Writer:
Stephen Markel, Tushara Bindu Gude, Muzaffar Alam, Los Angeles County Museum of ArtPublisher:
Los Angeles County Museum of ArtTags:Art Objects - Art/Beauty
2.
WAILING BEAUTY : The Perishing Art of Nawabi Lucknow
Writer:
Sir William Henry Sleeman, Peter Denis REEVESPublisher:
Saiyed Anwer AbbasTags:Art Objects - Art/Beauty
क्या आपने देखा है लखनऊ की सबसे भव्य प्राकृतिक देन, 'ब्लू नवाब तितली' को?
तितलियों को अक्सर फूलों पर मंडराते और अमृत (nectar) पीते देखा जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में एक ऐसी तितली भी पाई जाती है जिसका नाम 'नवाबों' पर रखा गया है और जिसका खान-पान अन्य तितलियों से बिल्कुल अलग है? 'ब्लू नवाब' (Polyura schreiber) नाम की यह तितली न केवल अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) के स्वास्थ्य की एक बड़ी संकेतक भी है। कीट विज्ञानियों के अनुसार, जहाँ ब्लू नवाब मौजूद होती है, वहाँ का वातावरण अत्यंत शुद्ध और संतुलित माना जाता है।ब्लू नवाब क्या है और इसकी वैज्ञानिक पहचान क्या है?ब्लू नवाब, जिसे वैज्ञानिक भाषा में पॉलीउरा श्रेइबर (Polyura schreiber) कहा जाता है, निम्फालिडे (Nymphalidae) परिवार की सदस्य है। यह मुख्य रूप से 'ब्रश-फुटेड' तितलियों की श्रेणी में आती है। इसकी पहचान इसके मजबूत शरीर और तेज उड़ान से होती है। इस तितली के पंखों का फैलाव 92 से 116 मिलीमीटर तक हो सकता है। इसके पिछले पंखों पर दो छोटी पूंछ जैसी संरचनाएं (tails) होती हैं, जो इसे अन्य प्रजातियों से अलग और आकर्षक बनाती हैं।इसे 'ब्लू नवाब' ही क्यों कहा जाता है?इस तितली का नाम इसकी उपस्थिति और भारत के सांस्कृतिक इतिहास का एक अनूठा संगम है। 'ब्लू' शब्द इसके पंखों पर दिखने वाली सुंदर नीली चमक को दर्शाता है, जबकि 'नवाब' शब्द भारतीय इतिहास के उन शासकों और रईसों के लिए उपयोग किया जाता था जो अपनी भव्यता और गरिमा के लिए जाने जाते थे। चूँकि इस तितली की उड़ान अत्यंत शालीन, तेज और इसके रंगों में एक शाही चमक होती है, इसलिए इसे 'ब्लू नवाब' का नाम दिया गया। यह नाम इसकी राजसी सुंदरता और प्रकृति में इसके 'रॉयल' दर्जे का प्रतीक है।भारत के किन इलाकों में यह पाया जाता है?ब्लू नवाब मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय एशिया (Tropical Asia) में पाई जाती है। भारत की बात करें तो यह दक्षिण भारत, असम और हिमालय की तलहटी वाले क्षेत्रों में देखी जाती है। इसके अलावा, यह म्यांमार, दक्षिण-पूर्वी एशिया और चीन के कुछ हिस्सों तक फैली हुई है। भारत में इसकी अलग-अलग उप-प्रजातियां भी मिलती हैं, जैसे दक्षिण भारत में Polyura schreiber wardii और असम से लेकर दक्षिण-पूर्वी एशिया तक Polyura schreiber assamensis पाई जाती है।यह किस तरह के वातावरण में रहना पसंद करता है?अध्ययनों से पता चलता है कि ब्लू नवाब को घने वन क्षेत्र (Forested habitats) अधिक पसंद हैं। यह विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय जंगलों, पेड़ों से घिरे इलाकों और जल स्रोतों के पास वाले क्षेत्रों में रहती है। इसे शहरी पार्कों, बगीचों और मैंग्रोव दलदलों में भी देखा जा सकता है। यह तितली अक्सर पेड़ों की ऊँचाइयों पर बैठना पसंद करती है और सुबह के समय जंगल के निचले हिस्सों में तेजी से उड़ते हुए देखी जा सकती है।ब्लू नवाब का आहार अन्य तितलियों से अलग क्यों है?जहाँ अधिकांश तितलियाँ केवल फूलों के रस पर निर्भर रहती हैं, वहीं ब्लू नवाब के वयस्क सदस्यों की पसंद काफी अलग है। ये तितलियाँ पेड़ों के रस (tree sap), सड़े हुए कार्बनिक पदार्थों और कभी-कभी पशुओं के अवशेषों (carrion) या उनके मल तक से पोषक तत्व प्राप्त करती हैं। पेड़ों का रस इन्हें वे खनिज और पोषक तत्व प्रदान करता है जो फूलों के अमृत में नहीं मिलते। नर तितलियों को अक्सर गीली जमीन पर खनिज सोखते हुए भी देखा जा सकता है।इस तितली का जीवन चक्र और प्रजनन कैसे होता है?ब्लू नवाब का जीवन चक्र किसी चमत्कार से कम नहीं है। इसकी शुरुआत मादा द्वारा मेजबान पौधों (host plants) की पत्तियों के ऊपरी हिस्से पर दिए गए पीले, गोलाकार अंडों से होती है। एक अंडे का व्यास लगभग 1.9 मिमी होता है।लार्वा (Caterpillar): अंडे से निकलने वाला लार्वा शुरू में सुनहरा भूरा होता है, लेकिन जल्द ही हरा हो जाता है। इसके सिर पर चार सींग जैसी संरचनाएं होती हैं, जो इसे किसी छोटे 'ड्रैगन' जैसा लुक देती हैं। यह मुख्य रूप से 'रेड सागा' (Adenanthera pavonina), 'रंबूटन' और 'वागटिया' जैसे पौधों की पत्तियां खाता है।प्यूपा (Pupa): पूरी तरह विकसित होने के बाद, इल्ली प्यूपा में बदल जाती है। यह प्यूपा हरे रंग का होता है और देखने में किसी बेरी जैसा लगता है।वयस्क: लगभग 10 से 11 दिनों के बाद प्यूपा से एक सुंदर तितली बाहर आती है।पारिस्थितिकी तंत्र में इसकी क्या भूमिका है?बटरफ्लाई कंजर्वेशन जैसी संस्थाओं का मानना है कि तितलियाँ जैव विविधता की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। ब्लू नवाब जैसे जीव 'स्वास्थ्य संकेतक' के रूप में कार्य करते हैं। इनका मौजूद होना इस बात का प्रमाण है कि उस क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ है और वहाँ प्रदूषण का स्तर कम है। इसके अलावा, ये परागण (pollination) में मदद करती हैं और खाद्य श्रृंखला (food chain) का एक अहम हिस्सा हैं, जहाँ पक्षी और चमगादड़ इनका शिकार करते हैं।दुर्भाग्य से, ब्लू नवाब को सबसे बड़ा खतरा आवास विनाश (Habitat destruction) से है। जंगलों की कटाई और शहरीकरण के कारण इनके रहने और प्रजनन के स्थान कम हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हमें इन 'शाही तितलियों' को बचाना है, तो हमें उनके प्राकृतिक आवासों और उन विशिष्ट मेजबान पौधों का संरक्षण करना होगा जिन पर इनका जीवन निर्भर है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2db6n7l2 2. https://tinyurl.com/29q3qkal 3. https://tinyurl.com/2dw65blm 4. https://tinyurl.com/2bxa2st3 5. https://tinyurl.com/24cts9mb
वास्तुकला II - कार्यालय/कार्य उपकरण
अचानक रुकती धड़कनों को फिर से कैसे शुरू कर देते हैं,पेसमेकर और आईसीडी जैसे छोटे से यंत्र?
फरवरी 1980 की एक सुबह जॉन्स हॉपकिन्स अस्पताल में चिकित्सा जगत ने एक अभूतपूर्व घटना देखी। डॉ. लेवी वॉटकिंस जूनियर ने एक 47 वर्षीय महिला के शरीर में दुनिया का पहला 'इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर डिफिब्रिलेटर' (Implantable Cardioverter Defibrillator ICD) प्रत्यारोपित किया। यह वह दौर था जब विशेषज्ञ इस तकनीक को लेकर संशय में थे। यहाँ तक कि बाहरी डिफिब्रिलेटर के आविष्कारक बर्नार्ड लाउन ने भी इसे "एक अव्यवहारिक समाधान" करार दिया था। लेकिन आज, यही यंत्र दुनिया भर में अचानक होने वाली कार्डियक डेथ (Sudden Cardiac Death) को रोकने का सबसे प्रमुख हथियार बन चुका है।ICD क्या है और यह हमारे दिल की सुरक्षा कैसे करता है?इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर-डिफिब्रिलेटर (ICD) एक छोटा, बैटरी से चलने वाला उपकरण है जिसे शरीर के अंदर, आमतौर पर बाएं कॉलरबोन के नीचे लगाया जाता है। विकिपीडिया के आंकड़ों के अनुसार, यह मुख्य रूप से उन मरीजों के लिए उपयोग किया जाता है जिन्हें वेंट्रिकुलर फाइब्रिलेशन या वेंट्रिकुलर टैकीकार्डिया जैसी जानलेवा स्थितियों का खतरा होता है। यह उपकरण लगातार हृदय की लय (Rhythm) की निगरानी करता है।इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर-डिफिब्रिलेटर (ICD)जब भी हृदय की गति एक निर्धारित सीमा से अधिक तेज़ या अनियमित हो जाती है, तो यह उपकरण तुरंत उसे पहचान लेता है। आधुनिक ICD न केवल खतरनाक धड़कन को पहचानते हैं, बल्कि वे 'ओवरड्राइव पेसिंग' या 'एंटी-टैकीकार्डिया पेसिंग' (ATP) के जरिए दिल को सामान्य लय में लाने की कोशिश भी करते हैं। यदि गति फिर भी अनियंत्रित रहती है, तो यह उपकरण एक बिजली का झटका (Shock) भेजता है ताकि हृदय फिर से अपनी सामान्य गति पर लौट सके। इसकी कार्यप्रणाली किसी आपातकालीन कक्ष में डॉक्टर द्वारा दिए जाने वाले बाहरी झटके के समान ही होती है, लेकिन शरीर के अंदर होने के कारण इसे बहुत कम वोल्टेज की आवश्यकता होती है।चिकित्सा इतिहास में इन उपकरणों का विकास कैसे हुआ?हृदय को सहारा देने की सुरक्षा करने वाले इन उपकरणों की कहानी लगभग 100 साल पुरानी है। पेसमेकर के विकास की शुरुआत 1928 में हुई थी, लेकिन पहला पूरी तरह से प्रत्यारोपित होने वाला पेसमेकर 1958 में स्वीडन के करोलिंस्का संस्थान में लगाया गया था। इसे रूण एल्मक्विस्ट और सर्जन एके सेनिंग ने विकसित किया था। दिलचस्प तथ्य यह है कि दुनिया के पहले पेसमेकर प्राप्त करने वाले मरीज, अर्ने लार्सन, अपने जीवनकाल में 26 अलग-अलग पेसमेकर उपकरणों के साथ 86 वर्ष की आयु तक जीवित रहे।ICD के विकास का श्रेय डॉ. मिशेल मिरोव्स्की और उनकी टीम को जाता है। 1969 में शुरू हुई उनकी रिसर्च को 11 साल बाद सफलता मिली। एप्लाइड फिजिक्स लेबोरेटरी (APL) ने इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहाँ अंतरिक्ष यान में इस्तेमाल होने वाली उच्च-तकनीक और गुणवत्ता नियंत्रण तकनीकों को इस मेडिकल डिवाइस में लागू किया गया। शुरुआती दौर में ये उपकरण इतने बड़े थे कि उन्हें पेट के क्षेत्र में प्रत्यारोपित करना पड़ता था और इसके लिए मरीज की पसलियों को खोलना पड़ता था।पेसमेकर और ICD के बीच मुख्य अंतर क्या है?यद्यपि ये दोनों उपकरण दिखने में एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन इनका कार्य अलग है। पेसमेकर मुख्य रूप से 'ब्रैडीकार्डिया' यानी धीमी धड़कन के इलाज के लिए होता है। यह तब काम करता है जब हृदय का प्राकृतिक पेसमेकर सही संकेत नहीं दे पाता। दूसरी ओर, ICD एक अधिक उन्नत प्रणाली है जिसमें पेसमेकर और डिफिब्रिलेटर दोनों के गुण होते हैं। यह धीमी धड़कन को सामान्य करने के साथ-साथ जानलेवा तेज़ धड़कन को रोकने की क्षमता भी रखता है। मे़डट्रॉनिक (Medtronics) के अनुसार, आधुनिक पेसमेकर अब विटामिन के कैप्सूल जितने छोटे (Leadless Pacemakers) भी आने लगे हैं, जिन्हें सीधे हृदय के अंदर लगाया जा सकता है।पेसमेकर ग्लोबल मार्केट और भारत में इन उपकरणों की आपूर्ति कैसे होती है?इन जीवनरक्षक उपकरणों का निर्माण और वैश्विक आपूर्ति मुख्य रूप से कुछ बड़ी कंपनियों जैसे मे़डट्रॉनिक (Medtronic), सेंट जूड मेडिकल (अब एबॉट) और बोस्टन साइंटिफिक द्वारा की जाती है। साइंस डायरेक्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, ICD एक जटिल प्रणाली है जिसमें पल्स जेनरेटर, लीड्स (तारे) और एक प्रोग्रामर शामिल होता है। इसके जेनरेटर में कंप्यूटर चिप, रैम, प्रोग्रामेबल सॉफ्टवेयर और लिथियम-सिल्वर वैनेडियम बैटरी होती है।भारत जैसे देशों में, जहाँ हृदय रोगों का बोझ बहुत अधिक है, इन उन्नत चिकित्सा तकनीकों के लिए मुख्य रूप से आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। पीएमसी (PMC) की शोध रिपोर्ट बताती है कि भारत इन उपकरणों का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगवाता है। उन्नत मेडिकल ग्रेड बैटरी और माइक्रो-इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्माण की स्थानीय सीमाओं के कारण, भारत के मरीजों को इन वैश्विक कंपनियों की तकनीक पर ही भरोसा करना पड़ता है। हालांकि, तकनीकी प्रगति के साथ इन उपकरणों की बैटरी लाइफ अब 10 साल से अधिक होने लगी है, जिससे बार-बार सर्जरी की आवश्यकता कम हुई है।इन उपकरणों के साथ जीवन जीने की क्या चुनौतियाँ हैं?एक बार ICD या पेसमेकर लग जाने के बाद मरीज एक सामान्य और सक्रिय जीवन जी सकता है, लेकिन कुछ सावधानियां बरतनी ज़रूरी होती हैं। मरीजों को तेज़ चुंबकीय क्षेत्र, एमआरआई (MRI) मशीनों और कुछ विशेष औद्योगिक उपकरणों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। हालांकि, मे़डट्रॉनिक जैसी कंपनियों ने अब 'MRI-Conditional' उपकरण पेश किए हैं, जिन्हें विशेष सेटिंग्स के साथ एमआरआई स्कैन के दौरान सुरक्षित रखा जा सकता है।मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका गहरा प्रभाव देखा गया है। शोध बताते हैं कि लगभग 13% से 38% मरीजों में अचानक लगने वाले झटके के डर से चिंता (Anxiety) और अवसाद के लक्षण देखे जा सकते हैं। इसीलिए, आधुनिक उपकरणों में अब ऐसी तकनीकें शामिल की जा रही हैं जो 'इनएप्रोप्रिएट शॉक' (गलत समय पर लगने वाले झटके) को कम कर सकें।क्या है इन उपकरणों का भविष्य?चिकित्सा जगत अब 'लीडलेस' (बिना तारों वाले) उपकरणों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की ओर बढ़ रहा है। मे़डट्रॉनिक के अनुसार, रिमोट मॉनिटरिंग सिस्टम अब डॉक्टरों को इंटरनेट के माध्यम से घर बैठे मरीज के दिल की जानकारी देने में सक्षम हैं। भविष्य में, एआई इन उपकरणों के डेटा का विश्लेषण कर धड़कन बिगड़ने से पहले ही डॉक्टर को चेतावनी दे सकेगा। भारत के लिए चुनौती इन महँगी तकनीकों को आम जनता के लिए सुलभ और किफायती बनाने की है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/h925vt8 2. https://tinyurl.com/24nwczyp 3. https://tinyurl.com/2263e94d 4. https://tinyurl.com/22cvptb5 5. https://tinyurl.com/ojwh4vb 6. https://tinyurl.com/27mspxyw 7. https://tinyurl.com/2xrh4q9w 8. https://tinyurl.com/24zwfqwk
स्पर्श - बनावट/वस्त्र
लखनऊ की ज़रदोज़ी कढ़ाई जैसे शिल्प, व्यापक मशीनी निर्माण के युग में भी बने हैं प्रासंगिक
लखनऊ, आज हम समझेंगे कि ‘शिल्प’ क्या होता है, और इसमें कुशल और रचनात्मक हस्तनिर्मित उत्पाद कैसे शामिल होते हैं। फिर, हम विनिर्माण के बारे में जानेंगे, और देखेंगे कि मशीनों की मदद किस प्रकार बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। इसके बाद, हम हथकरघा और मशीन से बने कपड़ों को देखकर, शिल्प और विनिर्माण की तुलना करेंगे। लेख में अंत में, हम देखेंगे कि ‘ज़रदोज़ी और चिकनकारी कढ़ाई’ पारंपरिक शिल्प कौशल व दक्षता के साथ, मशीन से बने कपड़ों में मानवीय स्पर्श कैसे जोड़ती है।कलाकारों द्वारा, पूरी तरह से हाथ से या हस्त उपकरणों की सहायता से बनाए गए उत्पादों को ‘शिल्प’ कहा जाता है। कारीगर की प्रत्यक्ष मेहनत व कुशलता, ऐसे उत्पाद का सबसे महत्वपूर्ण घटक होता है। ये उत्पाद संस्कृतियों को जोड़ते हैं। वे उस स्थान का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां से वे संबंधित हैं। वे सुंदर, कार्यात्मक और पारंपरिक होते हैं। शिल्प निर्माण से ऐसे उत्पाद बनते हैं, जो एक दूसरे से विशिष्ट होते हैं, क्योंकि इनका निर्माण एक समय में एक ही कारीगर द्वारा किया जाता है। इस कारण, आध्यात्मिक और सामाजिक ज्ञान रखने वाले ग्राहक इन्हें उपयोगी और महत्वपूर्ण पाते हैं।शिल्प उत्पादन प्राचीन काल से ही अस्तित्व में है, और औद्योगिक व्यवसाय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उत्पादन का यह रूप औद्योगिक क्रांति से पहले काफी आम था। यांत्रिक या बड़े पैमाने पर उत्पादन के आगमन से पहले, सभी उत्पादित चीजें हस्तनिर्मित होती थीं। वे उत्पाद सरल उपकरणों और बिना किसी स्वचालित प्रक्रिया के बिना, हाथ से बनाए जाते थे।वास्तव में, ‘विनिर्माण’ वह उद्योग है, जो मानवीय श्रम या मशीन के उपयोग से कच्चे माल से उत्पाद बनाता है। सरल अर्थ में, यह बड़े पैमाने पर तैयार उत्पादों में, उनके घटकों के निर्माण या संयोजन को दर्शाता है। सबसे महत्वपूर्ण विनिर्माण उद्योगों में, विमान, ऑटोमोबाइल, रसायन, कपड़े, कंप्यूटर, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, विद्युत उपकरण, फर्नीचर, भारी मशीनरी, परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद, जहाज, इस्पात, उपकरण और डाई आदि शामिल हैं।बड़े पैमाने पर होने वाले विनिर्माण में, उत्पादन मात्रा बढ़ने पर प्रति उत्पाद लागत कम हो जाती है। उत्पादन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करके और विशेष मशीन का उपयोग करके, श्रम लागत को भी कम किया जा सकता है, और उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है। मानकीकृत प्रक्रियाओं और मशीन के साथ आसानी से, उत्पादों की बड़ी मात्रा में प्रतिकृतियां बनाई जा सकती हैं और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन किया जा सकता है। उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग और विस्तारित बाज़ारों की जरूरतों को पूरा करने के लिए, यह मापनीयता महत्वपूर्ण है।ऐसी व्यापक उत्पादन क्रांति ने विभिन्न उद्योगों में नवाचार और तकनीकी प्रगति को प्रेरित किया है। चूंकि, कोई भी निर्माता दक्षता और उत्पादकता बढ़ाने का प्रयास करते हैं, वे उत्पादन प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने और नई प्रौद्योगिकियां अपनाने हेतु अनुसंधान और विकास में निवेश करते हैं।इसके विपरीत, पैमाने के संदर्भ में कारीगर विनिर्माण अक्सर सीमित होता है। चूंकि ये उत्पाद हस्तनिर्मित होते हैं, इसलिए किसी समय सीमा के भीतर बड़ी मांग को पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। प्रत्येक उत्पाद के लिए आवश्यक समय और प्रयास से, बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन करना मुश्किल हो सकता है। कारीगर विनिर्माण महंगा भी हो सकता है। हस्तनिर्मित उत्पादों की श्रम-गहन प्रकृति के साथ-साथ, कारीगरों की विशेषज्ञता और कौशल के परिणामस्वरूप उनकी उत्पादन लागत उच्च हो सकती है। इसके अलावा, प्रत्येक उत्पाद को हाथों से बनाने में समय लगता है, और उसकी बारीकियों पर ध्यान देना पड़ता है। कारीगर अपनी कृतियों की गुणवत्ता और विशिष्टता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास करते हैं। हालांकि, विस्तार पर ध्यान देने से उत्पादन समय भी लंबा हो सकता है।जबकि बड़े पैमाने पर होने वाले उत्पादन के अपने फायदे हैं, कारीगर विनिर्माण द्वारा लाए जाने वाले अद्वितीय मूल्य और गुणों को स्वीकार करना महत्वपूर्ण है। कारीगरों के सामने आने वाली चुनौतियों के कारण बड़े पैमाने पर उत्पादन का उदय हुआ है, लेकिन हस्तनिर्मित उत्पादों के साथ आने वाली कलात्मकता, शिल्प कौशल और व्यक्तित्व के लिए अभी भी जगह है। अतः व्यापक उत्पादन और कुछ क्षेत्रों में अद्वितीय शिल्प कौशल एवं व्यक्तित्व संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।चलिए, इन दो विपरीत स्थितियों का एक उदाहरण देखते हैं। हथकरघा कपड़ा, मानवीय रूप से संचालित करघे पर बुना गया कोई भी कपड़ा है। हथकरघे में एक ढांचा होता है, जो ऊर्ध्वाधर ताना धागों को तना हुआ रखता है, जबकि बुनकर हाथ, पैर पैडल और एक शटल का उपयोग करके क्षैतिज बाने के धागों को उनसे जोड़ते हैं। एक कुशल कारीगर, पूरे कार्य दिवस में आम तौर पर पांच से आठ मीटर कपड़ा बुनता है। इस प्रकार बुने हुए कपड़े में थोड़ी अनियमित बनावट होती है, परंतु यह मुलायम एवं हवादार होता है। भारत में हथकरघा क्षेत्र, कृषि के बाद ग्रामीण रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है, जो 4.3 मिलियन से अधिक बुनकरों और संबद्ध श्रमिकों को रोजगार प्रदान करता है। वैश्विक हथकरघा उत्पादन में भारत का हिस्सा लगभग 85 प्रतिशत है।हथकरघे के विपरीत, एक पावरलूम मशीन बिजली से चलती है, और एक मशीन चौदह हथकरघों के उत्पादन को प्रतिस्थापित कर सकती है। पावरलूम में बने कपड़े कसकर और समान रूप से बुने जाते हैं, जिससे यह सख्त और कम हवादार होते हैं। समय के साथ उनमें कृत्रिम अहसास विकसित होने लगता है, जबकि हाथ से बुने हुए कपड़े उपयोग के साथ नरम हो जाते हैं। हथकरघा बुनाई में शून्य विद्युत ऊर्जा की खपत होती है, और कई कारीगर आज भी प्राकृतिक तथा पौधों पर आधारित रंगों पर निर्भर हैं। इसी कारण, हथकरघा कपड़ा चुनना, कम कार्बन प्रभाव और उस शिल्प के संरक्षण के लिए प्रयास है।दरअसल, हस्तशिल्प का परिणाम सजावटी चीज़ें या प्राचीन, संशोधित पारंपरिक या फैशनेबल उत्पाद होते हैं। ऐसे उत्पादों में उपयोग की जाने वाली सामग्री प्राकृतिक, औद्योगिक रूप से संसाधित या शायद पुनर्नवीनीकृत हो सकती है। हस्तकला उत्पाद में, शिल्पकार अपनी सांस्कृतिक विरासत के विचारों, रूपों, सामग्रियों और कार्य के तरीकों के साथ-साथ अपने स्वयं के मूल्यों, जीवन दर्शन, फैशन और आत्म-छवि में स्थानांतरित करते हैं। हस्तशिल्प में प्रचुर मात्रा में अंतर्निहित डेटा होता है, जो कौशल के साथ हर साल बढ़ता है।वर्तमान समय में, मशीन से बने कपड़े अक्सर एक आधार के रूप में काम करते हैं, जिसे कारीगर हाथ की कढ़ाई से निखारते हैं। बड़े पैमाने पर होने वाले उत्पादन में, कपड़ों को मशीनों का उपयोग करके बुना, रंगा और सिला जाता है, जिससे समय और लागत कम हो जाती है। फिर इन कपड़ों को कुशल कारीगरों को सौंप दिया जाता है, जो इनपर हाथ की कढ़ाई करते हैं। इससे प्रत्येक टुकड़े को एक अद्वितीय और सजावटी फिनिश मिलती है।मशीन से बने कपड़े वास्तव में कढ़ाई के लिए उपयुक्त होते हैं, क्योंकि वे बनावट में एक समान होते हैं और कसकर बुने जाते हैं। यह स्थिरता कारीगरों के लिए कपड़े को खींचे या विकृत किए बिना, सटीक और विस्तृत डिज़ाइन बनाना आसान बनाती है। परिणामस्वरूप, असमान हस्तनिर्मित कपड़ों पर काम करने की तुलना में कढ़ाई साफ-सुथरी और अधिक परिष्कृत दिखाई देती है।इस संयोजन से उत्पादकों और कारीगरों दोनों को लाभ होता है। निर्माता कम लागत पर बड़ी मात्रा में उत्पादन कर सकते हैं, जबकि कारीगर उत्पाद के मूल्य और आकर्षण को बढ़ाने के लिए अपने कौशल का योगदान करते हैं। यह पारंपरिक कढ़ाई तकनीकों को आधुनिक फैशन में एकीकृत करके संरक्षित करने में भी मदद करता है।इसी संबंध का एक उदाहरण ‘ज़रदोज़ी कढ़ाई’ है। आज, यह कढ़ाई मशीन पर बने कपड़ों पर की जाती है। कढ़ाई का यह रूप, फारस से भारत में प्रचलित हुआ था। शाब्दिक तौर पर, "ज़र" का अर्थ सोना है, और “दोज़ी" का अर्थ कढ़ाई है। इस प्रकार, ज़रदोज़ी, विभिन्न कपड़ों पर कढ़ाई करने के लिए धातु से बंधे धागों का उपयोग करने की प्रक्रिया को संदर्भित करता है।औरंगजेब के शासनकाल के दौरान हमारा शहर लखनऊ इस कढ़ाई तकनीक का केंद्र बना था, जब सत्तारूढ़ मुगलों के तहत इस शाही कला को प्रोत्साहित किया गया। उनके संरक्षण ने ज़रदोज़ी कलाकारों को पूरे भारत में फैलने के लिए प्रोत्साहित किया। हालांकि, नवाबों के शहर से उच्च मांग के कारण लखनऊ उत्पादन का मुख्य केंद्र बना रहा। परंतु, समय के साथ सोने और चांदी की कीमतों में वृद्धि के साथ, ऐसी महंगी सामग्रियों का उपयोग मुश्किल हो गया, और कारीगरों ने सोने और चांदी में पॉलिश किए गए कृत्रिम धागों या तांबे के तारों का उपयोग करने का संकल्प लिया।हाल ही में, भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री ने लखनऊ और हमारे आसपास के जिलों में निर्मित सभी ज़रदोज़ी वस्त्रों को जीआई टैग (GI tag) प्रदान किया है। हैदराबाद, दिल्ली, आगरा, कश्मीर, कोलकाता, वाराणसी और फर्रुखाबाद जैसे शहर, इस कढ़ाई के अन्य विशेष क्षेत्र हैं।ज़रदोज़ी को दो अलग-अलग शैलियों में तैयार किया जाता है। पहली शैली ‘करचोबी’ है, जिसे मखमल या साटन जैसी भारी आधार सामग्री पर इसके टांके के घनत्व से पहचाना जाता है। यह आमतौर पर कोट, टेंट कवरिंग, फर्निशिंग और कैनोपी जैसे कपड़ों पर देखी जाती है। दूसरी शैली ‘कामदानी’ है, जिसमें रेशम और मलमल जैसे सुरुचिपूर्ण कपड़ों पर हल्का एवं नाजुक काम होता है। यह राजस्थान में प्रसिद्ध है। हालांकि इस तरह का काम स्कार्फ और घूंघट के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है, आजकल यह दुल्हनों के पहनावे पर सबसे ज्यादा दिखाई देता है।ज़रदोज़ी डिज़ाइन को पहले कपड़े पर रेखांकित किया जाता है, और फिर मिश्रित धातु के तारों और आकृतियों को उस पर फैलाया जाता है। धातु के तारों से डिज़ाइन बनाए जाते हैं, तथा कपड़े पर इन तत्वों को सिलने के लिए सुई और धागे का उपयोग किया जाता है। ज़रदोज़ी में आमतौर पर फूलों के डिज़ाइन के साथ-साथ ज्यामितीय आकृतियां भी होती हैं, जो इन्हें सुंदर रूप प्रदान करती है। संदर्भ1. https://tinyurl.com/4x696r75 2. https://tinyurl.com/3mfbennz 3. https://tinyurl.com/ys2vh52u 4. https://tinyurl.com/2s42kucn 5. https://tinyurl.com/4arvc683 6. https://tinyurl.com/2dd8c9pt
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
क्या आपका हर कदम और क्लिक डेटाबेस में दर्ज हो रहा है?
क्या आप जानते हैं कि एक एंड्रॉयड स्मार्टफ़ोन जब बिल्कुल खाली रखा होता है और उसका कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा होता, तब भी वह हर बारह घंटे में एक मेगाबाइट डेटा गूगल के सर्वर पर भेजता है? यह चौंकाने वाला आंकड़ा उस कंपनी का है जिसने 1995 में स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के एक हॉस्टल के कमरे से अपनी शुरुआत की थी। आज वह कंपनी न केवल दुनिया भर की जानकारी को व्यवस्थित कर रही है, बल्कि हमारे डिजिटल जीवन के हर कदम को ट्रैक भी कर रही है। आइए विस्तार से समझते हैं कि कैसे एक छोटा सा सर्च इंजन आज दुनिया की सबसे बड़ी डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ताकत बन चुका है और कैसे यह ओपन नॉलेज के सबसे बड़े स्रोत विकिपीडिया के अस्तित्व के लिए एक नई चुनौती पैदा कर रहा है।क्या एक गैराज से शुरू हुआ सफर आज पूरी दुनिया को चला रहा है?गूगल की कहानी की शुरुआत साल 1995 में स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से होती है, जहाँ लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन की पहली मुलाकात हुई थी। कुछ लोगों का कहना है कि अपनी पहली मुलाकात में वे लगभग हर बात पर असहमत थे, लेकिन अगले ही साल उन्होंने एक साझेदारी कर ली। अपने हॉस्टल के कमरों से काम करते हुए, उन्होंने एक ऐसा सर्च इंजन बनाया जो वर्ल्ड वाइड वेब पर पेजों का महत्व तय करने के लिए लिंक्स का इस्तेमाल करता था। शुरुआत में उन्होंने इस सर्च इंजन का नाम बैकरब रखा था। कुछ समय बाद इसका नाम बदलकर गूगल कर दिया गया, जो असल में गणित के एक शब्द का बिगड़ा हुआ रूप था जिसमें एक के बाद सौ शून्य होते हैं। अगस्त 1998 में सन माइक्रोसिस्टम्स के सह-संस्थापक एंडी बेचटोल्शेम ने लैरी और सर्गेई को एक लाख डॉलर का चेक दिया और आधिकारिक तौर पर गूगल इंक का जन्म हुआ। इस निवेश के बाद टीम हॉस्टल से निकलकर कैलिफ़ोर्निया के मेनलो पार्क में सुज़ैन वोज्स्की के गैराज में शिफ्ट हो गई। उस गैराज में भारी-भरकम कंप्यूटर, एक पिंग पोंग टेबल और नीले रंग का कालीन उनके शुरुआती दिनों की पहचान हुआ करते थे। समय के साथ कंपनी तेज़ी से बढ़ी और गैराज से निकलकर कैलिफ़ोर्निया के माउंटेन व्यू स्थित अपने मौजूदा मुख्यालय 'द गूगलप्लेक्स' में पहुँच गई। आज गूगल यूट्यूब, एंड्रॉयड, जीमेल और गूगल सर्च जैसे सैकड़ों उत्पाद बनाता है जिनका इस्तेमाल दुनिया भर के अरबों लोग करते हैं।क्या आपका हर कदम और क्लिक डेटाबेस में दर्ज हो रहा है?गूगल आज इंटरनेट की दुनिया में हर जगह मौजूद है और इसका डेटा कलेक्शन मॉडल बेहद विशाल है। ट्रिनिटी कॉलेज के एक शोधकर्ता डग लेह के अनुसार, गूगल का एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम एप्पल के आईओएस सिस्टम के मुकाबले बीस गुना ज़्यादा डेटा इकट्ठा करता है। गूगल के पास आपकी यूट्यूब हिस्ट्री, जीमेल के ईमेल, गूगल ड्राइव की फ़ाइलें, गूगल मैप्स की लोकेशन्स और गूगल कैलेंडर के शेड्यूल जैसी हर चीज़ की सीधी पहुँच है। जब आप कोई गूगल अकाउंट बनाते हैं, तो आप अपना फोन नंबर और क्रेडिट कार्ड जैसी निजी जानकारी देते हैं। गूगल की अपनी प्राइवेसी पॉलिसी के मुताबिक, जब आप उनकी सेवाओं का इस्तेमाल करते हुए कोई कंटेंट बनाते हैं, अपलोड करते हैं या प्राप्त करते हैं, तो कंपनी उसे कलेक्ट करती है। इसके अलावा, गूगल आपके ब्राउज़र का प्रकार, ऑपरेटिंग सिस्टम, मोबाइल नेटवर्क, आईपी एड्रेस और क्रैश रिपोर्ट भी जमा करता है। आपकी लोकेशन का पता लगाने के लिए गूगल सिर्फ़ जीपीएस पर निर्भर नहीं है, बल्कि वह आपके आस-पास मौजूद पब्लिक वाई-फ़ाई और सेल टावर का भी इस्तेमाल करता है। साल 2005 में वेब स्टैटिस्टिक्स कंपनी अर्चिन को खरीदने के बाद गूगल ने वेब एनालिटिक्स का भी लोकतंत्रीकरण कर दिया। वेबसाइट के मालिकों को गूगल एनालिटिक्स के ज़रिए यूज़र्स की उम्र, लिंग और रुचियों का जनसांख्यिकीय डेटा भी मिलता है। हालाँकि गूगल इस भारी भरकम डेटा का इस्तेमाल अपने विज्ञापनों को ज़्यादा सटीक बनाने और व्यक्तिगत अनुभव को बेहतर करने के लिए करता है।क्या आपकी निजी जानकारी अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को ट्रेन कर रही है?डेटा जुटाने की इसी कड़ी में अब एक नया अध्याय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जुड़ गया है। गूगल ने हाल ही में अपनी प्राइवेसी पॉलिसी में बदलाव करते हुए साफ़ कर दिया है कि वह इंटरनेट पर मौजूद सभी सार्वजनिक जानकारी का इस्तेमाल अपने एआई सिस्टम जैसे गूगल ट्रांसलेट, बार्ड और क्लाउड एआई को ट्रेन करने के लिए करेगा। क्या जीमेल का निजी डेटा भी एआई को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल हो रहा है, यह सवाल अभी भी रहस्य बना हुआ है। जब गूगल के चैटबॉट बार्ड से यह पूछा गया तो उसने खुद दावा किया था कि उसे जीमेल के डेटा से ट्रेन किया गया है, लेकिन गूगल ने तुरंत इसका खंडन करते हुए कहा कि बार्ड लार्ज लैंग्वेज मॉडल पर आधारित है जो गलतियां कर सकता है और इसे जीमेल डेटा पर ट्रेन नहीं किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि बार्ड और जेमिनी जैसे टूल्स गूगल की एक कोशिश हैं ताकि वह मुफ्त में उपलब्ध जानकारी पर कब्ज़ा कर सके और उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सके। पारंपरिक गूगल सर्च में जहाँ उपयोगकर्ताओं को जानकारी का मूल स्रोत देखने को मिलता था, वहीं अब चैटजीपीटी और बार्ड जैसे टूल्स सीधे जवाब देते हैं और लोगों से स्रोत जाँचने का विकल्प छीन लेते हैं। यह बिल्कुल उसी तरह है जब गूगल ने एएमपी प्रोजेक्ट शुरू किया था ताकि यूज़र्स ज़्यादा से ज़्यादा समय उनके ही सिस्टम पर बिताएं और बाहर के लिंक्स पर क्लिक न करें। क्या दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञानकोष सिर्फ गूगल का ईंधन बन रहा है?गूगल के इस विशाल एआई और सर्च इकोसिस्टम को शक्ति देने में विकिपीडिया का सबसे बड़ा योगदान रहा है। ऐतिहासिक रूप से गूगल ने विकिपीडिया के ऑर्गेनिक ट्रैफ़िक का लगभग 80 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा प्रदान किया है। साल 2012 में जब गूगल ने अपना नॉलेज ग्राफ़ लॉन्च किया, तो उसने खोज परिणामों में सीधे जानकारी दिखाने के लिए विकिपीडिया के डेटा का भारी इस्तेमाल किया। इसके बाद 2014 के आसपास शुरू हुए 'फीचर्ड स्निपेट्स' में भी विकिपीडिया की सामग्री का प्रमुखता से उपयोग हुआ, जिसके तहत लगभग 99 प्रतिशत स्निपेट्स टॉप सर्च रिज़ल्ट्स से आते हैं। गूगल ने इस साझेदारी को बनाए रखने के लिए 2010 और 2019 में विकिमीडिया फाउंडेशन को बीस-बीस लाख डॉलर के अनुदान भी दिए थे। लेकिन 2022 में दोनों के बीच एक बड़ा व्यावसायिक बदलाव आया, जब गूगल 'विकिमीडिया एंटरप्राइज़' का एक भुगतान करने वाला ग्राहक बन गया। इसके तहत गूगल को विकिपीडिया के डेटाबेस का सीधा और रियल-टाइम एक्सेस मिलता है ताकि वह अपने सर्च उत्पादों में बिना किसी देरी के एकदम ताज़ा जानकारी डाल सके। हालांकि गूगल के एल्गोरिदम पर निर्भरता के अपने नुकसान भी हैं; मैनहट्टन इंस्टीट्यूट के एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि विकिपीडिया के लेखों में अक्सर राजनीतिक झुकाव होता है और गूगल के सर्च एल्गोरिदम बिना किसी चेतावनी के इसी जानकारी को लाखों लोगों तक पहुँचाकर उसे एक निष्पक्ष तथ्य के रूप में स्थापित कर देते हैं। क्या एआई के दौर में ओपन नॉलेज और डेटा स्वामित्व का भविष्य खतरे में है?आज बिग टेक कंपनियों और यूज़र्स के बीच डेटा पर नियंत्रण और ओपन नॉलेज के भविष्य को लेकर एक बड़ी जंग छिड़ गई है। विकिमीडिया फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में विकिपीडिया पर इंसानों द्वारा देखे जाने वाले पेजों की संख्या में 8 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह गिरावट सीधे तौर पर गूगल के 'एआई ओवरव्यूज़' की वजह से है, जो मई 2024 में पूरी तरह लागू हुआ था। एआई ओवरव्यूज़ यूज़र्स को सर्च पेज पर ही पूरी जानकारी का सारांश दे देता है, जिससे लोग मूल वेबसाइट के लिंक पर क्लिक ही नहीं करते। प्यू रिसर्च सेंटर के एक विश्लेषण में पाया गया कि गूगल के एआई सारांश देखने वाले यूज़र्स में से केवल एक प्रतिशत ही बाहरी लिंक पर क्लिक करते हैं। इस 'ज़ीरो-क्लिक' सर्च की वजह से विकिपीडिया जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स पर बड़ा वित्तीय संकट मंडराने लगा है क्योंकि उनका पूरा संचालन चंदे पर निर्भर करता है, और जब वेबसाइट पर लोग कम आएंगे तो चंदा भी कम मिलेगा। जानकार इसे 'फ़्री राइडिंग' कहते हैं, जहाँ गूगल विकिपीडिया की सामग्री से उत्तर बनाकर विज्ञापन का राजस्व कमाता है, लेकिन ज्ञान को तैयार करने का पूरा बोझ मुफ्त में काम करने वाले स्वयंसेवकों पर छोड़ देता है। एआई के इस युग में यह साफ़ होता जा रहा है कि ज्ञान के विकेंद्रीकरण का मॉडल खतरे में है, क्योंकि सारी ताकत अब कुछ चुनिंदा सर्च इंजन और एआई कंपनियों के हाथों में सिमटती जा रही है। संदर्भ 1. https://tinyurl.com/262zqm3m2. https://tinyurl.com/ycar2vd73. https://tinyurl.com/22elvnrt4. https://tinyurl.com/25lwdnh45. https://tinyurl.com/25ydbsts
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
माराडोना के हैंड ऑफ गॉड ने कैसे जिताया अर्जेंटीना को विश्व कप
डिएगो माराडोना (Diego Maradona) फुटबॉल इतिहास के सबसे महान खिलाड़ियों में से एक माने जाते हैं। वर्ष 1986 के फीफा विश्व कप में इंग्लैंड के खिलाफ उनका प्रदर्शन आज भी खेल जगत के सबसे चर्चित पलों में गिना जाता है। इसी मैच में उन्होंने पहला गोल किया, जिसे बाद में “हैंड ऑफ गॉड” के नाम से जाना गया। इस गोल में माराडोना ने अपने हाथ से गेंद को जाल में पहुंचाया, लेकिन रेफरी यह देख नहीं पाए और गोल मान लिया गया। बाद में माराडोना ने मजाकिया अंदाज़ में कहा कि यह गोल “थोड़ा माराडोना के सिर से और थोड़ा भगवान के हाथ से” हुआ था।इसी मैच में कुछ मिनट बाद माराडोना ने दूसरा गोल किया, जिसे “गोल ऑफ द सेंचुरी” कहा जाता है। उन्होंने मैदान के बीच से गेंद लेकर कई इंग्लिश खिलाड़ियों को शानदार ड्रिब्लिंग (dribbling) से पीछे छोड़ा और गोल दाग दिया। यह गोल फुटबॉल इतिहास के सबसे बेहतरीन गोलों में गिना जाता है।माराडोना अपनी अद्भुत गेंद नियंत्रण क्षमता और कठिन अभ्यास के लिए भी जाने जाते थे। वे घंटों तक ड्रिब्लिंग, बॉल कंट्रोल और संतुलन पर मेहनत करते थे, जिसने उन्हें दुनिया के सबसे कुशल खिलाड़ियों में शामिल किया। उनकी प्रतिभा, जुनून और खेल शैली ने उन्हें फुटबॉल का अमर सितारा बना दिया। संदर्भ - https://tinyurl.com/55wth494 https://tinyurl.com/yc3f7986https://tinyurl.com/2bht2epfhttps://tinyurl.com/yc4k6he8https://tinyurl.com/tcdxzrv6
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
चलिए, आज भारत के राष्ट्रीय खेल - हॉकी के विकास व उपलब्धियों की जांच करते हैं
लखनऊ, आज हम हॉकी खेल के इतिहास को समझेंगे, और देखेंगे कि, यह एक आधुनिक खेल के रूप में कैसे विकसित हुआ। फिर हम पता लगाएंगे कि, भारत में औपनिवेशिक काल के दौरान हॉकी कैसे लोकप्रिय हुआ। इसके पश्चात, हम हॉकी के नियमों और खेल साहित्य पर नजर डालेंगे। बाद में, हम अंतरराष्ट्रीय हॉकी में भारत की उपलब्धियों की जांच करेंगे। और अंततः, हम ध्यानचंद जी जैसे हॉकी के महान खिलाड़ियों और इस खेल के स्टेडियमों एवं प्रशिक्षण केंद्रों के बारे में जानेंगे।फ़ील्ड हॉकी (Field hockey), 11-11 खिलाड़ियों के दो विरोधी संघों द्वारा खेला जाने वाला एक मैदानी खेल है। इसके खिलाड़ी, अपने विरोधी संघ के गोल (Goal) में एक छोटी गेंद को मारने के लिए, स्ट्राइकिंग छोर (Striking end) पर घुमावदार बनी छड़ियों का उपयोग करते हैं। माना जाता है कि, हॉकी की शुरुआत बहुत प्राचीन सभ्यताओं से हुई है। हॉकी में अरब, यूनानी, फारसी और रोमन लोगों के अपने-अपने संस्करण थे। साथ ही, दक्षिण अमेरिका के एज़्टेक इंडियन्स (Aztec Indians) द्वारा खेले जाने वाले, एक समान छड़ी खेल के प्रमाण भी पाए गए हैं। हॉकी को हर्लिंग (Hurling) और शिंटी (Shinty) जैसे अन्य शुरुआती खेलों से भी पहचाना जा सकता है। मध्य युग के दौरान, फ्रांस में हॉक्वेट (Hoquet) नामक एक छड़ी वाला खेल खेला जाता था। हॉकी का नाम इसी शब्द से आने की संभावना है।उन्नीसवीं सदी के अंत में अंग्रेजी स्कूलों में भी हॉकी प्रचलित हुआ। दक्षिणपूर्वी लंदन (London) के एक इलाके में स्थापित पहले पुरुष हॉकी क्लब ने, 1861 में एक नियम पुस्तक रिकॉर्ड की। लंदन के एक अन्य क्लब ने इन नियमों में कई प्रमुख बदलाव पेश किए। इनमें हाथों का उपयोग करने या कंधे के ऊपर लाठी उठाने पर प्रतिबंध; गेंद के रूप में रबर के स्थान पर एक गोले को अपनाना; और एक स्ट्राइकिंग सर्कल (Striking circle) को अपनाना शामिल था। ये नए नियम, 1886 में लंदन में स्थापित हुए हॉकी एसोसिएशन (Hockey Association) में लागू किए गए। भारत और पूर्वी विश्व में इस खेल को फैलाने के लिए, ब्रिटिश सेना काफी हद तक जिम्मेदार थी। हॉकी की अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता 1895 में शुरू हुई, और 1928 तक यह भारत का राष्ट्रीय खेल बन गया था। उस वर्ष ओलंपिक खेलों में भारतीय संघ ने पहली बार प्रतिस्पर्धा करते हुए स्वर्ण पदक जीता था। बाद में, अधिक अंतर्राष्ट्रीय मैचों के आह्वान के कारण, 1971 में हॉकी विश्व कप की शुरुआत हुई। इस खेल की अन्य प्रमुख अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में एशियाई कप, एशियाई खेल, यूरोपीय कप और पैन-अमेरिकन खेल शामिल हैं।खेल के मैदानों के रूप में, भूमि के बड़े भूखंडों की उपलब्धता और उपकरणों की सरल प्रकृति के कारण, हॉकी, धीरे-धीरे भारत में बच्चों और युवाओं के बीच लोकप्रिय खेल बन गया था। हमारे देश का पहला हॉकी क्लब, 1855 में तत्कालीन कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में बनाया गया था। अगले कुछ दशकों में, कलकत्ता में ‘बीटन कप’ और बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) में ‘आगा खान टूर्नामेंट’ जैसी नई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं ने इस खेल को अधिक लोकप्रिय बनाया। 1907 और 1908 में भारत में हॉकी एसोसिएशन बनाने की बात चल रही थी, हालांकि, यह नहीं बन पाया। फिर बाद में, अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ (FIH) के गठन के बाद, 1925 में भारतीय हॉकी महासंघ (IHF) का गठन हुआ था।भारतीय हॉकी महासंघ ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय दौरा, 1926 में न्यूजीलैंड (New Zealand) में आयोजित किया था। यहां भारतीय हॉकी पुरुष संघ ने 21 मैच खेले, और उनमें से 18 मैच जीते। इस प्रतियोगिता में युवा खिलाड़ी ध्यानचंद जी का उदय भी हुआ।1924 तक ओलंपिक खेलों के साथ समझौता न होने पर हॉकी को ओलंपिक से हटा दिया गया था। परंतु, अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ ने हॉकी को एम्स्टर्डम 1928 (Amsterdam 1928) ओलंपिक से स्थायी दर्जा प्राप्त करवाया। भारतीय हॉकी महासंघ ने 1927 में अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ की सदस्यता अर्जित की। इस प्रकार, भारतीय हॉकी संघ ने 1928 में अपना पहला ओलंपिक खेल खेला।दरअसल, हॉकी खेल का उद्देश्य, निर्धारित समय समाप्त होने से पहले विरोधी संघ से अधिक गोल करना है। सभी खिलाड़ी गेंद को नियंत्रित करने के लिए हॉकी स्टिक (Hockey stick) का उपयोग करते हैं, और अपने संघ के लिए स्कोर करने हेतु, इसे विरोधी गोल पोस्ट में डालते हैं। हॉकी स्टिक में घुमावदार छोर वाला एक लंबा हैंडल होता है, जो एक तरफ से सपाट होता है। स्टिक का वजन 737 ग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। पहले मैदानी हॉकी स्टिक लकड़ी के बनते थे, लेकिन आधुनिक हॉकी स्टिक कांच, कार्बन और अरैमिड (Aramid) के रेशों से बनाई जाती हैं।खिलाड़ियों को गेंद को छूने के लिए, स्टिक के केवल सपाट हिस्से का उपयोग करने की अनुमति है। ऐसा न करने पर बैकस्टिक फाउल (Backstick foul) होता है, और तब गेंद विपक्षी को दे दी जाती है। खिलाड़ियों को केवल अपनी स्टिक से ही गेंद को पास या ड्रिबल (Dribble) करके विपरीत गोल की ओर ले जाना होता है। इसके अलावा, गोल शॉट केवल स्ट्राइकिंग सर्कल के अंदर से ही किया जा सकता है।क्या आप जानते हैं कि, आज 13 ओलंपिक पदकों ( 8 स्वर्ण, 1 रजत और 4 कांस्य पदक) के साथ, भारत ने खुद को हॉकी खेल की सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित किया है। एक खिलाड़ी, जिन्होंने भारत की इस कहानी को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वे 1980 के मॉस्को ओलंपिक खेलों (Moscow Olympics) के स्वर्ण पदक विजेता जफर इकबाल हैं। दिलचस्प बात यह है कि, पिछले 100 वर्षों में दुनिया के किसी भी अन्य हॉकी संघ ने ऐसी सफलता नहीं पाई है। 1947 में भारत की आजादी के बाद, भारतीय हॉकी ने बहुत कुछ हासिल किया है। हमने 1947 से अब तक, 5 स्वर्ण पदक जीते हैं।1976 में ओलंपिक खेलों में, हॉकी एस्ट्रोटर्फ (Astroturf) में बदल गई, जबकि भारतीय संघ को प्राकृतिक घास वाले मैदानों पर खेलने की आदत थी। हालांकि, 1980 में भारत ने इस नई सतह पर खेलने की सभी चुनौतियों को पार कर लिया, और मॉस्को में प्रतिष्ठित स्वर्ण पदक जीता।जफर इकबाल के अलावा, हॉकी के एक अन्य खिलाड़ी, जो काफ़ी मशहूर एवं प्रतिभाशाली है, मेजर ध्यानचंद है। ध्यानचंद वे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपनी छड़ी की खेल रणनीति से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया था। इसी कारण, उन्हें ‘हॉकी के जादूगर’ यह उपनाम मिला। 29 अगस्त, 1905 को इलाहाबाद में ब्रिटिश भारतीय सेना के एक सैनिक के घर जन्मे ध्यान सिंह, बहुत कम उम्र में ही हॉकी की ओर आकर्षित हो गए थे। अपने पिता की तरह वे भी 16 साल की उम्र में सेना में भर्ती हो गए, और वहां अपना पसंदीदा खेल खेलना जारी रखा।सैन्य में बिताए अपने समय के दौरान, उन्होंने 1922 और 1926 के बीच विभिन्न सेना हॉकी प्रतियोगिताओं और रेजिमेंटल खेलों को खेला। ध्यानचंद खेल में इतने तल्लीन रहते थे कि, वे अपनी ड्यूटी के बाद रात में भी हॉकी खेलते थे। चांदनी रात में खेलने के कारण ही, उन्हें ध्यानचंद नाम मिला, क्योंकि 'चंद' शब्द का हिंदी अर्थ ‘चंद्रमा’ है।उनकी रैंकों में प्रगति के कारण, उन्हें 1926 में न्यूजीलैंड दौरे के लिए भारतीय सेना के संघ में शामिल किया गया। न्यूजीलैंड में भारतीय संघ ने 18 मैच जीते, दो मैच ड्रा (Draw) खेले और केवल एक ही मुकाबला हारा। भारत के इस अद्भुत प्रदर्शन की कई लोगों ने सराहना की, और विशेष रूप से ध्यानचंद जी को अपने पहले अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में अपनी प्रतिभा के लिए बहुत प्रशंसा मिली। दौरे से वापसी पर, उन्हें ब्रिटिश भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट में लांस नायक नामित किया गया।हॉकी को पहली बार ओलंपिक में शामिल करने के साथ, नवगठित भारतीय हॉकी महासंघ, नीदरलैंड (Netherland) खेलों के लिए सर्वोत्तम संभव संघ भेजने के लिए उत्सुक था। पंजाब, बंगाल, राजपुताना, संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और मध्य प्रांत ने इन खेलों में भाग लिया। और जब भारतीय सेना ये खेल नहीं खेल पाई, तब ध्यानचंद जी को संयुक्त प्रांत अर्थात हमारे वर्तमान उत्तर प्रदेश के लिए खेलने दिया गया।ध्यान चंद गेंद के साथवास्तव में, ध्यानचंद जी के कार्यकाल से ही उत्तर प्रदेश में हॉकी खेल के लिए लोकप्रियता है। आज भी, हमारे राज्य में ऐसी कई पहले हैं, जिनसे इस खेल के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ पाए। उदाहरण के तौर पर, के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम, पहली बार 1957 में हमारे शहर लखनऊ के हलचल भरे हजरतगंज के ठीक मध्य में खोला गया था। इसका नाम महान हॉकी खिलाड़ी - बाबू के. डी. सिंह के नाम पर रखा गया है, जिनका जन्म लखनऊ में हुआ था। यह भारत के सबसे पुराने बहुउद्देशीय स्टेडियमों में से एक है। के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम में क्रिकेट, टेनिस, फुटबॉल और हॉकी सहित कई अलग-अलग खेल खेले जाते हैं। इस स्थल ने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय हॉकी मैचों की मेजबानी की है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/mc4sw5fh 2. https://tinyurl.com/3h9eed3j 3. https://tinyurl.com/5tvx36rw 4. https://tinyurl.com/yp34n4bw 5. https://tinyurl.com/27st9xtx 6. https://tinyurl.com/5n8a645w
धर्म का युग : 600 ई.पू. से 300 ई.
जरूर जानें, अलेक्जेंड्रिया के महान पुस्तकालय ने कैसे रखी प्राचीन विश्व में ज्ञान की नींव?
आज, हम पढ़ेंगे कि सिकंदर (Alexander the Great) कौन था, और वैश्विक इतिहास को आकार देने में उनकी क्या भूमिका थी। फिर, हम पता लगाएंगे कि उन्होंने ज्ञान और संस्कृति के केंद्र के रूप में, अलेक्जेंड्रिया (Alexandria) शहर की स्थापना कैसे की। लेख में आगे, हम देखेंगे कि अलेक्जेंड्रिया कैसे एशिया, यूरोप और अफ्रीका का मिलन स्थल और व्यापार केंद्र था। फिर हम अलेक्जेंड्रिया के महान पुस्तकालय पर गौर करेंगे। इसके पश्चात, हम पता लगाएंगे कि सिकंदर की मृत्यु के बाद, पुस्तकालय के केंद्रीकृत ज्ञान का महत्व कैसे कम होने लगा। जबकि अंत में हम देखेंगे कि, आज अलेक्जेंड्रिया के पुस्तकालय की क्या विरासत बची है।सिकंदर का जन्म, जुलाई 356 ईसा पूर्व में मैसीडोनिया (Macedonia) की प्राचीन राजधानी पेला (Pella) में हुआ था। उनके माता-पिता मैसीडोन के फिलिप द्वितीय (Philip II) और उनकी पत्नी - ओलंपियास (Olympias) थे। सिकंदर ने, प्रसिद्ध दार्शनिक एरिस्टोटल (Aristotle) से शिक्षा प्राप्त की थी। 336 ईसा पूर्व में फिलिप द्वितीय की हत्या हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप, सिकंदर को उनका शक्तिशाली लेकिन अस्थिर राज्य विरासत में मिला। तब, उसने अपने घर में ही मौजूद दुश्मनों से निपटकर, ग्रीस में मैसीडोनियन शक्ति को फिर से स्थापित किया। इसके पश्चात, वह विशाल फ़ारसी साम्राज्य को जीतने के लिए निकल पड़ा। इस मुहिम में आई बाधाओं के बावजूद, सिकंदर कभी नहीं हारा। उन्होंने अपनी सेना को एशिया, सीरिया और मिस्र के फ़ारसी क्षेत्रों में जीत दिलाई। उनकी सबसे बड़ी जीत 331 ईसा पूर्व में गौगामेला (Gaugamela) की लड़ाई में थी, जो अब उत्तरी इराक है। इस प्रकार, वह केवल 25 वर्ष की आयु में ही फारस का 'महान राजा' बन गया। अगले आठ वर्षों में, राजा, सेनापति, राजनीतिज्ञ, विद्वान और खोजकर्ता के रूप में सिकंदर ने अपनी सेना को 11,000 मील आगे बढ़ाया, 70 से अधिक शहरों की स्थापना की। इस प्रकार उसने एक ऐसा साम्राज्य बनाया, जो तीन महाद्वीपों तक फैला हुआ था।इसी साम्राज्य में उत्तरी मिस्र में, भूमध्य सागर पर ‘अलेक्जेंड्रिया’ नामक एक बंदरगाह शहर बसा है, जिसकी स्थापना सिकंदर ने 331 ईसा पूर्व में की थी। सीरिया पर विजय प्राप्त करने के बाद, सिकंदर अपनी सेना के साथ मिस्र में गया। तब उसने ग्रीक के एक महत्वपूर्ण व्यापार केंद्र – नौक्रैटिस (Naucratis) से बेहतर वाणिज्यिक केंद्र बनाने के इरादे से अलेक्जेंड्रिया की स्थापना की थी। उसने अपनी इच्छा अनुसार, शहर का बुनियादी डिजाइन तैयार किया था। ग्रिड पैटर्न में आटा या अनाज डालकर इस शहर की योजना तैयार की गई थी, जिसे बाद में उनके वास्तुकार ने अपनाया था। यह प्राचीन दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक - फ़ारोस (Pharos), और अलेक्जेंड्रिया के पौराणिक पुस्तकालय का स्थल था। एक समय में, यह प्राचीन दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र भी था।अलेक्जेंड्रियासिकंदर के आगमन के बाद, यह शहर एक छोटे बंदरगाह से विकसित हुआ। बाद में, इस शहर को टॉलेमिक राजवंश (Ptolemaic Dynasty) (323-30 ईसा पूर्व) के तहत एक बौद्धिक, सांस्कृतिक और वाणिज्यिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। बाद में, यह प्रारंभिक ईसाई धर्म के केंद्र के रूप में भी प्रसिद्ध हो गया।अलेक्जेंड्रिया की सबसे उल्लेखनीय चीजों में से एक इसका पुस्तकालय था। यह ज्ञान के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण था। दरअसल, माउसियन (Mouseion), उच्च शिक्षा का एक संस्थान था, जो अलेक्जेंड्रिया के पुस्तकालय का हिस्सा था। यह ज्ञान की देवियों - म्यूज़ेस (Muses) को समर्पित था और संभवतः टॉलेमी द्वितीय (Ptolemy II – 282-246 ईसा पूर्व) द्वारा स्थापित किया गया था। यह विद्वानों के लिए एक सभा स्थल और घर के रूप में भी कार्य करता था, जिनके कार्यों ने इस पुस्तकालय की स्थापना में योगदान दिया था।331 ईसा पूर्व में, अलेक्जेंड्रिया समुद्र और नील नदी के बीच अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण, भूमध्य सागर का सबसे बड़ा व्यापार केंद्र बन गया। इसमें भव्य बंदरगाह (Port / Portus), सैन्य बेड़े के लिए पोर्टस मैग्नस (Portus Magnus) और नहरों, महलों और बाजारों के साथ-साथ वाणिज्य के लिए पोर्टस यूनोस्टस (Portus Eunostus) शामिल थे। अलेक्जेंड्रिया शहर समुद्री व्यापार के कारण विकसित हुआ। यहां से मिस्र के अनाज, पैपीरस (Papyrus) और कांच का निर्यात होता था , जबकि, ग्रीस और रोम से विलासिता की वस्तुओं का आयात होता था। नील नदी और कारवां मार्गों ने इसे अंतर्देशीय मिस्र, अरब, भारत और पूर्वी अफ्रीका से जोड़ा, जिससे मसालों, धूप बत्ती और वस्त्रों के आदान-प्रदान की सुविधा हुई। टॉलेमिक शासन के तहत, राज्य ने प्रमुख उद्योगों (विशेषकर गेहूं) को नियंत्रित किया था। साथ ही, महानगरीय बाजारों और उन्नत बंदरगाह सुविधाओं ने प्राचीन दुनिया के सबसे प्रभावशाली वाणिज्यिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में इसकी भूमिका को मजबूत किया।अलेक्जेंड्रिया का पुस्तकालय, वास्तव में प्राचीन दुनिया का एक आश्चर्य था, तथा ज्ञान और सीखने की शक्ति का प्रमाण भी था। इसमें पुस्तकों, पांडुलिपियों, स्क्रॉल और मानचित्रों का एक विशाल संग्रह था, जो इसे प्राचीन दुनिया के सबसे बड़े और व्यापक पुस्तकालयों में से एक बनाता है। कहा जाता है कि, इसमें 7 लाख से अधिक स्क्रॉल शामिल थे, जिनमें साहित्य, विज्ञान, दर्शन और अन्य विषयों के कार्य शामिल थे। इन स्क्रॉल की मदद से ही प्राचीन यूनानी, दुनिया के ज्ञान और अंतर्दृष्टि से वाकिब हुए। इसके अतिरिक्त, इस पुस्तकालय में मानचित्रों का एक बड़ा संग्रह था, जिनका नाविकों और व्यापारियों द्वारा भूमध्य सागर में नौचालन करने हेतु उपयोग किया जाता था। यह पुस्तकालय प्राचीन यूनानियों के लिए अत्यधिक गर्व और प्रशंसा का भी स्रोत था, और इसकी विरासत सदियों से कायम है।अलेक्जेंड्रिया का प्राचीन पुस्तकालयटॉलेमी द्वितीय के शासनकाल के दौरान, अलेक्जेंड्रिया के पुस्तकालय ने दुनिया में ज्ञान का सर्वोच्च केंद्र बनने के लिए, एक क्रांतिकारी नीति लागू की। शाही आदेश के अनुसार, शहर के बंदरगाह पर उतरने वाले प्रत्येक जहाज की पुस्तकों और स्क्रॉल के लिए अनिवार्य खोज की जाती थी। किसी भी पांडुलिपि को तुरंत जब्त कर लिया जाता था, और निरीक्षण के लिए पुस्तकालय में भेजा जाता था। इस अधिग्रहण रणनीति ने इस पुस्तकालय को भूमध्य सागर के बौद्धिक उत्पादन के लिए एक विशाल भंडार में बदल दिया। एक बार जब कोई किताब जब्त कर ली जाती थी, तो पुस्तकालय के लेखक इसकी एक हस्तलिखित प्रति तैयार करते थे। इसके बाद, पुस्तकालय में मूल पांडुलिपि रखी जाती थी, जबकि, उसकी प्रति जहाज के मालिक को लौटाई जाती थी।सिकंदर की मृत्यु के बाद, टॉलेमी तृतीय के शासनकाल से लेकर क्लियोपेट्रा सप्तम (Cleopatra VII) के शासनकाल तक, अलेक्जेंड्रिया के पतन को राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों द्वारा चिह्नित किया गया था। इसी कारण, अंततः टॉलेमिक राजवंश का अंत हुआ। इस अवधि के दौरान, इस शहर ने अपना पूर्व गौरव खो दिया। लगातार उत्तराधिकार विवादों और नागरिक अशांति से राज्य की राजनीतिक स्थिरता भी कमजोर हो गई थी। महंगे सैन्य अभियान, भव्य शाही व्यय और खराब संसाधन प्रबंधन ने राज्य के वित्त पर भी दबाव डाला, जिसके परिणामस्वरूप कराधान में वृद्धि हुई, और जनता में असंतोष हुआ। इसके पुस्तकालय का पतन भी, इतिहास के दुखद और गर्म बहस वाले रहस्यों में से एक बना हुआ है।अलेक्जेंड्रिया का यह पुस्तकालय आज सही सलामत नहीं है। लेकिन इसके खंडहरों में भी, सहस्राब्दियों तक इसका प्रभाव गूंजता है। इस पुस्तकालय ने इस बात को आकार दिया कि, समाज किस प्रकार शिक्षा, अनुसंधान और सांस्कृतिक संरक्षण को महत्व देता है। यहां बनाए गए नवीन बिब्लियोथेका अलेक्जेंड्रिना (Bibliotheca Alexandrina) पुस्तकालय में संग्रहालय, गैलरी और अनुसंधान केंद्र शामिल हैं।जबकि, अलेक्जेंड्रिया के मूल पुस्तकालय का कोई निश्चित खंडहर नहीं मिला है, पुरातत्वविदों ने माउसियन परिसर के कुछ हिस्सों, प्राचीन व्याख्यान कक्षों और भूमिगत कमरों का पता लगाया है। माना जाता है कि, वे भंडारण सुविधाएं या उपभवन थे। इस उत्खनन से हेलेनिस्टिक वास्तुकला (Hellenistic architecture) और कलाकृतियों का पता चलता है, जो अलेक्जेंड्रिया के इस उत्खनन से हेलेनिस्टिक वास्तुकला (Hellenistic architecture) और कलाकृतियों का पता चलता है, जो अलेक्जेंड्रिया के प्रज्वलित और ज्ञान पर आधारित अतीत का संकेत देते हैं। संदर्भ1. https://tinyurl.com/ywey7428 2. https://tinyurl.com/4w6v8pap 3. https://tinyurl.com/yuxtnsfe 4. https://tinyurl.com/y9e535vb 5. https://tinyurl.com/yrn34bw6 6. https://tinyurl.com/2thta6e9 7. https://tinyurl.com/4uwntwxj
आधुनिक राज्य : 1947 ई. से वर्तमान तक
भारी कर्ज के बावजूद संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका का दबदबा क्यों?
दुनिया भर में शांति बनाए रखने का दावा करने वाले संयुक्त राष्ट्र को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि अमेरिका इसका सबसे बड़ा ख़र्च क्यों उठाता है। आम तौर पर लोगों को लगता है कि बाइस प्रतिशत का भारी भरकम बजट देकर अमेरिका शायद कोई घाटे का सौदा कर रहा है। लेकिन असलियत इसके बिल्कुल उलट है। अकेले न्यूयॉर्क शहर को संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय की मेज़बानी करने से हर साल लगभग तीन अरब अड़सठ करोड़ डॉलर का सीधा आर्थिक फ़ायदा होता है और पंद्रह हज़ार से ज़्यादा लोगों को रोज़गार मिलता है। सिर्फ़ पैसा ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे ताक़तवर कूटनीतिक मंच के अपने देश में होने से अमेरिका को ख़ुफ़िया जानकारी और वैश्विक राजनीति पर ऐसा नियंत्रण मिलता है जिसे किसी भी क़ीमत पर ख़रीदा नहीं जा सकता। दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की राख से निकालकर आज के आधुनिक दौर तक पहुँचाने वाली इस विशाल संस्था का इतिहास, इसकी ताक़त और इसकी कमज़ोरियों को समझना आज के दौर में बेहद ज़रूरी है।द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र का गठन क्यों हुआ?बीसवीं सदी में दुनिया ने दो भयानक महायुद्ध देखे थे। पहले विश्व युद्ध के बाद शांति बनाए रखने के लिए साल 1919 में लीग ऑफ नेशंस नाम की संस्था बनाई गई थी। लेकिन यह संस्था दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की आग में जलने से नहीं रोक सकी और साल 1946 में इसे भंग कर दिया गया। इसी विफलता से सबक लेते हुए दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने एक नया और ज़्यादा मज़बूत वैश्विक संगठन बनाने का फ़ैसला किया। इसकी पहली सुगबुगाहट अगस्त 1941 में तब हुई जब अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूज़वेल्ट और ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने अटलांटिक चार्टर पर हस्ताक्षर किए। बाद में डंबार्टन ओक्स और याल्टा सम्मेलनों में अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ के नेताओं ने इसकी रूपरेखा तैयार की। आख़िरकार 25 अप्रैल 1945 को सैन फ्रांसिस्को में दुनिया भर के पचास देशों के प्रतिनिधि जमा हुए। पोलैंड जो इस सम्मेलन में नहीं आ सका था, उसे भी बाद में संस्थापक सदस्य के रूप में शामिल किया गया। इस तरह 24 अक्टूबर 1945 को इक्यावन संस्थापक देशों के साथ संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक तौर पर स्थापना हुई। इसका मुख्य मक़सद आने वाली पीढ़ियों को युद्ध के ख़तरे से बचाना, मानवाधिकारों की रक्षा करना और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का पालन सुनिश्चित करना है।सुरक्षा परिषद कैसे काम करती है और यह वीटो पावर क्या है?संयुक्त राष्ट्र के भीतर सबसे ताक़तवर हिस्सा उसकी सुरक्षा परिषद है। यही वह इकलौती संस्था है जो अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने के लिए सैन्य बल के इस्तेमाल की मंज़ूरी दे सकती है और इसके फ़ैसले सदस्य देशों पर क़ानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं। इस परिषद में कुल पंद्रह सदस्य होते हैं जिनमें से पाँच स्थायी सदस्य हैं और दस अस्थायी सदस्य होते हैं जिन्हें दो साल के लिए चुना जाता है। ये पाँच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन हैं। इन पाँचों देशों के पास एक बेहद ख़ास ताक़त है जिसे वीटो पावर कहा जाता है। किसी भी बड़े और ग़ैर-प्रक्रियागत फ़ैसले को पास करने के लिए पंद्रह में से नौ सदस्यों की हाँ ज़रूरी है, लेकिन इसके साथ ही यह भी ज़रूरी है कि पाँचों स्थायी सदस्यों में से कोई भी इसके ख़िलाफ़ वोट न करे। अगर एक भी स्थायी सदस्य न में वोट देता है तो वह प्रस्ताव रद्द हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र बनाते समय इन बड़े देशों को डर था कि कहीं बहुमत उनके ख़िलाफ़ न इस्तेमाल होने लगे। अगर इन्हें यह ताक़त न दी जाती तो ये देश इस संस्था में शामिल ही नहीं होते और पुरानी संस्था लीग ऑफ नेशंस की तरह यह भी नाकाम हो जाती। हालाँकि अब यह वीटो पावर एक बड़ी समस्या बन चुकी है। स्थायी सदस्य अक्सर अंतरराष्ट्रीय शांति के बजाय अपने आर्थिक और राजनीतिक फ़ायदों के लिए या अपने सहयोगी देशों को बचाने के लिए इस ताक़त का इस्तेमाल करते हैं। अगर कोई स्थायी देश किसी प्रस्ताव को रोकना नहीं चाहता लेकिन उसका समर्थन भी नहीं करना चाहता, तो वह वोटिंग में हिस्सा न लेने का विकल्प चुन सकता है।सुरक्षा परिषदभारत सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य क्यों नहीं है?भारत जैसे विशाल और प्रभावशाली देश का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य न होना आज के समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी बहस का विषय है। दुनिया भर के तमाम मंचों और रेडिट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के एशिया केंद्रित फ़ोरम पर यह सवाल लगातार उठता रहता है कि आख़िर भारत इसका स्थायी हिस्सा क्यों नहीं है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अब तक दुनिया काफ़ी बदल चुकी है लेकिन सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता आज भी उन्हीं पाँच देशों तक सीमित है। इस मुद्दे पर वैश्विक कूटनीति में लगातार चर्चा होती रहती है और भारत की दावेदारी को लेकर विभिन्न देशों और जानकारों के बीच एक लंबी बहस जारी है।दुनिया के कितने देश संयुक्त राष्ट्र का हिस्सा हैं और कौन बाहर है?इस समय दुनिया भर के एक सौ पचानवे देश संयुक्त राष्ट्र के दायरे में गिने जाते हैं। इनमें से एक सौ तिरानवे देश इसके पूर्ण सदस्य हैं जबकि दो देशों को स्थायी ग़ैर-सदस्य पर्यवेक्षक का दर्जा मिला हुआ है। ये दो देश वेटिकन सिटी और फ़िलिस्तीन हैं। पर्यवेक्षक होने के नाते वे महासभा की बैठकों में हिस्सा ले सकते हैं लेकिन उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं है। वेटिकन सिटी दुनिया का इकलौता ऐसा आज़ाद देश है जिसने ख़ुद ही पूर्ण सदस्य बनने के लिए आवेदन नहीं किया क्योंकि वहां के सर्वोच्च धर्मगुरु पोप अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सीधा दख़ल नहीं देना चाहते। दूसरी तरफ़ फ़िलिस्तीन को एक सौ अड़तीस देशों ने संप्रभु राष्ट्र माना है लेकिन इज़रायल के साथ चल रहे विवाद के कारण अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश उसे पूर्ण सदस्य बनने से रोकते हैं। इनके अलावा ताइवान, कोसोवो और पश्चिमी सहारा जैसे कई इलाक़े हैं जो पूर्ण देश की मान्यता पाना चाहते हैं। ताइवान तो शुरुआत में संस्थापक सदस्य था लेकिन चीन में हुए गृह युद्ध के बाद जब वहाँ कम्युनिस्ट सरकार आई तो संयुक्त राष्ट्र ने पुरानी सरकार को निकालकर नई चीनी सरकार को मान्यता दे दी। अब चीन अपने वीटो की ताक़त से ताइवान को कभी सदस्य नहीं बनने देता। किसी भी नए देश को सदस्य बनने के लिए सुरक्षा परिषद के पाँचों स्थायी सदस्यों की सहमति और फिर महासभा में दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होती है।संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों का मानचित्रइस विशाल वैश्विक संस्था को पैसा कहाँ से मिलता है?संयुक्त राष्ट्र को चलाने का ज़्यादातर ख़र्च इसके एक सौ तिरानवे सदस्य देश उठाते हैं। संस्था के मुख्य रूप से दो बजट होते हैं जिनमें एक नियमित बजट है और दूसरा शांति स्थापना बजट है। हर देश को कितना पैसा देना है यह उसकी भुगतान क्षमता के आधार पर तय होता है। इसके लिए उस देश की कुल राष्ट्रीय आय, जनसंख्या और बाहरी कर्ज़ जैसे आँकड़े देखे जाते हैं। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है इसलिए वह सबसे ज़्यादा बाइस प्रतिशत पैसा देता है जो कि लगभग अस्सी करोड़ डॉलर से ज़्यादा बैठता है। इसके बाद चीन बीस प्रतिशत और जापान लगभग सात प्रतिशत का योगदान देते हैं। शांति स्थापना के काम में भी अमेरिका छब्बीस प्रतिशत से ज़्यादा का ख़र्च उठाता है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि कई देश समय पर पैसा नहीं चुकाते। इस साल के शुरुआती आँकड़ों के मुताबिक़ बानवे देशों ने अपना पूरा बकाया नहीं चुकाया है। अमेरिका पर ख़ुद डेढ़ अरब डॉलर का भारी बकाया है और चीन पर भी लगभग साठ करोड़ डॉलर का कर्ज़ है। अगर कोई देश लगातार दो साल तक अपना ज़रूरी बकाया नहीं चुकाता है तो संयुक्त राष्ट्र महासभा में उसका वोट देने का अधिकार छीना जा सकता है। अफ़ग़ानिस्तान और वेनेज़ुएला जैसे देशों को ऐसी ही कार्रवाई का सामना करना पड़ा है।अमेरिका को अपने यहाँ मुख्यालय होने का क्या फ़ायदा मिलता है?साल 1946 में संयुक्त राष्ट्र ने अपने मुख्यालय के लिए अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर को चुना था। बहुत से अमेरिकियों को लगता है कि उनके देश का पैसा इस वैश्विक संस्था पर बेवज़ह ख़र्च हो रहा है और इसीलिए वहाँ की सरकार भी कई बार बजट में कटौती की बात करती है। लेकिन मुख्यालय का अमेरिका में होना उसके लिए एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो दुनिया के किसी और देश के पास नहीं है। हर साल होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में दुनिया भर के नेता और बड़े अधिकारी न्यूयॉर्क आते हैं। इन विदेशी प्रतिनिधियों के बच्चे अमेरिका में पढ़ाई करते हैं और छुट्टियाँ बिताते हैं जिससे अमेरिका का कूटनीतिक दबदबा बढ़ता है। साल 2009 में विकीलीक्स के दस्तावेज़ों से यह बात सामने आई थी कि यह मुख्यालय अमेरिका के लिए दुनिया भर की ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने का एक बहुत बड़ा केंद्र है। इसके अलावा वीज़ा जारी करने का अधिकार अमेरिका के पास है। वह कई बार इसका इस्तेमाल अपने राजनीतिक मक़सद के लिए करता है। हाल ही में अमेरिका ने फ़िलिस्तीन के प्रतिनिधिमंडल को वीज़ा न देने की धमकी दी थी। अगर अमेरिका अपने बजट में कटौती करता है या पीछे हटता है तो चीन जैसे देश इस ख़ाली जगह को भरने के लिए पूरी तरह तैयार बैठे हैं। जानकार मानते हैं कि अगर अमेरिका से यह संस्था किसी और देश में चली गई तो अमेरिका दुनिया के एजेंडे को तय करने की अपनी सबसे बड़ी ताक़त खो देगा।संदर्भ 1. https://tinyurl.com/ybhgprqy2. https://tinyurl.com/255f3fy73. https://tinyurl.com/28n22sh34. https://tinyurl.com/2d5hlhdt5. https://tinyurl.com/2at2pq5z6. https://tinyurl.com/225xx2zo
निवास : 2000 ई.पू. से 600 ई.पू.
भागवत पुराण में कैसे पनपी इंद्रप्रस्थ नगरी श्रो कृष्ण के भक्ति रस में
क्या आप जानते हैं कि प्राचीन भारतीय इतिहास और ज्ञान के सबसे बड़े विश्वकोशों में से एक, भागवत पुराण, मूल रूप से 18 हज़ार श्लोकों और 332 अध्यायों में लिखा गया था जो बारह स्कंधों में विभाजित है। यह महज़ एक धार्मिक किताब नहीं है, बल्कि यह समय की गणना से लेकर मानव जीवन की उत्पत्ति, भ्रूण के विकास और ब्रह्मांड के विनाश तक के रहस्यों को खोलता है। हिंदू धार्मिक परंपरा के अनुसार कलियुग की शुरुआत में महर्षि व्यास द्वारा रचित यह ग्रंथ मुख्य रूप से परमेश्वर के प्रति अगाध प्रेम पर केंद्रित है। जब पांडव वंशी राजा परीक्षित को एक ब्राह्मण ने सात दिन में मृत्यु का श्राप दिया था, तब उन्होंने अपना राज-पाट छोड़कर जीवन का असली लक्ष्य खोजने का निश्चय किया। उसी समय उनकी भेंट महान संत शुकदेव गोस्वामी से हुई, जिन्होंने लगातार सात दिनों तक बिना खाए-पिए राजा परीक्षित को यही भागवत पुराण सुनाया था ताकि उन्हें मोक्ष मिल सके। इसी पवित्र ग्रंथ में हम देखते हैं कि कैसे भगवान कृष्ण पांडवों का मार्गदर्शन करते हैं और इंद्रप्रस्थ जैसी भव्य राजधानी की स्थापना से लेकर उनके जीवन की कई अहम घटनाओं में अपनी भूमिका निभाते हैं।भागवत पुराण में जीवन, मृत्यु और परम भक्ति का क्या रहस्य छिपा है?भागवत पुराण अठारह महापुराणों में से एक है जिसे वैदिक ज्ञान का सबसे प्रामाणिक स्रोत माना जाता है। यह ग्रंथ आत्मा की प्रकृति से लेकर ब्रह्मांड की उत्पत्ति तक ज्ञान के सभी क्षेत्रों को छूता है। यह जीवन क्या है, मृत्यु और जन्म का चक्र क्या है, और ईश्वर व मनुष्य के बीच क्या संबंध है, जैसे मूलभूत सवालों के जवाब देता है। हिंदू धर्म में जीवन के चार मुख्य पहलू माने गए हैं— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। भागवत पुराण इन चारों के अलावा एक पाँचवाँ तत्व भी जोड़ता है, और वह है ईश्वरीय सेवा या परम भक्ति। इसका दसवाँ स्कंध सबसे अधिक प्रसिद्ध है, जिसमें वृंदावन में कृष्ण के बचपन की लीलाओं का विस्तार से वर्णन है। इसमें कृष्ण को केवल एक मार्गदर्शक के रूप में नहीं, बल्कि एक शूरवीर बालक के रूप में दिखाया गया है, जो राक्षसों से गाँव वालों की रक्षा करता है। वृंदावन की गोपियों का कृष्ण के प्रति जो अगाध और तीव्र प्रेम था, उसे ही बाद में भक्ति योग के रूप में जाना गया। जब कृष्ण मथुरा चले जाते हैं, तो गोपियाँ दुख से भर जाती हैं और उनका यही वियोग सर्वोच्च भगवान के प्रति चरम भक्ति का एक आदर्श प्रस्तुत करता है। भगवत पुराण का दसवां खंडबंजर खांडवप्रस्थ कैसे बना भव्य और दिव्य इंद्रप्रस्थ?भागवत पुराण और महाभारत की कथाओं में इंद्रप्रस्थ को एक ऐसी जगह के रूप में दर्शाया गया है जहाँ पांडवों के जीवन की कई ऐतिहासिक घटनाएँ घटीं। जब कौरवों और पांडवों के बीच राज्य का बँटवारा हुआ, तो युधिष्ठिर ने खांडवप्रस्थ का बंजर और वीरान जंगल अपने हिस्से में लिया ताकि कोई और विवाद न हो। यह यमुना नदी के पश्चिमी तट पर स्थित एक बंजर भूमि थी, जिसके चारों ओर प्राचीन खांडव वन था। इस वन की रक्षा देवराज इंद्र करते थे और यहाँ नागों के राजा तक्षक का राज था। इंद्र ने यह सुनिश्चित किया था कि इस क्षेत्र में बारिश न हो और यह भूमि बंजर ही रहे ताकि इंसान यहाँ बस न सकें। एक दिन अग्नि देव एक कमज़ोर ब्राह्मण का रूप धारण करके कृष्ण और अर्जुन के पास आए। उन्होंने बताया कि बारह साल तक चले एक यज्ञ में लगातार घी पीने के कारण उन्हें अपच हो गई है और इसका इलाज केवल खांडव वन के जीवों की चर्बी खाने से ही हो सकता है। अग्नि देव ने भगवान विश्वकर्मा द्वारा बनाए गए दिव्य अस्त्र कृष्ण और अर्जुन को दिए। अर्जुन को प्रसिद्ध कपिध्वज रथ और गांडीव धनुष मिला, जबकि कृष्ण को अजेय सुदर्शन चक्र और कौमोदकी गदा प्राप्त हुई। खंडवा वन का दहन, बंतेय श्री मंदिर, 10वीं शताब्दी, अंगकोर, कंबोडियादेवराज इंद्र के तूफ़ान को अर्जुन और कृष्ण ने कैसे रोका?जब अस्त्रों से सुसज्जित होकर कृष्ण और अर्जुन ने खांडव वन को जलाना शुरू किया, तो देवराज इंद्र अपने पूरे दल-बल के साथ इसे बचाने आ पहुँचे। इंद्र ने अपने विशाल ऐरावत हाथी पर सवार होकर तूफ़ानी बारिश शुरू कर दी ताकि आग बुझाई जा सके। तब अर्जुन ने अपने अतुलनीय तीरंदाज़ी कौशल का प्रदर्शन करते हुए आसमान में तीरों की एक ऐसी छत या चंदवा बना दिया जिससे बारिश की बूँदें ज़मीन तक पहुँच ही नहीं पाईं। खमेर कला और कंबोडिया के मंदिरों की मूर्तियों में इस दृश्य को बहुत ही बारीकी से उकेरा गया है जहाँ दिखाया गया है कि तीरों की उस छत को हंसों की एक कतार ने सँभाल रखा है, जबकि नीचे नाग, शेर, हाथी और अन्य जानवर आग से बचने की कोशिश कर रहे हैं। इसी विनाश के बीच, अग्नि देव की कृपा से मंडपाल ऋषि की पत्नी जरिता और उनके चार बेटों को बचा लिया गया, जिनके नाम जरितारि, सारिसृक्क, स्तंबमित्र और द्रोण थे। इस पूरे प्रलय के बीच अर्जुन ने मयासुर नाम के एक महान असुर वास्तुकार की जान बख्श दी। मयासुर ने अपने प्राण बचाने के बदले में पांडवों के लिए एक ऐसा अद्भुत और भव्य नगर बसाया जिसकी सुंदरता के आगे स्वर्ग भी फीका पड़ जाए। देवराज इंद्र के सम्मान में इस भव्य नगर का नाम इंद्रप्रस्थ रखा गया। राजसूय यज्ञ में भगवान कृष्ण ने शिशुपाल का वध क्यों किया?इंद्रप्रस्थ के भव्य निर्माण के बाद, पांडवों ने वहां एक विशाल राजसूय यज्ञ का आयोजन किया। जरासंध के मारे जाने के बाद, भगवान कृष्ण और बलराम इस यज्ञ में शामिल होने के लिए मयासुर द्वारा निर्मित इस नई राजधानी में पधारे। यज्ञ के समापन समारोह में जब सबसे सम्मानित व्यक्ति को चुनने की बात आई, तो पांडवों में सबसे छोटे भाई सहदेव ने कृष्ण का नाम प्रस्तावित किया। इस पर जरासंध के पुराने सहयोगी राजा शिशुपाल ने कड़ी आपत्ति जताई। शिशुपाल कृष्ण की बुआ श्रुतदेवी का पुत्र था और जब उसका जन्म हुआ था, तब वह बहुत काला और बदसूरत था, और उसकी तीन आँखें व चार हाथ थे। उस समय एक आकाशवाणी हुई थी कि एक महान व्यक्ति इसे अपनी गोद में लेगा और इसके अतिरिक्त अंग गिर जाएंगे, और अंततः वही व्यक्ति इसका वध भी करेगा। बुआ श्रुतदेवी के अनुरोध पर कृष्ण ने वचन दिया था कि वह शिशुपाल की सौ गालियां माफ़ करेंगे। राजसूय यज्ञ में शिशुपाल ने कृष्ण को धोखेबाज़, स्त्रियों के पीछे भागने वाला और भगोड़ा कहते हुए सारी मर्यादाएँ लांघ दीं। जब शिशुपाल ने अपनी गालियों की गिनती पूरी कर ली, तो भगवान कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल की गर्दन काट दी। शिशुपाल के वध के बाद कृष्ण ने इंद्रप्रस्थ क्यों छोड़ा?राजसूय यज्ञ के सफलतापूर्वक संपन्न होने और शिशुपाल के मारे जाने के पश्चात की घटनाओं का वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के दसवें स्कंध (अध्याय 77, श्लोक 6-7) में स्पष्ट रूप से किया गया है।इन्द्रप्रस्थं गतः कृष्ण आहुतो धर्मसूनुना ।राजसूयेऽथ निवृत्ते शिशुपाले च संस्थिते ॥ ६ ॥कुरुवृद्धाननुज्ञाप्य मुनींश्च ससुतां पृथाम् ।निमित्तान्यतिघोराणि पश्यन् द्वारवतीं ययौ ॥७॥इस श्लोक का अर्थ यह है कि धर्मपुत्र युधिष्ठिर के आमंत्रित करने पर भगवान कृष्ण इंद्रप्रस्थ गए थे। राजसूय यज्ञ के संपन्न होने और शिशुपाल के मारे जाने के बाद, भगवान को बहुत ही अशुभ संकेत दिखाई देने लगे। अतः उन्होंने कुरु वंश के बुजुर्गों, महान ऋषियों, पृथा और उनके पुत्रों से अनुमति ली और द्वारका लौट गए। उनके जाने के बाद ही कौरवों के मन में पांडवों की समृद्धि और प्रसिद्धि को लेकर गहरी ईर्ष्या पैदा हुई। यह जलन तब और भड़क गई जब दुर्योधन भ्रमवश इंद्रप्रस्थ के एक पानी से भरे तालाब में गिर पड़ा और द्रौपदी ज़ोर से हँस पड़ीं। इन्हीं घटनाओं ने महाभारत के उस विनाशकारी युद्ध की नींव रखी। द्वारका में यदुवंश का विनाश कैसे शुरू हुआ?भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कंध के तीसवें अध्याय में यदुवंश के पतन की हृदय विदारक कथा है। आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष में बहुत भयानक और अशुभ संकेत देखने के बाद भगवान कृष्ण ने यदुवंशियों को सुधर्मा सभा में संबोधित किया। उन्होंने कहा कि द्वारका में अब एक पल भी रुकना सुरक्षित नहीं है। कृष्ण के निर्देश पर महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को शंखोद्धार भेज दिया गया, जबकि बाक़ी शूरवीर प्रभास क्षेत्र की ओर निकल पड़े जहाँ सरस्वती नदी पश्चिम की ओर बहती है। प्रभास पहुँचकर यदुवंशियों ने खूब मीठी शराब पी, जिससे उनकी बुद्धि पूरी तरह भ्रष्ट हो गई। अत्यधिक शराब के नशे में चूर होकर वे अहंकारी हो गए और आपस में भयानक रूप से लड़ने लगे। उन्होंने धनुष, तलवार, भाले और गदा जैसे हथियारों से एक-दूसरे पर जानलेवा हमले किए। प्रद्युम्न सांब से भिड़ गया, और अक्रूर भोज से लड़ने लगा। जब उनके पास तीर और हथियार खत्म हो गए, तो उन्होंने समुद्र तट पर उगी नरकट नाम की घास को उखाड़ लिया। ब्राह्मणों के पुराने श्राप के कारण वह घास उनके हाथों में आते ही वज्र जैसी मज़बूत लोहे की छड़ों में बदल गई। अपनी सुध-बुध खो चुके यदुवंशियों ने एक-दूसरे को बेरहमी से मारना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि जब कृष्ण ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो उन्होंने बलराम और कृष्ण पर भी हमला कर दिया, जिसके बाद वे दोनों भी इस भयंकर लड़ाई में शामिल हो गए। इस तरह ब्राह्मणों के श्राप और कृष्ण की माया के प्रभाव में आकर यदुवंश जलते हुए बाँस के जंगल की तरह राख हो गया। भगवत पुराण, खंड 11भगवान कृष्ण ने अपना शरीर कैसे त्यागा और इंद्रप्रस्थ फिर से शरणस्थली कैसे बना?अपने पूरे वंश को नष्ट होता देख, बलराम ने समुद्र के किनारे ध्यान लगाया और अपने आप को स्वयं में विलीन करके मानव दुनिया को त्याग दिया। बलराम के जाने के बाद भगवान कृष्ण एक पीपल के पेड़ के नीचे जाकर शांति से बैठ गए। उनका दायां पैर, जिसका तलवा लाल कमल के समान था, उनकी जांघ पर रखा हुआ था और वह बिल्कुल एक हिरण के चेहरे जैसा लग रहा था। उसी समय ज़रा नाम के एक शिकारी ने उसे हिरण समझकर तीर मार दिया। यह तीर उसी लोहे के टुकड़े से बना था जो ब्राह्मणों द्वारा श्रापित और नष्ट की गई गदा से बचा हुआ था। जब शिकारी ने पास आकर चतुर्भुज रूप देखा तो अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। कृष्ण ने उसे बताया कि उसे डरने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह सब उन्हीं की इच्छा से हुआ है। इसके बाद कृष्ण का सारथी दारुक वहाँ पहुँचा और उनके चरणों में गिर पड़ा। कृष्ण ने दारुक को आदेश दिया कि वह तुरंत द्वारका जाए और बचे हुए परिवार वालों को इस आपसी विनाश की ख़बर दे। कृष्ण ने कहा कि वे सभी द्वारका छोड़ दें क्योंकि अब यह नगरी समुद्र में डूब जाएगी। कृष्ण ने निर्देश दिया कि सभी लोग अपने परिवारों को लेकर अर्जुन के संरक्षण में इंद्रप्रस्थ चले जाएं। इंद्रप्रस्थ उस अराजकता और संकट के समय महिलाओं और कमज़ोरों के लिए एक सुरक्षित शरणस्थली बना। अर्जुन ने वहाँ पहुँचकर कृष्ण के पोते वज्र को इंद्रप्रस्थ के सिंहासन पर बैठाया, जिसने पांडवों के प्रस्थान के बाद भी वहाँ राज किया। संदर्भ 1. https://shorturl.at/B4BZ2 2. https://tinyurl.com/267s8ngr3. https://tinyurl.com/243z565a4. https://tinyurl.com/23mrevoq5. https://tinyurl.com/2b2av6h6
तितलियाँ और कीट
ब्लू नवाब तितली का अद्भुत सफर इल्ली से रंगीन उड़ान तक
ब्लू नवाब तितली (Blue Nawab butterfly ) भारत की सबसे सुंदर और दुर्लभ तितलियों में से एक मानी जाती है। यह मुख्य रूप से पश्चिमी घाट, असम और पश्चिम बंगाल के घने जंगलों में दिखाई देती है। इसकी सबसे रोचक बात इसका जीवन चक्र है, जिसमें एक छोटा सा अंडा धीरे धीरे रंगीन तितली में बदल जाता है।मादा तितली पत्तियों पर अंडे देती है। लगभग चार दिनों बाद इनमें से छोटी इल्लियाँ निकलती हैं, जो सबसे पहले अपने अंडे के खोल को ही खा जाती हैं। शुरुआत में उनका रंग सुनहरा भूरा होता है, लेकिन कुछ ही दिनों में वे हरी हो जाती हैं ताकि पत्तियों के बीच आसानी से छिप सकें। ये इल्लियाँ पत्तियों को खाकर तेजी से बढ़ती हैं और बढ़ने के साथ कई बार अपनी त्वचा बदलती हैं।कुछ समय बाद इल्ली रेशम जैसा सहारा बनाकर प्यूपा में बदल जाती है। यह अवस्था लगभग दस से ग्यारह दिनों तक रहती है। फिर एक दिन प्यूपा का खोल टूटता है और उसमें से एक सुंदर ब्लू नवाब तितली बाहर निकलती है। अपने पंख फैलाकर सूखाने के बाद यह पहली बार उड़ान भरती है। यह पूरा रूपांतरण प्रकृति के सबसे अद्भुत परिवर्तनों में से एक माना जाता है।संदर्भ - https://tinyurl.com/yk7edrym https://tinyurl.com/2rmssv9dhttps://tinyurl.com/222thtpahttps://tinyurl.com/4smjxrm7
भूमि और मिट्टी के प्रकार : कृषि योग्य, बंजर, मैदान
हमारे कृषि प्रधान राज्य में, उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के खिलाफ क्या हो सकते हैं समाधान?
चलिए, आज समझते हैं कि ‘उर्वरक’ क्या हैं, और कृषि में उनकी क्या भूमिका है। फिर, हम देखेंगे कि उनका उत्पादन तेल और गैस उद्योग से कैसे जुड़ा है। लेख में आगे, हम पता लगाएंगे कि वैश्विक तेल संकट के दौरान उर्वरकों की कीमतें क्यों बढ़ती हैं। जबकि, अंत में हम टिकाऊ उर्वरक विकल्पों और नई प्रौद्योगिकियों की जांच करेंगे, जो जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता को कम करती हैं।हमारे भारतवर्ष में, मिट्टी के प्रकार और मौसम की स्थिति के आधार पर विविध फसलों की खेती की जाती है। पिछले कुछ वर्षों में विविध फसल पैटर्न और पोषक तत्वों की बढ़ती मांग के कारण, खेती में उर्वरकों के इस्तेमाल में काफी वृद्धि हुई है। प्रत्येक फसल के स्वस्थ विकास के लिए उर्वरक की आवश्यकता होती है, क्योंकि यह उन्हें आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है।दरअसल, ‘उर्वरक’ वे कार्बनिक या अकार्बनिक पदार्थ होते हैं, जो फसलों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं। आम तौर पर, वे दानेदार या तरल होते हैं। अधिकांश उर्वरकों में तीन प्राथमिक मैक्रोन्यूट्रिएंट्स (Macronutrients) होते हैं: नाइट्रोजन (Nitrogen), फास्फोरस (Phosphorus), और पोटेशियम (Potassium)। इन्हें आमतौर पर एनपीके (NPK) उर्वरक के रूप में जाना जाता है। ये पोषक तत्व पौधों की वृद्धि और विकास में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।जब फसलें बढ़ती हैं, तो वे मिट्टी से पोषक तत्व अवशोषित करती हैं। समय के साथ, मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, और मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है। उर्वरक इन पोषक तत्वों को प्रदान करने में मदद करते हैं। इसलिए पौधों को वे पोषक तत्व मिलते हैं, जो मिट्टी अकेले प्रदान नहीं कर सकती।भारतीय फसलों में, उर्वरक ‘वृद्धि वर्धक’ के रूप में कार्य करते हैं। ऊर्वरकों से प्राप्त पोषक तत्व जड़ों की मदद से पौधे के सभी भागों में जाते हैं। तब, पोटेशियम पौधे के तने को मजबूत करता है, और अनाज की गुणवत्ता में सुधार करता है। नाइट्रोजन पत्तियों को हरा-भरा बनाता है, और जीवंत रखता है। जबकि, फॉस्फोरस मजबूत जड़ विकास को बढ़ावा देता है। आम तौर पर, ये तत्व पौधों के चयापचय कार्यों को बेहतर बनाने और तेज विकास को बढ़ावा देने के लिए मिलकर काम करते हैं।नाइट्रोजन उर्वरक, वैश्विक कृषि उत्पादकता की रीढ़ बने हुए हैं, और यूरिया (Urea) उनमें से सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला नाइट्रोजन उर्वरक है। लगभग 46 % नाइट्रोजन सामग्री के साथ, यूरिया गेहूं, चावल, मक्का और कई बागवानी फसलों को नाइट्रोजन की आपूर्ति करता है। हालांकि, प्रत्येक टन यूरिया के पीछे एक अत्यधिक ऊर्जा-गहन औद्योगिक प्रक्रिया निहित है। यूरिया का उत्पादन काफी हद तक प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है। प्राकृतिक गैस,यूरिया उत्पादन में रासायनिक सामग्री और ऊर्जा स्रोत के रूप में कार्य करता है। जिन देशों में देशज गैस उत्पादन सीमित है, वहां उर्वरक विनिर्माण को बनाए रखने के लिए तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी - LNG) आवश्यक हो जाती है। प्राकृतिक गैस और उर्वरकों के बीच इस संबंध का मतलब है कि, वैश्विक ऊर्जा बाजार हमेशा ही उर्वरक उपलब्धता, उत्पादन लागत और अंततः खाद्य सुरक्षा को सीधे प्रभावित करते हैं।यूरिया का उत्पादन अमोनिया (Ammonia) के निर्माण से शुरू होता है, जो सभी नाइट्रोजन उर्वरकों का मूलभूत निर्माण घटक है। अमोनिया का उत्पादन, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन का उपयोग करके किया जाता है। नाइट्रोजन हवा से आसानी से उपलब्ध होता है, लेकिन हाइड्रोजन का उत्पादन औद्योगिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है।आधुनिक उर्वरक संयंत्रों में हाइड्रोजन, मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस से निकाला जाता है, क्योंकि उसमें मुख्य रूप से मीथेन (CH₄) गैस होता है। उत्पादन के पहले चरण में, प्राकृतिक गैस की लगभग 800-900 डिग्री सेल्सियस पर भाप के साथ प्रक्रिया की जाती है। इस प्रक्रिया में हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड (Carbon monoxide) उत्पन्न होते हैं। फिर कार्बन मोनोऑक्साइड को एक अन्य प्रतिक्रिया के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित किया जाता है। इस प्रक्रिया में फिर से अतिरिक्त हाइड्रोजन उत्पन्न होता है।एक बार हाइड्रोजन का उत्पादन होने के बाद, इसे हेबर-बॉश प्रक्रिया (Haber–Bosch process) में नाइट्रोजन के साथ जोड़ा जाता है। इस चरण में, नाइट्रोजन और हाइड्रोजन अत्यधिक उच्च दबाव और तापमान में प्रक्रिया करके अमोनिया (NH₃) बनाते हैं। अमोनिया का उपयोग उर्वरक के रूप में किया जा सकता है, लेकिन इसका सुरक्षित रूप से भंडारण और परिवहन करना मुश्किल है। इसलिए, अधिकांश अमोनिया यूरिया में परिवर्तित किया जाता है।इस प्रकार, प्रक्रिया के अंतिम चरण में, संयंत्र में पहले उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके अमोनिया को यूरिया में परिवर्तित किया जाता है। दरअसल, पहले अमोनिया और कार्बन डाइऑक्साइड प्रतिक्रिया करके अमोनियम कार्बामेट (Ammonium carbamate) बनाते हैं। यह मध्यवर्ती यौगिक, फिर यूरिया और पानी में विघटित हो जाता है। इसी जटिल प्रक्रिया के कारण, प्राकृतिक गैस महत्वपूर्ण हो जाती है। होर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है, जहां से लगभग एक चौथाई समुद्री तेल, तरलीकृत प्राकृतिक गैस और उर्वरकों की महत्वपूर्ण मात्रा का वहन होता है। हाल ही में बढ़े वैश्विक संघर्ष के बाद से, इस जलसंधि के माध्यम से होने वाले नौ-परिवहन में काफी गिरावट आई है। ऊर्जा बाज़ारों में इसका परिणाम दिखने लगा है। तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। और जैसे ही गैस की कीमतें बढ़ती हैं, उर्वरक उत्पादन लागत बढ़ जाती है, जिससे उनकी भी कीमतें उच्च हो जाती हैं। नतीजतन, नाइट्रोजन-आधारित उर्वरकों की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, क्योंकि उनके उत्पादन में प्राकृतिक गैस महत्वपूर्ण है।बढ़ती कीमतें, मिट्टी के स्वास्थ्य, पानी की गुणवत्ता और पारिस्थितिकी तंत्र पर संभावित प्रतिकूल प्रभावों के कारण, आज रासायनिक उर्वरकों का उपयोग जांच के दायरे में आ गया है। सौभाग्य से, रासायनिक उर्वरकों के कई पर्यावरण-अनुकूल विकल्प हैं, जो मिट्टी की उर्वरता को बढ़ावा देते हैं, पौधों के विकास में सहायता करते हैं, और टिकाऊ एवं धारणीय कृषि पद्धतियों में योगदान करते हैं। ये विकल्प निम्नलिखित हैं -1. खाद और जैविक पदार्थकम्पोस्ट (Compost) या "काला सोना", हमारी रसोई एवं आंगन अपशिष्ट और पौधों के अवशेषों जैसे विघटित कार्बनिक पदार्थों से बनता है। यह आवश्यक पोषक तत्वों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों से भरपूर होता है, तथा मिट्टी की संरचना में सुधार करता है। जैविक कचरे को पुनर्चक्रित करके और उसे मिट्टी में लौटाकर खाद बनाने से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो जाती है।2. हरी खाद और आवरण फसलेंआवरण फसलें (Cover crops), जिन्हें हरी खाद के रूप में भी जाना जाता है, मिट्टी के स्वास्थ्य और उर्वरता में सुधार के लिए लगाई जाती हैं। फलियां, घास और तिपतिया घास जैसी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ग्रहण करती हैं, तथा खरपतवारों और मिट्टी के कटाव को रोकती हैं। जब ये फसलें विघटित हो जाती हैं, तो वे पोषक तत्व और कार्बनिक पदार्थों से मिट्टी को समृद्ध करती हैं। इस प्रकार, वे मुख्य फसल के विकास में सहायक हैं। 3. जैवउर्वरक और माइक्रोबियल इनोकुलेंट्स (Microbial Inoculants)राइजोबियम (rhizobium), माइकोराइजा (mycorrhizae) और नाइट्रोजन-फिक्सिंग बैक्टीरिया (nitrogen-fixing bacteria) जैसे जैव उर्वरक, माइक्रोबियल इनोकुलेंट हैं। ये जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता और पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाते हैं। ये लाभकारी सूक्ष्मजीव, पौधों के साथ सहजीवी संबंध बनाते हैं, पोषक तत्वों के अवशोषण में मदद करते हैं, पौधों के विकास को बढ़ावा देते हैं, और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करते हैं। इसके अलावा, अगला बड़ा नवाचार ‘हरित अमोनिया’ का उत्पादन है। यह नाइट्रोजन उर्वरक उत्पादन के लिए कार्बन-मुक्त विकल्प प्रदान करता है, जो टिकाऊ कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हरित अमोनिया का उत्पादन, प्राकृतिक गैस के बजाय पवन, सौर या जलविद्युत ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके किया जाता है। सबसे पहले, नवीकरणीय बिजली से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है। फिर, वायु पृथक्करण इकाइयां वायुमंडल से नाइट्रोजन गैस अलग करती हैं। इसके पश्चात, हरित हैबर-बॉश प्रक्रिया में अमोनिया का उत्पादन करने के लिए, उत्प्रेरक का उपयोग करके हाइड्रोजन और नाइट्रोजन को दबाव में संयोजित किया जाता है। यह जीवाश्म ईंधन (प्राकृतिक गैस) के बजाय नवीकरणीय ऊर्जा द्वारा संचालित होता है। हरित अमोनिया, पारंपरिक अमोनिया उत्पादन से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को समाप्त करता है, तथा नाइट्रोजन उर्वरक के लिए एक स्वच्छ विकल्प प्रदान करता है। साथ ही, यह वैश्विक स्थिरता और जलवायु कार्रवाई लक्ष्यों के साथ संरेखित है।संदर्भ 1. https://tinyurl.com/yzkbr6bb 2. https://tinyurl.com/3rtky2e4 3. https://tinyurl.com/2wt98vyj 4. https://tinyurl.com/5cjehkfw 5. https://tinyurl.com/4sjnpfck 6. https://tinyurl.com/bd6cpvtb
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
क्या 1970 के दशक की उस एक बगावत ने हमेशा के लिए बदल दिया क्रिकेट का इतिहास?
साल 1977 की बात है, जब क्रिकेट की दुनिया के सबसे बड़े और रूढ़िवादी अधिकारियों के सामने एक व्यक्ति ने खड़े होकर निडरता से कहा था कि "हम सभी के अंदर थोड़ा बहुत लालच होता है, आपकी कीमत क्या है?" जब उन क्रिकेट अधिकारियों ने उसकी बात नहीं मानी, तो उस व्यक्ति ने एक बेहद आक्रामक रास्ता अपनाया और दुनिया के 50 से अधिक बेहतरीन क्रिकेटरों को अपनी ही एक अलग क्रिकेट प्रतियोगिता के लिए गुप्त रूप से साइन कर लिया। यह कोई और नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया के अरबपति मीडिया टाइकून (media tycoon) केरी पैकर (Kerry Packer) थे। पैकर का शुरुआती जीवन चुनौतियों से भरा था। बचपन में पोलियो के कारण वे नौ महीने अस्पताल में रहे, लेकिन इस बीमारी से उबरकर वे अपने स्कूल के हैवीवेट बॉक्सिंग चैंपियन (Heavyweight Boxing Champion) बने। पैकर को पढ़ने-लिखने में दिक्कत होती थी, जिसे अनजानी बीमारी डिस्लेक्सिया (dyslexia) कहा जाता है, और उनके पिता उन्हें परिवार का सबसे बेवकूफ सदस्य मानते थे। लेकिन इसी लड़ाकू स्वभाव ने आगे चलकर उन्हें व्यापार और क्रिकेट की दुनिया में अलग पहचान दिलाई। उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया जिसने सफेद कपड़ों और दिन के उजाले में खेले जाने वाले इस पारंपरिक खेल को रंगीन कपड़ों, दूधिया रोशनी और खिलाड़ियों को मिलने वाले भारी वेतन के एक बिल्कुल नए युग में धकेल दिया। केरी पैकर कौन थे और उन्होंने पारंपरिक क्रिकेट से इतनी बड़ी बगावत क्यों की?केरी पैकर ऑस्ट्रेलिया के एक बेहद ताकतवर मीडिया घराने से ताल्लुक रखते थे। साल 1974 में उनके पिता की मृत्यु के बाद उन्हें विरासत में 100 मिलियन डॉलर का साम्राज्य मिला था, जिसे उन्होंने अपनी कुशाग्र व्यापारिक बुद्धि से अपनी मृत्यु तक 6.5 बिलियन डॉलर के विशाल साम्राज्य में बदल दिया था। 1976 के मध्य में, पैकर अपने टीवी चैनल 'चैनल नाइन' (Channel Nine) के लिए ऑस्ट्रेलिया के घरेलू टेस्ट मैचों के प्रसारण के विशेष अधिकार चाहते थे। उन्होंने इसके लिए तीन साल के 1.5 मिलियन डॉलर की भारी-भरकम पेशकश की, जो कि पिछले प्रसारण अनुबंध से पूरे आठ गुना अधिक थी। लेकिन ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट बोर्ड (Australian Cricket Board) ने उनके इस आकर्षक प्रस्ताव को खारिज कर दिया और सरकारी चैनल को तरजीह दी। पैकर को यह महसूस हुआ कि यह फैसला एक पुराने नेटवर्क की आपसी मिलीभगत का नतीजा है। इस अपमान से पैकर को इतनी नाराज़गी हुई कि उन्होंने खुद की एक क्रिकेट प्रतियोगिता शुरू करने की ठान ली, जिसे 'वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट' (world series cricket) का नाम दिया गया। 1977 की शुरुआत में ही उन्होंने इंग्लैंड के तत्कालीन कप्तान टोनी ग्रेग (Tony Greig) और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान इयान चैपल (Ian Chappell) की मदद से दुनिया भर के दिग्गज खिलाड़ियों को अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाना शुरू कर दिया। इयान चैपल ने बाद में कहा था कि यह उनके जीवन का सबसे कठिन क्रिकेट था क्योंकि इसमें दुनिया के सभी सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी शामिल थे।दुनिया भर के क्रिकेट प्रशासकों और अदालतों ने इस बड़े बदलाव पर कैसी प्रतिक्रिया दी?मई 1977 में जब पैकर की इस गुप्त योजना का खुलासा हुआ, तो क्रिकेट जगत में जैसे भूचाल आ गया। क्रिकेट प्रशासकों ने इसे पैकर का सर्कस करार दिया और खिलाड़ियों को भाड़े का टट्टू कहकर अपमानित किया। इंग्लैंड के टोनी ग्रेग से उनकी कप्तानी छीन ली गई। इस विद्रोह को दबाने के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (International Cricket Council) ने लंदन में एक बैठक बुलाई, जिसमें बात न बनने पर पैकर ने स्पष्ट कह दिया कि अब हर कोई अपने लिए लड़ेगा। जुलाई में परिषद ने फैसला सुनाया कि पैकर के मैचों को प्रथम श्रेणी का दर्जा नहीं दिया जाएगा और इसमें हिस्सा लेने वाले खिलाड़ियों पर टेस्ट क्रिकेट खेलने से प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। इसके खिलाफ पैकर ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। अदालत में चले एक लंबे मुकदमे में जस्टिस स्लेड (Justice Slade) ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि पेशेवर क्रिकेटरों को अपनी आजीविका कमाने का पूरा हक है और क्रिकेट बोर्ड उनके रास्ते में सिर्फ इसलिए बाधा नहीं डाल सकता क्योंकि इससे उनके अपने हित प्रभावित होते हैं। इस फैसले से क्रिकेट प्रतिष्ठानों को भारी झटका लगा और उन्हें मुकदमे के खर्च के रूप में लगभग 250,000 पाउंड भी चुकाने पड़े। हालांकि, अलग-अलग देशों का रुख समय के साथ बदलता गया। वेस्टइंडीज़ का क्रिकेट बोर्ड आर्थिक रूप से बहुत कमज़ोर था, इसलिए 1979 के वसंत में उन्होंने पैकर के साथ सीरीज़ के लिए बातचीत शुरू कर दी। पाकिस्तान ने शुरुआत में सख्त रवैया अपनाया, लेकिन बाद में इंग्लैंड के खिलाफ बुरी तरह हारने पर उन्होंने व्यावहारिक सोच अपनाते हुए 1978 में भारत के खिलाफ सीरीज़ के लिए पैकर के खिलाड़ियों को टीम में वापस बुला लिया। न्यूज़ीलैंड के प्रशासक वाल्टर हैडली (Walter Hadley) शुरू से ही समझौता चाहते थे। वहीं, रंगभेद के कारण अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध झेल रहे दक्षिण अफ्रीका के खिलाड़ी भी इस मौके का फायदा उठाकर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के साथ खेलने के लिए उत्सुक थे। उस समय भारत इस विवाद से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा था, लेकिन ऐसी ज़ोरदार अफ़वाहें फैल गई थीं कि भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी (Bishan Singh Bedi) और स्टार बल्लेबाज़ सुनील गावस्कर (Sunil Gavaskar) ने भी पैकर की लीग के विकल्पों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।दूधिया रोशनी, हेलमेट और ड्रॉप-इन पिचों ने पारंपरिक खेल को कैसे नया रूप दिया?क्रिकेट को रात के समय फ्लडलाइट्स (floodlights) में खेलने का विचार सबसे पहले 1930 के दशक में सामने आया था, लेकिन माना जाता है कि इंग्लैंड में पहली बार फ्लडलाइट्स में क्रिकेट मैच 11 अगस्त 1952 को मिडिलसेक्स काउंटी क्रिकेट क्लब (Middlesex County Cricket Club) और आर्सेनल फुटबॉल क्लब (Arsenal Football Club) के बीच खेला गया था। लेकिन इसे नियमित रूप से शुरू करने का पूरा श्रेय केरी पैकर को ही जाता है। वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट के शुरुआती मैचों में दर्शकों की संख्या बहुत कम थी। पैकर को पारंपरिक मैदानों पर खेलने की अनुमति नहीं थी, इसलिए उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई नियमों वाले फुटबॉल स्टेडियम (Football Stadium) पट्टे पर लिए। सबसे बड़ी समस्या वहां क्रिकेट की पिच बनाने की थी। पैकर ने जॉन मै (John May) को काम पर रखा, जिन्होंने ग्रीनहाउस (greenhouse) में पिचें उगाईं और क्रेन की मदद से उन्हें स्टेडियम की सतह में स्थापित किया, जिसे आज हम ड्रॉप-इन पिच (drop-in pitch) के नाम से जानते हैं। इस तकनीक के बिना यह लीग पूरी तरह से विफल हो जाती। पैकर ने तेज़ गेंदबाज़ी के आक्रामक पहलू पर बहुत ज़ोर दिया और डेनिस लिली (Dennis Lillee), इमरान खान (Imran Khan) तथा एंडी रॉबर्ट्स (Andy Roberts) जैसे गेंदबाज़ों का भारी प्रचार किया। सिडनी (Sydney) के एक मैच में वेस्टइंडीज़ के एंडी रॉबर्ट्स की एक खतरनाक बाउंसर से ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ डेविड हूक्स (David Hookes) का जबड़ा टूट गया। इस भयानक घटना ने खिलाड़ियों को सुरक्षा के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया और इसी के बाद क्रिकेट में हेलमेट का चलन शुरू हुआ। शुरुआत में डेनिस एमिस (Dennis Amis) ने बल्लेबाज़ी करते समय अपनी सुरक्षा के लिए मोटरसाइकिल का हेलमेट पहना था। पैकर ने दर्शकों को मैदान में लाने के लिए मार्केटिंग (Marketing) पर ज़ोर दिया। नतीजा यह हुआ कि नवंबर 1978 में सिडनी क्रिकेट ग्राउंड में फ्लडलाइट्स के नीचे खेले गए एक डे-नाइट मैच को देखने के लिए 44,374 दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। रात के समय रंगीन कपड़ों में क्रिकेट का यह नया रूप दर्शकों को बहुत पसंद आया। वनडे क्रिकेट का उदय कैसे हुआ और इसे दुनिया की सबसे बड़ी पहचान कैसे मिली?वनडे यानी वन डे इंटरनेशनल (One Day International) सीमित ओवरों का क्रिकेट है, जो मुख्य रूप से 1970 के दशक में अस्तित्व में आया। क्रिकेट के इतिहास का पहला आधिकारिक वनडे मैच 5 जनवरी 1971 को मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड (Melbourne Cricket Ground) पर ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच खेला गया था। लेकिन इसे आज के आधुनिक, पेशेवर और तेज़-तर्रार रूप में ढालने का काम 1970 के दशक के अंत में पैकर की इसी बगावत ने किया। रंगीन जर्सी (Jersey), रात के समय मैच, सफेद गेंदें, काली साइट स्क्रीन (black site screen), अलग-अलग एंगल वाले कई टीवी कैमरे, पिच के माइक्रोफोन और टीवी स्क्रीन पर ग्राफिक्स—यह सब उसी वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट की देन हैं। 17 जनवरी 1979 को पहली बार पूरी तरह से रंगीन जर्सी में मैच खेला गया, जिसमें ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी सुनहरे पीले (golden yellow) और वेस्टइंडीज़ के खिलाड़ी कोरल पिंक (coral pink) कपड़ों में मैदान पर उतरे थे। धीरे-धीरे वनडे क्रिकेट में सफेद कपड़ों और लाल गेंद का चलन खत्म हो गया और 2001 तक इसे पूरी तरह से बंद कर दिया गया। 1979 आते-आते भारी आर्थिक नुकसान और मुकदमों से थककर ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट बोर्ड ने पैकर के साथ शांति समझौता कर लिया। पैकर के चैनल को न सिर्फ क्रिकेट के विशेष प्रसारण अधिकार मिले बल्कि खेल के प्रचार-प्रसार का दस साल का बड़ा अनुबंध भी हासिल हुआ। आज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद सभी टीमों की वनडे रैंकिंग जारी करती है। इस समय दुनिया में 12 पूर्ण सदस्य देश हैं जिन्हें वनडे क्रिकेट का स्थायी दर्ज़ा प्राप्त है, और क्रिकेट का सबसे बड़ा महाकुंभ यानी विश्व कप भी इसी 50-ओवर के प्रारूप में खेला जाता है। लखनऊ के खेल प्रेमी पहली बार अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट का गवाह कब बने?वनडे क्रिकेट और डे-नाइट मैचों के इस रोमांचक सफर ने धीरे-धीरे दुनिया भर के देशों और भारत के हर कोने को क्रिकेट के खुमार में पूरी तरह से रंग दिया। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के खेल प्रेमियों के लिए भी वह दिन बेहद खास और ऐतिहासिक था, जब उनके अपने शहर में पहली बार अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट का शानदार आगाज़ हुआ। लखनऊ के मशहूर के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम (K. D. Singh Babu Stadium) में पहला पुरुष वनडे मैच 27 अक्टूबर 1989 को खेला गया था। यह ऐतिहासिक मुकाबला एमआरएफ वर्ल्ड सीरीज़, (जिसे क्रिकेट जगत में नेहरू कप के नाम से भी जाना जाता है!) का एक अहम हिस्सा था। इस बड़े मंच पर पाकिस्तान और श्रीलंका की मजबूत टीमें आमने-सामने थीं। उस दौर में स्टेडियम की सीढ़ियों पर बैठकर दुनिया के दिग्गज खिलाड़ियों को एक दूसरे के खिलाफ कड़ा संघर्ष करते देखना लखनऊ के दर्शकों के लिए एक बिल्कुल नया, अद्भुत और रोमांचक अनुभव था। इसी मैच के साथ लखनऊ शहर ने भी विश्व क्रिकेट के नक़्शे पर एक शानदार मेज़बान के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई, जो आज भी इस शहर की समृद्ध खेल विरासत का एक बेहद अहम हिस्सा है। इस एक मैच ने लखनऊ के युवाओं में खेल के प्रति जो दीवानगी पैदा की, वह आज भी यहाँ के हर गली-मोहल्ले में खेलते बच्चों में साफ़ देखी जा सकती है। संदर्भ https://tinyurl.com/252t65tchttps://tinyurl.com/26vpbjymhttps://tinyurl.com/25aorczjhttps://tinyurl.com/2ak7ll6uhttps://tinyurl.com/22anss5j
तितलियाँ और कीट
15-07-2026 09:24 AM • Lucknow-Hindi
क्या आपने देखा है लखनऊ की सबसे भव्य प्राकृतिक देन, 'ब्लू नवाब तितली' को?
तितलियों को अक्सर फूलों पर मंडराते और अमृत (nectar) पीते देखा जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में एक ऐसी तितली भी पाई जाती है जिसका नाम 'नवाबों' पर रखा गया है और जिसका खान-पान अन्य तितलियों से बिल्कुल अलग है? 'ब्लू नवाब' (Polyura schreiber) नाम की यह तितली न केवल अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) के स्वास्थ्य की एक बड़ी संकेतक भी है। कीट विज्ञानियों के अनुसार, जहाँ ब्लू नवाब मौजूद होती है, वहाँ का वातावरण अत्यंत शुद्ध और संतुलित माना जाता है।
ब्लू नवाब क्या है और इसकी वैज्ञानिक पहचान क्या है? ब्लू नवाब, जिसे वैज्ञानिक भाषा में पॉलीउरा श्रेइबर (Polyura schreiber) कहा जाता है, निम्फालिडे (Nymphalidae) परिवार की सदस्य है। यह मुख्य रूप से 'ब्रश-फुटेड' तितलियों की श्रेणी में आती है। इसकी पहचान इसके मजबूत शरीर और तेज उड़ान से होती है। इस तितली के पंखों का फैलाव 92 से 116 मिलीमीटर तक हो सकता है। इसके पिछले पंखों पर दो छोटी पूंछ जैसी संरचनाएं (tails) होती हैं, जो इसे अन्य प्रजातियों से अलग और आकर्षक बनाती हैं।
इसे 'ब्लू नवाब' ही क्यों कहा जाता है? इस तितली का नाम इसकी उपस्थिति और भारत के सांस्कृतिक इतिहास का एक अनूठा संगम है। 'ब्लू' शब्द इसके पंखों पर दिखने वाली सुंदर नीली चमक को दर्शाता है, जबकि 'नवाब' शब्द भारतीय इतिहास के उन शासकों और रईसों के लिए उपयोग किया जाता था जो अपनी भव्यता और गरिमा के लिए जाने जाते थे। चूँकि इस तितली की उड़ान अत्यंत शालीन, तेज और इसके रंगों में एक शाही चमक होती है, इसलिए इसे 'ब्लू नवाब' का नाम दिया गया। यह नाम इसकी राजसी सुंदरता और प्रकृति में इसके 'रॉयल' दर्जे का प्रतीक है।
भारत के किन इलाकों में यह पाया जाता है? ब्लू नवाब मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय एशिया (Tropical Asia) में पाई जाती है। भारत की बात करें तो यह दक्षिण भारत, असम और हिमालय की तलहटी वाले क्षेत्रों में देखी जाती है। इसके अलावा, यह म्यांमार, दक्षिण-पूर्वी एशिया और चीन के कुछ हिस्सों तक फैली हुई है। भारत में इसकी अलग-अलग उप-प्रजातियां भी मिलती हैं, जैसे दक्षिण भारत में Polyura schreiber wardii और असम से लेकर दक्षिण-पूर्वी एशिया तक Polyura schreiber assamensis पाई जाती है।
यह किस तरह के वातावरण में रहना पसंद करता है? अध्ययनों से पता चलता है कि ब्लू नवाब को घने वन क्षेत्र (Forested habitats) अधिक पसंद हैं। यह विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय जंगलों, पेड़ों से घिरे इलाकों और जल स्रोतों के पास वाले क्षेत्रों में रहती है। इसे शहरी पार्कों, बगीचों और मैंग्रोव दलदलों में भी देखा जा सकता है। यह तितली अक्सर पेड़ों की ऊँचाइयों पर बैठना पसंद करती है और सुबह के समय जंगल के निचले हिस्सों में तेजी से उड़ते हुए देखी जा सकती है।
ब्लू नवाब का आहार अन्य तितलियों से अलग क्यों है? जहाँ अधिकांश तितलियाँ केवल फूलों के रस पर निर्भर रहती हैं, वहीं ब्लू नवाब के वयस्क सदस्यों की पसंद काफी अलग है। ये तितलियाँ पेड़ों के रस (tree sap), सड़े हुए कार्बनिक पदार्थों और कभी-कभी पशुओं के अवशेषों (carrion) या उनके मल तक से पोषक तत्व प्राप्त करती हैं। पेड़ों का रस इन्हें वे खनिज और पोषक तत्व प्रदान करता है जो फूलों के अमृत में नहीं मिलते। नर तितलियों को अक्सर गीली जमीन पर खनिज सोखते हुए भी देखा जा सकता है।
इस तितली का जीवन चक्र और प्रजनन कैसे होता है? ब्लू नवाब का जीवन चक्र किसी चमत्कार से कम नहीं है। इसकी शुरुआत मादा द्वारा मेजबान पौधों (host plants) की पत्तियों के ऊपरी हिस्से पर दिए गए पीले, गोलाकार अंडों से होती है। एक अंडे का व्यास लगभग 1.9 मिमी होता है। लार्वा (Caterpillar): अंडे से निकलने वाला लार्वा शुरू में सुनहरा भूरा होता है, लेकिन जल्द ही हरा हो जाता है। इसके सिर पर चार सींग जैसी संरचनाएं होती हैं, जो इसे किसी छोटे 'ड्रैगन' जैसा लुक देती हैं। यह मुख्य रूप से 'रेड सागा' (Adenanthera pavonina), 'रंबूटन' और 'वागटिया' जैसे पौधों की पत्तियां खाता है। प्यूपा (Pupa): पूरी तरह विकसित होने के बाद, इल्ली प्यूपा में बदल जाती है। यह प्यूपा हरे रंग का होता है और देखने में किसी बेरी जैसा लगता है। वयस्क: लगभग 10 से 11 दिनों के बाद प्यूपा से एक सुंदर तितली बाहर आती है।
पारिस्थितिकी तंत्र में इसकी क्या भूमिका है? बटरफ्लाई कंजर्वेशन जैसी संस्थाओं का मानना है कि तितलियाँ जैव विविधता की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। ब्लू नवाब जैसे जीव 'स्वास्थ्य संकेतक' के रूप में कार्य करते हैं। इनका मौजूद होना इस बात का प्रमाण है कि उस क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ है और वहाँ प्रदूषण का स्तर कम है। इसके अलावा, ये परागण (pollination) में मदद करती हैं और खाद्य श्रृंखला (food chain) का एक अहम हिस्सा हैं, जहाँ पक्षी और चमगादड़ इनका शिकार करते हैं।
दुर्भाग्य से, ब्लू नवाब को सबसे बड़ा खतरा आवास विनाश (Habitat destruction) से है। जंगलों की कटाई और शहरीकरण के कारण इनके रहने और प्रजनन के स्थान कम हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हमें इन 'शाही तितलियों' को बचाना है, तो हमें उनके प्राकृतिक आवासों और उन विशिष्ट मेजबान पौधों का संरक्षण करना होगा जिन पर इनका जीवन निर्भर है।
अचानक रुकती धड़कनों को फिर से कैसे शुरू कर देते हैं,पेसमेकर और आईसीडी जैसे छोटे से यंत्र?
फरवरी 1980 की एक सुबह जॉन्स हॉपकिन्स अस्पताल में चिकित्सा जगत ने एक अभूतपूर्व घटना देखी। डॉ. लेवी वॉटकिंस जूनियर ने एक 47 वर्षीय महिला के शरीर में दुनिया का पहला 'इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर डिफिब्रिलेटर' (Implantable Cardioverter Defibrillator ICD) प्रत्यारोपित किया। यह वह दौर था जब विशेषज्ञ इस तकनीक को लेकर संशय में थे। यहाँ तक कि बाहरी डिफिब्रिलेटर के आविष्कारक बर्नार्ड लाउन ने भी इसे "एक अव्यवहारिक समाधान" करार दिया था। लेकिन आज, यही यंत्र दुनिया भर में अचानक होने वाली कार्डियक डेथ (Sudden Cardiac Death) को रोकने का सबसे प्रमुख हथियार बन चुका है।
ICD क्या है और यह हमारे दिल की सुरक्षा कैसे करता है? इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर-डिफिब्रिलेटर (ICD) एक छोटा, बैटरी से चलने वाला उपकरण है जिसे शरीर के अंदर, आमतौर पर बाएं कॉलरबोन के नीचे लगाया जाता है। विकिपीडिया के आंकड़ों के अनुसार, यह मुख्य रूप से उन मरीजों के लिए उपयोग किया जाता है जिन्हें वेंट्रिकुलर फाइब्रिलेशन या वेंट्रिकुलर टैकीकार्डिया जैसी जानलेवा स्थितियों का खतरा होता है। यह उपकरण लगातार हृदय की लय (Rhythm) की निगरानी करता है।
इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर-डिफिब्रिलेटर (ICD)
जब भी हृदय की गति एक निर्धारित सीमा से अधिक तेज़ या अनियमित हो जाती है, तो यह उपकरण तुरंत उसे पहचान लेता है। आधुनिक ICD न केवल खतरनाक धड़कन को पहचानते हैं, बल्कि वे 'ओवरड्राइव पेसिंग' या 'एंटी-टैकीकार्डिया पेसिंग' (ATP) के जरिए दिल को सामान्य लय में लाने की कोशिश भी करते हैं। यदि गति फिर भी अनियंत्रित रहती है, तो यह उपकरण एक बिजली का झटका (Shock) भेजता है ताकि हृदय फिर से अपनी सामान्य गति पर लौट सके। इसकी कार्यप्रणाली किसी आपातकालीन कक्ष में डॉक्टर द्वारा दिए जाने वाले बाहरी झटके के समान ही होती है, लेकिन शरीर के अंदर होने के कारण इसे बहुत कम वोल्टेज की आवश्यकता होती है।
चिकित्सा इतिहास में इन उपकरणों का विकास कैसे हुआ? हृदय को सहारा देने की सुरक्षा करने वाले इन उपकरणों की कहानी लगभग 100 साल पुरानी है। पेसमेकर के विकास की शुरुआत 1928 में हुई थी, लेकिन पहला पूरी तरह से प्रत्यारोपित होने वाला पेसमेकर 1958 में स्वीडन के करोलिंस्का संस्थान में लगाया गया था। इसे रूण एल्मक्विस्ट और सर्जन एके सेनिंग ने विकसित किया था। दिलचस्प तथ्य यह है कि दुनिया के पहले पेसमेकर प्राप्त करने वाले मरीज, अर्ने लार्सन, अपने जीवनकाल में 26 अलग-अलग पेसमेकर उपकरणों के साथ 86 वर्ष की आयु तक जीवित रहे। ICD के विकास का श्रेय डॉ. मिशेल मिरोव्स्की और उनकी टीम को जाता है। 1969 में शुरू हुई उनकी रिसर्च को 11 साल बाद सफलता मिली। एप्लाइड फिजिक्स लेबोरेटरी (APL) ने इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहाँ अंतरिक्ष यान में इस्तेमाल होने वाली उच्च-तकनीक और गुणवत्ता नियंत्रण तकनीकों को इस मेडिकल डिवाइस में लागू किया गया। शुरुआती दौर में ये उपकरण इतने बड़े थे कि उन्हें पेट के क्षेत्र में प्रत्यारोपित करना पड़ता था और इसके लिए मरीज की पसलियों को खोलना पड़ता था।
पेसमेकर और ICD के बीच मुख्य अंतर क्या है? यद्यपि ये दोनों उपकरण दिखने में एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन इनका कार्य अलग है। पेसमेकर मुख्य रूप से 'ब्रैडीकार्डिया' यानी धीमी धड़कन के इलाज के लिए होता है। यह तब काम करता है जब हृदय का प्राकृतिक पेसमेकर सही संकेत नहीं दे पाता। दूसरी ओर, ICD एक अधिक उन्नत प्रणाली है जिसमें पेसमेकर और डिफिब्रिलेटर दोनों के गुण होते हैं। यह धीमी धड़कन को सामान्य करने के साथ-साथ जानलेवा तेज़ धड़कन को रोकने की क्षमता भी रखता है। मे़डट्रॉनिक (Medtronics) के अनुसार, आधुनिक पेसमेकर अब विटामिन के कैप्सूल जितने छोटे (Leadless Pacemakers) भी आने लगे हैं, जिन्हें सीधे हृदय के अंदर लगाया जा सकता है।
पेसमेकर
ग्लोबल मार्केट और भारत में इन उपकरणों की आपूर्ति कैसे होती है? इन जीवनरक्षक उपकरणों का निर्माण और वैश्विक आपूर्ति मुख्य रूप से कुछ बड़ी कंपनियों जैसे मे़डट्रॉनिक (Medtronic), सेंट जूड मेडिकल (अब एबॉट) और बोस्टन साइंटिफिक द्वारा की जाती है। साइंस डायरेक्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, ICD एक जटिल प्रणाली है जिसमें पल्स जेनरेटर, लीड्स (तारे) और एक प्रोग्रामर शामिल होता है। इसके जेनरेटर में कंप्यूटर चिप, रैम, प्रोग्रामेबल सॉफ्टवेयर और लिथियम-सिल्वर वैनेडियम बैटरी होती है।
भारत जैसे देशों में, जहाँ हृदय रोगों का बोझ बहुत अधिक है, इन उन्नत चिकित्सा तकनीकों के लिए मुख्य रूप से आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। पीएमसी (PMC) की शोध रिपोर्ट बताती है कि भारत इन उपकरणों का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगवाता है। उन्नत मेडिकल ग्रेड बैटरी और माइक्रो-इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्माण की स्थानीय सीमाओं के कारण, भारत के मरीजों को इन वैश्विक कंपनियों की तकनीक पर ही भरोसा करना पड़ता है। हालांकि, तकनीकी प्रगति के साथ इन उपकरणों की बैटरी लाइफ अब 10 साल से अधिक होने लगी है, जिससे बार-बार सर्जरी की आवश्यकता कम हुई है।
इन उपकरणों के साथ जीवन जीने की क्या चुनौतियाँ हैं? एक बार ICD या पेसमेकर लग जाने के बाद मरीज एक सामान्य और सक्रिय जीवन जी सकता है, लेकिन कुछ सावधानियां बरतनी ज़रूरी होती हैं। मरीजों को तेज़ चुंबकीय क्षेत्र, एमआरआई (MRI) मशीनों और कुछ विशेष औद्योगिक उपकरणों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। हालांकि, मे़डट्रॉनिक जैसी कंपनियों ने अब 'MRI-Conditional' उपकरण पेश किए हैं, जिन्हें विशेष सेटिंग्स के साथ एमआरआई स्कैन के दौरान सुरक्षित रखा जा सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका गहरा प्रभाव देखा गया है। शोध बताते हैं कि लगभग 13% से 38% मरीजों में अचानक लगने वाले झटके के डर से चिंता (Anxiety) और अवसाद के लक्षण देखे जा सकते हैं। इसीलिए, आधुनिक उपकरणों में अब ऐसी तकनीकें शामिल की जा रही हैं जो 'इनएप्रोप्रिएट शॉक' (गलत समय पर लगने वाले झटके) को कम कर सकें।
क्या है इन उपकरणों का भविष्य? चिकित्सा जगत अब 'लीडलेस' (बिना तारों वाले) उपकरणों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की ओर बढ़ रहा है। मे़डट्रॉनिक के अनुसार, रिमोट मॉनिटरिंग सिस्टम अब डॉक्टरों को इंटरनेट के माध्यम से घर बैठे मरीज के दिल की जानकारी देने में सक्षम हैं। भविष्य में, एआई इन उपकरणों के डेटा का विश्लेषण कर धड़कन बिगड़ने से पहले ही डॉक्टर को चेतावनी दे सकेगा। भारत के लिए चुनौती इन महँगी तकनीकों को आम जनता के लिए सुलभ और किफायती बनाने की है।
लखनऊ की ज़रदोज़ी कढ़ाई जैसे शिल्प, व्यापक मशीनी निर्माण के युग में भी बने हैं प्रासंगिक
लखनऊ, आज हम समझेंगे कि ‘शिल्प’ क्या होता है, और इसमें कुशल और रचनात्मक हस्तनिर्मित उत्पाद कैसे शामिल होते हैं। फिर, हम विनिर्माण के बारे में जानेंगे, और देखेंगे कि मशीनों की मदद किस प्रकार बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। इसके बाद, हम हथकरघा और मशीन से बने कपड़ों को देखकर, शिल्प और विनिर्माण की तुलना करेंगे। लेख में अंत में, हम देखेंगे कि ‘ज़रदोज़ी और चिकनकारी कढ़ाई’ पारंपरिक शिल्प कौशल व दक्षता के साथ, मशीन से बने कपड़ों में मानवीय स्पर्श कैसे जोड़ती है।
कलाकारों द्वारा, पूरी तरह से हाथ से या हस्त उपकरणों की सहायता से बनाए गए उत्पादों को ‘शिल्प’ कहा जाता है। कारीगर की प्रत्यक्ष मेहनत व कुशलता, ऐसे उत्पाद का सबसे महत्वपूर्ण घटक होता है। ये उत्पाद संस्कृतियों को जोड़ते हैं। वे उस स्थान का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां से वे संबंधित हैं। वे सुंदर, कार्यात्मक और पारंपरिक होते हैं। शिल्प निर्माण से ऐसे उत्पाद बनते हैं, जो एक दूसरे से विशिष्ट होते हैं, क्योंकि इनका निर्माण एक समय में एक ही कारीगर द्वारा किया जाता है। इस कारण, आध्यात्मिक और सामाजिक ज्ञान रखने वाले ग्राहक इन्हें उपयोगी और महत्वपूर्ण पाते हैं।
शिल्प उत्पादन प्राचीन काल से ही अस्तित्व में है, और औद्योगिक व्यवसाय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उत्पादन का यह रूप औद्योगिक क्रांति से पहले काफी आम था। यांत्रिक या बड़े पैमाने पर उत्पादन के आगमन से पहले, सभी उत्पादित चीजें हस्तनिर्मित होती थीं। वे उत्पाद सरल उपकरणों और बिना किसी स्वचालित प्रक्रिया के बिना, हाथ से बनाए जाते थे।
वास्तव में, ‘विनिर्माण’ वह उद्योग है, जो मानवीय श्रम या मशीन के उपयोग से कच्चे माल से उत्पाद बनाता है। सरल अर्थ में, यह बड़े पैमाने पर तैयार उत्पादों में, उनके घटकों के निर्माण या संयोजन को दर्शाता है। सबसे महत्वपूर्ण विनिर्माण उद्योगों में, विमान, ऑटोमोबाइल, रसायन, कपड़े, कंप्यूटर, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, विद्युत उपकरण, फर्नीचर, भारी मशीनरी, परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद, जहाज, इस्पात, उपकरण और डाई आदि शामिल हैं।
बड़े पैमाने पर होने वाले विनिर्माण में, उत्पादन मात्रा बढ़ने पर प्रति उत्पाद लागत कम हो जाती है। उत्पादन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करके और विशेष मशीन का उपयोग करके, श्रम लागत को भी कम किया जा सकता है, और उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है। मानकीकृत प्रक्रियाओं और मशीन के साथ आसानी से, उत्पादों की बड़ी मात्रा में प्रतिकृतियां बनाई जा सकती हैं और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन किया जा सकता है। उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग और विस्तारित बाज़ारों की जरूरतों को पूरा करने के लिए, यह मापनीयता महत्वपूर्ण है।
ऐसी व्यापक उत्पादन क्रांति ने विभिन्न उद्योगों में नवाचार और तकनीकी प्रगति को प्रेरित किया है। चूंकि, कोई भी निर्माता दक्षता और उत्पादकता बढ़ाने का प्रयास करते हैं, वे उत्पादन प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने और नई प्रौद्योगिकियां अपनाने हेतु अनुसंधान और विकास में निवेश करते हैं।
इसके विपरीत, पैमाने के संदर्भ में कारीगर विनिर्माण अक्सर सीमित होता है। चूंकि ये उत्पाद हस्तनिर्मित होते हैं, इसलिए किसी समय सीमा के भीतर बड़ी मांग को पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। प्रत्येक उत्पाद के लिए आवश्यक समय और प्रयास से, बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन करना मुश्किल हो सकता है। कारीगर विनिर्माण महंगा भी हो सकता है। हस्तनिर्मित उत्पादों की श्रम-गहन प्रकृति के साथ-साथ, कारीगरों की विशेषज्ञता और कौशल के परिणामस्वरूप उनकी उत्पादन लागत उच्च हो सकती है। इसके अलावा, प्रत्येक उत्पाद को हाथों से बनाने में समय लगता है, और उसकी बारीकियों पर ध्यान देना पड़ता है। कारीगर अपनी कृतियों की गुणवत्ता और विशिष्टता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास करते हैं। हालांकि, विस्तार पर ध्यान देने से उत्पादन समय भी लंबा हो सकता है।
जबकि बड़े पैमाने पर होने वाले उत्पादन के अपने फायदे हैं, कारीगर विनिर्माण द्वारा लाए जाने वाले अद्वितीय मूल्य और गुणों को स्वीकार करना महत्वपूर्ण है। कारीगरों के सामने आने वाली चुनौतियों के कारण बड़े पैमाने पर उत्पादन का उदय हुआ है, लेकिन हस्तनिर्मित उत्पादों के साथ आने वाली कलात्मकता, शिल्प कौशल और व्यक्तित्व के लिए अभी भी जगह है। अतः व्यापक उत्पादन और कुछ क्षेत्रों में अद्वितीय शिल्प कौशल एवं व्यक्तित्व संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।
चलिए, इन दो विपरीत स्थितियों का एक उदाहरण देखते हैं। हथकरघा कपड़ा, मानवीय रूप से संचालित करघे पर बुना गया कोई भी कपड़ा है। हथकरघे में एक ढांचा होता है, जो ऊर्ध्वाधर ताना धागों को तना हुआ रखता है, जबकि बुनकर हाथ, पैर पैडल और एक शटल का उपयोग करके क्षैतिज बाने के धागों को उनसे जोड़ते हैं। एक कुशल कारीगर, पूरे कार्य दिवस में आम तौर पर पांच से आठ मीटर कपड़ा बुनता है। इस प्रकार बुने हुए कपड़े में थोड़ी अनियमित बनावट होती है, परंतु यह मुलायम एवं हवादार होता है। भारत में हथकरघा क्षेत्र, कृषि के बाद ग्रामीण रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है, जो 4.3 मिलियन से अधिक बुनकरों और संबद्ध श्रमिकों को रोजगार प्रदान करता है। वैश्विक हथकरघा उत्पादन में भारत का हिस्सा लगभग 85 प्रतिशत है।
हथकरघे के विपरीत, एक पावरलूम मशीन बिजली से चलती है, और एक मशीन चौदह हथकरघों के उत्पादन को प्रतिस्थापित कर सकती है। पावरलूम में बने कपड़े कसकर और समान रूप से बुने जाते हैं, जिससे यह सख्त और कम हवादार होते हैं। समय के साथ उनमें कृत्रिम अहसास विकसित होने लगता है, जबकि हाथ से बुने हुए कपड़े उपयोग के साथ नरम हो जाते हैं। हथकरघा बुनाई में शून्य विद्युत ऊर्जा की खपत होती है, और कई कारीगर आज भी प्राकृतिक तथा पौधों पर आधारित रंगों पर निर्भर हैं। इसी कारण, हथकरघा कपड़ा चुनना, कम कार्बन प्रभाव और उस शिल्प के संरक्षण के लिए प्रयास है।
दरअसल, हस्तशिल्प का परिणाम सजावटी चीज़ें या प्राचीन, संशोधित पारंपरिक या फैशनेबल उत्पाद होते हैं। ऐसे उत्पादों में उपयोग की जाने वाली सामग्री प्राकृतिक, औद्योगिक रूप से संसाधित या शायद पुनर्नवीनीकृत हो सकती है। हस्तकला उत्पाद में, शिल्पकार अपनी सांस्कृतिक विरासत के विचारों, रूपों, सामग्रियों और कार्य के तरीकों के साथ-साथ अपने स्वयं के मूल्यों, जीवन दर्शन, फैशन और आत्म-छवि में स्थानांतरित करते हैं। हस्तशिल्प में प्रचुर मात्रा में अंतर्निहित डेटा होता है, जो कौशल के साथ हर साल बढ़ता है।
वर्तमान समय में, मशीन से बने कपड़े अक्सर एक आधार के रूप में काम करते हैं, जिसे कारीगर हाथ की कढ़ाई से निखारते हैं। बड़े पैमाने पर होने वाले उत्पादन में, कपड़ों को मशीनों का उपयोग करके बुना, रंगा और सिला जाता है, जिससे समय और लागत कम हो जाती है। फिर इन कपड़ों को कुशल कारीगरों को सौंप दिया जाता है, जो इनपर हाथ की कढ़ाई करते हैं। इससे प्रत्येक टुकड़े को एक अद्वितीय और सजावटी फिनिश मिलती है।
मशीन से बने कपड़े वास्तव में कढ़ाई के लिए उपयुक्त होते हैं, क्योंकि वे बनावट में एक समान होते हैं और कसकर बुने जाते हैं। यह स्थिरता कारीगरों के लिए कपड़े को खींचे या विकृत किए बिना, सटीक और विस्तृत डिज़ाइन बनाना आसान बनाती है। परिणामस्वरूप, असमान हस्तनिर्मित कपड़ों पर काम करने की तुलना में कढ़ाई साफ-सुथरी और अधिक परिष्कृत दिखाई देती है।
इस संयोजन से उत्पादकों और कारीगरों दोनों को लाभ होता है। निर्माता कम लागत पर बड़ी मात्रा में उत्पादन कर सकते हैं, जबकि कारीगर उत्पाद के मूल्य और आकर्षण को बढ़ाने के लिए अपने कौशल का योगदान करते हैं। यह पारंपरिक कढ़ाई तकनीकों को आधुनिक फैशन में एकीकृत करके संरक्षित करने में भी मदद करता है।
इसी संबंध का एक उदाहरण ‘ज़रदोज़ी कढ़ाई’ है। आज, यह कढ़ाई मशीन पर बने कपड़ों पर की जाती है। कढ़ाई का यह रूप, फारस से भारत में प्रचलित हुआ था। शाब्दिक तौर पर, "ज़र" का अर्थ सोना है, और “दोज़ी" का अर्थ कढ़ाई है। इस प्रकार, ज़रदोज़ी, विभिन्न कपड़ों पर कढ़ाई करने के लिए धातु से बंधे धागों का उपयोग करने की प्रक्रिया को संदर्भित करता है।
औरंगजेब के शासनकाल के दौरान हमारा शहर लखनऊ इस कढ़ाई तकनीक का केंद्र बना था, जब सत्तारूढ़ मुगलों के तहत इस शाही कला को प्रोत्साहित किया गया। उनके संरक्षण ने ज़रदोज़ी कलाकारों को पूरे भारत में फैलने के लिए प्रोत्साहित किया। हालांकि, नवाबों के शहर से उच्च मांग के कारण लखनऊ उत्पादन का मुख्य केंद्र बना रहा। परंतु, समय के साथ सोने और चांदी की कीमतों में वृद्धि के साथ, ऐसी महंगी सामग्रियों का उपयोग मुश्किल हो गया, और कारीगरों ने सोने और चांदी में पॉलिश किए गए कृत्रिम धागों या तांबे के तारों का उपयोग करने का संकल्प लिया।
हाल ही में, भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री ने लखनऊ और हमारे आसपास के जिलों में निर्मित सभी ज़रदोज़ी वस्त्रों को जीआई टैग (GI tag) प्रदान किया है। हैदराबाद, दिल्ली, आगरा, कश्मीर, कोलकाता, वाराणसी और फर्रुखाबाद जैसे शहर, इस कढ़ाई के अन्य विशेष क्षेत्र हैं।
ज़रदोज़ी को दो अलग-अलग शैलियों में तैयार किया जाता है। पहली शैली ‘करचोबी’ है, जिसे मखमल या साटन जैसी भारी आधार सामग्री पर इसके टांके के घनत्व से पहचाना जाता है। यह आमतौर पर कोट, टेंट कवरिंग, फर्निशिंग और कैनोपी जैसे कपड़ों पर देखी जाती है। दूसरी शैली ‘कामदानी’ है, जिसमें रेशम और मलमल जैसे सुरुचिपूर्ण कपड़ों पर हल्का एवं नाजुक काम होता है। यह राजस्थान में प्रसिद्ध है। हालांकि इस तरह का काम स्कार्फ और घूंघट के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है, आजकल यह दुल्हनों के पहनावे पर सबसे ज्यादा दिखाई देता है।
ज़रदोज़ी डिज़ाइन को पहले कपड़े पर रेखांकित किया जाता है, और फिर मिश्रित धातु के तारों और आकृतियों को उस पर फैलाया जाता है। धातु के तारों से डिज़ाइन बनाए जाते हैं, तथा कपड़े पर इन तत्वों को सिलने के लिए सुई और धागे का उपयोग किया जाता है। ज़रदोज़ी में आमतौर पर फूलों के डिज़ाइन के साथ-साथ ज्यामितीय आकृतियां भी होती हैं, जो इन्हें सुंदर रूप प्रदान करती है।
क्या आपका हर कदम और क्लिक डेटाबेस में दर्ज हो रहा है?
क्या आप जानते हैं कि एक एंड्रॉयड स्मार्टफ़ोन जब बिल्कुल खाली रखा होता है और उसका कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा होता, तब भी वह हर बारह घंटे में एक मेगाबाइट डेटा गूगल के सर्वर पर भेजता है? यह चौंकाने वाला आंकड़ा उस कंपनी का है जिसने 1995 में स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के एक हॉस्टल के कमरे से अपनी शुरुआत की थी। आज वह कंपनी न केवल दुनिया भर की जानकारी को व्यवस्थित कर रही है, बल्कि हमारे डिजिटल जीवन के हर कदम को ट्रैक भी कर रही है। आइए विस्तार से समझते हैं कि कैसे एक छोटा सा सर्च इंजन आज दुनिया की सबसे बड़ी डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ताकत बन चुका है और कैसे यह ओपन नॉलेज के सबसे बड़े स्रोत विकिपीडिया के अस्तित्व के लिए एक नई चुनौती पैदा कर रहा है।
क्या एक गैराज से शुरू हुआ सफर आज पूरी दुनिया को चला रहा है? गूगल की कहानी की शुरुआत साल 1995 में स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से होती है, जहाँ लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन की पहली मुलाकात हुई थी। कुछ लोगों का कहना है कि अपनी पहली मुलाकात में वे लगभग हर बात पर असहमत थे, लेकिन अगले ही साल उन्होंने एक साझेदारी कर ली। अपने हॉस्टल के कमरों से काम करते हुए, उन्होंने एक ऐसा सर्च इंजन बनाया जो वर्ल्ड वाइड वेब पर पेजों का महत्व तय करने के लिए लिंक्स का इस्तेमाल करता था। शुरुआत में उन्होंने इस सर्च इंजन का नाम बैकरब रखा था। कुछ समय बाद इसका नाम बदलकर गूगल कर दिया गया, जो असल में गणित के एक शब्द का बिगड़ा हुआ रूप था जिसमें एक के बाद सौ शून्य होते हैं। अगस्त 1998 में सन माइक्रोसिस्टम्स के सह-संस्थापक एंडी बेचटोल्शेम ने लैरी और सर्गेई को एक लाख डॉलर का चेक दिया और आधिकारिक तौर पर गूगल इंक का जन्म हुआ। इस निवेश के बाद टीम हॉस्टल से निकलकर कैलिफ़ोर्निया के मेनलो पार्क में सुज़ैन वोज्स्की के गैराज में शिफ्ट हो गई। उस गैराज में भारी-भरकम कंप्यूटर, एक पिंग पोंग टेबल और नीले रंग का कालीन उनके शुरुआती दिनों की पहचान हुआ करते थे। समय के साथ कंपनी तेज़ी से बढ़ी और गैराज से निकलकर कैलिफ़ोर्निया के माउंटेन व्यू स्थित अपने मौजूदा मुख्यालय 'द गूगलप्लेक्स' में पहुँच गई। आज गूगल यूट्यूब, एंड्रॉयड, जीमेल और गूगल सर्च जैसे सैकड़ों उत्पाद बनाता है जिनका इस्तेमाल दुनिया भर के अरबों लोग करते हैं।
क्या आपका हर कदम और क्लिक डेटाबेस में दर्ज हो रहा है? गूगल आज इंटरनेट की दुनिया में हर जगह मौजूद है और इसका डेटा कलेक्शन मॉडल बेहद विशाल है। ट्रिनिटी कॉलेज के एक शोधकर्ता डग लेह के अनुसार, गूगल का एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम एप्पल के आईओएस सिस्टम के मुकाबले बीस गुना ज़्यादा डेटा इकट्ठा करता है। गूगल के पास आपकी यूट्यूब हिस्ट्री, जीमेल के ईमेल, गूगल ड्राइव की फ़ाइलें, गूगल मैप्स की लोकेशन्स और गूगल कैलेंडर के शेड्यूल जैसी हर चीज़ की सीधी पहुँच है। जब आप कोई गूगल अकाउंट बनाते हैं, तो आप अपना फोन नंबर और क्रेडिट कार्ड जैसी निजी जानकारी देते हैं। गूगल की अपनी प्राइवेसी पॉलिसी के मुताबिक, जब आप उनकी सेवाओं का इस्तेमाल करते हुए कोई कंटेंट बनाते हैं, अपलोड करते हैं या प्राप्त करते हैं, तो कंपनी उसे कलेक्ट करती है। इसके अलावा, गूगल आपके ब्राउज़र का प्रकार, ऑपरेटिंग सिस्टम, मोबाइल नेटवर्क, आईपी एड्रेस और क्रैश रिपोर्ट भी जमा करता है। आपकी लोकेशन का पता लगाने के लिए गूगल सिर्फ़ जीपीएस पर निर्भर नहीं है, बल्कि वह आपके आस-पास मौजूद पब्लिक वाई-फ़ाई और सेल टावर का भी इस्तेमाल करता है। साल 2005 में वेब स्टैटिस्टिक्स कंपनी अर्चिन को खरीदने के बाद गूगल ने वेब एनालिटिक्स का भी लोकतंत्रीकरण कर दिया। वेबसाइट के मालिकों को गूगल एनालिटिक्स के ज़रिए यूज़र्स की उम्र, लिंग और रुचियों का जनसांख्यिकीय डेटा भी मिलता है। हालाँकि गूगल इस भारी भरकम डेटा का इस्तेमाल अपने विज्ञापनों को ज़्यादा सटीक बनाने और व्यक्तिगत अनुभव को बेहतर करने के लिए करता है।
क्या आपकी निजी जानकारी अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को ट्रेन कर रही है? डेटा जुटाने की इसी कड़ी में अब एक नया अध्याय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जुड़ गया है। गूगल ने हाल ही में अपनी प्राइवेसी पॉलिसी में बदलाव करते हुए साफ़ कर दिया है कि वह इंटरनेट पर मौजूद सभी सार्वजनिक जानकारी का इस्तेमाल अपने एआई सिस्टम जैसे गूगल ट्रांसलेट, बार्ड और क्लाउड एआई को ट्रेन करने के लिए करेगा। क्या जीमेल का निजी डेटा भी एआई को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल हो रहा है, यह सवाल अभी भी रहस्य बना हुआ है। जब गूगल के चैटबॉट बार्ड से यह पूछा गया तो उसने खुद दावा किया था कि उसे जीमेल के डेटा से ट्रेन किया गया है, लेकिन गूगल ने तुरंत इसका खंडन करते हुए कहा कि बार्ड लार्ज लैंग्वेज मॉडल पर आधारित है जो गलतियां कर सकता है और इसे जीमेल डेटा पर ट्रेन नहीं किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि बार्ड और जेमिनी जैसे टूल्स गूगल की एक कोशिश हैं ताकि वह मुफ्त में उपलब्ध जानकारी पर कब्ज़ा कर सके और उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सके। पारंपरिक गूगल सर्च में जहाँ उपयोगकर्ताओं को जानकारी का मूल स्रोत देखने को मिलता था, वहीं अब चैटजीपीटी और बार्ड जैसे टूल्स सीधे जवाब देते हैं और लोगों से स्रोत जाँचने का विकल्प छीन लेते हैं। यह बिल्कुल उसी तरह है जब गूगल ने एएमपी प्रोजेक्ट शुरू किया था ताकि यूज़र्स ज़्यादा से ज़्यादा समय उनके ही सिस्टम पर बिताएं और बाहर के लिंक्स पर क्लिक न करें।
क्या दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञानकोष सिर्फ गूगल का ईंधन बन रहा है? गूगल के इस विशाल एआई और सर्च इकोसिस्टम को शक्ति देने में विकिपीडिया का सबसे बड़ा योगदान रहा है। ऐतिहासिक रूप से गूगल ने विकिपीडिया के ऑर्गेनिक ट्रैफ़िक का लगभग 80 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा प्रदान किया है। साल 2012 में जब गूगल ने अपना नॉलेज ग्राफ़ लॉन्च किया, तो उसने खोज परिणामों में सीधे जानकारी दिखाने के लिए विकिपीडिया के डेटा का भारी इस्तेमाल किया। इसके बाद 2014 के आसपास शुरू हुए 'फीचर्ड स्निपेट्स' में भी विकिपीडिया की सामग्री का प्रमुखता से उपयोग हुआ, जिसके तहत लगभग 99 प्रतिशत स्निपेट्स टॉप सर्च रिज़ल्ट्स से आते हैं। गूगल ने इस साझेदारी को बनाए रखने के लिए 2010 और 2019 में विकिमीडिया फाउंडेशन को बीस-बीस लाख डॉलर के अनुदान भी दिए थे। लेकिन 2022 में दोनों के बीच एक बड़ा व्यावसायिक बदलाव आया, जब गूगल 'विकिमीडिया एंटरप्राइज़' का एक भुगतान करने वाला ग्राहक बन गया। इसके तहत गूगल को विकिपीडिया के डेटाबेस का सीधा और रियल-टाइम एक्सेस मिलता है ताकि वह अपने सर्च उत्पादों में बिना किसी देरी के एकदम ताज़ा जानकारी डाल सके। हालांकि गूगल के एल्गोरिदम पर निर्भरता के अपने नुकसान भी हैं; मैनहट्टन इंस्टीट्यूट के एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि विकिपीडिया के लेखों में अक्सर राजनीतिक झुकाव होता है और गूगल के सर्च एल्गोरिदम बिना किसी चेतावनी के इसी जानकारी को लाखों लोगों तक पहुँचाकर उसे एक निष्पक्ष तथ्य के रूप में स्थापित कर देते हैं।
क्या एआई के दौर में ओपन नॉलेज और डेटा स्वामित्व का भविष्य खतरे में है? आज बिग टेक कंपनियों और यूज़र्स के बीच डेटा पर नियंत्रण और ओपन नॉलेज के भविष्य को लेकर एक बड़ी जंग छिड़ गई है। विकिमीडिया फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में विकिपीडिया पर इंसानों द्वारा देखे जाने वाले पेजों की संख्या में 8 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह गिरावट सीधे तौर पर गूगल के 'एआई ओवरव्यूज़' की वजह से है, जो मई 2024 में पूरी तरह लागू हुआ था। एआई ओवरव्यूज़ यूज़र्स को सर्च पेज पर ही पूरी जानकारी का सारांश दे देता है, जिससे लोग मूल वेबसाइट के लिंक पर क्लिक ही नहीं करते। प्यू रिसर्च सेंटर के एक विश्लेषण में पाया गया कि गूगल के एआई सारांश देखने वाले यूज़र्स में से केवल एक प्रतिशत ही बाहरी लिंक पर क्लिक करते हैं। इस 'ज़ीरो-क्लिक' सर्च की वजह से विकिपीडिया जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स पर बड़ा वित्तीय संकट मंडराने लगा है क्योंकि उनका पूरा संचालन चंदे पर निर्भर करता है, और जब वेबसाइट पर लोग कम आएंगे तो चंदा भी कम मिलेगा। जानकार इसे 'फ़्री राइडिंग' कहते हैं, जहाँ गूगल विकिपीडिया की सामग्री से उत्तर बनाकर विज्ञापन का राजस्व कमाता है, लेकिन ज्ञान को तैयार करने का पूरा बोझ मुफ्त में काम करने वाले स्वयंसेवकों पर छोड़ देता है। एआई के इस युग में यह साफ़ होता जा रहा है कि ज्ञान के विकेंद्रीकरण का मॉडल खतरे में है, क्योंकि सारी ताकत अब कुछ चुनिंदा सर्च इंजन और एआई कंपनियों के हाथों में सिमटती जा रही है।
माराडोना के हैंड ऑफ गॉड ने कैसे जिताया अर्जेंटीना को विश्व कप
डिएगो माराडोना (Diego Maradona) फुटबॉल इतिहास के सबसे महान खिलाड़ियों में से एक माने जाते हैं। वर्ष 1986 के फीफा विश्व कप में इंग्लैंड के खिलाफ उनका प्रदर्शन आज भी खेल जगत के सबसे चर्चित पलों में गिना जाता है। इसी मैच में उन्होंने पहला गोल किया, जिसे बाद में “हैंड ऑफ गॉड” के नाम से जाना गया। इस गोल में माराडोना ने अपने हाथ से गेंद को जाल में पहुंचाया, लेकिन रेफरी यह देख नहीं पाए और गोल मान लिया गया। बाद में माराडोना ने मजाकिया अंदाज़ में कहा कि यह गोल “थोड़ा माराडोना के सिर से और थोड़ा भगवान के हाथ से” हुआ था।
इसी मैच में कुछ मिनट बाद माराडोना ने दूसरा गोल किया, जिसे “गोल ऑफ द सेंचुरी” कहा जाता है। उन्होंने मैदान के बीच से गेंद लेकर कई इंग्लिश खिलाड़ियों को शानदार ड्रिब्लिंग (dribbling) से पीछे छोड़ा और गोल दाग दिया। यह गोल फुटबॉल इतिहास के सबसे बेहतरीन गोलों में गिना जाता है।
माराडोना अपनी अद्भुत गेंद नियंत्रण क्षमता और कठिन अभ्यास के लिए भी जाने जाते थे। वे घंटों तक ड्रिब्लिंग, बॉल कंट्रोल और संतुलन पर मेहनत करते थे, जिसने उन्हें दुनिया के सबसे कुशल खिलाड़ियों में शामिल किया। उनकी प्रतिभा, जुनून और खेल शैली ने उन्हें फुटबॉल का अमर सितारा बना दिया।
चलिए, आज भारत के राष्ट्रीय खेल - हॉकी के विकास व उपलब्धियों की जांच करते हैं
लखनऊ, आज हम हॉकी खेल के इतिहास को समझेंगे, और देखेंगे कि, यह एक आधुनिक खेल के रूप में कैसे विकसित हुआ। फिर हम पता लगाएंगे कि, भारत में औपनिवेशिक काल के दौरान हॉकी कैसे लोकप्रिय हुआ। इसके पश्चात, हम हॉकी के नियमों और खेल साहित्य पर नजर डालेंगे। बाद में, हम अंतरराष्ट्रीय हॉकी में भारत की उपलब्धियों की जांच करेंगे। और अंततः, हम ध्यानचंद जी जैसे हॉकी के महान खिलाड़ियों और इस खेल के स्टेडियमों एवं प्रशिक्षण केंद्रों के बारे में जानेंगे।
फ़ील्ड हॉकी (Field hockey), 11-11 खिलाड़ियों के दो विरोधी संघों द्वारा खेला जाने वाला एक मैदानी खेल है। इसके खिलाड़ी, अपने विरोधी संघ के गोल (Goal) में एक छोटी गेंद को मारने के लिए, स्ट्राइकिंग छोर (Striking end) पर घुमावदार बनी छड़ियों का उपयोग करते हैं। माना जाता है कि, हॉकी की शुरुआत बहुत प्राचीन सभ्यताओं से हुई है। हॉकी में अरब, यूनानी, फारसी और रोमन लोगों के अपने-अपने संस्करण थे। साथ ही, दक्षिण अमेरिका के एज़्टेक इंडियन्स (Aztec Indians) द्वारा खेले जाने वाले, एक समान छड़ी खेल के प्रमाण भी पाए गए हैं। हॉकी को हर्लिंग (Hurling) और शिंटी (Shinty) जैसे अन्य शुरुआती खेलों से भी पहचाना जा सकता है। मध्य युग के दौरान, फ्रांस में हॉक्वेट (Hoquet) नामक एक छड़ी वाला खेल खेला जाता था। हॉकी का नाम इसी शब्द से आने की संभावना है।
उन्नीसवीं सदी के अंत में अंग्रेजी स्कूलों में भी हॉकी प्रचलित हुआ। दक्षिणपूर्वी लंदन (London) के एक इलाके में स्थापित पहले पुरुष हॉकी क्लब ने, 1861 में एक नियम पुस्तक रिकॉर्ड की। लंदन के एक अन्य क्लब ने इन नियमों में कई प्रमुख बदलाव पेश किए। इनमें हाथों का उपयोग करने या कंधे के ऊपर लाठी उठाने पर प्रतिबंध; गेंद के रूप में रबर के स्थान पर एक गोले को अपनाना; और एक स्ट्राइकिंग सर्कल (Striking circle) को अपनाना शामिल था। ये नए नियम, 1886 में लंदन में स्थापित हुए हॉकी एसोसिएशन (Hockey Association) में लागू किए गए।
भारत और पूर्वी विश्व में इस खेल को फैलाने के लिए, ब्रिटिश सेना काफी हद तक जिम्मेदार थी। हॉकी की अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता 1895 में शुरू हुई, और 1928 तक यह भारत का राष्ट्रीय खेल बन गया था। उस वर्ष ओलंपिक खेलों में भारतीय संघ ने पहली बार प्रतिस्पर्धा करते हुए स्वर्ण पदक जीता था। बाद में, अधिक अंतर्राष्ट्रीय मैचों के आह्वान के कारण, 1971 में हॉकी विश्व कप की शुरुआत हुई। इस खेल की अन्य प्रमुख अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में एशियाई कप, एशियाई खेल, यूरोपीय कप और पैन-अमेरिकन खेल शामिल हैं।
खेल के मैदानों के रूप में, भूमि के बड़े भूखंडों की उपलब्धता और उपकरणों की सरल प्रकृति के कारण, हॉकी, धीरे-धीरे भारत में बच्चों और युवाओं के बीच लोकप्रिय खेल बन गया था। हमारे देश का पहला हॉकी क्लब, 1855 में तत्कालीन कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में बनाया गया था। अगले कुछ दशकों में, कलकत्ता में ‘बीटन कप’ और बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) में ‘आगा खान टूर्नामेंट’ जैसी नई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं ने इस खेल को अधिक लोकप्रिय बनाया। 1907 और 1908 में भारत में हॉकी एसोसिएशन बनाने की बात चल रही थी, हालांकि, यह नहीं बन पाया। फिर बाद में, अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ (FIH) के गठन के बाद, 1925 में भारतीय हॉकी महासंघ (IHF) का गठन हुआ था।
भारतीय हॉकी महासंघ ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय दौरा, 1926 में न्यूजीलैंड (New Zealand) में आयोजित किया था। यहां भारतीय हॉकी पुरुष संघ ने 21 मैच खेले, और उनमें से 18 मैच जीते। इस प्रतियोगिता में युवा खिलाड़ी ध्यानचंद जी का उदय भी हुआ।
1924 तक ओलंपिक खेलों के साथ समझौता न होने पर हॉकी को ओलंपिक से हटा दिया गया था। परंतु, अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ ने हॉकी को एम्स्टर्डम 1928 (Amsterdam 1928) ओलंपिक से स्थायी दर्जा प्राप्त करवाया। भारतीय हॉकी महासंघ ने 1927 में अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ की सदस्यता अर्जित की। इस प्रकार, भारतीय हॉकी संघ ने 1928 में अपना पहला ओलंपिक खेल खेला।
दरअसल, हॉकी खेल का उद्देश्य, निर्धारित समय समाप्त होने से पहले विरोधी संघ से अधिक गोल करना है। सभी खिलाड़ी गेंद को नियंत्रित करने के लिए हॉकी स्टिक (Hockey stick) का उपयोग करते हैं, और अपने संघ के लिए स्कोर करने हेतु, इसे विरोधी गोल पोस्ट में डालते हैं। हॉकी स्टिक में घुमावदार छोर वाला एक लंबा हैंडल होता है, जो एक तरफ से सपाट होता है। स्टिक का वजन 737 ग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। पहले मैदानी हॉकी स्टिक लकड़ी के बनते थे, लेकिन आधुनिक हॉकी स्टिक कांच, कार्बन और अरैमिड (Aramid) के रेशों से बनाई जाती हैं।
खिलाड़ियों को गेंद को छूने के लिए, स्टिक के केवल सपाट हिस्से का उपयोग करने की अनुमति है। ऐसा न करने पर बैकस्टिक फाउल (Backstick foul) होता है, और तब गेंद विपक्षी को दे दी जाती है। खिलाड़ियों को केवल अपनी स्टिक से ही गेंद को पास या ड्रिबल (Dribble) करके विपरीत गोल की ओर ले जाना होता है। इसके अलावा, गोल शॉट केवल स्ट्राइकिंग सर्कल के अंदर से ही किया जा सकता है।
क्या आप जानते हैं कि, आज 13 ओलंपिक पदकों ( 8 स्वर्ण, 1 रजत और 4 कांस्य पदक) के साथ, भारत ने खुद को हॉकी खेल की सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित किया है। एक खिलाड़ी, जिन्होंने भारत की इस कहानी को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वे 1980 के मॉस्को ओलंपिक खेलों (Moscow Olympics) के स्वर्ण पदक विजेता जफर इकबाल हैं। दिलचस्प बात यह है कि, पिछले 100 वर्षों में दुनिया के किसी भी अन्य हॉकी संघ ने ऐसी सफलता नहीं पाई है। 1947 में भारत की आजादी के बाद, भारतीय हॉकी ने बहुत कुछ हासिल किया है। हमने 1947 से अब तक, 5 स्वर्ण पदक जीते हैं।
1976 में ओलंपिक खेलों में, हॉकी एस्ट्रोटर्फ (Astroturf) में बदल गई, जबकि भारतीय संघ को प्राकृतिक घास वाले मैदानों पर खेलने की आदत थी। हालांकि, 1980 में भारत ने इस नई सतह पर खेलने की सभी चुनौतियों को पार कर लिया, और मॉस्को में प्रतिष्ठित स्वर्ण पदक जीता।
जफर इकबाल के अलावा, हॉकी के एक अन्य खिलाड़ी, जो काफ़ी मशहूर एवं प्रतिभाशाली है, मेजर ध्यानचंद है। ध्यानचंद वे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपनी छड़ी की खेल रणनीति से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया था। इसी कारण, उन्हें ‘हॉकी के जादूगर’ यह उपनाम मिला। 29 अगस्त, 1905 को इलाहाबाद में ब्रिटिश भारतीय सेना के एक सैनिक के घर जन्मे ध्यान सिंह, बहुत कम उम्र में ही हॉकी की ओर आकर्षित हो गए थे। अपने पिता की तरह वे भी 16 साल की उम्र में सेना में भर्ती हो गए, और वहां अपना पसंदीदा खेल खेलना जारी रखा।
सैन्य में बिताए अपने समय के दौरान, उन्होंने 1922 और 1926 के बीच विभिन्न सेना हॉकी प्रतियोगिताओं और रेजिमेंटल खेलों को खेला। ध्यानचंद खेल में इतने तल्लीन रहते थे कि, वे अपनी ड्यूटी के बाद रात में भी हॉकी खेलते थे। चांदनी रात में खेलने के कारण ही, उन्हें ध्यानचंद नाम मिला, क्योंकि 'चंद' शब्द का हिंदी अर्थ ‘चंद्रमा’ है।
उनकी रैंकों में प्रगति के कारण, उन्हें 1926 में न्यूजीलैंड दौरे के लिए भारतीय सेना के संघ में शामिल किया गया। न्यूजीलैंड में भारतीय संघ ने 18 मैच जीते, दो मैच ड्रा (Draw) खेले और केवल एक ही मुकाबला हारा। भारत के इस अद्भुत प्रदर्शन की कई लोगों ने सराहना की, और विशेष रूप से ध्यानचंद जी को अपने पहले अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में अपनी प्रतिभा के लिए बहुत प्रशंसा मिली। दौरे से वापसी पर, उन्हें ब्रिटिश भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट में लांस नायक नामित किया गया।
हॉकी को पहली बार ओलंपिक में शामिल करने के साथ, नवगठित भारतीय हॉकी महासंघ, नीदरलैंड (Netherland) खेलों के लिए सर्वोत्तम संभव संघ भेजने के लिए उत्सुक था। पंजाब, बंगाल, राजपुताना, संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और मध्य प्रांत ने इन खेलों में भाग लिया। और जब भारतीय सेना ये खेल नहीं खेल पाई, तब ध्यानचंद जी को संयुक्त प्रांत अर्थात हमारे वर्तमान उत्तर प्रदेश के लिए खेलने दिया गया।
ध्यान चंद गेंद के साथ
वास्तव में, ध्यानचंद जी के कार्यकाल से ही उत्तर प्रदेश में हॉकी खेल के लिए लोकप्रियता है। आज भी, हमारे राज्य में ऐसी कई पहले हैं, जिनसे इस खेल के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ पाए। उदाहरण के तौर पर, के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम, पहली बार 1957 में हमारे शहर लखनऊ के हलचल भरे हजरतगंज के ठीक मध्य में खोला गया था। इसका नाम महान हॉकी खिलाड़ी - बाबू के. डी. सिंह के नाम पर रखा गया है, जिनका जन्म लखनऊ में हुआ था। यह भारत के सबसे पुराने बहुउद्देशीय स्टेडियमों में से एक है। के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम में क्रिकेट, टेनिस, फुटबॉल और हॉकी सहित कई अलग-अलग खेल खेले जाते हैं। इस स्थल ने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय हॉकी मैचों की मेजबानी की है।
जरूर जानें, अलेक्जेंड्रिया के महान पुस्तकालय ने कैसे रखी प्राचीन विश्व में ज्ञान की नींव?
आज, हम पढ़ेंगे कि सिकंदर (Alexander the Great) कौन था, और वैश्विक इतिहास को आकार देने में उनकी क्या भूमिका थी। फिर, हम पता लगाएंगे कि उन्होंने ज्ञान और संस्कृति के केंद्र के रूप में, अलेक्जेंड्रिया (Alexandria) शहर की स्थापना कैसे की। लेख में आगे, हम देखेंगे कि अलेक्जेंड्रिया कैसे एशिया, यूरोप और अफ्रीका का मिलन स्थल और व्यापार केंद्र था। फिर हम अलेक्जेंड्रिया के महान पुस्तकालय पर गौर करेंगे। इसके पश्चात, हम पता लगाएंगे कि सिकंदर की मृत्यु के बाद, पुस्तकालय के केंद्रीकृत ज्ञान का महत्व कैसे कम होने लगा। जबकि अंत में हम देखेंगे कि, आज अलेक्जेंड्रिया के पुस्तकालय की क्या विरासत बची है।
सिकंदर का जन्म, जुलाई 356 ईसा पूर्व में मैसीडोनिया (Macedonia) की प्राचीन राजधानी पेला (Pella) में हुआ था। उनके माता-पिता मैसीडोन के फिलिप द्वितीय (Philip II) और उनकी पत्नी - ओलंपियास (Olympias) थे। सिकंदर ने, प्रसिद्ध दार्शनिक एरिस्टोटल (Aristotle) से शिक्षा प्राप्त की थी। 336 ईसा पूर्व में फिलिप द्वितीय की हत्या हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप, सिकंदर को उनका शक्तिशाली लेकिन अस्थिर राज्य विरासत में मिला। तब, उसने अपने घर में ही मौजूद दुश्मनों से निपटकर, ग्रीस में मैसीडोनियन शक्ति को फिर से स्थापित किया। इसके पश्चात, वह विशाल फ़ारसी साम्राज्य को जीतने के लिए निकल पड़ा।
इस मुहिम में आई बाधाओं के बावजूद, सिकंदर कभी नहीं हारा। उन्होंने अपनी सेना को एशिया, सीरिया और मिस्र के फ़ारसी क्षेत्रों में जीत दिलाई। उनकी सबसे बड़ी जीत 331 ईसा पूर्व में गौगामेला (Gaugamela) की लड़ाई में थी, जो अब उत्तरी इराक है। इस प्रकार, वह केवल 25 वर्ष की आयु में ही फारस का 'महान राजा' बन गया। अगले आठ वर्षों में, राजा, सेनापति, राजनीतिज्ञ, विद्वान और खोजकर्ता के रूप में सिकंदर ने अपनी सेना को 11,000 मील आगे बढ़ाया, 70 से अधिक शहरों की स्थापना की। इस प्रकार उसने एक ऐसा साम्राज्य बनाया, जो तीन महाद्वीपों तक फैला हुआ था।
इसी साम्राज्य में उत्तरी मिस्र में, भूमध्य सागर पर ‘अलेक्जेंड्रिया’ नामक एक बंदरगाह शहर बसा है, जिसकी स्थापना सिकंदर ने 331 ईसा पूर्व में की थी। सीरिया पर विजय प्राप्त करने के बाद, सिकंदर अपनी सेना के साथ मिस्र में गया। तब उसने ग्रीक के एक महत्वपूर्ण व्यापार केंद्र – नौक्रैटिस (Naucratis) से बेहतर वाणिज्यिक केंद्र बनाने के इरादे से अलेक्जेंड्रिया की स्थापना की थी। उसने अपनी इच्छा अनुसार, शहर का बुनियादी डिजाइन तैयार किया था। ग्रिड पैटर्न में आटा या अनाज डालकर इस शहर की योजना तैयार की गई थी, जिसे बाद में उनके वास्तुकार ने अपनाया था। यह प्राचीन दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक - फ़ारोस (Pharos), और अलेक्जेंड्रिया के पौराणिक पुस्तकालय का स्थल था। एक समय में, यह प्राचीन दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र भी था।
अलेक्जेंड्रिया
सिकंदर के आगमन के बाद, यह शहर एक छोटे बंदरगाह से विकसित हुआ। बाद में, इस शहर को टॉलेमिक राजवंश (Ptolemaic Dynasty) (323-30 ईसा पूर्व) के तहत एक बौद्धिक, सांस्कृतिक और वाणिज्यिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। बाद में, यह प्रारंभिक ईसाई धर्म के केंद्र के रूप में भी प्रसिद्ध हो गया।
अलेक्जेंड्रिया की सबसे उल्लेखनीय चीजों में से एक इसका पुस्तकालय था। यह ज्ञान के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण था। दरअसल, माउसियन (Mouseion), उच्च शिक्षा का एक संस्थान था, जो अलेक्जेंड्रिया के पुस्तकालय का हिस्सा था। यह ज्ञान की देवियों - म्यूज़ेस (Muses) को समर्पित था और संभवतः टॉलेमी द्वितीय (Ptolemy II – 282-246 ईसा पूर्व) द्वारा स्थापित किया गया था। यह विद्वानों के लिए एक सभा स्थल और घर के रूप में भी कार्य करता था, जिनके कार्यों ने इस पुस्तकालय की स्थापना में योगदान दिया था।
331 ईसा पूर्व में, अलेक्जेंड्रिया समुद्र और नील नदी के बीच अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण, भूमध्य सागर का सबसे बड़ा व्यापार केंद्र बन गया। इसमें भव्य बंदरगाह (Port / Portus), सैन्य बेड़े के लिए पोर्टस मैग्नस (Portus Magnus) और नहरों, महलों और बाजारों के साथ-साथ वाणिज्य के लिए पोर्टस यूनोस्टस (Portus Eunostus) शामिल थे। अलेक्जेंड्रिया शहर समुद्री व्यापार के कारण विकसित हुआ। यहां से मिस्र के अनाज, पैपीरस (Papyrus) और कांच का निर्यात होता था , जबकि, ग्रीस और रोम से विलासिता की वस्तुओं का आयात होता था। नील नदी और कारवां मार्गों ने इसे अंतर्देशीय मिस्र, अरब, भारत और पूर्वी अफ्रीका से जोड़ा, जिससे मसालों, धूप बत्ती और वस्त्रों के आदान-प्रदान की सुविधा हुई। टॉलेमिक शासन के तहत, राज्य ने प्रमुख उद्योगों (विशेषकर गेहूं) को नियंत्रित किया था। साथ ही, महानगरीय बाजारों और उन्नत बंदरगाह सुविधाओं ने प्राचीन दुनिया के सबसे प्रभावशाली वाणिज्यिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में इसकी भूमिका को मजबूत किया।
अलेक्जेंड्रिया का पुस्तकालय, वास्तव में प्राचीन दुनिया का एक आश्चर्य था, तथा ज्ञान और सीखने की शक्ति का प्रमाण भी था। इसमें पुस्तकों, पांडुलिपियों, स्क्रॉल और मानचित्रों का एक विशाल संग्रह था, जो इसे प्राचीन दुनिया के सबसे बड़े और व्यापक पुस्तकालयों में से एक बनाता है। कहा जाता है कि, इसमें 7 लाख से अधिक स्क्रॉल शामिल थे, जिनमें साहित्य, विज्ञान, दर्शन और अन्य विषयों के कार्य शामिल थे। इन स्क्रॉल की मदद से ही प्राचीन यूनानी, दुनिया के ज्ञान और अंतर्दृष्टि से वाकिब हुए। इसके अतिरिक्त, इस पुस्तकालय में मानचित्रों का एक बड़ा संग्रह था, जिनका नाविकों और व्यापारियों द्वारा भूमध्य सागर में नौचालन करने हेतु उपयोग किया जाता था। यह पुस्तकालय प्राचीन यूनानियों के लिए अत्यधिक गर्व और प्रशंसा का भी स्रोत था, और इसकी विरासत सदियों से कायम है।
अलेक्जेंड्रिया का प्राचीन पुस्तकालय
टॉलेमी द्वितीय के शासनकाल के दौरान, अलेक्जेंड्रिया के पुस्तकालय ने दुनिया में ज्ञान का सर्वोच्च केंद्र बनने के लिए, एक क्रांतिकारी नीति लागू की। शाही आदेश के अनुसार, शहर के बंदरगाह पर उतरने वाले प्रत्येक जहाज की पुस्तकों और स्क्रॉल के लिए अनिवार्य खोज की जाती थी। किसी भी पांडुलिपि को तुरंत जब्त कर लिया जाता था, और निरीक्षण के लिए पुस्तकालय में भेजा जाता था। इस अधिग्रहण रणनीति ने इस पुस्तकालय को भूमध्य सागर के बौद्धिक उत्पादन के लिए एक विशाल भंडार में बदल दिया। एक बार जब कोई किताब जब्त कर ली जाती थी, तो पुस्तकालय के लेखक इसकी एक हस्तलिखित प्रति तैयार करते थे। इसके बाद, पुस्तकालय में मूल पांडुलिपि रखी जाती थी, जबकि, उसकी प्रति जहाज के मालिक को लौटाई जाती थी।
सिकंदर की मृत्यु के बाद, टॉलेमी तृतीय के शासनकाल से लेकर क्लियोपेट्रा सप्तम (Cleopatra VII) के शासनकाल तक, अलेक्जेंड्रिया के पतन को राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों द्वारा चिह्नित किया गया था। इसी कारण, अंततः टॉलेमिक राजवंश का अंत हुआ। इस अवधि के दौरान, इस शहर ने अपना पूर्व गौरव खो दिया। लगातार उत्तराधिकार विवादों और नागरिक अशांति से राज्य की राजनीतिक स्थिरता भी कमजोर हो गई थी। महंगे सैन्य अभियान, भव्य शाही व्यय और खराब संसाधन प्रबंधन ने राज्य के वित्त पर भी दबाव डाला, जिसके परिणामस्वरूप कराधान में वृद्धि हुई, और जनता में असंतोष हुआ। इसके पुस्तकालय का पतन भी, इतिहास के दुखद और गर्म बहस वाले रहस्यों में से एक बना हुआ है।
अलेक्जेंड्रिया का यह पुस्तकालय आज सही सलामत नहीं है। लेकिन इसके खंडहरों में भी, सहस्राब्दियों तक इसका प्रभाव गूंजता है। इस पुस्तकालय ने इस बात को आकार दिया कि, समाज किस प्रकार शिक्षा, अनुसंधान और सांस्कृतिक संरक्षण को महत्व देता है। यहां बनाए गए नवीन बिब्लियोथेका अलेक्जेंड्रिना (Bibliotheca Alexandrina) पुस्तकालय में संग्रहालय, गैलरी और अनुसंधान केंद्र शामिल हैं।
जबकि, अलेक्जेंड्रिया के मूल पुस्तकालय का कोई निश्चित खंडहर नहीं मिला है, पुरातत्वविदों ने माउसियन परिसर के कुछ हिस्सों, प्राचीन व्याख्यान कक्षों और भूमिगत कमरों का पता लगाया है। माना जाता है कि, वे भंडारण सुविधाएं या उपभवन थे। इस उत्खनन से हेलेनिस्टिक वास्तुकला (Hellenistic architecture) और कलाकृतियों का पता चलता है, जो अलेक्जेंड्रिया के इस उत्खनन से हेलेनिस्टिक वास्तुकला (Hellenistic architecture) और कलाकृतियों का पता चलता है, जो अलेक्जेंड्रिया के प्रज्वलित और ज्ञान पर आधारित अतीत का संकेत देते हैं।
भारी कर्ज के बावजूद संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका का दबदबा क्यों?
दुनिया भर में शांति बनाए रखने का दावा करने वाले संयुक्त राष्ट्र को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि अमेरिका इसका सबसे बड़ा ख़र्च क्यों उठाता है। आम तौर पर लोगों को लगता है कि बाइस प्रतिशत का भारी भरकम बजट देकर अमेरिका शायद कोई घाटे का सौदा कर रहा है। लेकिन असलियत इसके बिल्कुल उलट है। अकेले न्यूयॉर्क शहर को संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय की मेज़बानी करने से हर साल लगभग तीन अरब अड़सठ करोड़ डॉलर का सीधा आर्थिक फ़ायदा होता है और पंद्रह हज़ार से ज़्यादा लोगों को रोज़गार मिलता है। सिर्फ़ पैसा ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे ताक़तवर कूटनीतिक मंच के अपने देश में होने से अमेरिका को ख़ुफ़िया जानकारी और वैश्विक राजनीति पर ऐसा नियंत्रण मिलता है जिसे किसी भी क़ीमत पर ख़रीदा नहीं जा सकता। दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की राख से निकालकर आज के आधुनिक दौर तक पहुँचाने वाली इस विशाल संस्था का इतिहास, इसकी ताक़त और इसकी कमज़ोरियों को समझना आज के दौर में बेहद ज़रूरी है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र का गठन क्यों हुआ? बीसवीं सदी में दुनिया ने दो भयानक महायुद्ध देखे थे। पहले विश्व युद्ध के बाद शांति बनाए रखने के लिए साल 1919 में लीग ऑफ नेशंस नाम की संस्था बनाई गई थी। लेकिन यह संस्था दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की आग में जलने से नहीं रोक सकी और साल 1946 में इसे भंग कर दिया गया। इसी विफलता से सबक लेते हुए दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने एक नया और ज़्यादा मज़बूत वैश्विक संगठन बनाने का फ़ैसला किया। इसकी पहली सुगबुगाहट अगस्त 1941 में तब हुई जब अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूज़वेल्ट और ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने अटलांटिक चार्टर पर हस्ताक्षर किए। बाद में डंबार्टन ओक्स और याल्टा सम्मेलनों में अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ के नेताओं ने इसकी रूपरेखा तैयार की। आख़िरकार 25 अप्रैल 1945 को सैन फ्रांसिस्को में दुनिया भर के पचास देशों के प्रतिनिधि जमा हुए। पोलैंड जो इस सम्मेलन में नहीं आ सका था, उसे भी बाद में संस्थापक सदस्य के रूप में शामिल किया गया। इस तरह 24 अक्टूबर 1945 को इक्यावन संस्थापक देशों के साथ संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक तौर पर स्थापना हुई। इसका मुख्य मक़सद आने वाली पीढ़ियों को युद्ध के ख़तरे से बचाना, मानवाधिकारों की रक्षा करना और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का पालन सुनिश्चित करना है।
सुरक्षा परिषद कैसे काम करती है और यह वीटो पावर क्या है? संयुक्त राष्ट्र के भीतर सबसे ताक़तवर हिस्सा उसकी सुरक्षा परिषद है। यही वह इकलौती संस्था है जो अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने के लिए सैन्य बल के इस्तेमाल की मंज़ूरी दे सकती है और इसके फ़ैसले सदस्य देशों पर क़ानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं। इस परिषद में कुल पंद्रह सदस्य होते हैं जिनमें से पाँच स्थायी सदस्य हैं और दस अस्थायी सदस्य होते हैं जिन्हें दो साल के लिए चुना जाता है। ये पाँच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन हैं। इन पाँचों देशों के पास एक बेहद ख़ास ताक़त है जिसे वीटो पावर कहा जाता है। किसी भी बड़े और ग़ैर-प्रक्रियागत फ़ैसले को पास करने के लिए पंद्रह में से नौ सदस्यों की हाँ ज़रूरी है, लेकिन इसके साथ ही यह भी ज़रूरी है कि पाँचों स्थायी सदस्यों में से कोई भी इसके ख़िलाफ़ वोट न करे। अगर एक भी स्थायी सदस्य न में वोट देता है तो वह प्रस्ताव रद्द हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र बनाते समय इन बड़े देशों को डर था कि कहीं बहुमत उनके ख़िलाफ़ न इस्तेमाल होने लगे। अगर इन्हें यह ताक़त न दी जाती तो ये देश इस संस्था में शामिल ही नहीं होते और पुरानी संस्था लीग ऑफ नेशंस की तरह यह भी नाकाम हो जाती। हालाँकि अब यह वीटो पावर एक बड़ी समस्या बन चुकी है। स्थायी सदस्य अक्सर अंतरराष्ट्रीय शांति के बजाय अपने आर्थिक और राजनीतिक फ़ायदों के लिए या अपने सहयोगी देशों को बचाने के लिए इस ताक़त का इस्तेमाल करते हैं। अगर कोई स्थायी देश किसी प्रस्ताव को रोकना नहीं चाहता लेकिन उसका समर्थन भी नहीं करना चाहता, तो वह वोटिंग में हिस्सा न लेने का विकल्प चुन सकता है।
सुरक्षा परिषद
भारत सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य क्यों नहीं है? भारत जैसे विशाल और प्रभावशाली देश का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य न होना आज के समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी बहस का विषय है। दुनिया भर के तमाम मंचों और रेडिट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के एशिया केंद्रित फ़ोरम पर यह सवाल लगातार उठता रहता है कि आख़िर भारत इसका स्थायी हिस्सा क्यों नहीं है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अब तक दुनिया काफ़ी बदल चुकी है लेकिन सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता आज भी उन्हीं पाँच देशों तक सीमित है। इस मुद्दे पर वैश्विक कूटनीति में लगातार चर्चा होती रहती है और भारत की दावेदारी को लेकर विभिन्न देशों और जानकारों के बीच एक लंबी बहस जारी है।
दुनिया के कितने देश संयुक्त राष्ट्र का हिस्सा हैं और कौन बाहर है? इस समय दुनिया भर के एक सौ पचानवे देश संयुक्त राष्ट्र के दायरे में गिने जाते हैं। इनमें से एक सौ तिरानवे देश इसके पूर्ण सदस्य हैं जबकि दो देशों को स्थायी ग़ैर-सदस्य पर्यवेक्षक का दर्जा मिला हुआ है। ये दो देश वेटिकन सिटी और फ़िलिस्तीन हैं। पर्यवेक्षक होने के नाते वे महासभा की बैठकों में हिस्सा ले सकते हैं लेकिन उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं है। वेटिकन सिटी दुनिया का इकलौता ऐसा आज़ाद देश है जिसने ख़ुद ही पूर्ण सदस्य बनने के लिए आवेदन नहीं किया क्योंकि वहां के सर्वोच्च धर्मगुरु पोप अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सीधा दख़ल नहीं देना चाहते। दूसरी तरफ़ फ़िलिस्तीन को एक सौ अड़तीस देशों ने संप्रभु राष्ट्र माना है लेकिन इज़रायल के साथ चल रहे विवाद के कारण अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश उसे पूर्ण सदस्य बनने से रोकते हैं। इनके अलावा ताइवान, कोसोवो और पश्चिमी सहारा जैसे कई इलाक़े हैं जो पूर्ण देश की मान्यता पाना चाहते हैं। ताइवान तो शुरुआत में संस्थापक सदस्य था लेकिन चीन में हुए गृह युद्ध के बाद जब वहाँ कम्युनिस्ट सरकार आई तो संयुक्त राष्ट्र ने पुरानी सरकार को निकालकर नई चीनी सरकार को मान्यता दे दी। अब चीन अपने वीटो की ताक़त से ताइवान को कभी सदस्य नहीं बनने देता। किसी भी नए देश को सदस्य बनने के लिए सुरक्षा परिषद के पाँचों स्थायी सदस्यों की सहमति और फिर महासभा में दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होती है।
संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों का मानचित्र
इस विशाल वैश्विक संस्था को पैसा कहाँ से मिलता है? संयुक्त राष्ट्र को चलाने का ज़्यादातर ख़र्च इसके एक सौ तिरानवे सदस्य देश उठाते हैं। संस्था के मुख्य रूप से दो बजट होते हैं जिनमें एक नियमित बजट है और दूसरा शांति स्थापना बजट है। हर देश को कितना पैसा देना है यह उसकी भुगतान क्षमता के आधार पर तय होता है। इसके लिए उस देश की कुल राष्ट्रीय आय, जनसंख्या और बाहरी कर्ज़ जैसे आँकड़े देखे जाते हैं। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है इसलिए वह सबसे ज़्यादा बाइस प्रतिशत पैसा देता है जो कि लगभग अस्सी करोड़ डॉलर से ज़्यादा बैठता है। इसके बाद चीन बीस प्रतिशत और जापान लगभग सात प्रतिशत का योगदान देते हैं। शांति स्थापना के काम में भी अमेरिका छब्बीस प्रतिशत से ज़्यादा का ख़र्च उठाता है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि कई देश समय पर पैसा नहीं चुकाते। इस साल के शुरुआती आँकड़ों के मुताबिक़ बानवे देशों ने अपना पूरा बकाया नहीं चुकाया है। अमेरिका पर ख़ुद डेढ़ अरब डॉलर का भारी बकाया है और चीन पर भी लगभग साठ करोड़ डॉलर का कर्ज़ है। अगर कोई देश लगातार दो साल तक अपना ज़रूरी बकाया नहीं चुकाता है तो संयुक्त राष्ट्र महासभा में उसका वोट देने का अधिकार छीना जा सकता है। अफ़ग़ानिस्तान और वेनेज़ुएला जैसे देशों को ऐसी ही कार्रवाई का सामना करना पड़ा है।
अमेरिका को अपने यहाँ मुख्यालय होने का क्या फ़ायदा मिलता है? साल 1946 में संयुक्त राष्ट्र ने अपने मुख्यालय के लिए अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर को चुना था। बहुत से अमेरिकियों को लगता है कि उनके देश का पैसा इस वैश्विक संस्था पर बेवज़ह ख़र्च हो रहा है और इसीलिए वहाँ की सरकार भी कई बार बजट में कटौती की बात करती है। लेकिन मुख्यालय का अमेरिका में होना उसके लिए एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो दुनिया के किसी और देश के पास नहीं है। हर साल होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में दुनिया भर के नेता और बड़े अधिकारी न्यूयॉर्क आते हैं। इन विदेशी प्रतिनिधियों के बच्चे अमेरिका में पढ़ाई करते हैं और छुट्टियाँ बिताते हैं जिससे अमेरिका का कूटनीतिक दबदबा बढ़ता है। साल 2009 में विकीलीक्स के दस्तावेज़ों से यह बात सामने आई थी कि यह मुख्यालय अमेरिका के लिए दुनिया भर की ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने का एक बहुत बड़ा केंद्र है। इसके अलावा वीज़ा जारी करने का अधिकार अमेरिका के पास है। वह कई बार इसका इस्तेमाल अपने राजनीतिक मक़सद के लिए करता है। हाल ही में अमेरिका ने फ़िलिस्तीन के प्रतिनिधिमंडल को वीज़ा न देने की धमकी दी थी। अगर अमेरिका अपने बजट में कटौती करता है या पीछे हटता है तो चीन जैसे देश इस ख़ाली जगह को भरने के लिए पूरी तरह तैयार बैठे हैं। जानकार मानते हैं कि अगर अमेरिका से यह संस्था किसी और देश में चली गई तो अमेरिका दुनिया के एजेंडे को तय करने की अपनी सबसे बड़ी ताक़त खो देगा।
भागवत पुराण में कैसे पनपी इंद्रप्रस्थ नगरी श्रो कृष्ण के भक्ति रस में
क्या आप जानते हैं कि प्राचीन भारतीय इतिहास और ज्ञान के सबसे बड़े विश्वकोशों में से एक, भागवत पुराण, मूल रूप से 18 हज़ार श्लोकों और 332 अध्यायों में लिखा गया था जो बारह स्कंधों में विभाजित है। यह महज़ एक धार्मिक किताब नहीं है, बल्कि यह समय की गणना से लेकर मानव जीवन की उत्पत्ति, भ्रूण के विकास और ब्रह्मांड के विनाश तक के रहस्यों को खोलता है। हिंदू धार्मिक परंपरा के अनुसार कलियुग की शुरुआत में महर्षि व्यास द्वारा रचित यह ग्रंथ मुख्य रूप से परमेश्वर के प्रति अगाध प्रेम पर केंद्रित है। जब पांडव वंशी राजा परीक्षित को एक ब्राह्मण ने सात दिन में मृत्यु का श्राप दिया था, तब उन्होंने अपना राज-पाट छोड़कर जीवन का असली लक्ष्य खोजने का निश्चय किया। उसी समय उनकी भेंट महान संत शुकदेव गोस्वामी से हुई, जिन्होंने लगातार सात दिनों तक बिना खाए-पिए राजा परीक्षित को यही भागवत पुराण सुनाया था ताकि उन्हें मोक्ष मिल सके। इसी पवित्र ग्रंथ में हम देखते हैं कि कैसे भगवान कृष्ण पांडवों का मार्गदर्शन करते हैं और इंद्रप्रस्थ जैसी भव्य राजधानी की स्थापना से लेकर उनके जीवन की कई अहम घटनाओं में अपनी भूमिका निभाते हैं।
भागवत पुराण में जीवन, मृत्यु और परम भक्ति का क्या रहस्य छिपा है? भागवत पुराण अठारह महापुराणों में से एक है जिसे वैदिक ज्ञान का सबसे प्रामाणिक स्रोत माना जाता है। यह ग्रंथ आत्मा की प्रकृति से लेकर ब्रह्मांड की उत्पत्ति तक ज्ञान के सभी क्षेत्रों को छूता है। यह जीवन क्या है, मृत्यु और जन्म का चक्र क्या है, और ईश्वर व मनुष्य के बीच क्या संबंध है, जैसे मूलभूत सवालों के जवाब देता है। हिंदू धर्म में जीवन के चार मुख्य पहलू माने गए हैं— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। भागवत पुराण इन चारों के अलावा एक पाँचवाँ तत्व भी जोड़ता है, और वह है ईश्वरीय सेवा या परम भक्ति। इसका दसवाँ स्कंध सबसे अधिक प्रसिद्ध है, जिसमें वृंदावन में कृष्ण के बचपन की लीलाओं का विस्तार से वर्णन है। इसमें कृष्ण को केवल एक मार्गदर्शक के रूप में नहीं, बल्कि एक शूरवीर बालक के रूप में दिखाया गया है, जो राक्षसों से गाँव वालों की रक्षा करता है। वृंदावन की गोपियों का कृष्ण के प्रति जो अगाध और तीव्र प्रेम था, उसे ही बाद में भक्ति योग के रूप में जाना गया। जब कृष्ण मथुरा चले जाते हैं, तो गोपियाँ दुख से भर जाती हैं और उनका यही वियोग सर्वोच्च भगवान के प्रति चरम भक्ति का एक आदर्श प्रस्तुत करता है।
भगवत पुराण का दसवां खंड
बंजर खांडवप्रस्थ कैसे बना भव्य और दिव्य इंद्रप्रस्थ? भागवत पुराण और महाभारत की कथाओं में इंद्रप्रस्थ को एक ऐसी जगह के रूप में दर्शाया गया है जहाँ पांडवों के जीवन की कई ऐतिहासिक घटनाएँ घटीं। जब कौरवों और पांडवों के बीच राज्य का बँटवारा हुआ, तो युधिष्ठिर ने खांडवप्रस्थ का बंजर और वीरान जंगल अपने हिस्से में लिया ताकि कोई और विवाद न हो। यह यमुना नदी के पश्चिमी तट पर स्थित एक बंजर भूमि थी, जिसके चारों ओर प्राचीन खांडव वन था। इस वन की रक्षा देवराज इंद्र करते थे और यहाँ नागों के राजा तक्षक का राज था। इंद्र ने यह सुनिश्चित किया था कि इस क्षेत्र में बारिश न हो और यह भूमि बंजर ही रहे ताकि इंसान यहाँ बस न सकें। एक दिन अग्नि देव एक कमज़ोर ब्राह्मण का रूप धारण करके कृष्ण और अर्जुन के पास आए। उन्होंने बताया कि बारह साल तक चले एक यज्ञ में लगातार घी पीने के कारण उन्हें अपच हो गई है और इसका इलाज केवल खांडव वन के जीवों की चर्बी खाने से ही हो सकता है। अग्नि देव ने भगवान विश्वकर्मा द्वारा बनाए गए दिव्य अस्त्र कृष्ण और अर्जुन को दिए। अर्जुन को प्रसिद्ध कपिध्वज रथ और गांडीव धनुष मिला, जबकि कृष्ण को अजेय सुदर्शन चक्र और कौमोदकी गदा प्राप्त हुई।
खंडवा वन का दहन, बंतेय श्री मंदिर, 10वीं शताब्दी, अंगकोर, कंबोडिया
देवराज इंद्र के तूफ़ान को अर्जुन और कृष्ण ने कैसे रोका? जब अस्त्रों से सुसज्जित होकर कृष्ण और अर्जुन ने खांडव वन को जलाना शुरू किया, तो देवराज इंद्र अपने पूरे दल-बल के साथ इसे बचाने आ पहुँचे। इंद्र ने अपने विशाल ऐरावत हाथी पर सवार होकर तूफ़ानी बारिश शुरू कर दी ताकि आग बुझाई जा सके। तब अर्जुन ने अपने अतुलनीय तीरंदाज़ी कौशल का प्रदर्शन करते हुए आसमान में तीरों की एक ऐसी छत या चंदवा बना दिया जिससे बारिश की बूँदें ज़मीन तक पहुँच ही नहीं पाईं। खमेर कला और कंबोडिया के मंदिरों की मूर्तियों में इस दृश्य को बहुत ही बारीकी से उकेरा गया है जहाँ दिखाया गया है कि तीरों की उस छत को हंसों की एक कतार ने सँभाल रखा है, जबकि नीचे नाग, शेर, हाथी और अन्य जानवर आग से बचने की कोशिश कर रहे हैं। इसी विनाश के बीच, अग्नि देव की कृपा से मंडपाल ऋषि की पत्नी जरिता और उनके चार बेटों को बचा लिया गया, जिनके नाम जरितारि, सारिसृक्क, स्तंबमित्र और द्रोण थे। इस पूरे प्रलय के बीच अर्जुन ने मयासुर नाम के एक महान असुर वास्तुकार की जान बख्श दी। मयासुर ने अपने प्राण बचाने के बदले में पांडवों के लिए एक ऐसा अद्भुत और भव्य नगर बसाया जिसकी सुंदरता के आगे स्वर्ग भी फीका पड़ जाए। देवराज इंद्र के सम्मान में इस भव्य नगर का नाम इंद्रप्रस्थ रखा गया।
राजसूय यज्ञ में भगवान कृष्ण ने शिशुपाल का वध क्यों किया? इंद्रप्रस्थ के भव्य निर्माण के बाद, पांडवों ने वहां एक विशाल राजसूय यज्ञ का आयोजन किया। जरासंध के मारे जाने के बाद, भगवान कृष्ण और बलराम इस यज्ञ में शामिल होने के लिए मयासुर द्वारा निर्मित इस नई राजधानी में पधारे। यज्ञ के समापन समारोह में जब सबसे सम्मानित व्यक्ति को चुनने की बात आई, तो पांडवों में सबसे छोटे भाई सहदेव ने कृष्ण का नाम प्रस्तावित किया। इस पर जरासंध के पुराने सहयोगी राजा शिशुपाल ने कड़ी आपत्ति जताई। शिशुपाल कृष्ण की बुआ श्रुतदेवी का पुत्र था और जब उसका जन्म हुआ था, तब वह बहुत काला और बदसूरत था, और उसकी तीन आँखें व चार हाथ थे। उस समय एक आकाशवाणी हुई थी कि एक महान व्यक्ति इसे अपनी गोद में लेगा और इसके अतिरिक्त अंग गिर जाएंगे, और अंततः वही व्यक्ति इसका वध भी करेगा। बुआ श्रुतदेवी के अनुरोध पर कृष्ण ने वचन दिया था कि वह शिशुपाल की सौ गालियां माफ़ करेंगे। राजसूय यज्ञ में शिशुपाल ने कृष्ण को धोखेबाज़, स्त्रियों के पीछे भागने वाला और भगोड़ा कहते हुए सारी मर्यादाएँ लांघ दीं। जब शिशुपाल ने अपनी गालियों की गिनती पूरी कर ली, तो भगवान कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल की गर्दन काट दी।
शिशुपाल के वध के बाद कृष्ण ने इंद्रप्रस्थ क्यों छोड़ा? राजसूय यज्ञ के सफलतापूर्वक संपन्न होने और शिशुपाल के मारे जाने के पश्चात की घटनाओं का वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के दसवें स्कंध (अध्याय 77, श्लोक 6-7) में स्पष्ट रूप से किया गया है।
इन्द्रप्रस्थं गतः कृष्ण आहुतो धर्मसूनुना ।
राजसूयेऽथ निवृत्ते शिशुपाले च संस्थिते ॥ ६ ॥
कुरुवृद्धाननुज्ञाप्य मुनींश्च ससुतां पृथाम् ।
निमित्तान्यतिघोराणि पश्यन् द्वारवतीं ययौ ॥७॥
इस श्लोक का अर्थ यह है कि धर्मपुत्र युधिष्ठिर के आमंत्रित करने पर भगवान कृष्ण इंद्रप्रस्थ गए थे। राजसूय यज्ञ के संपन्न होने और शिशुपाल के मारे जाने के बाद, भगवान को बहुत ही अशुभ संकेत दिखाई देने लगे। अतः उन्होंने कुरु वंश के बुजुर्गों, महान ऋषियों, पृथा और उनके पुत्रों से अनुमति ली और द्वारका लौट गए। उनके जाने के बाद ही कौरवों के मन में पांडवों की समृद्धि और प्रसिद्धि को लेकर गहरी ईर्ष्या पैदा हुई। यह जलन तब और भड़क गई जब दुर्योधन भ्रमवश इंद्रप्रस्थ के एक पानी से भरे तालाब में गिर पड़ा और द्रौपदी ज़ोर से हँस पड़ीं। इन्हीं घटनाओं ने महाभारत के उस विनाशकारी युद्ध की नींव रखी।
द्वारका में यदुवंश का विनाश कैसे शुरू हुआ? भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कंध के तीसवें अध्याय में यदुवंश के पतन की हृदय विदारक कथा है। आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष में बहुत भयानक और अशुभ संकेत देखने के बाद भगवान कृष्ण ने यदुवंशियों को सुधर्मा सभा में संबोधित किया। उन्होंने कहा कि द्वारका में अब एक पल भी रुकना सुरक्षित नहीं है। कृष्ण के निर्देश पर महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को शंखोद्धार भेज दिया गया, जबकि बाक़ी शूरवीर प्रभास क्षेत्र की ओर निकल पड़े जहाँ सरस्वती नदी पश्चिम की ओर बहती है। प्रभास पहुँचकर यदुवंशियों ने खूब मीठी शराब पी, जिससे उनकी बुद्धि पूरी तरह भ्रष्ट हो गई। अत्यधिक शराब के नशे में चूर होकर वे अहंकारी हो गए और आपस में भयानक रूप से लड़ने लगे। उन्होंने धनुष, तलवार, भाले और गदा जैसे हथियारों से एक-दूसरे पर जानलेवा हमले किए। प्रद्युम्न सांब से भिड़ गया, और अक्रूर भोज से लड़ने लगा। जब उनके पास तीर और हथियार खत्म हो गए, तो उन्होंने समुद्र तट पर उगी नरकट नाम की घास को उखाड़ लिया। ब्राह्मणों के पुराने श्राप के कारण वह घास उनके हाथों में आते ही वज्र जैसी मज़बूत लोहे की छड़ों में बदल गई। अपनी सुध-बुध खो चुके यदुवंशियों ने एक-दूसरे को बेरहमी से मारना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि जब कृष्ण ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो उन्होंने बलराम और कृष्ण पर भी हमला कर दिया, जिसके बाद वे दोनों भी इस भयंकर लड़ाई में शामिल हो गए। इस तरह ब्राह्मणों के श्राप और कृष्ण की माया के प्रभाव में आकर यदुवंश जलते हुए बाँस के जंगल की तरह राख हो गया।
भगवत पुराण, खंड 11
भगवान कृष्ण ने अपना शरीर कैसे त्यागा और इंद्रप्रस्थ फिर से शरणस्थली कैसे बना? अपने पूरे वंश को नष्ट होता देख, बलराम ने समुद्र के किनारे ध्यान लगाया और अपने आप को स्वयं में विलीन करके मानव दुनिया को त्याग दिया। बलराम के जाने के बाद भगवान कृष्ण एक पीपल के पेड़ के नीचे जाकर शांति से बैठ गए। उनका दायां पैर, जिसका तलवा लाल कमल के समान था, उनकी जांघ पर रखा हुआ था और वह बिल्कुल एक हिरण के चेहरे जैसा लग रहा था। उसी समय ज़रा नाम के एक शिकारी ने उसे हिरण समझकर तीर मार दिया। यह तीर उसी लोहे के टुकड़े से बना था जो ब्राह्मणों द्वारा श्रापित और नष्ट की गई गदा से बचा हुआ था। जब शिकारी ने पास आकर चतुर्भुज रूप देखा तो अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। कृष्ण ने उसे बताया कि उसे डरने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह सब उन्हीं की इच्छा से हुआ है। इसके बाद कृष्ण का सारथी दारुक वहाँ पहुँचा और उनके चरणों में गिर पड़ा। कृष्ण ने दारुक को आदेश दिया कि वह तुरंत द्वारका जाए और बचे हुए परिवार वालों को इस आपसी विनाश की ख़बर दे। कृष्ण ने कहा कि वे सभी द्वारका छोड़ दें क्योंकि अब यह नगरी समुद्र में डूब जाएगी। कृष्ण ने निर्देश दिया कि सभी लोग अपने परिवारों को लेकर अर्जुन के संरक्षण में इंद्रप्रस्थ चले जाएं। इंद्रप्रस्थ उस अराजकता और संकट के समय महिलाओं और कमज़ोरों के लिए एक सुरक्षित शरणस्थली बना। अर्जुन ने वहाँ पहुँचकर कृष्ण के पोते वज्र को इंद्रप्रस्थ के सिंहासन पर बैठाया, जिसने पांडवों के प्रस्थान के बाद भी वहाँ राज किया।
ब्लू नवाब तितली का अद्भुत सफर इल्ली से रंगीन उड़ान तक
ब्लू नवाब तितली (Blue Nawab butterfly ) भारत की सबसे सुंदर और दुर्लभ तितलियों में से एक मानी जाती है। यह मुख्य रूप से पश्चिमी घाट, असम और पश्चिम बंगाल के घने जंगलों में दिखाई देती है। इसकी सबसे रोचक बात इसका जीवन चक्र है, जिसमें एक छोटा सा अंडा धीरे धीरे रंगीन तितली में बदल जाता है।
मादा तितली पत्तियों पर अंडे देती है। लगभग चार दिनों बाद इनमें से छोटी इल्लियाँ निकलती हैं, जो सबसे पहले अपने अंडे के खोल को ही खा जाती हैं। शुरुआत में उनका रंग सुनहरा भूरा होता है, लेकिन कुछ ही दिनों में वे हरी हो जाती हैं ताकि पत्तियों के बीच आसानी से छिप सकें। ये इल्लियाँ पत्तियों को खाकर तेजी से बढ़ती हैं और बढ़ने के साथ कई बार अपनी त्वचा बदलती हैं।
कुछ समय बाद इल्ली रेशम जैसा सहारा बनाकर प्यूपा में बदल जाती है। यह अवस्था लगभग दस से ग्यारह दिनों तक रहती है। फिर एक दिन प्यूपा का खोल टूटता है और उसमें से एक सुंदर ब्लू नवाब तितली बाहर निकलती है। अपने पंख फैलाकर सूखाने के बाद यह पहली बार उड़ान भरती है। यह पूरा रूपांतरण प्रकृति के सबसे अद्भुत परिवर्तनों में से एक माना जाता है।
भूमि और मिट्टी के प्रकार : कृषि योग्य, बंजर, मैदान
19-05-2026 10:18 AM • Lucknow-Hindi
हमारे कृषि प्रधान राज्य में, उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के खिलाफ क्या हो सकते हैं समाधान?
चलिए, आज समझते हैं कि ‘उर्वरक’ क्या हैं, और कृषि में उनकी क्या भूमिका है। फिर, हम देखेंगे कि उनका उत्पादन तेल और गैस उद्योग से कैसे जुड़ा है। लेख में आगे, हम पता लगाएंगे कि वैश्विक तेल संकट के दौरान उर्वरकों की कीमतें क्यों बढ़ती हैं। जबकि, अंत में हम टिकाऊ उर्वरक विकल्पों और नई प्रौद्योगिकियों की जांच करेंगे, जो जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता को कम करती हैं।
हमारे भारतवर्ष में, मिट्टी के प्रकार और मौसम की स्थिति के आधार पर विविध फसलों की खेती की जाती है। पिछले कुछ वर्षों में विविध फसल पैटर्न और पोषक तत्वों की बढ़ती मांग के कारण, खेती में उर्वरकों के इस्तेमाल में काफी वृद्धि हुई है। प्रत्येक फसल के स्वस्थ विकास के लिए उर्वरक की आवश्यकता होती है, क्योंकि यह उन्हें आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है।
दरअसल, ‘उर्वरक’ वे कार्बनिक या अकार्बनिक पदार्थ होते हैं, जो फसलों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं। आम तौर पर, वे दानेदार या तरल होते हैं। अधिकांश उर्वरकों में तीन प्राथमिक मैक्रोन्यूट्रिएंट्स (Macronutrients) होते हैं: नाइट्रोजन (Nitrogen), फास्फोरस (Phosphorus), और पोटेशियम (Potassium)। इन्हें आमतौर पर एनपीके (NPK) उर्वरक के रूप में जाना जाता है। ये पोषक तत्व पौधों की वृद्धि और विकास में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
जब फसलें बढ़ती हैं, तो वे मिट्टी से पोषक तत्व अवशोषित करती हैं। समय के साथ, मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, और मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है। उर्वरक इन पोषक तत्वों को प्रदान करने में मदद करते हैं। इसलिए पौधों को वे पोषक तत्व मिलते हैं, जो मिट्टी अकेले प्रदान नहीं कर सकती।
भारतीय फसलों में, उर्वरक ‘वृद्धि वर्धक’ के रूप में कार्य करते हैं। ऊर्वरकों से प्राप्त पोषक तत्व जड़ों की मदद से पौधे के सभी भागों में जाते हैं। तब, पोटेशियम पौधे के तने को मजबूत करता है, और अनाज की गुणवत्ता में सुधार करता है। नाइट्रोजन पत्तियों को हरा-भरा बनाता है, और जीवंत रखता है। जबकि, फॉस्फोरस मजबूत जड़ विकास को बढ़ावा देता है। आम तौर पर, ये तत्व पौधों के चयापचय कार्यों को बेहतर बनाने और तेज विकास को बढ़ावा देने के लिए मिलकर काम करते हैं।
नाइट्रोजन उर्वरक, वैश्विक कृषि उत्पादकता की रीढ़ बने हुए हैं, और यूरिया (Urea) उनमें से सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला नाइट्रोजन उर्वरक है। लगभग 46 % नाइट्रोजन सामग्री के साथ, यूरिया गेहूं, चावल, मक्का और कई बागवानी फसलों को नाइट्रोजन की आपूर्ति करता है। हालांकि, प्रत्येक टन यूरिया के पीछे एक अत्यधिक ऊर्जा-गहन औद्योगिक प्रक्रिया निहित है। यूरिया का उत्पादन काफी हद तक प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है। प्राकृतिक गैस,यूरिया उत्पादन में रासायनिक सामग्री और ऊर्जा स्रोत के रूप में कार्य करता है। जिन देशों में देशज गैस उत्पादन सीमित है, वहां उर्वरक विनिर्माण को बनाए रखने के लिए तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी - LNG) आवश्यक हो जाती है। प्राकृतिक गैस और उर्वरकों के बीच इस संबंध का मतलब है कि, वैश्विक ऊर्जा बाजार हमेशा ही उर्वरक उपलब्धता, उत्पादन लागत और अंततः खाद्य सुरक्षा को सीधे प्रभावित करते हैं।
यूरिया का उत्पादन अमोनिया (Ammonia) के निर्माण से शुरू होता है, जो सभी नाइट्रोजन उर्वरकों का मूलभूत निर्माण घटक है। अमोनिया का उत्पादन, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन का उपयोग करके किया जाता है। नाइट्रोजन हवा से आसानी से उपलब्ध होता है, लेकिन हाइड्रोजन का उत्पादन औद्योगिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है।
आधुनिक उर्वरक संयंत्रों में हाइड्रोजन, मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस से निकाला जाता है, क्योंकि उसमें मुख्य रूप से मीथेन (CH₄) गैस होता है। उत्पादन के पहले चरण में, प्राकृतिक गैस की लगभग 800-900 डिग्री सेल्सियस पर भाप के साथ प्रक्रिया की जाती है। इस प्रक्रिया में हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड (Carbon monoxide) उत्पन्न होते हैं। फिर कार्बन मोनोऑक्साइड को एक अन्य प्रतिक्रिया के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित किया जाता है। इस प्रक्रिया में फिर से अतिरिक्त हाइड्रोजन उत्पन्न होता है।
एक बार हाइड्रोजन का उत्पादन होने के बाद, इसे हेबर-बॉश प्रक्रिया (Haber–Bosch process) में नाइट्रोजन के साथ जोड़ा जाता है। इस चरण में, नाइट्रोजन और हाइड्रोजन अत्यधिक उच्च दबाव और तापमान में प्रक्रिया करके अमोनिया (NH₃) बनाते हैं। अमोनिया का उपयोग उर्वरक के रूप में किया जा सकता है, लेकिन इसका सुरक्षित रूप से भंडारण और परिवहन करना मुश्किल है। इसलिए, अधिकांश अमोनिया यूरिया में परिवर्तित किया जाता है।
इस प्रकार, प्रक्रिया के अंतिम चरण में, संयंत्र में पहले उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके अमोनिया को यूरिया में परिवर्तित किया जाता है। दरअसल, पहले अमोनिया और कार्बन डाइऑक्साइड प्रतिक्रिया करके अमोनियम कार्बामेट (Ammonium carbamate) बनाते हैं। यह मध्यवर्ती यौगिक, फिर यूरिया और पानी में विघटित हो जाता है।
इसी जटिल प्रक्रिया के कारण, प्राकृतिक गैस महत्वपूर्ण हो जाती है। होर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है, जहां से लगभग एक चौथाई समुद्री तेल, तरलीकृत प्राकृतिक गैस और उर्वरकों की महत्वपूर्ण मात्रा का वहन होता है। हाल ही में बढ़े वैश्विक संघर्ष के बाद से, इस जलसंधि के माध्यम से होने वाले नौ-परिवहन में काफी गिरावट आई है। ऊर्जा बाज़ारों में इसका परिणाम दिखने लगा है। तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। और जैसे ही गैस की कीमतें बढ़ती हैं, उर्वरक उत्पादन लागत बढ़ जाती है, जिससे उनकी भी कीमतें उच्च हो जाती हैं। नतीजतन, नाइट्रोजन-आधारित उर्वरकों की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, क्योंकि उनके उत्पादन में प्राकृतिक गैस महत्वपूर्ण है।
बढ़ती कीमतें, मिट्टी के स्वास्थ्य, पानी की गुणवत्ता और पारिस्थितिकी तंत्र पर संभावित प्रतिकूल प्रभावों के कारण, आज रासायनिक उर्वरकों का उपयोग जांच के दायरे में आ गया है। सौभाग्य से, रासायनिक उर्वरकों के कई पर्यावरण-अनुकूल विकल्प हैं, जो मिट्टी की उर्वरता को बढ़ावा देते हैं, पौधों के विकास में सहायता करते हैं, और टिकाऊ एवं धारणीय कृषि पद्धतियों में योगदान करते हैं। ये विकल्प निम्नलिखित हैं -
1. खाद और जैविक पदार्थ कम्पोस्ट (Compost) या "काला सोना", हमारी रसोई एवं आंगन अपशिष्ट और पौधों के अवशेषों जैसे विघटित कार्बनिक पदार्थों से बनता है। यह आवश्यक पोषक तत्वों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों से भरपूर होता है, तथा मिट्टी की संरचना में सुधार करता है। जैविक कचरे को पुनर्चक्रित करके और उसे मिट्टी में लौटाकर खाद बनाने से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो जाती है।
2. हरी खाद और आवरण फसलें आवरण फसलें (Cover crops), जिन्हें हरी खाद के रूप में भी जाना जाता है, मिट्टी के स्वास्थ्य और उर्वरता में सुधार के लिए लगाई जाती हैं। फलियां, घास और तिपतिया घास जैसी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ग्रहण करती हैं, तथा खरपतवारों और मिट्टी के कटाव को रोकती हैं। जब ये फसलें विघटित हो जाती हैं, तो वे पोषक तत्व और कार्बनिक पदार्थों से मिट्टी को समृद्ध करती हैं। इस प्रकार, वे मुख्य फसल के विकास में सहायक हैं।
3. जैवउर्वरक और माइक्रोबियल इनोकुलेंट्स (Microbial Inoculants) राइजोबियम (rhizobium), माइकोराइजा (mycorrhizae) और नाइट्रोजन-फिक्सिंग बैक्टीरिया (nitrogen-fixing bacteria) जैसे जैव उर्वरक, माइक्रोबियल इनोकुलेंट हैं। ये जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता और पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाते हैं। ये लाभकारी सूक्ष्मजीव, पौधों के साथ सहजीवी संबंध बनाते हैं, पोषक तत्वों के अवशोषण में मदद करते हैं, पौधों के विकास को बढ़ावा देते हैं, और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करते हैं।
इसके अलावा, अगला बड़ा नवाचार ‘हरित अमोनिया’ का उत्पादन है। यह नाइट्रोजन उर्वरक उत्पादन के लिए कार्बन-मुक्त विकल्प प्रदान करता है, जो टिकाऊ कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हरित अमोनिया का उत्पादन, प्राकृतिक गैस के बजाय पवन, सौर या जलविद्युत ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके किया जाता है। सबसे पहले, नवीकरणीय बिजली से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है। फिर, वायु पृथक्करण इकाइयां वायुमंडल से नाइट्रोजन गैस अलग करती हैं। इसके पश्चात, हरित हैबर-बॉश प्रक्रिया में अमोनिया का उत्पादन करने के लिए, उत्प्रेरक का उपयोग करके हाइड्रोजन और नाइट्रोजन को दबाव में संयोजित किया जाता है। यह जीवाश्म ईंधन (प्राकृतिक गैस) के बजाय नवीकरणीय ऊर्जा द्वारा संचालित होता है। हरित अमोनिया, पारंपरिक अमोनिया उत्पादन से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को समाप्त करता है, तथा नाइट्रोजन उर्वरक के लिए एक स्वच्छ विकल्प प्रदान करता है। साथ ही, यह वैश्विक स्थिरता और जलवायु कार्रवाई लक्ष्यों के साथ संरेखित है।
क्या 1970 के दशक की उस एक बगावत ने हमेशा के लिए बदल दिया क्रिकेट का इतिहास?
साल 1977 की बात है, जब क्रिकेट की दुनिया के सबसे बड़े और रूढ़िवादी अधिकारियों के सामने एक व्यक्ति ने खड़े होकर निडरता से कहा था कि "हम सभी के अंदर थोड़ा बहुत लालच होता है, आपकी कीमत क्या है?" जब उन क्रिकेट अधिकारियों ने उसकी बात नहीं मानी, तो उस व्यक्ति ने एक बेहद आक्रामक रास्ता अपनाया और दुनिया के 50 से अधिक बेहतरीन क्रिकेटरों को अपनी ही एक अलग क्रिकेट प्रतियोगिता के लिए गुप्त रूप से साइन कर लिया। यह कोई और नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया के अरबपति मीडिया टाइकून (media tycoon) केरी पैकर (Kerry Packer) थे। पैकर का शुरुआती जीवन चुनौतियों से भरा था। बचपन में पोलियो के कारण वे नौ महीने अस्पताल में रहे, लेकिन इस बीमारी से उबरकर वे अपने स्कूल के हैवीवेट बॉक्सिंग चैंपियन (Heavyweight Boxing Champion) बने। पैकर को पढ़ने-लिखने में दिक्कत होती थी, जिसे अनजानी बीमारी डिस्लेक्सिया (dyslexia) कहा जाता है, और उनके पिता उन्हें परिवार का सबसे बेवकूफ सदस्य मानते थे। लेकिन इसी लड़ाकू स्वभाव ने आगे चलकर उन्हें व्यापार और क्रिकेट की दुनिया में अलग पहचान दिलाई। उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया जिसने सफेद कपड़ों और दिन के उजाले में खेले जाने वाले इस पारंपरिक खेल को रंगीन कपड़ों, दूधिया रोशनी और खिलाड़ियों को मिलने वाले भारी वेतन के एक बिल्कुल नए युग में धकेल दिया।
केरी पैकर कौन थे और उन्होंने पारंपरिक क्रिकेट से इतनी बड़ी बगावत क्यों की? केरी पैकर ऑस्ट्रेलिया के एक बेहद ताकतवर मीडिया घराने से ताल्लुक रखते थे। साल 1974 में उनके पिता की मृत्यु के बाद उन्हें विरासत में 100 मिलियन डॉलर का साम्राज्य मिला था, जिसे उन्होंने अपनी कुशाग्र व्यापारिक बुद्धि से अपनी मृत्यु तक 6.5 बिलियन डॉलर के विशाल साम्राज्य में बदल दिया था। 1976 के मध्य में, पैकर अपने टीवी चैनल 'चैनल नाइन' (Channel Nine) के लिए ऑस्ट्रेलिया के घरेलू टेस्ट मैचों के प्रसारण के विशेष अधिकार चाहते थे। उन्होंने इसके लिए तीन साल के 1.5 मिलियन डॉलर की भारी-भरकम पेशकश की, जो कि पिछले प्रसारण अनुबंध से पूरे आठ गुना अधिक थी। लेकिन ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट बोर्ड (Australian Cricket Board) ने उनके इस आकर्षक प्रस्ताव को खारिज कर दिया और सरकारी चैनल को तरजीह दी। पैकर को यह महसूस हुआ कि यह फैसला एक पुराने नेटवर्क की आपसी मिलीभगत का नतीजा है। इस अपमान से पैकर को इतनी नाराज़गी हुई कि उन्होंने खुद की एक क्रिकेट प्रतियोगिता शुरू करने की ठान ली, जिसे 'वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट' (world series cricket) का नाम दिया गया। 1977 की शुरुआत में ही उन्होंने इंग्लैंड के तत्कालीन कप्तान टोनी ग्रेग (Tony Greig) और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान इयान चैपल (Ian Chappell) की मदद से दुनिया भर के दिग्गज खिलाड़ियों को अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाना शुरू कर दिया। इयान चैपल ने बाद में कहा था कि यह उनके जीवन का सबसे कठिन क्रिकेट था क्योंकि इसमें दुनिया के सभी सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी शामिल थे। दुनिया भर के क्रिकेट प्रशासकों और अदालतों ने इस बड़े बदलाव पर कैसी प्रतिक्रिया दी? मई 1977 में जब पैकर की इस गुप्त योजना का खुलासा हुआ, तो क्रिकेट जगत में जैसे भूचाल आ गया। क्रिकेट प्रशासकों ने इसे पैकर का सर्कस करार दिया और खिलाड़ियों को भाड़े का टट्टू कहकर अपमानित किया। इंग्लैंड के टोनी ग्रेग से उनकी कप्तानी छीन ली गई। इस विद्रोह को दबाने के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (International Cricket Council) ने लंदन में एक बैठक बुलाई, जिसमें बात न बनने पर पैकर ने स्पष्ट कह दिया कि अब हर कोई अपने लिए लड़ेगा। जुलाई में परिषद ने फैसला सुनाया कि पैकर के मैचों को प्रथम श्रेणी का दर्जा नहीं दिया जाएगा और इसमें हिस्सा लेने वाले खिलाड़ियों पर टेस्ट क्रिकेट खेलने से प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। इसके खिलाफ पैकर ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। अदालत में चले एक लंबे मुकदमे में जस्टिस स्लेड (Justice Slade) ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि पेशेवर क्रिकेटरों को अपनी आजीविका कमाने का पूरा हक है और क्रिकेट बोर्ड उनके रास्ते में सिर्फ इसलिए बाधा नहीं डाल सकता क्योंकि इससे उनके अपने हित प्रभावित होते हैं। इस फैसले से क्रिकेट प्रतिष्ठानों को भारी झटका लगा और उन्हें मुकदमे के खर्च के रूप में लगभग 250,000 पाउंड भी चुकाने पड़े। हालांकि, अलग-अलग देशों का रुख समय के साथ बदलता गया। वेस्टइंडीज़ का क्रिकेट बोर्ड आर्थिक रूप से बहुत कमज़ोर था, इसलिए 1979 के वसंत में उन्होंने पैकर के साथ सीरीज़ के लिए बातचीत शुरू कर दी। पाकिस्तान ने शुरुआत में सख्त रवैया अपनाया, लेकिन बाद में इंग्लैंड के खिलाफ बुरी तरह हारने पर उन्होंने व्यावहारिक सोच अपनाते हुए 1978 में भारत के खिलाफ सीरीज़ के लिए पैकर के खिलाड़ियों को टीम में वापस बुला लिया। न्यूज़ीलैंड के प्रशासक वाल्टर हैडली (Walter Hadley) शुरू से ही समझौता चाहते थे। वहीं, रंगभेद के कारण अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध झेल रहे दक्षिण अफ्रीका के खिलाड़ी भी इस मौके का फायदा उठाकर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के साथ खेलने के लिए उत्सुक थे। उस समय भारत इस विवाद से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा था, लेकिन ऐसी ज़ोरदार अफ़वाहें फैल गई थीं कि भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी (Bishan Singh Bedi) और स्टार बल्लेबाज़ सुनील गावस्कर (Sunil Gavaskar) ने भी पैकर की लीग के विकल्पों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।
दूधिया रोशनी, हेलमेट और ड्रॉप-इन पिचों ने पारंपरिक खेल को कैसे नया रूप दिया? क्रिकेट को रात के समय फ्लडलाइट्स (floodlights) में खेलने का विचार सबसे पहले 1930 के दशक में सामने आया था, लेकिन माना जाता है कि इंग्लैंड में पहली बार फ्लडलाइट्स में क्रिकेट मैच 11 अगस्त 1952 को मिडिलसेक्स काउंटी क्रिकेट क्लब (Middlesex County Cricket Club) और आर्सेनल फुटबॉल क्लब (Arsenal Football Club) के बीच खेला गया था। लेकिन इसे नियमित रूप से शुरू करने का पूरा श्रेय केरी पैकर को ही जाता है। वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट के शुरुआती मैचों में दर्शकों की संख्या बहुत कम थी। पैकर को पारंपरिक मैदानों पर खेलने की अनुमति नहीं थी, इसलिए उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई नियमों वाले फुटबॉल स्टेडियम (Football Stadium) पट्टे पर लिए। सबसे बड़ी समस्या वहां क्रिकेट की पिच बनाने की थी। पैकर ने जॉन मै (John May) को काम पर रखा, जिन्होंने ग्रीनहाउस (greenhouse) में पिचें उगाईं और क्रेन की मदद से उन्हें स्टेडियम की सतह में स्थापित किया, जिसे आज हम ड्रॉप-इन पिच (drop-in pitch) के नाम से जानते हैं। इस तकनीक के बिना यह लीग पूरी तरह से विफल हो जाती। पैकर ने तेज़ गेंदबाज़ी के आक्रामक पहलू पर बहुत ज़ोर दिया और डेनिस लिली (Dennis Lillee), इमरान खान (Imran Khan) तथा एंडी रॉबर्ट्स (Andy Roberts) जैसे गेंदबाज़ों का भारी प्रचार किया। सिडनी (Sydney) के एक मैच में वेस्टइंडीज़ के एंडी रॉबर्ट्स की एक खतरनाक बाउंसर से ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ डेविड हूक्स (David Hookes) का जबड़ा टूट गया। इस भयानक घटना ने खिलाड़ियों को सुरक्षा के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया और इसी के बाद क्रिकेट में हेलमेट का चलन शुरू हुआ। शुरुआत में डेनिस एमिस (Dennis Amis) ने बल्लेबाज़ी करते समय अपनी सुरक्षा के लिए मोटरसाइकिल का हेलमेट पहना था। पैकर ने दर्शकों को मैदान में लाने के लिए मार्केटिंग (Marketing) पर ज़ोर दिया। नतीजा यह हुआ कि नवंबर 1978 में सिडनी क्रिकेट ग्राउंड में फ्लडलाइट्स के नीचे खेले गए एक डे-नाइट मैच को देखने के लिए 44,374 दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। रात के समय रंगीन कपड़ों में क्रिकेट का यह नया रूप दर्शकों को बहुत पसंद आया।
वनडे क्रिकेट का उदय कैसे हुआ और इसे दुनिया की सबसे बड़ी पहचान कैसे मिली? वनडे यानी वन डे इंटरनेशनल (One Day International) सीमित ओवरों का क्रिकेट है, जो मुख्य रूप से 1970 के दशक में अस्तित्व में आया। क्रिकेट के इतिहास का पहला आधिकारिक वनडे मैच 5 जनवरी 1971 को मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड (Melbourne Cricket Ground) पर ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच खेला गया था। लेकिन इसे आज के आधुनिक, पेशेवर और तेज़-तर्रार रूप में ढालने का काम 1970 के दशक के अंत में पैकर की इसी बगावत ने किया। रंगीन जर्सी (Jersey), रात के समय मैच, सफेद गेंदें, काली साइट स्क्रीन (black site screen), अलग-अलग एंगल वाले कई टीवी कैमरे, पिच के माइक्रोफोन और टीवी स्क्रीन पर ग्राफिक्स—यह सब उसी वर्ल्ड सीरीज़ क्रिकेट की देन हैं। 17 जनवरी 1979 को पहली बार पूरी तरह से रंगीन जर्सी में मैच खेला गया, जिसमें ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी सुनहरे पीले (golden yellow) और वेस्टइंडीज़ के खिलाड़ी कोरल पिंक (coral pink) कपड़ों में मैदान पर उतरे थे। धीरे-धीरे वनडे क्रिकेट में सफेद कपड़ों और लाल गेंद का चलन खत्म हो गया और 2001 तक इसे पूरी तरह से बंद कर दिया गया। 1979 आते-आते भारी आर्थिक नुकसान और मुकदमों से थककर ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट बोर्ड ने पैकर के साथ शांति समझौता कर लिया। पैकर के चैनल को न सिर्फ क्रिकेट के विशेष प्रसारण अधिकार मिले बल्कि खेल के प्रचार-प्रसार का दस साल का बड़ा अनुबंध भी हासिल हुआ। आज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद सभी टीमों की वनडे रैंकिंग जारी करती है। इस समय दुनिया में 12 पूर्ण सदस्य देश हैं जिन्हें वनडे क्रिकेट का स्थायी दर्ज़ा प्राप्त है, और क्रिकेट का सबसे बड़ा महाकुंभ यानी विश्व कप भी इसी 50-ओवर के प्रारूप में खेला जाता है।
लखनऊ के खेल प्रेमी पहली बार अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट का गवाह कब बने? वनडे क्रिकेट और डे-नाइट मैचों के इस रोमांचक सफर ने धीरे-धीरे दुनिया भर के देशों और भारत के हर कोने को क्रिकेट के खुमार में पूरी तरह से रंग दिया। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के खेल प्रेमियों के लिए भी वह दिन बेहद खास और ऐतिहासिक था, जब उनके अपने शहर में पहली बार अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट का शानदार आगाज़ हुआ। लखनऊ के मशहूर के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम (K. D. Singh Babu Stadium) में पहला पुरुष वनडे मैच 27 अक्टूबर 1989 को खेला गया था। यह ऐतिहासिक मुकाबला एमआरएफ वर्ल्ड सीरीज़, (जिसे क्रिकेट जगत में नेहरू कप के नाम से भी जाना जाता है!) का एक अहम हिस्सा था। इस बड़े मंच पर पाकिस्तान और श्रीलंका की मजबूत टीमें आमने-सामने थीं। उस दौर में स्टेडियम की सीढ़ियों पर बैठकर दुनिया के दिग्गज खिलाड़ियों को एक दूसरे के खिलाफ कड़ा संघर्ष करते देखना लखनऊ के दर्शकों के लिए एक बिल्कुल नया, अद्भुत और रोमांचक अनुभव था। इसी मैच के साथ लखनऊ शहर ने भी विश्व क्रिकेट के नक़्शे पर एक शानदार मेज़बान के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई, जो आज भी इस शहर की समृद्ध खेल विरासत का एक बेहद अहम हिस्सा है। इस एक मैच ने लखनऊ के युवाओं में खेल के प्रति जो दीवानगी पैदा की, वह आज भी यहाँ के हर गली-मोहल्ले में खेलते बच्चों में साफ़ देखी जा सकती है।