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रैगिंग की बढ़ती समस्या से निपटने के लिये कानून

Lucknow
20-10-2018 01:48 PM

‘रैगिंग’ (Ragging), सुनने में तो सामान्य शब्द लगता है परंतु इसके पीछे छिपी भयावहता को वे ही समझ सकते हैं जिन्होंने इसे झेला हो। पहले रैगिंग सीनियर और जूनियर के बीच जान पहचान बढ़ाने, परिचय लेने और हंसी मज़ाक करने का एक ज़रिया हुआ करती थी। परंतु आधुनिकता के साथ रैगिंग के तरीके भी बदलते जा रहे हैं। आज समय-समय पर रैगिंग के कई मामले सामने आ रहे है। गलत व्यवहार, अपमानजनक छेड़छाड़, मारपीट, अपशब्द बोलना, यौन उत्पीड़न जैसी कितनी ही अमानवीय घटनाएं हुई हैं जो रैगिंग के रूप में सामने आयी हैं।

हाल ही में लखनऊ के एक मेडिकल कॉलेज के छह छात्रों को निलंबित कर दिया गया। यहां तक कि उन्हें हॉस्टल से भी निष्कासित कर दिया गया है। इस मामले की जांच के लिए चीफ प्रॉक्टर (Chief Proctor) के नेतृत्व में कमेटी गठित की गई है। एम.बी.बी.एस.-बी.डी.एस. प्रथम वर्ष के पीड़ित छात्रों ने एंटी-रैगिंग सेल (Anti-ragging Cell) में शिकायत की थी। साथ ही छात्रों ने यू.जी.सी. (UGC) की एंटी रैगिंग हेल्पलाइन पर शिकायत कर बताया कि सीनियर छात्र रैगिंग कर रहे हैं। इसके बाद एंटी रैगिंग सेल ने कॉलेज प्रशासन को सूचना दी। इस सूचना से कॉलेज प्रशासन की एंटी रैगिंग सेल ने हॉस्टल पहुंच कर जांच पड़ताल की।

2007 की एक रिपोर्ट के अनुसार रैगिंग के कारण शारीरिक रूप से घायल छात्रों के मामलों की संख्या 42 थी और इसी वर्ष 7 छात्रों ने रैगिंग से अपनी जान तक गंवा दी और प्रतिवर्ष ये आंकड़े बढ़ते ही जा रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि रैगिंग के विरुद्ध न्याय प्रणाली सब हाथ पर हाथ रख कर बैठी हुई है और कोई कार्य नहीं कर रही है। 1997 में तमिलनाडु में विधानसभा में पहला एंटी रैगिंग कानून पास किया गया। इसके बाद, विश्व जागृति मिशन द्वारा दायर सार्वजनिक मुकदमे के जवाब में मई 2001 में भारत के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से एंटी रैगिंग प्रयासों में एक बड़ा कदम उठाया गया। 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने रैगिंग पर संज्ञान लेते हुए इसकी रोकथाम के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एम.एच.आर.डी.) ने सी.बी.आई. के पूर्व निदेशक ए. राघवन की अध्यक्षता में एक सात सदस्यीय कमेटी बनाई। ताकि विरोधी कदम उठाने के उपायों की सिफारिश की जा सके।

मई 2007 में अदालत में प्रस्तुत राघवन समिति की रिपोर्ट में भारतीय दंड संहिता के तहत एक विशेष खंड के रूप में रैगिंग को शामिल करने का प्रस्ताव रखा। उसके बाद 16 मई 2007 में सर्वोच्च न्यायालय अंतरिम आदेश के अनुसार अकादमिक संस्थानों के लिए रैगिंग के किसी भी मामले की शिकायत पुलिस के साथ आधिकारिक ऍफ़.आई.आर. (First Information Report) के रूप में दर्ज करना अनिवार्य है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि सभी मामलों की औपचारिक रूप से आपराधिक न्याय प्रणाली के तहत जांच की जाएगी, न कि अकादमिक संस्थानों द्वारा।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद, भारत सरकार द्वारा एक राष्ट्रीय एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन लॉन्च की गई, जो संस्थान के प्रमुख और स्थानीय पुलिस अधिकारियों को कॉलेज से रैगिंग शिकायत के बारे में सूचित करके पीड़ितों की मदद करती है। इस हेल्पलाइन की सहायता से ईमेल (helpline@antiragging.in) के माध्यम से या फोन (1800-180-5522) के माध्यम से पीड़ित के नाम का खुलासा किए बिना शिकायतें भी पंजीकृत की जा सकती हैं।

साथ ही आपको बता दें कि वर्ष 2009 में एक मेडिकल संस्‍थान के एक छात्र की रैगिंग से हुई मौत के बाद सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी शिक्षण संस्‍थानों को रैगिंग विरोधी कानून का सख्‍ती से पालन करने के निर्देश दिए हैं। यू.जी.सी. (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कॉलेजों में रैगिंग को देखते हुए छात्रों के व्‍यवहार को लेकर कड़े नियम बनाए हैं। इसके तहत निम्‍न प्रकार के व्‍यवहार को रैगिंग माना जाएगा:

1. छात्र के रंगरूप, लिंग, जाति या उसके पहनावे पर टिप्‍पणी किया जाना या उसके स्‍वाभिमान को ठेस पहुंचाना।
2. किसी छात्र का उसकी श्रेत्रीयता, भाषा या फिर जाति के आधार पर अपमान किया जाना।
3. छात्र की नस्‍ल या फिर उसके परिवार पर अभद्र टिप्‍पणी किया जाना।
4. छात्रों से उनकी मर्जी के बिना जबरन किसी प्रकार का अनावश्‍यक कार्य कराया जाना या उससे शारीरिक या मानसिक दुर्व्यवहार किया जाना।

यूजीसी के द्वारा पारित किये गये नियमों के अनुसार कॉलेज में आवेदन पत्र/नामांकन फॉर्म के साथ कॉलेज के दिशानिर्देशों के प्रॉस्पेक्टस (Prospectus) में सुप्रीम कोर्ट/केंद्रीय और राज्य सरकार के सभी निर्देश शामिल होंगे। प्रवेश आवेदन/नामांकन फॉर्म अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में होगा और प्राथमिक रूप से क्षेत्रीय भाषा में अभिभावक द्वारा हस्ताक्षरित किया जाएगा। कॉलेज में दाखिले के दौरान छात्र व अभिभावकों को शपथ-पत्र देना होगा। प्रत्येक कॉलेज एक समिति का गठन करेगा जिसे एंटी-रैगिंग कमेटी के रूप में जाना जाएगा और एंटी रैगिंग कमेटी द्वारा एंटी-रैगिंग स्क्वाड (Anti-ragging Squad) का निर्माण किया जाएगा जो हॉस्टलों की निगरानी करेगी।

संदर्भ:
1.https://en.wikipedia.org/wiki/Ragging
2.http://indianlawwatch.com/practice/anti-ragging-laws-in-india/#_ftn3
3.https://www.amarujala.com/lucknow/raging-in-kgmu-six-students-suspended

http://prarang.in/Lucknow/1810201972





कैसे एक शेर बन गया माँ दुर्गा का वाहन?

Lucknow
19-10-2018 01:28 PM

भारतीय संस्‍कृति में देवियों का विशेष महत्‍व है विशेषकर दुर्गा माता का। अन्‍य देवियों को इनका स्‍वरूप माना जाता है। आपने अक्‍सर देखा होगा कि दुर्गा माता की प्रतिमा या उनकी तस्‍वीर बिना शेर के पूरी नहीं होती है। लखनऊ शहर के उत्‍तरी पूर्वी भाग में बौद्ध और जैन धर्म का प्रमुख केंद्र श्रावस्‍ती स्थित है, जिसकी खोज वैदिक काल के राजा श्रावस्‍ती द्वारा की गयी थी। इस क्षेत्र के निकट साहेत-माहेत में उत्‍खनन के दौरान कई ऐतिहासिक वस्‍तुऐं एवं मूर्तियां पायी गईं, जिन्‍हें लखनऊ और मथुरा के संग्रहालय में संरक्षित रखा गया है। इनमें से एक प्रतिमा टेराकोटा से बनी माँ दुर्गा की शेर के साथ है, जो लखनऊ के संग्राहलय में संरक्षित रखी गयी है। यह मूर्ती 6ठी शताब्दी की मानी गयी है तथा ऊपर दिए गए चित्र में आप इसे देख सकते हैं।

क्‍यों दर्शाया जाता है माँ को हमेशा शेर के साथ, क्‍या संबंध है इनके मध्‍य? इसके पीछे एक कथा है:

माता पार्वती ने शिव से विवाह करने के लिए कड़ी तपस्‍या की, जिस कारण माता पार्वती का रंग सांवला पड़ गया। एक दिन शिव पार्वती वार्तालाप कर रहे थे तभी शिव ने माता पार्वती के रंग पर उपहास कर दिया। यह शब्‍द माता को चुभ गये, उन्‍होंने गोरा होने के लिए तपस्‍या प्रारंभ कर दी। उनकी तपस्‍या के दौरान एक भूखा शेर उन्हें अपना आहार बनाने हेतु वहाँ आया किंतु माता को तपस्‍या में लीन देख वह उनके तपस्‍या से उठने की प्रतीक्षा करने लगा। माता को तपस्‍या करते-करते कई वर्ष बीत गये किंतु वह शेर अपने स्‍थान से नहीं हिला। अंततः शिव द्वारा माता पार्वती को गोरी होने का वरदान दिया गया। माता ने तपस्‍या से उठने के पश्‍चात शेर को कैलाश में द्वार पाल के रूप में रख लिया। यह कथा दर्शाती है कि माता सभी बुरे विचारों वालों को भी अपनी शरण में स्‍थान देती हैं, बस आवश्‍यकता है उन्‍हें ढूंढने की।


वास्‍तव में भारत में शेर एक निवासी नहीं बल्कि एक प्रवासी जीव है। वर्ष 2013 में वाल्मिक थापर की एक पुस्‍तक आयी, जिसमें उन्‍होंने शेर और चीता को प्रवासी जीव बताया, जो अफ्रीका और मध्‍य एशिया से शाही परिवारों के मनोरंजन के लिए प्रशिक्षित करके भारत लाए जाते थे। धीरे-धीरे यह यहां की मूल प्रजाति में परिवर्तित होने लगे। 17वीं शताब्‍दी के मध्‍य में एशियन शेरों के अंधाधुन शिकार ने इनकी संख्‍या में तीव्रता से कमी लाई जिनमें से कई प्रजातियां विलुप्‍त हो गयी। भारत में लाए गये, इन शेरों का संरक्षण आवयश्‍क हो गया क्‍योंकि ये मिस्र की सभ्‍यता से जुड़ी प्रजाति की अंतिम श्रृंखला शेष रह गयी है। जो प्रमुख रूप से गिरि राष्‍ट्रीय उद्यान में संरक्षित हैं। जिसे 20वीं सदी में शेरों के लिए संरक्षित किया गया। 1936 की गणना में 150 शेरों की संख्‍या ज्ञात की गयी, जो संरक्षण के बाद 2015 तक 523 हो गयी। भारत में शेरों को संरक्षण देने के लिए विभिन्‍न योजनाएं चलाई गयी हैं, जिन्‍होंने इनकी संख्‍या वृद्धि में योगदान दिया है।

संदर्भ :
1.https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10155026758546239&set=p.10155026758546239&type=3&theater
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Shravasti
3.https://www.quora.com/What-is-spiritual-meaning-of-Lion-on-which-Devi-Durga-sits
4.https://blogs.kent.ac.uk/barbarylion/2015/10/05/was-the-lion-ever-native-to-india/
5.http://www.pbs.org/wnet/nature/indias-wandering-lions-asiatic-lion-fact-sheet/14129/

http://prarang.in/Lucknow/1810191966





तितली और उसके जैसा दिखने वाला पतंगा

Lucknow
18-10-2018 03:01 PM

गर्मियों के दिनों में तितली और पतंगे कुछ ज्यादा ही नज़र आते हैं। जहां गर्मियों में तितलियाँ सुबह की गुनगुनी धूप में अपने पंख सेकती हैं वहीं पतंगे चांद की रोशनी में अठखेली करते हैं। तितलियों और पतंगों में बहुत समानताएं हैं जिसके चलते लोग अक्सर इन्हें पहचानने में धोखा खा जाते हैं। दोनों के पंख रंगीन और आकर्षक होते हैं, दोनों को फूलों पर मंडराते हुए भी देखा जा सकता है और इन दोनों के लार्वा (Larvae) पत्ती खाते हैं। कुल मिलाकर दोनों एक ही लगते हैं, खासकर बच्चों को, जो पतंगे को तितली समझ कर उनके पीछे पड़ जाते हैं।

पतंगा तितली जैसा एक कीट होता है। हालांकि वे एक जैसे दिखते तो हैं, परंतु आकृति, व्यवहार, वर्गीकरण आदि के आधार पर देखा जाये तो तितलियों और पतंगों में कई अंतर होते हैं।

1. तितलियों और पतंगों का वर्गीकरण
जीवविज्ञान वर्गीकरण के अनुसार तितलियाँ और पतंगे दोनों 'लेपीडोप्टेरा' (Lepidoptera) वर्ग के प्राणी हैं। परंतु तितलियाँ वास्तव में रंग-बिरंगे पतंगों का एक वर्ग हैं जो भिन्न नज़र आने की वजह से एक अलग श्रेणी में आती हैं। वर्गीकरण वैज्ञानिकों के अनुसार तितलियाँ प्राकृतिक मोनोफिलटिक समूह (Monophyletic group) की हैं और उन्हें रोपैलोसेरा (Rhopalocera) आर्डर में रखा जाता है, जबकि पतंगों को एक अन्य आर्डर हिटरोसेरा (Heterocera) में रखा गया है।

2. दोनों के एंटीना की संरचना और आकार
तितलियों के एंटीना पतले फिलामेंट (Filament) से बने और आगे से मुड़े हुए होते हैं। जबकि पतंगों के एंटीना शाखित, धागेनुमा या पंख जैसे होते हैं।

3. पंख संरचना
पतंगों में पंख जुड़े होते हैं और पतंगों में एक अतिरिक्त पंख संरचना होती है जिसे फ्रैनूलम (Frenulum) कहा जाता है, जो पीछे के और आगे के पंखों को जोड़ता है। तितलियों के पंख जुड़े नहीं होते हैं, इनमें फ्रैनूलम नहीं होता है।

4. प्यूपा
तितलियों और पतंगे दोनों एक लार्वा चरण, एक प्यूपा चरण और अंत में, एक वयस्क तितली या कीट में कायापलट की प्रक्रिया से गुजरते हैं। ये दोनों ही अपने कोकूनों (Cocoon) को बुनते हैं। एक तितली का कैटरपिलर (Caterpillar) कठोर प्रोटीन से बने कोकून को बुनता है, जिसे क्रिसलिस (Chrisalis) भी कहा जाता है। मॉथ कैटरपिलर रेशमी कोकून को बुनते हैं।

5. पंखों का रंग
तितली पंख रंग में उज्ज्वल होते हैं, जबकि पतंगे का पंख गहरा होते हैं। तितलियों पर पीले, सफ़ेद और हरे रंग के पंखों को देखना आम है। लेकिन पतंगों के पंखों में काले या भूरे रंग जैसे गहरे रंग तक सीमित होते हैं, ये रंग उन्हें शिकारियों से छिपाने में मदद करते हैं।

6. शरीर का आकार
तितलियों में पतले थोरैक्स (Thorax) और चिकनी पेट की संरचनाएं होती हैं, जबकि पतंगों के पास मोटा, बालों वाला थोरैक्स होता हैं।

7. आराम करने की स्थिति
तितलियाँ अपने पंखों के ऊपर अपने पंखों को जोड़कर आराम करती हैं। दूसरी ओर, पतंगे अपने पंख विस्तृत फैलाते हैं। हालांकि, तितलियों और पतंगों की कुछ प्रजातियां, इस प्रवृत्ति का पालन नहीं करते हैं।

8. गतिविधि का समय
अधिकतर पतंगे निशाचरता दिखलाते हैं (यानी रात को सक्रीय होते हैं) और केवल शाम या रात के अंधेरे में ही उड़ते हैं।, हालाँकि दिन में सक्रीय पतंगों की भी कई जातियाँ हैं। तितलियाँ रात के समय आराम करती हैं, और दिन के दौरान सक्रिय होते हैं। लगता हैं इन जीवों ने चांद-सूरज को आपस में बांट लिया है।

अब यदि आप तितलियों को पकड़ना चाहते हैं और पतंगो से तितलियों को प्रभावी रूप से पहचानना चाहते हैं, तो इन सभी महत्वपूर्ण आकृति निशानियों और उनकी गतिविधियों के समय के अंतरों का ध्यान रखें। तितलियों को दिन के दौरान शिकार करना आदर्श होगा, जब वे स्वतंत्र रूप से उड़ रही हों, और पतंगों के लिये रात का समय या आप दिन के दौरान भी पतंगों को पकड़ सकते हैं, जब वे आराम कर रहे होते हैं।

संदर्भ:
1.https://en.wikipedia.org/wiki/Comparison_of_butterflies_and_moths
2.https://australianmuseum.net.au/what-are-the-differences-between-butterflies-and-moths
3.https://easyscienceforkids.com/all-about-butterflies-and-moths/

http://prarang.in/Lucknow/1810181963





सोने से भी महंगा है इत्र का अउद तेल

Lucknow
17-10-2018 01:24 PM

परफ्यूम (Perfume) एक ऐसा सुगंधित पदार्थ होता है जिसका इस्तेमाल प्राचीनकाल से होता आया है। बेहतरीन परफ्यूम हर युग में हमेशा से ही लोगों को आकर्षित करते आ रहे हैं और लोगों के पसंदीदा रहे हैं। खासकर यूरोप के बाज़ार में परफ्यूम या सेंट (Scent) की मांग पहले से ही काफी अधिक है। क्या आपको मालूम है कि दुनिया में एक परफ्यूम ऐसा भी है, जो सोने से भी महंगा है? और क्या आपको मालूम है कि ‘अउद’ का तेल (Oud oil) क्या है और यह किस काम आता है?

अगर आपको इन दोनों सवालों के जवाब नहीं पता, तो आपको ये भी नहीं मालूम होगा कि अउद और परफ्यूम दोनों का गहरा नाता है। तो, आइये दूसरे सवाल का जवाब आपको पहले बता देते हैं।

अगरवुड तेल, जिसे अउद तेल, एलोसवुड तेल आदि कहा जाता है दुनिया में सबसे महंगी इत्र सामग्री में से एक है। इसमें एक मनमोहक सुगंध होती है जो काफी शक्तिशाली होती है और सदियों से भारत, दक्षिणपूर्व एशिया और मध्य पूर्व में इसका उपयोग किया जा रहा है। आज, पश्चिमी देशों में इसे पुरुषों और महिलाओं के लिए कई परफ्यूम में सुगंध देने के लिए उपयोग कर रहे हैं। यह तेल अगरवुड पेड़ों की कई प्रजातियों से प्राप्त एक बेहद दुर्लभ और बहुमूल्य प्राकृतिक तेल है। अगर (Agar) मूल रूप से एशिया महाद्वीप का वृक्ष है। यह भारत के साथ चीन, बांग्लादेश, जापान आदि में भी पाया जाता है। भारत में यह उत्तर भारत के पूर्वी भागों त्रिपुरा, नागालैंड, असम में पाया जाता है।

यह एक उपयोगी और व्यावसायिक महत्त्व का वृक्ष है। इसकी लकड़ी आरम्भ में साधारण पीले रंग की होती है एवं इसमें किसी प्रकार की कोई सुगंध नहीं होती है। कुछ समय बाद इसके तने और शाखाओं पर एक कवक फिआलोफोरा पैरासिटिका (Phialophora parasitica) का आक्रमण होता है, जिससे एक विशिष्ट रस निकलता है। यह रस अगर की लकड़ी को काला, भारी और सुगंधित बना देता है। इसकी लकड़ी की राल से अउद तेल निकाला जाता है, जिसका उपयोग बेशक़ीमती इत्र बनाने में ही नहीं वरन् अगरबत्ती (अगर+बत्ती) बनाने में भी होता है। शायद यही कारण है कि हमारे देश में अगरबत्ती के करोड़ रूपये के व्यापार के चलते "अगरबत्ती" और "अगरतला" (त्रिपुरा) जैसे शहरों के नाम रखे गये हैं। ऊपर दिया गया चित्र अगरतला का ही है जिसमें कुछ अगर के पेड़ भी दिखाई पड़ते हैं। साथ ही अउद के तेल का नाम भी शायद इसलिए ही अउद पड़ा क्योंकि पुराने समय में अवध से कई इत्र के व्यापारी भारत से बाहर इन्हें बेचने जाते थे।

एक सुगंधित घटक के रूप में अउद का एक लंबा इतिहास रहा है। तीसरी शताब्दी ईस्वी से ही चीन के लोग इस पेड़ की लकड़ी को धूप बत्ती के लिए बहुत इस्तेमाल करते थे। भारत में भी इसे सदियों से धूप के रूप में जलाया गया है। हालांकि इस्लामी दुनिया में, यह एक तेल के रूप में और व्यक्तिगत इत्र के रूप में मूल्यवान रहा है। आज की तारीख़ में अगर की लकड़ी से निकलने वाले तेल का इत्र दुनिया भर में बेहद मशहूर है। वर्तमान में दुबई को दुनिया की अउद राजधानी कहा जाता है। यहां कच्ची सामग्री को बड़े पैमाने पर खरीदा और बेचा जाता है।

दुनिया भर में अगर की लकड़ी की इतनी मांग है कि इसे पूरा करना मुश्किल हो रहा है। आज की तारीख़ में अगरवुड की नस्ल के कुछ ही पेड़ बचे हैं। इसकी कम मात्रा, उच्च मांग, और इसे काटने में आने वाली कठिनाई के कारण, ये तेल दुनिया का सबसे महंगा तेल है। इसकी कीमत लगभग 5,000 डॉलर प्रति पौंड (0.45 किलो) हो सकती है। आज की तारीख़ में इसका वार्षिक बाजार क़रीब 6 बिलियन डॉलर का है और इसका मूल्य अक्सर सोने के मूल्य से ढाई गुना अधिक अनुमानित किया जाता है। इन कारणों से इसे ‘तरल सोने’ के रूप में भी जाना जाता है।

अउद के तेल को पोलो सुप्रीम अउद (Polo Supreme Oud), रीस ब्लैक अउद (Reiss Black Oud), क्रीड रॉयल अउद (Creed Royal Oud), वर्साचे अउद (Versace Oud) और बॉस बोटल्ड अउद (Boss Bottled Oud) जैसी महंगें परफ्यूम तैयार करने में इस्तेमाल किया जाता है।

संदर्भ:
1.https://www.townandcountrymag.com/style/beauty-products/a1935/oud-perfume/
2.https://www.liveabout.com/what-is-oud-oudh-346101
3.https://www.gq-magazine.co.uk/article/best-mens-oud-fragrances-guide

http://prarang.in/Lucknow/1810171958





भारतीयों के साथ किया गया नस्लवाद छपा था पोस्टकार्ड में

Lucknow
16-10-2018 02:15 PM

तस्‍वीरें बिना कुछ कहे बहुत कुछ बयां कर देती हैं। ऐसा ही कुछ नज़ारा देखने को मिला लंदन के SOAS विश्‍व विद्यालय में लगी एक प्रदर्शनी में जिसमें 1900-1930 के दौरान भारत से यूरोप भेजे गये 300 पोस्‍ट कार्डों को प्रदर्शित किया गया। इन पोस्‍टकार्डों में तत्‍कालीन समाज के प्रत्‍येक वर्ग की तस्‍वीरों को दर्शाया गया था। इन पोस्‍टकार्डों को हम 19वीं सदी के भारत का इंस्‍टाग्राम (Instagram) भी कह सकते हैं। औपनिवेशिक काल के दौरान संचार के लिए पोस्‍टकार्ड एकमात्र अच्‍छा विकल्‍प था। कम मूल्‍य का होने के कारण उच्‍च, मध्‍यम और निम्‍न वर्ग तीनों के मध्‍य पोस्टकार्ड समान रूप से लोकप्र‍िय हो गया था। 1902-1910 के बीच 6 अरब पोस्‍टकार्ड मात्र ब्रिटिश डाक द्वारा जारी किये गये थे। इन आंकड़ों से आप इनकी लोकप्रियता का अनुमान लगा सकते हैं।


पोस्‍टकार्ड भेजने के लिये किसी प्रकार के लिफाफे की आवश्‍यकता नहीं होती थी। इन पोस्‍टकार्डों के चित्र प्रारंभिक भारतीयों का जीवन, नस्‍लवाद-रूढ़िवाद, शहरीकरण, धर्म और ब्रिटिश शासन के दौरान दैनिक जीवन आदि पर केंद्रित होते थे। इन चित्रों के माध्‍यम से उस दौरान के प्रत्‍येक वर्ग की जीवन शैली को अत्‍यन्‍त करीब से दर्शाया गया है। मद्रास और बैंगलुरू के क्षेत्र के फोटोग्राफर (Photographer) और स्‍टूडियो (Studio) यूरोप में तक प्रसिद्ध थे, इस कारण अधिकांश पोस्‍टकार्ड इसी क्षेत्र से पारित किये जाते थे। इनमें आप कहीं अंग्रजों के ठाट बाट तो कहीं गरीबों की दयनीय स्थिति को देख सकते हैं। साथ ही उस दौरान की इमारतों और सड़कों के चित्र (बैंगलुरू) लोगों के मध्‍य अत्‍यंत प्रिय थे, इसमें भारतीय और यूरोपियों के मध्‍य अंतर स्‍पष्‍ट झलकता है।


कुछ चित्रों में महिलाओं को जूं निकालते हुए दर्शाया गया है, तो कुछ में एक भारतीय व्‍यक्ति को यूरोपीय को नहलाते (मद्रास) हुए दर्शाया गया है। इन पोस्‍टकार्डों में कुछ लोगों के व्‍यवसाय को भी दर्शाया गया है जैसे-धोबी, घर के मुलाज़िम, फल विक्रेता (मद्रास) आदि। इनके चित्रों में भारतीय अक्‍सर उनके रंग-रूप, धर्म, रोजगार आदि से जाने जाते थे। इन तस्‍वीरों में प्रदर्शित नस्‍लवाद विवाद का कारण बना। पोस्‍ट कार्ड में कुछ तस्‍वीरें ऐसी भी थीं जिसमें भारतीय और उनके ‘मास्टर’ (यूरोपियों) के बीच के सम्बन्ध पर व्यंग्य किया गया था।


इन पोस्‍टकार्डों के माध्‍यम से ब्रिटिश, भारत में अपनी और भारतीयों की स्थिति को विश्‍व के सामने रखना चाहते थे। भारत की देवांगना कुमार (लोकसभा अध्‍यक्ष मीरा कुमार की बेटी) द्वारा औपनिवेशिक काल के दौरान की कुछ तस्‍वीरों की प्रदर्शिनी लगायी गयी, जिसमें भारतीय माली, दूध वाले, बावर्ची, घर की कामकाजी महिलाओं आदि की तस्‍वीरें हैं। इनकी वेशभूषा यूरोपियों की इनके प्रति मानसिकता को स्‍पष्‍ट झलकाती है। इनके संग्रह में औपनिवेशिक समाज के इस वर्ग के प्रति सहानुभूति दर्शायी गयी है।

संदर्भ:
1.https://www.bbc.com/news/amp/world-asia-india-45506092?__twitter_impression=true
2.https://qz.com/india/1384146/postcards-were-the-instagram-of-colonial-india/
3.http://www.rediff.com/getahead/slide-show/slide-show-1-specials-vintage-pics-the-servants-of-the-british-raj/20121111.htm
4.https://www.thehindu.com/features/friday-review/art/the-picture-is-the-message/article5189785.ece
5.https://www.thehindu.com/features/friday-review/art/altering-the-gaze/article3811736.ece

http://prarang.in/Lucknow/1810161956





आयकिया (IKEA) के संस्थापक ने दिए सफलता के 9 सिद्धांत

Lucknow
15-10-2018 02:50 PM

आज वैश्वीकरण के इस दौर में कई कंपनियाँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना विस्तार करने में फ़्रैंचाइज़ी (Franchisee) का उपयोग दूसरे देशों में निवेश करने के लिये कर रही हैं। यह दुनिया में कई आयामों के साथ लोकप्रिय हो रहा है। फ्रेंचाइजिंग वृहत वैश्विक मान्यता वाला एक व्यापार प्रारूप है। हाल ही में आयकिया (स्वीडिश कंपनी (IKEA)) वैश्विक फ्रैंचाइज़र (Franchiser) के रूप में दुनिया के सामने उभरकर आयी है। इसने अलग-अलग देशों में अपने कई स्टोरों की स्थापना की है। आयकिया दुनिया भर में सबसे अच्छी मान्यता प्राप्त फर्नीचर ब्रांडों में से एक है और आज ये निश्चित रूप से फर्नीचर और घरेलू उत्पादों की बिक्री में सबसे प्रमुख बन गये है।

इस कंपनी की स्थापना 1943 में एक 17 वर्षीय स्वीडिश लड़के ‘इंग्वार कामप्राड’ ने की थी। सालों बाद यह लगभग 39.3 अरब डॉलर से अधिक के कुल मूल्य के साथ एक शक्तिशाली विशालकाय कंपनी बन गयी। आज इंग्वार कामप्राड विश्व में 10वें सबसे अमीर व्यक्ति हैं और यूरोप में वे दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति हैं।

हाल ही में हैदराबाद में आयकिया (IKEA) ने अपना भारत का पहला स्टोर खोला। हैदराबाद की हाईटेक सिटी (High tech City) में आयकिया का यह स्टोर 105 अरब रुपये (1.5 अरब डॉलर) निवेश के साथ 4,00,000 वर्ग फुट में बना है। इस स्टोर में 1,000 उत्पाद मिलेंगे, जिनमें से कुछ उत्पाद ऐसे हैं, जिनकी कीमत 200 रुपये से भी कम है। इस वजह से आयकिया को उम्मीद है कि प्रति वर्ष 7 मिलियन लोग स्टोर में खरीददारी करने आएंगे। आयकिया अगले साल ई-कॉमर्स वेबसाइट (e-commerce) को लांच करने की योजना भी बना रही है। कंपनी का लक्ष्य 2025 तक पूरे देश में 25 स्टोर खोलने का है। अगला स्टोर मुंबई में 2019 में खुलेगा, इसके बाद बैंगलोर, गुड़गांव और दिल्ली के बाहरी इलाके में स्टोर स्थापित किए जाने की बात कही गई है। आयकिया हैदराबाद में अपने स्टोर से सीधे 950 लोगों को रोज़गार देगा। इस स्टोर की खास बात यह है कि लोगों को फर्नीचर के अलावा यहाँ भारतीय व्यंजन जैसे समोसा और डोसे का भी स्वाद मिलेगा। आयकिया ने अपने इस स्टोर में हज़ार सीटों की क्षमता वाला एक रेस्टोरेंट भी खोला है।

कंपनी के संस्थापक इंग्वार कामप्राड खुदरा व्यापार और उनके व्यवसाय के प्रबंधन के बारे में अपने विशिष्ट विचारों के लिए जाने जाते हैं। आयकिया (IKEA) की सफलता में इंग्वार कामप्राड के खास सिद्धांतों का योगदान रहा है। आयकिया (IKEA) की सफलता की कहानी से इंग्वार कामप्राड के निम्नलिखित सिद्धांतों को जाना जा सकता है, जिन्हें उन्होंने आयकिया में लागू किया और दुनिया का सबसे बड़ा फर्नीचर साम्राज्य बनाया:

1. उत्पाद रेंज - हमारी पहचान
आयकिया के फर्नीचर अच्छी तरह से डिज़ाइन (Design) और क्रियाशील हों और उन्हें बेहद कम कीमत पर बेचा जाना चाहिए। आयकिया का लक्ष्य कम कीमतों के साथ अच्छे डिज़ाइन, अच्छा कार्य और अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पादों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचना है।

2. आयकिया भावना - एक मजबूत और जीवित वास्तविकता
आयकिया की असली भावना आज भी उत्साह, नवीकरण, लागत सतर्कता, ज़िम्मेदारी लेने और मदद करने के जोश, काम के प्रति नम्रता और सादगी पर आधारित है।

3. लाभ हमें संसाधन देता है
कामप्राड लिखते हैं- हमारा उद्देश्य जनता के लिए बेहतर रोज़मर्रा की जिंदगी देना है। उस तक पहुंचने के लिए, आयकिया को वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता है। वित्तीय संसाधनों का निर्माण करने में हमारा उद्देश्य लंबी अवधि में अच्छे नतीजे तक पहुंचना है। उसके लिये सबसे कम कीमतों पर बिक्री करनी होगी, और उन्हें अच्छी गुणवत्ता भी देनी होगी। संसाधनों को बर्बाद किए बिना कंपनी को लाभ और प्रगति के मार्ग पर ले जाना होगा।

4. छोटे साधनों के साथ अच्छे परिणाम तक पहुंचना
एक डेस्क डिज़ाइन करने के लिए जिसे 5000 क्रोना (स्वीडिश मुद्रा) का खर्च हुआ हो, यह कोई मुश्किल कार्य नहीं है, लेकिन एक कार्यात्मक और अच्छे डेस्क को डिज़ाइन करने के लिए जो केवल 100 क्रोना का खर्च करता है, वो सबसे अच्छे फर्नीचर डिज़ाइनर द्वारा किया जा सकता है। छोटे साधनों या बहुत सीमित संसाधनों के साथ भी अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।

5. सरलता एक गुण है
कामप्राड लिखते हैं- सरल दिनचर्या का अधिक प्रभाव पड़ता है। हमें फैंसी कारों (Fancy Cars), बड़े-बड़े खिताबों, महंगे कपड़ों, या अन्य प्रतीकों की आवश्यकता नहीं है। हम अपनी ताकत और अपनी सादगी पर भरोसा करते हैं।

6. एक अलग तरीके से कार्य करना
वह लिखते हैं- नए रास्ते को अपनाकर भी प्रगति की जा सकती है। हम हमेशा पुराने तरीके ही स्वीकार कर लेते हैं, क्योंकि वे अच्छी तरह से स्थापित हैं। बल्कि नए रास्तों से भी प्रगति की जा सकती है।

7. एकाग्रता - हमारी सफलता के लिए महत्वपूर्ण है
जब एक नया मार्केट का निर्माण करते हैं, तो मार्केटिंग पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार समय की मांग के अनुसार अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

8. जिम्मेदारी लेना - एक विशेषाधिकार
कामप्राड अपने सहकर्मियों से निर्णय और जिम्मेदारी लेने के अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करने के लिए कहते हैं। जिम्मेदारी लेने वाले हर प्रणाली में आवश्यक होते हैं। जो औसत दर्जे के लोग हैं वो हमेशा अपने कर्तव्य से भागते हैं और अपना समय खुद को सही साबित करने में लगाते हैं। जबकि सकारात्मक व्यक्ति हमेशा आगे देखता है। उत्तरदायित्व लेने वाले हर प्रणाली में आवश्यक हैं।

9. ज्यादातर चीजें अभी भी किये जाने के लिये बाकी हैं। एक शानदार भविष्य!
लक्ष्य पूर्ण हो जाने की भावना एक प्रभावी नींद वाली गोली है। यह भावना आप में केवल ठहराव का कारण बनती है। जबकि कामप्राड के अनुसार सच्ची खुशी आपको सिर्फ लक्ष्य तक पहुंचकर नहीं मिलती है, बल्कि उस तक पहुँचने के मार्ग में मिलती है।

संदर्भ:
1.https://goo.gl/R7i3yA
2.https://nordic.businessinsider.com/ikeas-billionaire-creator-turns-90-today--heres-how-he-built-the-worlds-largest-furniture-store-2017-6/
3.https://money.cnn.com/2018/08/08/news/companies/ikea-in-india-hyderabad/index.html

http://prarang.in/Lucknow/1810151952





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