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लखनऊ एवं पूर्ण उत्तर प्रेदेश के जंगल

Lucknow
18-06-2018 12:45 PM

आज दुनिया की आबादी कल से 2,00,000 लोग ज़्यादा है। विश्व जनसंख्या घड़ी आपको वास्तविक समय में सीधा प्रसारण दिखाती है कि वास्तव में यह कितनी तेजी से दौड़ रही है। बढ़ती जनसंख्या का यह विकास पृथ्वी के संसाधनों पर भारी दबाव डालेगा और हमें जीवित रहने के अधिक स्थिर रास्ते खोजने होंगे, वो भी तेजी के साथ। इस समय दुनिया की आबादी 7.6 अरब है और गिनती लगातार जारी है।

भारत की वर्तमान आबादी 1,35,33,21,780 है। भारत की आबादी कुल विश्व जनसंख्या का 17.74 प्रतिशत के बराबर है। भारत जनसंख्या की दृष्टि से देशों और निर्भरताओं की सूची में दूसरे स्थान पर है। उत्तर प्रदेश का बहुसांस्कृतिक राज्य वर्तमान में भारत की कुल आबादी का 16 प्रतिशत है।

आर्थिक विकास और पारिस्थितिकीय स्थिरता में वन एक महत्तवपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वन मानव और अन्य जीव-जन्तुओं के लिए आवश्यक पर्यावरण और पारिस्थितिकीय स्थिरता जैसी कई सेवाएं प्रदान करते हैं। मानव जाति के कल्याण के लिए धरती पर वन आवश्यक हैं। वे सिर्फ हरे रंग की चादर या आवरण नहीं हैं, जिनसे हमें पृथ्वी को सुंदर बनाने की आवश्यकता है, बल्कि उनके अस्तित्व और निर्वाह के लिए उनके पास कई और अनिवार्य कार्य हैं। वे मानव जीवन के कई पहलुओं के लिए एक संसाधन के रूप में कार्य करते हैं। सभ्यता के विकास के लिए- खेतों, खानों, कस्बों और सड़क निर्माण के लिए बड़े क्षेत्रों को मंजूरी दे दी गई है। उत्तर प्रदेश, भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है।

उत्तर प्रदेश में 21,720 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वन और पेड़ों का आवरण है, जो भौगोलिक क्षेत्र का 9.01 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में मौजूदा वनस्पति को तीन श्रेणियों में बांटा गया है।

1. नम उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन
2. शुष्क उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन
3. कंटिले उष्णकटिबंधीय वन

उत्तर प्रदेश का भौगोलिक क्षेत्रफल 2,40,928 वर्ग किलोमीटर है, जो देश के कुल क्षेत्रफल का 7.3 प्रतिशत है। 1951 में अविभाजित उत्तर प्रदेश में दर्ज वन क्षेत्र 30,245 वर्ग किलोमीटर था। अतिरिक्त क्षेत्रों को धीरे-धीरे अधिसूचित किया गया था और 1998-99 तक 51,428 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र और विस्तृत किया गया था। 1999 में उत्तराखण्ड को उत्तर प्रदेश से अलग किया गया था, जिस कारण उत्तर प्रदेश के हिस्से में केवल 16,888 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र आया था। 2011 में वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, दर्ज वन क्षेत्र 16,583 वर्ग किलोमीटर था, जो 1999 में दर्ज कुल वन क्षेत्र में से 305 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र की गिरावट थी। उत्तर प्रदेश के मामले में बढ़ती मांगों और विकास को ध्यान में रखते हुए जैसे- सड़कों, सिंचाई, बिजली, पेयजल, खनन उत्पादों आदि के कारण वन आवरण क्षेत्र में भारी गिरावट आयी। इस विशाल भाग के अलावा वन भूमि के अवैध रूप से गैर वन उपयोगों पर अतिक्रमण कर दिया गया।

अक्टूबर 2008 से जनवरी 2009 तक सेटेलाईट द्वारा एकत्रित आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में अनुमानित वन आवरण क्षेत्र 14,338 वर्ग किलोमीटर है। जिसमें 1,626 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बहुत घने वन, 4,559 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मध्यम घने वन और 8,153 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में खुला वन है।

अगर हम बात करें उत्तर प्रदेश के लखनऊ जिले की तो लखनऊ, उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा शहर होने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की राजधानी भी है। 2018 के अंत तक लखनऊ की अनुमानित जनसंख्या आंकड़ा 3.4704 मिलियन हो सकता है।

वन आवरण की कमी के कारण वन संसाधनों, मिट्टी, जल संसाधनों और जैव-रासायनिक चक्रों के कामकाज पर स्पष्ट प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। राष्ट्रीय वन नीति निर्धारित करती है कि राष्ट्रीय लक्ष्य को वन आवरण के तहत देश की कुल भूमि क्षेत्र का न्यूनतम एक तिहाई होना चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों में कुल क्षेत्र का लक्ष्य वन आवरण के तहत 2/3 क्षेत्र को वन आवरण क्षेत्र होना चाहिए। उत्तर प्रदेश में 2011 के अनुसार 23.81 प्रतिशत राष्ट्रीय आवरण के लिए 9.01 प्रतिशत पर वन है।

सन् 2025 तक, विश्व की जनसंख्या 8 अरब लोगों से अधिक की होगी। लगभग 2040 में विश्व की जनसंख्या 9 अरब हो सकती है और 2100 तक यह आंकड़ा 11 अरब लोगों तक पहुंच सकता है। इस शताब्दी में विश्व अर्थव्यवस्था 26 गुना बढ़ सकती है और यह पृथ्वी के प्रकृति संसाधनों पर भारी दबाव डालेगा। जबकि हम पहले ही 160 प्रतिशत पर अधिक उपयोग कर रहे हैं।

यदि हम पृथ्वी पर उपलब्ध प्रकृति द्वारा दिये गये सीमित संसाधनों का उपभोग करने के तरीके को मूल रूप से बदलना शुरू नहीं करते हैं, तो हम निश्चित रूप से अपने उपभोक्ता समाज के पूर्ण पतन के लिए आगे बढ़ेंगे। वर्तमान प्रवृत्तियों पर पृथ्वी बहुत से लोग और 26 गुना बड़ी अर्थव्यवस्था को दोबारा संभाल नहीं सकती है।

हमें एक नई औद्योगिक क्रांति की आवश्यकता है, जहां आर्थिक संपत्ति, पर्यावरणीय और सामाजिक स्थिरता साथ-साथ और तेजी से चल सके। हम महत्तवपूर्ण पहलुओं वाले बिन्दुओं तक पहुंच रहे हैं, इससे पहले कि नकारात्मक प्रवृत्तियों को दूर करने में बहुत देरी हो जाएगी।

संधर्भ

1.http://www.theworldcounts.com/counters/shocking_environmental_facts_and_statistics/world_population_clock_live
2.https://www.worldometers.info/world-population/india-population/
3.http://countrymeters.info/en/India
4.http://www.indiaonlinepages.com/population/uttar-pradesh-population.html
5.http://indiapopulation2018.in/population-of-lucknow-2018.html
6.http://www.wealthywaste.com/forest-cover-in-uttar-pradesh-an-overview
7.http://upenvis.nic.in/database/forest_838.aspx


रविवार कविता

Lucknow
17-06-2018 11:25 AM

काका हाथरसी  भारत के एक हिंदी व्यंग्यवादी और विनोदी कवि थे। यह कविता उन्ही के द्वारा लिखी हुई है.उनका असली नाम प्रभु लाल गर्ग था। उन्होंने कलका हाथरसी के कलम नाम के तहत लिखा था। उन्होंने "काका" चुना, क्योंकि उन्होंने एक नाटक में किरदार निभाया जिसने उन्हें लोकप्रिय बना दिया, और उनके मूल स्थान हाथरस के नाम पर उनका नाम "हाथरसी" पड़ा । आज पेश है उनकी एक कविता
वंदन कर भारत माता का, गणतंत्र राज्य की बोलो जय।
काका का दर्शन प्राप्त करो, सब पाप-ताप हो जाए क्षय॥

मैं अपनी त्याग-तपस्या से जनगण को मार्ग दिखाता हूँ।
है कमी अन्न की इसीलिए चमचम-रसगुल्ले खाता हूँ॥

गीता से ज्ञान मिला मुझको, मँज गया आत्मा का दर्पण।
निर्लिप्त और निष्कामी हूँ, सब कर्म किए प्रभु के अर्पण॥

आत्मोन्नति के अनुभूत योग, कुछ तुमको आज बतऊँगा।
हूँ सत्य-अहिंसा का स्वरूप, जग में प्रकाश फैलाऊँगा॥

आई स्वराज की बेला तब, 'सेवा-व्रत' हमने धार लिया।
दुश्मन भी कहने लगे दोस्त! मैदान आपने मार लिया॥

जब अंतःकरण हुआ जाग्रत, उसने हमको यों समझाया।
आँधी के आम झाड़ मूरख क्षणभंगुर है नश्वर काया॥

गृहणी ने भृकुटी तान कहा-कुछ अपना भी उद्धार करो।
है सदाचार क अर्थ यही तुम सदा एक के चार करो॥

गुरु भ्रष्टदेव ने सदाचार का गूढ़ भेद यह बतलाया।
जो मूल शब्द था सदाचोर, वह सदाचार अब कहलाया॥

गुरुमंत्र मिला आई अक्कल उपदेश देश को देता मैं।
है सारी जनता थर्ड क्लास, एअरकंडीशन नेता मैं॥

जनता के संकट दूर करूँ, इच्छा होती, मन भी चलता।
पर भ्रमण और उद्घाटन-भाषण से अवकाश नहीं मिलता॥

आटा महँगा, भाटे महँगे, महँगाई से मत घबराओ।
राशन से पेट न भर पाओ, तो गाजर शकरकन्द खाओ॥

ऋषियों की वाणी याद करो, उन तथ्यों पर विश्वास करो।
यदि आत्मशुद्धि करना चाहो, उपवास करो, उपवास करो॥

दर्शन-वेदांत बताते हैं, यह जीवन-जगत अनित्या है।
इसलिए दूध, घी, तेल, चून, चीनी, चावल, सब मिथ्या है॥

रिश्वत अथवा उपहार-भेंट मैं नहीं किसी से लेता हूँ।
यदि भूले भटके ले भी लूँ तो कृष्णार्पण कर देता हूँ॥

ले भाँति-भाँति की औषधियाँ, शासक-नेता आगे आए।
भारत से भ्रष्टाचार अभी तक दूर नहीं वे कर पाए॥

अब केवल एक इलाज शेष, मेरा यह नुस्खा नोट करो।
जब खोट करो, मत ओट करो, सब कुछ डंके की चोट करो॥

संदर्भ

1.https://www.bharatdarshan.co.nz/author-profile/48/kaka-hathrasi.html
2.http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%8F%E0%A4%85%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A5%80%E0%A4%B6%E0%A4%A8_%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%A4%E0%A4%BE_/_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%80


क्या होता है ये वेतन आयोग?

Lucknow
16-06-2018 11:01 AM

वेतन आयोग सरकारी कर्मचारियों के वेतन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अंग है। वेतन आयोग का गठन समय-समय पर सरकार द्वारा कर्मचारियों के वेतन, भत्तों व पेंशन आदि में फेर बदल आदि के लिए किया जाता है। अब तक भारत में कुल 7 वेतन आयोगों का गठन हो चुका है। भारत का पहला वेतन आयोग भारत की आजादी के भी एक वर्ष पहले ही गठित हुआ था। यह वेतन आयोग जनवरी सन 1946 में गठित हुआ था। प्रत्येक वेतन आयोग का एक अध्यक्ष होता है। भारत के पहले वेतन आयोग के अध्यक्ष श्रीनिवास वरदाचरियार थे। दूसरा वेतन आयोग 1957 में हुआ था। यह आजादी के 10 वर्ष बाद गठित हुआ था। तीसरा वेतन आयोग एक अत्यंत महत्वपूर्ण सैद्धांतिक आयोग था। यह आयोग सन 1970 में गठित हुआ था। यह आयोग सरकार द्वारा वेतन के निर्धारण के ढाँचे के निर्माण के लिए जाना जाता है। चौथा वेतन आयोग सन 1983 में गठित हुआ था। पांचवा वेतन आयोग सन 1994 में गठित हुआ था। 6ठे वेतन आयोग की स्थापना सन 2006 में की गयी थी। इस आयोग में वेतन के बढ़ाने पर जोर दिया गया था। सातवें वेतन आयोग का गठन 2013 में हुआ था परन्तु इसकी रिपोर्ट 2015 में सौंपी गयी थी। सातवें वेतन आयोग में सबसे कम बढ़त देखने को मिली।

वेतन आयोग के गठन और इसकी कार्य प्रणाली को स्थापित करने के लिए कुछ प्रमुख बिन्दुओं को ध्यान से देखा जाता है। साधारणतया वेतन आयोग का अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायाधीश ही बनाया जाता है। आयोग के गठन में कुल 5-6 सदस्यों का समूह होता है जिसमें अर्थशास्त्र और अन्य विषयों के जानकार लोग होते हैं। आयोग विभिन्न विभागों के लोगों की समस्याओं को सुनता है और उनके सुझावों को आमंत्रित करता है। आई.ए.एस. अधिकारीयों से लेकर चतुर्थ श्रेणी तक के कर्मचारी आयोग को ज्ञापन देने का कार्य करते हैं। वेतन आयोग के गठन में करीब 2 वर्ष का समय लगता है जिसमें विभिन्न विभागों द्वारा दी गयी दलीलें सुनी जाती हैं और उन्हें फिर सरकार को सौंपा जाता है। सरकार अपने अनुसार विज्ञप्ति में लिखी गयी बिन्दुओं पर संशोधन करती हैं या उसको सीधे मान लेती है। सरकार द्वारा कितना भुगतान किया जाना संभव है, इसके आधार पर आयोग कार्य करता है। कई ऐसे मामले सामने आये हैं जहाँ पर बिना वित्तीय ज्ञान के आयोग की बात मान ली गयी और सरकार के खजाने में कमी थी। कई बार यह बात होती है कि क्या वेतन आयोग मात्र वेतन बढ़ाने का ही कार्य करता है या अन्य कार्य भी करता है। वेतन आयोग में समानता, निष्पक्षता, पदोन्नति आदि के विषय में बातें की जाती हैं।

सातवाँ वेतन आयोग अभी हाल ही में गठित हुआ तथा इसमें कई बातें रखी गयी थीं जैसे कि वेतन भत्ते और पेंशन आदि में 23.55% की वृद्धि। खजाने को ध्यान में रखकर आयोग ने मूल वेतन में 14.27% वृद्धि की बात रखी है जो यदि देखा जाए तो आज तक के वेतन आयोग की सबसे कम वृद्धि है। इस वेतन आयोग से सरकारी कर्मचारियों की कमाई में बढ़ोतरी देखने को मिली। पेंशन पाने वालों को इस आयोग में एक स्थान दिया गया तथा 6,000 से 18,000 तक की बढ़ोतरी सेवानिवृत्त के पेंशन में जोड़ा गया है। वेतन आयोग कई बिन्दुओं को ध्यान में रखकर विभिन्न सिफारिशों को पेश करता है।

1.http://www.dnaindia.com/business/report-7th-pay-commission-good-news-for-50-lakh-employees-likely-to-come-in-august-2624227
2.https://www.financialexpress.com/money/7th-pay-commission-modi-government-takes-big-decision-for-23-lakh-retired-teachers-non-teaching-staff/1202797/
3.https://www.punjabkesari.in/national/news/when-set-up-on-the-first-commission-learn-some-important-things-488564
4.https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%81_%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A4%E0%A4%A8_%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97
5.https://www.facebook.com/permalink.php?id=270079749824952&story_fbid=383185308514395
6.https://en.wikipedia.org/wiki/Pay_Commission


कुछ चित्रकारी कुरान से प्रेरित

Lucknow
15-06-2018 03:15 PM

कला का अपना ही एक अलग महत्व होता है। यह कई चीजें प्रदर्शित करती है जैसे कि ग्यान, प्रतिभा, समय, काल, आदि। कला का प्रयोग विभिन्न समयों में क्रांतियों में भी किया गया था। सम्पूर्ण भारत भर में विभिन्न प्रकार की कलाएं पायी जाती हैं। अब यदि हम चित्रकारी को देखें तो भारत में इसके कई रूप प्रचलित हैं जैसे कालीघाट, पहाड़ी, राजस्थानी, तंजौर इत्यादि। इन चित्रों के अलावा भी भारत में कई चित्र परम्पराएं ऐसी भी हैं जो कि विदेश से भी भारत आयी हैं।

लखनऊ की स्थापना के समय से ही फारसी कला का प्रभाव यहां पर पड़ा। भारत और फ़ारस (ईरान) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्राचीन संबंध है जिसे करीब 2000 से ज्यादा सालों पुराना आंका जा सकता है। भारत में मुगल काल के समय से ही वहां की कला भारत में आयातित हुयी है जिसे विभिन्न लघु चित्रों में हम पाते हैं। आइए हम आज बात करते हैं ईरान के महानतम जीवित कलाकार महमूद फार्शियान की कला की। महमूद धर्म से प्रेरणा लेकर अपनी कलाओं का सृजन करते हैं। उनकी लोकप्रिय कलाकृतियाँ अक्सर कुरान से प्रेरित होती हैं। चित्र में महमूद द्वारा बनाए गए चित्रों को प्रदर्शित किया गया है जिसमें दाईं ओर उनकी रचना ‘प्रोफेट जोसफ’ को प्रदर्शित किया गया है। यह चित्र अपने में ही अत्यंत जीवंत होने का प्रमाण प्रस्तुत करता है। यह चित्र सुनहरे और सफेद रंग के मिश्रण से बनाया गया है जो कि फारसी कला का एक महत्वपूर्ण अंग है। बाईं ओर का चित्र ऊपर वाले से प्रार्थना के रूप में गुहार लगाने को प्रदर्शित करता है। इस चित्र में एक व्यक्ति के सिर्फ हाथ को असमान की तरफ दिखाते हुए प्रदर्शित किया गया है।

महमूद की कला मे खास बात यह है कि उनकी कलाकृतियां अत्यंत जीवंत होने का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं. महमूद का जन्म ईरान के इसफहान शहर में हुआ था। इसफहान ईरान के सबसे खूबसूरत शहरों में से एक है। उनकी कलाएं इतनी महत्वपूर्ण हैं कि इनकी प्रदर्शनी को मुंबई में सन 2015 में प्रदर्शित किया गया था, महमूद ने अपनी ही एक अलग शैली का निर्माण किया था जिसने कि फ़ारसी कला को एक नयी ऊंचाई प्रदान की। आज वर्तमान में महमूद की कला पूरे संसार में मानी और जानी जाती है। ईद के उपलक्ष्य में उनकी धार्मिक कलाकृतियों का अवलोकन करना अत्यंत ही संतुष्टि प्रदान करने वाला प्रतीत होता है।

1.http://art-now-and-then.blogspot.com/2014/04/mahmoud-farshchian.html
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Mahmoud_Farshchian
3.https://www.pinterest.com/pin/312718767857732579/
4.https://www.hindustantimes.com/art-and-culture/iranian-connection-a-glimpse-of-mahmoud-farshchian-s-works/story-Le6IHPl8HJKAV40qUYStcK.html
5.http://farshchianart.com


1857 के लखनऊ का अनदेखा दुर्लभ चित्र

Lucknow
14-06-2018 02:25 PM

प्रस्तुत चित्र लखनऊ का एक बहुत ही दुर्लभ चित्र है जिसमें लखनऊ को गोमती नदी के किनारे बसा हुआ दिखाया गया है। यह चित्र सन 1857 में लन्दन में प्रकाशित किया गया था। यह समय था संघर्ष का समय और इसी को चित्र में भी दर्शाने की कोशिश की गयी है।

सन 1856 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी सेना को अवध की सीमा की ओर भेजा और फिर कुशासन करने के लिए पूरे राज्य पर कब्ज़ा करने की साज़िश की। अवध उस समय चीफ कमिश्नर सर हेनरी लॉरेंस के अधीन था। वहीँ अवध के नवाब वाजिद अली शाह को ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा कैद कर कलकत्ता भिजवा दिया गया। और उसके बाद सन 1857 में भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम, ग़दर शुरू हुआ जिसमें शासक बनाया गया बेग़म हज़रत महल को। ग़दर में हार का सामना कर बेग़म हज़रत महल और अन्य विद्रोहियों ने नेपाल में शरण ली। विद्रोहियों ने कुछ समय के लिए तो राज्य पर अपना राज फिर स्थापित कर लिया था। अंग्रेजों को पूरे 18 महीने लग गए थे राज्य को दोबारा अपने अधीन लाने में। आज भी लखनऊ में रेजीडेंसी और शहीद स्मारक पर उस दौर की झलकियाँ देखि जा सकती हैं।

चित्र में हम लखनऊ के कुछ अभिन्न अंग देख सकते हैं। इनमें से 8 अंगों को नीचे एक-एक करके स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया गया है। कोशिश कीजिये नीचे स्क्रोल किये बिना इन्हें पहचानने की और फिर देखिये आप कितने अंग सही पहचान पाए।

निम्नलिखित जगहों को चित्र में पहचानने के लिए उनके पास लिखे अंक (1 से लेकर 8) को चित्र में ढूंढें। बेहतर तरीके से देखने के लिए चित्र को ज़ूम करके देखें।

1. विद्रोही शिविर (Rebel Camp)
2. किलेबंदी (Fortifications)
3. किला (The Fort)
4. असफ उद दौला की मस्जिद (Mosque of Asoph ud Dowlah)
5. मस्जिद (Mosque)
6. रजा का महल (King’s Palace)
7. समाधि (Mausoleum)
8. नेना साहिब के अनुयायी (Nena Sahib’s Followers)

1.https://www.raremaps.com/gallery/detail/54774/lucknow-on-the-goomty-capital-of-the-kingdom-of-oude-read-co
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Siege_of_Lucknow


इस कड़कती गर्मी में इन फिल्मों से पायें ठंडक

Lucknow
13-06-2018 01:54 PM

गर्मी का समय, उस पर ज्येष्ठ का महिना, फिर चिलचिलाती धूप और टप-टप टपकता पसीना और कहीं ऐसे में उत्तर प्रदेश के लखनऊ जैसे शहर में बिजली चली जाये, तो क्या कहना। लखनऊ शहर का महासागरों और पहाड़ी क्षेत्रों से दूर होने के कारण हम मनाली, कश्मीर, गोवा, लेह-लदाख आदि ऐसे पर्वतीय और सागरीय क्षेत्रों की मात्र कल्पना ही कर सकते हैं। हर व्यक्ति गर्मी के मौसम में गर्मी से बचकर ठण्डक का ऐहसास लेना चाहता है। ऐसे में शहर का वातानुकूलित सिनेमा हॉल एक उचित विकल्प हो सकता है कुछ क्षण गर्मी से बचने का। हम हमारी कल्पना में समायी पहाड़ी और समुद्री क्षेत्रों में बनी गयी फिल्मों का चैन के साथ लुप्त उठा सकते हैं और गर्मी को कुछ समय के लिए धूल चटा सकते हैं।

आज हम ऐसी ही कुछ बॉलीवुड फिल्मों को आपके लिए लेकर आये हैं और वो वहाँ क्यों शूट हुई यह भी जानेंगे। साथ ही साथ यह भी जानेंगे कि जहां अधिकांश भारतीयों के लिए गर्मी से बचने का मतलब पहाड़ों की ओर रूख करना है, वहीं दूसरी ओर यूरोपीय और अमेरिकी लोग गर्मियों में सूर्य का ताप लेने के लिए समुद्र तट पर काया को चर्म रोग मुक्त करने के लिए जाना पसंद करते हैं। त्वचा का रंग और इसकी पिग्मेंटेशन (Pigmentation) हमारे विकल्पों को प्रभावित करती है और यह सिर्फ एक सांस्कृतिक भेद का विषय नहीं है।

गोवा- ग्रीष्मकाल में युवाओं की पहली पसन्द है। गोवा की समुद्र की लहरों में गोता लगाने के लिए युवा, प्रेमी और हनीमूनर हमेशा तत्पर रहते हैं। 2001 में गोवा में बनी बॉलीवुड फिल्म ‘दिल चाहता है’ के ब्लॉकबस्टर हिट होने के कारण यह जगह लोगों के मध्य और भी लोकप्रिय बन गयी। यह फिल्म तीन दोस्तों की गोवा यात्रा कहानी को बताती है। फिल्म में उनका मजेदार व्यवहार आज भी प्रेरणादायक है। 2001 से गोवा फिल्म शूटिंग का प्रमुख और पसंदीदा स्थल बन गया है। गोवा में छोटे-बड़े सुंदर और रमणीय 40 तट हैं। अपने हल्के और सुखद एहसास के कारण यह शांतिप्रिय लोगों की पहली पसन्द है।

कश्मीर- ‘गर फिरदौस बर रूये ज़मी, अस्त-हमी अस्तो-हमी अस्तो-हमी अस्तो।’ अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं हैं, यहीं है। कश्मीर गर्मियों में घूमने के लिए सबसे सुंदर, ठण्डी और अच्छी जगह है। कश्मीर शुरू से ही भारी बर्फबारी के लिए सुर्खियों का केन्द्र रहता है। बस हम कल्पना कर सकते हैं कि कश्मीर गर्मियों में कैसे इतना ठण्डा है। यह न केवल भारत का ताज है, बल्कि ग्रीष्मकाल में यह देश का स्वर्ग भी है। बर्फ से ढके हुए पहाड़ों के मध्य स्थित, इसका उत्तरी क्षेत्र नरम और मुस्कुराते सूरज तक जाता है, जबकि देश के अन्य हिस्सों में गर्मी से नाराजगी है। कश्मीर में सूर्य की किरणें जब जमीन पर गिरकर बर्फ की सतह को चमकाती हैं, मानो ऐसा लगता है जैसे कि सफेद सोने की चादर बिछायी हो और वातावरण सुखमय बन जाता है, बजाए तपन महसूस कराने के। ऐसे में आप यश चोपड़ा की निर्देशित फिल्म ‘जब तक है जान’ के संगीत एलबम में ‘जिया रे, जिया रे’ गीत का विडियो देख आंनदित हो सकते हैं। साथ ही इस गर्मी के एहसास से दूर ले जाने वाली कुछ अन्य फ़िल्में हैं - ‘ये जवानी है दिवानी’, ‘जंगली’, ‘काश्मीर की कली’ जिनका लुत्फ़ उठाते हुए आप इस गर्मी की मार को भुला सकते हैं।

वहीँ दूसरी ओर यदि बात करें विदेशी गर्मियों की तो लोग उसमें ऐसी फ़िल्में देखना पसंद करते हैं जो किसी समुद्र तट या धूप वाले स्थान को प्रदर्शित करे। उदाहरण के तौर पर कुछ फ़िल्में जैसे ‘दि टैलेंटेड मिस्टर रिपली’, ‘डू दी राईट थिंग’, ‘टॉमबॉय’, ‘समर विद मोनिका’, ‘पौलीन एट दी बीच’ आदि गर्मियों में मौसम में अमेरिका और यूरोप के लोग देखना पसंद करते हैं।

1. https://www.indianeagle.com/travelbeats/indian-summer-destinations-in-bollywood-movies/
2. https://www.theguardian.com/film/2017/jun/24/25-greatest-summer-films


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