबू?

Meerut
14-06-2018 05:37 PM

यूं तो मेरठ के बारे में हमें काफ़ी किताबों में पढ़ने को मिल जाता है। और इन किताबों में से कई तो काफी प्राचीन भी हैं। परन्तु क्या आप जानते हैं कि मेरठ का ज़िक्र थॉमस बेकन नाम के एक व्यक्ति की सन 1840 की एक किताब ‘ओरिएण्टल एनुअल 1840’ में भी पाया गया है? जी हाँ। और तो और ये किताब इस किताब में उस समय के मेरठवासियों से वार्तालाप कर कुछ बिंदु भी दिए गए हैं। संभवतः, यह मेरठ के बारे में बताने वाली पहली किताब हो सकती है जिसे किसी अंग्रेज़ ने लिखा हो। उन्हीं में से एक विषय है मेरठ की प्रसिद्ध आबू लेन का। एक समय में इस स्थान पर एक आबू का मकबरा हुआ करता था जिसे सन 1688 में बनवाया गया था, जो है तो आज भी मौजूद परन्तु बहुत बुरी हालत में। अब लेखक की रूचि यह जानने में थी कि आखिर ये आबू था कौन जिसका मकबरा मेरठ में इतना मुख्य माना जाता है। तो आइये आज जानते हैं आबू लेन के आबू के बारे में।

लेखक के अनुसार उन्हें मेरठ के कुछ लोगों से इस विषय में पूछकर एक नहीं बल्कि करीब 45-46 आबू की जानकारी प्राप्त हुई। और हैरत की बात तो ये कि उनमें से हर एक आबू से कोई रोचक कथा जुड़ी थी। यानी 1840 के समय में भी इस बारे में किसी को निश्चित जानकारी नहीं थी। सबको बस एक अंदाज़ा ही था। उन सभी में से लेखक को 3 आबू ऐसे लगे जिनके नाम पर इस मकबरे का नाम पड़ा हो सकता है। उन 3 आबू के बारे में लेखक द्वारा प्राप्त जानकारी निम्न थी-

1.आबू बकर:
कुछ इतिहासकारों द्वारा इस आबू को अल-राज़ी की शक्ति का मुख्य बिंदु कहा जाता था। कहा जाता है कि इस आबू को तीन बार दफनाया गया था। वास्तव में उनकी जिंदगी हर तरीके से त्रयात्मक ही थी, जिस हिसाब से उनके 3 मकबरे भी बनाये जाते चाहिए थे। आबू बकर 3 अलग-अलग ख़लीफ द्वारा 3 बार वज़ीर चुने गए थे, उन्होंने 3 बार ही मक्का की भी यात्रा की थी, 3 बार उन्होंने क़ुरान के पाक़ पाठों का अनुकरण किया था, और जैसा कि ऊपर बताया गया है, उन्हें दफ़नाया भी 3 बार गया था।

2. आबू ओबैदा:
आबू ओबैदा को फ़ारस (ईरान) पर आक्रमण करने के लिए सेना के सेनापति के रूप में सबसे योग्य माना गया था। ओबैदा पूरी फ़ौज लेकर फरात नदी पर फ़ारस की सेना के सामने खड़ा हो गया और वहीँ अपनी छावनी लगा बैठा। फ़ारस की सेना में करीब 80,000 सैनिक थे तो वहीँ ओबैदा की सेना में सिर्फ 9,000, इसके बावजूद वो अपनी पूरी सेना को लेकर फ़ारस की सेना से लड़ने चला गया। आबू ओबैदा की फ़ौज का हर सैनिक दूसरी सेना के कम से कम 10 सैनिकों को मारने का दावा करता था, परन्तु फ़ारस की सेना में मौजूद हाथियों से लड़ने का उनको कोई अनुभाव नहीं था। इससे आबू के सैनिक थोड़े डर गए परन्तु आबू मुस्कुराते हुए दूसरी सेना के सेनापति शेह्रिऔ की ओर बढ़ने लगा। शेह्रिऔ एक सफ़ेद हाथी पर सवार था। अनगिनत भालों से बचते हुए आबू शेह्रिऔ तक पहुंचा और उसे हाथी से नीचे धकेल दिया और फिर उसे बीच में से चीर दिया। यह देख शेह्रिऔ का हाथी क्रोधित हो उठा परन्तु आबू ने हाथी की सूंड पर वार किया। परन्तु इस प्रक्रिया में आबू का पैर फिसल गया और वो ज़मीन पर जा गिरा। इससे पहले कि वो खुदको संभालता, घायल हाथी आबू के ऊपर आ गिरा और एक मक्खी की तरह आबू को पीस दिया।

3. आबू अक्कर:
आबू अक्कर वैसे तो अमीर इस्माइल के घर का एक मामूली सा ग़ुलाम था, परन्तु उसके एक कार्य की वजह से उसका नाम अमर हो गया। उमर लाइस को पराजित करने के बाद अमीर इस्माइल ने उसके इलाके पर कब्ज़ा कर लिया और उसे बंदी बना लिया। वह जानता था कि उमर ने कहीं ना कहीं एक खज़ाना छिपा कर रखा है। उमर से पूछने पर यह जवाब मिला कि उसने जंग से पहले ही सारा खज़ाना हेरात भिजवा दिया था ताकि वो किसी के हाथ ना लग सके। यह सुनकर अमीर ने एक टुकड़ी हेरात की ओर भी भेजी परन्तु खज़ाना कहीं न मिला। अब अमीर इस्माइल की फ़ौज का सब्र ख़त्म हो रहा था। वे अपना ईनाम चाहते थे। एक रास्ता था कर (Tax) को तीन गुना कर देना परन्तु अमीर ने वह रास्ता नहीं चुना। कुछ दिन में कोलाहल और बढ़ गया और अंत में अमीर के परिवार ने अपने आभूषणों से फ़ौज को ईनाम देने का फैसले किया। जैसे ही अमीर के परिवार की एक महिला ने अपना हार उतारा, एक चील उड़ते हुए आई और उसे मांस का टुकड़ा समझ अपने पंजों में दबा ले गयी। यह देख आबू अक्कर तुरंत एक घोड़े पर सवार हुआ और उस चील का पीछा करने लगा। कुछ देर में जब चील ने हार नीचे फेंका तो वो एक कुँए में जा गिरा। कुंआ सूखा पड़ा था तो आबू हार वापस लाने को उसमें उतर गया। परन्तु उसे वहाँ हार के अलावा और भी बहुत कुछ मिला। हीरे जवाहरात से भरी तिजोरियां उसी कुँए में छिपाई गईं थी। आबू ने वापस जा कर अमीर को इस बारे में बताया और सभी फौजियों को उनका ईनाम प्राप्त हुआ। उस दिन से आबू अक्कर को एक धनी व्यक्ति बना दिया गया, और उसकी उदारता के किस्से उसके अच्छे भाग्य के जितने ही मशहूर हो गए।

1. द ओरिएण्टल एनुअल 1840, थॉमस बेकन


हम मेरठियों की खड़ी बोली

Meerut
13-06-2018 01:56 PM

खड़ी से अर्थ है ‘खरी’ अर्थात् ‘शुद्ध’, मतलब ‘ठेठ हिन्दी बोली’। शु़द्ध अथवा ठेठ हिन्दी बोली या भाषा को उस समय खरी या खड़ी बोली के नाम से संबोधित किया गया जब हिंदुस्तान में अरबी, फारसी, और हिंदुस्तानी मिश्रित शब्दों व उर्दू भाषा का चलन था। लगभग 18वीं शताब्दी के आरम्भ में कुछ हिन्दी गद्यकारों ने ठेठ हिन्दी में लिखना शुरू किया था। खड़ी बोली से तात्पर्य खड़ी बोली हिन्दी से है, जिसे भारतीय संविधान ने राजभाषा के रूप में स्वीकार किया है।

खड़ी बोली पश्चिम रूहेलखण्ड, गंगा के उत्तरी दोआब और अंबाला जिले की उपभाषा है, जो ग्रामीण जनता के द्वारा मातृभाषा के रूप में बोली जाती है। इस प्रदेश में मेरठ, रामपुर, बिजनौर, मुज़फ्फरनगर, मुरादाबाद, सहारनपुर, देहरादून का मैदानी भाग, अंबाला और भूतपूर्व पटियाला रियासत के पूर्वी भाग आते हैं।

आज जिस हिन्दी भाषा को तीस करोड़ लोग बोल रहे हैं, उस खड़ी बोली के विकास में हरिऔध जी का ऐतिहासिक योगदान रहा है। एक महाकाव्य के रूप में सबसे पहले हरिऔध के “प्रिय प्रवास” ने ही खड़ी बोली की दुंदभी बजाई थी।

1.https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%96%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A5%80%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80
2.https://hindi.yourstory.com/read/bb52d9dcfe/first-world-poet-39-


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