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अमेरीका में भी एक ऐतिहासिक लखनऊ

Lucknow
13-08-2018 05:40 PM

यू.एस. (USA) के न्यू इंग्लैंड क्षेत्र में न्यू हैम्पशायर (New Hampshire) के ओस्सीपी पर्वत (Ossipee Mountains) की अविश्वसनीय सुंदरता और विन्नीपेसावकी (Winnipesaukee) झील के व्यापक दृश्य ऐतिहासिक ‘लखनऊ’ से घिरे हुए हैं। क्यों, चौंक गए ना? परन्तु, यहाँ जिस लखनऊ की बात हो रही है वह एक पर्वत शिखर पर 5,500 एकड़ में फैली हुई 16 कमरों की बड़ी हवेली है।

अब आपके ज़हन में यह प्रश्न जरूरत उठ रहा होगा कि भला अमेरीका में ऐतिहासिक लखनऊ कैसे हो सकता है? यह प्रश्न उठना लाज़मी भी है, परन्तु हम यहाँ भारत के लखनऊ शहर की बात नहीं कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं 1913-14 में जूते का व्यवसाय करने वाले एक करोड़पति थॉमस गुस्ताव प्लांट द्वारा अपनी दूसरी पत्नी ओलिव कॉर्नेलिया ड्यूई के लिये निर्मित एक भव्य हवेली की। यह एक पर्वत शिखर पर 5,500 एकड़ में फैली हुई 16 कमरों की बड़ी हवेली है। लखनऊ शहर से इसका नाम मिलना महज़ शब्दों का एक खेल है। इसे आमतौर पर ‘कासल इन दी क्लाउड्स’ (Castle in the Clouds) के नाम से जाना जाता है।

थॉमस गुस्ताव प्लांट को खराब निवेश तथा व्यापार में घाटे के चलते अपना पैसा खोने के बाद, घर और घर की सामग्री की नीलामी करनी पड़ी ताकि वह अपने लेनदारों को भुगतान कर सके। 1942 में, प्लांट ने इसका स्वामित्व अपने दोस्त फ्रेड टोबी को दे दिया। यह हवेली 1950 के दशक के मध्य तक टोबी परिवार की संपत्ति रही। फ्रेड टोबी के रेसिंग अस्तबल को याद रखने के लिए एक अस्तबल भी मौजूद है जिसे उन्हीं के द्वारा दिये गये नाम "लखनऊ अस्तबल" से जाना जाता है।

यह हवेली प्रसिद्ध बोस्टन वास्तुकार जे. विलियम्स द्वारा अमेरिकी शिल्पकार शैली के तहत बनाई गई थी। घर में कई नवीनीकरण पद्धतियों का उपयोग किया गया था जो उस समय दुर्लभ थीं। जिसमें गोलाकार स्नान, इंटरलॉकिंग किचन टाइल्स (Interlocking Kitchen Tiles) तथा केंद्रीय वैक्यूम (Vacuum) प्रणाली शामिल थी। इसका आंतरिक भाग ए.एच. डेवनपोर्ट कंपनी के दो वास्तुकार इरविंग और कैसन द्वारा डिज़ाइन किया गया था। विलियम जैक्सन एंड कंपनी द्वारा कांस्य और टाइल का काम किया गया था, तथा एडवर्ड एफ. कैल्डवेल एंड कंपनी द्वारा इलेक्ट्रिक फिक्स्चर (Electric Fixture) और टिफ़नी द्वारा कांच का काम किया गया था।

कासल इन दी क्लाउड्स का संचालन आज एक गैर-लाभकारी संगठन कैसल संरक्षण सोसायटी के स्वामित्व में है। मई के अंत से अक्टूबर के शुरूआत तक कैसल, कैरिज हाउस (Carriage House), गिफ्ट शॉप (Gift Shop), कला गैलरी (Art Gallery) और कैफे (Café) जनता के लिए खुले रहते हैं। यह संपत्ति 2018 में यू.एस. के ऐतिहासिक स्थानों के राष्ट्रीय रजिस्टर पर सूचीबद्ध की गयी है।

संदर्भ:
1.https://en.wikipedia.org/wiki/Castle_in_the_Clouds
2.https://www.castleintheclouds.org/history/
3.http://www.moultonboroughhistory.org/MHS%20Articles%20&%20Tidbits/Articles/NEW%20INSIGHTS%20ON%20THE%20HISTORY%20OF%20CASTLE%20IN%20THE%20CLOUDS.html
4.http://www.lucknowfarms.com/lucknowname.html


कुछ ऐसे होते हैं चिकनकारी के टांके

Lucknow
12-08-2018 10:55 AM

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जाति, भूगोल, जलवायु और सांस्कृतिक परंपराओं के आधार पर वस्त्रों की भी काफ़ी भिन्नता है। यहाँ के वस्त्रों में भारतीय कढ़ाई, प्रिंट (Print), हस्तशिल्प, सजावटी, वस्त्र पहनने की शैलियों की विस्तृत विविधता शामिल है। भारत के पारंपरिक कपड़ों मे पश्चिमी शैलियों का मिश्रण भी हमें देखने को मिलता है। भारत में भारतीय कढ़ाई सबसे स्थायी कलात्मक परंपराओं में से एक है। यह भी क्षेत्र और वस्त्रों की शैली में भिन्न होती हैं। भारतीय कढ़ाई की बात हो रही हो और लखनऊ की चिकनकारी कढ़ाई का ज़िक्र ना हो, ऐसा संभव नहीं है।

उत्कृष्ट और जटिल चिकनकारी कार्य के लिए लखनऊ भारत का मुख्य केंद्र है। ऐसा माना जाता है कि मुगल सम्राट जहांगीर की पत्नी नूर जहां द्वारा इसे भारत में पेश किया गया और मुगल साम्राज्य के दौरान ही इसने लोकप्रियता हासिल की। इसमें मलमल, रेशम, शिफॉन, नेट इत्यादि जैसे विभिन्न प्रकार के कपड़ों में हाथ से एक नाज़ुक और कलात्मक रूप से कढा़ई की जाती है।

आम तौर पर एक पूरे पैटर्न (Pattern) में विभिन्न लखनवी चिकनकारी कढ़ाई का संयोजन होता है। मूल रूप से इसमें 35 प्रकार की कढ़ाई होती हैं, और 6 से 8 प्रकार की चिकनकारी कढ़ाई 90% महिलाओं द्वारा होती है। और वहीं दूसरी ओर लगभग 35 प्रकार की पूरी श्रृंखला केवल कुछ महिलाओं द्वारा ही की जाती है, जिन्हें 'मास्टर कलाकार या कारीगर' के रूप में मान्यता प्राप्त है।

चिकनकारी में कढ़ाई के टांकों के प्रकार कुछ इस तरह हैं –
टेपचि, राहत, बनारसी, फंदा, जाली, तुर्पाई, दर्ज़दारी, पेचानी, बिजली, घसपट्टी, हथकड़ी, बंजकली, साज़ी, कपकपी, मदराज़ी, ताजमहल, ज़ंजीर, कंगन, धनिया-पट्टी, रोज़न, मेहरकी, चनापट्टी, बालदा, जोरा, कील कंगन, बुलबुल आदि।

मुगलों और नवाबों की अवधि में इसके सुनहरे सालों के बाद, ब्रिटिश शासन के दौरान इसमें बड़ी गिरावट देखी गई। उसके बाद औद्योगिक युग के दौरान चिकन ने पहले के समान लोकप्रियता के साथ फिर से उभरना शुरू कर दिया और साथ ही इसे व्यावसायीकरण में भी ज्यादा समय नहीं लगा। बॉलीवुड फिल्म जगत में और साथ ही छोटे डिजाइन (Design) उद्यमों ने राष्ट्रीय स्तर पर चिकनकारी कार्य के सम्मान और प्रशंसा की वापसी में अपना बड़ा योगदान दिया। इस प्रकार, निस्संदेह, लखनऊ चिकन की विविधता में आज पहले की तुलना से और भी अधिक संपन्न है। आज यह सामान्य शहरी जनता, उच्च वर्गों, और बॉलीवुड और हॉलीवुड की हस्तियों में समान रूप से प्रचलित है।

संदर्भ :
1. http://sonamsrivastava.blogspot.com/2011/04/chikankari-not-just-embroidery.html/
2. http://chikankaari.com/the-history-behind-chikankari-and-types-of-stitches/
3. http://blog.myne.in/post/41453379850/types-of-stitches-in-chikankari
4. https://www.utsavpedia.com/motifs-embroideries/murri-and-phanda-stitch/


एक नज़र लखनऊ पर आधारित फिल्मों के गीतों पर

Lucknow
11-08-2018 11:13 AM

हिन्दी सिनेमा की शुरुआत राजा हरीश चंद्र पर बनी एक फिल्म से हुई थी। तब से अब तक सिनेमा के माध्यम से विभिन्न कलाओं का विकास हुआ है। संगीत, नृत्य, काव्य-कला, आदि कलाओं के विकास में भी सिनेमा ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, चूंकि सिनेमा मनोरंजन का माध्यम है। हमारी फिल्में ना केवल एक व्यक्ति की कहानी को दिखाती हैं बल्कि एक स्थान से संबंधित कला और संस्कृति को भी जन साधारण तक पहुंचाती हैं। ऐसी ही हमारे फिल्म जगत की तीन फिल्में हैं जो लखनऊ से जुड़ी हुई हैं, और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यहां की जीवन शैली, संस्कृति, तथा भाषा को दर्शाती हैं।

उन्हीं में से पहली फिल्म है ‘उमराव जान’। यदि उमराव जान का नाम आये और तब लखनऊ का ज़िक्र न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता। 1981 में बनी उमराव जान, मिर्ज़ा मुहम्मद हादी रुस्वा के उपन्यास ‘उमराव जान अदा’ पर आधारित है। यह फिल्म लखनऊ के नवाबी अंदाज़, मुशायरों और शायरियों को प्रदर्शित करती है। इस फिल्म के गीतों को अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान ने लिखा था, जिन्हें ‘शहरयार’ नाम से भी जाना जाता है। शहरयार का जन्म 1936 में बरेली के एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। उन्होनें 1961 में उर्दू में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। उन्हें सबसे ज्यादा लोकप्रियता उमराव जान के गीतों ‘इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं’ और ‘दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये’ से मिली। उन्हें वर्ष 2008 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी नवाज़ा गया।

‘शतरंज के खिलाड़ी’ फिल्म 1977 में बनी थी। यह फिल्म मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखी गई कहानी पर आधारित है, तथा इस फिल्म का निर्देशन प्रसिद्ध बांग्ला फिल्मकार सत्यजित राय ने किया था। इसकी कहानी लखनऊ तथा अवध के नवाब वाजिद अली शाह के साम्राज्य के दो समृद्ध नवाबों मिर्ज़ा सज्जद अली (संजीव कुमार द्वारा निभाया गया) और मीर रोशन अली (सईद जाफरी द्वारा निभाया गया) के इर्द-गिर्द घूमती है। ये दोनों नवाब शतरंज खेलने में इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें अपने शासन की भी फ़िक्र नहीं रहती थी। जहां इस फिल्म की शुरूआत अमिताभ बच्चन की शानदार आवाज से होती है, वहीं इसका अंत अंग्रेज़ों के अवध पर आधिपत्य के बाद के एक दृश्य से होता है, जिसमें दोनों खिलाड़ी शतरंज अपने पुराने देशी अंदाज़ की बजाय अंग्रेज़ी शैली में खेलने लगते हैं। फिल्म के संगीत के बारे में तो क्या ही कहना। फिल्म में संगीत निर्देशक के रूप में भी सत्यजीत राय ने ही कार्य किया था, तथा फिल्म में एक बड़ा ही अनोखा गीत है ‘तड़प तड़प सगरी रैन गुज़री’ जिसे गाया गया है मशहूर अभिनेता अमजद खान द्वारा। इस गीत को आप नीचे दिए गए वीडियो पर क्लिक करके सुन सकते हैं।


‘लखनऊ सेंट्रल’ एक और ऐसी फिल्म है जो ज़ाहिर तौर पर लखनऊ पर ही आधारित है क्योंकि इसके नाम में ही हमारे लखनऊ का ज़िक्र हो जाता है। यह फिल्म हत्या के आरोप में फंसे एक व्यक्ति के बारे में है, जो लखनऊ सेंट्रल जेल में सज़ा काट रहा है। इस बीच लखनऊ सेंट्रल जेल में एक बैंड प्रतियोगिता का आयोजन होता है जिसमें भाग लेने के लिए यह शख्स एक बैंड बनाता है। यह फिल्म बताती है कि कैसे इस व्यक्ति का जीवन जेल में व्यतीत होता है और कैसे वह इस बैंड को बनाकर संगीत के माध्यम से अपने जीवन को एक नयी दिशा देता है। फिल्म के गानों की बात करें तो वे बेहद आकर्षक और खूबसूरत हैं। फिल्म में एक से अधिक संगीत निर्देशकों ने कार्य किया था: तनिष्क बागची, अर्जुन हरजाई, रोचक कोहली। फिल्म में एक पुराने लोकप्रिय गीत ‘कावाँ कावाँ’ को पुनः जीवित किया गया है जिसे लेख के पहले वीडियो पर क्लिक करके आप सून सकते हैं। साथ ही एक गाना मशहूर गायक अरिजीत सिंह द्वारा भी गाया गया है। फिल्म में कुछ गाने सूफी शैली के गीत की ओर भी इशारा करते हैं।

संदर्भ:
1.https://www.thehindu.com/arts/shahryar-19362012-the-poet-who-gave-umrao-jaan-her-voice/article2893025.ece#!
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Akhlaq_Mohammed_Khan
3.https://www.thehindu.com/todays-paper/tp-features/tp-fridayreview/shatranj-ke-khilari-1977/article6063082.ece
4.https://en.wikipedia.org/wiki/Lucknow_Central
5.http://www.musicaloud.com/2017/09/08/lucknow-central-music-review-bollywood-soundtrack/


हर लखनऊ वासी को पढ़ने चाहिए ये 5 लेख

Lucknow
10-08-2018 02:00 PM

समय कैसे बीतता है पता ही नहीं चलता ना। प्रारंग का यह सफ़र भी कुछ ऐसा ही है जो अपने पाठकों के प्रोत्साहन के साथ चलता जा रहा है और दिन प्रतिदिन और भी मनोरंजक होता जा रहा है। हर दिन हमारे इस प्रारंग परिवार में कुछ नए सदस्य जुड़ते जा रहे हैं। तो आज हम कुछ समय निकालेंगे 2018 के अब तक के सफ़र की समीक्षा करने में।

आज की तारीख है 10 अगस्त 2018 तथा आज इस वर्ष का 222वां दिन है। इन 222 दिनों में प्रारंग अपने परिवार के लखनऊवासियों तक 216 लेख पहुंचा चुका है तथा यह लेख 217वां लेख होगा। यदि ध्यान दें तो लगभग हर दिन प्रारंग ने लखनऊ को समर्पित एक लेख आप तक पहुँचाया है। प्रारंग के अनूठे वर्गीकरण में यदि इन लेखों को देखा जाए तो संस्कृति से जुड़े 178 लेख तथा प्रकृति से जुड़े 38 लेख अब तक इस वर्ष में प्रस्तुत किये गए हैं। और यदि संस्कृति और प्रकृति के भीतर वर्गीकरण की बात करें तो लेखों का वितरण कुछ इस प्रकार है:

प्रकृति:
• समयसीमा- 20
• मानव व उसकी इन्द्रियाँ- 84
• मानव व उसके आविष्कार- 74

संस्कृति:
• भूगोल- 8
• जीव-जंतु- 15
• वनस्पति- 15

इन लेखों को प्रारंग के लखनऊ पोर्टल (http://lucknow.prarang.in/), फेसबुक (https://www.facebook.com/prarang.in/), ट्विटर (https://twitter.com/prarang_in?lang=en) तथा प्रारंग की एंड्राइड मोबाइल एप्लीकेशन (https://play.google.com/store/apps/details?id=com.riversanskiriti.prarang&hl=en_IN) द्वारा आप तक पहुँचाया गया। इनमें से लखनऊवासियों की सबसे अधिक प्रतिक्रिया फेसबुक पर देखने को मिली।

यदि बात करें फेसबुक लाइक्स (Facebook Likes) की तो वर्ष 2018 में लखनऊ के लेखों को करीब 5000 बार लाइक किया गया तथा उनपर कमेंट (Comment) के रूप में पाठकों द्वारा 46 बार टिप्पणी की गयी। आज प्रारंग के साथ फेसबुक पर करीब 43,000+ पाठक जुड़े हुए हैं जिनमें से 10,000+ पाठक लखनऊ से हैं। साथ ही प्रारंग की एंड्राइड मोबाइल एप्लीकेशन के 1000 से भी अधिक डाउनलोड (Download) हो चुके हैं जिनमें से लखनऊ से करीब 300 डाउनलोड हैं।

प्रारंग द्वारा प्रकाशित किये गए प्रस्तुत 5 लेख लखनऊवासियों में सबसे अधिक लोकप्रिय रहे। प्रत्येक लेख के ऊपर क्लिक कर आप उसे पढ़ सकते हैं:

1. कार्यस्थल तक पहुँचने का दैनिक संघर्ष
2. वीडियो गेम की लत किसी नशे से नहीं है कम
3. लखनऊ एक विदेशी कलाकार की नज़र से
4. लखनऊ में जानवरों की लड़ाई
5. क्यों हो गयी हमारी गोमती की ऐसी दयनीय दशा?

साथ ही हम आप सभी से आग्रह करना चाहेंगे कि हर लेख पर कमेंट और लाइक के रूप में अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर ज़ाहिर करें। अंत में प्रारंग अपने सभी लखनऊ के पाठकों को हमारे साथ बने रहने के लिए धन्यवाद कहना चाहेगा क्योंकि यह आप लोगों का निरंतर प्रोत्साहन ही है जो हमें हर दिन बेहतर से बेहतर कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।


हिरोशिमा पर परमाणु वार पर बनी फिल्मों में प्रेरणा है ‘शतरंज के खिलाड़ी’ की शैली से

Lucknow
09-08-2018 01:15 PM

20वीं सदी के दो प्रसिद्ध फिल्म (Film) निर्देशकों के नाम तो आपने सुना ही होंगे- सत्यजीत राय एवं जापान के अकीरा कुरोसावा। वास्तव में इनके और अन्य समकालीन निर्देशकों के बीच बहुत आदर-सम्मान था। वे एक दूसरे के काम को ध्यान से देखते थे, उनकी समीक्षा करते थे, तथा उनके शैलियों से प्रेरणा लेते थे।

राय, जिनके द्वारा भारतीय चलचित्र में एक अनूठी शैली की स्थापना की गयी, की फिल्मों में इतालवी यथार्थवाद (Italian Neorealism) का प्रभाव दिखाई देता है। दूसरी ओर, कुरोसावा, जो निर्देशकों में खुद एक प्रमुख नाम थे, और आज भी ‘रोशोमान’ जैसी फिल्मों के लिए याद किये जाते हैं, का यह कहना था कि ज़िन्दगी में राय की फिल्म न देखना, सूर्य और चन्द्रमा न देखने समान है, और राय के इंसानियत के प्रति प्रेम एवं उसके गहरे अवलोकन की बहुत प्रशंसा भी करते थे।

1857 ग़दर अथवा स्वतंत्रता संग्राम के विषय पर 1977 में बनी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ एक लोकप्रिय फिल्म है जिसमें लखनऊ के अतीत का एक काल्पनिक चित्र अमर है। यह राय की पहली हिंदी फिल्म थी, और इसमें वे गंभीर संघर्ष का काल (1856) दर्शाते हैं जब अंग्रेज़, नवाब वाजिद अली शाह के शासन-क्षेत्र पर कब्ज़ा कर रहे थे, और दो ठाकुर, जो नवाब की सहायता करने के ज़िम्मेदार होने चाहिए थे, शतरंज के खेल में मग्न थे।

आज तारीख अगस्त 9 है। अगस्त 6 एवं 9, 1945 में जापान के हिरोशिमा व नागासाकी पर अमरीका द्वारा परमाणु बम गिराए गए थे, जिसके पश्चात दूसरे विश्व युद्ध का अंत हुआ। विश्व में पहली बार इस पैमाने पर मानवीय विनाश हुआ, और आज तक हर अगस्त के महीने में, विभिन्न कलाकृतियाँ हमें इस घटना की याद दिलाती हैं।

कुरोसावा ने अपनी फिल्मों में कलात्मक तरीकों से न्युक्लियर बम की घटना से सम्बंधित हिंसा, संघर्ष, विनाश, आतंक, मायूसी, निराशा, उलझन और मोहभंग जैसे भाव दर्शाये हैं। उनकी ऐसी एक फिल्म है ‘रैपसोडी इन औगस्त’ (अंग्रेज़ी नाम Rhapsody in August) जिसका जापानी नाम है ‘हाचिगात्सु नो रापुसोदी’; ऐसा एक और बड़ा उदाहरण है ‘ड्रीम्स’ (Dreams)। ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसी फिल्मों की सरलता, मनुष्य की विफलताओं का तीव्र अवलोकन, मनुष्य की हिंसा और मायूसी का विस्तृत चित्र, आदि, विश्व भर की फिल्मों में जंग जैसे विषय को छू गया, खासकर परमाणु बमबारी के विशाल विषय को लेकर कुरोसावा जैसे कलाकारों की फिल्मों में।

संदर्भ:
1.https://en.wikipedia.org/wiki/Rhapsody_in_August
2.https://motherboard.vice.com/en_us/article/ezvbp7/hiroshima-dreams-how-a-cinema-legend-tackled-nuclear-terror
3.http://gregmitchellwriter.blogspot.com/2014/04/marquez-and-kurosawa.html
4.https://www.indiewire.com/2015/05/akira-kurosawa-said-watching-a-satyajit-ray-film-is-like-seeing-the-sun-or-moon-187504/
5.https://www.indiewire.com/2014/08/why-the-best-american-filmmakers-owe-a-debt-to-satyajit-ray-23072/
6.http://sensesofcinema.com/2002/great-directors/ray/


हमारे ऋण और रिज़र्व बैंक के ‘रेट्स’ का सम्बन्ध

Lucknow
08-08-2018 12:07 PM

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा निर्धारित रेपो रेट (Repo Rate) वह दर है, जिस पर आर बी आई (RBI) सभी बैंकों को ऋण देता है। जब यह केंद्रीय बैंक रेपो दर में बढ़ोतरी करता है तो सभी बैंक जो अभी तक केंद्रीय बैंक से लिए गए ऋण का भुगतान सामान्य दर पर कर रहे थे, अब वही भुगतान ब्याज की बड़ी हुई दर पर करने को बाध्य हो जाते हैं, अतः इस व्यय की क्षतिपूर्ति के लिए सभी बैंक अपने ग्राहकों को दिए गये ऋण की ब्याज दर भी बड़ा देते हैं, जिसका प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से व्यवसायों और व्यक्तियों पर पड़ता है।

पिछले वर्ष से पूर्व तकनीकी सलाहकार समिति के परामर्श पर दर की कटौती के संदर्भ में आर बी आई के गवर्नर द्वारा फैसला किया जाता था जिसके अनुसार गवर्नर अपने फैसले को रोक या बदल सकते थे, क्योंकि तकनीकी समिति की भूमिका केवल एक सलाहकार के रुप में थी। परंतु पिछले साल प्रणाली में बदलाव किये गए, अब आर बी आई ने एक नया मुद्रास्फीति-लक्ष्यीकरण शासन अपना लिया है, जिसके तहत केंद्रीय बैंक ने उपभोक्तों के मुद्रास्फीति को 4% या उससे कम रखने की आवश्यकता जताई है।

वहीं पिछले कुछ महीनों मे मुद्रास्फीति का स्तर कम रहा है। दूसरी ओर जून में वस्तु तथा सेवाओं की कीमतों में सिर्फ 1.5% की वृद्धि हुई, जबकि आरबीआई का पूर्वानुमान था की अप्रैल-सितंबर में मुद्रास्फीति 2%-3.5% रहेगी। मार्च 2016 के अंत में कुल निवेश में केवल 5.18% की वृद्धि हुई। 2016-17 वित्तीय वर्ष में बैंक क्रेडिट (bank credit) वृद्धि पिछले 60 वर्षों की तुलना में 5.1% से अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच गई थी।

आर बी आई की मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee) द्वारा प्रत्येक दो महीने में रेपो दर पर निर्णय लेती है। दर को अपरिवर्तित रखना (जैसा पिछले वर्ष किया गया था), उसमे वृद्धि करना तथा उसे घटाने के विकल्पों मे से भी चुनाव करती है। ब्याज दरों में बदलाव करना है या नहीं, यह तय करते हुए समिति अर्थव्यवस्था तथा मुद्रास्फीति के स्तर की स्थिति को भी देखती है। मुद्रास्फीति पर नियंत्रित करने के उद्देश्य से आर बी आई इस मौद्रिक नीति उपकरण का उपयोग, दर में कटौती करता है जिससे अर्थव्यवस्था की तरलता में वृद्धि हो जाती है।

आर बी आई ने रेपो दर में 25 बी पी एस (BPS अथवा Basis Points) या 0.25% से 8.25% की वृद्धि की है, बी पी एस वित्त में ब्याज दर तथा अन्य प्रतिशत को मापने की एक इकाई है , एक बीपीएस 1% के 1/100वें भाग के बराबर होता है। बैंक ग्राहकों को निश्चित ब्याज दर पर गृह ऋण, शिक्षा ऋण तथा व्यक्तिगत ऋण जैसे कई ऋण प्रदान करते हैं, जो रेपो दर के सीधे आनुपातिक हैं। अब रेपो दर में 0.25% की वृद्धि होती है तो यह वृद्धि सीधे एक आम नागरिक को दिए गए ऋण की ब्याज दर को भी प्रभावित करेगी, ऋण की ब्याज दर भी बढ़ेगी साथ ही ऋण के ईएमआई में भी वृद्धि होगी।

संदर्भ:
1.https://scroll.in/article/845634/why-the-business-media-is-obsessing-over-rbi-cutting-rates-and-how-it-affects-you
2.https://www.thehindubusinessline.com/money-and-banking/what-the-rate-hike-means-for-investors/article24097416.ece
3.https://www.quora.com/What-will-be-the-effect-if-the-RBI-increases-the-bank-rate


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