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मध्यकालीन उपन्यास से प्रेरित है प्रसिद्ध कार्यक्रम चंद्रकांता की कहानी

Lucknow
20-09-2018 02:17 PM

चंद्रकांता का नाम सुनते ही हमें याद आती है एक भारतीय टेलीविज़न सीरिज़, जो आंशिक रूप से देवकीनन्दन खत्री द्वारा रचित एक तिलिस्मी हिन्दी उपन्यास (चंद्रकांता) पर आधारित थी। यह मूल रूप से दूरदर्शन के डीडी नेशनल पर 1994 और 1996 के बीच प्रसारित किया गया था, और निरजा गुलेरी द्वारा बनाया, लिखा, और निर्देशित किया था। उन दिनों ये धारावाहिक काफी लोकप्रिय भी हुआ था। जिन्होंने इस सीरिज को देखा है, इसका नाम सुनते ही उनके मन में जरुर इस धारावाहिक का टाइटल सांग ("नवगढ, विजयगढ़ में थी तकरार....नौगढ़ का था जो राजकुमार...चंद्रकांता से करता था प्यार") फिर से स्मरण हो गया होगा। आप इस धारावाहिक का पहला एपिसोड नीचे दिए गए वीडियो में भी देख सकते हैं।


बाबू देवकीनन्दन खत्री (जन्म 29 जून 1861 पूसा, मुजफ्फ़रपुर, बिहार - मृत्यु 1 अगस्त 1913) ने चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, काजर की कोठरी, नरेंद्र-मोहिनी, कुसुम कुमारी, वीरेंद्र वीर, गुप्त गोंडा, कटोरा भर, भूतनाथ जैसी रचनाएं की थी। परंतु उपन्यास ‘चंद्रकांता’ (1888 - 1892) का उनके लेखन जीवन में बहुत बड़ा योगदान रहा है। इस उपन्यास ने सबका मन मोह लिया, कहा जाता है कि इस उपन्यास को पढ़ने के लिये लाखों लोगों ने हिंदी सीखी। यह उपन्यास चार भागों में विभक्त है। बाबू देवकीनंदन खत्री ने 'तिलिस्म' (जादुई यंत्र या आकर्षण), 'अय्यार' (एक प्रकार का योद्धा) और 'अय्यारी' जैसे शब्दों को हिंदीभाषियों के बीच लोकप्रिय बनाया। वे लगातार कई-कई दिनों तक चकिया एवं नौगढ़ के बीहड़ जंगलों, पहाड़ियों और प्राचीन ऐतिहासिक इमारतों के खंडहरों की खाक छानते रहते थे। इन्हीं की पृष्ठभूमि में अपनी तिलिस्म तथा अय्यारी के कारनामों की कल्पनाओं को मिश्रित कर उन्होंने चन्द्रकान्ता उपन्यास की रचना की। इसकी लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इसी कथा को आगे बढ़ाते हुए दूसरा उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ (1894 - 1904) लिखा जो चन्द्रकान्ता की अपेक्षा कई गुना रोचक था। उनका यह उपन्यास भी अत्यन्त लोकप्रिय हुआ।

चन्द्रकान्ता धारावाहिक को एक प्रेम कथा कहा जा सकता है। ये प्रेम कहानी, दो दुश्मन राजघरानों, नवगढ़ और विजयगढ़ के बीच जन्म लेती है, जिसमें तिलिस्मी और अय्यारी के अनेक चमत्कार पाठक को आश्चर्यजनक कर देते हैं। विजयगढ़ की राजकुमारी चंद्रकांता और नवगढ़ के राजकुमार विरेन्द्र विक्रम को आपस में प्रेम है, लेकिन राज परिवारों में दुश्मनी है। हांलांकि इसका ज़िम्मेदार विजयगढ़ का महामंत्री क्रूर सिंह है, जो चंद्रकांता से शादी करने और विजयगढ़ का महाराज बनने का सपना देखता है। जब क्रूर सिंह अपने प्रयास में असफल हो जाते हैं तो वह शक्तिशाली पड़ोसी राज्य चुनारगढ़ (मिर्ज़ापुर के चुनार में स्थित किले की ओर इशारा करते हुए, जिसने खत्री को ‘चंद्रकांता’ लिखने की प्रेरणा दी थी) के राजा शिवदत्त से मिल जाता है। क्रूर सिंह के कहने से शिवदत्त चंद्रकांता को पकड़ लेते हैं और जब चंद्रकांता शिवदत्त से दूर भागती है तो वो एक तिलिस्म में खुद को कैद पाती है। उसके बाद कुंवर वीरेंद्र अय्यारों की मदद से शिवदत्त के साथ लड़ कर तिलिस्म तोड़ देते हैं। रहस्यों से भरे इस धारावाहिक को क्रूर सिंह के षड्यंत्र एवं वीरेन्द्र विक्रम के पराक्रम और तिलिस्म तथा अय्यारों का वर्णन अत्यधिक रोचक बना देता हैं।

इस सीरियल का प्रसारण 1996 में कानूनी विवादों के कारण रोक दिया गया था और निर्माताओं को पुनर्निर्माण के लिए अदालत में मुकदमा दायर करना पड़ा था। भारत के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, चंद्रकांता को 1999 में दूरदर्शन द्वारा पुनरारंभ किया गया। इसके पात्र एक लम्बे समय तक लोगों के दिलों में बने रहे थे। अब ये कहानी फिर से सहारा वन (चंद्रकांता) और लाइफ ओके (प्रेम या पहेली) पर नए ढंग से दिखाई गई है। इन सीरियल में युद्ध, तिलिस्म, बदले की भावना को एक नए रूप में लोगों के सामने लाया गया है, जो लोगों को रोमांचित कर देता है।

संदर्भ:
1. https://wikivisually.com/wiki/Chandrakanta_(novel)
2. https://goo.gl/rY126P
3. https://en.wikipedia.org/wiki/Chandrakanta_(TV_series)
4. https://wikivisually.com/wiki/Kahani_Chandrakanta_Ki

http://prarang.in/Lucknow/1809201849





इस्‍लाम धर्म में मौलवी, क़ाज़ी, उलेमा, हाजी आदि की भूमिका

Lucknow
19-09-2018 02:19 PM

लगभग छठी सातवीं शताब्दी में जन्‍मे विश्‍व के सबसे बड़े धर्म इस्लाम के आज सर्वाधिक अनुयायी हैं। इस धर्म को बचाए रखने और इसका संचालन करने के लिए, इस्‍लाम में कुछ प्रमुख सदस्‍य होते हैं, जिन्‍हें प्रायः मौलवी, क़ाज़ी, उलेमा, हाजी, इमाम, मुफ्ती आदि कहा जाता है। चलिए एक नज़र डालें इनकी कार्य प्रणाली पर और जानें इनके मध्य अंतर।

क़ाज़ी:
शरिया अदालत के मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश को क़ाज़ी कहते हैं। क़ाज़ी शब्द का अर्थ ‘न्याय करना’ या ‘निर्णय लेना’ होता है। क़ाज़ी शब्द पैगंबर मुहम्मद के समय से उपयोग किया जा रहा है। इनके द्वारा असाधारण कार्य जैसे मध्यस्थता, अनाथों और नाबालिगों के लिये अभिभावक, और पर्यवेक्षण और लेखा परीक्षा जैसे सार्वजनिक कार्य भी किए जाते हैं। क़ाज़ी का निर्णय इज्मा, इस्लाम, इस्लामी विद्वानों की प्रचलित सर्वसम्मति पर आधारित होना चाहिए। प्राचीन रूप से क़ाज़ी पर किसी क्षेत्र या शहर के प्रशासनिक, न्यायायिक और राजकोषीय नियंत्रण की ज़िम्मेदारी भी होती थी। ज्यादातर मामलों में, क़ाज़ी अपने बाद अपने बेटे या बहुत करीबी रिश्तेदार को अगला क़ाज़ी नियुक्त कर सकता है।

मुफ्ती:
क़ाज़ी की तरह ही मुफ्ती भी शरिया कानून की व्याख्या शक्ति है। मुफ्ती वह व्यक्ति बनता है जो धार्मिक ज्ञान में एक स्तर (विश्वविद्यालय की डिग्री और सहकर्मियों की स्वीकृति) तक पहुंच गया हो। इस्लामिक रूप से, उन्हें अपने ज्ञान से अपनी राय देने का अधिकार होता है, लेकिन वास्तव में उन्हें कोई शक्ति नहीं प्रदान होती हैं।

इमाम:
वहीं जो व्यक्ति नियमित रूप से मस्जिद में नमाज़ पढ़ने का कार्य करता है उन्हें लोग इमाम कहकर बुलाते हैं। लेकिन जो व्यक्ति सिर्फ एक बार मस्जिद में नमाज़ पढ़ता है, उसे नमाज़ पढ़ने तक ही इमाम बुलाया जाता है। आजकल, इमाम को राज्य (धार्मिक मामलों के मंत्रालय, जो कि अधिकांश मुस्लिम देशों जैसे तुर्की में मौजूद है) द्वारा नियुक्त किया जाता है। इनके पास भी कोई शक्ति नहीं होती है।

मौलवी:
मौलवी शब्द अरबी शब्द मावला से लिया गया है, जिसके कई अर्थ हैं, जिनमें "ईश्वर" भी शामिल है। मौलवी मुस्लिम धार्मिक विद्वानों, या उलमा को दिया गया सम्मानित इस्लामी धार्मिक शीर्षक है। मौलवी आमतौर पर एक उच्च योग्य इस्लामी विद्वान का अर्थ है, जिसने मदरसा (इस्लामी स्कूल) या दारुल उलूम (इस्लामी धर्मशास्त्र) में पूर्ण अध्ययन प्राप्त किया हो।

हाजी:
हाजी एक मुस्लिम व्यक्ति को दिया गया एक सम्मानित शीर्षक है जिसने सफलतापूर्वक मक्का में हज की यात्रा को पूरा कर लिया हो। जो कि एक तरह से इस्लामी तीर्थयात्रा है।

उलेमा:
उलेमा इस्‍लाम धर्म के प्रमुख ज्ञाता होते हैं, प्रमुखतः सुन्‍नी इस्‍लाम के। इन्‍हें इस्‍लामी धर्म के ज्ञान और कानून के संरक्षक, प्रचारक और व्याख्याता के रूप में भी इंगित किया जाता है। ये धार्मिक संस्‍थानों (मदरसे) से शिक्षा को पूर्ण कर प्रायः क़ाज़ी (न्यायाधीश), अध्‍यापक के पदों पर नियुक्‍त होते हैं। इस्‍लाम में किसी भी प्रकार के परिवर्तन और कानून निर्माण में उलेमा प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

उपरोक्‍त विवरण से आपको ज्ञात हो गया है कि, सभी इस्‍लामिक प्रमुखों को उनके ज्ञान, क्षमता और अनुभव के आधार पर पद सौंपा जाता है। जिसे वे अपनी पूरी निष्‍ठा और ईमानदारी के साथ निभाते हैं। तथा अपने धर्म के अस्तिव को बचाने और बढ़ाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

संदर्भ:
1. https://en.wikipedia.org/wiki/Qadi
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Mufti
3. https://en.wikipedia.org/wiki/Imam
4. https://en.wikipedia.org/wiki/Ulama
5. https://en.wikipedia.org/wiki/Hajji_(disambiguation)
6. https://en.wikipedia.org/wiki/Mawlawi_(Islamic_title)
7. http://islamqa.org/hanafi/askimam/29679

http://prarang.in/Lucknow/1809191845





विश्व में 100 वर्ष का आंकड़ा पार करने वाले व्यक्तियों का सफर

Lucknow
18-09-2018 01:22 PM

समय जैसे पंख लगाकर उड़ रहा है, वैसे-वैसे मनुष्‍य की उम्र भी घटती जा रही है। हमारे प्राचीन और एतिहासिक ग्रंथों से ज्ञात होता है कि प्राचीन मनुष्‍य इतनी लम्‍बी आयु जीता था, जहां तक आज का मनुष्‍य शायद ही पहुंच पाये। फिर भी विश्‍व में अनेक लोग ऐसे हैं जो 100 या उससे अधिक के आंकड़े पार कर रहे हैं। चलिए जानें विश्‍व और भारत में इनका अनुपात।

वर्ष 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्‍व में ऐसे आधे मिलियन से ज्‍यादा लोग थे, जो अपनी सौ वर्ष या उससे अधिक की आयु पूरी कर चुके थे। संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के अनुसार यह संख्‍या 1990 से चार गुना अधिक है। जिसमें प्रथम स्‍थान अमेरिका फिर जापान, चाइना, भारत और इटली का है। इनके अनुमानों के अनुसार 2050 तक दुनिया में 3.7 मिलियन लोग सौ वर्ष की आयु वाले होंगे।

शतायु व्यक्तियों के आकड़ों में अमेरिका में अप्रवास और कुछ अन्‍य कारणों से प्रति 10,000 लोगों में मात्र 2.2 व्‍यक्ति ही सौ वर्ष की आयु वाले हैं, जबकि जापान और इटली में यह आंकड़े क्रमशः 4.8 और 4.1 है। इससे ज्ञात होता है कि जापान वास्‍तव में आगे चल रहा है, पिछले कुछ समय में जापान ने सौ वर्ष पूरे करने वाले व्‍यक्तियों के आंकड़ों का नया रिकॉर्ड बनाया है, जिसमें 88% महिलाएं ही हैं। हाल ही में विश्‍व की सबसे ज़्यादा उम्र (117 वर्ष) में मृत्यु को प्राप्त होने वाली महिला (चियो मियाको) भी जापान की ही थीं। जापान में सौ वर्ष पूरे करने वालों के लिए जश्‍न मनाया जाता है तथा उनके सम्‍मान में एक दिन का सार्वजनिक अवकाश भी होता है। और यहां के प्रधान मंत्री द्वारा इन लोगों को एक बधाई पत्र और यादगार के रूप में एक कप भी दिया जाता है।

चीन और भारत में भले ही विश्‍व की जनसंख्‍या का सबसे बड़ा हिस्‍सा रहता हो, किंतु सौ वर्ष या उससे अधिक जीने वाले लोगों के आंकड़ों में वे सबसे आगे नहीं हैं। परन्तु एक अनुमान के अनुसार चीन आने वाले समय में 2050 तक सबसे ज्‍यादा शतायु वाले व्‍यक्तियों का राष्‍ट्र बन जाएगा। वहीं भारत में भी इनकी संख्‍या में इजाफा हो रहा है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 6,05,778 शतायु व्‍यक्ति थे जिसमें महिला का अनुपात काफी कम है। पूरे भारत में सबसे ज्‍यादा सौ वर्ष वाले व्‍यक्ति उत्‍तर प्रदेश (लगभग 2 लाख) में थे, जिनका अनुपात आप नीचे दिये गये ग्राफ (Graph, 2011 की जनगणना के अनुसार) में देख सकते हैं:


सौ वर्ष की आयु वाले व्‍यक्तियों का बड़ा हिस्‍सा ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है, जो नीचे दिये गये ग्राफ से स्‍पष्‍ट है:


आप अपने शरीर को स्‍वस्‍थ रखेंगे, तो शरीर आपको स्‍वस्‍थ रखेगा। यह मानना है जयपुर (भारत) के 127 वर्षीय शहनाई वादक हबिब मियाँ का। उम्र के प्रभाव के कारण इनकी दृष्टि कम हो गयी है, किंतु जीवन के प्रति इनका उत्‍साह आज भी बरकरार है।

ऐसे ही जज्‍बा हमें देखने को मिलता है कोलकाता के शरफुद्दीन क़ादरी (105 वर्ष) में, वे एक यूनानी दवाओं के चिकित्‍सक के रूप में कार्य कर रहे हैं। ये लोगों को मुफ्त में स्‍वास्‍थ्‍य सेवा देते हैं। इनकी दिनचर्या में इनकी उम्र कहीं भी नहीं दिखाई देती है।

कोयंबटूर की 109 वर्षीय एक गृहिणी आज भी अपना सारा कार्य स्‍वयं करती हैं। वे अपने किसी भी कार्य के लिए किसी पर निर्भर नहीं हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो अपनी दिनचर्या में उम्र को बाधा नहीं बनने देते हैं।

आज युवावर्ग को आवश्‍यकता है यह समझने की कि वृद्धावस्‍था जीवन का एक ऐसा पड़ाव है, जिसमें हम सभी को प्रवेश करना है। अतः अपने वृद्धों को बोझ ना समझें, उन्‍हें उत्‍साहित करें लम्‍बी उम्र जीने के लिए। उन्‍हें भरोसा दिलायें आप हमेशा उनके साथ हैं।

संदर्भ:
1.https://www.washingtonpost.com/world/2018/09/14/japan-sets-new-record-number-people-over-years-old-almost-all-are-women/?utm_term=.226a7e33a1bb
2.https://www.indiatoday.in/magazine/cover-story/story/20070730-centenarians-preachings-to-keep-body-fit-and-mind-healthy-748164-2007-07-30
3.http://www.ijcmph.com/index.php/ijcmph/article/viewFile/1429/1233
4.http://www.pewresearch.org/fact-tank/2016/04/21/worlds-centenarian-population-projected-to-grow-eightfold-by-2050/

http://prarang.in/Lucknow/1809181840





प्राकृतिक सौन्‍दर्य ही नहीं वरन् स्‍वास्‍थ्‍य के लिए भी लाभदायक चंपा

Lucknow
17-09-2018 02:48 PM

विश्‍व में पाई जाने वाली अनेक वनस्‍पतियाँ (कुछ ज्ञात और कुछ अज्ञात) औषधियों का भण्‍डार हैं। जब हम इनके मध्‍य संबंध साधते हैं, तो हमारे मस्तिष्‍क में सबसे पहले अयुर्वेद का नाम आता है, किंतु अन्‍य देशों (जैसे यूरोप, अमेरिका आदि) में इस संदर्भ में प्रयोग किया जाने वाला प्राचीन रोमन शब्‍द है ‘मटेरिया मेडिका’ (औषधि विवरणिका)। विश्‍व के सर्वाधिक औषधीय पौधों की प्रजाति भारत में पाई जाती है। इन्‍हीं आयुर्वेदिक पौधों में जानें बहुमुखी औषधीय गुणों के धनी चंपा (पुष्प) के बारे में:

"चम्पा तुझमें तीन गुण- रंग, रूप और वास, अवगुण तुझमें एक ही भँवर न आयें पास।
रूप तेज तो राधिके, अरु भँवर कृष्ण को दास, इस मर्यादा के लिये भँवर न आयें पास।।"

प्राकृतिक सौंदर्य और रंग बिरंगे पुष्‍पों से भरपूर चंपा के पौधे का उपयोग अनेक स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक पारंपरिक औषधि के रूप में भी किया जाता है। आर्द्र जलवायु में उगने वाला यह पौधा, वैसे तो वनों को हरा भरा रखने और घर की साज सज्‍जा बढ़ाने के लिए उगाया जाता‍ है। किंतु इसके विभिन्‍न भागों अर्थात छाल, पत्ती, जड़ें, पुष्‍प आदि का उपयोग, अनेक बिमारियों की दवा के रूप में भी किया जाता है। जो इस प्रकार हैं:

1. मरहम : चंपा के पुष्‍प को सूखाकर उसमें उपस्थित तेल से मरहम (औषधीय उपयोग हेतु) तैयार किया जाता है।

2. सूजन घटाने हेतु : शरिर के किसी भी भाग से सूजन कम करने के लिए इसकी नरम छाल को पानी के साथ गरम करके उस पानी को सूजन वाले हिस्‍से में लगाकर सूजन कम की जा सकती है।

3. एंटीबायोटिक (Antibiotic) के रूप में : इस पौधे में उपस्थित यौगिक भिन्न औषधीय गुणों वाले होते हैं जैसे एंटीपायरेटिक (Antipyretic, बुखार को कम करने वाला), एंटीइनफ्लारनाटिफ (Antiinflarnatif, जलन पर काबू पाने वाला), और एनाल्जेसिक (Analgesic, दर्द से राहत देने वाला)।

4. दांत दर्द से राहत हेतु : पौधे की कुछ बूंदे रुई के माध्‍यम से दांत के दर्द वाले स्‍थान पर रखें, यह प्रक्रिया दिन में 1-2 बार ही करें। यह दर्द से अस्‍थायी राहत दिलाने में सहायक सिद्ध होता है।

5. अल्‍सर (फोड़े) से राहत : चंपा के पुष्‍प को आग में सुखाकर (सिकुड़ने तक) जैतून के तेल के साथ मिश्रण तैयार करें तथा उसे अल्‍सर वाले स्‍थान पर लगाएं।

6. मधुमेह को कम करने में सहायक : चंपा के पौधे की 1 जड़ को धोकर उसे 2 कप पानी में तब तक उबालें जब तक वह एक कप ना हो जाए। इस पानी का सेवन मधुमेह के रागियों के लिए लाभदायक होता है।

*ऊपर दिए गए सभी उपचार शैक्षिक उद्देश्य के लिए हैं ना कि आज़माने लायक सिद्ध उपचार हैं। गलत खुराक इलाज के बजाय, आपको दुष्प्रभाव और नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए कोई भी उपचार अपनाने से पहले योग्य और प्रशिक्षित आयुर्वेदिक और एलोपैथिक डॉक्टरों से सलाह ज़रूर करें।

अन्‍य नाम :

मराठी – खैर चम्पा
तेलुगु – नुरू वरहालू
कन्नड़ – देवा गनिगिले
बंगाली – दालान फूल
उड़िया – गोलोची
असमिया – गुलांची
संस्कृत – खीरा चंपा
संताली – चंपा पुनगर
गुजराती – रहाड़ा चंपो
मलयालम – अरली

संदर्भ :
1. अंग्रेज़ी पुस्तक: Kurian, J. C. (1995) Plants that Heal, Oriental Watchman Publishing House
2. http://plantsandbenefits.blogspot.com/2014/08/frangipani-flower-benefits-as-antibiotic.html
3. http://2beingfit.com/temple-flower-or-frangipani-proven-benefits-uses/#
4. http://sandipnaik.blogspot.com/2013/04/blog-post_13.html
5. https://en.wikipedia.org/wiki/Materia_medica
6. http://www.medicinehunter.com/about-plant-medicines

http://prarang.in/Lucknow/1809171838





फिल्म जगत को बदलने वाली लाइट ऑफ़ एशिया

Lucknow
16-09-2018 01:37 PM

महान लोग हमेशा वे नहीं होते जो व्यवस्था और तंत्र के विरूद्ध जाते हैं तथा बाकी सबके लिए पथ बनाते हैं, कई बार वे ऐसे भी लोग होते हैं जो अपने पीछे एक छाप छोड़ जाते हैं जो समय के साथ धुंधली तो हो जाती है पर उसका प्रभाव आम हो जाता है। उन्हीं में से एक थे जर्मनी के फ्रान्ज़ ऑस्टेन। उनके द्वारा किया गया भिन्न संस्कृतियों का जोड़ आज दुनिया भुला चुकी है परन्तु आपको ये भी बता दें कि उनके बिना भारत का सिनेमा जगत वर्तमान स्थिति से बिलकुल अलग हो सकता था।

सही मायने में फ्रान्ज़ हिंदी फिल्मों के खोजकर्ता थे जिन्होंने सन 1940, 1950 और कुछ हद तक 1960 की सबसे बड़ी और मशहूर फ़िल्में निर्मित की थीं। सन 1924 में फ्रान्ज़ एक लन्दन में रहने वाले भारतीय वकील से मिले जिनका नाम था हिमांशु राय। उस समय राय फ्रान्ज़ की जन्मभूमि म्युनिक आये हुए थे। उनके म्युनिक आने का लक्ष्य था विश्व के धर्मों पर आधारित अपनी फिल्मों की एक श्रृंखला के लिए कुछ साथी ढूंढना और वहाँ उन्होंने साथी के रूप में हाथ मिलाया फ्रान्ज़ के भाई पीटर की कंपनी के साथ।

इसके बाद फ्रान्ज़ द्वारा फ़िल्में बनाने का सिलसिला शुरू हुआ। ऑस्टेन ने शुरुआत की ‘लाइट ऑफ़ एशिया’ (1925) की शूटिंग से। उस समय इसके जैसी काफी और भी फ़िल्में भिन्न निर्माताओं द्वारा बनाई जा रही थीं पर एक विशेषता जो इस फिल्म को सबसे अलग बनाती थी वह ये थी कि ‘लाइट ऑफ़ एशिया’ की शूटिंग भारत में हुई थी जिससे फिल्म और भी वास्तविक लगती थी। ऊपर दिए गए विडियो में आप यह पूरी फिल्म देख सकते हैं। यह फिल्म यूरोप में काफी प्रसिद्ध हुई तथा इसके बाद ऑस्टेन और राय की जोड़ी ने ऐसी दो और फ़िल्में बनाईं, ‘शिराज़’ (1928) जो ताज महल की कहानी पर आधारित थी और ‘प्रपंच पाश’ (1929) जो महाभारत पर आधारित थी।

सिनेमा में मौन से आवाज़ों के तकनीकी सफ़र की वजह से ऑस्टेन और राय की साझेदारी थम गयी क्योंकि जर्मन बोलते हुए भारतीय फिल्मों में अटपटे लगते। परन्तु ये उनकी साझेदारी का अंत नहीं था। 1934 में बॉम्बे टॉकीज़ की नींव रखने के बाद राय ने फ्रान्ज़ को दोबारा संपर्क किया और इसके बाद इन्होंने काफी फ़िल्में साथ बनाईं जिनमें से एक थी ‘अछूत कन्या’ (1937) जिसने मशहूर भारतीय अभिनेता अशोक कुमार को प्रसिद्धी की सीढ़ी पर चढ़ाया।

हालांकि ऑस्टेन को हिंदी का एक शब्द भी समझ नहीं आता था, फिर भी उन्होंने इतनी ख़ास फिल्मों का निर्माण किया जिन्हें आज तक फिल्म जगत की सबसे बेहतरीन रचनाओं में गिना जाता है, इससे समझ आता है कि फ्रान्ज़ को अपनी कला की पूरी पूरी समझ थी तथा शायद वे ना होते तो आज भारतीय सिनेमा जगत इतनी प्रगति न कर पाता।

संदर्भ:
1.https://swarajyamag.com/culture/the-many-ways-cinema-forgot-franz-osten
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Franz_Osten

http://prarang.in/Lucknow/1809161833





कैसे बना टाटा का नाम इतना विश्वसनीय

Lucknow
15-09-2018 02:25 PM

कंपनी की मार्केट कैपिटलाइज़ेशन (Market Capitalization) एक कंपनी के आउटस्टैंडिंग शेयरों (कंपनी के वे सभी शेयर जो वर्तमान में निवेशकों, कंपनी अधिकारियों और अंदरूनी सूत्रों के अधिकार में हैं) की संख्या को बाज़ार मूल्य से गुणा करके प्राप्त की जाती है। इसे मार्केट कैप के नाम से भी जाना जाता है। शेयर बाज़ार में कंपनियों का वर्गीकरण उसके मार्केट कैप के आधार पर किया जाता है। हम यह कह सकते हैं कि मार्केट कैप किसी कंपनी के कद को नापने का सर्वोत्तम तरीका है। यदि हम शेयर बाज़ार में कद की बात करें और टाटा ग्रुप का नाम न आए यह तो संभव नहीं है, देश का यह सबसे बड़ा उद्योग समूह, टाटा ग्रुप, 150 साल से अस्तित्व में है।

टाटा समूह दुनिया के 140 से भी अधिक देशों को उत्पाद व सेवाएँ निर्यात करता है। टाटा ग्रुप की कई देशों में 100 से ज़्यादा कंपनियाँ हैं। टाटा समूह की सफलता को इसके आंकड़े बखूबी बयां करते हैं। 2005-06 में इसकी कुल आय $967,229 मिलियन थी। ये समस्त भारत की GDP (सकल घरेलू उत्पाद) के 2.8% के बराबर है। वर्तमान में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के मार्केट कैप में टाटा की हिस्सेदारी 7.5% है। इसमें टी.सी.एस. का मार्केट कैप 790,000 करोड़ (14 सितम्बर 2018 को) के करीब है, जो कि रिलाइंस के बाद दूसरे नंबर पर है, टाटा मोटर्स का मार्केट कैप 76,933 करोड़ (14 सितम्बर 2018 को), टाटा स्टील का मार्केट कैप 74,095 करोड़ (14 सितम्बर 2018 को), तथा टाइटन का मार्केट कैप 74,769 करोड़ (14 सितम्बर 2018 को) है। टाटा ग्रुप की कंपनियों में अभी 41 लाख शेयरधारक हैं।

टाटा समूह की नींव 1868 में जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा (3 मार्च 1839 - 19 मई 1904) द्वारा रखी गई थी। 29 वर्षीय जमशेदजी ने अपने पिता की बैंकिंग कंपनी में काम करते हुए व्यवसाय की बारीकी को सीख कर बॉम्बे में एक व्यापारिक कंपनी की स्थापना की थी। इस युवा पारसी ने ‘एबीसिनियन युद्ध’ में ब्रिटिश सैनिकों को सामान उपलब्ध करा कर 4 मिलियन रुपये का एक बड़ा लाभ कमाया था। 1968 की शुरुआत में टाटा समूह की बागडोर जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा या जे. आर. डी. टाटा ने संभाली।

जे. आर. डी. टाटा भारत के वायुयान उद्योग और अन्य उद्योगों के अग्रणी थे। उनके योगदान से टाटा ने देश में कई ऊँचाइयाँ छुईं। वह जे. आर. डी. टाटा की अनोखी प्रचार प्रणाली ही थी जिसने टाटा को कई सफलताएँ दिलायीं। इस प्रणाली में टाटा अपने विज्ञापनों के माध्यम से हर देशवासी में देशभक्ति की एक भावना जगा देता था, और साथ ही साथ अपना प्रसार भी कर देता था, जैसे एक कपड़े का विज्ञापन जो यह दर्शाता है कि 30 सालों में भारत कपड़ों के आयातकर्ता से विश्व के दुसरे सबसे बड़े निर्यातकर्ता में परिवर्तित हो चुका है, और विज्ञापन के नीचे लिखा हुआ “निजी उद्यम देश की सेवा करते हैं”; एक विज्ञापन जिसमें कृषि के मशीनीकरण की महत्ता दर्शायी गयी है और बताया गया है कि टाटा ग्रुप स्टील भी बनाती है। इस तरह की कार्यनीति ने देशवासियों का भरोसा जीतने में टाटा की काफी सहायता की। जे. आर. डी. टाटा के बाद 1991 में रतन टाटा ने कार्यभार संभाला। और वर्तमान में टाटा ने नटराजन चंद्रशेखरन को चेयरमैन नियुक्त किया है।


टाटा का कार्यक्षेत्र अनेक व्यवसायों व व्यवसाय से सम्बंधित सेवाओं के क्षेत्र में फैला हुआ है। टाटा का नाम चाय में टाटा चाय तथा घड़ियों में टाइटन से जुड़ा है और सूचना और संचार के क्षेत्र में भी टाटा का नाम टी.सी.एस. जैसी तमाम कंपनियों से जुड़ा है। इसके अलावा टाटा का कार्यक्षेत्र अभियांत्रिकी, सूचना प्रौद्योगिकी, वाहन, रासायनिक उद्योग, ऊर्जा, सॉफ्टवेयर, होटल, इस्पात एवं उपभोक्ता सामग्री आदि क्षेत्र में भी फैला हुआ है।

टाटा समूह का मकसद समझदारी, ज़िम्मेदारी, एकता और बेहतरीन काम से समाज में जीवन के स्तर को उंचा उठाना है। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या विज्ञान या तकनीक का क्षेत्र, टाटा का योगदान अहम है। करीब हर भारतीय इस बात का सम्मान भी करता है। हो सकता है कि दुनिया में अधिकांश लोगों ने टाटा स्टील या टाटा मोटर्स का नाम न सुना हो, लेकिन आपने कभी ना कभी तो टाटा की ‘टेटली चाय’ की चुस्कियां ली होंगी या फिर फोन कॉल के लिए समुद्र के नीचे बिछे फाइबर ऑप्टिक केबल (Fibre Optic Cable) का इस्तेमाल किया ही होगा। भारत का पहला आयोडीन युक्त टाटा का नमक (देश का नमक) का उपयोग तो देश के हर किचन में हुआ है। यही वजह है कि टाटा का नाम आज देश भर की ज़ुबान पर है।

संदर्भ:
1.https://scroll.in/magazine/892183/how-jrd-tata-came-up-with-a-marketing-strategy-that-ran-through-tata-ads-for-nearly-a-century
2.http://www.tata.com/aboutus/sub_index/Heritage
3.https://en.wikipedia.org/wiki/Tata_Group

http://prarang.in/Lucknow/1809151830





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