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लखनऊ का सफ़ेद बारादरी

Lucknow
13-03-2018 10:49 AM

बारादरी शब्द दो शब्दों के संयोग से बना है पहला है बारा= बारह और दूसरा है दरी-द्वार अर्थात बारादरी का शाब्दिक अर्थ है बारह द्वार की इमारत। लखनऊ के कैसर बाग़ में स्थित बारादरी अपने सफेद रंग के कारण सफेद बारादरी के नाम से भी जाना जाता है, वर्तमानकाल में यह उत्सव और संगीत के लिए प्रयोग किया जाता है, जहां शहर के अभिजात वर्ग विवाह स्वागत समारोह आयोजित करता है। परन्तु शायद ही कुछ लोग को यह पता होगा की बारादरी एक शोक मानाने की ईमारत थी। इस ईमारत का नाम कसर-उल-एज़ा है। जैसा कि यह अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह द्वारा इमाम हुसैन और कर्बला में उनके अनुयायियों के शहीदी के लिए आजादारी (शोक) को मानाने के लिए इमामबारा के रूप में बनवाया गया था।

लखनऊ के प्रमुख बारादरी (सफ़ेद बारादरी) में वैसे तो कई द्वार हैं पर प्रमुख द्वार पर एक बड़ी छत की तरह है जिसपर संगमरमर पर नक्काशी की गयी है। इसके ऊपर अष्टकोणीय मीनार है। सफ़ेद बारादरी के अन्दर के भाग में अत्यंत विशिष्ट स्टको का कार्य किया गया है तथा इसके द्वारों पर भी गहन कलाकारी की गयी है। इस बारादरी में महाराजा मान सिंह और दिग्विजय सिंह बलरामपुर की प्रतिमाये लगायी गयी हैं जो की अंजुमन-ए-हिन्द के संस्थापक थे। वर्तमान काल में यह विवाह आदि उत्सवों के लिए प्रयोग में लायी जाती है, पर आज भी इसकी कलाकारी किसी का भी ध्यान आकर्षण करने में पीछे नहीं हटती।

1.इनक्रेडिबल लखनऊ: ए विजिटर्स गाइड, सैयद अनवर अब्बास


लज़ीज़ लखनवी बिरियानी

Lucknow
12-03-2018 11:30 AM

लखनऊ को नवाबी व कबाबी का शहर कहा जाता है और यह एक तरह से गलत भी नहीं है पर यदि कहा जाये यहाँ के कबाब के अलावा एक ऐसा खाना है जो यहाँ के नाम से ही जाना जाता है तो वह है यहाँ की बिरियानी। लखनवी बिरियानी लखनऊ के रसोईं का एक महत्वपूर्ण नगीना है। भारत के कुछ गिने-चुने मध्यकालीन शहरों की अपनी अलग प्रकार की बिरियानी होती हैं जैसे मुरादाबाद की मुरादाबादी बिरियानी, हैदराबाद की हैदराबादी बिरियानी और लखनऊ की लखनवी बिरियानी आदि। लखनवी बिरियानी बनाने में बासमती चावल, चिकन, प्याज, अदरक की चटनी, लहसुन की चटनी, हरा मिर्च, मिंट, धनिया की पट्टी, नारियल, खुस-खुस पानी, मलाई, दही, धनिया का बुक्का, मिर्च बुक्का, हल्दी, नमक, तेल, घी, निम्बू, दूध, केसरिया रंग (खाने वाला), केवड़े का पानी, लौंग, कालीमिर्च, दालचीनी, हरी इलायची, काली इलायची, जीरा आदि।

बिरियानी बनाने के लिए चिकन को ऊपर बताये गए सभी मसालों में अच्छे से मिला लिया जाता है तथा उसे दो घंटे के लिए

अच्छे से मिल जाने के लिए छोड़ दिया जाता है। बासमती चावल को भी अच्छी तरीके से धो कर एक घंटे तक पानी में फूलने के लिए छोड़ दिया जाता है बाद में ठीक मात्रा में पानी में चावल को पका लिया जाता है और उसमे जीरा व नमक मिला कर अच्छे से चलाया जाता है। चावल को मात्र आधा ही पकने दे। चिकन को पकाने के लिए एक कधी में घी या टेक ले और ऊपर बताये गए सभी गरम मसलों को दाल हलकी आंच में चलायें अब इसमें चिकन डाले और मध्यम आंच पर 15-20 मिनट तक पकाएं। 15 मिनट के बाद आप देखेंगे की सारा तेल ऊपर की तरफ तैरने लगेगा अब आग को बुझा कर उसपर मिंट और धनिया की पट्टी डाले और 10 मिनट के लिए इसे ढक दें। अब एक गहरा बर्तन लें (एक ढक्कन के साथ) जिसको हलकी आंच पर रखा जा सकता हो, अब उस बर्तन में घी लगायें और बाद में चिकन डालें और चिकन को फैला दें। अब अधपका चावल उसपर डालें और उसे भी चिकन की तरह फैला दें। अब ऊपर दिए गये पत्तों आदि को बिरियानी के ऊपर फैला दें और बर्तन के ऊपर एक साफ़ तौलिया रखें फिर उसे बर्तन के ढक्कन से बंद कर दें। अब इसे 20 मिनट तक हलकी आंच में पकने दें। अब स्वादिष्ट लखनवी बिरियानी तैयार है।

1.द क्लासिक क्युज़ीन ऑफ लखनऊ, ए फूड मेमोयर बाय मिर्ज़ा ज़ाफर हुसैन
2.http://secretindianrecipe.com/recipe/lucknowi-chicken-biryani-recipe-rich-chicken-biryani-lucknow
3.http://www.spoonforkandfood.com/lucknowi-murg-biryani-awadhi-chicken-biryani-recipe


लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा

Lucknow
11-03-2018 08:44 AM

लखनऊ अपनी विशिष्ट इमारतों व उनकी विशेष कला के लिये जाना जाता है यहाँ पर अनेक अद्भुत महल, मस्जिद, इमामबाड़ा, मकबरों आदि का निर्माण किया गया है। लखनऊ में बने इमारतों का सीधा श्रेय अवध के चौथे नवाब असफ-उद-दौला को जाता है जिन्होंने लखनऊ को अवध की राजधानी बनायी। उनको लखनऊ के शुरूआती दौर के विकास के लिए भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। असफ-उद-दौला लखनऊ के पहले नवाब थे जिन्होंने यहाँ पर महल, बगीचे, धार्मिक व अन्य इमारतों की रचना करवाई। असफ-उद-दौला द्वारा बनवाये गए शुरूआती और सबसे बड़ी ईमारत लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा था। यह इमामबाड़ा-ए-असफी नाम से भी जाना जाता है, यह पुराने शहर की आज भी सबसे बड़ी इमारत है।

नवाब ने इस इमामबाड़ा का निर्माण 1783-84 में आये भुखमरी के दौरान लोगों को रोजगार देने के लिए किया था और इसके निर्माण कार्य में करीब बीस हज़ार लोगों को रोजगार मिला था। इसके निर्माण में कई मशहूर हस्तियाँ भी मजदूरी का कार्य कर रही थी तथा उनको दर था की कहीं उनको कार्य करते हुए कोई और देख न ले इस लिए नवाब ने इसका निर्माण शाम व रात्रि में कराने का फैसला लिया। रात्रि के समय का कार्य नौसीखियों द्वारा किया जाता था जिससे वह ठीक तरीके से नहीं होता था बाद में दिन के समय उसको तोड़ कर राजगीरों द्वारा उसको पुनः बनाया जाता था। यह इमामबाड़ा 6 सालों में तैयार हुआ तथा करीब इसपर एक करोड़ रूपए का खर्च हुआ। इस इमामबाड़े के आकर को किफ़ायत-उल्लाह के द्वारा बनाया गया था। इस इमामबाड़े की कला इंडो-सारसैनिक है जिसमे कुछ मुग़ल और राजपूत कला के अंग दिखाई देते हैं।

1.इनक्रेडिबल लखनऊ: ए विजिटर्स गाइड, सैयद अनवर अब्बास


लखनऊ के सफ़ेद बाघ आखिर कहाँ से आये

Lucknow
10-03-2018 09:06 AM

बाघ तो वैसे भारत में कई स्थानों पर पाए जाते हैं पर सफ़ेद बाघ पूरे विश्व में मात्र भारत में पाया गया था। समस्त सफ़ेद बाघ बंगाल बाघ के ही नस्ल के हैं मात्र ये जीन्स में बदलाव के कारण सफ़ेद हो जाते हैं। भारत में सर्वप्रथम सफ़ेद बाघ 1556-1605 के दौरान प्रकाश में आया था। सफ़ेद बाघों के इतिहास में सर्वप्रथम सन 1915 में रीवा के महाराज गुलाब सिंह द्वारा सफ़ेद बाघ पकड़ा गया था जो की करीब 2 वर्ष का था। वह महाराज के महल पर अगले 5 वर्षों तक रहा फिर उसे मार दिया गया और उसमे फूस भर कर किंग जॉर्ज पंचम को भेट स्वरुप भेज दिया गया।

मई 1951 को महाराजा मार्तंड सिंह द्वारा रीवा के जंगलों से ही एक अन्य बाघ का बच्चा देखा गया जो की अपने 4 भाइयों बहनों में अकेला सफ़ेद बाघ था। मार्तंड सिंह को यह बाघ का बच्चा पकड़ने के लिए उसके माँ व उसके 2 अन्य बच्चों को मारना पड़ा था। अन्तोगत्वा यह बाघ का बच्चा पकड़ा गया और उसे महाराजा के 150 कमरों के आलीशान महल में रखा गया था। मात्र 3 दिन के भीतर ही यह बच्चा भागने में सफल रहा और उसे पकड़ने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी पर पुनः उसे पकड़ लिया गया। फिर आजीवन वह बाघ एक कमरें में रखा गया यह बाघ आगे चलकर मोहन नाम से जाना गया। मोहन को कई बाघिनों जैसे बेगम, राधा आदि के साथ रखा गया जिससे कई सफ़ेद बच्चे हुए।

वर्तमान काल में भारत व कई अन्य देश में पाए जाने वाले सफ़ेद बाघ मोहन बाघ की ही संताने हैं। मोहन बाघ की मृत्यु 19 साल 7 महीने की अवस्था में हो गयी थी। मोहन के अलावा जंगली बाघ में एकमात्र बाघ सन 1958 में बिहार में देखा गया था जिसे वहीँ पर मार दिया गया था। अब जंगलों से सफ़ेद बाघ पूरी तरह से विलुप्त हो चुके हैं। लखनऊ चिड़ियाघर में भी पाए जाने वाले सभी सफ़ेद बाघ मोहन की ही संतानों की ही संताने हैं। वर्तमान काल में लखनऊ चिड़ियाघर सफ़ेद बाघों के लिए जन्नत बना हुआ है यहाँ का सफ़ेद बाघ आर्यन और बाघिन सोना यहाँ के बाघों की जनसँख्या में वृद्धि कर रहे हैं। मध्यप्रदेश के रीवा में अब एक सफ़ेद बाघों की सफारी का भी प्रबंध किया जा रहा है जैसा की ज्ञात हो सभी सफ़ेद बाघों की नस्ल को आगे बढाने का कार्य यही से शुरू हुआ था।

1.द टाइगर्स इन इंडिया: अ नेचुरल हिस्ट्री, जे. सी. डेनिअल
2.http://www.lairweb.org.nz/tiger/rewa2.html


आखिर क्या है ये डीएनए?

Lucknow
09-03-2018 02:06 PM

बच्चे अपने माता पिता के इतने समान फिर भी अलग क्यों दिखते हैं? एक जीव दूसरे जीव की तरह क्यूँ नहीं होता? जो बीमारी या विशेषताएँ हमारे पूर्वजों अथवा हम में होती हैं वो बच्चों में कैसे आ जाती हैं? इन सभी प्रश्नों का उत्तर है – डीएनए (DNA)। डीएनए डिओक्सीराइबोनुक्लेइक एसिड (Deoxyribonucleic acid) का संक्षेप है। घुमावदार सीढ़ी की तरह संरचना वाला यह अणु सभी जीवों की अनुवांशिक सामग्री की पोटली है। कुछ विषाणु छोड़कर सभी सजीवों में डिओक्सीराइबोनुक्लेइक अम्ल मिलते हैं, उन कुछ विषाणुओं में राइबोनुक्लेइक(Ribonucleic) अम्ल होते हैं।

डी.एन.ए. के अणुओं में अनुवांशिक गुणों का संकेत होता है जिसे अनुवांशिक कूट कहते हैं। कोशिका के केन्द्रक के डीएनए में प्रोटीन संश्लेषण हेतु सूचना निहित होती है तथा डीएनए के कण में नुक्लेओटाइड (Nucleotide) नामक नाइट्रोजन (Nitrogen) युक्त वस्तु रहती है जो चार प्रकार की है, अडेनिन(Adenine), ग्वानिन(Guanine), थाइमिन (Thymine) और साइटोसिन(Cytosine)। यह नुक्लेओटाइड एक दूसरे के साथ जोड़ी बनाते हैं जिसे फॉस्फेट(Phosphate) की अणु जोड़े रखती है जो फिर एक श्रृंखला बनाते हैं जिसे हम पॉलीन्यूक्लियोटाइड (Polynucleotide) श्रृंखला कहते हैं। डीएनए कोशिकाओं में गुणसूत्रों (क्रोमोजोम: Chromosome) के रूप में रहता है जो सभी अनुवांशिक गुणों को निर्धारित व संचारित करते हैं। प्रत्येक प्रजाति में गुणसूत्रों की संख्या निश्चित रहती है। मानव के शरीर में 23 जोड़ों में 46 गुणसूत्र होते हैं। इनमें से 22 गुणसूत्र स्त्री और पुरुष में एक समान होते हैं लेकिन 23वा गुणसूत्र दोनों में अलग होता हैं।

जनन के वक़्त कोशिकाएं विभिन्न रसायनिक क्रियाओं का उपयोग करके डीएनए की प्रतिकृति बनाती हैं लेकिन मौलिक डीएनए कभी एक समान नहीं होता, माता-पिता के गुणसूत्रों का भी उपयोग होता है, जिसकी वजह से हम एक दूसरे के समान होते हुए भी भिन्न होते हैं वरना हम बस एक दूसरे के प्रतिरूप बन रह जायेंगे। जैसा हम जानते हैं कि विभिन्नता की वजह से हम अनुकूलन कर उत्पत्ति के हर पड़ाव को पार कर आये हैं, तो अगर यह विभिन्निता हमें हमारे डीएनए ने प्रदान न की तो हम पृथ्वी से विलुप्त हो जायेंगे।

1. डीएनए एनसायक्लोपेडिया ब्रिटानिका https://www.britannica.com/science/DNA
2. https://ghr.nlm.nih.gov/primer/basics/dna
3. वंशागति का आणविक आधार एनसीइआरटी http://ncert.nic.in/ncerts/l/lhbo106.pdf


रोगवाहक घरेलू मक्खी

Lucknow
08-03-2018 01:22 PM

तीसमार खां की कहानी तो आपने सुनी ही होगी? कहानी तो बड़ी लम्बी है मगर मुख्य बात ये है कि उसे तीस मार खां क्यूँ बुलाया गया? एक साथ उसने तीस मक्खियों को मारा था जो उसे परेशान कर रही थी, किसी ने पूछा कितने मारे तो उसने कहा तीस। लोगों को लगा कि कितना शेरदिल इंसान है तबसे उसे सब तीसमार खां बुलाने लगे, उन्हें पता नहीं था की वह मक्खियों की बात कर रहा था। मनुष्य बस्ती जहाँ-जहाँ होती है वहाँ-वहाँ आपको मक्खियाँ दिखती हैं। अनादी काल से ये मनुष्य की सार्वत्रिक साथी रहीं हैं। पहले तो इन्हें बहुत ही महत्तवहीन और हानिरहित समझा जाता था लेकिन आगे चल वैज्ञानिकों से पता चला की वे तो असल में विकारी रोगकारक जंतुओं की वाहक हैं।

घरेलू मक्खी का वर्णन पहली बार कार्ल लिन्नेअस ने अपनी किताब सिस्टेमा नेचुरे (Systema naturae) में सन 1758 में किया। उसने इन्हें मुस्का डोमेस्टिका (Musca domestica Linn) यह नाम दिया। मान्यता है कि मक्खियाँ सीनोज़ोइक (Cenozoic) महाकल्प से पृथ्वी पर मौजूद हैं तथा मक्खियों की कुल संख्या में से 90% संख्या घरेलू मक्खियों की है। घरेलू मक्खी जंतु जगत के डिप्टेरा (Diptera) गण से हैं।

मक्खियों के दांत अथवा डंख नहीं होते, वे अपने मुंह से पोषण सोख लेती हैं। ज्यादातर वे तरल पदार्थ खा लेती हैं लेकिन ठोस पर्दार्थों पर थूक के अथवा वामन करके उन्हें तरल कर सोख लेती हैं। मक्खी की ऑंखें बड़ी ही महत्वपूर्ण और अनोखी होती हैं, उनमें हजार से भी ज्यादा लेंस रहती हैं जो उसके सामने के दृश्य को अलग-अलग नज़रिए से देख सकती हैं और उसे बड़े विस्तारित क्षेत्र को एक ही झटके में पूरा देख लेने की शक्ति देती हैं। मक्खियों के 6 पैर होते हैं, इन सभी पैरों पर छोटे-छोटे कांटेदार बाल होते हैं। आप प्रस्तुत चित्र देखें जिसमें मक्खी के पैरों का सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से चित्रण किया गया है। इनमें वे पूरी दुनिया की गंदगी और रोग साथ लिए घूमती हैं मतलब मक्खियों के पैर ही प्रमुख रोगवाहक हैं।

मक्खियों को साफ़ सुथरी जगहों से परहेज़ है, वे गन्दी जगह ख़ास कर मल-मूत्र, सड़े गले कलेवर और कचरे के ढेर पसंद करती हैं हालांकि वे बिना ढके हुए स्वादिष्ट खाने पर भी तांव मार लेती हैं। अंडे देने के लिए वे गन्दी जगह ही ढूंढती हैं। इसी लिए बेहतर होता है कि हम अपना घर हमेशा स्वच्छ रखें तथा रोज़ के रोज़ कचरे की सफाई हो तथा मल मूत्र विसर्जन के स्थान अथवा कचरा फेंकने की जगहों की हर रोज़ सफाई की जाए और अगर वो नहीं हो सकता तो वहाँ पर कीटनाशी औषधी का इस्तेमाल हो।

1. हाउस फ्लाय: एनसायक्लोपेडिया ब्रिटानिका https://www.britannica.com/animal/housefly
2. द हाउस फ्लाय: मुस्का डोमेस्टिका लिन्न: इट्स स्ट्रक्चर, हैबिट्स, डेवलपमेंट, रिलेशन टू डिजीज एंड कण्ट्रोल: सी. गॉर्डन हेविट
https://books.google.co.in/books?id=2FYiIGjMsuYC&printsec=frontcover&dq=The+House-Fly:+Musca+Domestica+Linn:&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwjVrs6Om9zZAhUCNY8KHb9VAaoQ6AEIKDAA#v=onepage&q=The%20House-Fly%3A%20Musca%20Domestica%20Linn%3A&f=falsemp;q=house%20fly&f=false


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