Writer:
Stephen Markel, Tushara Bindu Gude, Muzaffar Alam, Los Angeles County Museum of ArtPublisher:
Los Angeles County Museum of ArtTags:Art Objects - Art/Beauty
2.
WAILING BEAUTY : The Perishing Art of Nawabi Lucknow
Writer:
Sir William Henry Sleeman, Peter Denis REEVESPublisher:
Saiyed Anwer AbbasTags:Art Objects - Art/Beauty
उत्तर भारत में क्यों नहीं मनाते महाराष्ट्र जैसी गणेश चतुर्थी ? जानिए असली वजह
भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना में विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश का स्थान सर्वोपरि है। किसी भी नए कार्य, यात्रा अथवा मांगलिक अनुष्ठान के आरंभ में प्रथम पूज्य के रूप में उनका आह्वान किया जाता है। गणेश चतुर्थी, जिसे गणेशोत्सव और विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है, मूल रूप से भगवान गणेश के जन्मोत्सव, उनकी अगाध बुद्धि, शुभ शुरुआत और बाधाओं के निवारण का पावन पर्व है। यह 10 दिवसीय महापर्व घरों में मिट्टी की छोटी प्रतिमाओं की स्थापना से आरंभ होकर सार्वजनिक पंडालों की भव्यता और अंत में श्रद्धा-भरे विसर्जन जुलूस तक विस्तृत होता है। यह उत्सव केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मूर्तिकारों, संगीतकारों, फूल-विक्रेताओं, रसोइयों और सज्जाकारों के हुनर को एक साझा मंच प्रदान करता है, जहाँ व्यक्तिगत साधना सामुदायिक उल्लास में परिवर्तित हो जाती है।क्या है गणेश चतुर्थी की पौराणिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि?धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं में भगवान गणेश के प्राकट्य को लेकर कई आख्यान मिलते हैं। इनमें सबसे प्रचलित कथा माता पार्वती और भगवान शिव से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने अपनी सुरक्षा और एकांत की रक्षा के लिए अपने उबटन से एक बालक की रचना की और उसे द्वारपाल नियुक्त किया। जब भगवान शिव वहाँ पहुँचे, तो बालक ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। इस टकराव के परिणामस्वरूप बालक का मस्तक कट गया। माता पार्वती के गहन विलाप को देखकर भगवान शिव ने उन्हें एक हाथी का शीश लगाकर पुनर्जीवित किया और अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया। यह कथा केवल एक घटना नहीं है, बल्कि यह जीवन के कई गहरे व्यावहारिक संदेश देती है। यह सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य का निर्वहन पूरी निष्ठा से करना चाहिए, क्रोध विवेक के अभाव में विनाश लाता है, और संघर्ष के बाद भी प्रेम, स्वीकृति और पुनर्स्थापना संभव है।भगवान गणेश के शारीरिक स्वरूप में भी जीवन प्रबंधन के गूढ़ रहस्य समाहित हैं। उनका विशाल मस्तक व्यापक सोच और सुदृढ़ निर्णय क्षमता का प्रतीक माना गया है। उनके बड़े-बड़े कान धैर्यपूर्वक सुनने की महत्ता को दर्शाते हैं, जबकि उनकी सूक्ष्म आँखें गहन एकाग्रता और सूक्ष्म दृष्टि का बोध कराती हैं। उनकी सूंड शक्ति और परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलनशीलता (फ्लेक्सिबिलिटी) को रेखांकित करती है। उनका वाहन मूषक चंचल इच्छाओं और वासनाओं पर नियंत्रण का संकेत देता है, और उनके हाथ में स्थित मोदक सच्चे परिश्रम के उपरांत मिलने वाले मधुर परिणाम का द्योतक है। इस प्रकार, गणेश जी की आराधना केवल एक पारंपरिक क्रिया नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आचरण और सामाजिक व्यवहार में इन सद्गुणों को अपनाने का आह्वान है।क्या है गणपति पूजन से जुड़ा प्राचीन गण और टोटम का सामाजिक सिद्धांत?गणेश पूजा की ऐतिहासिक जड़ों को लेकर समाजशास्त्रियों और शोधकर्ताओं ने कई महत्वपूर्ण अवधारणाएँ प्रस्तुत की हैं। दक्कन क्षेत्र के प्राचीन इतिहास पर प्रस्तुत एक समाजशास्त्रीय शोध के अनुसार, प्राचीन काल में दक्कन में गण नामक गणतांत्रिक कबीले रहा करते थे। इन कबीलों के प्रमुख को 'गणपति' कहा जाता था। उस दौर में प्रत्येक कबीले का अपना एक विशिष्ट प्रतीक चिह्न होता था, जिसे टोटम (totem) कहा जाता था, और यह प्रायः किसी पशु के शीश के रूप में होता था।ऐतिहासिक विश्लेषण के अनुसार, जिस कबीले का टोटम गज-मुख (हाथी का सिर) था, उसने दक्कन के एक विस्तृत भूभाग पर अपना आधिपत्य और प्रभाव स्थापित किया। उस कबीले के प्रमुख अत्यंत लोकप्रिय हुए और जनमानस में उनके प्रति गहरा आदर भाव विकसित हो गया। कालांतर में, लोगों ने श्रद्धावश उनकी स्मृति और उपस्थिति को पूजना प्रारंभ किया। चूँकि उनके कबीले का प्रतीक हाथी का शीश था, इसलिए उनकी प्रतिमा का निर्माण भी गज-शीश के साथ किया जाने लगा। धीरे-धीरे समय बीतने के साथ यह कबीलाई परंपरा भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश के पौराणिक पूजन के साथ एकाकार हो गई और इसने एक सार्वभौमिक धार्मिक स्वरूप ग्रहण कर लिया।बाल गंगाधर तिलक ने 1892 में इस पर्व को सार्वजनिक आंदोलन क्यों बनाया?यद्यपि गणेश चतुर्थी का पर्व घरों के भीतर सदियों से मनाया जाता रहा था, परंतु इसे सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने का श्रेय राष्ट्रवादी नेता बाल गंगाधर तिलक को जाता है। वर्ष 1892 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने हिंदुओं के सार्वजनिक रूप से एकत्रित होने पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे थे। इन दमनकारी नियमों का रचनात्मक उत्तर देने के लिए बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव को सार्वजनिक पंडालों के रूप में आयोजित करने की प्रेरणा दी।सार्वजनिक पंडाल केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं रहे, बल्कि वे राष्ट्रीय विमर्श, बौद्धिक भाषणों, नाटकों, संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के प्रमुख केंद्र बन गए। इस मंच ने समाज के विभिन्न वर्गों, जातियों और स्तरों के लोगों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। यहाँ से जो सामाजिक एकता और नागरिक एकजुटता की नींव पड़ी, वह आज भी जीवित है। आज भी अनेक गणेश मंडल न केवल धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, बल्कि रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य सेवाएँ और सामाजिक कल्याणकारी कार्य आयोजित करके उसी लोक-कल्याणकारी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।उत्तर भारत और महाराष्ट्र के उत्सवों की प्रकृति में क्या भिन्नता है?सांस्कृतिक दृष्टि से यह प्रश्न प्रायः उठता है कि उत्तर भारत में गणेश चतुर्थी उस पैमाने पर क्यों नहीं मनाई जाती, जिस प्रकार महाराष्ट्र और कर्नाटक में देखी जाती है। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में रामनवमी, जन्माष्टमी, और विशेषकर होली तथा दिवाली को कहीं अधिक व्यापक स्तर पर मनाया जाता रहा है। दिवाली और होली केवल धार्मिक तिथियाँ नहीं हैं, बल्कि वे प्रत्यक्ष रूप से कृषि और फसलों के चक्र से जुड़ी हुई हैं, जिसके कारण ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उनका जुड़ाव अत्यंत गहरा है।दूसरी ओर, ऐतिहासिक रूप से महाराष्ट्र में उस दौर में होली और दिवाली का स्वरूप उत्तरी मैदानों जितना विशाल नहीं था। 1892 में तिलक द्वारा की गई पहल के बाद महाराष्ट्र और गोवा के अंचल में गणेश चतुर्थी को सामूहिक पंडाल संस्कृति के रूप में जो विस्तार मिला, वह उत्तर भारत के पारंपरिक घरेलू उत्सवों से भिन्न था। उत्तर भारत में भगवान गणेश की पूजा अनिवार्य रूप से प्रत्येक शुभ कार्य और दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ की जाती है, किंतु 10 दिनों तक बप्पा की प्रतिमा घर लाकर बिठाने और सार्वजनिक पंडाल सजाने का चलन ऐतिहासिक रूप से मुख्य रूप से दक्कन और पश्चिमी भारत तक ही केंद्रित रहा।महाराष्ट्र, गोवा और दिल्ली में किस तरह सजते हैं बप्पा के दरबार?महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की भव्यता देखते ही बनती है। मुंबई में 'गणपति बप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया' के गगनभेदी जयकारों के बीच पूरा शहर जीवंत हो उठता है। यहाँ के प्रसिद्ध पंडालों में लालबागचा राजा, खेतवाड़ी गणराज, गणेश गल्ली मुंबईचा राजा और अंधेरीचा राजा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जहाँ दर्शन के लिए मीलों लंबी कतारें लगती हैं। सांस्कृतिक राजधानी पुणे में यह पर्व अत्यंत प्रामाणिक और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। पुणे के पंडालों में शास्त्रीय कला, लोकनृत्य और मोदक व लड्डुओं का विशेष भोग लगाया जाता है।पड़ोसी राज्य गोवा में भी इस पर्व की अनुपम छटा देखने को मिलती है। यहाँ लोग अपने घरों की गहन सफ़ाई करते हैं और सगे-संबंधियों के यहाँ मिलने जाते हैं। गोवा के मार्सेल और मपुसा ऐसे प्रमुख स्थल हैं, जहाँ प्राचीन मंदिरों की उपस्थिति के कारण गणेश चतुर्थी का आयोजन अत्यंत वैभवशाली होता है।देश की राजधानी दिल्ली का स्वरूप अपनी विविधता के लिए जाना जाता है। दिल्ली के पंडालों में एक ओर जहाँ विभिन्न राज्यों की परंपराओं का संगम दिखाई देता है और भगवान गणेश की विशालकाय प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं, वहीं दूसरी ओर मंदिरों में आचार्यों और पुरोहितों द्वारा वेद और उपनिषदों की ऋचाओं का सस्वर पाठ वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।दक्षिण भारत और हैदराबाद में कैसे मनाया जाता है यह पावन पर्व?दक्षिण भारत के राज्यों में गणेश चतुर्थी का उल्लास एक विशिष्ट धार्मिक क्रम के साथ प्रकट होता है। तमिलनाडु और कर्नाटक में गणेश चतुर्थी से ठीक एक दिन पहले गौरी हब्बा (या गोवरी हब्बा) मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता है कि पुत्र के आगमन से पूर्व माता का स्वागत किया जाता है; अतः पहले दिन भगवान गणेश की माता, देवी गौरी की विधिवत प्रतिष्ठा और आराधना होती है, और उसके अगले दिन भगवान गणेश का स्वागत किया जाता है। कर्नाटक में इस अवसर पर गोज्जू, मोदकम और पायसम जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाकर अर्पित किए जाते हैं।तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में गणेशोत्सव का उत्साह अत्यंत भव्य रूप में सामने आता है। यहाँ 10 दिनों तक निरंतर चलने वाले आयोजनों में श्रद्धालु भारी संख्या में एकत्र होते हैं। पूजन के दौरान भगवान को उंद्राल्लू, कुडुमुलु और चावल की खीर (राइस पॉरिज) का विशेष नैवेद्य चढ़ाया जाता है। हैदराबाद का खैराताबाद मंडल अपनी विशाल प्रतिमाओं के लिए देशभर में विख्यात है। यहाँ 60 फीट तक ऊँची गणेश प्रतिमा स्थापित की जाती है और भगवान के बाएँ हाथ में लगभग 5,600 किलोग्राम वजनी महालड्डू का भोग रखा जाता है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुँचते हैं।सात समंदर पार पेरिस की सड़कों पर कैसे गूंजते हैं गणपति के जयकारे?भगवान गणेश की आराधना की गूँज भारत की भौगोलिक सीमाओं को पार कर यूरोप तक जा पहुँची है। फ़्रांस की राजधानी पेरिस (Paris) के 18वें एरोन्डिसमेंट (18th arrondissement) में प्रतिवर्ष गणेश महोत्सव का भव्य आयोजन किया जाता है। यह पूरा आयोजन ला चैपल (La Chapelle) क्षेत्र में स्थित श्री मणिका विनायकरालयम (Sri Manicka Vinayakar Alayam) मंदिर द्वारा संपन्न कराया जाता है।रविवार, 30 अगस्त को आयोजित होने वाले इस वार्षिक उत्सव में हिंदू समुदाय के हज़ारों श्रद्धालु और स्थानीय नागरिक सम्मिलित होते हैं। मंदिर में पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों और अभिषेक के उपरांत भगवान गणेश की भव्य प्रतिमा को एक सुसज्जित रथ पर विराजमान किया जाता है। इस रथ को श्रद्धालु रस्सियों के सहारे खींचते हुए पेरिस की प्रमुख सड़कों से निकालते हैं। इस शोभायात्रा में गायक और वादक भजन-कीर्तन प्रस्तुत करते हुए चलते हैं, जो एक कार्निवल (carnival) जैसा उल्लासमय दृश्य प्रस्तुत करता है। यात्रा के मार्ग में उपस्थित जनसमूह के बीच प्रसाद, पारंपरिक मिठाइयाँ और शीतल पेय वितरित किए जाते हैं, जो भारतीय संस्कृति के वैश्विक विस्तार और सौहार्द का जीवंत प्रमाण है।विसर्जन का आध्यात्मिक और पर्यावरणीय संदेश क्या है?गणेश चतुर्थी के 10वें दिन अनंत चतुर्दशी पर प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। मुंबई में अरब सागर के तटों पर और अन्य शहरों में विभिन्न जलाशयों में जब बप्पा को विदाई दी जाती है, तो वह दृश्य अत्यंत भावुक होता है। विसर्जन का वास्तविक दार्शनिक अर्थ यह है कि भौतिक आकार नश्वर और अस्थायी हैं। जिस प्रकार मिट्टी से बनी प्रतिमा जल में विलीन होकर पुनः प्रकृति का अंग बन जाती है, उसी प्रकार समस्त सांसारिक रूप अंततः विराट ईश्वरीय सत्ता में समाहित हो जाते हैं।वर्तमान समय में जलस्रोतों के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक चिकनी मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बनी मूर्तियों के उपयोग पर विशेष बल दिया जा रहा है। विसर्जन की यह रस्म हमें सिखाती है कि जीवन में परिवर्तन को सहजता से स्वीकार करना चाहिए और विदाई के क्षणों में भी आगामी वर्ष में बप्पा के पुनः आगमन की मंगलकामना और कृतज्ञता का भाव बनाए रखना चाहिए।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2635jfn42. https://tinyurl.com/2ayg93jh3. https://tinyurl.com/28yfl2ws4. https://tinyurl.com/2a4257ye
बैक्टीरिया, प्रोटोज़ोआ, क्रोमिस्टा और शैवाल
क्रूज शिप पर फैला रहस्यमयी हंता वायरस क्या भारत के लिए भी है खतरा?
हाल ही में एमवी होंडियस (MV Hondius) नामक एक क्रूज शिप (cruise ship) पर एक जानलेवा संक्रमण फैलने से पूरी दुनिया के स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ गई हैं। यह क्रूज शिप अर्जेंटीना से केप वर्डे की यात्रा पर था, जहां कई यात्रियों में गंभीर श्वसन संबंधी बीमारियां देखी गईं। जांच में यह बात सामने आई कि यह संक्रमण हंता वायरस के एंडीज स्ट्रेन (Andes strain) के कारण फैला है। इस वायरस की चपेट में आने से एक डच महिला की मृत्यु हो गई, जबकि ब्रिटिश और स्विस यात्री गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हुए। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2025 में ऑस्कर विजेता अभिनेता जीन हैकमैन (Gene Hackman) की पत्नी बेट्सी अराकावा (Betsy Arakawa) का निधन भी इसी वायरस से जुड़ी सांस की बीमारी के कारण हुआ था, जिसके बाद उनके घर के आस-पास चूहों के घोंसले पाए गए थे। इस खतरनाक वायरस ने वैश्विक स्तर पर यह बहस छेड़ दी है कि क्या चूहों से फैलने वाली यह बीमारी एक नई महामारी का रूप ले सकती है।हंता वायरस क्या है और यह कैसे फैलता है?हंता वायरस कोई एक अकेला वायरस नहीं है, बल्कि यह वायरसों का एक पूरा समूह है जो मुख्य रूप से चूहों और कृंतकों द्वारा फैलता है। इस वायरस का नाम दक्षिण कोरिया की एक नदी के नाम पर रखा गया है। यह वायरस बुन्याविरालेस ऑर्डर (Order Bunyavirales) के हंताविरिडे फेमिली (Family Hantaviridae) से संबंधित है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जो चूहे इस वायरस को अपने शरीर में लेकर घूमते हैं, वे खुद कभी बीमार नहीं पड़ते। यह वायरस चूहों के मल, मूत्र और लार में मौजूद होता है।जब चूहे किसी बंद जगह पर मल-मूत्र करते हैं और वह सूख जाता है, तो सफाई करते समय या हवा के झोंके से उसके कण हवा में मिल जाते हैं। जब इंसान इस दूषित हवा में सांस लेता है, तो यह वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसे एरोसोलाइज्ड ट्रांसमिशन (aerosolized transmission) कहा जाता है। इसके अलावा, चूहों द्वारा खाए गए या जूठे किए गए भोजन का सेवन करने, वायरस से दूषित सतहों को छूने के बाद उन्हीं हाथों से अपनी आंख, नाक या मुंह को छूने, या संक्रमित चूहे के काटने और खरोंचने से भी यह संक्रमण इंसानों में फैल सकता है।क्रूज शिप पर यह आउटब्रेक कैसे हुआ और एंडीज स्ट्रेन क्यों है खतरनाक?एमवी होंडियस क्रूज शिप का मामला चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यह शिप एक अप्रैल 2026 को अर्जेंटीना के उशुआइया से निकला था और पहला मामला छह अप्रैल को सामने आया। चूंकि इस वायरस का इन्क्यूबेशन पीरियड (incubation period) आमतौर पर लंबा होता है, इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि पहले यात्री को यह संक्रमण क्रूज पर चढ़ने से पहले ही अर्जेंटीना में बर्ड-वाचिंग (पक्षियों को देखने) की किसी गतिविधि के दौरान चूहों के संपर्क में आने से हुआ होगा।चिंता का असली कारण एंडीज स्ट्रेन है। आमतौर पर हंता वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में नहीं फैलता है। लेकिन दक्षिण अमेरिका (विशेषकर अर्जेंटीना और चिली) में पाया जाने वाला एंडीज स्ट्रेन इसका एकमात्र अपवाद है। जब कोई व्यक्ति इस स्ट्रेन से संक्रमित होता है, तो बहुत करीबी और लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले परिवार के सदस्यों या देखभाल करने वालों में यह वायरस फैल सकता है। क्रूज शिप पर दूसरा मामला पहले मरीज के बेहद करीबी संपर्क वाले व्यक्ति का ही था, जो इस बात का प्रबल संकेत देता है कि यह वायरस इंसान से इंसान में फैला है। इससे पहले 2018 में भी अर्जेंटीना में एक पार्टी के दौरान एक ही संक्रमित व्यक्ति से 34 लोग संक्रमित हुए थे, जिनमें से 11 की मौत हो गई थी।हंता वायरस से संक्रमित होने पर शरीर में क्या लक्षण दिखाई देते हैं?वायरस के संपर्क में आने और बीमारी के लक्षण दिखने के बीच का समय (इन्क्यूबेशन पीरियड) एक से आठ सप्ताह तक का हो सकता है। यह वायरस दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दो तरह की गंभीर बीमारियां पैदा करता है। उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में यह हंता वायरस पल्मोनरी सिंड्रोम (Hantavirus Pulmonary Syndrome - एचपीएस) का कारण बनता है। शुरुआती दौर में मरीज को तेज बुखार, सिरदर्द, थकान, ठंड लगना और शरीर की बड़ी मांसपेशियों (जैसे जांघ, कूल्हे और पीठ) में तेज दर्द होता है। कुछ लोगों को पेट दर्द, मतली, उल्टी और डायरिया की शिकायत भी होती है।चार से दस दिन बीत जाने के बाद, यह बीमारी अपने दूसरे और अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश करती है। वायरस फेफड़ों की छोटी रक्त वाहिकाओं (केपिलरीज - capillaries) पर हमला करता है, जिससे उनमें रिसाव होने लगता है और फेफड़ों में पानी भर जाता है। इसके कारण मरीज को भयानक खांसी आती है, सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई होती है और शरीर में ऑक्सीजन की कमी से उसकी जान जा सकती है। एचपीएस बेहद घातक है और इसमें मृत्यु दर 30 से 50 प्रतिशत तक होती है।वहीं दूसरी ओर, यूरोप और एशिया में यह वायरस हेमोरेजिक फीवर विद रीनल सिंड्रोम (hemorrhagic fever with renal syndrome - एचएफआरएस) का कारण बनता है। इसमें बुखार, धुंधली दिखाई देना और पीठ दर्द के साथ-साथ गंभीर मामलों में लो ब्लड प्रेशर, आंतरिक रक्तस्राव और एक्यूट किडनी फेलियर (acute kidney failure) की समस्या उत्पन्न हो जाती है। एचएफआरएस में मृत्यु दर आमतौर पर 1 से 15 प्रतिशत के बीच होती है।जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय बदलाव कैसे बढ़ा रहे हैं इसका खतरा?शोधकर्ताओं का मानना है कि हंता वायरस जैसे जूनोटिक रोगों (जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियां) के बढ़ने के पीछे जलवायु परिवर्तन और बेतरतीब शहरीकरण एक बहुत बड़ा कारण है। जैसे-जैसे जंगलों की कटाई हो रही है और इंसान कृषि और रिहायशी मकसदों के लिए वन्यजीवों के आवास में अतिक्रमण कर रहा है, इंसानों और चूहों के बीच का संपर्क तेजी से बढ़ रहा है।तापमान में वृद्धि और अनियमित बारिश के कारण चूहों के खाने की उपलब्धता में बदलाव आता है। जब भोजन प्रचुर मात्रा में होता है, तो चूहों की आबादी में विस्फोट होता है। आबादी बढ़ने पर ये चूहे भोजन और आश्रय की तलाश में इंसानों के घरों, खलिहानों और भंडारण स्थलों में घुस जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे महाद्वीप में जहां अब तक हंता वायरस का कोई मानव मामला दर्ज नहीं किया गया है, वहां भी कुछ चूहों में इसके एंटीबॉडी पाए गए हैं। यह इस बात का संकेत है कि वायरस पर्यावरण में खामोशी से मौजूद है और परिस्थितियां अनुकूल होने पर कभी भी प्रकोप फैला सकता है।क्या भारत को भी हंता वायरस से सतर्क रहने की आवश्यकता है?यद्यपि वर्तमान में हंता वायरस का केंद्र दक्षिण अमेरिका और यूरोप रहा है, लेकिन भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए यह एक मूक खतरा बन सकता है। भारत में मानसून के दौरान बाढ़, जलभराव और सीवेज ओवरफ्लो के कारण चूहों का आतंक बढ़ जाता है। मुंबई, दिल्ली और कोलकाता जैसे महानगरों में पुरानी इमारतों, रेलवे नेटवर्क और घनी बस्तियों के कारण इंसानों और चूहों का संपर्क बहुत अधिक है।भारत में हंता वायरस को लेकर सबसे बड़ी चुनौती इसके लक्षणों का अन्य बीमारियों से मेल खाना है। इसके शुरुआती लक्षण बिल्कुल डेंगू, मलेरिया, लेप्टोस्पायरोसिस (leptospirosis), इन्फ्लूएंजा (influenza) और वायरल बुखार जैसे होते हैं। इस कारण अधिकांश डॉक्टर प्रारंभिक जांच में हंता वायरस पर संदेह ही नहीं करते। अतीत में दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में हंता वायरस के एंटीबॉडी और संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (Indian Council of Medical Research - आईसीएमआर) ने कोविड-19 के बाद अपनी निगरानी प्रणाली को मजबूत किया है, लेकिन ग्रामीण और छोटे शहरों के अस्पतालों में अभी भी इस दुर्लभ बीमारी की सटीक जांच (आरटी-पीसीआर (RT-PCR)और आईजीएम एंटीबॉडी टेस्ट (IgM Antibody Test)) के लिए बुनियादी ढांचे का अभाव है। यदि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में मौजूद चूहों में इस वायरस का प्रसार होता है, तो खराब स्वच्छता और घनी आबादी के कारण यह तेजी से फैल सकता है।इस जानलेवा वायरस से बचाव और रोकथाम के क्या उपाय हैं?चूंकि हंता वायरस मुख्य रूप से चूहों से फैलता है, इसलिए उनसे बचाव ही इस बीमारी की सबसे अच्छी रोकथाम है। स्वास्थ्य एजेंसियों द्वारा कुछ सख्त दिशानिर्देश जारी किए गए हैं।अगर घर, गैराज या गोदाम में चूहों का मल-मूत्र दिखाई दे, तो उसे कभी भी सूखी झाड़ू या वैक्यूम क्लीनर से साफ न करें। ऐसा करने से वायरस हवा में उड़ने लगता है। सफाई से पहले चूहों के मल पर ब्लीच और पानी का घोल (या कोई मजबूत कीटाणुनाशक) छिड़कें और उसे पांच मिनट तक भीगने दें। इसके बाद पेपर टॉवल से पोंछकर उसे कचरे में फेंक दें। सफाई करते समय हमेशा रेस्पिरेटर मास्क और रबर या प्लास्टिक के दस्ताने पहनें। सफाई के बाद हाथों को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोना अनिवार्य है।घरों में चूहों के प्रवेश को रोकने के लिए दीवारों और दरवाजों के सभी छेदों (एक चौथाई इंच तक के) को स्टील वूल, जाली या सीमेंट से बंद करें। घर के बर्तन तुरंत धोएं और खाने-पीने की चीजों व पालतू जानवरों के भोजन को एयर-टाइट डिब्बों में बंद करके रखें। जिन केबिनों, स्टोरेज शेड या कमरों का लंबे समय से उपयोग नहीं हुआ है, वहां जाने से पहले दरवाजे और खिड़कियां खोलकर आधे घंटे तक ताजी हवा आने दें।इसके अलावा, गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों (5 वर्ष से कम) और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को पालतू चूहों (पेट रैट्स) से दूर रहना चाहिए। चूहों को पालने वालों को लगातार पिंजरे की सफाई और जानवरों के परीक्षण का ध्यान रखना चाहिए। क्या हंता वायरस का कोई सटीक इलाज या वैक्सीन उपलब्ध है?वर्तमान में हंता वायरस संक्रमण के लिए पूरी दुनिया में कोई भी प्रमाणित विशिष्ट एंटीवायरल उपचार या व्यापक रूप से उपलब्ध वैक्सीन नहीं है। इस बीमारी का इलाज मुख्य रूप से लक्षणों के आधार पर (सपोर्टिव केयर) किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति को चूहे वाले वातावरण में रहने के बाद तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ होती है, तो उसे तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए।अस्पताल में मरीजों को ऑक्सीजन थेरेपी दी जाती है। गंभीर एचपीएस मामलों में मरीजों को इंट्यूबेशन (intubation) या वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ सकती है। वहीं, एचएफआरएस के मरीजों में किडनी फेल होने की स्थिति में डायलिसिस का सहारा लिया जाता है, ताकि शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकाला जा सके और तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखा जा सके। सही समय पर आईसीयू (सघन चिकित्सा कक्ष) में भर्ती होने से मरीज की जान बचने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/25vrvc27 2. https://tinyurl.com/22hl9j78 3. https://tinyurl.com/24fymyog 4. https://tinyurl.com/2486aeho 5. https://tinyurl.com/23tpwyja 6. https://tinyurl.com/2dj9ckvb 7. https://tinyurl.com/29ls2gdq 8. https://tinyurl.com/2yp6n7lx
धर्म का युग : 600 ई.पू. से 300 ई.
रोमन साम्राज्य में एनीड व भारतवर्ष में रामायण महाकाव्य में युवा पीढ़ी के लिएं प्रेरणा
लखनऊ, आज हम विश्व प्रसिद्ध काव्य ‘एनीड (Aeneid)’ एवं हमारी भारतभूमि पर रचित ‘रामायण’ काव्य के बारे में जानेंगे। शीर्ष लैटिन (Latin) कवियों में से एक माने जाने वाले वर्जिल (Virgil) ने, अपने जीवन के अंतिम दस वर्षों (29 ईसा पूर्व-19 ईसा पूर्व) में ‘एनीड’ की रचना की थी। यह उनकी सर्वोत्कृष्ट कृति थी। हालाँकि दुर्भाग्यवश, इस काव्य के संपादन के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई। अपनी कृति अधूरी रह जाने से, वे इतने व्यथित थे कि उन्होंने अपनी मृत्यु के बाद इस काव्य को जला देने की इच्छा व्यक्त की थी। किंतु एनीड की अधूरी स्थिति में भी इसके एक ऐसे प्रशंसक थे, जिन्होंने इसके प्रारूपों को पहले ही देख रखा था। अतः उन्होंने अपने मित्र की अंतिम इच्छा को दरकिनार करते हुए, कुछ मामूली संशोधनों के साथ इसे प्रकाशित करवाया।एनीड, युवाओं के लिए अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि इसमें ट्रोजन राजवंश (Trojan royal family) के एक राजकुमार ऐनियस (Aeneas) की इटली-यात्रा का वर्णन है, जहाँ उसके लिए एक नए वंश व राज्य की भविष्यवाणी की गई है। ‘इलियाड (Iliad)’ काव्य के अनुसार, ट्रॉय (Troy) राज्य के विनाश के बाद सुरक्षित बचे कुछ सैनिकों व नागरिकों के साथ बच निकलता है। वहाँ, वह एक ऐसे स्वाभिमानी और साहसी वंश की नींव रखेगा, जिसकी कीर्ति संपूर्ण विश्व में फैलेगी। यह प्रसंग स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि ऐनियस एक युवा था, जो भविष्य में रोमन साम्राज्य (Roman Empire) की नींव रखने वाली भावी पीढ़ी का सही मार्गदर्शन और पालन-पोषण करेगा।युवाओं के लिए इसकी प्रासंगिकता का दूसरा कारण यह है कि इस महाकाव्य के अधिकांश पात्र युवा हैं। उदाहरण के लिए, जब ऐनियस की मां - देवी वीनस (Venus) उसे शहर के इतिहास से परिचित कराती हैं, तो वह उसे देवी जूनो (Juno) की कृपा प्राप्त करने हेतु उनके मंदिर जाने के लिए प्रेरित करती हैं। ऐनियस की समुद्री जहाज़ी यात्रा के दौरान, अफ्रीका के तट पर यह प्रसंग हुआ था। तत्पश्चात्, ऐनियस नगर में प्रवेश करता है और जूनो के मंदिर में कार्थेज की रानी (Queen of Carthage) - डिडो (Dido) की कृपादृष्टि प्राप्त करता है। यह घटना बताती है कि एक युवा होने के नाते, ऐनियस को अपनी यात्रा के दौरान पग-पग पर अपनी मां के मार्गदर्शन पर निर्भर रहना पड़ा, क्योंकि वह उस स्थान से पूर्णतः अनभिज्ञ था।ऐनियस के वंशज भविष्य में इस नगर पर पुनः विजय प्राप्त न कर सकें, इस आशंका से चिंतित होकर, वीनस अपने पुत्र की सुरक्षा हेतु एक योजना बनाती हैं। वह ऐनियस के सौतेले भाई - क्यूपिड (Cupid) को असकैनियस (Ascanius) का छद्म रूप देकर भेजती हैं। क्यूपिड, डिडो को उपहार भेंट करता है। तब, डिडो के मन में वात्सल्य-भाव जागृत होता है और वह ऐनियस के प्रेम में बंध जाती है। अपने दिवंगत पति के प्रति वफादार होने के बावजूद, वह ऐनियस के प्रति अत्यंत आसक्त हो जाती है। इस संदर्भ में, यह रचना ऐनियस और उसकी पीढ़ी के भविष्य तथा उसकी सफलता को लेकर चिंतित मां के प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करती है। वीनस द्वारा रचा गया यह संपूर्ण ताना-बाना, यह दर्शाता है कि भविष्य युवा पीढ़ी पर ही निर्भर करता है और उनका मार्गदर्शन करना अत्यंत आवश्यक है।इसके विपरीत, हमारे भारतवर्ष की पौराणिक कहानी - रामायण, उस कालखंड के समाज का चित्रण करती है, जहाँ विशाल साम्राज्य हैं; एक भावी राजा के रूप में राजकुमार का प्रशिक्षण किया जा रहा है; माता और सौतेली माताओं के मध्य द्वंद्व है; भाइयों में पारस्परिक प्रेम व निष्ठा है; और राजकुमारी के स्वयंवर की प्रतियोगिताएं हैं। रामायण, मुख्य रूप से वयस्क पीढ़ी के उत्तरदायित्वों पर केंद्रित है, क्योंकि इसमें नेतृत्व, पारिवारिक अंतर्द्वंद्व और प्रेम के गंभीर पक्षों का विवेचन है। ये गुण युवाओं की तुलना में प्रौढ़ एवं वयस्क व्यक्तियों में अधिक दृष्टिगोचर होते हैं।इसके अतिरिक्त, रामायण, एक नैतिक पुरुष और जननायक के आदर्श आचरण का निरूपण करता है, फिर चाहे वह संयमपूर्वक परिस्थितियों का सामना करना हो, दायित्वों को निष्ठा से निभाना हो, व्यक्तिगत दुःखों और सीमाओं से परे रहकर स्वशासित रहना हो, या समाज में प्रेम और सम्मान का भाव जगाना हो। दूसरी तरफ, माता सीता यह अनुभव करती हैं कि धरती पर उनका समय समाप्त हो चुका है, एवं वे धरती माता की गोद में समा जाती हैं। तत्पश्चात्, भगवान राम-सीता के दोनों पुत्र - लव और कुश, अपने पिता के साथ तब तक अयोध्या में रहते हैं, जब तक कि वे राज्य के उत्तराधिकारी नहीं बन जाते। यह हमें सीख देता है कि एक शासक को अपने जीवनकाल के बाद पुत्रों को योग्य बनाकर राज्य सौंपना चाहिए। पुत्रों ने भी अपने पिता से नेतृत्व कला के समस्त गुण सीखे, ताकि वे उस दायित्व को सफलतापूर्वक संभाल सकें।एक अलग विषय में, पैगंबर मुहम्मद की जीवनी, जिसे ‘सीरा’ के नाम से जाना जाता है, सर्वप्रथम आठवीं शताब्दी के विद्वान इब्न इसहाक द्वारा संकलित की गई थी। बाद में, इब्न हिशाम द्वारा इसे पुनः संपादित व परिमार्जित किया गया। वास्तव में, यह ग्रंथ पैगंबर साहब के जीवन की घटनाओं को कालक्रमानुसार प्रस्तुत करने के लिए मौखिक परंपराओं, वृत्तांतों और संदर्भ-योग्य कविताओं का एक चुनिंदा संकलन है। मौखिक विवरणों का यह संक्षिप्त रूप, पैगंबर साहब के जीवन और उपदेशों पर केंद्रित कई अन्य रचनाओं का मूल आधार भी बनता है। इनमें से कुछ ‘हदीस’ के नाम से प्रख्यात भविष्यवाणी परंपराओं के संग्रह हैं, जो इस्लामी कानून के स्रोतों में से एक हैं। इब्न इसहाक की यह कृति, उस व्यापक विद्वतापूर्ण एवं ऐतिहासिक साहित्य का अभिन्न अंग है, जो कुरान के साथ मिलकर इस्लामी आस्था (अकीदा) की नींव रखता है। यह आज भी संपूर्ण मुस्लिम जगत के लिए अत्यंत महत्त्व रखता है।हाल ही में, एक अरब इतिहासकार तारिफ अल-खालिदी ने रेखांकित किया है कि ‘अपने इसी मौलिक स्वरूप के कारण, 'सीरा' और 'हदीस' के विद्वानों द्वारा प्रस्तुत इतिहास का यह दृष्टिकोण, मिखाइल बख्तिन की शब्दावली में एक 'महाकाव्यात्मक चरित्र' धारण करता है’। यद्यपि खालिदी ने इस विचार को आगे विस्तृत नहीं किया, किंतु सीरा उन लक्षणों को दर्शाती है, जिन्हें अन्य विश्व-परंपराओं में महाकाव्य का दर्जा प्राप्त है।तुलनात्मक रूप में, 'एनीड' महाकाव्य, संभवतः पहली बार दो परस्पर विरोधी आदर्शों - मानवतावाद और साम्राज्यवाद को एक साथ अभिव्यक्ति देता है। इन्हें लंबे समय से यूरोपीय चेतना का आधार माना जाता रहा है। मानवतावाद, वर्जिल के मित्र और शत्रु दोनों के प्रति गहरी मानवीय संवेदना तथा दया व नम्रता के भाव में दिखाई देता है। इसी कारण, उन्हें ईसाई धर्म का पूर्वगामी भी माना गया। इसके विपरीत, साम्राज्यवाद 'एनीड' में वर्णित रोम की न्यायप्रिय सत्ता की अवधारणा में झलकता है, जिसे बाद के यूरोपीय और अमेरिकी साम्राज्यवादी विचारों का वैचारिक आधार माना जा सकता है।दूसरी तरफ, सीरा के साथ तुलना के लिए महर्षि वाल्मीकि रचित संस्कृत ‘रामायण’ चुना गया है। इसके केंद्र में धर्म एवं धार्मिकता की एक भिन्न अवधारणा है। रामायण की “प्रकृति और मनुष्य के बीच पूर्ण सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व” को पुनर्स्थापित करने वाले एकीकरण बल की अवधारणा ने भारतीय संस्कृति पर अमिट छाप छोड़ी है। इसकी यह शाश्वत प्रासंगिकता 'एनीड' और 'सीरा' के समतुल्य है। यह बात तब और भी स्पष्ट हो जाती है, जब हम रामायण से प्रेरित होकर लिखे गए उत्तरवर्ती पुनर्कथनों को देखते हैं। इसका उदाहरण, मध्यकालीन हिंदी में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' है, जिसे महात्मा गांधी संपूर्ण भक्ति-साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचना मानते थे। यहां ध्यान देने योग्य एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि ऋषि कंबन द्वारा रचित तमिल रामायण का उपयोग, 17वीं शताब्दी के कवि उमारू पुलावर ने "पैगंबर मुहम्मद की तमिल जीवनी" के लिए एक साहित्यिक मॉडल के रूप में किया था। यह इन दोनों आख्यानों के आपसी संबंध का एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है।दूसरी तरफ, 'एनीड' की कथा, महाभारत की तुलना में भी काफी सरल और सीधी है। ऐनियस की कथा में, उसके लिए इटली में एक नई मातृभूमि और रोमनों के पूर्वज के रूप में स्थापित होने के बारे में है। पांडवों की भांति, ऐनियस भी एक दैवीय संतान है। उसकी मां प्रेम की देवी वीनस हैं, और ओलम्पियन देवी-देवता इस महाकाव्य की घटनाओं में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इनमें से अधिकांश परिस्थितियां प्रतिशोधी देवी जूनो द्वारा उत्पन्न की जाती हैं, जो ट्रोजन शरणार्थियों से घृणा करती है। वर्जिल, इस वृत्तांत का उपयोग रोम की स्थापना की पौराणिक कथा को विस्तार देने और ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वियों की शत्रुता का पौराणिक कारण स्पष्ट करने के लिए करते हैं। साथ ही, सीज़र वंश (Caesar dynasty) की राजनीतिक सत्ता को वैधता और पौराणिक आधार प्रदान करने के लिए भी वे इसका उपयोग करते हैं।इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि रामायण व एनीड दोनों काव्यों में ऐसी महिलाएं हैं, जो नायक को उसके महान लक्ष्य से भटकाती हैं; इनमें देवताओं की कृपा और कोप की लीलाएं हैं; और अन्य साम्राज्यों की रहस्यमयी यात्राएं हैं। ये कुछ ऐसे तत्त्व हैं, जो इन महाकाव्यों की समानता को सिद्ध करते हैं। संदर्भ1. https://tinyurl.com/b2efyb52 2. https://tinyurl.com/4n394955 3. https://tinyurl.com/4wsu9x43
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
हमारे लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब: यहाँ धर्म की सीमाओं से परे कैसे बँधती है प्यार भरी राखी?
लखनऊ, चलिए आज रक्षाबंधन के अवसर पर इस त्योहार के बारे में जानते हैं। संस्कृत शब्द ‘रक्षा बंधन’ का अर्थ, ‘सुरक्षा का एक पावन बंधन’ है। यह आधुनिक त्योहार हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन, आमतौर पर अगस्त के महीने में मनाया जाता है। कई अन्य भारतीय त्योहारों की तरह, रक्षाबंधन की जड़ें भी प्राचीन पौराणिक कथाओं में मिलती हैं, और प्रत्येक कथा इसके अर्थ में एक नई परत जोड़ती है।रक्षाबंधन को लेकर, श्रीकृष्ण एवं द्रौपदी की कहानी शायद महाभारत की सबसे प्यारी और लोकप्रिय कहानी है। जब युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण की उंगली कट गई, तो द्रौपदी ने बिना एक पल गँवाए अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर, उनकी उंगली पर बाँध दिया। इस भाव से द्रवित होकर कृष्ण ने हमेशा के लिए उनकी रक्षा करने का संकल्प लिया। देखभाल और पारस्परिकता का यह सरल कार्य, आगे चलकर रक्षाबंधन का एक दिव्य रूप बन गया, जिसका जैविक भाई-बहन के रिश्ते से परे प्रेम, निश्छलता और सम्मान से गहरा नाता है।एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, मृत्यु के देवता यम एक वर्ष से अधिक समय से अपनी बहन यमुना से मिलने नहीं जा पाए थे। जब वे अंततः उनसे मिलने गए, तो यमुना ने उनकी कलाई पर राखी बाँधी और स्वादिष्ट मिठाइयों से उनका स्वागत किया। इस आत्मीयता से प्रसन्न होकर, यम ने उन्हें अमरता का वरदान दिया और हर वर्ष मिलने आने का संकल्प लिया। इससे रक्षाबंधन पर बहनों से मिलने और इस दिन को केवल राखी बाँधने तक सीमित न रखकर स्नेह का उत्सव बनाने की परंपरा को बढ़ावा मिला।दूसरी ओर, भविष्य पुराण के अनुसार, देवताओं के राजा इंद्र की पत्नी शची ने युद्ध में जाने से पहले उनकी विजय और सुरक्षा के लिए उनकी कलाई पर एक पवित्र धागा बाँधा था। उस समय इसे ‘राखी’ नहीं कहा जाता था, लेकिन इसके पीछे की भावना अपने प्रिय व्यक्ति को अपनी शुभकामनाओं की ताकत और सुरक्षा का आशीर्वाद देना थी।रक्षाबंधन केवल पौराणिक कथाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने भारतीय इतिहास में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 16वीं शताब्दी में, जब चित्तौड़गढ़ पर गंभीर खतरा मंडरा रहा था, तब मेवाड़ की साहसी रानी कर्णवती ने अपनी रक्षा की गुहार लगाते हुए मुगल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजी थी। उनके इस निश्छलता भरे भाव से प्रभावित होकर हुमायूँ अपनी सेना के साथ मदद के लिए दौड़ पड़े, भले ही इसके परिणामस्वरूप उन्हें अपने राजनीतिक सहयोगियों के खिलाफ ही क्यों न जाना पड़ा। यह इस बात का एक शक्तिशाली प्रमाण है कि राखी, कैसे धर्म, क्षेत्र और यहाँ तक कि राजनीतिक सीमाओं को भी पार कर सकती है।यद्यपि रक्षाबंधन से जुड़ी कई लोककथाएँ और दंतकथाएँ प्रचलित हैं, किंतु भविष्य पुराण में उल्लिखित कथा सबसे अधिक प्रामाणिक मानी जाती है। भविष्य पुराण की इस कथा का उल्लेख ‘व्रतराज’ में भी मिलता है। युगों पहले, देवताओं और राक्षसों के बीच एक भीषण युद्ध हुआ था, जो पूरे बारह वर्षों तक चला। अंततः देवता युद्ध हार गए और राक्षसों ने इंद्र के स्वर्गलोक के साथ-साथ तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। तब देवराज इंद्र ने, देवताओं के गुरु बृहस्पति से परामर्श किया। गुरु बृहस्पति ने उन्हें रक्षा विधान का सुझाव दिया और इसके विशेष मंत्र बताए। श्रावण पूर्णिमा के दिन गुरु बृहस्पति ने रक्षा विधान का अनुष्ठान संपन्न किया। इस अनुष्ठान के दौरान रक्षा पोटली को पवित्र मंत्रों से अभिमंत्रित किया गया था। पूजा के पश्चात इंद्र की पत्नी शची ने इंद्र के दाहिने हाथ पर वह रक्षा पोटली बाँध दी। उस रक्षा पोटली की असीम शक्ति के कारण ही इंद्र राक्षसों को पराजित करने और अपना खोया हुआ राज्य वापस पाने में सक्षम हुए। तभी से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन का अनुष्ठान करने की परंपरा चली आ रही है।आज, हालांकि इस त्योहार ने आधुनिक रूप लिया है। क्या आप जानते हैं कि हमारे शहर लखनऊ की प्रसिद्ध ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करते हुए, शहर के निवासियों ने रक्षाबंधन के पावन पर्व पर सभी सांस्कृतिक और धार्मिक बाधाओं को पार कर आपसी प्रेम का संदेश दिया है। 32 वर्षीय सुमुल सानिया पिछले दो दशकों से अपने पड़ोसी विनय प्रकाश मौर्य को राखी बाँधती आ रही हैं। उनकी माताएँ घनिष्ठ दोस्त थीं और वे इस बात पर विशेष जोर देती थीं कि उनके बच्चों के मन में हमेशा प्रेम और भाईचारे की भावना बनी रहे।इसी प्रकार, शहर के एक अन्य निवासी अब्दुल सबूर की पत्नी को अपनी एक सहकर्मी में, एक ऐसी बहन मिल गई है, जो पिछले छह वर्षों से लगातार उन्हें राखी बाँधती आ रही है। इसके अलावा, 24 वर्षीय आशीष सिंह की मुलाकात एक संवाद कार्यक्रम के दौरान इरम नाज से हुई थी। वे तब से नाज को अपनी बहन मानते हैं। नाज ने भी इस त्योहार से जुड़ी सभी परंपराओं की पूरी जानकारी हासिल की है ताकि वे इसे पूरी पारंपरिक निष्ठा के साथ मना सकें।दूसरी ओर, 47 वर्षीय सनोबर, अपनी शादी के बाद से ही अपने पति के दोस्त गौरव सरीन को राखी बांधती आ रही हैं। उनका कोई सगा भाई नहीं है, लेकिन जब भी उन्हें मदद की ज़रूरत होती है, सरीन हमेशा उनके साथ खड़े रहते हैं। जबकि उनके पति मोहम्मद हैदर ने, लखीमपुर खीरी के बौधिया कलां गांव के निवासियों के साथ वर्चुअल (ऑनलाइन) राखी मनाई है। हैदर ने कुछ दशक पहले इस गांव को गोद लिया था और इस गांव के कुछ लोगों के साथ उनके प्यारे संबंध हैं।रक्षाबंधन के त्योहार की शुरुआत होने से एक महीने पहले ही, बाज़ार रंग-बिरंगी राखियों से गुलज़ार हो जाते हैं। लोग अपने भाइयों और बहनों के लिए फैंसी राखियाँ, प्यार भरे संदेश वाले कार्ड और सार्थक उपहार चुनते हैं। जैसे ही उस दिन सुबह के अनुष्ठान शुरू होते हैं, बहनें आरती करने और अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाने में आगे रहती हैं। इसके बाद, वे अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, जो उसकी समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और समग्र कल्याण के लिए की गई प्रार्थनाओं का एक प्रतीक है। इसके बदले में, भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं और हर परिस्थिति में उनके रक्षक बने रहने का वादा करते हैं। यह दिन हँसी, खुशी और स्नेह के एक सामंजस्यपूर्ण माहौल के साथ आगे बढ़ता है।भारत में कोई भी उत्सव विशेष व्यंजनों का आनंद लिए बिना पूरा नहीं होता है और रक्षाबंधन इसका कोई अपवाद नहीं है! पारंपरिक मिठाइयां इस आनंदमय अवसर का मुख्य आकर्षण हैं। नारियल और मोतीचूर के स्वादिष्ट लड्डुओं से लेकर खीर, पायसम, घेवर और हलवे की तिकड़ी जैसे प्रत्येक व्यंजन, न केवल हमारी जिव्हा को तृप्त करते हैं, बल्कि भाइयों और बहनों के बीच साझा प्रिय बंधन की अंतर्निहित मिठास का भी प्रतीक है। संदर्भ1. https://tinyurl.com/4tk9776e 2. https://tinyurl.com/y3s6vjnh 3. https://tinyurl.com/4zd4pvwp 4. https://tinyurl.com/4p9kuwd5
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
लखनऊ की संगीत परंपरा में पियानो है शास्त्रीय, फिल्म और समकालीन संगीत की विधाओं में प्रयोग
लखनऊ भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहाँ स्थित भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय ने भारतीय संगीत के साथ-साथ पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के अध्ययन को भी प्रोत्साहन दिया है, जिससे दोनों संगीत परंपराओं के बीच संवाद को नई दिशा मिली। पश्चिमी संगीत के सबसे प्रभावशाली वाद्यों में पियानो का विशेष स्थान है। अपनी मधुर ध्वनि, विस्तृत स्वर-सीमा और एक साथ धुन तथा संगति प्रस्तुत करने की क्षमता के कारण यह शास्त्रीय, जैज़, फिल्म और समकालीन संगीत की अनेक विधाओं में व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है।पियानो में प्रत्येक कुंजी (key) एक छोटे हथौड़े को सक्रिय करती है, जो भीतर लगी तार पर प्रहार करके ध्वनि उत्पन्न करता है। कलाकार अपनी उँगलियों के स्पर्श, गति और लय के माध्यम से कोमल, गंभीर या ऊर्जावान भावों को सहजता से व्यक्त कर सकता है। यही कारण है कि पियानो को दुनिया के सबसे बहुआयामी वाद्यों में गिना जाता है और यह एकल प्रस्तुति से लेकर ऑर्केस्ट्रा तथा आधुनिक संगीत तक हर शैली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।पियानो की विविध अभिव्यक्तियों को समझने के लिए कुछ उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ देखी जा सकती हैं। विश्वविख्यात पियानोवादक लैंग लैंग (Lang Lang) की प्रस्तुति इस वाद्य की तकनीकी दक्षता और भावपूर्ण अभिव्यक्ति का सुंदर उदाहरण है। वहीं प्रसिद्ध जैज़ पियानोवादक हरबी हैनकॉक (Herbie Hancock) यह दिखाते हैं कि पियानो किस प्रकार तात्कालिक रचनात्मकता और लय के साथ नए संगीत का सृजन कर सकता है। भारतीय संदर्भ में ए. आर. रहमान ने पियानो और पश्चिमी संगीत संरचनाओं को भारतीय धुनों के साथ जोड़कर ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत की हैं, जिन्हें विश्वभर में सराहा गया है।आज पियानो केवल पश्चिमी शास्त्रीय संगीत का वाद्य नहीं रह गया है, बल्कि यह दुनिया भर के संगीतकारों की रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बन चुका है। भारत में भी अनेक कलाकारों और संगीतकारों ने इसे अपनी शैली के अनुरूप अपनाया है। यदि आप पियानो की मधुरता, तकनीकी क्षमता और भावनात्मक गहराई का अनुभव करना चाहते हैं, तो ये प्रस्तुतियाँ इस वाद्य की वैश्विक लोकप्रियता और इसकी संगीत यात्रा का उत्कृष्ट परिचय देती हैं।संदर्भ:https://tinyurl.com/hhhbs3ar https://tinyurl.com/yu33h3rj https://tinyurl.com/zyn6cb3j https://tinyurl.com/34wc9nm2 https://tinyurl.com/2xb2axfc
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
क्या आप हिंदू गणित को बचाने में लखनऊ विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक योगदान को जानते हैं?
महान भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि शुद्ध गणित अपने आप में तार्किक विचारों की कविता है। गणित केवल संख्याओं और गणनाओं का विषय नहीं है, बल्कि यह वह भाषा है जिससे ब्रह्मांड को समझा जा सकता है। इसका इतिहास उन प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ा है, जिन्होंने व्यापार, खगोल विज्ञान और दैनिक जीवन की समस्याओं को सुलझाने के लिए सबसे पहले संख्याओं का प्रयोग किया था। समय के साथ, इस विषय ने दर्शन, तर्कशास्त्र और विज्ञान की नींव रखी।प्राचीन सभ्यताओं में गणित की शुरुआत कैसे हुई?गणित का इतिहास हज़ारों साल पुराना है। आधुनिक युग से बहुत पहले, लगभग 3000 ईसा पूर्व में, सुमेर, अक्कद, असीरिया और प्राचीन मिस्र जैसी मेसोपोटामियाई (Mesopotamian) सभ्यताओं ने कराधान, वाणिज्य, व्यापार और खगोलीय रिकॉर्ड रखने के लिए अंकगणित, बीजगणित और ज्यामिति का उपयोग करना शुरू कर दिया था। मेसोपोटामिया और मिस्र से प्राप्त सबसे पुराने ज्ञात गणितीय ग्रंथों में बेबीलोनियन 'प्लिम्पटन 322' (Babylonian ‘Plimpton 322’), मिस्र का 'राइंड मैथमेटिकल पेपिरस' (The Rhind Mathematical Papyrus) और 'मास्को मैथमेटिकल पेपिरस' (The Moscow Mathematical Papyrus) शामिल हैं। इन ग्रंथों में पाइथागोरस ट्रिपल्स (Pythagorean Triples) का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि बुनियादी अंकगणित के बाद पाइथागोरस प्रमेय गणित के सबसे पुराने विकासों में से एक था।छठी शताब्दी ईसा पूर्व में, प्राचीन यूनानियों ने गणित को एक दार्शनिक और प्रदर्शनकारी अनुशासन के रूप में खड़ा किया। पाइथागोरस ने ज्यामिति की नींव रखी। लगभग 300 ईसा पूर्व में यूक्लिड ने 'एलिमेंट्स' नामक ग्रंथ का संकलन किया, जो दो हज़ार से अधिक वर्षों तक गणित का मानक पाठ्यपुस्तक बना रहा। यूक्लिड को ज्यामिति का पिता भी कहा जाता है। इसी तरह आर्किमिडीज़ (Archimedes) ने भौतिकी और इंटीग्रल कैलकुलस (Integral Calculus) में महान योगदान दिया।वेदों और प्राचीन भारत में गणित का विकास कैसे हुआ?भारत में गणित की जड़ें 1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व तक फैले वैदिक काल और उससे भी पहले सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2600 ईसा पूर्व) तक जाती हैं। सिंधु घाटी के लोग व्यापार और निर्माण के लिए बुनियादी संख्याओं और आकारों का उपयोग करते थे। भारत के प्राचीन ज्ञान के स्रोत वेदों में गणितीय सिद्धांतों की गहरी समझ मिलती है। ऋग्वेद में खरबों तक की बड़ी संख्याओं की अवधारणा मौजूद है। यजुर्वेद में ज्यामितीय आकारों, वृत्त की परिधि, वर्ग के विकर्ण और यहां तक कि पाई के मान का भी संदर्भ मिलता है। अथर्ववेद में जोड़, घटाव, गुणा और भाग जैसी गणितीय संक्रियाओं के तरीके शामिल हैं, जिनका उपयोग वैदिक अनुष्ठानों में किया जाता था। शुल्ब सूत्र, जो वेदों के परिशिष्ट हैं, अनुष्ठानों के लिए वेदियों के निर्माण हेतु सटीक ज्यामितीय माप प्रदान करते हैं।भारतीय गणितज्ञों ने दुनिया को क्या सिखाया?आधुनिक गणितीय प्रणाली, जिसका हम आज उपयोग करते हैं, उसकी उत्पत्ति प्राचीन भारत में हुई थी। 5वीं शताब्दी में महान भारतीय गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने 'शून्य' की क्रांतिकारी अवधारणा पेश की। अपनी प्रसिद्ध कृति 'आर्यभटीय' में उन्होंने शून्य के लिए एक प्रतीक पेश किया जिसे उन्होंने 'शून्य' कहा जिसका अर्थ था 'खाली'। शून्य के बिना बड़ी संख्याओं को लिखना और समझना असंभव था। आर्यभट्ट ने खगोल विज्ञान और त्रिकोणमिति में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।7वीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त ने गणित में बड़ा बदलाव किया। उन्होंने अपने ग्रंथ 'ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त' में शून्य और ऋणात्मक संख्याओं सहित अंकगणितीय संक्रियाओं के नियम दिए और द्विघात समीकरणों को हल करना सिखाया। मध्ययुगीन काल में, 14वीं से 16वीं शताब्दी के बीच, केरल स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी ने त्रिकोणमिति, बीजगणित और कैलकुलस में उल्लेखनीय प्रगति की। उन्होंने अनंत श्रृंखलाओं के लिए अग्रणी योगदान दिया जिसने आधुनिक कैलकुलस के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।आधुनिक युग में, श्रीनिवास रामानुजन जैसे गणितज्ञों ने दुनिया को हैरान कर दिया। रामानुजन ने संख्या सिद्धांत और अनंत श्रृंखलाओं में ऐसे सूत्र दिए जो आज भी दुनिया भर के गणितज्ञों के लिए शोध का विषय हैं। शकुंतला देवी, जिन्हें 'ह्यूमन कंप्यूटर' के नाम से जाना जाता है, ने अपनी अद्भुत मानसिक गणना क्षमताओं से अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की।वैश्विक स्तर पर आधुनिक गणित ने कैसे आकार लिया?8वीं से 14वीं शताब्दी के इस्लामी स्वर्ण युग के दौरान, अल-ख्वाज़िमी और इब्न अल-हयथम जैसे गणितज्ञों ने उत्कृष्ट योगदान दिया। अल-ख्वाज़िमी को बीजगणित का पिता माना जाता है। यूरोप में पुनर्जागरण काल के दौरान लियोनार्डो पिसानो (Leonardo Pisano), जिन्हें फाइबोनैचि (Fibonacci) के नाम से जाना जाता है, ने यूरोप में हिंदू-अरबी अंक प्रणाली की शुरुआत की, जिसने गणनाओं में क्रांति ला दी। इसी दौर में जोहान्स केप्लर (Johannes Kepler) ने ग्रहीय गति के नियम दिए। कला के लिए मशहूर लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci) ने भी ज्यामिति और अनुपात पर काम किया।17वीं शताब्दी में आइजैक न्यूटन और गॉटफ्रीड विल्हेम लाइबनिज़ (Gottfried Wilhelm Leibniz) ने स्वतंत्र रूप से कैलकुलस का विकास किया। न्यूटन के गति और सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण के नियमों ने शास्त्रीय यांत्रिकी को नया रूप दिया। 18वीं और 19वीं शताब्दी में लियोनहार्ड यूलर (Leonhard Euler) और कार्ल फ्रेडरिक गॉस (Carl Friedrich Gauss) जैसे दूरदर्शी गणितज्ञ सामने आए। गॉस ने संख्या सिद्धांत और सांख्यिकी में बड़ा योगदान दिया। 19वीं और 20वीं सदी में जॉर्ज कैंटर (Georg Cantor) ने सेट थ्योरी पेश की, अल्बर्ट आइंस्टीन ने सापेक्षता का सिद्धांत दिया, मैरी कार्टराइट (Mary Cartwright) ने नॉन-लीनियर डिफरेंशियल समीकरणों पर काम किया और एंड्रयू विल्स (Andrew Wiles) ने फर्मा की अंतिम प्रमेय को सिद्ध किया।'प्रिंसिपिया मैथेमेटिका' ने गणितीय तर्कशास्त्र को कैसे बदला?गणित और तर्कशास्त्र के दर्शन में 'प्रिंसिपिया मैथेमेटिका' (Principia Mathematica) एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्मारकीय ग्रंथ है। इसे ब्रिटिश दार्शनिकों बर्ट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) और अल्फ्रेड नॉर्थ व्हाइटहेड (Alfred North Whitehead) द्वारा लिखा गया था और 1910 से 1913 के बीच तीन खंडों में प्रकाशित किया गया। इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य गणित की तार्किक नींव को उजागर करना था। इसे 'लॉजिज़्म' (Logism) कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि गणित को पूरी तरह से शुद्ध तर्क के आधार पर सिद्ध किया जा सकता है।रसेल ने अपनी पिछली पुस्तक 'द प्रिंसिपल्स ऑफ मैथमेटिक्स' (The Principles of Mathematics) में तर्क दिया था कि संपूर्ण गणित को कुछ सरल स्वयंसिद्धों से प्राप्त किया जा सकता है, जो संख्या जैसी गणितीय धारणाओं के बजाय विशुद्ध रूप से तार्किक धारणाओं तक सीमित हों। बाद में रसेल को पता चला कि जर्मन गणितज्ञ गॉटलोब फ्रेगे (Gottlob Frege) ने अपनी पुस्तक 'द फाउंडेशंस ऑफ अरिथमेटिक' (The Foundations of Arithmetic) में उनसे पहले ही ऐसी कई खोजें कर ली थीं।वर्ष 1901 में रसेल ने तर्क प्रणाली के केंद्र में एक विरोधाभास की खोज की, जिसे अब ‘रसेल्स पैराडॉक्स’ (Russell's Paradox) के रूप में जाना जाता है। यह विरोधाभास तब उत्पन्न होता है जब हम उन सभी वर्गों का एक वर्ग बनाते हैं जो स्वयं के सदस्य नहीं हैं। यदि हम पूछें कि क्या यह वर्ग स्वयं का सदस्य है, तो एक विरोधाभास पैदा होता है। यदि यह है, तो यह नहीं है, और यदि यह नहीं है, तो यह है। यह वैसा ही है जैसे किसी गांव के नाई को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जाए जो उन सभी की दाढ़ी बनाता है जो खुद अपनी दाढ़ी नहीं बनाते। अब सवाल यह है कि क्या नाई खुद अपनी दाढ़ी बनाता है?इस विरोधाभास को दूर करने के लिए, रसेल ने 'थ्योरी ऑफ टाइप्स' (Theory of Types) की अवधारणा पेश की। इसमें रसेल और व्हाइटहेड ने 'एक्सिओम ऑफ रिड्यूसिबिलिटी' (Axiom of Reducibility) और 'एक्सिओम ऑफ इन्फिनिटी' (Axiom of Infinity) जैसे विशेष स्वयंसिद्धों को शामिल किया। यद्यपि यह सिद्धांत बहुत जटिल था, लेकिन इसने गणितीय तर्कशास्त्र और गणित के दर्शन के विकास पर अत्यधिक प्रभाव डाला। दर्शनशास्त्र में इस पुस्तक का सबसे बड़ा प्रभाव रसेल की 'थ्योरी ऑफ डिस्क्रिप्शंस' (Theory of Descriptions) के माध्यम से पड़ा, जिसने सामान्य भाषा की व्याकरणिक संरचनाओं और तार्किक रूपों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। ऑस्ट्रियाई गणितज्ञ कर्ट गोडेल (Kurt Gödel) का अपूर्णता प्रमेय भी इसी ग्रंथ के अध्ययन का परिणाम था।हिंदू गणित के संरक्षण में लखनऊ विश्वविद्यालय की क्या भूमिका है?गणित के क्षेत्र में विशेष रूप से 'हिंदू गणित' के संवर्धन में लखनऊ विश्वविद्यालय के गणित और खगोल विज्ञान विभाग का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। यह विभाग 1921 में तब अस्तित्व में आया जब तत्कालीन कैनिंग कॉलेज (Canning College) को नवगठित लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा अपने अधिकार में लिया गया था। शुरुआती दौर में प्रोफ़ेसर जे.ए. स्ट्रैंग (J. A. Strang) के नेतृत्व में विभाग ने अपने पाठ्यक्रमों को मजबूत किया।लगभग एक दशक बाद, विभाग के अगले प्रमुख प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह ने अपने गहन पाण्डित्य और योजना के साथ 1939 में 'हिंदू गणित' पर शोध के लिए एक विशेष अनुभाग शुरू किया। यह उत्तरी भारत में अपनी तरह का एकमात्र केंद्र था, जिसे बाद में 1950 में 'भारत गणित परिषद' का नाम दिया गया। प्रोफ़ेसर सिंह का मानना था कि प्राचीन हिंदू गणितज्ञों की उपलब्धियों को दुनिया के सामने लाने के लिए अज्ञात पांडुलिपियों पर व्यापक शोध आवश्यक है। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर बी.बी. दत्ता के साथ मिलकर 1935 में 'हिस्ट्री ऑफ हिंदू मैथमेटिक्स' नामक दो खंडों वाली पुस्तक लिखी, जिसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली और आज भी इसे एक प्रामाणिक स्रोत पुस्तक माना जाता है।लखनऊ विश्वविद्यालयवर्ष 1939 में, उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंदू गणित और खगोल विज्ञान से संबंधित पुराने ग्रंथों को एकत्र करने, संपादित करने, अनुवाद करने और उनकी व्याख्या करने के उद्देश्य से प्रोफ़ेसर सिंह के अधीन एक शोध योजना को मंजूरी दी। भारत भर से, राजस्थान, बंगाल, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, नेपाल और यहां तक कि लंदन के इंडिया ऑफिस से दुर्लभ पांडुलिपियां खोजी गईं। प्रोफ़ेसर सिंह ने स्वयं 58 पांडुलिपियों की प्रतियां प्राप्त कीं। 1947 में उन्होंने लघु भास्करीय और पाटीगणित के अंग्रेजी अनुवाद के साथ व्याख्यात्मक संस्करण प्रकाशित किए।विभाग ने बुनियादी ढांचे में भी ऐतिहासिक विकास किया। 1949 में खगोल विज्ञान के शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए भारत के पहले प्लैनेटेरियम (Planetarium) का निर्माण इसी विभाग में पूरा किया गया था। 1950 में प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह ने विज्ञान संकाय के डीन के रूप में विभाग के वर्तमान भवन का निर्माण कराया। 1954 में प्रोफ़ेसर राम वल्लभ ने विभागाध्यक्ष का पदभार संभाला और 1956 में सांख्यिकी अनुभाग के लिए एक नया ब्लॉक बनवाया। आज विभाग की कंप्यूटर लैब का नाम प्रोफ़ेसर राम वल्लभ के नाम पर और विशाल पुस्तकालय का नाम प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह के नाम पर है।प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह के निधन के बाद, उनके सच्चे उत्तराधिकारी प्रोफ़ेसर के.एस. शुक्ला ने उनके अधूरे काम को आगे बढ़ाया और मार्कंडेय मिश्रा जैसे विद्वानों की मदद से सूर्य सिद्धांत, महा भास्करीय और कर्ण-रत्न जैसी पांडुलिपियों को अंग्रेजी अनुवाद और टिप्पणियों के साथ प्रकाशित किया। विभाग ने प्रोफ़ेसर आर.पी. अग्रवाल, प्रोफ़ेसर एम.डी. उपाध्याय और कई अन्य महान शिक्षाविदों के नेतृत्व में निरंतर प्रगति की है। आज भी यह विभाग प्राचीन भारतीय गणितीय विरासत को सहेजने और आधुनिक गणित के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित करने का कार्य पूरी निष्ठा के साथ कर रहा है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/26pyujld 2. https://tinyurl.com/2h98vg34 3. https://tinyurl.com/2ymxa34b 4. https://tinyurl.com/25dfl3qw 5. https://tinyurl.com/y7kgo7aj 6. https://tinyurl.com/24vybg3h
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
कैसे बेगम हज़रत महल ने हिंदू-मुस्लिम एकता से 1857 में अंग्रेजों को दी थी मात?
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास कई शूरवीरों और वीरांगनाओं के अदम्य साहस से भरा पड़ा है। जब भी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का ज़िक्र होता है, तो उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और अवध की शान, बेगम हज़रत महल का नाम बड़े ही गर्व और सम्मान के साथ लिया जाता है। जिस समय ब्रिटिश हुकूमत पूरे भारत को अपने अधीन करने का क्रूर खेल खेल रही थी, उस समय लखनऊ की इस वीरांगना ने न केवल अंग्रेजों की सत्ता को खुली चुनौती दी, बल्कि महीनों तक उन्हें लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर दिया।बेगम हज़रत महल का प्रारंभिक जीवन और अवध के दरबार तक का सफर कैसा था?बेगम हज़रत महल का जन्म वर्ष 1820 के आसपास अवध राज्य की तत्कालीन राजधानी फैज़ाबाद में हुआ था। बचपन में उनका नाम मोहम्मदी खानम था। जीवन के शुरुआती दिन बेहद संघर्षपूर्ण रहे, जब उन्हें उनके माता-पिता द्वारा बेच दिया गया और उन्होंने एक तवायफ के रूप में अपना जीवन शुरू किया। शाही प्रतिनिधियों (agents) द्वारा खरीदे जाने के बाद, उन्होंने शाही हरम में एक 'ख्वासीन' (Khawasin) के रूप में प्रवेश किया और बाद में उन्हें ‘परी’ का दर्जा मिला।अपनी बुद्धिमत्ता, सौंदर्य और कला के दम पर उन्होंने अवध के अंतिम ताजदार, नवाब वाजिद अली शाह (Wajid Ali Shah) का दिल जीत लिया। नवाब ने उन्हें अपनी शाही उपपत्नी के रूप में स्वीकार किया और वह उनकी छोटी बेगम बन गईं। जब उन्होंने नवाब के बेटे बिरजिस क़द्र (Birjis Qadr) को जन्म दिया, तब उन्हें आधिकारिक तौर पर 'हज़रत महल' की उपाधि से नवाज़ा गया।अंग्रेजों द्वारा अवध का अधिग्रहण और बेगम का नेतृत्व कैसे शुरू हुआ?ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) की विस्तारवादी नीतियों के चलते, वर्ष 1856 में अंग्रेजों ने कुशासन का झूठा आरोप लगाकर अवध का अधिग्रहण कर लिया। उन्होंने नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता (Calcutta) निर्वासित कर दिया। अंग्रेजों को लगा था कि नवाब के जाने के बाद अवध आसानी से उनके कब्ज़े में आ जाएगा, लेकिन वे बेगम हज़रत महल के साहस से अनजान थे।बेगम ने कलकत्ता जाने से इनकार कर दिया और अपने बेटे के साथ लखनऊ में ही डटी रहीं। जैसे ही 1857 में मेरठ से बगावत की चिंगारी उठी और स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ, बेगम हज़रत महल ने राजा जयलाल सिंह और राजा हनुमंत सिंह जैसे स्थानीय नेताओं और विद्रोहियों के साथ मिलकर लखनऊ पर नियंत्रण कर लिया। 5 जुलाई 1857 को उन्होंने अपने नाबालिग बेटे, राजकुमार बिरजिस क़द्र को अवध का शासक (वली) घोषित कर दिया और खुद राजमाता (Regent) के रूप में सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली।अंग्रेजों की धार्मिक नीतियों के खिलाफ बेगम का घोषणापत्र क्या था?बेगम हज़रत महल केवल एक सैन्य नेता नहीं थीं, बल्कि वे एक गहरी राजनीतिक समझ रखने वाली शासिका भी थीं। उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सड़कें बनाने के बहाने अंधाधुंध हिंदू मंदिरों और मुस्लिम मस्जिदों को तोड़ा था। विद्रोह के अंतिम दिनों में जारी किए गए एक ऐतिहासिक घोषणापत्र में, बेगम ने अंग्रेजों द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता देने के दावों का कड़ा मज़ाक उड़ाया था।उन्होंने लिखा था: "सूअर का मांस खाना और शराब पीना, चर्बी वाले कारतूसों को काटना और मिठाइयों में सूअर की चर्बी मिलाना, सड़कें बनाने के बहाने हिंदू और मुसलमानों के मंदिरों और मस्जिदों को नष्ट करना, चर्च बनाना, ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए पादरियों को सड़कों पर भेजना... इन सबके बावजूद लोग कैसे विश्वास कर सकते हैं कि उनके धर्म में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा?" इस वैचारिक स्पष्टता ने हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के सैनिकों और आम जनता को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट कर दिया।लखनऊ रेजीडेंसी की घेराबंदी (Siege of Lucknow Residency) के खूनी संघर्ष में क्या हुआ?1857 के मध्य में, लखनऊ में स्थित ब्रिटिश मुख्यालय, जिसे रेजीडेंसी कहा जाता था, संघर्ष का मुख्य केंद्र बन गया। 30 जून 1857 को बेगम की विद्रोही सेना, जिसकी संख्या 10,000 से अधिक थी, ने सर हेनरी लॉरेंस (Sir Henry Lawrence) के नेतृत्व वाली एक छोटी ब्रिटिश सेना को रेजीडेंसी के भीतर घेर लिया। 4 जुलाई को लॉरेंस एक गोलाबारी में मारा गया।रेजीडेंसी के भीतर लगभग 3,000 लोग (अंग्रेज अधिकारी, महिलाएं, बच्चे और कुछ वफादार भारतीय सैनिक) फंसे हुए थे। मृत्यु, बीमारी और भूख ने ब्रिटिश खेमे का मनोबल तोड़ दिया था। बेगम हज़रत महल के निर्देश पर विद्रोही सेना लगातार हमले कर रही थी। सितंबर में सर हेनरी हैवलॉक (Sir Henry Havelock) के नेतृत्व में एक ब्रिटिश राहत दल वहां पहुंचा, लेकिन वह भी भारी विद्रोही हमलों के कारण रेजीडेंसी के भीतर ही फंस गया।महीनों की कड़ी घेराबंदी के बाद, अंततः नवंबर 1857 में सर कॉलिन कैंपबेल (Sir Colin Campbell) के नेतृत्व में एक विशाल ब्रिटिश सेना ने रेजीडेंसी पर हमला किया और घेराबंदी को तोड़ने में सफलता प्राप्त की। भारी रक्तपात और हजारों भारतीय योद्धाओं के बलिदान के बाद अंग्रेजों ने फिर से लखनऊ पर अपना कब्ज़ा जमा लिया।बेगम का निर्वासन और आज के भारत में उनकी विरासत क्या है?जब अंग्रेजों ने लखनऊ और अवध के अधिकांश हिस्सों पर फिर से कब्ज़ा कर लिया, तो बेगम हज़रत महल को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। नाना साहब और फैज़ाबाद के मौलवी के साथ मिलकर उन्होंने शाहजहांपुर में भी हमले किए, लेकिन अंततः ब्रिटिश सैन्य ताकत के सामने उन्हें भारत छोड़ना पड़ा।उन्होंने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण करने से साफ इनकार कर दिया और नेपाल में शरण मांगी। शुरुआत में नेपाल के प्रधानमंत्री जंग बहादुर ने उन्हें शरण देने से मना कर दिया, लेकिन बाद में उन्हें वहां रहने की अनुमति मिल गई। 7 अप्रैल 1879 को काठमांडू में उनका निधन हो गया और उन्हें वहीं जामा मस्जिद के पास सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।आज भी भारत बेगम हज़रत महल के इस बलिदान को नहीं भूला है। 15 अगस्त 1962 को लखनऊ के हज़रतगंज में ओल्ड विक्टोरिया पार्क (Old Victoria Park) का नाम बदलकर उनके सम्मान में 'बेगम हज़रत महल पार्क' रखा गया। 10 मई 1984 को भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। आज बेगम हज़रत महल का नाम केवल अवध के इतिहास में नहीं, बल्कि भारत की आज़ादी की उस अमर गाथा में दर्ज है, जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा देशभक्ति की प्रेरणा देती रहेगी।संदर्भ1. https://tinyurl.com/hzq7tb9 2. https://tinyurl.com/2b6yl35s 3. https://tinyurl.com/2altp25f
हथियार और खिलौने
तकनीक और सुरक्षा को देखते हुए, क्या रहा है हस्त-बंदूकों के क्रमिक विकास का इतिहास?
लखनऊ, क्या आप जानते हैं कि पिस्तौल (Pistol) का आविष्कार 1800 के दशक की शुरुआत में हुआ था? इसी दशक के अंत में, आधुनिक पिस्तौल ने भी आकार लेना शुरू किया था। साथ ही, 1836 में पहली व्यावहारिक रिवॉल्वर (Revolver) उत्पादन में आई। इसमें एक एकल और स्थिर बैरल, अर्थात बंदूक नली के साथ संरेखित पांच चेंबर वाले, एक घूमने वाले सिलेंडर का उपयोग किया गया था। हालांकि, इस प्रकार के हथियार की पहले भी कुछ पुनरावृत्तियां थीं, रिवॉल्वर, सिंगल-एक्शन या डबल-एक्शन वाली पहली हस्त-बंदूक थी। बाद में, 1857 में धातु कारतूस युग की शुरुआत होने पर, रिम फायर (Rim fire) कारतूस का उपयोग करने वाली पहली सफल रिवॉल्वर पेश की गई। हालांकि, रिवॉल्वर का वास्तविक युग तब शुरू हुआ, जब पिस्तौल निर्माता रिवॉल्वर का उत्पादन कर सकते थे। इसमें वे धुआं रहित बंदूक पाउडर के साथ कारतूस का उपयोग करते थे, और बाद में, बैलिस्टिक में सुधार करते थे।1883 में जब रिकॉइल (Recoil) संचालित मशीन गन का आविष्कार हुआ, तो बंदूक निर्माता छोटे अस्त्र विकसित करने की होड़ में थे। पिछली सदी में, बंदूक प्रौद्योगिकी में होने वाले बदलाव धीमे हो गए हैं। अब, पिस्तौल में मजबूत अनुसंधान और विकास के माध्यम से नवाचार देखे जा सकते हैं, जो इसकी डिजाइन में परिवर्तन लाते हैं। धुआं रहित पाउडर, स्ट्राइकर-फायर्ड एक्शन (Striker-fired action) और पॉलिमर ग्रिप्स (Polymer grips) जैसे उन्नत विनिर्माण विकास ने पिस्तौल के विकास को सटीकता, वजन, मारक क्षमता, पहुंच और सुरक्षा के मामले में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।एक आधुनिक रिवॉल्वर में, कारतूसों को छह चेंबर्स में लोड किया जाता है, जिनमें से प्रत्येक को बंदूक की बैरल के सामने रखा जा सकता है। एबैरल के साथ संरेखित किया गया एक स्प्रिंग वाला बंदूक प्रहारक, सिलेंडर की दूसरी तरफ स्थित होता है। बैरल के अंदर, कुछ पेंचदार खांचे बने होते हैं, जो गोली को स्थिरता देते हैं। लंबी बैरल, गोली की स्थिरता में सुधार करती है, क्योंकि यह उसे अधिक समय तक घुमाती है। बैरल की लंबाई से गोली की गति भी बढ़ जाती है, क्योंकि लंबे समय तक गैस का दबाव गोली की गति को तेज करता है। आधुनिक रिवॉल्वर में, ट्रिगर खींचने से बंदूक प्रहारक पीछे की ओर जाकर, छूट जाता है।दरअसल, प्रत्येक शॉट में, कुछ क्रमिक घटनाएं होती हैं। सबसे पहले, ट्रिगर, बंदूक प्रहारक को पीछे की ओर धकेलता है। जब यह पीछे की ओर बढ़ता है, तो बंदूक हैंडल में स्थित एक धातु स्प्रिंग को संपीड़ित करता है। उसी समय, ट्रिगर से जुड़ा एक भाग सिलेंडर को घुमाने के लिए लीवर (Lever) पर दबाव डालता है। यह सिलेंडर के चेंबर को बंदूक बैरल के सामने संरेखित करता है। फिर, जब ट्रिगर को पूरी तरह से पीछे धकेला जाता है, तो यह बंदूक प्रहारक को छोड़ देता है। इसके परिणामस्वरूप, संपीड़ित स्प्रिंग बंदूक प्रहारक को आगे की ओर चलाती है। इस पर लगी फायरिंग पिन (Pin), बंदूक से होकर गुजरती है, और प्राइमर से टकराती है। इससे प्राइमर फट जाता है, जिससे प्रोपेलेंट प्रज्वलित होता है। इससे बड़ी मात्रा में गैस निकलती है। गैस का दबाव गोली को बैरल के नीचे धकेलता है। गैस के दबाव के कारण, कारतूस केस भी फैल जाता है। बाद में, बंदूक को फिर से लोड करने के लिए, अलग-अलग कारतूसों को चेंबर्स में रखा जा सकता है, या स्पीड लोडर (Speed loader) में एक साथ छह कारतूस लोड किए जा सकते हैं।द्वितीय विश्व युद्ध में रडार, जेट इंजन और बैलिस्टिक मिसाइलों अस्त्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पांच प्रमुख लड़ाकू देशों में से चार देशों – अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और सोवियत संघ ने अपने सैनिकों को महत्वपूर्ण संख्या में पुरानी रिवॉल्वर जारी की थी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उन रिवॉल्वरों से लैस कई सैनिक, उनकी मदद से ही जीवित बच पाए।द्वितीय विश्व युद्ध में, हस्त–बंदूक के उद्देश्य रक्षात्मक थे। पिस्तौलें, युद्ध के लिए एक महत्वपूर्ण हथियार नहीं थीं, लेकिन वे अंतिम उपाय के रूप में सैनिकों की रक्षा करती थीं। हालांकि, प्रथम विश्व युद्ध के लिए मशीनगनें (Machine guns) अत्यंत महत्वपूर्ण थीं। इस युद्ध के पहले भी, ऐसे हथियारों का उपयोग करने का प्रयास किया गया था। लेकिन, विरोधी सैनिकों को इतनी बड़ी क्षमता में कभी भी ऐसे हथियारों का उपयोग नहीं करना पड़ा। और तो और, मशीनगनें वहनीय थीं, जिससे सैनिक उन्हें अपनी इच्छानुसार प्रयुक्त कर सकते थे। इसके अलावा, मशीन गनों वाले सैनिकों को युद्ध के मैदान के किनारों पर तैनात किया जाता है, जो इससे लगातार होने वाली गोलाबारी से आने वाले दुश्मन को हानि पहुंचाते थें।इसके अलावा, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्लेमथ्रोवर (Flamethrower) हथियार का भी उपयोग किया गया था। वे युद्ध के दौरान उपयोग किए जाने वाले सबसे खतरनाक हथियारों में से कुछ थे, क्योंकि इससे फ़ौरन आग निकलती थी। वे न केवल विरोधी सैनिकों के झुंड को मार सकते थे, बल्कि हथियार चलाने वाले सैनिक के लिए भी बड़ा खतरा पैदा करते थे। दूसरी तरफ, हथगोले इस समय के सबसे तकनीकी रूप से उन्नत हथियारों में से कुछ थे।जैसा कि हमने ऊपर पढ़ा हैं, 1883 में रिकॉइल-संचालित मशीन गन के आविष्कार के बाद, बंदूक निर्माता हस्त–बंदूक के सिद्धांतों का उपयोग करके कुछ छोटे अस्त्र विकसित करने की होड़ में थे। अर्ध-स्वचालित ब्लोबैक पिस्तौल (Blowback pistol) के पहले दो पेटेंट (Patents) ऑस्ट्रिया (Austria) देश से आए थे। परंतु, 1896 तक पहली बड़े पैमाने पर उत्पादित और व्यावसायिक रूप से सफल अर्ध-स्वचालित पिस्तौल पेश नहीं की गई थी। पॉल माउज़र (Paul Mauser) द्वारा डिज़ाइन की गई - माउज़र सी96, युद्ध में बड़े पैमाने पर उपयोग की जाने वाली पहली स्व-लोडिंग पिस्तौल में से एक थी। सी96 के बाद, श्वार्ज़लोज़ मॉडल 1898 (Schwarzlose Model 1898) प्रचलित हुआ, जो एक अर्ध-स्वचालित पिस्तौल थी। इसे तत्कालीन समय में सबसे उन्नत कहा जाता था, लेकिन इसे कभी भी व्यापक रूप से नहीं अपनाया गया। 1898 में, आधुनिक पिस्तौल जैसी दिखने वाली एक पिस्तौल का उत्पादन शुरू हुआ। यह एक लॉक-ब्रीच एक्शन (Locked-breech action) हथियार था, जिसका उपयोग आमतौर पर अधिकांश आधुनिक बड़ी अर्ध-स्वचालित पिस्तौल में किया जाता है।पिस्तौल के इतिहास में एक उल्लेखनीय विकास, स्ट्राइकर-फायर वाली पिस्तौल है। स्ट्राइकर-फायर वाली पिस्तौल में कोई बाहरी बंदूक प्रहारक या फायरिंग पिन नहीं होती है। फिर भी, यह दशकों से लोकप्रियता हासिल कर रही हैं। बिना बंदूक प्रहारक वाली बंदूकों की तकनीक की शुरूआत से, पिस्तौल की सुरक्षा, फायरिंग दर और सटीकता में काफी सुधार हुआ है। संदर्भ1. https://tinyurl.com/4exwrt85 2. https://tinyurl.com/nhhshwe2 3. https://tinyurl.com/2u27c6ad 4. https://tinyurl.com/55nja3h3 5. https://tinyurl.com/4exwrt85 6. https://tinyurl.com/ymsfy5e4
स्पर्श - बनावट/वस्त्र
पढ़ते हैं, अरुणाचल प्रदेश के मोनपा समुदाय की अनूठी कागज़ निर्माण कला, मोन शुगु के बारे में
लखनऊ, क्या आप जानते हैं कि कागज का इतिहास मिस्र की प्राचीन सभ्यताओं में, लगभग 3000 ईसा पूर्व से पपैरस (Papyrus) से शुरू होता है। पहले यह पपैरस पौधे के रेशों से बना एक पत्र था। यह प्रारंभिक कागज पुनर्नवीनीकरण योग्य था, और इस पर कई बार लिखा जा सकता था। प्राचीन चीन में कागज बनाने का एक अन्य रूप, जिसमें पुनर्चक्रण भी शामिल था, 105 ईस्वी में विकसित किया गया था। इस प्रक्रिया में शहतूत के पेड़, कपड़े के पुराने टुकड़े और मछली पकड़ने के जाल का उपयोग करके, चीन ने संसाधनों के टिकाऊ उपयोग के लिए एक प्रारंभिक दृष्टिकोण का प्रदर्शन किया था। इसी तरह, जापान में भी कागज बनाने के लिए शहतूत के पेड़ों की छाल का उपयोग किया जाता था, जो पुनः एक टिकाऊ दृष्टिकोण था। फिर, कागज़ की प्रौद्योगिकी लगभग 750 ईसा पूर्व में, संभवतः वर्तमान उज्बेकिस्तान के समरकंद तक पहुंची। इसने विशेष रूप से अरब दुनिया में, ज्ञान और संस्कृति के प्रसार में निर्णायक भूमिका निभाई।कागज का उत्पादन, 1109 में यूरोप पहुंचा। तब हेंप (Hemp), फ्लैक्स (Flax) और नेटल्स (Nettles) जैसे कच्चे माल यूरोपीय कागज उत्पादन के महत्वपूर्ण घटक बन गए। दूसरी ओर, स्विट्जरलैंड ने कागज उत्पादन के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहां से बेसल कागज (Basel paper) पूरे यूरोप में तेजी से फैल गया।1450 में जोहान्स गुटेनबर्ग (Johannes Gutenberg) द्वारा प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार ने, जनसंचार माध्यमों के युग की शुरुआत को चिह्नित किया, जिसने ज्ञान और संस्कृति के व्यापक प्रसार को सक्षम किया। अठारहवीं शताब्दी में कच्चे माल के संकट के कारण, लकड़ी से बने कागज का विकास हुआ, जिसने कागज उद्योग में क्रांति ला दी। इससे संसाधनों के अधिक टिकाऊ उपयोग को बढ़ावा मिला। इसी कड़ी में, 1989 में पहला क्लोरीन-मुक्त कॉपी पेपर तैयार किया गया, जो कागज उत्पादन को अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाने के प्रयासों में एक मील का पत्थर था।दरअसल, कागज बनाने की प्रक्रिया सदियों से वही रही है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में, बड़े पैमाने पर कागज उत्पादन के लिए लकड़ी के रेशे ही मुख्य कच्चा माल बन गए हैं। लकड़ी का उपयोग करने का मुख्य लाभ यह है कि, यह एक प्राकृतिक नवीकरणीय संसाधन है। लकड़ी के उपयोग के अन्य लाभों में इसकी आंतरिक ताकत, प्रति इकाई लंबाई, वजन और कम लागत पर उपलब्धता शामिल है। नया कागज बनाने के लिए, पुनर्चक्रित या बेकार कागज का भी उपयोग किया जा सकता है।किसी लुगदी मिल में, लकड़ी से यांत्रिक रेशे पाने के लिए लट्ठों को पीसा जाता है, या रासायनिक लुगदी के लिए लकड़ी के टुकड़ों को संसाधित किया जाता है। इससे बनी यांत्रिक लुगदी का उपयोग अखबारी कागज, विशेष कागजात, टिशू, पेपरबोर्ड और वॉलबोर्ड के लिए किया जाता है। जबकि रासायनिक लुगदी से बने, और मुद्रण के लिए चिकनी सतह पाने हेतु बनाए गए कागज को ‘महीन कागज’ कहा जाता है। इसका उपयोग कैलेंडर, कॉफी टेबल बुक, पत्रिकाओं और व्यावसायिक रिपोर्टों के उत्पादन में किया जाता है।इसके विपरीत, पुनर्चक्रित पल्पिंग प्रक्रिया में समाचार पत्रों, कार्डबोर्ड बक्से और पत्रिकाओं से स्याही हटाई जाती है, और उसे संशोधित किया जाता है। इस तरह से बनाए गए कागज के अंतिम उपयोग में, डिब्बों और बक्सों में रूपांतरण के लिए लाइनरबोर्ड (Linerboard) और फ़्लूटिंग (Fluting) शामिल हैं।कागज बनाने की संस्कृति में हमारा भारत देश भी पीछे नहीं है। अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक महत्व के साथ, अरुणाचल प्रदेश कई देशज समुदायों का घर है, जिनमें से प्रत्येक समुदाय की अपनी अनूठी परंपराएं और प्रथाएं हैं। ऐसा ही एक समुदाय ‘मोनपा’ है, जो मुख्य रूप से इस राज्य के तवांग और पश्चिम कामेंग जिलों में रहता है। अपनी जीवंत संस्कृति और जटिल शिल्प कौशल के लिए प्रख्यात मोनपा लोग, विशेष रूप से कागज बनाने की प्राचीन कला के लिए प्रसिद्ध हैं। यह 1,000 साल से अधिक पुरानी परंपरा है, जो विलुप्त होने के कगार पर थी। लेकिन, हाल ही में इसे पुनर्जीवित किया गया है। मोनपा हस्तनिर्मित कागज को पारंपरिक रूप से ‘मोन शुगु’ कहा जाता है। यह इस क्षेत्र के इतिहास, संस्कृति और लोगों की स्थायी भावना का एक प्रमाण है। यह कागज, मूल रूप से मोनपा जनजाति द्वारा ‘शुगु शेंग’ नामक एक स्थानीय पेड़ की छाल से तैयार किया जाता है, जो तवांग क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इस कागज का उपयोग न केवल रोजमर्रा के उद्देश्यों के लिए, बल्कि पवित्र बौद्ध धर्मग्रंथों और भजनों को लिखने के लिए भी किया जाता है। यह तवांग और अन्य बौद्ध समुदायों के लोगों के लिए, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है, जो उनके अनुष्ठानों का एक अभिन्न अंग है।इस हस्तनिर्मित कागज को बनाने की प्रक्रिया जैविक है, और इसमें कोई रासायनिक योजक नहीं है। सबसे पहले, शुगु शेंग पेड़ की छाल को काटा जाता है, और उसे सुखाया जाता है। फिर, इसे राख के घोल में उबाला जाता है, और फिर इसका गूदा बनाया जाता है। फिर इस गूदे को सांचे में फैलाया जाता है, और कागज बनाने के लिए सुखाया जाता है। परिणामी कागज, टिकाऊ एवं मजबूत होता है।एक समय में, मोनपा हस्तनिर्मित कागज निर्माण कला तवांग के हर स्थानीय परिवार के लिए आजीविका का एक स्रोत थी। हालांकि समय के साथ, जैसे ही चीन और अन्य देशों से बड़े पैमाने पर उत्पादित कागजों की बाजार में आपूर्ति हुई, मोनपा कागज उद्योग में गिरावट शुरू हो गई। बीसवीं सदी के अंत तक, यह प्राचीन शिल्प विलुप्त होने की कगार पर था, और केवल कुछ ही कारीगर इस शिल्प का अभ्यास कर रहे थे। परंतु 1994 में, इस उद्योग को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया। लेकिन, तवांग के चुनौतीपूर्ण भौगोलिक इलाके - ऊंचे पहाड़ों, कठिन सड़कों, और कठोर मौसम की स्थिति के कारण, ये पुनरुद्धार के प्रयास विफल रहे। इन असफलताओं के बावजूद, इस प्राचीन कला को पुनर्जीवित करने की प्रतिबद्धता कम नहीं हुई है।मोन-शुगु के उत्पादन में कई सावधानीपूर्वक निष्पादित चरण शामिल हैं:1. मार्च और दिसंबर के बीच, शुगु शेंग पेड़ के परिपक्व तने और लंबी शाखाओं की कटाई की जाती है। स्थानीय भाषा में ‘खोपा’ के नाम से प्रख्यात इनकी छाल को, सावधानी से छीला जाता है। फूलों और प्रजनन चरणों के दौरान, प्राकृतिक पुनर्जनन सुनिश्चित करने के लिए इन झाड़ियों को नहीं काटा जाता है।2. छाल की बाहरी हरी परत को पारंपरिक चाकू (क्योचुंग) का उपयोग करके हटा दिया जाता है। क्योंकि, छाल की अधिक मात्रा के परिणामस्वरूप कागज़ गहरे रंग का और कमज़ोर हो जाता है।3. गंदगी और अशुद्धियों को दूर करने के लिए, खुरची हुई छाल को बहते पानी में अच्छी तरह से धोया जाता है।4. फिर, साफ की गई छाल को पूरी तरह सूखने तक, तीन से चार दिनों तक धूप में सुखाया जाता है।5. सूखी छाल को नरम करने के लिए पानी में भिगोया जाता है, और फिर छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है।6. इस प्रकार भीगी हुई छाल को, बाद में राख के साथ मिश्रित पानी में छह से आठ घंटे तक उबाला जाता है, जो फाइबर को अलग करने में मदद करता है। इससे कागज की गुणवत्ता में सुधार भी होता है।7. फिर, उबली हुई छाल को एक सपाट पत्थर पर, लकड़ी के हथौड़े से तब तक पीटा जाता है, जब तक कि उसका बारीक गूदा न बन जाए।8. अंत में, लुगदी से शीट बनाने के लिए, इसे लकड़ी के तख्ते पर समान रूप से फैलाया जाता है, और धूप में सुखाया जाता है। फिर इसका गट्ठा बांधकर, इसे उपयोग या बिक्री के लिए संग्रहीत किया जाता है।मोनशुगु कागज, मोनपा लोगों के लिए पहचान का एक माध्यम है, जो मठवासी अनुष्ठानों, पारंपरिक कला और पर्यावरण प्रबंधन से जुड़ा हुआ है। मार्च से दिसंबर तक छाल-कटाई का चक्र, पौधे के प्रजनन चरण का सम्मान करता है, तथा प्राकृतिक पुनर्जनन और पारिस्थितिक संतुलन सुनिश्चित करता है। आर्थिक रूप से, इस इकाई ने एक विश्वसनीय आजीविका साधन बनाया है। कारीगर और महिलाएं, एक साथ काम करते हैं, युवाओं को प्रशिक्षित करते हैं, और अपने सामाजिक संबंधों को मजबूत करते हैं। संदर्भ1. https://tinyurl.com/yntrmcb2 2. https://tinyurl.com/ynmpwpzm 3. https://tinyurl.com/yck5bk72 4. https://tinyurl.com/azpcteh3 5. https://tinyurl.com/kyesbnnv
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
राग गौड़ मल्हार: जहाँ शास्त्रीय संगीत और मानसून का उल्लास एक साथ सुनाई देते हैं
अगर मल्हार राग-परिवार के सबसे मधुर और सुरुचिपूर्ण रागों की बात की जाए, तो राग गौड़ मल्हार का विशेष स्थान है। यह राग प्राचीन “गौड़” राग और “मल्हार” के स्वरांगों का सुंदर समन्वय है। संगीत परंपरा में इसे वर्षा ऋतु से जुड़े प्रमुख रागों में गिना जाता है, जहाँ इसकी मधुरता और विशिष्ट स्वर-विन्यास श्रोताओं के मन में मानसून की ताजगी और आनंद का भाव जगाते हैं।गौड़ मल्हार अपनी कोमल, संतुलित और भावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए जाना जाता है। इसमें गौड़ अंग, शुद्ध मल्हार अंग तथा बिलावल अंग का प्रभाव दिखाई देता है, जिसके कारण इसकी प्रस्तुति में गंभीरता और माधुर्य का सुंदर मेल सुनाई देता है। कलाकार आलाप, बोल-आलाप और तानों के माध्यम से इस राग के विविध रंगों को उभारते हैं, जिससे प्रत्येक प्रस्तुति अपनी अलग पहचान बना लेती है।इस राग की विविध प्रस्तुतियाँ इसकी बहुआयामी प्रकृति को दर्शाती हैं। उस्ताद अमजद अली खान के सरोद वादन में गौड़ मल्हार की मधुरता और गहराई सजीव हो उठती है। वहीं पंडित केदार बोडस और पंडित उल्हास कशालकर अपनी विशिष्ट गायकी के माध्यम से इसके स्वर-विन्यास और भावों को अलग-अलग शैली में प्रस्तुत करते हैं। इन तीनों प्रस्तुतियों से यह अनुभव किया जा सकता है कि एक ही राग कलाकार की कल्पनाशीलता के साथ कितने विविध रूप धारण कर सकता है।यदि आप मल्हार राग-परिवार के किसी ऐसे राग से परिचित होना चाहते हैं, जिसमें वर्षा ऋतु का उल्लास, शास्त्रीय संगीत की गरिमा और मधुरता का सुंदर संतुलन हो, तो राग गौड़ मल्हार की ये प्रस्तुतियाँ एक उत्कृष्ट परिचय हैं। इनमें भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा और कलाकारों की रचनात्मक अभिव्यक्ति का मनोहारी संगम सुनाई देता है।संदर्भ -https://tinyurl.com/yck6rpkrhttps://tinyurl.com/3dbcpmtmhttps://tinyurl.com/bdeamh5uhttps://tinyurl.com/2s3rpbbd
तितलियाँ और कीट
क्या आपने देखा है लखनऊ की सबसे भव्य प्राकृतिक देन, 'ब्लू नवाब तितली' को?
तितलियों को अक्सर फूलों पर मंडराते और अमृत (nectar) पीते देखा जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में एक ऐसी तितली भी पाई जाती है जिसका नाम 'नवाबों' पर रखा गया है और जिसका खान-पान अन्य तितलियों से बिल्कुल अलग है? 'ब्लू नवाब' (Polyura schreiber) नाम की यह तितली न केवल अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) के स्वास्थ्य की एक बड़ी संकेतक भी है। कीट विज्ञानियों के अनुसार, जहाँ ब्लू नवाब मौजूद होती है, वहाँ का वातावरण अत्यंत शुद्ध और संतुलित माना जाता है।ब्लू नवाब क्या है और इसकी वैज्ञानिक पहचान क्या है?ब्लू नवाब, जिसे वैज्ञानिक भाषा में पॉलीउरा श्रेइबर (Polyura schreiber) कहा जाता है, निम्फालिडे (Nymphalidae) परिवार की सदस्य है। यह मुख्य रूप से 'ब्रश-फुटेड' तितलियों की श्रेणी में आती है। इसकी पहचान इसके मजबूत शरीर और तेज उड़ान से होती है। इस तितली के पंखों का फैलाव 92 से 116 मिलीमीटर तक हो सकता है। इसके पिछले पंखों पर दो छोटी पूंछ जैसी संरचनाएं (tails) होती हैं, जो इसे अन्य प्रजातियों से अलग और आकर्षक बनाती हैं।इसे 'ब्लू नवाब' ही क्यों कहा जाता है?इस तितली का नाम इसकी उपस्थिति और भारत के सांस्कृतिक इतिहास का एक अनूठा संगम है। 'ब्लू' शब्द इसके पंखों पर दिखने वाली सुंदर नीली चमक को दर्शाता है, जबकि 'नवाब' शब्द भारतीय इतिहास के उन शासकों और रईसों के लिए उपयोग किया जाता था जो अपनी भव्यता और गरिमा के लिए जाने जाते थे। चूँकि इस तितली की उड़ान अत्यंत शालीन, तेज और इसके रंगों में एक शाही चमक होती है, इसलिए इसे 'ब्लू नवाब' का नाम दिया गया। यह नाम इसकी राजसी सुंदरता और प्रकृति में इसके 'रॉयल' दर्जे का प्रतीक है।भारत के किन इलाकों में यह पाया जाता है?ब्लू नवाब मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय एशिया (Tropical Asia) में पाई जाती है। भारत की बात करें तो यह दक्षिण भारत, असम और हिमालय की तलहटी वाले क्षेत्रों में देखी जाती है। इसके अलावा, यह म्यांमार, दक्षिण-पूर्वी एशिया और चीन के कुछ हिस्सों तक फैली हुई है। भारत में इसकी अलग-अलग उप-प्रजातियां भी मिलती हैं, जैसे दक्षिण भारत में Polyura schreiber wardii और असम से लेकर दक्षिण-पूर्वी एशिया तक Polyura schreiber assamensis पाई जाती है।यह किस तरह के वातावरण में रहना पसंद करता है?अध्ययनों से पता चलता है कि ब्लू नवाब को घने वन क्षेत्र (Forested habitats) अधिक पसंद हैं। यह विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय जंगलों, पेड़ों से घिरे इलाकों और जल स्रोतों के पास वाले क्षेत्रों में रहती है। इसे शहरी पार्कों, बगीचों और मैंग्रोव दलदलों में भी देखा जा सकता है। यह तितली अक्सर पेड़ों की ऊँचाइयों पर बैठना पसंद करती है और सुबह के समय जंगल के निचले हिस्सों में तेजी से उड़ते हुए देखी जा सकती है।ब्लू नवाब का आहार अन्य तितलियों से अलग क्यों है?जहाँ अधिकांश तितलियाँ केवल फूलों के रस पर निर्भर रहती हैं, वहीं ब्लू नवाब के वयस्क सदस्यों की पसंद काफी अलग है। ये तितलियाँ पेड़ों के रस (tree sap), सड़े हुए कार्बनिक पदार्थों और कभी-कभी पशुओं के अवशेषों (carrion) या उनके मल तक से पोषक तत्व प्राप्त करती हैं। पेड़ों का रस इन्हें वे खनिज और पोषक तत्व प्रदान करता है जो फूलों के अमृत में नहीं मिलते। नर तितलियों को अक्सर गीली जमीन पर खनिज सोखते हुए भी देखा जा सकता है।इस तितली का जीवन चक्र और प्रजनन कैसे होता है?ब्लू नवाब का जीवन चक्र किसी चमत्कार से कम नहीं है। इसकी शुरुआत मादा द्वारा मेजबान पौधों (host plants) की पत्तियों के ऊपरी हिस्से पर दिए गए पीले, गोलाकार अंडों से होती है। एक अंडे का व्यास लगभग 1.9 मिमी होता है।लार्वा (Caterpillar): अंडे से निकलने वाला लार्वा शुरू में सुनहरा भूरा होता है, लेकिन जल्द ही हरा हो जाता है। इसके सिर पर चार सींग जैसी संरचनाएं होती हैं, जो इसे किसी छोटे 'ड्रैगन' जैसा लुक देती हैं। यह मुख्य रूप से 'रेड सागा' (Adenanthera pavonina), 'रंबूटन' और 'वागटिया' जैसे पौधों की पत्तियां खाता है।प्यूपा (Pupa): पूरी तरह विकसित होने के बाद, इल्ली प्यूपा में बदल जाती है। यह प्यूपा हरे रंग का होता है और देखने में किसी बेरी जैसा लगता है।वयस्क: लगभग 10 से 11 दिनों के बाद प्यूपा से एक सुंदर तितली बाहर आती है।पारिस्थितिकी तंत्र में इसकी क्या भूमिका है?बटरफ्लाई कंजर्वेशन जैसी संस्थाओं का मानना है कि तितलियाँ जैव विविधता की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। ब्लू नवाब जैसे जीव 'स्वास्थ्य संकेतक' के रूप में कार्य करते हैं। इनका मौजूद होना इस बात का प्रमाण है कि उस क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ है और वहाँ प्रदूषण का स्तर कम है। इसके अलावा, ये परागण (pollination) में मदद करती हैं और खाद्य श्रृंखला (food chain) का एक अहम हिस्सा हैं, जहाँ पक्षी और चमगादड़ इनका शिकार करते हैं।दुर्भाग्य से, ब्लू नवाब को सबसे बड़ा खतरा आवास विनाश (Habitat destruction) से है। जंगलों की कटाई और शहरीकरण के कारण इनके रहने और प्रजनन के स्थान कम हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हमें इन 'शाही तितलियों' को बचाना है, तो हमें उनके प्राकृतिक आवासों और उन विशिष्ट मेजबान पौधों का संरक्षण करना होगा जिन पर इनका जीवन निर्भर है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2db6n7l2 2. https://tinyurl.com/29q3qkal 3. https://tinyurl.com/2dw65blm 4. https://tinyurl.com/2bxa2st3 5. https://tinyurl.com/24cts9mb
वास्तुकला II - कार्यालय/कार्य उपकरण
अचानक रुकती धड़कनों को फिर से कैसे शुरू कर देते हैं,पेसमेकर और आईसीडी जैसे छोटे से यंत्र?
फरवरी 1980 की एक सुबह जॉन्स हॉपकिन्स अस्पताल में चिकित्सा जगत ने एक अभूतपूर्व घटना देखी। डॉ. लेवी वॉटकिंस जूनियर ने एक 47 वर्षीय महिला के शरीर में दुनिया का पहला 'इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर डिफिब्रिलेटर' (Implantable Cardioverter Defibrillator ICD) प्रत्यारोपित किया। यह वह दौर था जब विशेषज्ञ इस तकनीक को लेकर संशय में थे। यहाँ तक कि बाहरी डिफिब्रिलेटर के आविष्कारक बर्नार्ड लाउन ने भी इसे "एक अव्यवहारिक समाधान" करार दिया था। लेकिन आज, यही यंत्र दुनिया भर में अचानक होने वाली कार्डियक डेथ (Sudden Cardiac Death) को रोकने का सबसे प्रमुख हथियार बन चुका है।ICD क्या है और यह हमारे दिल की सुरक्षा कैसे करता है?इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर-डिफिब्रिलेटर (ICD) एक छोटा, बैटरी से चलने वाला उपकरण है जिसे शरीर के अंदर, आमतौर पर बाएं कॉलरबोन के नीचे लगाया जाता है। विकिपीडिया के आंकड़ों के अनुसार, यह मुख्य रूप से उन मरीजों के लिए उपयोग किया जाता है जिन्हें वेंट्रिकुलर फाइब्रिलेशन या वेंट्रिकुलर टैकीकार्डिया जैसी जानलेवा स्थितियों का खतरा होता है। यह उपकरण लगातार हृदय की लय (Rhythm) की निगरानी करता है।इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर-डिफिब्रिलेटर (ICD)जब भी हृदय की गति एक निर्धारित सीमा से अधिक तेज़ या अनियमित हो जाती है, तो यह उपकरण तुरंत उसे पहचान लेता है। आधुनिक ICD न केवल खतरनाक धड़कन को पहचानते हैं, बल्कि वे 'ओवरड्राइव पेसिंग' या 'एंटी-टैकीकार्डिया पेसिंग' (ATP) के जरिए दिल को सामान्य लय में लाने की कोशिश भी करते हैं। यदि गति फिर भी अनियंत्रित रहती है, तो यह उपकरण एक बिजली का झटका (Shock) भेजता है ताकि हृदय फिर से अपनी सामान्य गति पर लौट सके। इसकी कार्यप्रणाली किसी आपातकालीन कक्ष में डॉक्टर द्वारा दिए जाने वाले बाहरी झटके के समान ही होती है, लेकिन शरीर के अंदर होने के कारण इसे बहुत कम वोल्टेज की आवश्यकता होती है।चिकित्सा इतिहास में इन उपकरणों का विकास कैसे हुआ?हृदय को सहारा देने की सुरक्षा करने वाले इन उपकरणों की कहानी लगभग 100 साल पुरानी है। पेसमेकर के विकास की शुरुआत 1928 में हुई थी, लेकिन पहला पूरी तरह से प्रत्यारोपित होने वाला पेसमेकर 1958 में स्वीडन के करोलिंस्का संस्थान में लगाया गया था। इसे रूण एल्मक्विस्ट और सर्जन एके सेनिंग ने विकसित किया था। दिलचस्प तथ्य यह है कि दुनिया के पहले पेसमेकर प्राप्त करने वाले मरीज, अर्ने लार्सन, अपने जीवनकाल में 26 अलग-अलग पेसमेकर उपकरणों के साथ 86 वर्ष की आयु तक जीवित रहे।ICD के विकास का श्रेय डॉ. मिशेल मिरोव्स्की और उनकी टीम को जाता है। 1969 में शुरू हुई उनकी रिसर्च को 11 साल बाद सफलता मिली। एप्लाइड फिजिक्स लेबोरेटरी (APL) ने इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहाँ अंतरिक्ष यान में इस्तेमाल होने वाली उच्च-तकनीक और गुणवत्ता नियंत्रण तकनीकों को इस मेडिकल डिवाइस में लागू किया गया। शुरुआती दौर में ये उपकरण इतने बड़े थे कि उन्हें पेट के क्षेत्र में प्रत्यारोपित करना पड़ता था और इसके लिए मरीज की पसलियों को खोलना पड़ता था।पेसमेकर और ICD के बीच मुख्य अंतर क्या है?यद्यपि ये दोनों उपकरण दिखने में एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन इनका कार्य अलग है। पेसमेकर मुख्य रूप से 'ब्रैडीकार्डिया' यानी धीमी धड़कन के इलाज के लिए होता है। यह तब काम करता है जब हृदय का प्राकृतिक पेसमेकर सही संकेत नहीं दे पाता। दूसरी ओर, ICD एक अधिक उन्नत प्रणाली है जिसमें पेसमेकर और डिफिब्रिलेटर दोनों के गुण होते हैं। यह धीमी धड़कन को सामान्य करने के साथ-साथ जानलेवा तेज़ धड़कन को रोकने की क्षमता भी रखता है। मे़डट्रॉनिक (Medtronics) के अनुसार, आधुनिक पेसमेकर अब विटामिन के कैप्सूल जितने छोटे (Leadless Pacemakers) भी आने लगे हैं, जिन्हें सीधे हृदय के अंदर लगाया जा सकता है।पेसमेकर ग्लोबल मार्केट और भारत में इन उपकरणों की आपूर्ति कैसे होती है?इन जीवनरक्षक उपकरणों का निर्माण और वैश्विक आपूर्ति मुख्य रूप से कुछ बड़ी कंपनियों जैसे मे़डट्रॉनिक (Medtronic), सेंट जूड मेडिकल (अब एबॉट) और बोस्टन साइंटिफिक द्वारा की जाती है। साइंस डायरेक्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, ICD एक जटिल प्रणाली है जिसमें पल्स जेनरेटर, लीड्स (तारे) और एक प्रोग्रामर शामिल होता है। इसके जेनरेटर में कंप्यूटर चिप, रैम, प्रोग्रामेबल सॉफ्टवेयर और लिथियम-सिल्वर वैनेडियम बैटरी होती है।भारत जैसे देशों में, जहाँ हृदय रोगों का बोझ बहुत अधिक है, इन उन्नत चिकित्सा तकनीकों के लिए मुख्य रूप से आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। पीएमसी (PMC) की शोध रिपोर्ट बताती है कि भारत इन उपकरणों का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगवाता है। उन्नत मेडिकल ग्रेड बैटरी और माइक्रो-इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्माण की स्थानीय सीमाओं के कारण, भारत के मरीजों को इन वैश्विक कंपनियों की तकनीक पर ही भरोसा करना पड़ता है। हालांकि, तकनीकी प्रगति के साथ इन उपकरणों की बैटरी लाइफ अब 10 साल से अधिक होने लगी है, जिससे बार-बार सर्जरी की आवश्यकता कम हुई है।इन उपकरणों के साथ जीवन जीने की क्या चुनौतियाँ हैं?एक बार ICD या पेसमेकर लग जाने के बाद मरीज एक सामान्य और सक्रिय जीवन जी सकता है, लेकिन कुछ सावधानियां बरतनी ज़रूरी होती हैं। मरीजों को तेज़ चुंबकीय क्षेत्र, एमआरआई (MRI) मशीनों और कुछ विशेष औद्योगिक उपकरणों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। हालांकि, मे़डट्रॉनिक जैसी कंपनियों ने अब 'MRI-Conditional' उपकरण पेश किए हैं, जिन्हें विशेष सेटिंग्स के साथ एमआरआई स्कैन के दौरान सुरक्षित रखा जा सकता है।मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका गहरा प्रभाव देखा गया है। शोध बताते हैं कि लगभग 13% से 38% मरीजों में अचानक लगने वाले झटके के डर से चिंता (Anxiety) और अवसाद के लक्षण देखे जा सकते हैं। इसीलिए, आधुनिक उपकरणों में अब ऐसी तकनीकें शामिल की जा रही हैं जो 'इनएप्रोप्रिएट शॉक' (गलत समय पर लगने वाले झटके) को कम कर सकें।क्या है इन उपकरणों का भविष्य?चिकित्सा जगत अब 'लीडलेस' (बिना तारों वाले) उपकरणों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की ओर बढ़ रहा है। मे़डट्रॉनिक के अनुसार, रिमोट मॉनिटरिंग सिस्टम अब डॉक्टरों को इंटरनेट के माध्यम से घर बैठे मरीज के दिल की जानकारी देने में सक्षम हैं। भविष्य में, एआई इन उपकरणों के डेटा का विश्लेषण कर धड़कन बिगड़ने से पहले ही डॉक्टर को चेतावनी दे सकेगा। भारत के लिए चुनौती इन महँगी तकनीकों को आम जनता के लिए सुलभ और किफायती बनाने की है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/h925vt8 2. https://tinyurl.com/24nwczyp 3. https://tinyurl.com/2263e94d 4. https://tinyurl.com/22cvptb5 5. https://tinyurl.com/ojwh4vb 6. https://tinyurl.com/27mspxyw 7. https://tinyurl.com/2xrh4q9w 8. https://tinyurl.com/24zwfqwk
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
14-09-2026 09:34 AM • Lucknow-Hindi
उत्तर भारत में क्यों नहीं मनाते महाराष्ट्र जैसी गणेश चतुर्थी ? जानिए असली वजह
भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना में विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश का स्थान सर्वोपरि है। किसी भी नए कार्य, यात्रा अथवा मांगलिक अनुष्ठान के आरंभ में प्रथम पूज्य के रूप में उनका आह्वान किया जाता है। गणेश चतुर्थी, जिसे गणेशोत्सव और विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है, मूल रूप से भगवान गणेश के जन्मोत्सव, उनकी अगाध बुद्धि, शुभ शुरुआत और बाधाओं के निवारण का पावन पर्व है। यह 10 दिवसीय महापर्व घरों में मिट्टी की छोटी प्रतिमाओं की स्थापना से आरंभ होकर सार्वजनिक पंडालों की भव्यता और अंत में श्रद्धा-भरे विसर्जन जुलूस तक विस्तृत होता है। यह उत्सव केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मूर्तिकारों, संगीतकारों, फूल-विक्रेताओं, रसोइयों और सज्जाकारों के हुनर को एक साझा मंच प्रदान करता है, जहाँ व्यक्तिगत साधना सामुदायिक उल्लास में परिवर्तित हो जाती है।
क्या है गणेश चतुर्थी की पौराणिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि? धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं में भगवान गणेश के प्राकट्य को लेकर कई आख्यान मिलते हैं। इनमें सबसे प्रचलित कथा माता पार्वती और भगवान शिव से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने अपनी सुरक्षा और एकांत की रक्षा के लिए अपने उबटन से एक बालक की रचना की और उसे द्वारपाल नियुक्त किया। जब भगवान शिव वहाँ पहुँचे, तो बालक ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। इस टकराव के परिणामस्वरूप बालक का मस्तक कट गया। माता पार्वती के गहन विलाप को देखकर भगवान शिव ने उन्हें एक हाथी का शीश लगाकर पुनर्जीवित किया और अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया। यह कथा केवल एक घटना नहीं है, बल्कि यह जीवन के कई गहरे व्यावहारिक संदेश देती है। यह सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य का निर्वहन पूरी निष्ठा से करना चाहिए, क्रोध विवेक के अभाव में विनाश लाता है, और संघर्ष के बाद भी प्रेम, स्वीकृति और पुनर्स्थापना संभव है।
भगवान गणेश के शारीरिक स्वरूप में भी जीवन प्रबंधन के गूढ़ रहस्य समाहित हैं। उनका विशाल मस्तक व्यापक सोच और सुदृढ़ निर्णय क्षमता का प्रतीक माना गया है। उनके बड़े-बड़े कान धैर्यपूर्वक सुनने की महत्ता को दर्शाते हैं, जबकि उनकी सूक्ष्म आँखें गहन एकाग्रता और सूक्ष्म दृष्टि का बोध कराती हैं। उनकी सूंड शक्ति और परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलनशीलता (फ्लेक्सिबिलिटी) को रेखांकित करती है। उनका वाहन मूषक चंचल इच्छाओं और वासनाओं पर नियंत्रण का संकेत देता है, और उनके हाथ में स्थित मोदक सच्चे परिश्रम के उपरांत मिलने वाले मधुर परिणाम का द्योतक है। इस प्रकार, गणेश जी की आराधना केवल एक पारंपरिक क्रिया नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आचरण और सामाजिक व्यवहार में इन सद्गुणों को अपनाने का आह्वान है।
क्या है गणपति पूजन से जुड़ा प्राचीन गण और टोटम का सामाजिक सिद्धांत? गणेश पूजा की ऐतिहासिक जड़ों को लेकर समाजशास्त्रियों और शोधकर्ताओं ने कई महत्वपूर्ण अवधारणाएँ प्रस्तुत की हैं। दक्कन क्षेत्र के प्राचीन इतिहास पर प्रस्तुत एक समाजशास्त्रीय शोध के अनुसार, प्राचीन काल में दक्कन में गण नामक गणतांत्रिक कबीले रहा करते थे। इन कबीलों के प्रमुख को 'गणपति' कहा जाता था। उस दौर में प्रत्येक कबीले का अपना एक विशिष्ट प्रतीक चिह्न होता था, जिसे टोटम (totem) कहा जाता था, और यह प्रायः किसी पशु के शीश के रूप में होता था।
ऐतिहासिक विश्लेषण के अनुसार, जिस कबीले का टोटम गज-मुख (हाथी का सिर) था, उसने दक्कन के एक विस्तृत भूभाग पर अपना आधिपत्य और प्रभाव स्थापित किया। उस कबीले के प्रमुख अत्यंत लोकप्रिय हुए और जनमानस में उनके प्रति गहरा आदर भाव विकसित हो गया। कालांतर में, लोगों ने श्रद्धावश उनकी स्मृति और उपस्थिति को पूजना प्रारंभ किया। चूँकि उनके कबीले का प्रतीक हाथी का शीश था, इसलिए उनकी प्रतिमा का निर्माण भी गज-शीश के साथ किया जाने लगा। धीरे-धीरे समय बीतने के साथ यह कबीलाई परंपरा भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश के पौराणिक पूजन के साथ एकाकार हो गई और इसने एक सार्वभौमिक धार्मिक स्वरूप ग्रहण कर लिया।
बाल गंगाधर तिलक ने 1892 में इस पर्व को सार्वजनिक आंदोलन क्यों बनाया? यद्यपि गणेश चतुर्थी का पर्व घरों के भीतर सदियों से मनाया जाता रहा था, परंतु इसे सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने का श्रेय राष्ट्रवादी नेता बाल गंगाधर तिलक को जाता है। वर्ष 1892 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने हिंदुओं के सार्वजनिक रूप से एकत्रित होने पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे थे। इन दमनकारी नियमों का रचनात्मक उत्तर देने के लिए बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव को सार्वजनिक पंडालों के रूप में आयोजित करने की प्रेरणा दी।
सार्वजनिक पंडाल केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं रहे, बल्कि वे राष्ट्रीय विमर्श, बौद्धिक भाषणों, नाटकों, संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के प्रमुख केंद्र बन गए। इस मंच ने समाज के विभिन्न वर्गों, जातियों और स्तरों के लोगों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। यहाँ से जो सामाजिक एकता और नागरिक एकजुटता की नींव पड़ी, वह आज भी जीवित है। आज भी अनेक गणेश मंडल न केवल धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, बल्कि रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य सेवाएँ और सामाजिक कल्याणकारी कार्य आयोजित करके उसी लोक-कल्याणकारी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
उत्तर भारत और महाराष्ट्र के उत्सवों की प्रकृति में क्या भिन्नता है? सांस्कृतिक दृष्टि से यह प्रश्न प्रायः उठता है कि उत्तर भारत में गणेश चतुर्थी उस पैमाने पर क्यों नहीं मनाई जाती, जिस प्रकार महाराष्ट्र और कर्नाटक में देखी जाती है। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में रामनवमी, जन्माष्टमी, और विशेषकर होली तथा दिवाली को कहीं अधिक व्यापक स्तर पर मनाया जाता रहा है। दिवाली और होली केवल धार्मिक तिथियाँ नहीं हैं, बल्कि वे प्रत्यक्ष रूप से कृषि और फसलों के चक्र से जुड़ी हुई हैं, जिसके कारण ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उनका जुड़ाव अत्यंत गहरा है।
दूसरी ओर, ऐतिहासिक रूप से महाराष्ट्र में उस दौर में होली और दिवाली का स्वरूप उत्तरी मैदानों जितना विशाल नहीं था। 1892 में तिलक द्वारा की गई पहल के बाद महाराष्ट्र और गोवा के अंचल में गणेश चतुर्थी को सामूहिक पंडाल संस्कृति के रूप में जो विस्तार मिला, वह उत्तर भारत के पारंपरिक घरेलू उत्सवों से भिन्न था। उत्तर भारत में भगवान गणेश की पूजा अनिवार्य रूप से प्रत्येक शुभ कार्य और दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ की जाती है, किंतु 10 दिनों तक बप्पा की प्रतिमा घर लाकर बिठाने और सार्वजनिक पंडाल सजाने का चलन ऐतिहासिक रूप से मुख्य रूप से दक्कन और पश्चिमी भारत तक ही केंद्रित रहा।
महाराष्ट्र, गोवा और दिल्ली में किस तरह सजते हैं बप्पा के दरबार? महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की भव्यता देखते ही बनती है। मुंबई में 'गणपति बप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया' के गगनभेदी जयकारों के बीच पूरा शहर जीवंत हो उठता है। यहाँ के प्रसिद्ध पंडालों में लालबागचा राजा, खेतवाड़ी गणराज, गणेश गल्ली मुंबईचा राजा और अंधेरीचा राजा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जहाँ दर्शन के लिए मीलों लंबी कतारें लगती हैं। सांस्कृतिक राजधानी पुणे में यह पर्व अत्यंत प्रामाणिक और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। पुणे के पंडालों में शास्त्रीय कला, लोकनृत्य और मोदक व लड्डुओं का विशेष भोग लगाया जाता है।
पड़ोसी राज्य गोवा में भी इस पर्व की अनुपम छटा देखने को मिलती है। यहाँ लोग अपने घरों की गहन सफ़ाई करते हैं और सगे-संबंधियों के यहाँ मिलने जाते हैं। गोवा के मार्सेल और मपुसा ऐसे प्रमुख स्थल हैं, जहाँ प्राचीन मंदिरों की उपस्थिति के कारण गणेश चतुर्थी का आयोजन अत्यंत वैभवशाली होता है।
देश की राजधानी दिल्ली का स्वरूप अपनी विविधता के लिए जाना जाता है। दिल्ली के पंडालों में एक ओर जहाँ विभिन्न राज्यों की परंपराओं का संगम दिखाई देता है और भगवान गणेश की विशालकाय प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं, वहीं दूसरी ओर मंदिरों में आचार्यों और पुरोहितों द्वारा वेद और उपनिषदों की ऋचाओं का सस्वर पाठ वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।
दक्षिण भारत और हैदराबाद में कैसे मनाया जाता है यह पावन पर्व? दक्षिण भारत के राज्यों में गणेश चतुर्थी का उल्लास एक विशिष्ट धार्मिक क्रम के साथ प्रकट होता है। तमिलनाडु और कर्नाटक में गणेश चतुर्थी से ठीक एक दिन पहले गौरी हब्बा (या गोवरी हब्बा) मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता है कि पुत्र के आगमन से पूर्व माता का स्वागत किया जाता है; अतः पहले दिन भगवान गणेश की माता, देवी गौरी की विधिवत प्रतिष्ठा और आराधना होती है, और उसके अगले दिन भगवान गणेश का स्वागत किया जाता है। कर्नाटक में इस अवसर पर गोज्जू, मोदकम और पायसम जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाकर अर्पित किए जाते हैं।
तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में गणेशोत्सव का उत्साह अत्यंत भव्य रूप में सामने आता है। यहाँ 10 दिनों तक निरंतर चलने वाले आयोजनों में श्रद्धालु भारी संख्या में एकत्र होते हैं। पूजन के दौरान भगवान को उंद्राल्लू, कुडुमुलु और चावल की खीर (राइस पॉरिज) का विशेष नैवेद्य चढ़ाया जाता है। हैदराबाद का खैराताबाद मंडल अपनी विशाल प्रतिमाओं के लिए देशभर में विख्यात है। यहाँ 60 फीट तक ऊँची गणेश प्रतिमा स्थापित की जाती है और भगवान के बाएँ हाथ में लगभग 5,600 किलोग्राम वजनी महालड्डू का भोग रखा जाता है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुँचते हैं।
सात समंदर पार पेरिस की सड़कों पर कैसे गूंजते हैं गणपति के जयकारे? भगवान गणेश की आराधना की गूँज भारत की भौगोलिक सीमाओं को पार कर यूरोप तक जा पहुँची है। फ़्रांस की राजधानी पेरिस (Paris) के 18वें एरोन्डिसमेंट (18th arrondissement) में प्रतिवर्ष गणेश महोत्सव का भव्य आयोजन किया जाता है। यह पूरा आयोजन ला चैपल (La Chapelle) क्षेत्र में स्थित श्री मणिका विनायकरालयम (Sri Manicka Vinayakar Alayam) मंदिर द्वारा संपन्न कराया जाता है।
रविवार, 30 अगस्त को आयोजित होने वाले इस वार्षिक उत्सव में हिंदू समुदाय के हज़ारों श्रद्धालु और स्थानीय नागरिक सम्मिलित होते हैं। मंदिर में पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों और अभिषेक के उपरांत भगवान गणेश की भव्य प्रतिमा को एक सुसज्जित रथ पर विराजमान किया जाता है। इस रथ को श्रद्धालु रस्सियों के सहारे खींचते हुए पेरिस की प्रमुख सड़कों से निकालते हैं। इस शोभायात्रा में गायक और वादक भजन-कीर्तन प्रस्तुत करते हुए चलते हैं, जो एक कार्निवल (carnival) जैसा उल्लासमय दृश्य प्रस्तुत करता है। यात्रा के मार्ग में उपस्थित जनसमूह के बीच प्रसाद, पारंपरिक मिठाइयाँ और शीतल पेय वितरित किए जाते हैं, जो भारतीय संस्कृति के वैश्विक विस्तार और सौहार्द का जीवंत प्रमाण है।
विसर्जन का आध्यात्मिक और पर्यावरणीय संदेश क्या है? गणेश चतुर्थी के 10वें दिन अनंत चतुर्दशी पर प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। मुंबई में अरब सागर के तटों पर और अन्य शहरों में विभिन्न जलाशयों में जब बप्पा को विदाई दी जाती है, तो वह दृश्य अत्यंत भावुक होता है। विसर्जन का वास्तविक दार्शनिक अर्थ यह है कि भौतिक आकार नश्वर और अस्थायी हैं। जिस प्रकार मिट्टी से बनी प्रतिमा जल में विलीन होकर पुनः प्रकृति का अंग बन जाती है, उसी प्रकार समस्त सांसारिक रूप अंततः विराट ईश्वरीय सत्ता में समाहित हो जाते हैं।
वर्तमान समय में जलस्रोतों के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक चिकनी मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बनी मूर्तियों के उपयोग पर विशेष बल दिया जा रहा है। विसर्जन की यह रस्म हमें सिखाती है कि जीवन में परिवर्तन को सहजता से स्वीकार करना चाहिए और विदाई के क्षणों में भी आगामी वर्ष में बप्पा के पुनः आगमन की मंगलकामना और कृतज्ञता का भाव बनाए रखना चाहिए।
संदर्भ
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2. https://tinyurl.com/2ayg93jh
3. https://tinyurl.com/28yfl2ws
4. https://tinyurl.com/2a4257ye
बैक्टीरिया, प्रोटोज़ोआ, क्रोमिस्टा और शैवाल
07-09-2026 09:59 AM • Lucknow-Hindi
क्रूज शिप पर फैला रहस्यमयी हंता वायरस क्या भारत के लिए भी है खतरा?
हाल ही में एमवी होंडियस (MV Hondius) नामक एक क्रूज शिप (cruise ship) पर एक जानलेवा संक्रमण फैलने से पूरी दुनिया के स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ गई हैं। यह क्रूज शिप अर्जेंटीना से केप वर्डे की यात्रा पर था, जहां कई यात्रियों में गंभीर श्वसन संबंधी बीमारियां देखी गईं। जांच में यह बात सामने आई कि यह संक्रमण हंता वायरस के एंडीज स्ट्रेन (Andes strain) के कारण फैला है। इस वायरस की चपेट में आने से एक डच महिला की मृत्यु हो गई, जबकि ब्रिटिश और स्विस यात्री गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हुए। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2025 में ऑस्कर विजेता अभिनेता जीन हैकमैन (Gene Hackman) की पत्नी बेट्सी अराकावा (Betsy Arakawa) का निधन भी इसी वायरस से जुड़ी सांस की बीमारी के कारण हुआ था, जिसके बाद उनके घर के आस-पास चूहों के घोंसले पाए गए थे। इस खतरनाक वायरस ने वैश्विक स्तर पर यह बहस छेड़ दी है कि क्या चूहों से फैलने वाली यह बीमारी एक नई महामारी का रूप ले सकती है।
हंता वायरस क्या है और यह कैसे फैलता है? हंता वायरस कोई एक अकेला वायरस नहीं है, बल्कि यह वायरसों का एक पूरा समूह है जो मुख्य रूप से चूहों और कृंतकों द्वारा फैलता है। इस वायरस का नाम दक्षिण कोरिया की एक नदी के नाम पर रखा गया है। यह वायरस बुन्याविरालेस ऑर्डर (Order Bunyavirales) के हंताविरिडे फेमिली (Family Hantaviridae) से संबंधित है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जो चूहे इस वायरस को अपने शरीर में लेकर घूमते हैं, वे खुद कभी बीमार नहीं पड़ते। यह वायरस चूहों के मल, मूत्र और लार में मौजूद होता है।
जब चूहे किसी बंद जगह पर मल-मूत्र करते हैं और वह सूख जाता है, तो सफाई करते समय या हवा के झोंके से उसके कण हवा में मिल जाते हैं। जब इंसान इस दूषित हवा में सांस लेता है, तो यह वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसे एरोसोलाइज्ड ट्रांसमिशन (aerosolized transmission) कहा जाता है। इसके अलावा, चूहों द्वारा खाए गए या जूठे किए गए भोजन का सेवन करने, वायरस से दूषित सतहों को छूने के बाद उन्हीं हाथों से अपनी आंख, नाक या मुंह को छूने, या संक्रमित चूहे के काटने और खरोंचने से भी यह संक्रमण इंसानों में फैल सकता है।
क्रूज शिप पर यह आउटब्रेक कैसे हुआ और एंडीज स्ट्रेन क्यों है खतरनाक? एमवी होंडियस क्रूज शिप का मामला चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यह शिप एक अप्रैल 2026 को अर्जेंटीना के उशुआइया से निकला था और पहला मामला छह अप्रैल को सामने आया। चूंकि इस वायरस का इन्क्यूबेशन पीरियड (incubation period) आमतौर पर लंबा होता है, इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि पहले यात्री को यह संक्रमण क्रूज पर चढ़ने से पहले ही अर्जेंटीना में बर्ड-वाचिंग (पक्षियों को देखने) की किसी गतिविधि के दौरान चूहों के संपर्क में आने से हुआ होगा।
चिंता का असली कारण एंडीज स्ट्रेन है। आमतौर पर हंता वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में नहीं फैलता है। लेकिन दक्षिण अमेरिका (विशेषकर अर्जेंटीना और चिली) में पाया जाने वाला एंडीज स्ट्रेन इसका एकमात्र अपवाद है। जब कोई व्यक्ति इस स्ट्रेन से संक्रमित होता है, तो बहुत करीबी और लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले परिवार के सदस्यों या देखभाल करने वालों में यह वायरस फैल सकता है। क्रूज शिप पर दूसरा मामला पहले मरीज के बेहद करीबी संपर्क वाले व्यक्ति का ही था, जो इस बात का प्रबल संकेत देता है कि यह वायरस इंसान से इंसान में फैला है। इससे पहले 2018 में भी अर्जेंटीना में एक पार्टी के दौरान एक ही संक्रमित व्यक्ति से 34 लोग संक्रमित हुए थे, जिनमें से 11 की मौत हो गई थी।
हंता वायरस से संक्रमित होने पर शरीर में क्या लक्षण दिखाई देते हैं? वायरस के संपर्क में आने और बीमारी के लक्षण दिखने के बीच का समय (इन्क्यूबेशन पीरियड) एक से आठ सप्ताह तक का हो सकता है। यह वायरस दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दो तरह की गंभीर बीमारियां पैदा करता है।
उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में यह हंता वायरस पल्मोनरी सिंड्रोम (Hantavirus Pulmonary Syndrome - एचपीएस) का कारण बनता है। शुरुआती दौर में मरीज को तेज बुखार, सिरदर्द, थकान, ठंड लगना और शरीर की बड़ी मांसपेशियों (जैसे जांघ, कूल्हे और पीठ) में तेज दर्द होता है। कुछ लोगों को पेट दर्द, मतली, उल्टी और डायरिया की शिकायत भी होती है।
चार से दस दिन बीत जाने के बाद, यह बीमारी अपने दूसरे और अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश करती है। वायरस फेफड़ों की छोटी रक्त वाहिकाओं (केपिलरीज - capillaries) पर हमला करता है, जिससे उनमें रिसाव होने लगता है और फेफड़ों में पानी भर जाता है। इसके कारण मरीज को भयानक खांसी आती है, सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई होती है और शरीर में ऑक्सीजन की कमी से उसकी जान जा सकती है। एचपीएस बेहद घातक है और इसमें मृत्यु दर 30 से 50 प्रतिशत तक होती है।
वहीं दूसरी ओर, यूरोप और एशिया में यह वायरस हेमोरेजिक फीवर विद रीनल सिंड्रोम (hemorrhagic fever with renal syndrome - एचएफआरएस) का कारण बनता है। इसमें बुखार, धुंधली दिखाई देना और पीठ दर्द के साथ-साथ गंभीर मामलों में लो ब्लड प्रेशर, आंतरिक रक्तस्राव और एक्यूट किडनी फेलियर (acute kidney failure) की समस्या उत्पन्न हो जाती है। एचएफआरएस में मृत्यु दर आमतौर पर 1 से 15 प्रतिशत के बीच होती है।
जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय बदलाव कैसे बढ़ा रहे हैं इसका खतरा? शोधकर्ताओं का मानना है कि हंता वायरस जैसे जूनोटिक रोगों (जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियां) के बढ़ने के पीछे जलवायु परिवर्तन और बेतरतीब शहरीकरण एक बहुत बड़ा कारण है। जैसे-जैसे जंगलों की कटाई हो रही है और इंसान कृषि और रिहायशी मकसदों के लिए वन्यजीवों के आवास में अतिक्रमण कर रहा है, इंसानों और चूहों के बीच का संपर्क तेजी से बढ़ रहा है।
तापमान में वृद्धि और अनियमित बारिश के कारण चूहों के खाने की उपलब्धता में बदलाव आता है। जब भोजन प्रचुर मात्रा में होता है, तो चूहों की आबादी में विस्फोट होता है। आबादी बढ़ने पर ये चूहे भोजन और आश्रय की तलाश में इंसानों के घरों, खलिहानों और भंडारण स्थलों में घुस जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे महाद्वीप में जहां अब तक हंता वायरस का कोई मानव मामला दर्ज नहीं किया गया है, वहां भी कुछ चूहों में इसके एंटीबॉडी पाए गए हैं। यह इस बात का संकेत है कि वायरस पर्यावरण में खामोशी से मौजूद है और परिस्थितियां अनुकूल होने पर कभी भी प्रकोप फैला सकता है।
क्या भारत को भी हंता वायरस से सतर्क रहने की आवश्यकता है? यद्यपि वर्तमान में हंता वायरस का केंद्र दक्षिण अमेरिका और यूरोप रहा है, लेकिन भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए यह एक मूक खतरा बन सकता है। भारत में मानसून के दौरान बाढ़, जलभराव और सीवेज ओवरफ्लो के कारण चूहों का आतंक बढ़ जाता है। मुंबई, दिल्ली और कोलकाता जैसे महानगरों में पुरानी इमारतों, रेलवे नेटवर्क और घनी बस्तियों के कारण इंसानों और चूहों का संपर्क बहुत अधिक है।
भारत में हंता वायरस को लेकर सबसे बड़ी चुनौती इसके लक्षणों का अन्य बीमारियों से मेल खाना है। इसके शुरुआती लक्षण बिल्कुल डेंगू, मलेरिया, लेप्टोस्पायरोसिस (leptospirosis), इन्फ्लूएंजा (influenza) और वायरल बुखार जैसे होते हैं। इस कारण अधिकांश डॉक्टर प्रारंभिक जांच में हंता वायरस पर संदेह ही नहीं करते। अतीत में दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में हंता वायरस के एंटीबॉडी और संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (Indian Council of Medical Research - आईसीएमआर) ने कोविड-19 के बाद अपनी निगरानी प्रणाली को मजबूत किया है, लेकिन ग्रामीण और छोटे शहरों के अस्पतालों में अभी भी इस दुर्लभ बीमारी की सटीक जांच (आरटी-पीसीआर (RT-PCR)और आईजीएम एंटीबॉडी टेस्ट (IgM Antibody Test)) के लिए बुनियादी ढांचे का अभाव है। यदि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में मौजूद चूहों में इस वायरस का प्रसार होता है, तो खराब स्वच्छता और घनी आबादी के कारण यह तेजी से फैल सकता है।
इस जानलेवा वायरस से बचाव और रोकथाम के क्या उपाय हैं? चूंकि हंता वायरस मुख्य रूप से चूहों से फैलता है, इसलिए उनसे बचाव ही इस बीमारी की सबसे अच्छी रोकथाम है। स्वास्थ्य एजेंसियों द्वारा कुछ सख्त दिशानिर्देश जारी किए गए हैं।
अगर घर, गैराज या गोदाम में चूहों का मल-मूत्र दिखाई दे, तो उसे कभी भी सूखी झाड़ू या वैक्यूम क्लीनर से साफ न करें। ऐसा करने से वायरस हवा में उड़ने लगता है। सफाई से पहले चूहों के मल पर ब्लीच और पानी का घोल (या कोई मजबूत कीटाणुनाशक) छिड़कें और उसे पांच मिनट तक भीगने दें। इसके बाद पेपर टॉवल से पोंछकर उसे कचरे में फेंक दें। सफाई करते समय हमेशा रेस्पिरेटर मास्क और रबर या प्लास्टिक के दस्ताने पहनें। सफाई के बाद हाथों को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोना अनिवार्य है।
घरों में चूहों के प्रवेश को रोकने के लिए दीवारों और दरवाजों के सभी छेदों (एक चौथाई इंच तक के) को स्टील वूल, जाली या सीमेंट से बंद करें। घर के बर्तन तुरंत धोएं और खाने-पीने की चीजों व पालतू जानवरों के भोजन को एयर-टाइट डिब्बों में बंद करके रखें। जिन केबिनों, स्टोरेज शेड या कमरों का लंबे समय से उपयोग नहीं हुआ है, वहां जाने से पहले दरवाजे और खिड़कियां खोलकर आधे घंटे तक ताजी हवा आने दें।
इसके अलावा, गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों (5 वर्ष से कम) और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को पालतू चूहों (पेट रैट्स) से दूर रहना चाहिए। चूहों को पालने वालों को लगातार पिंजरे की सफाई और जानवरों के परीक्षण का ध्यान रखना चाहिए।
क्या हंता वायरस का कोई सटीक इलाज या वैक्सीन उपलब्ध है? वर्तमान में हंता वायरस संक्रमण के लिए पूरी दुनिया में कोई भी प्रमाणित विशिष्ट एंटीवायरल उपचार या व्यापक रूप से उपलब्ध वैक्सीन नहीं है। इस बीमारी का इलाज मुख्य रूप से लक्षणों के आधार पर (सपोर्टिव केयर) किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति को चूहे वाले वातावरण में रहने के बाद तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ होती है, तो उसे तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए।
अस्पताल में मरीजों को ऑक्सीजन थेरेपी दी जाती है। गंभीर एचपीएस मामलों में मरीजों को इंट्यूबेशन (intubation) या वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ सकती है। वहीं, एचएफआरएस के मरीजों में किडनी फेल होने की स्थिति में डायलिसिस का सहारा लिया जाता है, ताकि शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकाला जा सके और तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखा जा सके। सही समय पर आईसीयू (सघन चिकित्सा कक्ष) में भर्ती होने से मरीज की जान बचने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है।
रोमन साम्राज्य में एनीड व भारतवर्ष में रामायण महाकाव्य में युवा पीढ़ी के लिएं प्रेरणा
लखनऊ, आज हम विश्व प्रसिद्ध काव्य ‘एनीड (Aeneid)’ एवं हमारी भारतभूमि पर रचित ‘रामायण’ काव्य के बारे में जानेंगे। शीर्ष लैटिन (Latin) कवियों में से एक माने जाने वाले वर्जिल (Virgil) ने, अपने जीवन के अंतिम दस वर्षों (29 ईसा पूर्व-19 ईसा पूर्व) में ‘एनीड’ की रचना की थी। यह उनकी सर्वोत्कृष्ट कृति थी। हालाँकि दुर्भाग्यवश, इस काव्य के संपादन के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई। अपनी कृति अधूरी रह जाने से, वे इतने व्यथित थे कि उन्होंने अपनी मृत्यु के बाद इस काव्य को जला देने की इच्छा व्यक्त की थी। किंतु एनीड की अधूरी स्थिति में भी इसके एक ऐसे प्रशंसक थे, जिन्होंने इसके प्रारूपों को पहले ही देख रखा था। अतः उन्होंने अपने मित्र की अंतिम इच्छा को दरकिनार करते हुए, कुछ मामूली संशोधनों के साथ इसे प्रकाशित करवाया।
एनीड, युवाओं के लिए अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि इसमें ट्रोजन राजवंश (Trojan royal family) के एक राजकुमार ऐनियस (Aeneas) की इटली-यात्रा का वर्णन है, जहाँ उसके लिए एक नए वंश व राज्य की भविष्यवाणी की गई है। ‘इलियाड (Iliad)’ काव्य के अनुसार, ट्रॉय (Troy) राज्य के विनाश के बाद सुरक्षित बचे कुछ सैनिकों व नागरिकों के साथ बच निकलता है। वहाँ, वह एक ऐसे स्वाभिमानी और साहसी वंश की नींव रखेगा, जिसकी कीर्ति संपूर्ण विश्व में फैलेगी। यह प्रसंग स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि ऐनियस एक युवा था, जो भविष्य में रोमन साम्राज्य (Roman Empire) की नींव रखने वाली भावी पीढ़ी का सही मार्गदर्शन और पालन-पोषण करेगा।
युवाओं के लिए इसकी प्रासंगिकता का दूसरा कारण यह है कि इस महाकाव्य के अधिकांश पात्र युवा हैं। उदाहरण के लिए, जब ऐनियस की मां - देवी वीनस (Venus) उसे शहर के इतिहास से परिचित कराती हैं, तो वह उसे देवी जूनो (Juno) की कृपा प्राप्त करने हेतु उनके मंदिर जाने के लिए प्रेरित करती हैं। ऐनियस की समुद्री जहाज़ी यात्रा के दौरान, अफ्रीका के तट पर यह प्रसंग हुआ था। तत्पश्चात्, ऐनियस नगर में प्रवेश करता है और जूनो के मंदिर में कार्थेज की रानी (Queen of Carthage) - डिडो (Dido) की कृपादृष्टि प्राप्त करता है। यह घटना बताती है कि एक युवा होने के नाते, ऐनियस को अपनी यात्रा के दौरान पग-पग पर अपनी मां के मार्गदर्शन पर निर्भर रहना पड़ा, क्योंकि वह उस स्थान से पूर्णतः अनभिज्ञ था।
ऐनियस के वंशज भविष्य में इस नगर पर पुनः विजय प्राप्त न कर सकें, इस आशंका से चिंतित होकर, वीनस अपने पुत्र की सुरक्षा हेतु एक योजना बनाती हैं। वह ऐनियस के सौतेले भाई - क्यूपिड (Cupid) को असकैनियस (Ascanius) का छद्म रूप देकर भेजती हैं। क्यूपिड, डिडो को उपहार भेंट करता है। तब, डिडो के मन में वात्सल्य-भाव जागृत होता है और वह ऐनियस के प्रेम में बंध जाती है। अपने दिवंगत पति के प्रति वफादार होने के बावजूद, वह ऐनियस के प्रति अत्यंत आसक्त हो जाती है। इस संदर्भ में, यह रचना ऐनियस और उसकी पीढ़ी के भविष्य तथा उसकी सफलता को लेकर चिंतित मां के प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करती है। वीनस द्वारा रचा गया यह संपूर्ण ताना-बाना, यह दर्शाता है कि भविष्य युवा पीढ़ी पर ही निर्भर करता है और उनका मार्गदर्शन करना अत्यंत आवश्यक है।
इसके विपरीत, हमारे भारतवर्ष की पौराणिक कहानी - रामायण, उस कालखंड के समाज का चित्रण करती है, जहाँ विशाल साम्राज्य हैं; एक भावी राजा के रूप में राजकुमार का प्रशिक्षण किया जा रहा है; माता और सौतेली माताओं के मध्य द्वंद्व है; भाइयों में पारस्परिक प्रेम व निष्ठा है; और राजकुमारी के स्वयंवर की प्रतियोगिताएं हैं। रामायण, मुख्य रूप से वयस्क पीढ़ी के उत्तरदायित्वों पर केंद्रित है, क्योंकि इसमें नेतृत्व, पारिवारिक अंतर्द्वंद्व और प्रेम के गंभीर पक्षों का विवेचन है। ये गुण युवाओं की तुलना में प्रौढ़ एवं वयस्क व्यक्तियों में अधिक दृष्टिगोचर होते हैं।
इसके अतिरिक्त, रामायण, एक नैतिक पुरुष और जननायक के आदर्श आचरण का निरूपण करता है, फिर चाहे वह संयमपूर्वक परिस्थितियों का सामना करना हो, दायित्वों को निष्ठा से निभाना हो, व्यक्तिगत दुःखों और सीमाओं से परे रहकर स्वशासित रहना हो, या समाज में प्रेम और सम्मान का भाव जगाना हो। दूसरी तरफ, माता सीता यह अनुभव करती हैं कि धरती पर उनका समय समाप्त हो चुका है, एवं वे धरती माता की गोद में समा जाती हैं। तत्पश्चात्, भगवान राम-सीता के दोनों पुत्र - लव और कुश, अपने पिता के साथ तब तक अयोध्या में रहते हैं, जब तक कि वे राज्य के उत्तराधिकारी नहीं बन जाते। यह हमें सीख देता है कि एक शासक को अपने जीवनकाल के बाद पुत्रों को योग्य बनाकर राज्य सौंपना चाहिए। पुत्रों ने भी अपने पिता से नेतृत्व कला के समस्त गुण सीखे, ताकि वे उस दायित्व को सफलतापूर्वक संभाल सकें।
एक अलग विषय में, पैगंबर मुहम्मद की जीवनी, जिसे ‘सीरा’ के नाम से जाना जाता है, सर्वप्रथम आठवीं शताब्दी के विद्वान इब्न इसहाक द्वारा संकलित की गई थी। बाद में, इब्न हिशाम द्वारा इसे पुनः संपादित व परिमार्जित किया गया। वास्तव में, यह ग्रंथ पैगंबर साहब के जीवन की घटनाओं को कालक्रमानुसार प्रस्तुत करने के लिए मौखिक परंपराओं, वृत्तांतों और संदर्भ-योग्य कविताओं का एक चुनिंदा संकलन है। मौखिक विवरणों का यह संक्षिप्त रूप, पैगंबर साहब के जीवन और उपदेशों पर केंद्रित कई अन्य रचनाओं का मूल आधार भी बनता है। इनमें से कुछ ‘हदीस’ के नाम से प्रख्यात भविष्यवाणी परंपराओं के संग्रह हैं, जो इस्लामी कानून के स्रोतों में से एक हैं। इब्न इसहाक की यह कृति, उस व्यापक विद्वतापूर्ण एवं ऐतिहासिक साहित्य का अभिन्न अंग है, जो कुरान के साथ मिलकर इस्लामी आस्था (अकीदा) की नींव रखता है। यह आज भी संपूर्ण मुस्लिम जगत के लिए अत्यंत महत्त्व रखता है।
हाल ही में, एक अरब इतिहासकार तारिफ अल-खालिदी ने रेखांकित किया है कि ‘अपने इसी मौलिक स्वरूप के कारण, 'सीरा' और 'हदीस' के विद्वानों द्वारा प्रस्तुत इतिहास का यह दृष्टिकोण, मिखाइल बख्तिन की शब्दावली में एक 'महाकाव्यात्मक चरित्र' धारण करता है’। यद्यपि खालिदी ने इस विचार को आगे विस्तृत नहीं किया, किंतु सीरा उन लक्षणों को दर्शाती है, जिन्हें अन्य विश्व-परंपराओं में महाकाव्य का दर्जा प्राप्त है।
तुलनात्मक रूप में, 'एनीड' महाकाव्य, संभवतः पहली बार दो परस्पर विरोधी आदर्शों - मानवतावाद और साम्राज्यवाद को एक साथ अभिव्यक्ति देता है। इन्हें लंबे समय से यूरोपीय चेतना का आधार माना जाता रहा है। मानवतावाद, वर्जिल के मित्र और शत्रु दोनों के प्रति गहरी मानवीय संवेदना तथा दया व नम्रता के भाव में दिखाई देता है। इसी कारण, उन्हें ईसाई धर्म का पूर्वगामी भी माना गया। इसके विपरीत, साम्राज्यवाद 'एनीड' में वर्णित रोम की न्यायप्रिय सत्ता की अवधारणा में झलकता है, जिसे बाद के यूरोपीय और अमेरिकी साम्राज्यवादी विचारों का वैचारिक आधार माना जा सकता है।
दूसरी तरफ, सीरा के साथ तुलना के लिए महर्षि वाल्मीकि रचित संस्कृत ‘रामायण’ चुना गया है। इसके केंद्र में धर्म एवं धार्मिकता की एक भिन्न अवधारणा है। रामायण की “प्रकृति और मनुष्य के बीच पूर्ण सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व” को पुनर्स्थापित करने वाले एकीकरण बल की अवधारणा ने भारतीय संस्कृति पर अमिट छाप छोड़ी है। इसकी यह शाश्वत प्रासंगिकता 'एनीड' और 'सीरा' के समतुल्य है। यह बात तब और भी स्पष्ट हो जाती है, जब हम रामायण से प्रेरित होकर लिखे गए उत्तरवर्ती पुनर्कथनों को देखते हैं। इसका उदाहरण, मध्यकालीन हिंदी में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' है, जिसे महात्मा गांधी संपूर्ण भक्ति-साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचना मानते थे। यहां ध्यान देने योग्य एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि ऋषि कंबन द्वारा रचित तमिल रामायण का उपयोग, 17वीं शताब्दी के कवि उमारू पुलावर ने "पैगंबर मुहम्मद की तमिल जीवनी" के लिए एक साहित्यिक मॉडल के रूप में किया था। यह इन दोनों आख्यानों के आपसी संबंध का एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है।
दूसरी तरफ, 'एनीड' की कथा, महाभारत की तुलना में भी काफी सरल और सीधी है। ऐनियस की कथा में, उसके लिए इटली में एक नई मातृभूमि और रोमनों के पूर्वज के रूप में स्थापित होने के बारे में है। पांडवों की भांति, ऐनियस भी एक दैवीय संतान है। उसकी मां प्रेम की देवी वीनस हैं, और ओलम्पियन देवी-देवता इस महाकाव्य की घटनाओं में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इनमें से अधिकांश परिस्थितियां प्रतिशोधी देवी जूनो द्वारा उत्पन्न की जाती हैं, जो ट्रोजन शरणार्थियों से घृणा करती है। वर्जिल, इस वृत्तांत का उपयोग रोम की स्थापना की पौराणिक कथा को विस्तार देने और ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वियों की शत्रुता का पौराणिक कारण स्पष्ट करने के लिए करते हैं। साथ ही, सीज़र वंश (Caesar dynasty) की राजनीतिक सत्ता को वैधता और पौराणिक आधार प्रदान करने के लिए भी वे इसका उपयोग करते हैं।
इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि रामायण व एनीड दोनों काव्यों में ऐसी महिलाएं हैं, जो नायक को उसके महान लक्ष्य से भटकाती हैं; इनमें देवताओं की कृपा और कोप की लीलाएं हैं; और अन्य साम्राज्यों की रहस्यमयी यात्राएं हैं। ये कुछ ऐसे तत्त्व हैं, जो इन महाकाव्यों की समानता को सिद्ध करते हैं।
हमारे लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब: यहाँ धर्म की सीमाओं से परे कैसे बँधती है प्यार भरी राखी?
लखनऊ, चलिए आज रक्षाबंधन के अवसर पर इस त्योहार के बारे में जानते हैं। संस्कृत शब्द ‘रक्षा बंधन’ का अर्थ, ‘सुरक्षा का एक पावन बंधन’ है। यह आधुनिक त्योहार हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन, आमतौर पर अगस्त के महीने में मनाया जाता है। कई अन्य भारतीय त्योहारों की तरह, रक्षाबंधन की जड़ें भी प्राचीन पौराणिक कथाओं में मिलती हैं, और प्रत्येक कथा इसके अर्थ में एक नई परत जोड़ती है।
रक्षाबंधन को लेकर, श्रीकृष्ण एवं द्रौपदी की कहानी शायद महाभारत की सबसे प्यारी और लोकप्रिय कहानी है। जब युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण की उंगली कट गई, तो द्रौपदी ने बिना एक पल गँवाए अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर, उनकी उंगली पर बाँध दिया। इस भाव से द्रवित होकर कृष्ण ने हमेशा के लिए उनकी रक्षा करने का संकल्प लिया। देखभाल और पारस्परिकता का यह सरल कार्य, आगे चलकर रक्षाबंधन का एक दिव्य रूप बन गया, जिसका जैविक भाई-बहन के रिश्ते से परे प्रेम, निश्छलता और सम्मान से गहरा नाता है।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, मृत्यु के देवता यम एक वर्ष से अधिक समय से अपनी बहन यमुना से मिलने नहीं जा पाए थे। जब वे अंततः उनसे मिलने गए, तो यमुना ने उनकी कलाई पर राखी बाँधी और स्वादिष्ट मिठाइयों से उनका स्वागत किया। इस आत्मीयता से प्रसन्न होकर, यम ने उन्हें अमरता का वरदान दिया और हर वर्ष मिलने आने का संकल्प लिया। इससे रक्षाबंधन पर बहनों से मिलने और इस दिन को केवल राखी बाँधने तक सीमित न रखकर स्नेह का उत्सव बनाने की परंपरा को बढ़ावा मिला।
दूसरी ओर, भविष्य पुराण के अनुसार, देवताओं के राजा इंद्र की पत्नी शची ने युद्ध में जाने से पहले उनकी विजय और सुरक्षा के लिए उनकी कलाई पर एक पवित्र धागा बाँधा था। उस समय इसे ‘राखी’ नहीं कहा जाता था, लेकिन इसके पीछे की भावना अपने प्रिय व्यक्ति को अपनी शुभकामनाओं की ताकत और सुरक्षा का आशीर्वाद देना थी।
रक्षाबंधन केवल पौराणिक कथाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने भारतीय इतिहास में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 16वीं शताब्दी में, जब चित्तौड़गढ़ पर गंभीर खतरा मंडरा रहा था, तब मेवाड़ की साहसी रानी कर्णवती ने अपनी रक्षा की गुहार लगाते हुए मुगल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजी थी। उनके इस निश्छलता भरे भाव से प्रभावित होकर हुमायूँ अपनी सेना के साथ मदद के लिए दौड़ पड़े, भले ही इसके परिणामस्वरूप उन्हें अपने राजनीतिक सहयोगियों के खिलाफ ही क्यों न जाना पड़ा। यह इस बात का एक शक्तिशाली प्रमाण है कि राखी, कैसे धर्म, क्षेत्र और यहाँ तक कि राजनीतिक सीमाओं को भी पार कर सकती है।
यद्यपि रक्षाबंधन से जुड़ी कई लोककथाएँ और दंतकथाएँ प्रचलित हैं, किंतु भविष्य पुराण में उल्लिखित कथा सबसे अधिक प्रामाणिक मानी जाती है। भविष्य पुराण की इस कथा का उल्लेख ‘व्रतराज’ में भी मिलता है। युगों पहले, देवताओं और राक्षसों के बीच एक भीषण युद्ध हुआ था, जो पूरे बारह वर्षों तक चला। अंततः देवता युद्ध हार गए और राक्षसों ने इंद्र के स्वर्गलोक के साथ-साथ तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। तब देवराज इंद्र ने, देवताओं के गुरु बृहस्पति से परामर्श किया। गुरु बृहस्पति ने उन्हें रक्षा विधान का सुझाव दिया और इसके विशेष मंत्र बताए। श्रावण पूर्णिमा के दिन गुरु बृहस्पति ने रक्षा विधान का अनुष्ठान संपन्न किया। इस अनुष्ठान के दौरान रक्षा पोटली को पवित्र मंत्रों से अभिमंत्रित किया गया था। पूजा के पश्चात इंद्र की पत्नी शची ने इंद्र के दाहिने हाथ पर वह रक्षा पोटली बाँध दी। उस रक्षा पोटली की असीम शक्ति के कारण ही इंद्र राक्षसों को पराजित करने और अपना खोया हुआ राज्य वापस पाने में सक्षम हुए। तभी से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन का अनुष्ठान करने की परंपरा चली आ रही है।
आज, हालांकि इस त्योहार ने आधुनिक रूप लिया है। क्या आप जानते हैं कि हमारे शहर लखनऊ की प्रसिद्ध ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करते हुए, शहर के निवासियों ने रक्षाबंधन के पावन पर्व पर सभी सांस्कृतिक और धार्मिक बाधाओं को पार कर आपसी प्रेम का संदेश दिया है। 32 वर्षीय सुमुल सानिया पिछले दो दशकों से अपने पड़ोसी विनय प्रकाश मौर्य को राखी बाँधती आ रही हैं। उनकी माताएँ घनिष्ठ दोस्त थीं और वे इस बात पर विशेष जोर देती थीं कि उनके बच्चों के मन में हमेशा प्रेम और भाईचारे की भावना बनी रहे।
इसी प्रकार, शहर के एक अन्य निवासी अब्दुल सबूर की पत्नी को अपनी एक सहकर्मी में, एक ऐसी बहन मिल गई है, जो पिछले छह वर्षों से लगातार उन्हें राखी बाँधती आ रही है। इसके अलावा, 24 वर्षीय आशीष सिंह की मुलाकात एक संवाद कार्यक्रम के दौरान इरम नाज से हुई थी। वे तब से नाज को अपनी बहन मानते हैं। नाज ने भी इस त्योहार से जुड़ी सभी परंपराओं की पूरी जानकारी हासिल की है ताकि वे इसे पूरी पारंपरिक निष्ठा के साथ मना सकें।
दूसरी ओर, 47 वर्षीय सनोबर, अपनी शादी के बाद से ही अपने पति के दोस्त गौरव सरीन को राखी बांधती आ रही हैं। उनका कोई सगा भाई नहीं है, लेकिन जब भी उन्हें मदद की ज़रूरत होती है, सरीन हमेशा उनके साथ खड़े रहते हैं। जबकि उनके पति मोहम्मद हैदर ने, लखीमपुर खीरी के बौधिया कलां गांव के निवासियों के साथ वर्चुअल (ऑनलाइन) राखी मनाई है। हैदर ने कुछ दशक पहले इस गांव को गोद लिया था और इस गांव के कुछ लोगों के साथ उनके प्यारे संबंध हैं।
रक्षाबंधन के त्योहार की शुरुआत होने से एक महीने पहले ही, बाज़ार रंग-बिरंगी राखियों से गुलज़ार हो जाते हैं। लोग अपने भाइयों और बहनों के लिए फैंसी राखियाँ, प्यार भरे संदेश वाले कार्ड और सार्थक उपहार चुनते हैं। जैसे ही उस दिन सुबह के अनुष्ठान शुरू होते हैं, बहनें आरती करने और अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाने में आगे रहती हैं। इसके बाद, वे अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, जो उसकी समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और समग्र कल्याण के लिए की गई प्रार्थनाओं का एक प्रतीक है। इसके बदले में, भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं और हर परिस्थिति में उनके रक्षक बने रहने का वादा करते हैं। यह दिन हँसी, खुशी और स्नेह के एक सामंजस्यपूर्ण माहौल के साथ आगे बढ़ता है।
भारत में कोई भी उत्सव विशेष व्यंजनों का आनंद लिए बिना पूरा नहीं होता है और रक्षाबंधन इसका कोई अपवाद नहीं है! पारंपरिक मिठाइयां इस आनंदमय अवसर का मुख्य आकर्षण हैं। नारियल और मोतीचूर के स्वादिष्ट लड्डुओं से लेकर खीर, पायसम, घेवर और हलवे की तिकड़ी जैसे प्रत्येक व्यंजन, न केवल हमारी जिव्हा को तृप्त करते हैं, बल्कि भाइयों और बहनों के बीच साझा प्रिय बंधन की अंतर्निहित मिठास का भी प्रतीक है।
लखनऊ की संगीत परंपरा में पियानो है शास्त्रीय, फिल्म और समकालीन संगीत की विधाओं में प्रयोग
लखनऊ भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहाँ स्थित भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय ने भारतीय संगीत के साथ-साथ पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के अध्ययन को भी प्रोत्साहन दिया है, जिससे दोनों संगीत परंपराओं के बीच संवाद को नई दिशा मिली। पश्चिमी संगीत के सबसे प्रभावशाली वाद्यों में पियानो का विशेष स्थान है। अपनी मधुर ध्वनि, विस्तृत स्वर-सीमा और एक साथ धुन तथा संगति प्रस्तुत करने की क्षमता के कारण यह शास्त्रीय, जैज़, फिल्म और समकालीन संगीत की अनेक विधाओं में व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है।
पियानो में प्रत्येक कुंजी (key) एक छोटे हथौड़े को सक्रिय करती है, जो भीतर लगी तार पर प्रहार करके ध्वनि उत्पन्न करता है। कलाकार अपनी उँगलियों के स्पर्श, गति और लय के माध्यम से कोमल, गंभीर या ऊर्जावान भावों को सहजता से व्यक्त कर सकता है। यही कारण है कि पियानो को दुनिया के सबसे बहुआयामी वाद्यों में गिना जाता है और यह एकल प्रस्तुति से लेकर ऑर्केस्ट्रा तथा आधुनिक संगीत तक हर शैली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
पियानो की विविध अभिव्यक्तियों को समझने के लिए कुछ उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ देखी जा सकती हैं। विश्वविख्यात पियानोवादक लैंग लैंग (Lang Lang) की प्रस्तुति इस वाद्य की तकनीकी दक्षता और भावपूर्ण अभिव्यक्ति का सुंदर उदाहरण है। वहीं प्रसिद्ध जैज़ पियानोवादक हरबी हैनकॉक (Herbie Hancock) यह दिखाते हैं कि पियानो किस प्रकार तात्कालिक रचनात्मकता और लय के साथ नए संगीत का सृजन कर सकता है। भारतीय संदर्भ में ए. आर. रहमान ने पियानो और पश्चिमी संगीत संरचनाओं को भारतीय धुनों के साथ जोड़कर ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत की हैं, जिन्हें विश्वभर में सराहा गया है।
आज पियानो केवल पश्चिमी शास्त्रीय संगीत का वाद्य नहीं रह गया है, बल्कि यह दुनिया भर के संगीतकारों की रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बन चुका है। भारत में भी अनेक कलाकारों और संगीतकारों ने इसे अपनी शैली के अनुरूप अपनाया है। यदि आप पियानो की मधुरता, तकनीकी क्षमता और भावनात्मक गहराई का अनुभव करना चाहते हैं, तो ये प्रस्तुतियाँ इस वाद्य की वैश्विक लोकप्रियता और इसकी संगीत यात्रा का उत्कृष्ट परिचय देती हैं।
क्या आप हिंदू गणित को बचाने में लखनऊ विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक योगदान को जानते हैं?
महान भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि शुद्ध गणित अपने आप में तार्किक विचारों की कविता है। गणित केवल संख्याओं और गणनाओं का विषय नहीं है, बल्कि यह वह भाषा है जिससे ब्रह्मांड को समझा जा सकता है। इसका इतिहास उन प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ा है, जिन्होंने व्यापार, खगोल विज्ञान और दैनिक जीवन की समस्याओं को सुलझाने के लिए सबसे पहले संख्याओं का प्रयोग किया था। समय के साथ, इस विषय ने दर्शन, तर्कशास्त्र और विज्ञान की नींव रखी।
प्राचीन सभ्यताओं में गणित की शुरुआत कैसे हुई? गणित का इतिहास हज़ारों साल पुराना है। आधुनिक युग से बहुत पहले, लगभग 3000 ईसा पूर्व में, सुमेर, अक्कद, असीरिया और प्राचीन मिस्र जैसी मेसोपोटामियाई (Mesopotamian) सभ्यताओं ने कराधान, वाणिज्य, व्यापार और खगोलीय रिकॉर्ड रखने के लिए अंकगणित, बीजगणित और ज्यामिति का उपयोग करना शुरू कर दिया था। मेसोपोटामिया और मिस्र से प्राप्त सबसे पुराने ज्ञात गणितीय ग्रंथों में बेबीलोनियन 'प्लिम्पटन 322' (Babylonian ‘Plimpton 322’), मिस्र का 'राइंड मैथमेटिकल पेपिरस' (The Rhind Mathematical Papyrus) और 'मास्को मैथमेटिकल पेपिरस' (The Moscow Mathematical Papyrus) शामिल हैं। इन ग्रंथों में पाइथागोरस ट्रिपल्स (Pythagorean Triples) का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि बुनियादी अंकगणित के बाद पाइथागोरस प्रमेय गणित के सबसे पुराने विकासों में से एक था।
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में, प्राचीन यूनानियों ने गणित को एक दार्शनिक और प्रदर्शनकारी अनुशासन के रूप में खड़ा किया। पाइथागोरस ने ज्यामिति की नींव रखी। लगभग 300 ईसा पूर्व में यूक्लिड ने 'एलिमेंट्स' नामक ग्रंथ का संकलन किया, जो दो हज़ार से अधिक वर्षों तक गणित का मानक पाठ्यपुस्तक बना रहा। यूक्लिड को ज्यामिति का पिता भी कहा जाता है। इसी तरह आर्किमिडीज़ (Archimedes) ने भौतिकी और इंटीग्रल कैलकुलस (Integral Calculus) में महान योगदान दिया।
वेदों और प्राचीन भारत में गणित का विकास कैसे हुआ? भारत में गणित की जड़ें 1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व तक फैले वैदिक काल और उससे भी पहले सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2600 ईसा पूर्व) तक जाती हैं। सिंधु घाटी के लोग व्यापार और निर्माण के लिए बुनियादी संख्याओं और आकारों का उपयोग करते थे। भारत के प्राचीन ज्ञान के स्रोत वेदों में गणितीय सिद्धांतों की गहरी समझ मिलती है। ऋग्वेद में खरबों तक की बड़ी संख्याओं की अवधारणा मौजूद है। यजुर्वेद में ज्यामितीय आकारों, वृत्त की परिधि, वर्ग के विकर्ण और यहां तक कि पाई के मान का भी संदर्भ मिलता है। अथर्ववेद में जोड़, घटाव, गुणा और भाग जैसी गणितीय संक्रियाओं के तरीके शामिल हैं, जिनका उपयोग वैदिक अनुष्ठानों में किया जाता था। शुल्ब सूत्र, जो वेदों के परिशिष्ट हैं, अनुष्ठानों के लिए वेदियों के निर्माण हेतु सटीक ज्यामितीय माप प्रदान करते हैं।
भारतीय गणितज्ञों ने दुनिया को क्या सिखाया? आधुनिक गणितीय प्रणाली, जिसका हम आज उपयोग करते हैं, उसकी उत्पत्ति प्राचीन भारत में हुई थी। 5वीं शताब्दी में महान भारतीय गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने 'शून्य' की क्रांतिकारी अवधारणा पेश की। अपनी प्रसिद्ध कृति 'आर्यभटीय' में उन्होंने शून्य के लिए एक प्रतीक पेश किया जिसे उन्होंने 'शून्य' कहा जिसका अर्थ था 'खाली'। शून्य के बिना बड़ी संख्याओं को लिखना और समझना असंभव था। आर्यभट्ट ने खगोल विज्ञान और त्रिकोणमिति में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
7वीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त ने गणित में बड़ा बदलाव किया। उन्होंने अपने ग्रंथ 'ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त' में शून्य और ऋणात्मक संख्याओं सहित अंकगणितीय संक्रियाओं के नियम दिए और द्विघात समीकरणों को हल करना सिखाया। मध्ययुगीन काल में, 14वीं से 16वीं शताब्दी के बीच, केरल स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी ने त्रिकोणमिति, बीजगणित और कैलकुलस में उल्लेखनीय प्रगति की। उन्होंने अनंत श्रृंखलाओं के लिए अग्रणी योगदान दिया जिसने आधुनिक कैलकुलस के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आधुनिक युग में, श्रीनिवास रामानुजन जैसे गणितज्ञों ने दुनिया को हैरान कर दिया। रामानुजन ने संख्या सिद्धांत और अनंत श्रृंखलाओं में ऐसे सूत्र दिए जो आज भी दुनिया भर के गणितज्ञों के लिए शोध का विषय हैं। शकुंतला देवी, जिन्हें 'ह्यूमन कंप्यूटर' के नाम से जाना जाता है, ने अपनी अद्भुत मानसिक गणना क्षमताओं से अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की।
वैश्विक स्तर पर आधुनिक गणित ने कैसे आकार लिया? 8वीं से 14वीं शताब्दी के इस्लामी स्वर्ण युग के दौरान, अल-ख्वाज़िमी और इब्न अल-हयथम जैसे गणितज्ञों ने उत्कृष्ट योगदान दिया। अल-ख्वाज़िमी को बीजगणित का पिता माना जाता है। यूरोप में पुनर्जागरण काल के दौरान लियोनार्डो पिसानो (Leonardo Pisano), जिन्हें फाइबोनैचि (Fibonacci) के नाम से जाना जाता है, ने यूरोप में हिंदू-अरबी अंक प्रणाली की शुरुआत की, जिसने गणनाओं में क्रांति ला दी। इसी दौर में जोहान्स केप्लर (Johannes Kepler) ने ग्रहीय गति के नियम दिए। कला के लिए मशहूर लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci) ने भी ज्यामिति और अनुपात पर काम किया।
17वीं शताब्दी में आइजैक न्यूटन और गॉटफ्रीड विल्हेम लाइबनिज़ (Gottfried Wilhelm Leibniz) ने स्वतंत्र रूप से कैलकुलस का विकास किया। न्यूटन के गति और सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण के नियमों ने शास्त्रीय यांत्रिकी को नया रूप दिया। 18वीं और 19वीं शताब्दी में लियोनहार्ड यूलर (Leonhard Euler) और कार्ल फ्रेडरिक गॉस (Carl Friedrich Gauss) जैसे दूरदर्शी गणितज्ञ सामने आए। गॉस ने संख्या सिद्धांत और सांख्यिकी में बड़ा योगदान दिया। 19वीं और 20वीं सदी में जॉर्ज कैंटर (Georg Cantor) ने सेट थ्योरी पेश की, अल्बर्ट आइंस्टीन ने सापेक्षता का सिद्धांत दिया, मैरी कार्टराइट (Mary Cartwright) ने नॉन-लीनियर डिफरेंशियल समीकरणों पर काम किया और एंड्रयू विल्स (Andrew Wiles) ने फर्मा की अंतिम प्रमेय को सिद्ध किया।
'प्रिंसिपिया मैथेमेटिका' ने गणितीय तर्कशास्त्र को कैसे बदला? गणित और तर्कशास्त्र के दर्शन में 'प्रिंसिपिया मैथेमेटिका' (Principia Mathematica) एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्मारकीय ग्रंथ है। इसे ब्रिटिश दार्शनिकों बर्ट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) और अल्फ्रेड नॉर्थ व्हाइटहेड (Alfred North Whitehead) द्वारा लिखा गया था और 1910 से 1913 के बीच तीन खंडों में प्रकाशित किया गया। इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य गणित की तार्किक नींव को उजागर करना था। इसे 'लॉजिज़्म' (Logism) कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि गणित को पूरी तरह से शुद्ध तर्क के आधार पर सिद्ध किया जा सकता है।
रसेल ने अपनी पिछली पुस्तक 'द प्रिंसिपल्स ऑफ मैथमेटिक्स' (The Principles of Mathematics) में तर्क दिया था कि संपूर्ण गणित को कुछ सरल स्वयंसिद्धों से प्राप्त किया जा सकता है, जो संख्या जैसी गणितीय धारणाओं के बजाय विशुद्ध रूप से तार्किक धारणाओं तक सीमित हों। बाद में रसेल को पता चला कि जर्मन गणितज्ञ गॉटलोब फ्रेगे (Gottlob Frege) ने अपनी पुस्तक 'द फाउंडेशंस ऑफ अरिथमेटिक' (The Foundations of Arithmetic) में उनसे पहले ही ऐसी कई खोजें कर ली थीं।
वर्ष 1901 में रसेल ने तर्क प्रणाली के केंद्र में एक विरोधाभास की खोज की, जिसे अब ‘रसेल्स पैराडॉक्स’ (Russell's Paradox) के रूप में जाना जाता है। यह विरोधाभास तब उत्पन्न होता है जब हम उन सभी वर्गों का एक वर्ग बनाते हैं जो स्वयं के सदस्य नहीं हैं। यदि हम पूछें कि क्या यह वर्ग स्वयं का सदस्य है, तो एक विरोधाभास पैदा होता है। यदि यह है, तो यह नहीं है, और यदि यह नहीं है, तो यह है। यह वैसा ही है जैसे किसी गांव के नाई को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जाए जो उन सभी की दाढ़ी बनाता है जो खुद अपनी दाढ़ी नहीं बनाते। अब सवाल यह है कि क्या नाई खुद अपनी दाढ़ी बनाता है?
इस विरोधाभास को दूर करने के लिए, रसेल ने 'थ्योरी ऑफ टाइप्स' (Theory of Types) की अवधारणा पेश की। इसमें रसेल और व्हाइटहेड ने 'एक्सिओम ऑफ रिड्यूसिबिलिटी' (Axiom of Reducibility) और 'एक्सिओम ऑफ इन्फिनिटी' (Axiom of Infinity) जैसे विशेष स्वयंसिद्धों को शामिल किया। यद्यपि यह सिद्धांत बहुत जटिल था, लेकिन इसने गणितीय तर्कशास्त्र और गणित के दर्शन के विकास पर अत्यधिक प्रभाव डाला। दर्शनशास्त्र में इस पुस्तक का सबसे बड़ा प्रभाव रसेल की 'थ्योरी ऑफ डिस्क्रिप्शंस' (Theory of Descriptions) के माध्यम से पड़ा, जिसने सामान्य भाषा की व्याकरणिक संरचनाओं और तार्किक रूपों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। ऑस्ट्रियाई गणितज्ञ कर्ट गोडेल (Kurt Gödel) का अपूर्णता प्रमेय भी इसी ग्रंथ के अध्ययन का परिणाम था।
हिंदू गणित के संरक्षण में लखनऊ विश्वविद्यालय की क्या भूमिका है? गणित के क्षेत्र में विशेष रूप से 'हिंदू गणित' के संवर्धन में लखनऊ विश्वविद्यालय के गणित और खगोल विज्ञान विभाग का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। यह विभाग 1921 में तब अस्तित्व में आया जब तत्कालीन कैनिंग कॉलेज (Canning College) को नवगठित लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा अपने अधिकार में लिया गया था। शुरुआती दौर में प्रोफ़ेसर जे.ए. स्ट्रैंग (J. A. Strang) के नेतृत्व में विभाग ने अपने पाठ्यक्रमों को मजबूत किया।
लगभग एक दशक बाद, विभाग के अगले प्रमुख प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह ने अपने गहन पाण्डित्य और योजना के साथ 1939 में 'हिंदू गणित' पर शोध के लिए एक विशेष अनुभाग शुरू किया। यह उत्तरी भारत में अपनी तरह का एकमात्र केंद्र था, जिसे बाद में 1950 में 'भारत गणित परिषद' का नाम दिया गया। प्रोफ़ेसर सिंह का मानना था कि प्राचीन हिंदू गणितज्ञों की उपलब्धियों को दुनिया के सामने लाने के लिए अज्ञात पांडुलिपियों पर व्यापक शोध आवश्यक है। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर बी.बी. दत्ता के साथ मिलकर 1935 में 'हिस्ट्री ऑफ हिंदू मैथमेटिक्स' नामक दो खंडों वाली पुस्तक लिखी, जिसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली और आज भी इसे एक प्रामाणिक स्रोत पुस्तक माना जाता है।
लखनऊ विश्वविद्यालय
वर्ष 1939 में, उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंदू गणित और खगोल विज्ञान से संबंधित पुराने ग्रंथों को एकत्र करने, संपादित करने, अनुवाद करने और उनकी व्याख्या करने के उद्देश्य से प्रोफ़ेसर सिंह के अधीन एक शोध योजना को मंजूरी दी। भारत भर से, राजस्थान, बंगाल, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, नेपाल और यहां तक कि लंदन के इंडिया ऑफिस से दुर्लभ पांडुलिपियां खोजी गईं। प्रोफ़ेसर सिंह ने स्वयं 58 पांडुलिपियों की प्रतियां प्राप्त कीं। 1947 में उन्होंने लघु भास्करीय और पाटीगणित के अंग्रेजी अनुवाद के साथ व्याख्यात्मक संस्करण प्रकाशित किए।
विभाग ने बुनियादी ढांचे में भी ऐतिहासिक विकास किया। 1949 में खगोल विज्ञान के शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए भारत के पहले प्लैनेटेरियम (Planetarium) का निर्माण इसी विभाग में पूरा किया गया था। 1950 में प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह ने विज्ञान संकाय के डीन के रूप में विभाग के वर्तमान भवन का निर्माण कराया। 1954 में प्रोफ़ेसर राम वल्लभ ने विभागाध्यक्ष का पदभार संभाला और 1956 में सांख्यिकी अनुभाग के लिए एक नया ब्लॉक बनवाया। आज विभाग की कंप्यूटर लैब का नाम प्रोफ़ेसर राम वल्लभ के नाम पर और विशाल पुस्तकालय का नाम प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह के नाम पर है।
प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह के निधन के बाद, उनके सच्चे उत्तराधिकारी प्रोफ़ेसर के.एस. शुक्ला ने उनके अधूरे काम को आगे बढ़ाया और मार्कंडेय मिश्रा जैसे विद्वानों की मदद से सूर्य सिद्धांत, महा भास्करीय और कर्ण-रत्न जैसी पांडुलिपियों को अंग्रेजी अनुवाद और टिप्पणियों के साथ प्रकाशित किया। विभाग ने प्रोफ़ेसर आर.पी. अग्रवाल, प्रोफ़ेसर एम.डी. उपाध्याय और कई अन्य महान शिक्षाविदों के नेतृत्व में निरंतर प्रगति की है। आज भी यह विभाग प्राचीन भारतीय गणितीय विरासत को सहेजने और आधुनिक गणित के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित करने का कार्य पूरी निष्ठा के साथ कर रहा है।
कैसे बेगम हज़रत महल ने हिंदू-मुस्लिम एकता से 1857 में अंग्रेजों को दी थी मात?
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास कई शूरवीरों और वीरांगनाओं के अदम्य साहस से भरा पड़ा है। जब भी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का ज़िक्र होता है, तो उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और अवध की शान, बेगम हज़रत महल का नाम बड़े ही गर्व और सम्मान के साथ लिया जाता है। जिस समय ब्रिटिश हुकूमत पूरे भारत को अपने अधीन करने का क्रूर खेल खेल रही थी, उस समय लखनऊ की इस वीरांगना ने न केवल अंग्रेजों की सत्ता को खुली चुनौती दी, बल्कि महीनों तक उन्हें लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर दिया।
बेगम हज़रत महल का प्रारंभिक जीवन और अवध के दरबार तक का सफर कैसा था? बेगम हज़रत महल का जन्म वर्ष 1820 के आसपास अवध राज्य की तत्कालीन राजधानी फैज़ाबाद में हुआ था। बचपन में उनका नाम मोहम्मदी खानम था। जीवन के शुरुआती दिन बेहद संघर्षपूर्ण रहे, जब उन्हें उनके माता-पिता द्वारा बेच दिया गया और उन्होंने एक तवायफ के रूप में अपना जीवन शुरू किया। शाही प्रतिनिधियों (agents) द्वारा खरीदे जाने के बाद, उन्होंने शाही हरम में एक 'ख्वासीन' (Khawasin) के रूप में प्रवेश किया और बाद में उन्हें ‘परी’ का दर्जा मिला।
अपनी बुद्धिमत्ता, सौंदर्य और कला के दम पर उन्होंने अवध के अंतिम ताजदार, नवाब वाजिद अली शाह (Wajid Ali Shah) का दिल जीत लिया। नवाब ने उन्हें अपनी शाही उपपत्नी के रूप में स्वीकार किया और वह उनकी छोटी बेगम बन गईं। जब उन्होंने नवाब के बेटे बिरजिस क़द्र (Birjis Qadr) को जन्म दिया, तब उन्हें आधिकारिक तौर पर 'हज़रत महल' की उपाधि से नवाज़ा गया।
अंग्रेजों द्वारा अवध का अधिग्रहण और बेगम का नेतृत्व कैसे शुरू हुआ? ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) की विस्तारवादी नीतियों के चलते, वर्ष 1856 में अंग्रेजों ने कुशासन का झूठा आरोप लगाकर अवध का अधिग्रहण कर लिया। उन्होंने नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता (Calcutta) निर्वासित कर दिया। अंग्रेजों को लगा था कि नवाब के जाने के बाद अवध आसानी से उनके कब्ज़े में आ जाएगा, लेकिन वे बेगम हज़रत महल के साहस से अनजान थे।
बेगम ने कलकत्ता जाने से इनकार कर दिया और अपने बेटे के साथ लखनऊ में ही डटी रहीं। जैसे ही 1857 में मेरठ से बगावत की चिंगारी उठी और स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ, बेगम हज़रत महल ने राजा जयलाल सिंह और राजा हनुमंत सिंह जैसे स्थानीय नेताओं और विद्रोहियों के साथ मिलकर लखनऊ पर नियंत्रण कर लिया। 5 जुलाई 1857 को उन्होंने अपने नाबालिग बेटे, राजकुमार बिरजिस क़द्र को अवध का शासक (वली) घोषित कर दिया और खुद राजमाता (Regent) के रूप में सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली।
अंग्रेजों की धार्मिक नीतियों के खिलाफ बेगम का घोषणापत्र क्या था? बेगम हज़रत महल केवल एक सैन्य नेता नहीं थीं, बल्कि वे एक गहरी राजनीतिक समझ रखने वाली शासिका भी थीं। उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सड़कें बनाने के बहाने अंधाधुंध हिंदू मंदिरों और मुस्लिम मस्जिदों को तोड़ा था। विद्रोह के अंतिम दिनों में जारी किए गए एक ऐतिहासिक घोषणापत्र में, बेगम ने अंग्रेजों द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता देने के दावों का कड़ा मज़ाक उड़ाया था।
उन्होंने लिखा था: "सूअर का मांस खाना और शराब पीना, चर्बी वाले कारतूसों को काटना और मिठाइयों में सूअर की चर्बी मिलाना, सड़कें बनाने के बहाने हिंदू और मुसलमानों के मंदिरों और मस्जिदों को नष्ट करना, चर्च बनाना, ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए पादरियों को सड़कों पर भेजना... इन सबके बावजूद लोग कैसे विश्वास कर सकते हैं कि उनके धर्म में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा?" इस वैचारिक स्पष्टता ने हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के सैनिकों और आम जनता को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट कर दिया।
लखनऊ रेजीडेंसी की घेराबंदी (Siege of Lucknow Residency) के खूनी संघर्ष में क्या हुआ? 1857 के मध्य में, लखनऊ में स्थित ब्रिटिश मुख्यालय, जिसे रेजीडेंसी कहा जाता था, संघर्ष का मुख्य केंद्र बन गया। 30 जून 1857 को बेगम की विद्रोही सेना, जिसकी संख्या 10,000 से अधिक थी, ने सर हेनरी लॉरेंस (Sir Henry Lawrence) के नेतृत्व वाली एक छोटी ब्रिटिश सेना को रेजीडेंसी के भीतर घेर लिया। 4 जुलाई को लॉरेंस एक गोलाबारी में मारा गया।
रेजीडेंसी के भीतर लगभग 3,000 लोग (अंग्रेज अधिकारी, महिलाएं, बच्चे और कुछ वफादार भारतीय सैनिक) फंसे हुए थे। मृत्यु, बीमारी और भूख ने ब्रिटिश खेमे का मनोबल तोड़ दिया था। बेगम हज़रत महल के निर्देश पर विद्रोही सेना लगातार हमले कर रही थी। सितंबर में सर हेनरी हैवलॉक (Sir Henry Havelock) के नेतृत्व में एक ब्रिटिश राहत दल वहां पहुंचा, लेकिन वह भी भारी विद्रोही हमलों के कारण रेजीडेंसी के भीतर ही फंस गया।
महीनों की कड़ी घेराबंदी के बाद, अंततः नवंबर 1857 में सर कॉलिन कैंपबेल (Sir Colin Campbell) के नेतृत्व में एक विशाल ब्रिटिश सेना ने रेजीडेंसी पर हमला किया और घेराबंदी को तोड़ने में सफलता प्राप्त की। भारी रक्तपात और हजारों भारतीय योद्धाओं के बलिदान के बाद अंग्रेजों ने फिर से लखनऊ पर अपना कब्ज़ा जमा लिया।
बेगम का निर्वासन और आज के भारत में उनकी विरासत क्या है? जब अंग्रेजों ने लखनऊ और अवध के अधिकांश हिस्सों पर फिर से कब्ज़ा कर लिया, तो बेगम हज़रत महल को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। नाना साहब और फैज़ाबाद के मौलवी के साथ मिलकर उन्होंने शाहजहांपुर में भी हमले किए, लेकिन अंततः ब्रिटिश सैन्य ताकत के सामने उन्हें भारत छोड़ना पड़ा।
उन्होंने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण करने से साफ इनकार कर दिया और नेपाल में शरण मांगी। शुरुआत में नेपाल के प्रधानमंत्री जंग बहादुर ने उन्हें शरण देने से मना कर दिया, लेकिन बाद में उन्हें वहां रहने की अनुमति मिल गई। 7 अप्रैल 1879 को काठमांडू में उनका निधन हो गया और उन्हें वहीं जामा मस्जिद के पास सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।
आज भी भारत बेगम हज़रत महल के इस बलिदान को नहीं भूला है। 15 अगस्त 1962 को लखनऊ के हज़रतगंज में ओल्ड विक्टोरिया पार्क (Old Victoria Park) का नाम बदलकर उनके सम्मान में 'बेगम हज़रत महल पार्क' रखा गया। 10 मई 1984 को भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। आज बेगम हज़रत महल का नाम केवल अवध के इतिहास में नहीं, बल्कि भारत की आज़ादी की उस अमर गाथा में दर्ज है, जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा देशभक्ति की प्रेरणा देती रहेगी।
तकनीक और सुरक्षा को देखते हुए, क्या रहा है हस्त-बंदूकों के क्रमिक विकास का इतिहास?
लखनऊ, क्या आप जानते हैं कि पिस्तौल (Pistol) का आविष्कार 1800 के दशक की शुरुआत में हुआ था? इसी दशक के अंत में, आधुनिक पिस्तौल ने भी आकार लेना शुरू किया था। साथ ही, 1836 में पहली व्यावहारिक रिवॉल्वर (Revolver) उत्पादन में आई। इसमें एक एकल और स्थिर बैरल, अर्थात बंदूक नली के साथ संरेखित पांच चेंबर वाले, एक घूमने वाले सिलेंडर का उपयोग किया गया था। हालांकि, इस प्रकार के हथियार की पहले भी कुछ पुनरावृत्तियां थीं, रिवॉल्वर, सिंगल-एक्शन या डबल-एक्शन वाली पहली हस्त-बंदूक थी। बाद में, 1857 में धातु कारतूस युग की शुरुआत होने पर, रिम फायर (Rim fire) कारतूस का उपयोग करने वाली पहली सफल रिवॉल्वर पेश की गई। हालांकि, रिवॉल्वर का वास्तविक युग तब शुरू हुआ, जब पिस्तौल निर्माता रिवॉल्वर का उत्पादन कर सकते थे। इसमें वे धुआं रहित बंदूक पाउडर के साथ कारतूस का उपयोग करते थे, और बाद में, बैलिस्टिक में सुधार करते थे।
1883 में जब रिकॉइल (Recoil) संचालित मशीन गन का आविष्कार हुआ, तो बंदूक निर्माता छोटे अस्त्र विकसित करने की होड़ में थे। पिछली सदी में, बंदूक प्रौद्योगिकी में होने वाले बदलाव धीमे हो गए हैं। अब, पिस्तौल में मजबूत अनुसंधान और विकास के माध्यम से नवाचार देखे जा सकते हैं, जो इसकी डिजाइन में परिवर्तन लाते हैं। धुआं रहित पाउडर, स्ट्राइकर-फायर्ड एक्शन (Striker-fired action) और पॉलिमर ग्रिप्स (Polymer grips) जैसे उन्नत विनिर्माण विकास ने पिस्तौल के विकास को सटीकता, वजन, मारक क्षमता, पहुंच और सुरक्षा के मामले में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।
एक आधुनिक रिवॉल्वर में, कारतूसों को छह चेंबर्स में लोड किया जाता है, जिनमें से प्रत्येक को बंदूक की बैरल के सामने रखा जा सकता है। एबैरल के साथ संरेखित किया गया एक स्प्रिंग वाला बंदूक प्रहारक, सिलेंडर की दूसरी तरफ स्थित होता है। बैरल के अंदर, कुछ पेंचदार खांचे बने होते हैं, जो गोली को स्थिरता देते हैं। लंबी बैरल, गोली की स्थिरता में सुधार करती है, क्योंकि यह उसे अधिक समय तक घुमाती है। बैरल की लंबाई से गोली की गति भी बढ़ जाती है, क्योंकि लंबे समय तक गैस का दबाव गोली की गति को तेज करता है। आधुनिक रिवॉल्वर में, ट्रिगर खींचने से बंदूक प्रहारक पीछे की ओर जाकर, छूट जाता है।
दरअसल, प्रत्येक शॉट में, कुछ क्रमिक घटनाएं होती हैं। सबसे पहले, ट्रिगर, बंदूक प्रहारक को पीछे की ओर धकेलता है। जब यह पीछे की ओर बढ़ता है, तो बंदूक हैंडल में स्थित एक धातु स्प्रिंग को संपीड़ित करता है। उसी समय, ट्रिगर से जुड़ा एक भाग सिलेंडर को घुमाने के लिए लीवर (Lever) पर दबाव डालता है। यह सिलेंडर के चेंबर को बंदूक बैरल के सामने संरेखित करता है। फिर, जब ट्रिगर को पूरी तरह से पीछे धकेला जाता है, तो यह बंदूक प्रहारक को छोड़ देता है। इसके परिणामस्वरूप, संपीड़ित स्प्रिंग बंदूक प्रहारक को आगे की ओर चलाती है। इस पर लगी फायरिंग पिन (Pin), बंदूक से होकर गुजरती है, और प्राइमर से टकराती है। इससे प्राइमर फट जाता है, जिससे प्रोपेलेंट प्रज्वलित होता है। इससे बड़ी मात्रा में गैस निकलती है। गैस का दबाव गोली को बैरल के नीचे धकेलता है। गैस के दबाव के कारण, कारतूस केस भी फैल जाता है। बाद में, बंदूक को फिर से लोड करने के लिए, अलग-अलग कारतूसों को चेंबर्स में रखा जा सकता है, या स्पीड लोडर (Speed loader) में एक साथ छह कारतूस लोड किए जा सकते हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध में रडार, जेट इंजन और बैलिस्टिक मिसाइलों अस्त्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पांच प्रमुख लड़ाकू देशों में से चार देशों – अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और सोवियत संघ ने अपने सैनिकों को महत्वपूर्ण संख्या में पुरानी रिवॉल्वर जारी की थी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उन रिवॉल्वरों से लैस कई सैनिक, उनकी मदद से ही जीवित बच पाए।
द्वितीय विश्व युद्ध में, हस्त–बंदूक के उद्देश्य रक्षात्मक थे। पिस्तौलें, युद्ध के लिए एक महत्वपूर्ण हथियार नहीं थीं, लेकिन वे अंतिम उपाय के रूप में सैनिकों की रक्षा करती थीं। हालांकि, प्रथम विश्व युद्ध के लिए मशीनगनें (Machine guns) अत्यंत महत्वपूर्ण थीं। इस युद्ध के पहले भी, ऐसे हथियारों का उपयोग करने का प्रयास किया गया था। लेकिन, विरोधी सैनिकों को इतनी बड़ी क्षमता में कभी भी ऐसे हथियारों का उपयोग नहीं करना पड़ा। और तो और, मशीनगनें वहनीय थीं, जिससे सैनिक उन्हें अपनी इच्छानुसार प्रयुक्त कर सकते थे। इसके अलावा, मशीन गनों वाले सैनिकों को युद्ध के मैदान के किनारों पर तैनात किया जाता है, जो इससे लगातार होने वाली गोलाबारी से आने वाले दुश्मन को हानि पहुंचाते थें।
इसके अलावा, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्लेमथ्रोवर (Flamethrower) हथियार का भी उपयोग किया गया था। वे युद्ध के दौरान उपयोग किए जाने वाले सबसे खतरनाक हथियारों में से कुछ थे, क्योंकि इससे फ़ौरन आग निकलती थी। वे न केवल विरोधी सैनिकों के झुंड को मार सकते थे, बल्कि हथियार चलाने वाले सैनिक के लिए भी बड़ा खतरा पैदा करते थे। दूसरी तरफ, हथगोले इस समय के सबसे तकनीकी रूप से उन्नत हथियारों में से कुछ थे।
जैसा कि हमने ऊपर पढ़ा हैं, 1883 में रिकॉइल-संचालित मशीन गन के आविष्कार के बाद, बंदूक निर्माता हस्त–बंदूक के सिद्धांतों का उपयोग करके कुछ छोटे अस्त्र विकसित करने की होड़ में थे। अर्ध-स्वचालित ब्लोबैक पिस्तौल (Blowback pistol) के पहले दो पेटेंट (Patents) ऑस्ट्रिया (Austria) देश से आए थे। परंतु, 1896 तक पहली बड़े पैमाने पर उत्पादित और व्यावसायिक रूप से सफल अर्ध-स्वचालित पिस्तौल पेश नहीं की गई थी। पॉल माउज़र (Paul Mauser) द्वारा डिज़ाइन की गई - माउज़र सी96, युद्ध में बड़े पैमाने पर उपयोग की जाने वाली पहली स्व-लोडिंग पिस्तौल में से एक थी। सी96 के बाद, श्वार्ज़लोज़ मॉडल 1898 (Schwarzlose Model 1898) प्रचलित हुआ, जो एक अर्ध-स्वचालित पिस्तौल थी। इसे तत्कालीन समय में सबसे उन्नत कहा जाता था, लेकिन इसे कभी भी व्यापक रूप से नहीं अपनाया गया। 1898 में, आधुनिक पिस्तौल जैसी दिखने वाली एक पिस्तौल का उत्पादन शुरू हुआ। यह एक लॉक-ब्रीच एक्शन (Locked-breech action) हथियार था, जिसका उपयोग आमतौर पर अधिकांश आधुनिक बड़ी अर्ध-स्वचालित पिस्तौल में किया जाता है।
पिस्तौल के इतिहास में एक उल्लेखनीय विकास, स्ट्राइकर-फायर वाली पिस्तौल है। स्ट्राइकर-फायर वाली पिस्तौल में कोई बाहरी बंदूक प्रहारक या फायरिंग पिन नहीं होती है। फिर भी, यह दशकों से लोकप्रियता हासिल कर रही हैं। बिना बंदूक प्रहारक वाली बंदूकों की तकनीक की शुरूआत से, पिस्तौल की सुरक्षा, फायरिंग दर और सटीकता में काफी सुधार हुआ है।
पढ़ते हैं, अरुणाचल प्रदेश के मोनपा समुदाय की अनूठी कागज़ निर्माण कला, मोन शुगु के बारे में
लखनऊ, क्या आप जानते हैं कि कागज का इतिहास मिस्र की प्राचीन सभ्यताओं में, लगभग 3000 ईसा पूर्व से पपैरस (Papyrus) से शुरू होता है। पहले यह पपैरस पौधे के रेशों से बना एक पत्र था। यह प्रारंभिक कागज पुनर्नवीनीकरण योग्य था, और इस पर कई बार लिखा जा सकता था। प्राचीन चीन में कागज बनाने का एक अन्य रूप, जिसमें पुनर्चक्रण भी शामिल था, 105 ईस्वी में विकसित किया गया था। इस प्रक्रिया में शहतूत के पेड़, कपड़े के पुराने टुकड़े और मछली पकड़ने के जाल का उपयोग करके, चीन ने संसाधनों के टिकाऊ उपयोग के लिए एक प्रारंभिक दृष्टिकोण का प्रदर्शन किया था।
इसी तरह, जापान में भी कागज बनाने के लिए शहतूत के पेड़ों की छाल का उपयोग किया जाता था, जो पुनः एक टिकाऊ दृष्टिकोण था। फिर, कागज़ की प्रौद्योगिकी लगभग 750 ईसा पूर्व में, संभवतः वर्तमान उज्बेकिस्तान के समरकंद तक पहुंची। इसने विशेष रूप से अरब दुनिया में, ज्ञान और संस्कृति के प्रसार में निर्णायक भूमिका निभाई।
कागज का उत्पादन, 1109 में यूरोप पहुंचा। तब हेंप (Hemp), फ्लैक्स (Flax) और नेटल्स (Nettles) जैसे कच्चे माल यूरोपीय कागज उत्पादन के महत्वपूर्ण घटक बन गए। दूसरी ओर, स्विट्जरलैंड ने कागज उत्पादन के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहां से बेसल कागज (Basel paper) पूरे यूरोप में तेजी से फैल गया।
1450 में जोहान्स गुटेनबर्ग (Johannes Gutenberg) द्वारा प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार ने, जनसंचार माध्यमों के युग की शुरुआत को चिह्नित किया, जिसने ज्ञान और संस्कृति के व्यापक प्रसार को सक्षम किया। अठारहवीं शताब्दी में कच्चे माल के संकट के कारण, लकड़ी से बने कागज का विकास हुआ, जिसने कागज उद्योग में क्रांति ला दी। इससे संसाधनों के अधिक टिकाऊ उपयोग को बढ़ावा मिला। इसी कड़ी में, 1989 में पहला क्लोरीन-मुक्त कॉपी पेपर तैयार किया गया, जो कागज उत्पादन को अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाने के प्रयासों में एक मील का पत्थर था।
दरअसल, कागज बनाने की प्रक्रिया सदियों से वही रही है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में, बड़े पैमाने पर कागज उत्पादन के लिए लकड़ी के रेशे ही मुख्य कच्चा माल बन गए हैं। लकड़ी का उपयोग करने का मुख्य लाभ यह है कि, यह एक प्राकृतिक नवीकरणीय संसाधन है। लकड़ी के उपयोग के अन्य लाभों में इसकी आंतरिक ताकत, प्रति इकाई लंबाई, वजन और कम लागत पर उपलब्धता शामिल है। नया कागज बनाने के लिए, पुनर्चक्रित या बेकार कागज का भी उपयोग किया जा सकता है।
किसी लुगदी मिल में, लकड़ी से यांत्रिक रेशे पाने के लिए लट्ठों को पीसा जाता है, या रासायनिक लुगदी के लिए लकड़ी के टुकड़ों को संसाधित किया जाता है। इससे बनी यांत्रिक लुगदी का उपयोग अखबारी कागज, विशेष कागजात, टिशू, पेपरबोर्ड और वॉलबोर्ड के लिए किया जाता है। जबकि रासायनिक लुगदी से बने, और मुद्रण के लिए चिकनी सतह पाने हेतु बनाए गए कागज को ‘महीन कागज’ कहा जाता है। इसका उपयोग कैलेंडर, कॉफी टेबल बुक, पत्रिकाओं और व्यावसायिक रिपोर्टों के उत्पादन में किया जाता है।
इसके विपरीत, पुनर्चक्रित पल्पिंग प्रक्रिया में समाचार पत्रों, कार्डबोर्ड बक्से और पत्रिकाओं से स्याही हटाई जाती है, और उसे संशोधित किया जाता है। इस तरह से बनाए गए कागज के अंतिम उपयोग में, डिब्बों और बक्सों में रूपांतरण के लिए लाइनरबोर्ड (Linerboard) और फ़्लूटिंग (Fluting) शामिल हैं।
कागज बनाने की संस्कृति में हमारा भारत देश भी पीछे नहीं है। अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक महत्व के साथ, अरुणाचल प्रदेश कई देशज समुदायों का घर है, जिनमें से प्रत्येक समुदाय की अपनी अनूठी परंपराएं और प्रथाएं हैं। ऐसा ही एक समुदाय ‘मोनपा’ है, जो मुख्य रूप से इस राज्य के तवांग और पश्चिम कामेंग जिलों में रहता है। अपनी जीवंत संस्कृति और जटिल शिल्प कौशल के लिए प्रख्यात मोनपा लोग, विशेष रूप से कागज बनाने की प्राचीन कला के लिए प्रसिद्ध हैं। यह 1,000 साल से अधिक पुरानी परंपरा है, जो विलुप्त होने के कगार पर थी। लेकिन, हाल ही में इसे पुनर्जीवित किया गया है। मोनपा हस्तनिर्मित कागज को पारंपरिक रूप से ‘मोन शुगु’ कहा जाता है। यह इस क्षेत्र के इतिहास, संस्कृति और लोगों की स्थायी भावना का एक प्रमाण है। यह कागज, मूल रूप से मोनपा जनजाति द्वारा ‘शुगु शेंग’ नामक एक स्थानीय पेड़ की छाल से तैयार किया जाता है, जो तवांग क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इस कागज का उपयोग न केवल रोजमर्रा के उद्देश्यों के लिए, बल्कि पवित्र बौद्ध धर्मग्रंथों और भजनों को लिखने के लिए भी किया जाता है। यह तवांग और अन्य बौद्ध समुदायों के लोगों के लिए, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है, जो उनके अनुष्ठानों का एक अभिन्न अंग है।
इस हस्तनिर्मित कागज को बनाने की प्रक्रिया जैविक है, और इसमें कोई रासायनिक योजक नहीं है। सबसे पहले, शुगु शेंग पेड़ की छाल को काटा जाता है, और उसे सुखाया जाता है। फिर, इसे राख के घोल में उबाला जाता है, और फिर इसका गूदा बनाया जाता है। फिर इस गूदे को सांचे में फैलाया जाता है, और कागज बनाने के लिए सुखाया जाता है। परिणामी कागज, टिकाऊ एवं मजबूत होता है।
एक समय में, मोनपा हस्तनिर्मित कागज निर्माण कला तवांग के हर स्थानीय परिवार के लिए आजीविका का एक स्रोत थी। हालांकि समय के साथ, जैसे ही चीन और अन्य देशों से बड़े पैमाने पर उत्पादित कागजों की बाजार में आपूर्ति हुई, मोनपा कागज उद्योग में गिरावट शुरू हो गई। बीसवीं सदी के अंत तक, यह प्राचीन शिल्प विलुप्त होने की कगार पर था, और केवल कुछ ही कारीगर इस शिल्प का अभ्यास कर रहे थे। परंतु 1994 में, इस उद्योग को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया। लेकिन, तवांग के चुनौतीपूर्ण भौगोलिक इलाके - ऊंचे पहाड़ों, कठिन सड़कों, और कठोर मौसम की स्थिति के कारण, ये पुनरुद्धार के प्रयास विफल रहे। इन असफलताओं के बावजूद, इस प्राचीन कला को पुनर्जीवित करने की प्रतिबद्धता कम नहीं हुई है।
मोन-शुगु के उत्पादन में कई सावधानीपूर्वक निष्पादित चरण शामिल हैं:
1. मार्च और दिसंबर के बीच, शुगु शेंग पेड़ के परिपक्व तने और लंबी शाखाओं की कटाई की जाती है। स्थानीय भाषा में ‘खोपा’ के नाम से प्रख्यात इनकी छाल को, सावधानी से छीला जाता है। फूलों और प्रजनन चरणों के दौरान, प्राकृतिक पुनर्जनन सुनिश्चित करने के लिए इन झाड़ियों को नहीं काटा जाता है।
2. छाल की बाहरी हरी परत को पारंपरिक चाकू (क्योचुंग) का उपयोग करके हटा दिया जाता है। क्योंकि, छाल की अधिक मात्रा के परिणामस्वरूप कागज़ गहरे रंग का और कमज़ोर हो जाता है।
3. गंदगी और अशुद्धियों को दूर करने के लिए, खुरची हुई छाल को बहते पानी में अच्छी तरह से धोया जाता है।
4. फिर, साफ की गई छाल को पूरी तरह सूखने तक, तीन से चार दिनों तक धूप में सुखाया जाता है।
5. सूखी छाल को नरम करने के लिए पानी में भिगोया जाता है, और फिर छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है।
6. इस प्रकार भीगी हुई छाल को, बाद में राख के साथ मिश्रित पानी में छह से आठ घंटे तक उबाला जाता है, जो फाइबर को अलग करने में मदद करता है। इससे कागज की गुणवत्ता में सुधार भी होता है।
7. फिर, उबली हुई छाल को एक सपाट पत्थर पर, लकड़ी के हथौड़े से तब तक पीटा जाता है, जब तक कि उसका बारीक गूदा न बन जाए।
8. अंत में, लुगदी से शीट बनाने के लिए, इसे लकड़ी के तख्ते पर समान रूप से फैलाया जाता है, और धूप में सुखाया जाता है। फिर इसका गट्ठा बांधकर, इसे उपयोग या बिक्री के लिए संग्रहीत किया जाता है।
मोनशुगु कागज, मोनपा लोगों के लिए पहचान का एक माध्यम है, जो मठवासी अनुष्ठानों, पारंपरिक कला और पर्यावरण प्रबंधन से जुड़ा हुआ है। मार्च से दिसंबर तक छाल-कटाई का चक्र, पौधे के प्रजनन चरण का सम्मान करता है, तथा प्राकृतिक पुनर्जनन और पारिस्थितिक संतुलन सुनिश्चित करता है। आर्थिक रूप से, इस इकाई ने एक विश्वसनीय आजीविका साधन बनाया है। कारीगर और महिलाएं, एक साथ काम करते हैं, युवाओं को प्रशिक्षित करते हैं, और अपने सामाजिक संबंधों को मजबूत करते हैं।
राग गौड़ मल्हार: जहाँ शास्त्रीय संगीत और मानसून का उल्लास एक साथ सुनाई देते हैं
अगर मल्हार राग-परिवार के सबसे मधुर और सुरुचिपूर्ण रागों की बात की जाए, तो राग गौड़ मल्हार का विशेष स्थान है। यह राग प्राचीन “गौड़” राग और “मल्हार” के स्वरांगों का सुंदर समन्वय है। संगीत परंपरा में इसे वर्षा ऋतु से जुड़े प्रमुख रागों में गिना जाता है, जहाँ इसकी मधुरता और विशिष्ट स्वर-विन्यास श्रोताओं के मन में मानसून की ताजगी और आनंद का भाव जगाते हैं।
गौड़ मल्हार अपनी कोमल, संतुलित और भावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए जाना जाता है। इसमें गौड़ अंग, शुद्ध मल्हार अंग तथा बिलावल अंग का प्रभाव दिखाई देता है, जिसके कारण इसकी प्रस्तुति में गंभीरता और माधुर्य का सुंदर मेल सुनाई देता है। कलाकार आलाप, बोल-आलाप और तानों के माध्यम से इस राग के विविध रंगों को उभारते हैं, जिससे प्रत्येक प्रस्तुति अपनी अलग पहचान बना लेती है।
इस राग की विविध प्रस्तुतियाँ इसकी बहुआयामी प्रकृति को दर्शाती हैं। उस्ताद अमजद अली खान के सरोद वादन में गौड़ मल्हार की मधुरता और गहराई सजीव हो उठती है। वहीं पंडित केदार बोडस और पंडित उल्हास कशालकर अपनी विशिष्ट गायकी के माध्यम से इसके स्वर-विन्यास और भावों को अलग-अलग शैली में प्रस्तुत करते हैं। इन तीनों प्रस्तुतियों से यह अनुभव किया जा सकता है कि एक ही राग कलाकार की कल्पनाशीलता के साथ कितने विविध रूप धारण कर सकता है।
यदि आप मल्हार राग-परिवार के किसी ऐसे राग से परिचित होना चाहते हैं, जिसमें वर्षा ऋतु का उल्लास, शास्त्रीय संगीत की गरिमा और मधुरता का सुंदर संतुलन हो, तो राग गौड़ मल्हार की ये प्रस्तुतियाँ एक उत्कृष्ट परिचय हैं। इनमें भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा और कलाकारों की रचनात्मक अभिव्यक्ति का मनोहारी संगम सुनाई देता है।
क्या आपने देखा है लखनऊ की सबसे भव्य प्राकृतिक देन, 'ब्लू नवाब तितली' को?
तितलियों को अक्सर फूलों पर मंडराते और अमृत (nectar) पीते देखा जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में एक ऐसी तितली भी पाई जाती है जिसका नाम 'नवाबों' पर रखा गया है और जिसका खान-पान अन्य तितलियों से बिल्कुल अलग है? 'ब्लू नवाब' (Polyura schreiber) नाम की यह तितली न केवल अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) के स्वास्थ्य की एक बड़ी संकेतक भी है। कीट विज्ञानियों के अनुसार, जहाँ ब्लू नवाब मौजूद होती है, वहाँ का वातावरण अत्यंत शुद्ध और संतुलित माना जाता है।
ब्लू नवाब क्या है और इसकी वैज्ञानिक पहचान क्या है? ब्लू नवाब, जिसे वैज्ञानिक भाषा में पॉलीउरा श्रेइबर (Polyura schreiber) कहा जाता है, निम्फालिडे (Nymphalidae) परिवार की सदस्य है। यह मुख्य रूप से 'ब्रश-फुटेड' तितलियों की श्रेणी में आती है। इसकी पहचान इसके मजबूत शरीर और तेज उड़ान से होती है। इस तितली के पंखों का फैलाव 92 से 116 मिलीमीटर तक हो सकता है। इसके पिछले पंखों पर दो छोटी पूंछ जैसी संरचनाएं (tails) होती हैं, जो इसे अन्य प्रजातियों से अलग और आकर्षक बनाती हैं।
इसे 'ब्लू नवाब' ही क्यों कहा जाता है? इस तितली का नाम इसकी उपस्थिति और भारत के सांस्कृतिक इतिहास का एक अनूठा संगम है। 'ब्लू' शब्द इसके पंखों पर दिखने वाली सुंदर नीली चमक को दर्शाता है, जबकि 'नवाब' शब्द भारतीय इतिहास के उन शासकों और रईसों के लिए उपयोग किया जाता था जो अपनी भव्यता और गरिमा के लिए जाने जाते थे। चूँकि इस तितली की उड़ान अत्यंत शालीन, तेज और इसके रंगों में एक शाही चमक होती है, इसलिए इसे 'ब्लू नवाब' का नाम दिया गया। यह नाम इसकी राजसी सुंदरता और प्रकृति में इसके 'रॉयल' दर्जे का प्रतीक है।
भारत के किन इलाकों में यह पाया जाता है? ब्लू नवाब मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय एशिया (Tropical Asia) में पाई जाती है। भारत की बात करें तो यह दक्षिण भारत, असम और हिमालय की तलहटी वाले क्षेत्रों में देखी जाती है। इसके अलावा, यह म्यांमार, दक्षिण-पूर्वी एशिया और चीन के कुछ हिस्सों तक फैली हुई है। भारत में इसकी अलग-अलग उप-प्रजातियां भी मिलती हैं, जैसे दक्षिण भारत में Polyura schreiber wardii और असम से लेकर दक्षिण-पूर्वी एशिया तक Polyura schreiber assamensis पाई जाती है।
यह किस तरह के वातावरण में रहना पसंद करता है? अध्ययनों से पता चलता है कि ब्लू नवाब को घने वन क्षेत्र (Forested habitats) अधिक पसंद हैं। यह विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय जंगलों, पेड़ों से घिरे इलाकों और जल स्रोतों के पास वाले क्षेत्रों में रहती है। इसे शहरी पार्कों, बगीचों और मैंग्रोव दलदलों में भी देखा जा सकता है। यह तितली अक्सर पेड़ों की ऊँचाइयों पर बैठना पसंद करती है और सुबह के समय जंगल के निचले हिस्सों में तेजी से उड़ते हुए देखी जा सकती है।
ब्लू नवाब का आहार अन्य तितलियों से अलग क्यों है? जहाँ अधिकांश तितलियाँ केवल फूलों के रस पर निर्भर रहती हैं, वहीं ब्लू नवाब के वयस्क सदस्यों की पसंद काफी अलग है। ये तितलियाँ पेड़ों के रस (tree sap), सड़े हुए कार्बनिक पदार्थों और कभी-कभी पशुओं के अवशेषों (carrion) या उनके मल तक से पोषक तत्व प्राप्त करती हैं। पेड़ों का रस इन्हें वे खनिज और पोषक तत्व प्रदान करता है जो फूलों के अमृत में नहीं मिलते। नर तितलियों को अक्सर गीली जमीन पर खनिज सोखते हुए भी देखा जा सकता है।
इस तितली का जीवन चक्र और प्रजनन कैसे होता है? ब्लू नवाब का जीवन चक्र किसी चमत्कार से कम नहीं है। इसकी शुरुआत मादा द्वारा मेजबान पौधों (host plants) की पत्तियों के ऊपरी हिस्से पर दिए गए पीले, गोलाकार अंडों से होती है। एक अंडे का व्यास लगभग 1.9 मिमी होता है। लार्वा (Caterpillar): अंडे से निकलने वाला लार्वा शुरू में सुनहरा भूरा होता है, लेकिन जल्द ही हरा हो जाता है। इसके सिर पर चार सींग जैसी संरचनाएं होती हैं, जो इसे किसी छोटे 'ड्रैगन' जैसा लुक देती हैं। यह मुख्य रूप से 'रेड सागा' (Adenanthera pavonina), 'रंबूटन' और 'वागटिया' जैसे पौधों की पत्तियां खाता है। प्यूपा (Pupa): पूरी तरह विकसित होने के बाद, इल्ली प्यूपा में बदल जाती है। यह प्यूपा हरे रंग का होता है और देखने में किसी बेरी जैसा लगता है। वयस्क: लगभग 10 से 11 दिनों के बाद प्यूपा से एक सुंदर तितली बाहर आती है।
पारिस्थितिकी तंत्र में इसकी क्या भूमिका है? बटरफ्लाई कंजर्वेशन जैसी संस्थाओं का मानना है कि तितलियाँ जैव विविधता की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। ब्लू नवाब जैसे जीव 'स्वास्थ्य संकेतक' के रूप में कार्य करते हैं। इनका मौजूद होना इस बात का प्रमाण है कि उस क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ है और वहाँ प्रदूषण का स्तर कम है। इसके अलावा, ये परागण (pollination) में मदद करती हैं और खाद्य श्रृंखला (food chain) का एक अहम हिस्सा हैं, जहाँ पक्षी और चमगादड़ इनका शिकार करते हैं।
दुर्भाग्य से, ब्लू नवाब को सबसे बड़ा खतरा आवास विनाश (Habitat destruction) से है। जंगलों की कटाई और शहरीकरण के कारण इनके रहने और प्रजनन के स्थान कम हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हमें इन 'शाही तितलियों' को बचाना है, तो हमें उनके प्राकृतिक आवासों और उन विशिष्ट मेजबान पौधों का संरक्षण करना होगा जिन पर इनका जीवन निर्भर है।
अचानक रुकती धड़कनों को फिर से कैसे शुरू कर देते हैं,पेसमेकर और आईसीडी जैसे छोटे से यंत्र?
फरवरी 1980 की एक सुबह जॉन्स हॉपकिन्स अस्पताल में चिकित्सा जगत ने एक अभूतपूर्व घटना देखी। डॉ. लेवी वॉटकिंस जूनियर ने एक 47 वर्षीय महिला के शरीर में दुनिया का पहला 'इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर डिफिब्रिलेटर' (Implantable Cardioverter Defibrillator ICD) प्रत्यारोपित किया। यह वह दौर था जब विशेषज्ञ इस तकनीक को लेकर संशय में थे। यहाँ तक कि बाहरी डिफिब्रिलेटर के आविष्कारक बर्नार्ड लाउन ने भी इसे "एक अव्यवहारिक समाधान" करार दिया था। लेकिन आज, यही यंत्र दुनिया भर में अचानक होने वाली कार्डियक डेथ (Sudden Cardiac Death) को रोकने का सबसे प्रमुख हथियार बन चुका है।
ICD क्या है और यह हमारे दिल की सुरक्षा कैसे करता है? इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर-डिफिब्रिलेटर (ICD) एक छोटा, बैटरी से चलने वाला उपकरण है जिसे शरीर के अंदर, आमतौर पर बाएं कॉलरबोन के नीचे लगाया जाता है। विकिपीडिया के आंकड़ों के अनुसार, यह मुख्य रूप से उन मरीजों के लिए उपयोग किया जाता है जिन्हें वेंट्रिकुलर फाइब्रिलेशन या वेंट्रिकुलर टैकीकार्डिया जैसी जानलेवा स्थितियों का खतरा होता है। यह उपकरण लगातार हृदय की लय (Rhythm) की निगरानी करता है।
इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर-डिफिब्रिलेटर (ICD)
जब भी हृदय की गति एक निर्धारित सीमा से अधिक तेज़ या अनियमित हो जाती है, तो यह उपकरण तुरंत उसे पहचान लेता है। आधुनिक ICD न केवल खतरनाक धड़कन को पहचानते हैं, बल्कि वे 'ओवरड्राइव पेसिंग' या 'एंटी-टैकीकार्डिया पेसिंग' (ATP) के जरिए दिल को सामान्य लय में लाने की कोशिश भी करते हैं। यदि गति फिर भी अनियंत्रित रहती है, तो यह उपकरण एक बिजली का झटका (Shock) भेजता है ताकि हृदय फिर से अपनी सामान्य गति पर लौट सके। इसकी कार्यप्रणाली किसी आपातकालीन कक्ष में डॉक्टर द्वारा दिए जाने वाले बाहरी झटके के समान ही होती है, लेकिन शरीर के अंदर होने के कारण इसे बहुत कम वोल्टेज की आवश्यकता होती है।
चिकित्सा इतिहास में इन उपकरणों का विकास कैसे हुआ? हृदय को सहारा देने की सुरक्षा करने वाले इन उपकरणों की कहानी लगभग 100 साल पुरानी है। पेसमेकर के विकास की शुरुआत 1928 में हुई थी, लेकिन पहला पूरी तरह से प्रत्यारोपित होने वाला पेसमेकर 1958 में स्वीडन के करोलिंस्का संस्थान में लगाया गया था। इसे रूण एल्मक्विस्ट और सर्जन एके सेनिंग ने विकसित किया था। दिलचस्प तथ्य यह है कि दुनिया के पहले पेसमेकर प्राप्त करने वाले मरीज, अर्ने लार्सन, अपने जीवनकाल में 26 अलग-अलग पेसमेकर उपकरणों के साथ 86 वर्ष की आयु तक जीवित रहे। ICD के विकास का श्रेय डॉ. मिशेल मिरोव्स्की और उनकी टीम को जाता है। 1969 में शुरू हुई उनकी रिसर्च को 11 साल बाद सफलता मिली। एप्लाइड फिजिक्स लेबोरेटरी (APL) ने इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहाँ अंतरिक्ष यान में इस्तेमाल होने वाली उच्च-तकनीक और गुणवत्ता नियंत्रण तकनीकों को इस मेडिकल डिवाइस में लागू किया गया। शुरुआती दौर में ये उपकरण इतने बड़े थे कि उन्हें पेट के क्षेत्र में प्रत्यारोपित करना पड़ता था और इसके लिए मरीज की पसलियों को खोलना पड़ता था।
पेसमेकर और ICD के बीच मुख्य अंतर क्या है? यद्यपि ये दोनों उपकरण दिखने में एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन इनका कार्य अलग है। पेसमेकर मुख्य रूप से 'ब्रैडीकार्डिया' यानी धीमी धड़कन के इलाज के लिए होता है। यह तब काम करता है जब हृदय का प्राकृतिक पेसमेकर सही संकेत नहीं दे पाता। दूसरी ओर, ICD एक अधिक उन्नत प्रणाली है जिसमें पेसमेकर और डिफिब्रिलेटर दोनों के गुण होते हैं। यह धीमी धड़कन को सामान्य करने के साथ-साथ जानलेवा तेज़ धड़कन को रोकने की क्षमता भी रखता है। मे़डट्रॉनिक (Medtronics) के अनुसार, आधुनिक पेसमेकर अब विटामिन के कैप्सूल जितने छोटे (Leadless Pacemakers) भी आने लगे हैं, जिन्हें सीधे हृदय के अंदर लगाया जा सकता है।
पेसमेकर
ग्लोबल मार्केट और भारत में इन उपकरणों की आपूर्ति कैसे होती है? इन जीवनरक्षक उपकरणों का निर्माण और वैश्विक आपूर्ति मुख्य रूप से कुछ बड़ी कंपनियों जैसे मे़डट्रॉनिक (Medtronic), सेंट जूड मेडिकल (अब एबॉट) और बोस्टन साइंटिफिक द्वारा की जाती है। साइंस डायरेक्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, ICD एक जटिल प्रणाली है जिसमें पल्स जेनरेटर, लीड्स (तारे) और एक प्रोग्रामर शामिल होता है। इसके जेनरेटर में कंप्यूटर चिप, रैम, प्रोग्रामेबल सॉफ्टवेयर और लिथियम-सिल्वर वैनेडियम बैटरी होती है।
भारत जैसे देशों में, जहाँ हृदय रोगों का बोझ बहुत अधिक है, इन उन्नत चिकित्सा तकनीकों के लिए मुख्य रूप से आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। पीएमसी (PMC) की शोध रिपोर्ट बताती है कि भारत इन उपकरणों का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगवाता है। उन्नत मेडिकल ग्रेड बैटरी और माइक्रो-इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्माण की स्थानीय सीमाओं के कारण, भारत के मरीजों को इन वैश्विक कंपनियों की तकनीक पर ही भरोसा करना पड़ता है। हालांकि, तकनीकी प्रगति के साथ इन उपकरणों की बैटरी लाइफ अब 10 साल से अधिक होने लगी है, जिससे बार-बार सर्जरी की आवश्यकता कम हुई है।
इन उपकरणों के साथ जीवन जीने की क्या चुनौतियाँ हैं? एक बार ICD या पेसमेकर लग जाने के बाद मरीज एक सामान्य और सक्रिय जीवन जी सकता है, लेकिन कुछ सावधानियां बरतनी ज़रूरी होती हैं। मरीजों को तेज़ चुंबकीय क्षेत्र, एमआरआई (MRI) मशीनों और कुछ विशेष औद्योगिक उपकरणों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। हालांकि, मे़डट्रॉनिक जैसी कंपनियों ने अब 'MRI-Conditional' उपकरण पेश किए हैं, जिन्हें विशेष सेटिंग्स के साथ एमआरआई स्कैन के दौरान सुरक्षित रखा जा सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका गहरा प्रभाव देखा गया है। शोध बताते हैं कि लगभग 13% से 38% मरीजों में अचानक लगने वाले झटके के डर से चिंता (Anxiety) और अवसाद के लक्षण देखे जा सकते हैं। इसीलिए, आधुनिक उपकरणों में अब ऐसी तकनीकें शामिल की जा रही हैं जो 'इनएप्रोप्रिएट शॉक' (गलत समय पर लगने वाले झटके) को कम कर सकें।
क्या है इन उपकरणों का भविष्य? चिकित्सा जगत अब 'लीडलेस' (बिना तारों वाले) उपकरणों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की ओर बढ़ रहा है। मे़डट्रॉनिक के अनुसार, रिमोट मॉनिटरिंग सिस्टम अब डॉक्टरों को इंटरनेट के माध्यम से घर बैठे मरीज के दिल की जानकारी देने में सक्षम हैं। भविष्य में, एआई इन उपकरणों के डेटा का विश्लेषण कर धड़कन बिगड़ने से पहले ही डॉक्टर को चेतावनी दे सकेगा। भारत के लिए चुनौती इन महँगी तकनीकों को आम जनता के लिए सुलभ और किफायती बनाने की है।