Writer:
Stephen Markel, Tushara Bindu Gude, Muzaffar Alam, Los Angeles County Museum of ArtPublisher:
Los Angeles County Museum of ArtTags:Art Objects - Art/Beauty
2.
WAILING BEAUTY : The Perishing Art of Nawabi Lucknow
Writer:
Sir William Henry Sleeman, Peter Denis REEVESPublisher:
Saiyed Anwer AbbasTags:Art Objects - Art/Beauty
हिंदी-उर्दू भाषा और लखनऊ के इतिहास, तहज़ीब, कारीगरी और कबाब में छिपे ईरान के गहरे राज़
क्या आपको पता है कि भारत और ईरान का रिश्ता आधुनिक राजनीति और देशों की वर्तमान सीमाओं से कहीं ज़्यादा पुराना है। जब 60,000 साल पहले इंसानों ने अफ्रीका से बाहर क़दम रखा था, तब वे फ़ारसी तटों के साथ चलते हुए ही दक्षिण एशिया तक पहुंचे थे। यह रिश्ता सिंधु घाटी सभ्यता के समय से और भी गहरा हो गया था, जो कि शुरुआती एलामाइट और मेसोपोटामिया संस्कृतियों के बिल्कुल समकालीन थी और जिनके साथ प्राचीन ईरान का सीधा संपर्क रहता था। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि डेरियस प्रथम (Darius I) के नेतृत्व में हखामनी साम्राज्य ने 516 ईसा पूर्व में उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों यानी सिंध और पंजाब पर कब्ज़ा कर लिया था और इसे अपने विशाल साम्राज्य का बीसवां प्रांत बना लिया था। यह क्षेत्र न केवल आर्थिक रूप से बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण था, बल्कि इसने यूनान के ख़िलाफ़ ज़ेरेक्सिस के सैन्य अभियानों के लिए सैनिक भी मुहैया कराए थे। भारत पर इसी ईरानी प्रभाव के साथ खरोष्ठी लिपि का भी प्रवेश हुआ, जो मूल रूप से अरामी भाषा से निकली थी और इसे उर्दू की ही तरह दाएं से बाएं लिखा जाता था। यह लिपि तीसरी शताब्दी तक उत्तर-पश्चिमी भारत में मज़बूती से मौजूद रही। यहाँ तक कि सम्राट अशोक के मशहूर शिलालेख और उनके नैतिक नियम भी इसी ईरानी शाही घोषणाओं की शैली से प्रेरित थे। अशोक के स्तंभों पर जो घंटी के आकार के शीर्ष दिखाई देते हैं, वे ईरान के पर्सिपोलिस (Persepolis) में पाए जाने वाले स्तंभों से बेहद मिलते-जुलते हैं। पर्सिपोलिस आधुनिक आनुवंशिक शोध भी आज इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, ख़ासकर हमारे उत्तरी और मध्य क्षेत्रों में, प्राचीन ईरानी किसानों के साथ अपनी गहरी आनुवंशिक विरासत साझा करता है। आज भी रिज़वी (Rizwi), काज़मी (Kazmi) और नक़वी (Naqvi) जैसे कई प्रमुख भारतीय शिया परिवार अपनी जड़ें सीधे ईरान से ही जोड़ते हैं। ईरान में आज भी अल्पसंख्यक पूरी सुरक्षा के साथ रहते हैं। वहाँ 19वीं सदी में भारतीय व्यापारियों द्वारा बनाए गए दो हिंदू मंदिर और चार प्रमुख गुरुद्वारे आज भी मौजूद हैं जहाँ लोग शांति से पूजा करते हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान भी भारत और ईरान के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध न केवल बनाए रखे गए बल्कि उन्हें संस्थागत रूप भी दिया गया। व्यापार फला-फूला और आध्यात्मिक संबंध बने रहे। आज़ादी के बाद भी भारत और ईरान ने सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे। हालाँकि, हाल के दशकों में सामरिक बदलावों, ख़ासकर इज़राइल और अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती नज़दीकियों ने इस गतिशीलता को बहुत प्रभावित किया है। साल 2005 में एक बड़ा मोड़ तब आया जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र में ईरान के परमाणु कार्यक्रम के ख़िलाफ़ वोट दिया। इसके बावजूद व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान आज भी जारी है। इंडो-आर्यन और ईरानी भाषाओं के बीच क्या समानताएं हैं?भारत की सबसे पुरानी भाषाओं में से एक संस्कृत का सीधा और गहरा संबंध इंडो-ईरानी भाषा परिवार से है। 1500 ईसा पूर्व में शुरू हुए वैदिक काल और उसके बाद के हज़ारों सालों तक भारतीय संस्कृति ने ईरान से बहुत कुछ ग्रहण किया। प्राचीन ईरानी भाषा और वैदिक संस्कृत में इतने सारे शब्द एक जैसे हैं कि भाषाविज्ञानी भी हैरान रह जाते हैं। उदाहरण के लिए, ईरानी धर्मगुरु ज़रथुस्त्र (Zarathustra) ने अहुर मज़्दा का उपदेश दिया था। यह ईरानी शब्द अहुर हमारे वेदों में असुर है। इसी तरह प्राचीन ईरान का अशा हमारे उपनिषदों के ईशा के बिल्कुल समान है। ईरानी भाषा के हवान, यस्न, जरन्य, नामन और सेना जैसे शब्द वैदिक संस्कृत के हवन, यज्ञ, हिरण्य, नामन और सेना ही हैं। दोनों महान परंपराओं की कविता के मीटर भी काफी मिलते-जुलते हैं। प्राचीन ईरानी कविता के मीटर वेदों के त्रिष्टुभ मीटर के बहुत क़रीब हैं। इतना ही नहीं, हमारी रोज़मर्रा की बातचीत में इस्तेमाल होने वाले बहुत से शब्द सीधे फ़ारसी से ही आए हैं। चादर, ज़मीन, दिल, चेहरा, ज़रूरी, दीवाना, ख़ूब, रंग, नारंगी, सफ़ेद, हमेशा, शायद, ख़राब, ख़ाली, गाय, मुर्ग़ी और चर्बी जैसे शब्द पूरी तरह से फ़ारसी के हैं, जिन्हें आज हम आम हिंदी और उर्दू में धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। इतिहास इस बात का भी गवाह है कि 17वीं शताब्दी में जब मराठा साम्राज्य के छत्रपति शिवाजी को दक्कन क्षेत्र में मुग़ल सेना के सेनापति राजस्थानी जय सिंह से कोई बातचीत करनी होती थी, तो वे संचार के लिए फ़ारसी भाषा का ही उपयोग करते थे। जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने सूरत में अपना पहला कार्यालय शुरू किया, तो सर थॉमस रो को स्थानीय भारतीय अधिकारियों के साथ संवाद करने के लिए फ़ारसी अनुवादकों को नौकरी पर रखना पड़ा था। यहाँ तक कि समाज सुधारक राजा राममोहन राय द्वारा लिखी गई सबसे पहली किताब भी फ़ारसी में ही रची गई थी। शाह, नामदार या नरीमन जैसे भारतीय नाम भी असल में फ़ारसी मूल के ही हैं। दोनों सभ्यताओं की काव्य और साहित्यिक परंपराएं कैसी रही हैं?साहित्य और दर्शन के क्षेत्र में भी दोनों ही सभ्यताओं ने पूरी दुनिया को महान और कालजयी रचनाएं दी हैं। अगर हम भारतीय उपमहाद्वीप के संस्कृत साहित्य की बात करें, तो यह आर्यों द्वारा रचित एक अत्यंत विशाल और समृद्ध संग्रह है। आर्य लोग शायद दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के दौरान उत्तर-पश्चिम की दिशा से भारतीय उपमहाद्वीप में आए थे। धीरे-धीरे यह विशाल साहित्य उस ब्राह्मणवादी समाज की अभिव्यक्ति का मुख्य और सबसे ताक़तवर ज़रिया बन गया। 1500 ईसा पूर्व से शुरू हुए गौरवशाली वैदिक काल के बाद, संस्कृत साहित्य का शास्त्रीय काल 500 ईसा पूर्व से लेकर लगभग 1000 ईसवी तक चला। इस साहित्य ने पूरे क्षेत्र में एक मुख्य सांस्कृतिक शक्ति के रूप में ख़ुद को स्थापित किया। दक्षिण में शुरू हुए भक्ति साहित्य ने उत्तर भारत में ज़ोर पकड़ा और इसने वर्ण व्यवस्था पर आधारित सामाजिक पदानुक्रम के विचार को एक गंभीर चुनौती दी।मौलाना जलालुद्दीन बल्खीवहीं दूसरी ओर, फ़ारसी और सूफ़ी काव्य परंपरा में मौलाना जलालुद्दीन बल्खी (Maulana Jalaluddin Balkhi) का नाम सबसे ऊंचे मुक़ाम पर आता है, जिन्हें आज पूरी दुनिया रूमी के नाम से जानती है। उनका जन्म 30 सितंबर 1207 को फ़ारसी साम्राज्य के पूर्वी छोर पर मौजूद बल्ख प्रांत में हुआ था। जब वे युवा ही थे, तब चंगेज़ ख़ान की हमलावर सेना के खौफ़ से बचने के लिए उनके पिता अपने परिवार को लेकर पश्चिम की ओर चले गए और वर्तमान तुर्की में बस गए। 1244 में उनकी मुलाक़ात शम्स तबरीज़ नाम के एक फ़क़ीर से हुई। रूमी ख़ुद यह मानते थे कि उनकी असली कविता शम्स से मिलने के बाद ही निखर कर सामने आई। शम्स के अचानक ग़ायब होने के बाद रूमी ने उनके गहरे वियोग में 40,000 से ज़्यादा शानदार गीत और छंद लिखे। इस महान संग्रह को दीवान-ए-शम्स-ए-तबरीज़ी कहा जाता है। अपने जीवन के आख़िरी 12 सालों में रूमी ने 64,000 पंक्तियों वाली अपनी सबसे महान रचना मसनवी-ए-मानवी (Masnavi-e-manavi) भी अपने मुंशी को बोलकर लिखवाई। इस मसनवी को कुछ सूफ़ी विचारक फ़ारसी भाषा का क़ुरान भी मानते हैं। संगीत के क्षेत्र में अमीर खुसरो ने भारत की कई स्थायी संगीत परंपराओं की नींव रखी, और उन्होंने भी अपना ज़्यादातर काम फ़ारसी में ही किया था। लखनऊ और ईरान के बीच इस गहरे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जुड़ाव का एक और बेहद अहम पहलू ईरान के पहले सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी (Ayatollah Ruhollah Khomeini) से भी जुड़ता है। शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि 1979 की इस्लामी क्रांति के प्रणेता खुमैनी की जड़ें असल में उत्तर प्रदेश की इसी ज़मीन से जुड़ी हुई थीं। उनके दादा, सैयद अहमद मूसवी, लखनऊ से महज़ कुछ दूरी पर स्थित बाराबंकी के पास पैदा हुए थे। 1830 के दशक में जब वे भारत से इराक और फिर बाद में ईरान के खुमैन शहर में जाकर बसे, तब भी उन्होंने अपनी भारतीय जड़ों और अपनी जन्मभूमि की पहचान को कभी नहीं भुलाया। इसी पहचान को आजीवन जीवित रखने के लिए उन्होंने अपने नाम के साथ हमेशा "हिंदी" उपनाम जोड़े रखा।अहमद हिंदी एक प्रखर विद्वान थे और उनके इसी गहरे शिया विश्वास और आध्यात्मिक मूल्यों की विरासत ने अयातुल्ला खुमैनी के वैचारिक दृष्टिकोण को इतनी गहराई से आकार दिया। यह उनके दादा से मिले इन्हीं संस्कारों का प्रभाव था जिसने खुमैनी को एक सुन्नी-बहुल मध्य पूर्व (Middle East) के बीच ईरान के शिया भविष्य को एक नई दिशा देने और उसे एक शक्तिशाली शिया राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की प्रेरणा दी। लखनऊ और बाराबंकी से जुड़ा यह एक इतना सशक्त और प्रसिद्ध ऐतिहासिक तथ्य है जिससे यहाँ के ज़्यादातर लोग भली-भांति परिचित हैं। ज़ाहिर है, इस महत्वपूर्ण कड़ी को शामिल किए बिना भारत और ईरान, ख़ासकर अवध और फ़ारस के रिश्तों की कहानी पूरी तरह अधूरी ही मानी जाएगी।लखनऊ की नवाबी तहज़ीब और ईरान के बीच क्या गहरा नाता है?लखनऊ की पूरी संस्कृति, वास्तुकला और मशहूर तहज़ीब पर ईरानी प्रभाव बिल्कुल साफ़ और जीवंत देखा जा सकता है। अवध के इन्हीं नवाबों ने लखनऊ को उत्तर भारत का सबसे परिष्कृत शहर बनाया था। ये शिया मुस्लिम शासक अपने पूर्वजों के तार सीधे ईरान के निशापुर शहर से जोड़ते थे। वे 15वीं शताब्दी के सैय्यद सुल्तानों के समय गंगा के मैदानी इलाक़ों में आकर बसे थे। 1707 में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद पैदा हुई राजनीतिक अराजकता का भरपूर फ़ायदा उठाते हुए ये नवाब मुग़ल साम्राज्य के कमज़ोर होने पर धीरे-धीरे स्वतंत्र शासक बन गए। नवाब आसफ़-उद्दौला और उनके बाद वाजिद अली शाह के शानदार शासनकाल में ईरान से पूरी तरह प्रभावित लखनऊ की यह कलात्मक नवाबी संस्कृति अपने चरम शिखर पर पहुँच गई। शासक और दरबारी बेहतरीन मलमल के लंबे कपड़े और उन पर खूबसूरत ब्रोकेड कोट पहना करते थे। आज भी लखनऊ के पुराने मोहल्लों और ऐतिहासिक इमारतों में यह खूबसूरत ईरानी झलक क़ायम है। नवाब आसफ़-उद्दौला द्वारा बनवाया गया विशाल आसफ़ी इमामबाड़ा शिया धार्मिक अनुष्ठानों का एक प्रमुख केंद्र है। मोहर्रम के दौरान पैगंबर के पोते इमाम हुसैन की शहादत की याद में जो ख़ूबसूरत ताज़िया बनाए जाते हैं, वे असल में हुसैन के मक़बरे की ही हूबहू प्रतिकृतियां होते हैं। लखनऊ की विश्व प्रसिद्ध चिकनकारी, ख़ासकर बारीक मलमल के कपड़े पर सफ़ेद धागे से की जाने वाली जादुई कढ़ाई, इसी परिष्कृत ईरानी संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। पुराने शहर की गलियों में आपको आज भी क़ुरान रखने के स्टैंड बनाने वाले, ताज़िया बनाने वाले कारीगर और पीतल का काम करने वाले आसानी से मिल जाएंगे। खान-पान की बात करें तो इदरीस की दुकान पर कोयले की धीमी आंच पर एक बड़े बर्तन में पकने वाली मटन बिरयानी, मुबीन का लज़ीज़ मुर्ग़ और निहारी कुल्चा, और मशहूर गलावटी कबाब जिसमें 160 प्रकार के विशेष मसाले पड़ते हैं, इसी समृद्ध नवाबी और ईरानी पाक कला की विरासत की देन हैं। लखनऊ, उत्तर प्रदेश और ईरान का रिश्ता केवल इतिहास तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह राजनीतिक रूप से भी अक्सर चर्चा के केंद्र में रहता है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ईरान के पहले सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी (Ayatollah Khomeini) और उत्तर प्रदेश के बीच के ऐतिहासिक संबंध को समझाने वाली ख़बरें भी प्रमुखता से छपी हैं। इन ताज़ा ख़बरों के केंद्र में ईरान की वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति और अमेरिका तथा इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए ताज़ा हवाई हमले हैं। इन भयानक हमलों में ईरान के मौजूदा सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई और उनके परिवार के कई सदस्यों के मारे जाने की बात सामने आई है। इस बड़ी घटना के बाद पूरे ईरान में 40 दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। ये तमाम आधुनिक घटनाक्रम और पुरानी ऐतिहासिक कड़ियाँ इस बात को पूरी तरह से साबित करती हैं कि भारत, ख़ासकर उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर और ईरान के बीच के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक संबंध कितने गहरे और अटूट हैं। सन्दर्भ 1. https://tinyurl.com/25bjytc62. https://tinyurl.com/23lrv9j53. https://tinyurl.com/yblyj7v64. https://tinyurl.com/2y3r4hr45. https://tinyurl.com/24mnzghf6. https://tinyurl.com/25kj4ovc
ध्वनि II - भाषाएँ
विश्व में हुआ मुद्रण का आरंभ: सिद्धम लिपि में लिखे धरणी बौद्ध मंत्रों के प्रचारण से
लखनऊ, क्या आप जानते हैं कि "धरणी" संस्कृत मंत्र क्या हैं? दरअसल, दुनिया में प्रिंटिंग (मुद्रण) की सबसे पहली तकनीक (चीन, कोरिया और जापान में) इन्हीं धरणी मंत्रों को रिकॉर्ड करने, दोहराने और प्रचारित करने के लिए शुरू की गई थी। आइए, आज इसके पीछे मौजूद संभावित कारणों और इतिहास को समझते हैं। अधिकांश धरणी "सिद्धम" लिपि में हैं, जिसका उपयोग शुरूआत में भारत में होता था। सिद्धम लिपि एक आबूगीदा या वर्णमाला लिपि है, जो आधुनिक भारतीय लिपियों से निकटता से संबंधित है। चलिए पढ़ते हैं।धरणी, जिन्हें विद्या और परिता के नाम से भी जाना जाता है, लंबे बौद्ध मंत्र हैं, जो स्मरणीय कोड, मंत्र या सस्वर पाठ के रूप में कार्य करते हैं। लगभग सभी धरणी मंत्र संस्कृत में रचे गए थे, हालांकि कुछ धरणी पाली भाषा में भी मिलते हैं। माना जाता है कि, ये मंत्र बौद्ध साधकों के लिए सुरक्षा रुपी कवच बनकर, उन्हें आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी ले जाने की शक्ति रखते हैं। यही वजह है कि ये मंत्र ऐतिहासिक बौद्ध साहित्य का एक बड़ा हिस्सा हैं। अधिकांश संस्कृत धरणी को 'सिद्धम' जैसी लिपियों में लिखा गया है, जिसका चीनी, कोरियाई, जापानी, वियतनामी, सिंहली, थाई आदि क्षेत्रीय लिपियों में लिप्यंतरण (Transliteration) किया जा सकता है। ये मंत्र वैदिक मंत्रों और पाठों के समान ही हैं, और उनकी निरंतरता को दर्शाते हैं।धरणी मंत्र बौद्ध धर्म की सभी प्रमुख परंपराओं के प्राचीन ग्रंथों में पाए जाते हैं। ये थेरवाद परंपरा द्वारा संरक्षित 'पाली कैनन' (Pali Cannon) का एक बड़ा हिस्सा हैं। 'सद्धर्मपुण्डरीक सूत्र' (कमल सूत्र) और 'हृदय सूत्र' जैसे महायान सूत्रों में भी धरणी मंत्र शामिल हैं, या उनके अंत में ये मंत्र दिए गए हैं। 'पंचरक्षा' जैसे कुछ बौद्ध ग्रंथ, पूरी तरह से धरणी को ही समर्पित हैं। ये नियमित अनुष्ठानिक प्रार्थनाओं का हिस्सा होने के साथ-साथ अपने आप में एक ताबीज या भाग्य आकर्षक भी माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इनका पाठ करने से दुर्भाग्य, बीमारियाँ या अन्य आपदाएँ टल जाती हैं। पूर्वी एशिया में, बौद्ध मठों के प्रशिक्षण में ये एक अनिवार्य हिस्सा थे। कुछ बौद्ध क्षेत्रों में तो इनका इतना महत्व था कि, किसी भी कारवाही की स्तिथि में, कोई गवाह सत्य बोलने की शपथ इन्हीं ग्रंथों पर हाथ रखकर लेते थे।पहली सहस्राब्दी ईस्वी में पूर्वी एशिया में 'धरणी-साहित्य' काफी लोकप्रिय हो गया था। चीनी रिकॉर्ड बताते हैं कि, ईस्वी सन् की शुरुआती शताब्दियों में ही इनका काफी प्रसार हो चुका था। तभी से ये चीन से कोरिया और जापान में पहुँचे। बौद्ध भक्तों के बीच इन छपे हुए धरणी मंत्रों की भारी मांग ने ही, शायद मुद्रण (Printing) तकनीक के विकास को प्रेरणा दी। रॉबर्ट सीवेल (Robert Sewell) और अन्य विद्वानों का मानना है कि, पूर्वी एशिया के ये धरणी रिकॉर्ड दुनिया के सबसे पुराने "प्रमाणित मुद्रित ग्रंथ" हैं। दक्षिण कोरिया के ग्योंग्जू (Gyeongju) में स्थित 'बुलगुक्सा (Bulguksa)' मंदिर से मिले आठवीं शताब्दी के शुरुआती धरणी ग्रंथों को दुनिया के सबसे पुराने ज्ञात मुद्रित ग्रंथों के रूप में मान्यता प्राप्त है। एक तरफ, कागज पर 'वुडब्लॉक प्रिंटिंग' (लकड़ी के ठप्पों से मुद्रण) का सबसे पुराना नमूना 1974 में, चीन के शियान (Xi'an) में खुदाई के दौरान मिला था। यह गांजे के रेशों से बने कागज (Hemp paper) पर छपा एक धरणी सूत्र है, जो तत्कालीन तांग राजवंश (618–907 ईस्वी) के दौरान लगभग 650 से 670 ईस्वी का है। वहीं तांग राजवंश के ही शुरुआती काल का एक और मुद्रित दस्तावेज़ मिला है, जो 690 से 699 ईस्वी के बीच छपा 'सद्धर्मपुण्डरीक सूत्र' या कमल सूत्र (Lotus Sutra) है।1966 में शोधकर्ताओं को दक्षिण कोरिया के बुलगुक्सा बौद्ध मंदिर के अंदर रेशमी कपड़े में लिपटा हुआ कागज का एक स्क्रॉल (Paper Scroll) मिला। यह 'प्योर लाइट धरणी सूत्र (Pure Light Dharani Sutra)' नामक बौद्ध सूत्र की एक प्रति थी। जोसेफ नीधम (Joseph Needham) ने 1970 में इसके लिखे जाने का समय लगभग 684 से 704 ईस्वी के बीच बताया था। बाद में, 1968 में मैकगिल विश्वविद्यालय (McGill University) ने 'ह्याकुमान्तो धरणी' (Hyakumanto Dharani) की एक प्रति हासिल की, जो मुद्रित पाठ के सबसे पुराने जीवित उदाहरणों में से एक है। इसके साथ वह छोटा लकड़ी का पैगोडा भी था, जिसमें इसे हजार साल से भी पहले रखा गया था। प्राचीन काल में माना जाता था कि, धरणी का जाप करने या उसकी प्रतिलिपि तैयार करने से व्यक्ति या पूरे देश की रक्षा होती है। जापान की महारानी - शोतोकु (Shotoku) ने आठवीं शताब्दी में बौद्ध धर्मगुरुओं को शांत करने और तब वहां हुए एक विद्रोह में मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए इन धरणी मंत्रों को छपवाया था। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, लगभग 770 ईस्वी के आसपास पूरे जापान में इस धरणी की दस लाख प्रतियाँ बनाकर बांटी गई थीं। इनमें से प्रत्येक धरणी को एक छोटे लकड़ी के पैगोडा में रखा गया था। पैगोडा का सबसे मुख्य धार्मिक कार्य बुद्ध के अवशेषों को सुरक्षित रखना और पूजा स्वीकार करना होता है। इस पैगोडा का मुख्य हिस्सा 'हिनोकी' लकड़ी से बना है और सफेद रंग से रंगा गया है। इसका शिखर चेरी के पेड़ से प्राप्त लकड़ी से बना है।ह्याकुमान्तो धरणीयह धरणी पाठ एक छोटे कागज के स्क्रॉल पर छपा है, जिसमें चीनी अक्षरों की तेईस कतारें हैं। इन प्रतियों की विशाल संख्या और छपे हुए अक्षरों की बनावट को देखते हुए, आज भी विद्वानों के बीच बहस होती है कि, क्या इन्हें लकड़ी के ब्लॉकों से छापा गया था या फिर, धातु प्रकार (Metal type) यंत्र का इस्तेमाल किया गया था? जो भी हो, उत्पादन का इतना बड़ा पैमाना सदियों तक दोबारा नहीं देखा गया।चलिए, अब हम धरणी मंत्रों की सिद्धम लिपि और आबूगीदा प्रणाली के बारे में जानते हैं। सिद्धम (जिसे कुटिला भी कहा जाता है) एक भारतीय लिपि है, जिसका उपयोग भारत में छठी से तेरहवीं शताब्दी तक किया गया था। इसे 'सिद्धमृत्का' के नाम से भी जाना जाता है। यह मध्यकालीन ब्राह्मी ‘आबूगीदा’ लिपि है, जो गुप्त लिपि से निकली है और आज की नागरी (देवनागरी), बंगाली, तिरहुता, ओडिया और नेपाली लिपियों की जननी है। भारतीय बौद्धों द्वारा सिद्धम लिपि का व्यापक रूप से उपयोग किया गया था, और आज भी पूर्वी एशियाई बौद्धों के बीच मंत्रों और धरणी लिखने के लिए इसका उपयोग होता है।संस्कृत में 'सिद्धम' शब्द का अर्थ "सिद्ध", "पूर्ण" या "सफल" है। इस लिपि का यह नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि दस्तावेजों की शुरुआत में 'सिद्धम' या 'सिद्धम अस्तु' (सिद्धि हो) लिखने का रिवाज था। सिद्धम एक वर्णमाला (Alphabet Set) न होकर, एक आबूगीदा (Abugida) लिपि है। इसमें हर अक्षर एक शब्दांश (Syllable) को दर्शाता है, जिसमें एक व्यंजन और (संभावित रूप से) एक स्वर शामिल होता है। यदि स्वर अलग से नहीं दिखाया गया है, तो 'अ' का स्वर उसमें पहले से ही माना जाता है। अन्य स्वरों को दर्शाने के लिए मात्राओं (Diacritic marks) का उपयोग किया जाता है, जैसे कि - अनुस्वार और विसर्ग।सिद्धम ग्रंथों को अन्य भारतीय लिपियों की तरह, आमतौर पर बाएं से दाएं और फिर ऊपर से नीचे लिखा जाता था। लेकिन कभी-कभी इसे पारंपरिक चीनी शैली में, ऊपर से नीचे और दाएं से बाएं भी लिखा जाता था। सिद्धम-जापानी द्विभाषी ग्रंथों में एक रोचक बात दिखती है। पांडुलिपि को 90 डिग्री घुमाकर जापानी भाषा ऊपर से नीचे लिखी जाती थी, और फिर वापस घुमाकर सिद्धम लिपि बाएं से दाएं लिखी जाती थी।दरअसल, एक आबूगीदा (जिसे 'अल्फासिलेबल' भी कहते हैं - alphasyllable) एक ऐसी लेखन प्रणाली है, जिसमें व्यंजन-स्वर के अनुक्रम को एक इकाई के रूप में लिखा जाता है। हर इकाई एक व्यंजन पर आधारित होती है और स्वर का स्थान गौण (मात्रा के रूप में) होता है। यह अंग्रेजी जैसी पूर्ण ‘अल्फाबेट’ प्रणाली से अलग है, जहाँ स्वर और व्यंजन का दर्जा बराबर होता है। हिंदी और अंग्रेजी के बीच सबसे बड़ा अंतर यही है कि, हिंदी में शब्द केवल व्यंजनों और स्वरों का क्रम नहीं है। यहाँ व्यंजन-स्वर मिलकर एक इकाई बनते हैं, जहाँ स्वर की मात्रा व्यंजन पर निर्भर होती है। इसी को अबुगिदा या वर्णमाला प्रणाली कहते हैं।संदर्भ 1. https://shorturl.at/mUOvx 2. https://shorturl.at/jtU4n 3. https://shorturl.at/pBoPI 4. https://shorturl.at/n9NDx 5. https://shorturl.at/Yaidp 6. https://shorturl.at/N69qp 7. https://rb.gy/eeldjm
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
राम नवमी विशेष: विष्णु-तत्त्व और प्रभु श्री राम के अवतार का आध्यात्मिक रहस्य
सनातन धर्म को लेकर अक्सर लोग इस असमंजस में रहते हैं कि, क्या वास्तव में यह (सनातन) बहुदेववाद यानी अनेक देवी-देवताओं को पूजने वाला धर्म है, अथवा एकेश्वरवाद (एक ही ईश्वर में विश्वास रखने वाला) धर्म है? यथार्थ में इसका सटीक और एकदम सही उत्तर तो केवल ईश्वर ही जानते हैं। लेकिन हम अपनी समझ बेहतर करने के लिए सनातन को उस दीपक की भांति संदर्भित कर सकते हैं, जिसकी चमक से पूरा कक्ष रौशन रहता है, किंतु रोशनी केवल एक स्रोत (लौ) से आती है। रौशनी के इसी सर्वशक्तिमान स्त्रोत को सनातन में विष्णु-तत्त्व कहा गया है।हिंदू धर्म में, भगवान के कई रूप हैं, लेकिन ईश्वर के सभी रूपों को विष्णु-तत्व या भगवान कृष्ण का विस्तार माना जाता है। इसका मतलब यह है कि यदि आप भगवान विष्णु के किसी भी रूप की पूजा करते हैं तो, आप वास्तव में मूल परमात्मा की ही पूजा कर रहे हैं। प्रत्येक जीव किसी न किसी प्रकार से पूजा में लगा हुआ है, चाहे वे भगवान में विश्वास करते हैं या नहीं। श्रीमद्भागवतम में प्रह्लाद महाराज ने शुद्ध भक्ति सेवा की नौ प्रक्रियाओं की सूची प्रदान की है, जिसमें भगवान विष्णु के पारलौकिक पवित्र नाम, रूप, गुण, साज-सामान और लीलाओं के बारे में सुनना और जप करना शामिल है। अन्य प्रक्रियाओं में उनका स्मरण करना, भगवान के चरण कमलों की सेवा करना, सोलह प्रकार की साज-सज्जा के साथ आदरपूर्वक पूजा करना, प्रार्थना करना, उनका सेवक बनना, प्रभु को अपना परम मित्र मानना और उन्हें अपना सब कुछ सौंप देना शामिल है। भगवान की किसी भी प्रकार से पूजा, रूप या विश्वास की परवाह किए बिना, अंततः मूल स्रोत, भगवान कृष्ण (विष्णु) की ओर ही ले जाती है।तत्त्व, या सत्य की अवधारणा, हिंदू धर्म में भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को संदर्भित करती है। उनमें से विष्णु-तत्व, जीव-तत्व, और शक्ति-तत्व प्रमुख हैं। विष्णु-तत्व को परम भगवान कृष्ण का सर्वव्यापी पहलू माना जाता है, जो परमात्मा के रूप में अपने आंशिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से पूरे ब्रह्मांड की देखभाल करते हैं। भगवान विष्णु प्रत्येक परमाणु के भीतर परमात्मा के रूप में विद्यमान हैं। जीव-तत्त्व, जीवों (मनुष्य, जानवर आदि) को संदर्भित करता है, जो शाश्वत और जीवित शक्तियां भी हैं लेकिन वह सर्वोच्च भगवान की तुलना में बहुत कम शक्तिशाली हैं। शक्ति-तत्व, भगवान की ऊर्जा या सामर्थ्य को संदर्भित करता है। जब कृष्ण या राम धरती पर प्रकट होते हैं, तो वे जीव-तत्व, विष्णु-तत्व, और शक्ति-तत्व सहित अपने सभी एकीकृत भागों के साथ प्रकट होते हैं। भगवान की शक्ति हर छोटी बड़ी चीज में मौजूद है, यहां तक कि ब्रह्मा, बलदेव, और योगमाया भी उनके प्रकट होने में एक भूमिका निभाते हैं। हिंदू धर्म में भगवान के कई रूप हैं और हर एक की पूजा अलग-अलग तरीके से की जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अलग-अलग आत्माएं अलग-अलग तरीकों से भगवान की सेवा करने के लिए स्वाभाविक रूप से प्रवृत्त होती हैं। उदाहरण के लिए, भगवान विष्णु, जिन्हें नारायण के नाम से भी जाना जाता है, की पूजा उन लोगों द्वारा की जाती है जो भगवान को बहुत ही ऐश्वर्यशाली और शक्तिशाली के रूप में देखना पसंद करते हैं। नारायण की चार भुजाएँ हैं जिनमें शंख, चक्र, गदा और कमल का फूल सुसज्ज्ति है, और वे बहुत सुंदर और विस्मयकारी हैं। दूसरी ओर, कृष्ण को भगवान का सबसे आकर्षक रूप माना जाता है, और उनकी पूजा उन लोगों द्वारा की जाती है जो भगवान के साथ वैवाहिक प्रेम या किसी अन्य प्रकार के शुद्ध प्रेम का आनंद लेना चाहते हैं। हालांकि, अगर भगवान विष्णु के राम अवतार की बात की जाए तो हम देखते हैं कि राम के सबसे बड़े भक्त, हनुमान, केवल राम की पूजा करते हैं और किसी और को भगवान के रूप में देखने से इंकार करते हैं। सरल शब्दों में देखें तो परम सत्य के विभिन्न पहलू होते हैं, जिन्हें तत्त्व के रूप में जाना जाता है। विष्णु-तत्व, जीव-तत्व और शक्ति-तत्व में से सबसे महत्वपूर्ण विष्णु-तत्व है, जो हर जगह मौजूद है। विष्णु-तत्त्व भगवान के परम व्यक्तित्व का सर्वव्यापी पहलू है। जीव-तत्व को ऊर्जा के रूप में वर्गीकृत किया गया है, ऊर्जावान के रूप में नहीं। जीव-तत्व अग्नि द्वारा उत्पन्न ऊष्मा के समान है, जबकि परमेश्वर स्वयं अग्नि के समान ऊर्जावान हैं। हम जीव आग की चिंगारी की तरह हैं जो आग से अलग होने पर अपनी रोशनी खो देती हैं। प्रभु श्री राम के जन्म की कथा इन्ही तत्वों के बीच के आपसी भेद को आध्यात्मिक व् शानदार रूप से संदर्भित करती है! कथा कुछ इस प्रकार है:हजारों साल पहले, सरयू नदी के तट पर, अयोध्या के खूबसूरत शहर में इक्ष्वाकु वंश के “दशरथ” नाम के एक राजा रहते थे; मान्यता अनुसार उन्होंने अपनी “दस इन्द्रियों” को अपने वश में करा हुआ था । वह एक उदार और बुद्धिमान राजा थे। उनकी तीन पत्नियां कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा थीं। अपने प्रजा के प्रिय होने के बावजूद, वह लगातार चिंतित और उदास रहते थे क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं थी।एक दिन राजा ने अपने पुरोहित गुरु वशिष्ठ को बुलाकर अपनी व्यथा सुनाई। वशिष्ठ ने कहा कि उनके जल्द ही चार बेटे होंगे और इसके लिए उन्होंने राजा को अश्वमेध यज्ञ करने की सलाह दी। इसके बाद दशरथ और उनके मंत्रियों ने वैदिक अनुष्ठान की सभी व्यवस्था करनी शुरू कर दीं और अयोध्या शहर को भव्य रूप से सजाया गया। अनुष्ठान के अंत में, यज्ञ की अग्नि से एक दिव्य प्राणी निकला, जिसके हाथों में दिव्य मिष्ठान का पात्र था। उन्होंने मिष्ठान का पात्र दशरथ को दे दिया, जिन्होंने इसे अपनी पत्नियों में बांट दिया - दशरथ ने मिठाई का आधा हिस्सा कौशल्या को,एक चौथाई सुमित्रा को और आठवां हिस्सा कैकेयी को दिया। हालाँकि,अभी भी कुछ मिठाई बची हुई थी,इसलिए उन्होंने इसे फिर से सुमित्रा को दे दिया। । जल्द ही, उनकी सभी पत्नियां गर्भवती हुईं और बारह महीने के बाद, रानी कौशल्या ने राम को जन्म दिया, जिन्हे भगवान विष्णु (विष्णु तत्व) का अवतार माना जाता है। राम के जन्म दिवस को अब रामनवमी के रूप में मनाया जाता है, जो चैत्र महीने में नौवें दिन पड़ता है।संदर्भ https://bit.ly/3TUpM9l https://bit.ly/3G5bDk3 https://bit.ly/3zey96g
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
जैज़ से जन-जन तक — उषा उथुप की अनोखी धुन
उषा उथुप (जन्म 8 नवम्बर 1947) भारतीय पॉप संगीत की उन विशिष्ट आवाज़ों में से हैं, जिन्होंने परंपरागत सीमाओं को तोड़ते हुए अपनी अलग पहचान बनाई। मुंबई में जन्मी और विभिन्न शहरों में पली-बढ़ीं उषा ने कम उम्र से ही संगीत में रुचि दिखाई। 1960 के दशक के अंत में चेन्नई और कोलकाता के नाइटक्लबों में लाइव परफ़ॉर्मेंस से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की, जहाँ उनकी गहरी, अनोखी और सशक्त आवाज़ ने श्रोताओं का ध्यान तुरंत आकर्षित किया। उस दौर में जब मुख्यधारा भारतीय संगीत मुख्यतः फिल्मी धुनों तक सीमित था, उषा उथुप ने जैज़, पॉप और डिस्को जैसी पश्चिमी शैलियों को भारतीय मंच पर आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया। साड़ी और बड़ी बिंदी में उनका मंचीय व्यक्तित्व इस बात का प्रतीक बना कि आधुनिकता और भारतीय सांस्कृतिक पहचान साथ-साथ चल सकती है। उन्हें पद्मश्री सहित अनेक सम्मानों से सम्मानित किया गया है, और उनके जीवन व करियर पर आधारित जीवनी The Queen of Indian Pop उनके लंबे और प्रभावशाली सफर को रेखांकित करती है।उल्लेखित वीडियो प्रस्तुतियों में उनकी वही जीवंत ऊर्जा, लयबद्धता और दर्शकों से सीधा संवाद करने की क्षमता दिखाई देती है, जिसने उन्हें दशकों तक प्रासंगिक बनाए रखा। उषा उथुप ने यह सिद्ध किया कि महिला कलाकार केवल पारंपरिक या सीमित भूमिकाओं तक बंधी नहीं हैं; वे मंच की कमान संभाल सकती हैं, नए प्रयोग कर सकती हैं और वैश्विक संगीत शैलियों को भारतीय श्रोताओं के अनुरूप ढाल सकती हैं। उनका स्वर केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और सांस्कृतिक समावेशन का प्रतीक बन गया।संदर्भ:https://tinyurl.com/rdrvp6kvhttps://tinyurl.com/et6vhhm8 https://tinyurl.com/ykehnfy5
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
होली का पर्व और इससे जुड़ी कथाएं, परंपराएं और सामाजिक महत्व
भारत में मनाए जाने वाले हर त्यौहार के पीछे कोई न कोई कारण और प्रभाव अवश्य ही छिपा रहता है और ऐसा ही एक त्यौहार होली का भी है, जिसे प्रेम, भाईचारे और एकता के प्रतीक के रूप में हर वर्ष सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है। यह पर्व सभी प्रकार के भेदों को मिटाकर समाज को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास करता है। बच्चे-बड़े, महिला-पुरूष, जाति और पंथ के बीच के भेदों को मिटाकर इस दिन सबको समान भाव से देखा जाता है। होली जहां रंगों का त्यौहार है, वहीं वसंत ऋतु की शुरुआत का भी प्रतीक है। पूर्वी राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल और ओडिशा में यह पर्व एक दिन पहले मनाया जाता है, जबकि उत्तरी उत्तर प्रदेश राज्य के कुछ हिस्सों में, यह उत्सव एक सप्ताह से भी अधिक समय तक मनाया जाता है।इस त्यौहार की किवदंती दानव राजा हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के दहन से जुडी हुई है। माना जाता है कि जब हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद ने अपने पिता को ब्रह्मांड का शासक न मानकर भगवान विष्णु को ब्रह्मांड का शासक माना, तब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के लिए अपनी बहन होलिका के साथ एक साजिश रची, जिसमें वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर आग की लपटों पर बैठी। चूंकि होलिका को आग से न जलने का वरदान प्राप्त था इसलिए हिरण्यकश्यप को लगा कि प्रह्लाद को मारने की यह साजिश सफल होगी, किंतु परिणाम उल्टा हुआ। प्रह्लाद तो बच गया लेकिन होलिका पूर्ण रूप से जल गयी क्योंकि वह केवल तब ही बच सकती थी जब वह अकले आग में बैठी होती। इस प्रकार बुराई पर अच्छाई की जीत हुई और पाप का अंत हुआ। पर्व से ठीक एक दिन पहले होलिका दहन की प्रक्रिया की जाती है तथा अगले दिन रंगों से होली खेली जाती है।रंगीन पाउडर और पानी फेंकने की परंपरा राधा और कृष्ण की पौराणिक प्रेम कहानी से उत्पन्न हुई है। माना जाता है कि सांवले कृष्ण ने जब राधा के गोरे रंग के बारे में अपनी माँ से शिकायत की तो बेटे की उदासी को कम करने के लिए, उनकी माँ ने उन्हें राधा की त्वचा को रंग से रंगने को कहा। इस प्रकार तब से प्रियजनों को रंग लगाने की यह परंपरा चली आ रही है। होली का लुफ्त जहां भारतीय लोग उठाते हैं, तो वहीं विदेशों से आये पर्यटक भी होली की इन छुट्टियों का आनंद लेते हैं। होली की सबसे खास बात यह है कि यह तुल्यकारक की भूमिका निभाती है। वर्तमान समय में विभिन्न कारकों की वजह से लोगों की बीच स्थापित दूरियों को कम करने में यह पर्व सहायक बना है। आय, जाति, पेशा और धर्म प्रतीकात्मक रूप इस दिन गायब हो जाते हैं। हिंदू धर्म के लोगों के साथ-साथ अन्य धर्म के लोग भी इस पर्व में शामिल होते हैं, जिसका उदाहरण लखनऊ में मनायी जाने वाली होली से लिया जा सकता है। चौक बाज़ार, अकबरी गेट, राजा बाज़ार आदि स्थानों पर होली के दिन हिंदू-मुस्लिम एकता के सुंदर दृश्य को अवश्य देखा जा सकता है। कई मुस्लिम कवियों द्वारा होली की सुंदरता को उनकी कविताओं में भी दर्शाया गया है।कवि मीर लखनऊ की होली से बहुत प्रभावित थे और यह प्रभाव उनकी कविताओं में भी दिखाई देता है, जैसे उनकी कविताओं की कुछ पंक्तियां निम्न प्रकार हैं:आओ साथी बहार फिर आईहोली में कितनी शदियां लायीजिस तरफ देखो मार्का सा हैशहर हा या कोई तमाशा हैथाल भर भर अबीर लाते हैंगुल की पत्ती मिला उड़ाते हैंइसी प्रकार अवध के आखरी नवाब, वाजिद अली शाह द्वारा होली के संदर्भ में लिखी गयी कुछ पंक्तियां निम्न प्रकार हैं:मोरे कान्हा जो आये पलट केअबके होली मई खेलूंगी डट केउनके पीछे मई चुपके से जाकेये गुलाल अपने तन से लगाकेरंग दूंगी उन्हें भी लिपट केसंदर्भ:https://tinyurl.com/4hn6jvrfhttps://tinyurl.com/2s3rumpe
खनिज
वैश्विक माइक्रोचिप संकट और भारत: सेमीकंडक्टर निर्माण केंद्र बनने की चुनौतियाँ व संभावनाएँ
अर्धचालक चिप्स (Semiconductor chips), जिसे माइक्रोचिप्स (Microchips) या एकीकृत सर्किट (Circuit) के रूप में भी जाना जाता है, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स (Consumer Electronics) से लेकर स्वास्थ्य सेवा तक लगभग हर उद्योग में एक महत्वपूर्ण घटक हैं। हालाँकि, इनकी सीमित आपूर्ति के कारण, दुनिया वर्तमान में चिप की कमी का सामना कर रही है।इस कमी को देखते हुए भारतीय सरकार ने दिसंबर 2021 में, देश को वैश्विक चिप निर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय अर्धचालक और डिस्प्ले (Display) निर्माताओं को आकर्षित करने के लिए 76,000 करोड़ रुपये (लगभग 10 बिलियन डॉलर) की प्रोत्साहन योजना को शुरू करने का प्रयास किया।लेकिन चीन और वियतनाम (Vietnam) जैसे अधिक प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में कमजोर पारिस्थितिकी तंत्र और संसाधनों की कमी के कारण भारत सेमीकंडक्टर वेलखनऊफर फैब्रिकेशन इकाइयों (Semiconductor wafer fabrication) की स्थापना में पिछड़ गया है।फैब निर्माण इकाइयां स्थापित करने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक यह तथ्य है कि इसके लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होती है।अरबों डॉलर में चलने वाली भारी लागत के अलावा, एक चिप के निर्माण में भी सैकड़ों गैलन शुद्ध पानी की आवश्यकता होती है, जो भारत में आवश्यक मात्रा में मिलना भी मुश्किल हो सकता है।निर्बाध बिजली आपूर्ति एक और बड़ी बाधा है। इस मुद्दे की जड़ यह है कि भारत अभी भी चिप निर्माण क्षेत्र में प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे के बराबर नहीं है।दरसल अर्धचालक चिप एक विद्युत परिपथ है जिसमें कई घटक जैसे ट्रांजिस्टर (Transistors) और अर्धचालक वेफर (Semiconductor wafer) पर तारों का निर्माण होता है। वे अधिकांश आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए छोटे दिमाग के रूप में कार्य करते हैं।इन चिप्स को बनाने के लिए, रेत से सिलिकॉन (Silicon) निकाला जाता है और ठोस सिलेंडर (Cylinder) में पिघलाया जाता है जिसे सिल्लियां कहा जाता है। इन सिल्लियों को फिर बहुत पतले वेफर्स में काट दिया जाता है और पॉलिश (Polish) की जाती है, जिसके बाद उन पर जटिल परिपथ मुद्रित होते हैं।अंत में, वेफर्स को अलग- अलग अर्धचालकों में काट दिया जाता है और तैयार चिप्स में पैक किया जाता है, जिसे बाद में एक परिपथ पट्ट पर रखा जा सकता है। इन चिप्स का निर्माण करना एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें तीन महीने से अधिक समय लगता है। लेकिन महामारी के चलते विश्व भर में चिप की कमी आ गई है। कोविड -19 ने आबादी के एक महत्वपूर्ण हिस्से को घर के अंदर रहने को मजबूर कर दिया है, जिससे उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे लैपटॉप (Laptop), फोन (Phones) और गेमिंग कंसोल (Gaming consoles) की मांग में अचानक वृद्धि हुई है।साथ ही क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrencies) की अचानक लोकप्रियता ने दुनिया भर में और अधिक खनन कार्यों को बढ़ा दिया है, जिसके लिए अधिक प्रसंस्करण इकाइयों की आवश्यकता होती है।हालांकि मांग बढ़ी है, आपूर्ति गिर गई है। दूसरी ओर,कार निर्माता ने महामारी की शुरुआत में अपने चिप के ऑर्डर (Order) को कम कर दिया, यह मानते हुए कि उपभोक्ताओं को नए वाहन खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं होगी,जिस वजह से आपूर्ति में गलत अनुमान लगाया गया और कम चिप का उत्पादन किया गया।संयुक्त राज्य अमेरिका (United States) और चीन (China) के बीच तनावपूर्ण संबंधों ने खराब आपूर्ति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, क्योंकि चीन चिप्स के सबसे बड़े निर्माताओं में से एक है। कई कंपनियां जिन्हें सेमीकंडक्टर्स की आवश्यकता होती है, उन्होंने पहले से ही अपनी दीर्घकालिक खरीद रणनीतियों पर पुनर्विचार करना प्रारंभ कर दिया है।कुछ उदाहरण के लिए उसी समय ऑर्डर करने वाली प्रणाली, जो वस्तुसूची की लागत को कम करने में मदद करता है, से हटकर अर्धचालक को पहले से ऑर्डर करने पर विचार कर रहे हैं।कई अर्धचालक कंपनियां (Company) मजबूत बने रहने के लिए अपनी दीर्घकालिक रणनीतियों को समायोजित कर रही हैं।अर्धचालक कंपनियां जो भी निर्णय लेती हैं, वह उनके उद्योग और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए व्यापक आर्थिक महत्व हो सकता है।2000 के दशक की शुरुआत में, अर्धचालक कंपनियों में लाभ मार्जिन (Profit Margin) कम था, जिसमें पूंजी की लागत से कम प्रतिफल उत्पन्न होता था। पिछले दशक के दौरान लाभप्रदता में सुधार हुआ, जो हालांकि, अधिकांश उद्योगों में माइक्रोचिप्स की बढ़ती मांग, प्रौद्योगिकी क्षेत्र की तीव्रवृद्धि, और क्लाउड के उपयोग में वृद्धि के साथ-साथ कई उप-खंडों में चल रहे समेकन से प्रेरित था। एक परिणाम यह है कि अर्धचालक उद्योग की लाभप्रदता अन्य उद्योगों की तुलना में काफी बेहतर हुई है, और यह प्रवृत्ति जारी रहने की उम्मीद है।जैसा कि किसी भी उद्योग में होता है, मूल्य सृजन उत्पाद श्रेणी के अनुसार भिन्न होता है, इसलिए कुछ खंडों में परिवर्तन दूसरों की तुलना में अधिक प्रभाव डाल सकते हैं। उदाहरण के लिए, मेमोरी (Memory) सबसे अधिक लाभदायक खंड रहा है, इसके बाद फैबलेस (Fabless) कंपनियां हैं जो अपने स्वयं के चिप्स डिजाइन करती हैं लेकिन अपने निर्माण को बाहरी स्रोत को देती हैं।कुछ क्षेत्रीय भिन्नताएँ भी स्पष्ट हैं। उत्तरी अमेरिका, कुछ सबसे बड़े फैबलेस खिलाड़ियों का घर, के पास 2015-19 की अवधि के दौरान वैश्विक अर्धचालक मूल्य पूल का लगभग 60% हिस्सा था। वहीं एशिया, जो अभी भी अनुबंध चिप निर्माण का केंद्र है, शेष 36% के लिए जिम्मेदार है। इस भौगोलिक प्रसार के साथ, अर्धचालक उद्योग के भीतर मूल्य निर्माण दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकता है।उत्पादन क्षमता बढ़ाने के अलावा, अर्धचालक कंपनियां अपने विकास को जारी रखने और ग्राहकों की मांग को पूरा करने के लिए कई कदमों पर विचार कर सकती हैं। वे लाभदायक क्षेत्रों में बढ़त हासिल करने और अपने ग्राहक आधार का विस्तार करने के लिए अधिक एम एंड ए (M&A) सौदे और साझेदारी कर सकते हैं।सेमीकंडक्टर कंपनियां नवीन तकनीकों में भी निवेश बढ़ा सकती हैं जो उन्हें स्वायत्त कारों, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (Internet of things), कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य क्षेत्रों में तेजी से विकास के लिए अग्रणी-बढ़त चिप्स विकसित करने में मदद करेगी। इन सबसे ऊपर, इन अनिश्चित समय के दौरान अधिक चुस्त रणनीतियां महत्वपूर्ण हो सकती हैं।संदर्भ :-https://bit.ly/3NnZSGw https://bit.ly/3NpAqAA
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
शिवरात्रि के इस पावन पर्व पर करें 'शिवोऽहम्' के भाव को आत्मसात
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ!महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आंतरिक जागरण का विशेष अवसर है। यह वह दिन माना जाता है जब शिव तत्व का प्रभाव पृथ्वी पर सबसे अधिक अनुभूत होता है, यानी भौतिक जीवन और आध्यात्मिक चेतना का सहज मिलन होता है। इसी कारण इस दिन किया गया ध्यान और साधना मन और चेतना पर गहरा प्रभाव छोड़ती है।महाशिवरात्रि हमें यह याद दिलाती है कि शिव कोई बाहरी सत्ता नहीं हैं, बल्कि वही शाश्वत चेतना हमारे भीतर भी विद्यमान है। “शिवोऽहम्” का भाव इसी अनुभूति की ओर संकेत करता है - कि सत्य, शांति और अनंतता हमारे अपने स्वरूप का हिस्सा हैं। जब मन द्वैत से ऊपर उठकर एकत्व को अनुभव करता है, तब जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलने लगता है।रात्रि का भाव शांति, विश्राम और मौन से जुड़ा है। इस दिन मन, बुद्धि और अहंकार को शांत कर ध्यान में स्थिर होना वास्तविक विश्राम माना जाता है। महाशिवरात्रि आत्मसमर्पण का भी संदेश देती है - जब व्यक्ति स्वयं को उस व्यापक चेतना के भरोसे छोड़ देता है, तब भय, चिंता और बेचैनी स्वतः कम होने लगती हैं। यही इस पर्व का वास्तविक अर्थ और सौंदर्य है।संदर्भ:https://tinyurl.com/52e6277c https://tinyurl.com/mr2rcz2b
अवधारणा I - मापन उपकरण (कागज़/घड़ी)
शाही गज़ से आधुनिक मेट्रिक प्रणाली तक: मापन इकाइयों के विकास की रोचक कहानी
मेट्रिक प्रणाली लंबाई, आयतन, दूरी, तापमान और वज़न जैसे मापों के लिए उपयोग की जाने वाली एक मानकीकृत प्रणाली है। यह तीन बुनियादी इकाइयों पर आधारित होती है:⦁ ➲ मीटर (m): लंबाई मापने के लिए।⦁ ➲ किलोग्राम (kg): द्रव्यमान मापने के लिए।⦁ ➲ सेकेंड (s): समय मापने के लिए।इस लेख में हम मेट्रिक प्रणाली के विकास, सामान्य मेट्रिक रूपांतरण इकाइयों तथा मुग़ल काल में भारत में प्रचलित मापन पद्धतियों के बारे में विस्तार से जानेंगे।मेट्रिक प्रणाली मापने का एक सुव्यवस्थित और विश्वसनीय तरीका है, जिसका उपयोग आज विश्वभर में वैज्ञानिक शोध, शिक्षा, व्यापार और दैनिक जीवन में किया जाता है। यह सरल मापों से लेकर जटिल गणनाओं तक के लिए उपयुक्त मानी जाती है।इसके कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं:⦁ ➲ मीटर (m): दूरी और लंबाई मापने की मानक इकाई। जैसे—घर से स्कूल की दूरी या किसी कपड़े की लंबाई।⦁ ➲ ग्राम (g): वज़न की इकाई, जिसे हम खाद्य पदार्थों के पैकेट पर अक्सर देखते हैं, जैसे “250 ग्राम चिप्स।”⦁ ➲ मिलीलीटर (ml): आयतन की इकाई, जिसका उपयोग पेय पदार्थों या तरल पदार्थों की मात्रा मापने में किया जाता है।मेट्रिक प्रणाली में लंबाई, द्रव्यमान (वज़न) और क्षमता (आयतन) के लिए अलग-अलग इकाइयाँ निर्धारित की गई हैं। उदाहरण के लिए:⦁ ➲ लंबाई: मिलीमीटर (mm), सेंटीमीटर (cm), डेसीमीटर (dm), मीटर (m) और किलोमीटर (km)। इनका उपयोग डेबिट कार्ड (Debit Card) की मोटाई से लेकर दो शहरों के बीच की दूरी तक मापने में होता है।⦁ ➲ वज़न: ग्राम (g) और किलोग्राम (kg), जिनसे फलों या शरीर का वज़न मापा जाता है।⦁ ➲ क्षमता: मिलीलीटर (ml) और लीटर (L), जिनका उपयोग जूस कैन या पानी की टंकी की मात्रा मापने में किया जाता है।1789 की फ़्रांसीसी क्रांति के बाद नागरिकों ने पूरे देश में एक समान वज़न और माप प्रणाली की आवश्यकता महसूस की। इस उद्देश्य से नेशनल असेंबली (National Assembly) और बाद की सरकारों ने पेरिस एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (Paris Academy of Sciences) तथा उसके उत्तराधिकारी इंस्टीट्यूट ऑफ फ़्रांस (Institute of France) को नई इकाइयाँ विकसित करने का कार्य सौंपा। इन इकाइयों को दूरी, आयतन, वज़न, कोण और समय मापने के लिए तैयार किया गया, और इन्हें इस तरह बनाया गया कि सभी एक-दूसरे से तार्किक रूप से जुड़े रहें।उदाहरण के तौर पर, लंबाई की इकाइयाँ दस की घात के आधार पर बढ़ती हैं - मिलीमीटर से सेंटीमीटर, फिर मीटर तक। एक लीटर को ऐसे घन के आयतन के रूप में परिभाषित किया गया जिसकी प्रत्येक भुजा 10 सेंटीमीटर हो। मानक तापमान पर एक लीटर पानी का वज़न लगभग एक किलोग्राम होता है। इससे पहले इंच, फ़ीट, गज़ और मील जैसी इकाइयों के बीच कोई स्पष्ट संबंध नहीं था। फ़्रांसीसियों ने न केवल राष्ट्रीय मानकों की स्थापना की, बल्कि एक ऐसी प्रणाली विकसित की जो आज मेट्रिक प्रणाली के रूप में वैश्विक स्तर पर अपनाई जा चुकी है।मेट्रिक प्रणाली के इतिहास की प्रमुख समयरेखा:⦁ ➲ 1668: जॉन विल्किंस (John Wilkins) ने एक संशोधित मापन प्रणाली का प्रस्ताव रखा।⦁ ➲ 1670: गेब्रियल मूटन (Gabriel Mouton) ने पृथ्वी की परिधि के अंश पर आधारित दशमलव प्रणाली सुझाई।⦁ ➲ 1671: जीन पिकार्ड (Jean Picard) ने झूलते पेंडुलम (Pendulum) को लंबाई मापने का आधार बनाने का विचार दिया।⦁ ➲ 1790: फ़्रांस की नेशनल असेंबली ने फ़्रेंच एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (French Academy of Sciences) से मानक प्रणाली विकसित करने का अनुरोध किया।⦁ ➲ 1795: फ़्रांस ने आधिकारिक रूप से मेट्रिक प्रणाली अपनाई।⦁ ➲ 1840: फ़्रांसीसी सरकार ने नागरिकों के लिए इसका उपयोग अनिवार्य किया।⦁ ➲ 1866: संयुक्त राज्य अमेरिका (United States) में मेट्रिक प्रणाली का उपयोग वैध घोषित हुआ, हालांकि अनिवार्य नहीं था।⦁ ➲ 1875: मीटर की संधि पर हस्ताक्षर किए गए और अंतर्राष्ट्रीय वज़न एवं माप ब्यूरो सम्मेलन (International Bureau of Weights and Measures Conference) आयोजित हुआ।⦁ ➲ 1957: अमेरिकी सेना (United States Army) और मरीन कॉर्प्स (Marine Corps) ने इसे अपने उपकरणों के मानक के रूप में अपनाया।⦁ ➲ 1965: ग्रेट ब्रिटेन (Great Britain) ने मेट्रिक प्रणाली अपनाने की प्रक्रिया शुरू की।⦁ ➲ 1988: ओम्निबस ट्रेड एंड कॉम्पिटिटिवनेस एक्ट (Omnibus Trade and Competitiveness Act) के तहत संघीय एजेंसियों को व्यापार में मेट्रिक प्रणाली उपयोग करने का निर्देश दिया गया।गणितीय रूप से, मेट्रिक रूपांतरण किलोग्राम, मीटर और सेकेंड पर आधारित होते हैं। क्षेत्रफल को वर्ग मीटर (m²) में और आयतन को घन मीटर (m³) में मापा जाता है। एक घन मीटर = 1,000 लीटर होता है, अर्थात 1 लीटर = 1/1,000 m³। समय की गणना में 1 घंटा = 60 मिनट, 1 मिनट = 60 सेकेंड और इस प्रकार 1 घंटा = 3,600 सेकेंड होता है। वहीं, 1 दिन = 24 घंटे = 86,400 सेकेंड के बराबर होता है।लेकिन आधुनिक मापन प्रणालियों के विकसित होने से पहले माप कैसे किए जाते थे? इसे समझने के लिए मुग़ल काल की व्यवस्था पर नज़र डालना उपयोगी होगा।मुग़ल काल में भारत में कई प्रकार की मापन इकाइयाँ प्रचलित थीं। कपड़ों को मापने के लिए अकबर का शाही गज़ (Akbar’s Royal Yard) उपयोग किया जाता था, जिसकी लंबाई लगभग 46 अंगुल होती थी। कृषि भूमि और इमारतों के लिए इस्कंधरी गज़ का प्रयोग होता था। विभिन्न गज़ों के कारण उत्पन्न समस्याओं को दूर करने के लिए इलाही गज़ (Ilahigaz) नामक एक मानक इकाई शुरू की गई, जिसकी लंबाई लगभग 33 से 34 इंच थी और जिसे आम जनता ने भी अपनाया।भूमि मापने के लिए बीघा (Bigha) का उपयोग किया जाता था, जिसकी लंबाई और चौड़ाई सामान्यतः 60 गज़ मानी जाती थी। गज़ और बीघा मुग़ल मापन प्रणाली की प्रमुख इकाइयाँ थीं।इन मापों के बीच संबंध इस प्रकार थे:⦁ ➲ 1 हाथ = 8 गिरह⦁ ➲ 1 गज़ = 2 हाथ⦁ ➲ 1 काठी = 5 और 5/6 हाथ⦁ ➲ 1 पंड = 20 काठी⦁ ➲ 1 बीघा = 20 पंड⦁ ➲ 1 बीघा = 20 विश्वा⦁ ➲ 1 विश्वा = 20 विश्वांसभारत में 1956 तक, जब मेट्रिक प्रणाली आधिकारिक रूप से लागू नहीं हुई थी, तब तक गज़ जैसी पारंपरिक इकाइयों का व्यापक उपयोग होता रहा।स्पष्ट है कि मापन इकाइयों की यह यात्रा—शाही गज़ से लेकर आधुनिक मेट्रिक प्रणाली तक—मानव सभ्यता की वैज्ञानिक प्रगति और मानकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रही है, जिसने आज हमारे जीवन को अधिक सटीक, सरल और व्यवस्थित बना दिया है।संदर्भhttps://tinyurl.com/2ddozczz https://tinyurl.com/2cwhuvag https://tinyurl.com/22ez3rmu https://tinyurl.com/y2dnkd9o
नदियाँ और नहरें
लखनऊ शहर में जल निकायों की भूमिका और वर्तमान स्थिति
उत्तर प्रदेश की राजधानी होने के नाते हमारा शहर लखनऊ अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं के लिए पूरे देश में विशेष पहचान रखता है। यही वजह है कि लखनऊ का समग्र और तेज़ विकास सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। लेकिन इस तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के बीच हमें यह भी गंभीरता से सोचना होगा कि कहीं आधुनिक सुविधाओं और शहरी विस्तार की चाह हमारी प्राकृतिक धरोहरों को नुकसान तो नहीं पहुँचा रही है। विकास की इस दौड़ में यदि जल निकायों और नदियों की अनदेखी होती रही, तो इसके दुष्परिणाम पूरे शहर को भविष्य में भुगतने पड़ सकते हैं।तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के चलते लखनऊ अपने जल निकायों का लगभग 46 प्रतिशत हिस्सा पहले ही खो चुका है। जो जल निकाय बचे भी हैं, उनमें से अधिकांश आज अपशिष्ट और सीवेज से बुरी तरह प्रदूषित हो चुके हैं। लखनऊ नगर निगम के एक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 1952 में शहर में 964 तालाब मौजूद थे, लेकिन 2006 तक इनकी संख्या घटकर केवल 494 रह गई। नगर निगम के भूमि रिकॉर्ड यह भी बताते हैं कि शहर में दर्ज कई टैंक और तालाब अब सुधार और अतिक्रमण के कारण पहचान से बाहर हो चुके हैं।तालाब और जलाशय प्राकृतिक रूप से स्पंज तथा थर्मो-रेगुलेटर (damper and thermo-regulator) की तरह काम करते हैं। ये वर्षा जल के संचय में मदद करते हैं और भूजल स्तर को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन लखनऊ के मुख्य शहरी क्षेत्रों में जल निकायों के लगभग समाप्त हो जाने से शहर भविष्य में गंभीर बाढ़ के खतरे की ओर बढ़ रहा है। पिछले एक दशक में लखनऊ चार बड़ी बाढ़ की घटनाओं का सामना कर चुका है, जो इस खतरे की स्पष्ट चेतावनी हैं।शहर की गोमती नदी की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। गोमती एक भूजल-आधारित नदी है, जो अपनी सहायक नदियों से पुनः भरती रहती है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Uttar Pradesh Pollution Control Board – UPPCB) के आँकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में गोमती का प्रवाह 35 से 40 प्रतिशत तक कम हो चुका है। कई स्थानों पर नदी में पानी इतना कम रह गया है कि उसे पैदल पार किया जा सकता है। लखनऊ में लगभग 13 किलोमीटर तक बहने वाला गोमती का यह हिस्सा आज अपनी सबसे खराब स्थिति में है और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board – CPCB) द्वारा इसे देश के सबसे प्रदूषित नदी खंडों में शामिल किया गया है।विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ता जैविक दबाव, पारिस्थितिक प्रवाह में कमी, सहायक नदियों की दुर्दशा, नदी के जलग्रहण क्षेत्र में गाद भराव और अतिक्रमण—इन सभी कारणों ने मिलकर गोमती को सीवेज और कीचड़ से भर दिया है। जानकारों का यह भी कहना है कि लखनऊ के आसपास लगभग 300 जलाशयों के निर्माण की योजनाओं और अवैध अतिक्रमण के चलते स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। पूरे उत्तर प्रदेश में अतिक्रमण के कारण एक लाख से अधिक जलाशय—जिनमें टैंक, तालाब, झीलें और कुएँ शामिल हैं—नष्ट हो चुके हैं।गोमती नदी में प्रदूषण को नियंत्रित करने का पहला संगठित प्रयास वर्ष 1993 में केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा शुरू की गई गोमती कार्य योजना के तहत किया गया था। इस योजना का उद्देश्य नालों को टैप करना और सीवेज को उपचार संयंत्रों तक पहुँचाना था। इसके बावजूद, आज भी बड़ी मात्रा में अनुपचारित सीवेज सीधे नदी में बह रहा है। इसके बाद अप्रैल 2015 में राज्य सरकार ने गोमती पुनरुद्धार परियोजना शुरू की, जिसके तहत नदी की सफाई, तटों को मज़बूत करने और सौंदर्यीकरण की योजना बनाई गई। गोमती बैराज तक नदी के पुनरुद्धार की अनुमानित लागत लगभग 600 करोड़ रुपये तय की गई थी। हालांकि, अतिक्रमण और शहरी दबाव के कारण इन प्रयासों के अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ सके।जल निकायों पर बढ़ते अतिक्रमण को रोकने के लिए सरकार और सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर हस्तक्षेप किए हैं। वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि प्राकृतिक झीलों और तालाबों की सुरक्षा जीवन के अधिकार का हिस्सा है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मूल अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसके बावजूद, लखनऊ के आधिकारिक रिकॉर्ड एक अलग और चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।वर्ष 2014 में पर्यावरण कार्यकर्ता अशोक शंकरम द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर एक याचिका में शहर के 37 जल निकायों पर हुए अतिक्रमण का मुद्दा उठाया गया था। इसके जवाब में अदालत ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (Lucknow Development Authority – LDA) और लखनऊ नगर निगम से स्पष्टीकरण माँगा। लेकिन 2015 में दिए गए जवाब में अतिक्रमण के खिलाफ उठाए गए ठोस कदमों की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि झीलों और तालाबों को अतिक्रमण मुक्त कराना एलडीए और नगर निगम का वैधानिक कर्तव्य है।जल निकायों से अतिक्रमण हटाने की मांग करने वाले अधिवक्ता मोतीलाल यादव का कहना है कि लखनऊ के आसपास सैकड़ों जलाशयों पर निर्माण की योजनाओं ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। हालांकि हाल के वर्षों में लखनऊ जिला प्रशासन ने जल निकायों और सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए अभियान शुरू किए हैं। जिला मजिस्ट्रेट के अनुसार, इन अभियानों का उद्देश्य न केवल तालाबों और जल निकायों का पुनरुद्धार करना है, बल्कि सरकारी भूमि को भी अतिक्रमण से मुक्त कराना है। इसी क्रम में सरोजनीनगर तहसील से शुरू किए गए अभियान के तहत राजस्व विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों की टीम ने लगभग 12 बीघा भूमि से अतिक्रमण हटाया, जिसकी बाज़ार कीमत करीब 7 करोड़ 84 लाख रुपये आँकी गई है।संदर्भhttps://bit.ly/3sPYxQY https://bit.ly/3yQ0HE3 https://bit.ly/3wFhvwi https://tinyurl.com/ytxu4mx5
प्रारंभिक मध्यकाल : 1000 ई. से 1450 ई.
कैसे ममलूक वंश ने भारत में सल्तनती सत्ता और नई वास्तुकला की शुरुआत की?
लखनऊवासियों, आज हम एक ऐसे ऐतिहासिक विषय पर बात करने जा रहे हैं जो भले ही सीधे हमारे शहर से जुड़ा न हो, लेकिन भारत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य इतिहास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है - दिल्ली सल्तनत और उसके प्रथम राजवंश, ममलूक वंश का उदय। जिस तरह लखनऊ अपनी तहज़ीब, नक़्क़ाशीदार इमारतों और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए प्रसिद्ध है, उसी तरह सल्तनत काल की इमारतों और स्थापत्य शैलियों ने भी भारत की वास्तुकला की दिशा निर्धारित की। यही कारण है कि इस विषय को समझना हमें यह जानने में मदद करता है कि सदियों पहले भारत में किस तरह की सत्ता, किस तरह की इमारतें और किस तरह की तकनीकें विकसित हुईं - और वे आगे चलकर हमारी आधुनिक कलात्मक विरासत का आधार कैसे बनीं।आज के इस लेख में हम क्रमबद्ध रूप से पाँच महत्वपूर्ण पहलुओं को सरल भाषा में समझेंगे। सबसे पहले, हम जानेंगे कि दिल्ली सल्तनत कैसे स्थापित हुई और ममलूक वंश की शुरुआत में मुहम्मद घोरी, कुतुब-उद-दीन ऐबक और इल्तुतमिश की भूमिका क्या रही। इसके बाद, हम ममलूक शासकों की प्रशासनिक चुनौतियों और उनकी नीतियों पर नज़र डालेंगे, जिनसे सल्तनत मजबूत हुई। फिर हम समझेंगे कि सल्तनत काल की वास्तुकला कैसे भारतीय, इस्लामी और मध्य-एशियाई शैलियों का सुंदर मिश्रण बनी। इसके बाद हम उन प्रमुख इमारतों के बारे में जानेंगे - जैसे कुतुब मीनार, अलाई दरवाज़ा और तुगलकाबाद - जिन्होंने इस युग की पहचान बनाई। अंत में, हम देखेंगे कि चूना-गारा, आर्कुएट (Arcuate - धनुषाकार) तकनीक और गुम्बद-निर्माण जैसी नई तकनीकों ने भारतीय वास्तुकला में कैसे बड़ा परिवर्तन लाया।दिल्ली सल्तनत का उदय और ममलूक (गुलाम) वंश की स्थापनादिल्ली सल्तनत का इतिहास वास्तव में 12वीं सदी के उत्तरार्ध में घुरिद साम्राज्य के विस्तार से शुरू होता है। घुर के शासक मुहम्मद घोरी ने जब 1192 में तराइन की दूसरी लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को हराया और फिर 1194 में चंदावर की लड़ाई में जयचंद पर विजय प्राप्त की, तब उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा उनके नियंत्रण में आ गया। वे स्वयं भारत में अधिक समय नहीं रुके, इसलिए प्रशासन संचालन का दायित्व उन्होंने अपने सबसे विश्वस्त सैन्य अधिकारी कुतुब-उद-दीन ऐबक को सौंपा, जो उनका दास होने के बावजूद एक कुशल योद्धा, रणनीतिकार और संगठक था।1206 में मुहम्मद घोरी की मृत्यु के बाद ऐबक ने दिल्ली में स्वतंत्र सत्ता स्थापित की और इसी क्षण से दिल्ली सल्तनत के प्रथम राजवंश - ममलूक वंश - का जन्म हुआ। “ममलूक” शब्द अरबी से आया है, जिसका अर्थ है “स्वामी-निर्मित दास” या प्रशिक्षित सैनिक। ये साधारण दास नहीं थे, बल्कि अत्यंत सक्षम, निष्ठावान और युद्धकला में दक्ष योद्धा होते थे।ऐबक के बाद उसके दामाद और उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने सल्तनत को एक सुसंगठित, शक्तिशाली और स्थिर राज्य का स्वरूप दिया। कूटनीति, सैन्य-व्यवस्था और प्रशासनिक सुधारों के कारण इल्तुतमिश को वास्तव में दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।ममलूक शासकों का शासन, चुनौतियाँ और प्रशासनिक मजबूतीजब 1211 में इल्तुतमिश ने सत्ता संभाली, तब सल्तनत अभी भी नवजात अवस्था में थी और उसे कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। पहली चुनौती पश्चिमी सीमा पर मंगोलों का लगातार दबाव था, जिन्होंने मध्य एशिया में उथल-पुथल मचा रखी थी और भारत की दिशा में भी नजरें टिकाई थीं। दूसरी चुनौती तुर्की अमीरों की शक्ति थी, जो दरबार में अपने प्रभाव को बढ़ाकर सुल्तान की शक्ति को कमजोर करना चाहते थे। तीसरी चुनौती भारतीय हिंदू सरदारों की स्वतंत्रता-प्रियता थी, जिन्हें सल्तनत की अधीनता कबूल करवाना आवश्यक था। इल्तुतमिश ने शक्तिशाली सेना, संगठित प्रशासन और समझदारीपूर्ण गठबंधन-नीति के माध्यम से इन तीनों क्षेत्रों में सफलता पाई। उसके शासन के बाद उसकी योग्य पुत्री रज़िया सुल्तान ने सत्ता संभाली - जो भारतीय इतिहास की पहली मुस्लिम महिला शासक थीं। लेकिन तुर्क अमीर एक महिला को सत्ता में देखकर असंतुष्ट हुए और अंततः रज़िया को अपदस्थ कर दिया।राजनीतिक अस्थिरता के बाद सत्ता गियास-उद-दीन बलबन के हाथों में पहुँची, जिसने शाही मर्यादा, अनुशासन और राजसत्ता की “दैवीय छवि” को अत्यधिक सुदृढ़ किया। बलबन ने मंगोलों के विरुद्ध व्यापक सुरक्षा-तंत्र तैयार किया और दरबार में कठोर “ज़ाब्ते” लागू किए। उसके शासन में सल्तनत पुनः एक मजबूत और स्थिर साम्राज्य बन गई।सल्तनत काल की वास्तुकला: उद्भव, विशेषताएँ और सांस्कृतिक संगमसल्तनत काल वास्तुकला के इतिहास में एक क्रांतिकारी चरण था। इस अवधि में जन्म लेने वाली इमारतें केवल धार्मिक या राजनीतिक प्रतीक नहीं थीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी, मध्य एशियाई और भारतीय कला का अनोखा संगम थीं। यह वह दौर था जब भारत में पहली बार स्पष्ट रूप से विकसित इंडो-इस्लामिक (Indo-Islamic) वास्तुकला दिखाई देती है - एक ऐसा कला-रूप जिसमें हिंदू-जैन मंदिरों की परंपरागत मूर्तिकारी और भारतीय पत्थर-शिल्प, इस्लामी जगत की मेहराबों, गुम्बदों, ज्यामितीय डिजाइन और ईंट-निर्माण तकनीकों के साथ मिश्रित होते हैं। सल्तनत काल की वास्तुकला तीन प्रमुख रूपों में विकसित हुई - दिल्ली की शाही शैली, जो मुख्यतः सुल्तानों द्वारा संरक्षित थी; प्रांतीय सल्तनती शैली, जो बंगाल, गुजरात और दक्कन में विकसित हुई; तथा हिंदू शासकों के अधीन विकसित शैली, जिसमें राजस्थानी और दक्षिण भारतीय तत्वों का प्रभाव था। यह विविधता आगे चलकर उस विशाल वास्तु-परंपरा का आधार बनी जिसने मुगल काल में अपनी चरम सुंदरता प्राप्त की।प्रमुख इमारतें और सुल्तानों का स्थापत्य योगदानसल्तनत काल में निर्मित इमारतों की श्रृंखला अत्यंत विस्तृत है और इनमें से कई भारत की ऐतिहासिक पहचान बन चुकी हैं। सबसे पहले कुतुब-उल-इस्लाम मस्जिद और अढ़ाई दिन का झोंपड़ा का उल्लेख किया जाता है, जिनमें हिंदू-जैन स्थापत्य की मूर्तिकारी और इस्लामी विन्यास का अद्वितीय सम्मिश्रण देखा जाता है। इसके बाद आती है कुतुब मीनार, जो ईंट-निर्मित मीनारों में विश्व के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक है। ऐबक ने इसकी नींव रखी, इल्तुतमिश ने तीन मंज़िलें बनवाईं और बाद में फ़िरोज़ तुगलक ने इसे और ऊँचा तथा भव्य बनाया।अन्य उल्लेखनीय स्थापत्य योगदानों में शामिल हैं—सुल्तान-ए-गारी का मकबरा, भारत का पहला मकबराहौज़-ए-शम्सी, जो जल-विनियोजन की अद्भुत समझ दर्शाता हैअलाई दरवाज़ा, जो शुद्ध इस्लामी वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना हैतुगलकाबाद, जहाँपनाह, और फ़िरोज़ाबाद - तीन बड़े शाही शहरलोदी और सैय्यद शासकों द्वारा बनवाए गए गुम्बद-दार मकबरे, जिनमें भारत में “बाग़-वाले मकबरों” की परंपरा की शुरुआत हुईये सभी इमारतें न केवल सुल्तानों की शक्ति, बल्कि उस समय की अभियांत्रिकी, कला और सौंदर्य-बोध को भी उजागर करती हैं।सल्तनत काल में निर्माण तकनीकें: आर्कुएट शैली और नई सामग्रियाँसल्तनत काल में भारत की निर्माण-तकनीक में एक मूलभूत परिवर्तन आया। इस काल में पहली बार चूना-गारा (Lime mortar), जिप्सम (Gypsum), सुरखी, और पकी ईंटों का बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ। इन नई सामग्रियों ने निर्माण को तेज, सस्ता और टिकाऊ बना दिया। सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन था आर्कुएट तकनीक का विकास - यानी मेहराबों और गुम्बदों की मदद से विशाल, बिना स्तंभों वाले आंतरिक स्थानों का निर्माण। मेहराबों में प्रयुक्त वौसोइर (पच्चर-आकार के पत्थर) और केंद्र-पत्थर (keystone) ने इमारतों को पहले से कहीं अधिक स्थिर और ऊँचा बनाने की क्षमता प्रदान की। कम लागत और बेहतर स्थायित्व के कारण मस्जिदों, मकबरों, महलों, सरायों, बारादरियों और बाजारों के निर्माण में तेजी आई। यह तकनीकी परिवर्तन आगे मुगल काल की उच्च स्तरीय वास्तुकला की नींव बना।भारतीय–इस्लामी प्रभावों का मिलन और उसका ऐतिहासिक महत्वसल्तनत काल का स्थापत्य भारत की सांस्कृतिक विविधता और सह-अस्तित्व का उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रारंभिक मस्जिदें और भवन कई बार परित्यक्त हिंदू-जैन मंदिरों, संस्कृत महाविद्यालयों और अन्य संरचनाओं पर निर्मित किए गए, जिसके परिणामस्वरूप इन इमारतों में भारतीय शिल्प - जैसे आलंकरण, फूल-पत्ती के डिज़ाइन, कमल आकृति, और अलंकारिक स्तंभ - स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इससे एक नया मिश्रणात्मक स्थापत्य-रूप उभरा, जिसने न केवल सल्तनत काल बल्कि आगे के सैय्यद, लोदी और मुगल काल को भी प्रभावित किया। यही प्रभाव भारत में इस्लामी स्थापत्य को स्थानीय विशेषताओं के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सफल बना, जिसके कारण इस युग की इमारतें आज भी भारत की कला-परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं।संदर्भ - https://tinyurl.com/29uxyr9x https://tinyurl.com/bdz6cbr8 https://tinyurl.com/2u3m8p29 https://tinyurl.com/38axrksh
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
महात्मा गांधी की शहादत: एक राष्ट्र, एक विचारधारा और अमर नैतिक विरासत
लखनऊवासियो, भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि त्याग, नैतिकता और आत्मबल की एक गहरी यात्रा था और इस यात्रा के केंद्र में महात्मा गांधी का नाम सबसे उज्ज्वल रूप में उभरता है। 30 जनवरी का दिन हमें उस क्षण की याद दिलाता है, जब देश ने अपने नैतिक मार्गदर्शक को खो दिया, लेकिन उनके विचार और मूल्य हमेशा के लिए अमर हो गए। यही कारण है कि हर वर्ष 30 जनवरी को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि महात्मा गांधी के विचारों, उनके बलिदान और उनके द्वारा दिए गए संदेश को याद किया जा सके। शहीद दिवस हमें गांधी जी के बलिदान, अहिंसा और सत्य के संदेश को फिर से आत्मसात करने का अवसर देता है।आज के इस लेख में हम सबसे पहले महात्मा गांधी के व्यक्तित्व और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका को समझेंगे। इसके बाद 30 जनवरी 1948 की उस घटना पर चर्चा करेंगे, जिसने पूरे देश को शोक में डुबो दिया। फिर हम गांधी जी के विचारों और सिद्धांतों को जानेंगे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को नैतिक दिशा दी। आगे उनके प्रमुख आंदोलनों और योगदान पर नज़र डालेंगे। अंत में, हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि उनकी शहादत आज के भारत में क्यों और कैसे प्रासंगिक बनी हुई है।महात्मा गांधी का परिचय और स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिकामहात्मा गांधी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली और केंद्रीय व्यक्तित्व थे। उन्होंने न केवल अंग्रेज़ी शासन के ख़िलाफ़ जनआंदोलनों का नेतृत्व किया, बल्कि आम जनता को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने का कार्य भी किया। उनके नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन एक जनआंदोलन बना, जिसमें हर वर्ग और हर आयु के लोग शामिल हुए। गांधी जी का व्यक्तित्व सादगी, अनुशासन और नैतिकता का प्रतीक था, जिसने उन्हें “राष्ट्रपिता” के रूप में स्थापित किया। उन्होंने संघर्ष के दौरान यह सिद्ध किया कि नैतिक शक्ति और जनसमर्थन किसी भी साम्राज्यवादी ताक़त से अधिक प्रभावशाली हो सकते हैं।30 जनवरी 1948: महात्मा गांधी की हत्या और शहीद दिवस30 जनवरी 1948 का दिन भारतीय इतिहास के सबसे पीड़ादायक और अविस्मरणीय क्षणों में से एक माना जाता है। इसी दिन महात्मा गांधी की उनकी नियमित प्रार्थना सभा के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ ही महीनों बाद हुई, जब देश अभी नवस्वतंत्र भारत की दिशा और भविष्य को आकार दे रहा था। गांधी जी की हत्या की खबर ने पूरे देश को गहरे शोक और स्तब्धता में डुबो दिया। लाखों लोगों के लिए यह केवल एक नेता की मृत्यु नहीं थी, बल्कि नैतिक नेतृत्व और मानवीय मूल्यों की क्षति थी। उनकी शहादत उस विचारधारा पर प्रहार थी, जो अहिंसा, सह-अस्तित्व, धार्मिक सौहार्द और सामाजिक समरसता पर आधारित थी। यही कारण है कि 30 जनवरी को हर वर्ष शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि महात्मा गांधी के बलिदान, उनके संघर्ष और उनके जीवन मूल्यों को स्मरण किया जा सके और आने वाली पीढ़ियों को उनके आदर्शों से प्रेरणा मिल सके।महात्मा गांधी के विचार और सिद्धांतमहात्मा गांधी के विचार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा और दिशा तय करने वाले सिद्धांत थे। सत्याग्रह और अहिंसा उनके सबसे प्रमुख और प्रभावशाली विचार माने जाते हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने अन्याय, शोषण और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष किया। गांधी जी का विश्वास था कि किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनाए गए साधन उतने ही पवित्र और नैतिक होने चाहिए जितना स्वयं लक्ष्य। उनके अनुसार हिंसा से प्राप्त किया गया परिणाम स्थायी नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत नैतिकता और सामाजिक नैतिकता में कोई अंतर नहीं होना चाहिए, क्योंकि समाज की नैतिकता व्यक्तियों के आचरण से ही बनती है। उनके विचारों ने न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में संघर्ष और विरोध के तरीकों को एक नई दिशा दी। आज भी उनके विचार शांति, सहिष्णुता और संवाद के महत्व को रेखांकित करते हैं और आधुनिक समाज के लिए उतने ही प्रासंगिक बने हुए हैं।स्वतंत्रता संग्राम में गांधी के प्रमुख आंदोलन और योगदानमहात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिनका उद्देश्य आम जनता को जागरूक करना और ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ संगठित करना था। असहयोग आंदोलन के माध्यम से उन्होंने विदेशी शासन की वैधता को चुनौती दी, जबकि दांडी मार्च ने औपनिवेशिक कानूनों के अन्यायपूर्ण स्वरूप को दुनिया के सामने उजागर किया। इन आंदोलनों ने जनता में आत्मसम्मान और एकजुटता की भावना को मज़बूत किया। गांधी जी का योगदान केवल आंदोलनों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय एकता पर भी लगातार बल दिया।महात्मा गांधी की शहादत का महत्व और आज के भारत में प्रासंगिकतामहात्मा गांधी की शहादत आज भी भारत के लिए गहरा संदेश रखती है। उनके जीवन और बलिदान से यह सीख मिलती है कि हिंसा के बिना भी बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन संभव हैं। आज के समय में, जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, गांधी जी के विचार—सहिष्णुता, संवाद और शांति—और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। शहीद दिवस केवल अतीत को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन का अवसर भी है कि हम गांधी जी के मूल्यों को अपने जीवन और समाज में कितना आत्मसात कर पा रहे हैं।संदर्भ-https://tinyurl.com/ykv9knxm https://tinyurl.com/5ec5yjz9
घर - आंतरिक सज्जा/कुर्सियाँ/कालीन
कैसे पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर, लखनऊ के घरों को संस्कृति, सौंदर्य और पहचान देता है
लखनऊवासियों के लिए घर केवल चार दीवारों का ढाँचा नहीं, बल्कि तहज़ीब, सलीक़े और सांस्कृतिक विरासत का विस्तार होता है। यहाँ की जीवनशैली में कला, नफ़ासत और संतुलन की झलक हर चीज़ में दिखाई देती है - चाहे वह पहनावा हो, खानपान या फिर घर की सजावट। ऐसे में फ़र्नीचर केवल उपयोग की वस्तु नहीं रहता, बल्कि वह घर के व्यक्तित्व और सोच को भी दर्शाता है। आज लखनऊ के बाज़ारों में पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर और आधुनिक डिज़ाइनों का ऐसा सुंदर संगम देखने को मिलता है, जो अतीत की कारीगरी और वर्तमान की ज़रूरतों - दोनों को साथ लेकर चलता है। भारतीय फ़र्नीचर की यह यात्रा सदियों पुराने सामाजिक बदलावों, विदेशी प्रभावों और स्थानीय शिल्प परंपराओं से होकर आज के स्वरूप तक पहुँची है।आज इस लेख में हम भारतीय फ़र्नीचर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके विकास को समझेंगे। इसके बाद मध्यकालीन भारत में शाही संरक्षण और फ़र्नीचर निर्माण की भूमिका पर चर्चा करेंगे। फिर मुगल काल और यूरोपीय प्रभावों से बनी विविध फ़र्नीचर शैलियों को जानेंगे। आगे भारतीय फ़र्नीचर में प्रयुक्त नक्काशी, जड़ाई और सामग्रियों के महत्व पर बात करेंगे। अंत में, उन पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर वस्तुओं को समझेंगे, जो आज लखनऊ सहित देशभर में फिर से लोकप्रिय हो रही हैं।भारतीय फ़र्नीचर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विकास यात्राप्राचीन भारत में फ़र्नीचर आज की तरह रोज़मर्रा के जीवन का अनिवार्य हिस्सा नहीं था। लोग अधिकतर फ़र्श पर बैठकर जीवन व्यतीत करते थे और साधारण जीवनशैली को महत्व दिया जाता था। फिर भी, वेदिक ग्रंथों और प्राचीन साहित्य में पीढ़ा, खाटा, मुंडा और चौकी जैसी कुछ फ़र्नीचर वस्तुओं का उल्लेख मिलता है। ये वस्तुएँ विशेष अवसरों, धार्मिक कार्यों या विशिष्ट वर्ग तक ही सीमित थीं। धीरे-धीरे समाज की संरचना बदली, निजी स्थानों की अवधारणा विकसित हुई और आराम व सुविधा को अधिक महत्व मिलने लगा। इसी क्रम में फ़र्नीचर की उपयोगिता बढ़ी और वह धीरे-धीरे भारतीय घरों का हिस्सा बनने लगा। यह विकास एकदम अचानक नहीं हुआ, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव और ज़रूरतों के साथ आकार लेता गया।मध्यकालीन भारत में फ़र्नीचर निर्माण और शाही संरक्षणमध्यकालीन भारत में फ़र्नीचर निर्माण को विशेष रूप से शाही संरक्षण प्राप्त हुआ। दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य के दौरान यह कला अपने चरम पर पहुँची। इस समय लकड़ी के कारीगरों को राजपरिवार का संरक्षण और सम्मान प्राप्त था, जिससे उनकी कला में निखार आया। उस दौर का फ़र्नीचर मुख्यतः राजसी उपयोग के लिए बनाया जाता था - जैसे सिंहासन, दरबारी आसन, महलों के दरवाज़े, खंभे और सजावटी संरचनाएँ। इन वस्तुओं में भव्यता, मजबूती और बारीक कारीगरी का अनोखा मेल दिखाई देता है। आम लोगों के घरों में फ़र्नीचर का प्रचलन अभी भी सीमित था, लेकिन यह काल भारतीय फ़र्नीचर कला की तकनीकी और सौंदर्यात्मक नींव को मज़बूत करने वाला साबित हुआ।मुगल काल में भारतीय फ़र्नीचर पर कलात्मक प्रभाव16वीं शताब्दी में मुगलों के आगमन के साथ उत्तर भारत में फ़र्नीचर की शैली में एक नया अध्याय शुरू हुआ। मुगल स्थापत्य और कला की तरह ही फ़र्नीचर में भी भव्यता, संतुलन और अलंकरण पर विशेष ध्यान दिया गया। गहरे रंग की दृढ़ लकड़ियाँ, हड्डी और हाथी दाँत की जड़ाई, शीशों का प्रयोग और जटिल नक्काशी इस दौर की प्रमुख विशेषताएँ रहीं। लेखन मेज़, टेबल, दीवान और आरामदायक आसनों का प्रचलन बढ़ा। लखनऊ जैसे शहर, जहाँ मुगल और बाद में नवाबी संस्कृति का गहरा प्रभाव रहा, वहाँ यह शैली फ़र्नीचर के डिज़ाइनों में आज भी दिखाई देती है। यही कारण है कि लखनऊ के पारंपरिक फ़र्नीचर में शाही ठाठ और नज़ाकत का अहसास बना रहता है।यूरोपीय प्रभाव और इंडो-यूरोपीय फ़र्नीचर शैलियों का विकास1500 के बाद भारत में पुर्तगाली, डच, फ़्रांसीसी और अंततः अंग्रेज़ों का आगमन हुआ। जब ये यूरोपीय समुदाय भारत में बसे, तो उन्हें अपने रहन-सहन के अनुसार फ़र्नीचर की आवश्यकता पड़ी। उन्होंने भारतीय कारीगरों से वही डिज़ाइन तैयार करने को कहा, जिनका उपयोग वे यूरोप में करते थे, लेकिन स्थानीय लकड़ी और कारीगरी के साथ। इससे भारतीय और यूरोपीय शैलियों का अद्भुत संगम देखने को मिला। गोवानीज़ (Goanese), इंडो-डच (Indo-Dutch) और एंग्लो-इंडियन (Anglo-Indian) जैसी फ़र्नीचर शैलियाँ इसी प्रक्रिया से विकसित हुईं। इन शैलियों में यूरोपीय ढाँचा, लेकिन भारतीय नक्काशी और सजावटी तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। यह दौर भारतीय फ़र्नीचर को वैश्विक प्रभावों से जोड़ने वाला साबित हुआ।भारतीय फ़र्नीचर में नक्काशी, जड़ाई और सामग्री का महत्वभारतीय फ़र्नीचर की सबसे बड़ी पहचान उसकी उत्कृष्ट नक्काशी और जड़ाई है। सागौन और आबनूस जैसी मज़बूत लकड़ियों का उपयोग इसे टिकाऊ बनाता है, जबकि हाथी दाँत, हड्डी और धातु की जड़ाई इसे विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करती है। पुष्प आकृतियाँ, ज्यामितीय पैटर्न और धार्मिक प्रतीक फ़र्नीचर को केवल उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि कला का रूप देते हैं। लखनऊ के कई पुराने घरों और हवेलियों में आज भी ऐसी कारीगरी के उदाहरण मिलते हैं, जो बीते समय की शिल्प परंपरा की गवाही देते हैं। यही कारीगरी भारतीय फ़र्नीचर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाती है।पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर जो आज फिर से लोकप्रिय हो रहे हैंआधुनिक जीवनशैली के बावजूद, पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर आज फिर से लोगों की पसंद बन रहा है। बाजोट पूजा और सजावट दोनों के लिए उपयोगी है और छोटे घरों में बहुउद्देशीय फ़र्नीचर की तरह काम करता है। प्राचीन सागौन की अलमारियाँ अब केवल भंडारण नहीं, बल्कि घर की शोभा बढ़ाने वाला तत्व बन गई हैं। रंग-बिरंगे कपड़ों से सजे भारतीय ओटोमन छोटे कमरों में अतिरिक्त बैठने की जगह प्रदान करते हैं। दीवान आज भी भारतीय घरों में आराम, संवाद और परंपरा का प्रतीक बना हुआ है, जबकि लकड़ी की जालियाँ आधुनिक घरों में भी निजता और सौंदर्य का संतुलन बनाए रखती हैं। इस प्रकार, पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर लखनऊ के घरों में न केवल अतीत की यादें संजोता है, बल्कि आधुनिक जीवन को सांस्कृतिक गहराई और विशिष्ट पहचान भी प्रदान करता है।संदर्भ https://tinyurl.com/5xbrztaf https://tinyurl.com/yhyj6bykhttps://tinyurl.com/5cvy7pxu
ध्वनि II - भाषाएँ
18-04-2026 09:40 AM • Lucknow-Hindi
हिंदी-उर्दू भाषा और लखनऊ के इतिहास, तहज़ीब, कारीगरी और कबाब में छिपे ईरान के गहरे राज़
क्या आपको पता है कि भारत और ईरान का रिश्ता आधुनिक राजनीति और देशों की वर्तमान सीमाओं से कहीं ज़्यादा पुराना है। जब 60,000 साल पहले इंसानों ने अफ्रीका से बाहर क़दम रखा था, तब वे फ़ारसी तटों के साथ चलते हुए ही दक्षिण एशिया तक पहुंचे थे। यह रिश्ता सिंधु घाटी सभ्यता के समय से और भी गहरा हो गया था, जो कि शुरुआती एलामाइट और मेसोपोटामिया संस्कृतियों के बिल्कुल समकालीन थी और जिनके साथ प्राचीन ईरान का सीधा संपर्क रहता था। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि डेरियस प्रथम (Darius I) के नेतृत्व में हखामनी साम्राज्य ने 516 ईसा पूर्व में उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों यानी सिंध और पंजाब पर कब्ज़ा कर लिया था और इसे अपने विशाल साम्राज्य का बीसवां प्रांत बना लिया था। यह क्षेत्र न केवल आर्थिक रूप से बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण था, बल्कि इसने यूनान के ख़िलाफ़ ज़ेरेक्सिस के सैन्य अभियानों के लिए सैनिक भी मुहैया कराए थे। भारत पर इसी ईरानी प्रभाव के साथ खरोष्ठी लिपि का भी प्रवेश हुआ, जो मूल रूप से अरामी भाषा से निकली थी और इसे उर्दू की ही तरह दाएं से बाएं लिखा जाता था। यह लिपि तीसरी शताब्दी तक उत्तर-पश्चिमी भारत में मज़बूती से मौजूद रही। यहाँ तक कि सम्राट अशोक के मशहूर शिलालेख और उनके नैतिक नियम भी इसी ईरानी शाही घोषणाओं की शैली से प्रेरित थे। अशोक के स्तंभों पर जो घंटी के आकार के शीर्ष दिखाई देते हैं, वे ईरान के पर्सिपोलिस (Persepolis) में पाए जाने वाले स्तंभों से बेहद मिलते-जुलते हैं।
पर्सिपोलिस
आधुनिक आनुवंशिक शोध भी आज इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, ख़ासकर हमारे उत्तरी और मध्य क्षेत्रों में, प्राचीन ईरानी किसानों के साथ अपनी गहरी आनुवंशिक विरासत साझा करता है। आज भी रिज़वी (Rizwi), काज़मी (Kazmi) और नक़वी (Naqvi) जैसे कई प्रमुख भारतीय शिया परिवार अपनी जड़ें सीधे ईरान से ही जोड़ते हैं। ईरान में आज भी अल्पसंख्यक पूरी सुरक्षा के साथ रहते हैं। वहाँ 19वीं सदी में भारतीय व्यापारियों द्वारा बनाए गए दो हिंदू मंदिर और चार प्रमुख गुरुद्वारे आज भी मौजूद हैं जहाँ लोग शांति से पूजा करते हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान भी भारत और ईरान के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध न केवल बनाए रखे गए बल्कि उन्हें संस्थागत रूप भी दिया गया। व्यापार फला-फूला और आध्यात्मिक संबंध बने रहे। आज़ादी के बाद भी भारत और ईरान ने सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे। हालाँकि, हाल के दशकों में सामरिक बदलावों, ख़ासकर इज़राइल और अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती नज़दीकियों ने इस गतिशीलता को बहुत प्रभावित किया है। साल 2005 में एक बड़ा मोड़ तब आया जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र में ईरान के परमाणु कार्यक्रम के ख़िलाफ़ वोट दिया। इसके बावजूद व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान आज भी जारी है।
इंडो-आर्यन और ईरानी भाषाओं के बीच क्या समानताएं हैं? भारत की सबसे पुरानी भाषाओं में से एक संस्कृत का सीधा और गहरा संबंध इंडो-ईरानी भाषा परिवार से है। 1500 ईसा पूर्व में शुरू हुए वैदिक काल और उसके बाद के हज़ारों सालों तक भारतीय संस्कृति ने ईरान से बहुत कुछ ग्रहण किया। प्राचीन ईरानी भाषा और वैदिक संस्कृत में इतने सारे शब्द एक जैसे हैं कि भाषाविज्ञानी भी हैरान रह जाते हैं। उदाहरण के लिए, ईरानी धर्मगुरु ज़रथुस्त्र (Zarathustra) ने अहुर मज़्दा का उपदेश दिया था। यह ईरानी शब्द अहुर हमारे वेदों में असुर है। इसी तरह प्राचीन ईरान का अशा हमारे उपनिषदों के ईशा के बिल्कुल समान है। ईरानी भाषा के हवान, यस्न, जरन्य, नामन और सेना जैसे शब्द वैदिक संस्कृत के हवन, यज्ञ, हिरण्य, नामन और सेना ही हैं। दोनों महान परंपराओं की कविता के मीटर भी काफी मिलते-जुलते हैं। प्राचीन ईरानी कविता के मीटर वेदों के त्रिष्टुभ मीटर के बहुत क़रीब हैं।इतना ही नहीं, हमारी रोज़मर्रा की बातचीत में इस्तेमाल होने वाले बहुत से शब्द सीधे फ़ारसी से ही आए हैं। चादर, ज़मीन, दिल, चेहरा, ज़रूरी, दीवाना, ख़ूब, रंग, नारंगी, सफ़ेद, हमेशा, शायद, ख़राब, ख़ाली, गाय, मुर्ग़ी और चर्बी जैसे शब्द पूरी तरह से फ़ारसी के हैं, जिन्हें आज हम आम हिंदी और उर्दू में धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। इतिहास इस बात का भी गवाह है कि 17वीं शताब्दी में जब मराठा साम्राज्य के छत्रपति शिवाजी को दक्कन क्षेत्र में मुग़ल सेना के सेनापति राजस्थानी जय सिंह से कोई बातचीत करनी होती थी, तो वे संचार के लिए फ़ारसी भाषा का ही उपयोग करते थे। जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने सूरत में अपना पहला कार्यालय शुरू किया, तो सर थॉमस रो को स्थानीय भारतीय अधिकारियों के साथ संवाद करने के लिए फ़ारसी अनुवादकों को नौकरी पर रखना पड़ा था। यहाँ तक कि समाज सुधारक राजा राममोहन राय द्वारा लिखी गई सबसे पहली किताब भी फ़ारसी में ही रची गई थी। शाह, नामदार या नरीमन जैसे भारतीय नाम भी असल में फ़ारसी मूल के ही हैं।
दोनों सभ्यताओं की काव्य और साहित्यिक परंपराएं कैसी रही हैं? साहित्य और दर्शन के क्षेत्र में भी दोनों ही सभ्यताओं ने पूरी दुनिया को महान और कालजयी रचनाएं दी हैं। अगर हम भारतीय उपमहाद्वीप के संस्कृत साहित्य की बात करें, तो यह आर्यों द्वारा रचित एक अत्यंत विशाल और समृद्ध संग्रह है। आर्य लोग शायद दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के दौरान उत्तर-पश्चिम की दिशा से भारतीय उपमहाद्वीप में आए थे। धीरे-धीरे यह विशाल साहित्य उस ब्राह्मणवादी समाज की अभिव्यक्ति का मुख्य और सबसे ताक़तवर ज़रिया बन गया। 1500 ईसा पूर्व से शुरू हुए गौरवशाली वैदिक काल के बाद, संस्कृत साहित्य का शास्त्रीय काल 500 ईसा पूर्व से लेकर लगभग 1000 ईसवी तक चला। इस साहित्य ने पूरे क्षेत्र में एक मुख्य सांस्कृतिक शक्ति के रूप में ख़ुद को स्थापित किया। दक्षिण में शुरू हुए भक्ति साहित्य ने उत्तर भारत में ज़ोर पकड़ा और इसने वर्ण व्यवस्था पर आधारित सामाजिक पदानुक्रम के विचार को एक गंभीर चुनौती दी।
मौलाना जलालुद्दीन बल्खी
वहीं दूसरी ओर, फ़ारसी और सूफ़ी काव्य परंपरा में मौलाना जलालुद्दीन बल्खी (Maulana Jalaluddin Balkhi) का नाम सबसे ऊंचे मुक़ाम पर आता है, जिन्हें आज पूरी दुनिया रूमी के नाम से जानती है। उनका जन्म 30 सितंबर 1207 को फ़ारसी साम्राज्य के पूर्वी छोर पर मौजूद बल्ख प्रांत में हुआ था। जब वे युवा ही थे, तब चंगेज़ ख़ान की हमलावर सेना के खौफ़ से बचने के लिए उनके पिता अपने परिवार को लेकर पश्चिम की ओर चले गए और वर्तमान तुर्की में बस गए। 1244 में उनकी मुलाक़ात शम्स तबरीज़ नाम के एक फ़क़ीर से हुई। रूमी ख़ुद यह मानते थे कि उनकी असली कविता शम्स से मिलने के बाद ही निखर कर सामने आई। शम्स के अचानक ग़ायब होने के बाद रूमी ने उनके गहरे वियोग में 40,000 से ज़्यादा शानदार गीत और छंद लिखे। इस महान संग्रह को दीवान-ए-शम्स-ए-तबरीज़ी कहा जाता है। अपने जीवन के आख़िरी 12 सालों में रूमी ने 64,000 पंक्तियों वाली अपनी सबसे महान रचना मसनवी-ए-मानवी (Masnavi-e-manavi) भी अपने मुंशी को बोलकर लिखवाई। इस मसनवी को कुछ सूफ़ी विचारक फ़ारसी भाषा का क़ुरान भी मानते हैं। संगीत के क्षेत्र में अमीर खुसरो ने भारत की कई स्थायी संगीत परंपराओं की नींव रखी, और उन्होंने भी अपना ज़्यादातर काम फ़ारसी में ही किया था।
लखनऊ और ईरान के बीच इस गहरे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जुड़ाव का एक और बेहद अहम पहलू ईरान के पहले सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी (Ayatollah Ruhollah Khomeini) से भी जुड़ता है। शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि 1979 की इस्लामी क्रांति के प्रणेता खुमैनी की जड़ें असल में उत्तर प्रदेश की इसी ज़मीन से जुड़ी हुई थीं। उनके दादा, सैयद अहमद मूसवी, लखनऊ से महज़ कुछ दूरी पर स्थित बाराबंकी के पास पैदा हुए थे। 1830 के दशक में जब वे भारत से इराक और फिर बाद में ईरान के खुमैन शहर में जाकर बसे, तब भी उन्होंने अपनी भारतीय जड़ों और अपनी जन्मभूमि की पहचान को कभी नहीं भुलाया। इसी पहचान को आजीवन जीवित रखने के लिए उन्होंने अपने नाम के साथ हमेशा "हिंदी" उपनाम जोड़े रखा।
अहमद हिंदी एक प्रखर विद्वान थे और उनके इसी गहरे शिया विश्वास और आध्यात्मिक मूल्यों की विरासत ने अयातुल्ला खुमैनी के वैचारिक दृष्टिकोण को इतनी गहराई से आकार दिया। यह उनके दादा से मिले इन्हीं संस्कारों का प्रभाव था जिसने खुमैनी को एक सुन्नी-बहुल मध्य पूर्व (Middle East) के बीच ईरान के शिया भविष्य को एक नई दिशा देने और उसे एक शक्तिशाली शिया राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की प्रेरणा दी। लखनऊ और बाराबंकी से जुड़ा यह एक इतना सशक्त और प्रसिद्ध ऐतिहासिक तथ्य है जिससे यहाँ के ज़्यादातर लोग भली-भांति परिचित हैं। ज़ाहिर है, इस महत्वपूर्ण कड़ी को शामिल किए बिना भारत और ईरान, ख़ासकर अवध और फ़ारस के रिश्तों की कहानी पूरी तरह अधूरी ही मानी जाएगी।
लखनऊ की नवाबी तहज़ीब और ईरान के बीच क्या गहरा नाता है? लखनऊ की पूरी संस्कृति, वास्तुकला और मशहूर तहज़ीब पर ईरानी प्रभाव बिल्कुल साफ़ और जीवंत देखा जा सकता है। अवध के इन्हीं नवाबों ने लखनऊ को उत्तर भारत का सबसे परिष्कृत शहर बनाया था। ये शिया मुस्लिम शासक अपने पूर्वजों के तार सीधे ईरान के निशापुर शहर से जोड़ते थे। वे 15वीं शताब्दी के सैय्यद सुल्तानों के समय गंगा के मैदानी इलाक़ों में आकर बसे थे। 1707 में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद पैदा हुई राजनीतिक अराजकता का भरपूर फ़ायदा उठाते हुए ये नवाब मुग़ल साम्राज्य के कमज़ोर होने पर धीरे-धीरे स्वतंत्र शासक बन गए। नवाब आसफ़-उद्दौला और उनके बाद वाजिद अली शाह के शानदार शासनकाल में ईरान से पूरी तरह प्रभावित लखनऊ की यह कलात्मक नवाबी संस्कृति अपने चरम शिखर पर पहुँच गई। शासक और दरबारी बेहतरीन मलमल के लंबे कपड़े और उन पर खूबसूरत ब्रोकेड कोट पहना करते थे।
आज भी लखनऊ के पुराने मोहल्लों और ऐतिहासिक इमारतों में यह खूबसूरत ईरानी झलक क़ायम है। नवाब आसफ़-उद्दौला द्वारा बनवाया गया विशाल आसफ़ी इमामबाड़ा शिया धार्मिक अनुष्ठानों का एक प्रमुख केंद्र है। मोहर्रम के दौरान पैगंबर के पोते इमाम हुसैन की शहादत की याद में जो ख़ूबसूरत ताज़िया बनाए जाते हैं, वे असल में हुसैन के मक़बरे की ही हूबहू प्रतिकृतियां होते हैं। लखनऊ की विश्व प्रसिद्ध चिकनकारी, ख़ासकर बारीक मलमल के कपड़े पर सफ़ेद धागे से की जाने वाली जादुई कढ़ाई, इसी परिष्कृत ईरानी संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। पुराने शहर की गलियों में आपको आज भी क़ुरान रखने के स्टैंड बनाने वाले, ताज़िया बनाने वाले कारीगर और पीतल का काम करने वाले आसानी से मिल जाएंगे। खान-पान की बात करें तो इदरीस की दुकान पर कोयले की धीमी आंच पर एक बड़े बर्तन में पकने वाली मटन बिरयानी, मुबीन का लज़ीज़ मुर्ग़ और निहारी कुल्चा, और मशहूर गलावटी कबाब जिसमें 160 प्रकार के विशेष मसाले पड़ते हैं, इसी समृद्ध नवाबी और ईरानी पाक कला की विरासत की देन हैं।लखनऊ, उत्तर प्रदेश और ईरान का रिश्ता केवल इतिहास तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह राजनीतिक रूप से भी अक्सर चर्चा के केंद्र में रहता है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ईरान के पहले सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी (Ayatollah Khomeini) और उत्तर प्रदेश के बीच के ऐतिहासिक संबंध को समझाने वाली ख़बरें भी प्रमुखता से छपी हैं। इन ताज़ा ख़बरों के केंद्र में ईरान की वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति और अमेरिका तथा इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए ताज़ा हवाई हमले हैं। इन भयानक हमलों में ईरान के मौजूदा सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई और उनके परिवार के कई सदस्यों के मारे जाने की बात सामने आई है। इस बड़ी घटना के बाद पूरे ईरान में 40 दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। ये तमाम आधुनिक घटनाक्रम और पुरानी ऐतिहासिक कड़ियाँ इस बात को पूरी तरह से साबित करती हैं कि भारत, ख़ासकर उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर और ईरान के बीच के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक संबंध कितने गहरे और अटूट हैं।
विश्व में हुआ मुद्रण का आरंभ: सिद्धम लिपि में लिखे धरणी बौद्ध मंत्रों के प्रचारण से
लखनऊ, क्या आप जानते हैं कि "धरणी" संस्कृत मंत्र क्या हैं? दरअसल, दुनिया में प्रिंटिंग (मुद्रण) की सबसे पहली तकनीक (चीन, कोरिया और जापान में) इन्हीं धरणी मंत्रों को रिकॉर्ड करने, दोहराने और प्रचारित करने के लिए शुरू की गई थी। आइए, आज इसके पीछे मौजूद संभावित कारणों और इतिहास को समझते हैं। अधिकांश धरणी "सिद्धम" लिपि में हैं, जिसका उपयोग शुरूआत में भारत में होता था। सिद्धम लिपि एक आबूगीदा या वर्णमाला लिपि है, जो आधुनिक भारतीय लिपियों से निकटता से संबंधित है। चलिए पढ़ते हैं। धरणी, जिन्हें विद्या और परिता के नाम से भी जाना जाता है, लंबे बौद्ध मंत्र हैं, जो स्मरणीय कोड, मंत्र या सस्वर पाठ के रूप में कार्य करते हैं। लगभग सभी धरणी मंत्र संस्कृत में रचे गए थे, हालांकि कुछ धरणी पाली भाषा में भी मिलते हैं। माना जाता है कि, ये मंत्र बौद्ध साधकों के लिए सुरक्षा रुपी कवच बनकर, उन्हें आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी ले जाने की शक्ति रखते हैं। यही वजह है कि ये मंत्र ऐतिहासिक बौद्ध साहित्य का एक बड़ा हिस्सा हैं। अधिकांश संस्कृत धरणी को 'सिद्धम' जैसी लिपियों में लिखा गया है, जिसका चीनी, कोरियाई, जापानी, वियतनामी, सिंहली, थाई आदि क्षेत्रीय लिपियों में लिप्यंतरण (Transliteration) किया जा सकता है। ये मंत्र वैदिक मंत्रों और पाठों के समान ही हैं, और उनकी निरंतरता को दर्शाते हैं।
धरणी मंत्र बौद्ध धर्म की सभी प्रमुख परंपराओं के प्राचीन ग्रंथों में पाए जाते हैं। ये थेरवाद परंपरा द्वारा संरक्षित 'पाली कैनन' (Pali Cannon) का एक बड़ा हिस्सा हैं। 'सद्धर्मपुण्डरीक सूत्र' (कमल सूत्र) और 'हृदय सूत्र' जैसे महायान सूत्रों में भी धरणी मंत्र शामिल हैं, या उनके अंत में ये मंत्र दिए गए हैं। 'पंचरक्षा' जैसे कुछ बौद्ध ग्रंथ, पूरी तरह से धरणी को ही समर्पित हैं। ये नियमित अनुष्ठानिक प्रार्थनाओं का हिस्सा होने के साथ-साथ अपने आप में एक ताबीज या भाग्य आकर्षक भी माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इनका पाठ करने से दुर्भाग्य, बीमारियाँ या अन्य आपदाएँ टल जाती हैं। पूर्वी एशिया में, बौद्ध मठों के प्रशिक्षण में ये एक अनिवार्य हिस्सा थे। कुछ बौद्ध क्षेत्रों में तो इनका इतना महत्व था कि, किसी भी कारवाही की स्तिथि में, कोई गवाह सत्य बोलने की शपथ इन्हीं ग्रंथों पर हाथ रखकर लेते थे। पहली सहस्राब्दी ईस्वी में पूर्वी एशिया में 'धरणी-साहित्य' काफी लोकप्रिय हो गया था। चीनी रिकॉर्ड बताते हैं कि, ईस्वी सन् की शुरुआती शताब्दियों में ही इनका काफी प्रसार हो चुका था। तभी से ये चीन से कोरिया और जापान में पहुँचे। बौद्ध भक्तों के बीच इन छपे हुए धरणी मंत्रों की भारी मांग ने ही, शायद मुद्रण (Printing) तकनीक के विकास को प्रेरणा दी। रॉबर्ट सीवेल (Robert Sewell) और अन्य विद्वानों का मानना है कि, पूर्वी एशिया के ये धरणी रिकॉर्ड दुनिया के सबसे पुराने "प्रमाणित मुद्रित ग्रंथ" हैं। दक्षिण कोरिया के ग्योंग्जू (Gyeongju) में स्थित 'बुलगुक्सा (Bulguksa)' मंदिर से मिले आठवीं शताब्दी के शुरुआती धरणी ग्रंथों को दुनिया के सबसे पुराने ज्ञात मुद्रित ग्रंथों के रूप में मान्यता प्राप्त है। एक तरफ, कागज पर 'वुडब्लॉक प्रिंटिंग' (लकड़ी के ठप्पों से मुद्रण) का सबसे पुराना नमूना 1974 में, चीन के शियान (Xi'an) में खुदाई के दौरान मिला था। यह गांजे के रेशों से बने कागज (Hemp paper) पर छपा एक धरणी सूत्र है, जो तत्कालीन तांग राजवंश (618–907 ईस्वी) के दौरान लगभग 650 से 670 ईस्वी का है। वहीं तांग राजवंश के ही शुरुआती काल का एक और मुद्रित दस्तावेज़ मिला है, जो 690 से 699 ईस्वी के बीच छपा 'सद्धर्मपुण्डरीक सूत्र' या कमल सूत्र (Lotus Sutra) है।1966 में शोधकर्ताओं को दक्षिण कोरिया के बुलगुक्सा बौद्ध मंदिर के अंदर रेशमी कपड़े में लिपटा हुआ कागज का एक स्क्रॉल (Paper Scroll) मिला। यह 'प्योर लाइट धरणी सूत्र (Pure Light Dharani Sutra)' नामक बौद्ध सूत्र की एक प्रति थी। जोसेफ नीधम (Joseph Needham) ने 1970 में इसके लिखे जाने का समय लगभग 684 से 704 ईस्वी के बीच बताया था। बाद में, 1968 में मैकगिल विश्वविद्यालय (McGill University) ने 'ह्याकुमान्तो धरणी' (Hyakumanto Dharani) की एक प्रति हासिल की, जो मुद्रित पाठ के सबसे पुराने जीवित उदाहरणों में से एक है। इसके साथ वह छोटा लकड़ी का पैगोडा भी था, जिसमें इसे हजार साल से भी पहले रखा गया था। प्राचीन काल में माना जाता था कि, धरणी का जाप करने या उसकी प्रतिलिपि तैयार करने से व्यक्ति या पूरे देश की रक्षा होती है। जापान की महारानी - शोतोकु (Shotoku) ने आठवीं शताब्दी में बौद्ध धर्मगुरुओं को शांत करने और तब वहां हुए एक विद्रोह में मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए इन धरणी मंत्रों को छपवाया था। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, लगभग 770 ईस्वी के आसपास पूरे जापान में इस धरणी की दस लाख प्रतियाँ बनाकर बांटी गई थीं। इनमें से प्रत्येक धरणी को एक छोटे लकड़ी के पैगोडा में रखा गया था। पैगोडा का सबसे मुख्य धार्मिक कार्य बुद्ध के अवशेषों को सुरक्षित रखना और पूजा स्वीकार करना होता है। इस पैगोडा का मुख्य हिस्सा 'हिनोकी' लकड़ी से बना है और सफेद रंग से रंगा गया है। इसका शिखर चेरी के पेड़ से प्राप्त लकड़ी से बना है।
ह्याकुमान्तो धरणी
यह धरणी पाठ एक छोटे कागज के स्क्रॉल पर छपा है, जिसमें चीनी अक्षरों की तेईस कतारें हैं। इन प्रतियों की विशाल संख्या और छपे हुए अक्षरों की बनावट को देखते हुए, आज भी विद्वानों के बीच बहस होती है कि, क्या इन्हें लकड़ी के ब्लॉकों से छापा गया था या फिर, धातु प्रकार (Metal type) यंत्र का इस्तेमाल किया गया था? जो भी हो, उत्पादन का इतना बड़ा पैमाना सदियों तक दोबारा नहीं देखा गया। चलिए, अब हम धरणी मंत्रों की सिद्धम लिपि और आबूगीदा प्रणाली के बारे में जानते हैं। सिद्धम (जिसे कुटिला भी कहा जाता है) एक भारतीय लिपि है, जिसका उपयोग भारत में छठी से तेरहवीं शताब्दी तक किया गया था। इसे 'सिद्धमृत्का' के नाम से भी जाना जाता है। यह मध्यकालीन ब्राह्मी ‘आबूगीदा’ लिपि है, जो गुप्त लिपि से निकली है और आज की नागरी (देवनागरी), बंगाली, तिरहुता, ओडिया और नेपाली लिपियों की जननी है। भारतीय बौद्धों द्वारा सिद्धम लिपि का व्यापक रूप से उपयोग किया गया था, और आज भी पूर्वी एशियाई बौद्धों के बीच मंत्रों और धरणी लिखने के लिए इसका उपयोग होता है। संस्कृत में 'सिद्धम' शब्द का अर्थ "सिद्ध", "पूर्ण" या "सफल" है। इस लिपि का यह नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि दस्तावेजों की शुरुआत में 'सिद्धम' या 'सिद्धम अस्तु' (सिद्धि हो) लिखने का रिवाज था। सिद्धम एक वर्णमाला (Alphabet Set) न होकर, एक आबूगीदा (Abugida) लिपि है। इसमें हर अक्षर एक शब्दांश (Syllable) को दर्शाता है, जिसमें एक व्यंजन और (संभावित रूप से) एक स्वर शामिल होता है। यदि स्वर अलग से नहीं दिखाया गया है, तो 'अ' का स्वर उसमें पहले से ही माना जाता है। अन्य स्वरों को दर्शाने के लिए मात्राओं (Diacritic marks) का उपयोग किया जाता है, जैसे कि - अनुस्वार और विसर्ग। सिद्धम ग्रंथों को अन्य भारतीय लिपियों की तरह, आमतौर पर बाएं से दाएं और फिर ऊपर से नीचे लिखा जाता था। लेकिन कभी-कभी इसे पारंपरिक चीनी शैली में, ऊपर से नीचे और दाएं से बाएं भी लिखा जाता था। सिद्धम-जापानी द्विभाषी ग्रंथों में एक रोचक बात दिखती है। पांडुलिपि को 90 डिग्री घुमाकर जापानी भाषा ऊपर से नीचे लिखी जाती थी, और फिर वापस घुमाकर सिद्धम लिपि बाएं से दाएं लिखी जाती थी। दरअसल, एक आबूगीदा (जिसे 'अल्फासिलेबल' भी कहते हैं - alphasyllable) एक ऐसी लेखन प्रणाली है, जिसमें व्यंजन-स्वर के अनुक्रम को एक इकाई के रूप में लिखा जाता है। हर इकाई एक व्यंजन पर आधारित होती है और स्वर का स्थान गौण (मात्रा के रूप में) होता है। यह अंग्रेजी जैसी पूर्ण ‘अल्फाबेट’ प्रणाली से अलग है, जहाँ स्वर और व्यंजन का दर्जा बराबर होता है। हिंदी और अंग्रेजी के बीच सबसे बड़ा अंतर यही है कि, हिंदी में शब्द केवल व्यंजनों और स्वरों का क्रम नहीं है। यहाँ व्यंजन-स्वर मिलकर एक इकाई बनते हैं, जहाँ स्वर की मात्रा व्यंजन पर निर्भर होती है। इसी को अबुगिदा या वर्णमाला प्रणाली कहते हैं।
राम नवमी विशेष: विष्णु-तत्त्व और प्रभु श्री राम के अवतार का आध्यात्मिक रहस्य
सनातन धर्म को लेकर अक्सर लोग इस असमंजस में रहते हैं कि, क्या वास्तव में यह (सनातन) बहुदेववाद यानी अनेक देवी-देवताओं को पूजने वाला धर्म है, अथवा एकेश्वरवाद (एक ही ईश्वर में विश्वास रखने वाला) धर्म है? यथार्थ में इसका सटीक और एकदम सही उत्तर तो केवल ईश्वर ही जानते हैं। लेकिन हम अपनी समझ बेहतर करने के लिए सनातन को उस दीपक की भांति संदर्भित कर सकते हैं, जिसकी चमक से पूरा कक्ष रौशन रहता है, किंतु रोशनी केवल एक स्रोत (लौ) से आती है। रौशनी के इसी सर्वशक्तिमान स्त्रोत को सनातन में विष्णु-तत्त्व कहा गया है। हिंदू धर्म में, भगवान के कई रूप हैं, लेकिन ईश्वर के सभी रूपों को विष्णु-तत्व या भगवान कृष्ण का विस्तार माना जाता है। इसका मतलब यह है कि यदि आप भगवान विष्णु के किसी भी रूप की पूजा करते हैं तो, आप वास्तव में मूल परमात्मा की ही पूजा कर रहे हैं। प्रत्येक जीव किसी न किसी प्रकार से पूजा में लगा हुआ है, चाहे वे भगवान में विश्वास करते हैं या नहीं।
श्रीमद्भागवतम में प्रह्लाद महाराज ने शुद्ध भक्ति सेवा की नौ प्रक्रियाओं की सूची प्रदान की है, जिसमें भगवान विष्णु के पारलौकिक पवित्र नाम, रूप, गुण, साज-सामान और लीलाओं के बारे में सुनना और जप करना शामिल है। अन्य प्रक्रियाओं में उनका स्मरण करना, भगवान के चरण कमलों की सेवा करना, सोलह प्रकार की साज-सज्जा के साथ आदरपूर्वक पूजा करना, प्रार्थना करना, उनका सेवक बनना, प्रभु को अपना परम मित्र मानना और उन्हें अपना सब कुछ सौंप देना शामिल है। भगवान की किसी भी प्रकार से पूजा, रूप या विश्वास की परवाह किए बिना, अंततः मूल स्रोत, भगवान कृष्ण (विष्णु) की ओर ही ले जाती है। तत्त्व, या सत्य की अवधारणा, हिंदू धर्म में भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को संदर्भित करती है। उनमें से विष्णु-तत्व, जीव-तत्व, और शक्ति-तत्व प्रमुख हैं। विष्णु-तत्व को परम भगवान कृष्ण का सर्वव्यापी पहलू माना जाता है, जो परमात्मा के रूप में अपने आंशिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से पूरे ब्रह्मांड की देखभाल करते हैं। भगवान विष्णु प्रत्येक परमाणु के भीतर परमात्मा के रूप में विद्यमान हैं। जीव-तत्त्व, जीवों (मनुष्य, जानवर आदि) को संदर्भित करता है, जो शाश्वत और जीवित शक्तियां भी हैं लेकिन वह सर्वोच्च भगवान की तुलना में बहुत कम शक्तिशाली हैं। शक्ति-तत्व, भगवान की ऊर्जा या सामर्थ्य को संदर्भित करता है।
जब कृष्ण या राम धरती पर प्रकट होते हैं, तो वे जीव-तत्व, विष्णु-तत्व, और शक्ति-तत्व सहित अपने सभी एकीकृत भागों के साथ प्रकट होते हैं। भगवान की शक्ति हर छोटी बड़ी चीज में मौजूद है, यहां तक कि ब्रह्मा, बलदेव, और योगमाया भी उनके प्रकट होने में एक भूमिका निभाते हैं। हिंदू धर्म में भगवान के कई रूप हैं और हर एक की पूजा अलग-अलग तरीके से की जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अलग-अलग आत्माएं अलग-अलग तरीकों से भगवान की सेवा करने के लिए स्वाभाविक रूप से प्रवृत्त होती हैं। उदाहरण के लिए, भगवान विष्णु, जिन्हें नारायण के नाम से भी जाना जाता है, की पूजा उन लोगों द्वारा की जाती है जो भगवान को बहुत ही ऐश्वर्यशाली और शक्तिशाली के रूप में देखना पसंद करते हैं। नारायण की चार भुजाएँ हैं जिनमें शंख, चक्र, गदा और कमल का फूल सुसज्ज्ति है, और वे बहुत सुंदर और विस्मयकारी हैं।
दूसरी ओर, कृष्ण को भगवान का सबसे आकर्षक रूप माना जाता है, और उनकी पूजा उन लोगों द्वारा की जाती है जो भगवान के साथ वैवाहिक प्रेम या किसी अन्य प्रकार के शुद्ध प्रेम का आनंद लेना चाहते हैं। हालांकि, अगर भगवान विष्णु के राम अवतार की बात की जाए तो हम देखते हैं कि राम के सबसे बड़े भक्त, हनुमान, केवल राम की पूजा करते हैं और किसी और को भगवान के रूप में देखने से इंकार करते हैं। सरल शब्दों में देखें तो परम सत्य के विभिन्न पहलू होते हैं, जिन्हें तत्त्व के रूप में जाना जाता है। विष्णु-तत्व, जीव-तत्व और शक्ति-तत्व में से सबसे महत्वपूर्ण विष्णु-तत्व है, जो हर जगह मौजूद है। विष्णु-तत्त्व भगवान के परम व्यक्तित्व का सर्वव्यापी पहलू है। जीव-तत्व को ऊर्जा के रूप में वर्गीकृत किया गया है, ऊर्जावान के रूप में नहीं। जीव-तत्व अग्नि द्वारा उत्पन्न ऊष्मा के समान है, जबकि परमेश्वर स्वयं अग्नि के समान ऊर्जावान हैं। हम जीव आग की चिंगारी की तरह हैं जो आग से अलग होने पर अपनी रोशनी खो देती हैं।
प्रभु श्री राम के जन्म की कथा इन्ही तत्वों के बीच के आपसी भेद को आध्यात्मिक व् शानदार रूप से संदर्भित करती है! कथा कुछ इस प्रकार है: हजारों साल पहले, सरयू नदी के तट पर, अयोध्या के खूबसूरत शहर में इक्ष्वाकु वंश के “दशरथ” नाम के एक राजा रहते थे; मान्यता अनुसार उन्होंने अपनी “दस इन्द्रियों” को अपने वश में करा हुआ था । वह एक उदार और बुद्धिमान राजा थे। उनकी तीन पत्नियां कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा थीं। अपने प्रजा के प्रिय होने के बावजूद, वह लगातार चिंतित और उदास रहते थे क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं थी। एक दिन राजा ने अपने पुरोहित गुरु वशिष्ठ को बुलाकर अपनी व्यथा सुनाई। वशिष्ठ ने कहा कि उनके जल्द ही चार बेटे होंगे और इसके लिए उन्होंने राजा को अश्वमेध यज्ञ करने की सलाह दी। इसके बाद दशरथ और उनके मंत्रियों ने वैदिक अनुष्ठान की सभी व्यवस्था करनी शुरू कर दीं और अयोध्या शहर को भव्य रूप से सजाया गया।
अनुष्ठान के अंत में, यज्ञ की अग्नि से एक दिव्य प्राणी निकला, जिसके हाथों में दिव्य मिष्ठान का पात्र था। उन्होंने मिष्ठान का पात्र दशरथ को दे दिया, जिन्होंने इसे अपनी पत्नियों में बांट दिया - दशरथ ने मिठाई का आधा हिस्सा कौशल्या को,एक चौथाई सुमित्रा को और आठवां हिस्सा कैकेयी को दिया। हालाँकि,अभी भी कुछ मिठाई बची हुई थी,इसलिए उन्होंने इसे फिर से सुमित्रा को दे दिया। । जल्द ही, उनकी सभी पत्नियां गर्भवती हुईं और बारह महीने के बाद, रानी कौशल्या ने राम को जन्म दिया, जिन्हे भगवान विष्णु (विष्णु तत्व) का अवतार माना जाता है। राम के जन्म दिवस को अब रामनवमी के रूप में मनाया जाता है, जो चैत्र महीने में नौवें दिन पड़ता है।
उषा उथुप (जन्म 8 नवम्बर 1947) भारतीय पॉप संगीत की उन विशिष्ट आवाज़ों में से हैं, जिन्होंने परंपरागत सीमाओं को तोड़ते हुए अपनी अलग पहचान बनाई। मुंबई में जन्मी और विभिन्न शहरों में पली-बढ़ीं उषा ने कम उम्र से ही संगीत में रुचि दिखाई। 1960 के दशक के अंत में चेन्नई और कोलकाता के नाइटक्लबों में लाइव परफ़ॉर्मेंस से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की, जहाँ उनकी गहरी, अनोखी और सशक्त आवाज़ ने श्रोताओं का ध्यान तुरंत आकर्षित किया। उस दौर में जब मुख्यधारा भारतीय संगीत मुख्यतः फिल्मी धुनों तक सीमित था, उषा उथुप ने जैज़, पॉप और डिस्को जैसी पश्चिमी शैलियों को भारतीय मंच पर आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया। साड़ी और बड़ी बिंदी में उनका मंचीय व्यक्तित्व इस बात का प्रतीक बना कि आधुनिकता और भारतीय सांस्कृतिक पहचान साथ-साथ चल सकती है। उन्हें पद्मश्री सहित अनेक सम्मानों से सम्मानित किया गया है, और उनके जीवन व करियर पर आधारित जीवनी The Queen of Indian Pop उनके लंबे और प्रभावशाली सफर को रेखांकित करती है।
उल्लेखित वीडियो प्रस्तुतियों में उनकी वही जीवंत ऊर्जा, लयबद्धता और दर्शकों से सीधा संवाद करने की क्षमता दिखाई देती है, जिसने उन्हें दशकों तक प्रासंगिक बनाए रखा। उषा उथुप ने यह सिद्ध किया कि महिला कलाकार केवल पारंपरिक या सीमित भूमिकाओं तक बंधी नहीं हैं; वे मंच की कमान संभाल सकती हैं, नए प्रयोग कर सकती हैं और वैश्विक संगीत शैलियों को भारतीय श्रोताओं के अनुरूप ढाल सकती हैं। उनका स्वर केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और सांस्कृतिक समावेशन का प्रतीक बन गया।
होली का पर्व और इससे जुड़ी कथाएं, परंपराएं और सामाजिक महत्व
भारत में मनाए जाने वाले हर त्यौहार के पीछे कोई न कोई कारण और प्रभाव अवश्य ही छिपा रहता है और ऐसा ही एक त्यौहार होली का भी है, जिसे प्रेम, भाईचारे और एकता के प्रतीक के रूप में हर वर्ष सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है। यह पर्व सभी प्रकार के भेदों को मिटाकर समाज को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास करता है। बच्चे-बड़े, महिला-पुरूष, जाति और पंथ के बीच के भेदों को मिटाकर इस दिन सबको समान भाव से देखा जाता है। होली जहां रंगों का त्यौहार है, वहीं वसंत ऋतु की शुरुआत का भी प्रतीक है। पूर्वी राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल और ओडिशा में यह पर्व एक दिन पहले मनाया जाता है, जबकि उत्तरी उत्तर प्रदेश राज्य के कुछ हिस्सों में, यह उत्सव एक सप्ताह से भी अधिक समय तक मनाया जाता है।इस त्यौहार की किवदंती दानव राजा हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के दहन से जुडी हुई है। माना जाता है कि जब हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद ने अपने पिता को ब्रह्मांड का शासक न मानकर भगवान विष्णु को ब्रह्मांड का शासक माना, तब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के लिए अपनी बहन होलिका के साथ एक साजिश रची, जिसमें वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर आग की लपटों पर बैठी। चूंकि होलिका को आग से न जलने का वरदान प्राप्त था इसलिए हिरण्यकश्यप को लगा कि प्रह्लाद को मारने की यह साजिश सफल होगी, किंतु परिणाम उल्टा हुआ। प्रह्लाद तो बच गया लेकिन होलिका पूर्ण रूप से जल गयी क्योंकि वह केवल तब ही बच सकती थी जब वह अकले आग में बैठी होती। इस प्रकार बुराई पर अच्छाई की जीत हुई और पाप का अंत हुआ। पर्व से ठीक एक दिन पहले होलिका दहन की प्रक्रिया की जाती है तथा अगले दिन रंगों से होली खेली जाती है।रंगीन पाउडर और पानी फेंकने की परंपरा राधा और कृष्ण की पौराणिक प्रेम कहानी से उत्पन्न हुई है। माना जाता है कि सांवले कृष्ण ने जब राधा के गोरे रंग के बारे में अपनी माँ से शिकायत की तो बेटे की उदासी को कम करने के लिए, उनकी माँ ने उन्हें राधा की त्वचा को रंग से रंगने को कहा। इस प्रकार तब से प्रियजनों को रंग लगाने की यह परंपरा चली आ रही है। होली का लुफ्त जहां भारतीय लोग उठाते हैं, तो वहीं विदेशों से आये पर्यटक भी होली की इन छुट्टियों का आनंद लेते हैं। होली की सबसे खास बात यह है कि यह तुल्यकारक की भूमिका निभाती है। वर्तमान समय में विभिन्न कारकों की वजह से लोगों की बीच स्थापित दूरियों को कम करने में यह पर्व सहायक बना है। आय, जाति, पेशा और धर्म प्रतीकात्मक रूप इस दिन गायब हो जाते हैं। हिंदू धर्म के लोगों के साथ-साथ अन्य धर्म के लोग भी इस पर्व में शामिल होते हैं, जिसका उदाहरण लखनऊ में मनायी जाने वाली होली से लिया जा सकता है। चौक बाज़ार, अकबरी गेट, राजा बाज़ार आदि स्थानों पर होली के दिन हिंदू-मुस्लिम एकता के सुंदर दृश्य को अवश्य देखा जा सकता है। कई मुस्लिम कवियों द्वारा होली की सुंदरता को उनकी कविताओं में भी दर्शाया गया है।
कवि मीर लखनऊ की होली से बहुत प्रभावित थे और यह प्रभाव उनकी कविताओं में भी दिखाई देता है, जैसे उनकी कविताओं की कुछ पंक्तियां निम्न प्रकार हैं: आओ साथी बहार फिर आई होली में कितनी शदियां लायी जिस तरफ देखो मार्का सा है शहर हा या कोई तमाशा है थाल भर भर अबीर लाते हैं गुल की पत्ती मिला उड़ाते हैं
इसी प्रकार अवध के आखरी नवाब, वाजिद अली शाह द्वारा होली के संदर्भ में लिखी गयी कुछ पंक्तियां निम्न प्रकार हैं: मोरे कान्हा जो आये पलट के अबके होली मई खेलूंगी डट के उनके पीछे मई चुपके से जाके ये गुलाल अपने तन से लगाके रंग दूंगी उन्हें भी लिपट के
वैश्विक माइक्रोचिप संकट और भारत: सेमीकंडक्टर निर्माण केंद्र बनने की चुनौतियाँ व संभावनाएँ
अर्धचालक चिप्स (Semiconductor chips), जिसे माइक्रोचिप्स (Microchips) या एकीकृत सर्किट (Circuit) के रूप में भी जाना जाता है, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स (Consumer Electronics) से लेकर स्वास्थ्य सेवा तक लगभग हर उद्योग में एक महत्वपूर्ण घटक हैं। हालाँकि, इनकी सीमित आपूर्ति के कारण, दुनिया वर्तमान में चिप की कमी का सामना कर रही है।इस कमी को देखते हुए भारतीय सरकार ने दिसंबर 2021 में, देश को वैश्विक चिप निर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय अर्धचालक और डिस्प्ले (Display) निर्माताओं को आकर्षित करने के लिए 76,000 करोड़ रुपये (लगभग 10 बिलियन डॉलर) की प्रोत्साहन योजना को शुरू करने का प्रयास किया।लेकिन चीन और वियतनाम (Vietnam) जैसे अधिक प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में कमजोर पारिस्थितिकी तंत्र और संसाधनों की कमी के कारण भारत सेमीकंडक्टर वेलखनऊफर फैब्रिकेशन इकाइयों (Semiconductor wafer fabrication) की स्थापना में पिछड़ गया है। फैब निर्माण इकाइयां स्थापित करने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक यह तथ्य है कि इसके लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होती है।अरबों डॉलर में चलने वाली भारी लागत के अलावा, एक चिप के निर्माण में भी सैकड़ों गैलन शुद्ध पानी की आवश्यकता होती है, जो भारत में आवश्यक मात्रा में मिलना भी मुश्किल हो सकता है।निर्बाध बिजली आपूर्ति एक और बड़ी बाधा है। इस मुद्दे की जड़ यह है कि भारत अभी भी चिप निर्माण क्षेत्र में प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे के बराबर नहीं है। दरसल अर्धचालक चिप एक विद्युत परिपथ है जिसमें कई घटक जैसे ट्रांजिस्टर (Transistors) और अर्धचालक वेफर (Semiconductor wafer) पर तारों का निर्माण होता है। वे अधिकांश आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए छोटे दिमाग के रूप में कार्य करते हैं।इन चिप्स को बनाने के लिए, रेत से सिलिकॉन (Silicon) निकाला जाता है और ठोस सिलेंडर (Cylinder) में पिघलाया जाता है जिसे सिल्लियां कहा जाता है। इन सिल्लियों को फिर बहुत पतले वेफर्स में काट दिया जाता है और पॉलिश (Polish) की जाती है, जिसके बाद उन पर जटिल परिपथ मुद्रित होते हैं। अंत में, वेफर्स को अलग- अलग अर्धचालकों में काट दिया जाता है और तैयार चिप्स में पैक किया जाता है, जिसे बाद में एक परिपथ पट्ट पर रखा जा सकता है। इन चिप्स का निर्माण करना एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें तीन महीने से अधिक समय लगता है। लेकिन महामारी के चलते विश्व भर में चिप की कमी आ गई है। कोविड -19 ने आबादी के एक महत्वपूर्ण हिस्से को घर के अंदर रहने को मजबूर कर दिया है, जिससे उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे लैपटॉप (Laptop), फोन (Phones) और गेमिंग कंसोल (Gaming consoles) की मांग में अचानक वृद्धि हुई है।साथ ही क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrencies) की अचानक लोकप्रियता ने दुनिया भर में और अधिक खनन कार्यों को बढ़ा दिया है, जिसके लिए अधिक प्रसंस्करण इकाइयों की आवश्यकता होती है।हालांकि मांग बढ़ी है, आपूर्ति गिर गई है। दूसरी ओर,कार निर्माता ने महामारी की शुरुआत में अपने चिप के ऑर्डर (Order) को कम कर दिया, यह मानते हुए कि उपभोक्ताओं को नए वाहन खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं होगी,जिस वजह से आपूर्ति में गलत अनुमान लगाया गया और कम चिप का उत्पादन किया गया।संयुक्त राज्य अमेरिका (United States) और चीन (China) के बीच तनावपूर्ण संबंधों ने खराब आपूर्ति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, क्योंकि चीन चिप्स के सबसे बड़े निर्माताओं में से एक है।
कई कंपनियां जिन्हें सेमीकंडक्टर्स की आवश्यकता होती है, उन्होंने पहले से ही अपनी दीर्घकालिक खरीद रणनीतियों पर पुनर्विचार करना प्रारंभ कर दिया है।कुछ उदाहरण के लिए उसी समय ऑर्डर करने वाली प्रणाली, जो वस्तुसूची की लागत को कम करने में मदद करता है, से हटकर अर्धचालक को पहले से ऑर्डर करने पर विचार कर रहे हैं।कई अर्धचालक कंपनियां (Company) मजबूत बने रहने के लिए अपनी दीर्घकालिक रणनीतियों को समायोजित कर रही हैं।अर्धचालक कंपनियां जो भी निर्णय लेती हैं, वह उनके उद्योग और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए व्यापक आर्थिक महत्व हो सकता है। 2000 के दशक की शुरुआत में, अर्धचालक कंपनियों में लाभ मार्जिन (Profit Margin) कम था, जिसमें पूंजी की लागत से कम प्रतिफल उत्पन्न होता था। पिछले दशक के दौरान लाभप्रदता में सुधार हुआ, जो हालांकि, अधिकांश उद्योगों में माइक्रोचिप्स की बढ़ती मांग, प्रौद्योगिकी क्षेत्र की तीव्रवृद्धि, और क्लाउड के उपयोग में वृद्धि के साथ-साथ कई उप-खंडों में चल रहे समेकन से प्रेरित था। एक परिणाम यह है कि अर्धचालक उद्योग की लाभप्रदता अन्य उद्योगों की तुलना में काफी बेहतर हुई है, और यह प्रवृत्ति जारी रहने की उम्मीद है।जैसा कि किसी भी उद्योग में होता है, मूल्य सृजन उत्पाद श्रेणी के अनुसार भिन्न होता है, इसलिए कुछ खंडों में परिवर्तन दूसरों की तुलना में अधिक प्रभाव डाल सकते हैं। उदाहरण के लिए, मेमोरी (Memory) सबसे अधिक लाभदायक खंड रहा है, इसके बाद फैबलेस (Fabless) कंपनियां हैं जो अपने स्वयं के चिप्स डिजाइन करती हैं लेकिन अपने निर्माण को बाहरी स्रोत को देती हैं।कुछ क्षेत्रीय भिन्नताएँ भी स्पष्ट हैं। उत्तरी अमेरिका, कुछ सबसे बड़े फैबलेस खिलाड़ियों का घर, के पास 2015-19 की अवधि के दौरान वैश्विक अर्धचालक मूल्य पूल का लगभग 60% हिस्सा था। वहीं एशिया, जो अभी भी अनुबंध चिप निर्माण का केंद्र है, शेष 36% के लिए जिम्मेदार है। इस भौगोलिक प्रसार के साथ, अर्धचालक उद्योग के भीतर मूल्य निर्माण दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकता है। उत्पादन क्षमता बढ़ाने के अलावा, अर्धचालक कंपनियां अपने विकास को जारी रखने और ग्राहकों की मांग को पूरा करने के लिए कई कदमों पर विचार कर सकती हैं। वे लाभदायक क्षेत्रों में बढ़त हासिल करने और अपने ग्राहक आधार का विस्तार करने के लिए अधिक एम एंड ए (M&A) सौदे और साझेदारी कर सकते हैं।सेमीकंडक्टर कंपनियां नवीन तकनीकों में भी निवेश बढ़ा सकती हैं जो उन्हें स्वायत्त कारों, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (Internet of things), कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य क्षेत्रों में तेजी से विकास के लिए अग्रणी-बढ़त चिप्स विकसित करने में मदद करेगी। इन सबसे ऊपर, इन अनिश्चित समय के दौरान अधिक चुस्त रणनीतियां महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
शिवरात्रि के इस पावन पर्व पर करें 'शिवोऽहम्' के भाव को आत्मसात
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ! महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आंतरिक जागरण का विशेष अवसर है। यह वह दिन माना जाता है जब शिव तत्व का प्रभाव पृथ्वी पर सबसे अधिक अनुभूत होता है, यानी भौतिक जीवन और आध्यात्मिक चेतना का सहज मिलन होता है। इसी कारण इस दिन किया गया ध्यान और साधना मन और चेतना पर गहरा प्रभाव छोड़ती है।
महाशिवरात्रि हमें यह याद दिलाती है कि शिव कोई बाहरी सत्ता नहीं हैं, बल्कि वही शाश्वत चेतना हमारे भीतर भी विद्यमान है। “शिवोऽहम्” का भाव इसी अनुभूति की ओर संकेत करता है - कि सत्य, शांति और अनंतता हमारे अपने स्वरूप का हिस्सा हैं। जब मन द्वैत से ऊपर उठकर एकत्व को अनुभव करता है, तब जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलने लगता है।
रात्रि का भाव शांति, विश्राम और मौन से जुड़ा है। इस दिन मन, बुद्धि और अहंकार को शांत कर ध्यान में स्थिर होना वास्तविक विश्राम माना जाता है। महाशिवरात्रि आत्मसमर्पण का भी संदेश देती है - जब व्यक्ति स्वयं को उस व्यापक चेतना के भरोसे छोड़ देता है, तब भय, चिंता और बेचैनी स्वतः कम होने लगती हैं। यही इस पर्व का वास्तविक अर्थ और सौंदर्य है।
शाही गज़ से आधुनिक मेट्रिक प्रणाली तक: मापन इकाइयों के विकास की रोचक कहानी
मेट्रिक प्रणाली लंबाई, आयतन, दूरी, तापमान और वज़न जैसे मापों के लिए उपयोग की जाने वाली एक मानकीकृत प्रणाली है। यह तीन बुनियादी इकाइयों पर आधारित होती है: ⦁ ➲ मीटर (m): लंबाई मापने के लिए। ⦁ ➲ किलोग्राम (kg): द्रव्यमान मापने के लिए। ⦁ ➲ सेकेंड (s): समय मापने के लिए।
इस लेख में हम मेट्रिक प्रणाली के विकास, सामान्य मेट्रिक रूपांतरण इकाइयों तथा मुग़ल काल में भारत में प्रचलित मापन पद्धतियों के बारे में विस्तार से जानेंगे।
मेट्रिक प्रणाली मापने का एक सुव्यवस्थित और विश्वसनीय तरीका है, जिसका उपयोग आज विश्वभर में वैज्ञानिक शोध, शिक्षा, व्यापार और दैनिक जीवन में किया जाता है। यह सरल मापों से लेकर जटिल गणनाओं तक के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
इसके कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं: ⦁ ➲ मीटर (m): दूरी और लंबाई मापने की मानक इकाई। जैसे—घर से स्कूल की दूरी या किसी कपड़े की लंबाई। ⦁ ➲ ग्राम (g): वज़न की इकाई, जिसे हम खाद्य पदार्थों के पैकेट पर अक्सर देखते हैं, जैसे “250 ग्राम चिप्स।” ⦁ ➲ मिलीलीटर (ml): आयतन की इकाई, जिसका उपयोग पेय पदार्थों या तरल पदार्थों की मात्रा मापने में किया जाता है।
मेट्रिक प्रणाली में लंबाई, द्रव्यमान (वज़न) और क्षमता (आयतन) के लिए अलग-अलग इकाइयाँ निर्धारित की गई हैं। उदाहरण के लिए: ⦁ ➲ लंबाई: मिलीमीटर (mm), सेंटीमीटर (cm), डेसीमीटर (dm), मीटर (m) और किलोमीटर (km)। इनका उपयोग डेबिट कार्ड (Debit Card) की मोटाई से लेकर दो शहरों के बीच की दूरी तक मापने में होता है। ⦁ ➲ वज़न: ग्राम (g) और किलोग्राम (kg), जिनसे फलों या शरीर का वज़न मापा जाता है। ⦁ ➲ क्षमता: मिलीलीटर (ml) और लीटर (L), जिनका उपयोग जूस कैन या पानी की टंकी की मात्रा मापने में किया जाता है।
1789 की फ़्रांसीसी क्रांति के बाद नागरिकों ने पूरे देश में एक समान वज़न और माप प्रणाली की आवश्यकता महसूस की। इस उद्देश्य से नेशनल असेंबली (National Assembly) और बाद की सरकारों ने पेरिस एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (Paris Academy of Sciences) तथा उसके उत्तराधिकारी इंस्टीट्यूट ऑफ फ़्रांस (Institute of France) को नई इकाइयाँ विकसित करने का कार्य सौंपा। इन इकाइयों को दूरी, आयतन, वज़न, कोण और समय मापने के लिए तैयार किया गया, और इन्हें इस तरह बनाया गया कि सभी एक-दूसरे से तार्किक रूप से जुड़े रहें।
उदाहरण के तौर पर, लंबाई की इकाइयाँ दस की घात के आधार पर बढ़ती हैं - मिलीमीटर से सेंटीमीटर, फिर मीटर तक। एक लीटर को ऐसे घन के आयतन के रूप में परिभाषित किया गया जिसकी प्रत्येक भुजा 10 सेंटीमीटर हो। मानक तापमान पर एक लीटर पानी का वज़न लगभग एक किलोग्राम होता है। इससे पहले इंच, फ़ीट, गज़ और मील जैसी इकाइयों के बीच कोई स्पष्ट संबंध नहीं था। फ़्रांसीसियों ने न केवल राष्ट्रीय मानकों की स्थापना की, बल्कि एक ऐसी प्रणाली विकसित की जो आज मेट्रिक प्रणाली के रूप में वैश्विक स्तर पर अपनाई जा चुकी है।
मेट्रिक प्रणाली के इतिहास की प्रमुख समयरेखा: ⦁ ➲ 1668: जॉन विल्किंस (John Wilkins) ने एक संशोधित मापन प्रणाली का प्रस्ताव रखा। ⦁ ➲ 1670: गेब्रियल मूटन (Gabriel Mouton) ने पृथ्वी की परिधि के अंश पर आधारित दशमलव प्रणाली सुझाई। ⦁ ➲ 1671: जीन पिकार्ड (Jean Picard) ने झूलते पेंडुलम (Pendulum) को लंबाई मापने का आधार बनाने का विचार दिया। ⦁ ➲ 1790: फ़्रांस की नेशनल असेंबली ने फ़्रेंच एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (French Academy of Sciences) से मानक प्रणाली विकसित करने का अनुरोध किया। ⦁ ➲ 1795: फ़्रांस ने आधिकारिक रूप से मेट्रिक प्रणाली अपनाई। ⦁ ➲ 1840: फ़्रांसीसी सरकार ने नागरिकों के लिए इसका उपयोग अनिवार्य किया। ⦁ ➲ 1866: संयुक्त राज्य अमेरिका (United States) में मेट्रिक प्रणाली का उपयोग वैध घोषित हुआ, हालांकि अनिवार्य नहीं था। ⦁ ➲ 1875: मीटर की संधि पर हस्ताक्षर किए गए और अंतर्राष्ट्रीय वज़न एवं माप ब्यूरो सम्मेलन (International Bureau of Weights and Measures Conference) आयोजित हुआ। ⦁ ➲ 1957: अमेरिकी सेना (United States Army) और मरीन कॉर्प्स (Marine Corps) ने इसे अपने उपकरणों के मानक के रूप में अपनाया। ⦁ ➲ 1965: ग्रेट ब्रिटेन (Great Britain) ने मेट्रिक प्रणाली अपनाने की प्रक्रिया शुरू की। ⦁ ➲ 1988: ओम्निबस ट्रेड एंड कॉम्पिटिटिवनेस एक्ट (Omnibus Trade and Competitiveness Act) के तहत संघीय एजेंसियों को व्यापार में मेट्रिक प्रणाली उपयोग करने का निर्देश दिया गया।
गणितीय रूप से, मेट्रिक रूपांतरण किलोग्राम, मीटर और सेकेंड पर आधारित होते हैं। क्षेत्रफल को वर्ग मीटर (m²) में और आयतन को घन मीटर (m³) में मापा जाता है। एक घन मीटर = 1,000 लीटर होता है, अर्थात 1 लीटर = 1/1,000 m³। समय की गणना में 1 घंटा = 60 मिनट, 1 मिनट = 60 सेकेंड और इस प्रकार 1 घंटा = 3,600 सेकेंड होता है। वहीं, 1 दिन = 24 घंटे = 86,400 सेकेंड के बराबर होता है।
लेकिन आधुनिक मापन प्रणालियों के विकसित होने से पहले माप कैसे किए जाते थे? इसे समझने के लिए मुग़ल काल की व्यवस्था पर नज़र डालना उपयोगी होगा।
मुग़ल काल में भारत में कई प्रकार की मापन इकाइयाँ प्रचलित थीं। कपड़ों को मापने के लिए अकबर का शाही गज़ (Akbar’s Royal Yard) उपयोग किया जाता था, जिसकी लंबाई लगभग 46 अंगुल होती थी। कृषि भूमि और इमारतों के लिए इस्कंधरी गज़ का प्रयोग होता था। विभिन्न गज़ों के कारण उत्पन्न समस्याओं को दूर करने के लिए इलाही गज़ (Ilahigaz) नामक एक मानक इकाई शुरू की गई, जिसकी लंबाई लगभग 33 से 34 इंच थी और जिसे आम जनता ने भी अपनाया।
भूमि मापने के लिए बीघा (Bigha) का उपयोग किया जाता था, जिसकी लंबाई और चौड़ाई सामान्यतः 60 गज़ मानी जाती थी। गज़ और बीघा मुग़ल मापन प्रणाली की प्रमुख इकाइयाँ थीं।
इन मापों के बीच संबंध इस प्रकार थे: ⦁ ➲ 1 हाथ = 8 गिरह ⦁ ➲ 1 गज़ = 2 हाथ ⦁ ➲ 1 काठी = 5 और 5/6 हाथ ⦁ ➲ 1 पंड = 20 काठी ⦁ ➲ 1 बीघा = 20 पंड ⦁ ➲ 1 बीघा = 20 विश्वा ⦁ ➲ 1 विश्वा = 20 विश्वांस
भारत में 1956 तक, जब मेट्रिक प्रणाली आधिकारिक रूप से लागू नहीं हुई थी, तब तक गज़ जैसी पारंपरिक इकाइयों का व्यापक उपयोग होता रहा।
स्पष्ट है कि मापन इकाइयों की यह यात्रा—शाही गज़ से लेकर आधुनिक मेट्रिक प्रणाली तक—मानव सभ्यता की वैज्ञानिक प्रगति और मानकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रही है, जिसने आज हमारे जीवन को अधिक सटीक, सरल और व्यवस्थित बना दिया है।
लखनऊ शहर में जल निकायों की भूमिका और वर्तमान स्थिति
उत्तर प्रदेश की राजधानी होने के नाते हमारा शहर लखनऊ अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं के लिए पूरे देश में विशेष पहचान रखता है। यही वजह है कि लखनऊ का समग्र और तेज़ विकास सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। लेकिन इस तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के बीच हमें यह भी गंभीरता से सोचना होगा कि कहीं आधुनिक सुविधाओं और शहरी विस्तार की चाह हमारी प्राकृतिक धरोहरों को नुकसान तो नहीं पहुँचा रही है। विकास की इस दौड़ में यदि जल निकायों और नदियों की अनदेखी होती रही, तो इसके दुष्परिणाम पूरे शहर को भविष्य में भुगतने पड़ सकते हैं।
तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के चलते लखनऊ अपने जल निकायों का लगभग 46 प्रतिशत हिस्सा पहले ही खो चुका है। जो जल निकाय बचे भी हैं, उनमें से अधिकांश आज अपशिष्ट और सीवेज से बुरी तरह प्रदूषित हो चुके हैं। लखनऊ नगर निगम के एक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 1952 में शहर में 964 तालाब मौजूद थे, लेकिन 2006 तक इनकी संख्या घटकर केवल 494 रह गई। नगर निगम के भूमि रिकॉर्ड यह भी बताते हैं कि शहर में दर्ज कई टैंक और तालाब अब सुधार और अतिक्रमण के कारण पहचान से बाहर हो चुके हैं।
तालाब और जलाशय प्राकृतिक रूप से स्पंज तथा थर्मो-रेगुलेटर (damper and thermo-regulator) की तरह काम करते हैं। ये वर्षा जल के संचय में मदद करते हैं और भूजल स्तर को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन लखनऊ के मुख्य शहरी क्षेत्रों में जल निकायों के लगभग समाप्त हो जाने से शहर भविष्य में गंभीर बाढ़ के खतरे की ओर बढ़ रहा है। पिछले एक दशक में लखनऊ चार बड़ी बाढ़ की घटनाओं का सामना कर चुका है, जो इस खतरे की स्पष्ट चेतावनी हैं।
शहर की गोमती नदी की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। गोमती एक भूजल-आधारित नदी है, जो अपनी सहायक नदियों से पुनः भरती रहती है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Uttar Pradesh Pollution Control Board – UPPCB) के आँकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में गोमती का प्रवाह 35 से 40 प्रतिशत तक कम हो चुका है। कई स्थानों पर नदी में पानी इतना कम रह गया है कि उसे पैदल पार किया जा सकता है। लखनऊ में लगभग 13 किलोमीटर तक बहने वाला गोमती का यह हिस्सा आज अपनी सबसे खराब स्थिति में है और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board – CPCB) द्वारा इसे देश के सबसे प्रदूषित नदी खंडों में शामिल किया गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ता जैविक दबाव, पारिस्थितिक प्रवाह में कमी, सहायक नदियों की दुर्दशा, नदी के जलग्रहण क्षेत्र में गाद भराव और अतिक्रमण—इन सभी कारणों ने मिलकर गोमती को सीवेज और कीचड़ से भर दिया है। जानकारों का यह भी कहना है कि लखनऊ के आसपास लगभग 300 जलाशयों के निर्माण की योजनाओं और अवैध अतिक्रमण के चलते स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। पूरे उत्तर प्रदेश में अतिक्रमण के कारण एक लाख से अधिक जलाशय—जिनमें टैंक, तालाब, झीलें और कुएँ शामिल हैं—नष्ट हो चुके हैं।
गोमती नदी में प्रदूषण को नियंत्रित करने का पहला संगठित प्रयास वर्ष 1993 में केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा शुरू की गई गोमती कार्य योजना के तहत किया गया था। इस योजना का उद्देश्य नालों को टैप करना और सीवेज को उपचार संयंत्रों तक पहुँचाना था। इसके बावजूद, आज भी बड़ी मात्रा में अनुपचारित सीवेज सीधे नदी में बह रहा है। इसके बाद अप्रैल 2015 में राज्य सरकार ने गोमती पुनरुद्धार परियोजना शुरू की, जिसके तहत नदी की सफाई, तटों को मज़बूत करने और सौंदर्यीकरण की योजना बनाई गई। गोमती बैराज तक नदी के पुनरुद्धार की अनुमानित लागत लगभग 600 करोड़ रुपये तय की गई थी। हालांकि, अतिक्रमण और शहरी दबाव के कारण इन प्रयासों के अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ सके।
जल निकायों पर बढ़ते अतिक्रमण को रोकने के लिए सरकार और सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर हस्तक्षेप किए हैं। वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि प्राकृतिक झीलों और तालाबों की सुरक्षा जीवन के अधिकार का हिस्सा है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मूल अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसके बावजूद, लखनऊ के आधिकारिक रिकॉर्ड एक अलग और चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
वर्ष 2014 में पर्यावरण कार्यकर्ता अशोक शंकरम द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर एक याचिका में शहर के 37 जल निकायों पर हुए अतिक्रमण का मुद्दा उठाया गया था। इसके जवाब में अदालत ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (Lucknow Development Authority – LDA) और लखनऊ नगर निगम से स्पष्टीकरण माँगा। लेकिन 2015 में दिए गए जवाब में अतिक्रमण के खिलाफ उठाए गए ठोस कदमों की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि झीलों और तालाबों को अतिक्रमण मुक्त कराना एलडीए और नगर निगम का वैधानिक कर्तव्य है।
जल निकायों से अतिक्रमण हटाने की मांग करने वाले अधिवक्ता मोतीलाल यादव का कहना है कि लखनऊ के आसपास सैकड़ों जलाशयों पर निर्माण की योजनाओं ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। हालांकि हाल के वर्षों में लखनऊ जिला प्रशासन ने जल निकायों और सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए अभियान शुरू किए हैं। जिला मजिस्ट्रेट के अनुसार, इन अभियानों का उद्देश्य न केवल तालाबों और जल निकायों का पुनरुद्धार करना है, बल्कि सरकारी भूमि को भी अतिक्रमण से मुक्त कराना है। इसी क्रम में सरोजनीनगर तहसील से शुरू किए गए अभियान के तहत राजस्व विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों की टीम ने लगभग 12 बीघा भूमि से अतिक्रमण हटाया, जिसकी बाज़ार कीमत करीब 7 करोड़ 84 लाख रुपये आँकी गई है।
कैसे ममलूक वंश ने भारत में सल्तनती सत्ता और नई वास्तुकला की शुरुआत की?
लखनऊवासियों, आज हम एक ऐसे ऐतिहासिक विषय पर बात करने जा रहे हैं जो भले ही सीधे हमारे शहर से जुड़ा न हो, लेकिन भारत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य इतिहास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है - दिल्ली सल्तनत और उसके प्रथम राजवंश, ममलूक वंश का उदय। जिस तरह लखनऊ अपनी तहज़ीब, नक़्क़ाशीदार इमारतों और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए प्रसिद्ध है, उसी तरह सल्तनत काल की इमारतों और स्थापत्य शैलियों ने भी भारत की वास्तुकला की दिशा निर्धारित की। यही कारण है कि इस विषय को समझना हमें यह जानने में मदद करता है कि सदियों पहले भारत में किस तरह की सत्ता, किस तरह की इमारतें और किस तरह की तकनीकें विकसित हुईं - और वे आगे चलकर हमारी आधुनिक कलात्मक विरासत का आधार कैसे बनीं। आज के इस लेख में हम क्रमबद्ध रूप से पाँच महत्वपूर्ण पहलुओं को सरल भाषा में समझेंगे। सबसे पहले, हम जानेंगे कि दिल्ली सल्तनत कैसे स्थापित हुई और ममलूक वंश की शुरुआत में मुहम्मद घोरी, कुतुब-उद-दीन ऐबक और इल्तुतमिश की भूमिका क्या रही। इसके बाद, हम ममलूक शासकों की प्रशासनिक चुनौतियों और उनकी नीतियों पर नज़र डालेंगे, जिनसे सल्तनत मजबूत हुई। फिर हम समझेंगे कि सल्तनत काल की वास्तुकला कैसे भारतीय, इस्लामी और मध्य-एशियाई शैलियों का सुंदर मिश्रण बनी। इसके बाद हम उन प्रमुख इमारतों के बारे में जानेंगे - जैसे कुतुब मीनार, अलाई दरवाज़ा और तुगलकाबाद - जिन्होंने इस युग की पहचान बनाई। अंत में, हम देखेंगे कि चूना-गारा, आर्कुएट (Arcuate - धनुषाकार) तकनीक और गुम्बद-निर्माण जैसी नई तकनीकों ने भारतीय वास्तुकला में कैसे बड़ा परिवर्तन लाया।
दिल्ली सल्तनत का उदय और ममलूक (गुलाम) वंश की स्थापना दिल्ली सल्तनत का इतिहास वास्तव में 12वीं सदी के उत्तरार्ध में घुरिद साम्राज्य के विस्तार से शुरू होता है। घुर के शासक मुहम्मद घोरी ने जब 1192 में तराइन की दूसरी लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को हराया और फिर 1194 में चंदावर की लड़ाई में जयचंद पर विजय प्राप्त की, तब उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा उनके नियंत्रण में आ गया। वे स्वयं भारत में अधिक समय नहीं रुके, इसलिए प्रशासन संचालन का दायित्व उन्होंने अपने सबसे विश्वस्त सैन्य अधिकारी कुतुब-उद-दीन ऐबक को सौंपा, जो उनका दास होने के बावजूद एक कुशल योद्धा, रणनीतिकार और संगठक था। 1206 में मुहम्मद घोरी की मृत्यु के बाद ऐबक ने दिल्ली में स्वतंत्र सत्ता स्थापित की और इसी क्षण से दिल्ली सल्तनत के प्रथम राजवंश - ममलूक वंश - का जन्म हुआ। “ममलूक” शब्द अरबी से आया है, जिसका अर्थ है “स्वामी-निर्मित दास” या प्रशिक्षित सैनिक। ये साधारण दास नहीं थे, बल्कि अत्यंत सक्षम, निष्ठावान और युद्धकला में दक्ष योद्धा होते थे। ऐबक के बाद उसके दामाद और उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने सल्तनत को एक सुसंगठित, शक्तिशाली और स्थिर राज्य का स्वरूप दिया। कूटनीति, सैन्य-व्यवस्था और प्रशासनिक सुधारों के कारण इल्तुतमिश को वास्तव में दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
ममलूक शासकों का शासन, चुनौतियाँ और प्रशासनिक मजबूती जब 1211 में इल्तुतमिश ने सत्ता संभाली, तब सल्तनत अभी भी नवजात अवस्था में थी और उसे कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। पहली चुनौती पश्चिमी सीमा पर मंगोलों का लगातार दबाव था, जिन्होंने मध्य एशिया में उथल-पुथल मचा रखी थी और भारत की दिशा में भी नजरें टिकाई थीं। दूसरी चुनौती तुर्की अमीरों की शक्ति थी, जो दरबार में अपने प्रभाव को बढ़ाकर सुल्तान की शक्ति को कमजोर करना चाहते थे। तीसरी चुनौती भारतीय हिंदू सरदारों की स्वतंत्रता-प्रियता थी, जिन्हें सल्तनत की अधीनता कबूल करवाना आवश्यक था। इल्तुतमिश ने शक्तिशाली सेना, संगठित प्रशासन और समझदारीपूर्ण गठबंधन-नीति के माध्यम से इन तीनों क्षेत्रों में सफलता पाई। उसके शासन के बाद उसकी योग्य पुत्री रज़िया सुल्तान ने सत्ता संभाली - जो भारतीय इतिहास की पहली मुस्लिम महिला शासक थीं। लेकिन तुर्क अमीर एक महिला को सत्ता में देखकर असंतुष्ट हुए और अंततः रज़िया को अपदस्थ कर दिया। राजनीतिक अस्थिरता के बाद सत्ता गियास-उद-दीन बलबन के हाथों में पहुँची, जिसने शाही मर्यादा, अनुशासन और राजसत्ता की “दैवीय छवि” को अत्यधिक सुदृढ़ किया। बलबन ने मंगोलों के विरुद्ध व्यापक सुरक्षा-तंत्र तैयार किया और दरबार में कठोर “ज़ाब्ते” लागू किए। उसके शासन में सल्तनत पुनः एक मजबूत और स्थिर साम्राज्य बन गई।
सल्तनत काल की वास्तुकला: उद्भव, विशेषताएँ और सांस्कृतिक संगम सल्तनत काल वास्तुकला के इतिहास में एक क्रांतिकारी चरण था। इस अवधि में जन्म लेने वाली इमारतें केवल धार्मिक या राजनीतिक प्रतीक नहीं थीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी, मध्य एशियाई और भारतीय कला का अनोखा संगम थीं। यह वह दौर था जब भारत में पहली बार स्पष्ट रूप से विकसित इंडो-इस्लामिक (Indo-Islamic) वास्तुकला दिखाई देती है - एक ऐसा कला-रूप जिसमें हिंदू-जैन मंदिरों की परंपरागत मूर्तिकारी और भारतीय पत्थर-शिल्प, इस्लामी जगत की मेहराबों, गुम्बदों, ज्यामितीय डिजाइन और ईंट-निर्माण तकनीकों के साथ मिश्रित होते हैं। सल्तनत काल की वास्तुकला तीन प्रमुख रूपों में विकसित हुई - दिल्ली की शाही शैली, जो मुख्यतः सुल्तानों द्वारा संरक्षित थी; प्रांतीय सल्तनती शैली, जो बंगाल, गुजरात और दक्कन में विकसित हुई; तथा हिंदू शासकों के अधीन विकसित शैली, जिसमें राजस्थानी और दक्षिण भारतीय तत्वों का प्रभाव था। यह विविधता आगे चलकर उस विशाल वास्तु-परंपरा का आधार बनी जिसने मुगल काल में अपनी चरम सुंदरता प्राप्त की।
प्रमुख इमारतें और सुल्तानों का स्थापत्य योगदान सल्तनत काल में निर्मित इमारतों की श्रृंखला अत्यंत विस्तृत है और इनमें से कई भारत की ऐतिहासिक पहचान बन चुकी हैं। सबसे पहले कुतुब-उल-इस्लाम मस्जिद और अढ़ाई दिन का झोंपड़ा का उल्लेख किया जाता है, जिनमें हिंदू-जैन स्थापत्य की मूर्तिकारी और इस्लामी विन्यास का अद्वितीय सम्मिश्रण देखा जाता है। इसके बाद आती है कुतुब मीनार, जो ईंट-निर्मित मीनारों में विश्व के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक है। ऐबक ने इसकी नींव रखी, इल्तुतमिश ने तीन मंज़िलें बनवाईं और बाद में फ़िरोज़ तुगलक ने इसे और ऊँचा तथा भव्य बनाया। अन्य उल्लेखनीय स्थापत्य योगदानों में शामिल हैं—
सुल्तान-ए-गारी का मकबरा, भारत का पहला मकबरा
हौज़-ए-शम्सी, जो जल-विनियोजन की अद्भुत समझ दर्शाता है
अलाई दरवाज़ा, जो शुद्ध इस्लामी वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है
तुगलकाबाद, जहाँपनाह, और फ़िरोज़ाबाद - तीन बड़े शाही शहर
लोदी और सैय्यद शासकों द्वारा बनवाए गए गुम्बद-दार मकबरे, जिनमें भारत में “बाग़-वाले मकबरों” की परंपरा की शुरुआत हुई
ये सभी इमारतें न केवल सुल्तानों की शक्ति, बल्कि उस समय की अभियांत्रिकी, कला और सौंदर्य-बोध को भी उजागर करती हैं।
सल्तनत काल में निर्माण तकनीकें: आर्कुएट शैली और नई सामग्रियाँ सल्तनत काल में भारत की निर्माण-तकनीक में एक मूलभूत परिवर्तन आया। इस काल में पहली बार चूना-गारा (Lime mortar), जिप्सम (Gypsum), सुरखी, और पकी ईंटों का बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ। इन नई सामग्रियों ने निर्माण को तेज, सस्ता और टिकाऊ बना दिया। सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन था आर्कुएट तकनीक का विकास - यानी मेहराबों और गुम्बदों की मदद से विशाल, बिना स्तंभों वाले आंतरिक स्थानों का निर्माण। मेहराबों में प्रयुक्त वौसोइर (पच्चर-आकार के पत्थर) और केंद्र-पत्थर (keystone) ने इमारतों को पहले से कहीं अधिक स्थिर और ऊँचा बनाने की क्षमता प्रदान की। कम लागत और बेहतर स्थायित्व के कारण मस्जिदों, मकबरों, महलों, सरायों, बारादरियों और बाजारों के निर्माण में तेजी आई। यह तकनीकी परिवर्तन आगे मुगल काल की उच्च स्तरीय वास्तुकला की नींव बना।
भारतीय–इस्लामी प्रभावों का मिलन और उसका ऐतिहासिक महत्व सल्तनत काल का स्थापत्य भारत की सांस्कृतिक विविधता और सह-अस्तित्व का उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रारंभिक मस्जिदें और भवन कई बार परित्यक्त हिंदू-जैन मंदिरों, संस्कृत महाविद्यालयों और अन्य संरचनाओं पर निर्मित किए गए, जिसके परिणामस्वरूप इन इमारतों में भारतीय शिल्प - जैसे आलंकरण, फूल-पत्ती के डिज़ाइन, कमल आकृति, और अलंकारिक स्तंभ - स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इससे एक नया मिश्रणात्मक स्थापत्य-रूप उभरा, जिसने न केवल सल्तनत काल बल्कि आगे के सैय्यद, लोदी और मुगल काल को भी प्रभावित किया। यही प्रभाव भारत में इस्लामी स्थापत्य को स्थानीय विशेषताओं के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सफल बना, जिसके कारण इस युग की इमारतें आज भी भारत की कला-परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं।
महात्मा गांधी की शहादत: एक राष्ट्र, एक विचारधारा और अमर नैतिक विरासत
लखनऊवासियो, भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि त्याग, नैतिकता और आत्मबल की एक गहरी यात्रा था और इस यात्रा के केंद्र में महात्मा गांधी का नाम सबसे उज्ज्वल रूप में उभरता है। 30 जनवरी का दिन हमें उस क्षण की याद दिलाता है, जब देश ने अपने नैतिक मार्गदर्शक को खो दिया, लेकिन उनके विचार और मूल्य हमेशा के लिए अमर हो गए। यही कारण है कि हर वर्ष 30 जनवरी को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि महात्मा गांधी के विचारों, उनके बलिदान और उनके द्वारा दिए गए संदेश को याद किया जा सके। शहीद दिवस हमें गांधी जी के बलिदान, अहिंसा और सत्य के संदेश को फिर से आत्मसात करने का अवसर देता है। आज के इस लेख में हम सबसे पहले महात्मा गांधी के व्यक्तित्व और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका को समझेंगे। इसके बाद 30 जनवरी 1948 की उस घटना पर चर्चा करेंगे, जिसने पूरे देश को शोक में डुबो दिया। फिर हम गांधी जी के विचारों और सिद्धांतों को जानेंगे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को नैतिक दिशा दी। आगे उनके प्रमुख आंदोलनों और योगदान पर नज़र डालेंगे। अंत में, हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि उनकी शहादत आज के भारत में क्यों और कैसे प्रासंगिक बनी हुई है।
महात्मा गांधी का परिचय और स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका महात्मा गांधी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली और केंद्रीय व्यक्तित्व थे। उन्होंने न केवल अंग्रेज़ी शासन के ख़िलाफ़ जनआंदोलनों का नेतृत्व किया, बल्कि आम जनता को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने का कार्य भी किया। उनके नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन एक जनआंदोलन बना, जिसमें हर वर्ग और हर आयु के लोग शामिल हुए। गांधी जी का व्यक्तित्व सादगी, अनुशासन और नैतिकता का प्रतीक था, जिसने उन्हें “राष्ट्रपिता” के रूप में स्थापित किया। उन्होंने संघर्ष के दौरान यह सिद्ध किया कि नैतिक शक्ति और जनसमर्थन किसी भी साम्राज्यवादी ताक़त से अधिक प्रभावशाली हो सकते हैं।
30 जनवरी 1948: महात्मा गांधी की हत्या और शहीद दिवस 30 जनवरी 1948 का दिन भारतीय इतिहास के सबसे पीड़ादायक और अविस्मरणीय क्षणों में से एक माना जाता है। इसी दिन महात्मा गांधी की उनकी नियमित प्रार्थना सभा के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ ही महीनों बाद हुई, जब देश अभी नवस्वतंत्र भारत की दिशा और भविष्य को आकार दे रहा था। गांधी जी की हत्या की खबर ने पूरे देश को गहरे शोक और स्तब्धता में डुबो दिया। लाखों लोगों के लिए यह केवल एक नेता की मृत्यु नहीं थी, बल्कि नैतिक नेतृत्व और मानवीय मूल्यों की क्षति थी। उनकी शहादत उस विचारधारा पर प्रहार थी, जो अहिंसा, सह-अस्तित्व, धार्मिक सौहार्द और सामाजिक समरसता पर आधारित थी। यही कारण है कि 30 जनवरी को हर वर्ष शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि महात्मा गांधी के बलिदान, उनके संघर्ष और उनके जीवन मूल्यों को स्मरण किया जा सके और आने वाली पीढ़ियों को उनके आदर्शों से प्रेरणा मिल सके।
महात्मा गांधी के विचार और सिद्धांत महात्मा गांधी के विचार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा और दिशा तय करने वाले सिद्धांत थे। सत्याग्रह और अहिंसा उनके सबसे प्रमुख और प्रभावशाली विचार माने जाते हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने अन्याय, शोषण और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष किया। गांधी जी का विश्वास था कि किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनाए गए साधन उतने ही पवित्र और नैतिक होने चाहिए जितना स्वयं लक्ष्य। उनके अनुसार हिंसा से प्राप्त किया गया परिणाम स्थायी नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत नैतिकता और सामाजिक नैतिकता में कोई अंतर नहीं होना चाहिए, क्योंकि समाज की नैतिकता व्यक्तियों के आचरण से ही बनती है। उनके विचारों ने न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में संघर्ष और विरोध के तरीकों को एक नई दिशा दी। आज भी उनके विचार शांति, सहिष्णुता और संवाद के महत्व को रेखांकित करते हैं और आधुनिक समाज के लिए उतने ही प्रासंगिक बने हुए हैं।
स्वतंत्रता संग्राम में गांधी के प्रमुख आंदोलन और योगदान महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिनका उद्देश्य आम जनता को जागरूक करना और ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ संगठित करना था। असहयोग आंदोलन के माध्यम से उन्होंने विदेशी शासन की वैधता को चुनौती दी, जबकि दांडी मार्च ने औपनिवेशिक कानूनों के अन्यायपूर्ण स्वरूप को दुनिया के सामने उजागर किया। इन आंदोलनों ने जनता में आत्मसम्मान और एकजुटता की भावना को मज़बूत किया। गांधी जी का योगदान केवल आंदोलनों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय एकता पर भी लगातार बल दिया।
महात्मा गांधी की शहादत का महत्व और आज के भारत में प्रासंगिकता महात्मा गांधी की शहादत आज भी भारत के लिए गहरा संदेश रखती है। उनके जीवन और बलिदान से यह सीख मिलती है कि हिंसा के बिना भी बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन संभव हैं। आज के समय में, जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, गांधी जी के विचार—सहिष्णुता, संवाद और शांति—और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। शहीद दिवस केवल अतीत को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन का अवसर भी है कि हम गांधी जी के मूल्यों को अपने जीवन और समाज में कितना आत्मसात कर पा रहे हैं।
कैसे पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर, लखनऊ के घरों को संस्कृति, सौंदर्य और पहचान देता है
लखनऊवासियों के लिए घर केवल चार दीवारों का ढाँचा नहीं, बल्कि तहज़ीब, सलीक़े और सांस्कृतिक विरासत का विस्तार होता है। यहाँ की जीवनशैली में कला, नफ़ासत और संतुलन की झलक हर चीज़ में दिखाई देती है - चाहे वह पहनावा हो, खानपान या फिर घर की सजावट। ऐसे में फ़र्नीचर केवल उपयोग की वस्तु नहीं रहता, बल्कि वह घर के व्यक्तित्व और सोच को भी दर्शाता है। आज लखनऊ के बाज़ारों में पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर और आधुनिक डिज़ाइनों का ऐसा सुंदर संगम देखने को मिलता है, जो अतीत की कारीगरी और वर्तमान की ज़रूरतों - दोनों को साथ लेकर चलता है। भारतीय फ़र्नीचर की यह यात्रा सदियों पुराने सामाजिक बदलावों, विदेशी प्रभावों और स्थानीय शिल्प परंपराओं से होकर आज के स्वरूप तक पहुँची है। आज इस लेख में हम भारतीय फ़र्नीचर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके विकास को समझेंगे। इसके बाद मध्यकालीन भारत में शाही संरक्षण और फ़र्नीचर निर्माण की भूमिका पर चर्चा करेंगे। फिर मुगल काल और यूरोपीय प्रभावों से बनी विविध फ़र्नीचर शैलियों को जानेंगे। आगे भारतीय फ़र्नीचर में प्रयुक्त नक्काशी, जड़ाई और सामग्रियों के महत्व पर बात करेंगे। अंत में, उन पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर वस्तुओं को समझेंगे, जो आज लखनऊ सहित देशभर में फिर से लोकप्रिय हो रही हैं।
भारतीय फ़र्नीचर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विकास यात्रा प्राचीन भारत में फ़र्नीचर आज की तरह रोज़मर्रा के जीवन का अनिवार्य हिस्सा नहीं था। लोग अधिकतर फ़र्श पर बैठकर जीवन व्यतीत करते थे और साधारण जीवनशैली को महत्व दिया जाता था। फिर भी, वेदिक ग्रंथों और प्राचीन साहित्य में पीढ़ा, खाटा, मुंडा और चौकी जैसी कुछ फ़र्नीचर वस्तुओं का उल्लेख मिलता है। ये वस्तुएँ विशेष अवसरों, धार्मिक कार्यों या विशिष्ट वर्ग तक ही सीमित थीं। धीरे-धीरे समाज की संरचना बदली, निजी स्थानों की अवधारणा विकसित हुई और आराम व सुविधा को अधिक महत्व मिलने लगा। इसी क्रम में फ़र्नीचर की उपयोगिता बढ़ी और वह धीरे-धीरे भारतीय घरों का हिस्सा बनने लगा। यह विकास एकदम अचानक नहीं हुआ, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव और ज़रूरतों के साथ आकार लेता गया। मध्यकालीन भारत में फ़र्नीचर निर्माण और शाही संरक्षण मध्यकालीन भारत में फ़र्नीचर निर्माण को विशेष रूप से शाही संरक्षण प्राप्त हुआ। दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य के दौरान यह कला अपने चरम पर पहुँची। इस समय लकड़ी के कारीगरों को राजपरिवार का संरक्षण और सम्मान प्राप्त था, जिससे उनकी कला में निखार आया। उस दौर का फ़र्नीचर मुख्यतः राजसी उपयोग के लिए बनाया जाता था - जैसे सिंहासन, दरबारी आसन, महलों के दरवाज़े, खंभे और सजावटी संरचनाएँ। इन वस्तुओं में भव्यता, मजबूती और बारीक कारीगरी का अनोखा मेल दिखाई देता है। आम लोगों के घरों में फ़र्नीचर का प्रचलन अभी भी सीमित था, लेकिन यह काल भारतीय फ़र्नीचर कला की तकनीकी और सौंदर्यात्मक नींव को मज़बूत करने वाला साबित हुआ।
मुगल काल में भारतीय फ़र्नीचर पर कलात्मक प्रभाव 16वीं शताब्दी में मुगलों के आगमन के साथ उत्तर भारत में फ़र्नीचर की शैली में एक नया अध्याय शुरू हुआ। मुगल स्थापत्य और कला की तरह ही फ़र्नीचर में भी भव्यता, संतुलन और अलंकरण पर विशेष ध्यान दिया गया। गहरे रंग की दृढ़ लकड़ियाँ, हड्डी और हाथी दाँत की जड़ाई, शीशों का प्रयोग और जटिल नक्काशी इस दौर की प्रमुख विशेषताएँ रहीं। लेखन मेज़, टेबल, दीवान और आरामदायक आसनों का प्रचलन बढ़ा। लखनऊ जैसे शहर, जहाँ मुगल और बाद में नवाबी संस्कृति का गहरा प्रभाव रहा, वहाँ यह शैली फ़र्नीचर के डिज़ाइनों में आज भी दिखाई देती है। यही कारण है कि लखनऊ के पारंपरिक फ़र्नीचर में शाही ठाठ और नज़ाकत का अहसास बना रहता है। यूरोपीय प्रभाव और इंडो-यूरोपीय फ़र्नीचर शैलियों का विकास 1500 के बाद भारत में पुर्तगाली, डच, फ़्रांसीसी और अंततः अंग्रेज़ों का आगमन हुआ। जब ये यूरोपीय समुदाय भारत में बसे, तो उन्हें अपने रहन-सहन के अनुसार फ़र्नीचर की आवश्यकता पड़ी। उन्होंने भारतीय कारीगरों से वही डिज़ाइन तैयार करने को कहा, जिनका उपयोग वे यूरोप में करते थे, लेकिन स्थानीय लकड़ी और कारीगरी के साथ। इससे भारतीय और यूरोपीय शैलियों का अद्भुत संगम देखने को मिला। गोवानीज़ (Goanese), इंडो-डच (Indo-Dutch) और एंग्लो-इंडियन (Anglo-Indian) जैसी फ़र्नीचर शैलियाँ इसी प्रक्रिया से विकसित हुईं। इन शैलियों में यूरोपीय ढाँचा, लेकिन भारतीय नक्काशी और सजावटी तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। यह दौर भारतीय फ़र्नीचर को वैश्विक प्रभावों से जोड़ने वाला साबित हुआ।
भारतीय फ़र्नीचर में नक्काशी, जड़ाई और सामग्री का महत्व भारतीय फ़र्नीचर की सबसे बड़ी पहचान उसकी उत्कृष्ट नक्काशी और जड़ाई है। सागौन और आबनूस जैसी मज़बूत लकड़ियों का उपयोग इसे टिकाऊ बनाता है, जबकि हाथी दाँत, हड्डी और धातु की जड़ाई इसे विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करती है। पुष्प आकृतियाँ, ज्यामितीय पैटर्न और धार्मिक प्रतीक फ़र्नीचर को केवल उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि कला का रूप देते हैं। लखनऊ के कई पुराने घरों और हवेलियों में आज भी ऐसी कारीगरी के उदाहरण मिलते हैं, जो बीते समय की शिल्प परंपरा की गवाही देते हैं। यही कारीगरी भारतीय फ़र्नीचर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाती है। पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर जो आज फिर से लोकप्रिय हो रहे हैं आधुनिक जीवनशैली के बावजूद, पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर आज फिर से लोगों की पसंद बन रहा है। बाजोट पूजा और सजावट दोनों के लिए उपयोगी है और छोटे घरों में बहुउद्देशीय फ़र्नीचर की तरह काम करता है। प्राचीन सागौन की अलमारियाँ अब केवल भंडारण नहीं, बल्कि घर की शोभा बढ़ाने वाला तत्व बन गई हैं। रंग-बिरंगे कपड़ों से सजे भारतीय ओटोमन छोटे कमरों में अतिरिक्त बैठने की जगह प्रदान करते हैं। दीवान आज भी भारतीय घरों में आराम, संवाद और परंपरा का प्रतीक बना हुआ है, जबकि लकड़ी की जालियाँ आधुनिक घरों में भी निजता और सौंदर्य का संतुलन बनाए रखती हैं। इस प्रकार, पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर लखनऊ के घरों में न केवल अतीत की यादें संजोता है, बल्कि आधुनिक जीवन को सांस्कृतिक गहराई और विशिष्ट पहचान भी प्रदान करता है।