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जौनपुर की अटाला मस्जिद पर बनी कलाकृतियाँ

Jaunpur District
13-03-2018 10:49 AM

अटाला मस्जिद जौनपुर की प्रमुख मस्जिदों में से आती है। इस मस्जिद का निर्माण यहाँ पर स्थित अटाला देवी के मंदिर को हटा कर किया गया है। जब जौनपुर में 1359 ईस्वी में सुल्तान फिरोज शाह आया तो उस समय वह यहाँ पर स्थित मंदिर को तोड़ने की सोचा पर खैर-उद-दीन के द्वारा लिखे तथ्य के आधार पर वहां के हिन्दुओं ने इसका विरोध किया तो फिरोज ने इसे तोड़ने का ख्याल त्याग दिया। कालांतर में सुल्तान इब्राहीम शाह का समय आने पर वह मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया और उस स्थान पर अटाला मस्जिद का निर्माण हुआ। यह मस्जिद सन 1408 में बनकर तैयार हो गयी थी। खैर-उद-दीन यह भी कहते हैं की इब्राहीम शाह ने अपने मुख्य कर्मचारियों को यहाँ पर शुक्रवार को व ईद के नमाज के लिए बोला। सभी शर्की सुल्तानों द्वारा अटाला में रोज नमाज पढ़ा जाता था। सिकंदर लोदी के आने के बाद यह मस्जिद काफी हद तक तोड़ दी गयी थी। लेकिन सन 1860 में मुंशी हैदर द्वारा इसका संरक्षण किया गया। अटाला मस्जिद जौनपुर कला का प्राचीनतम उदहारण है। यह मस्जिद जौनपुर के समस्त मस्जिदों में सबसे ज्यादा सुन्दर और सजाई हुयी मस्जिद है।

यह मस्जिद 258 वर्ग फीट में स्थित है तथा इसका आँगन 177 फीट का है जिसमे तीन दरवाजे लगाये गए हैं प्रथम दरवाजा मुख्य दरवाजा है और अन्य दरवाजे मुख्य दरवाजों से छोटे हैं। इस मस्जिद के प्रत्येक मेहराब सुन्दरता के साथ बनाये गएँ हैं तथा इनपर काली पट्टी से घेरा गया है। इस मस्जिद में काले संगेमरमर का प्रयोग किया गया है। इस मस्जिद के प्रत्येक मेहराबों को कलाकृतियों से अलंकृत किया गया है। मस्जिद के प्रमुख कक्ष के प्रमुख द्वार (प्रथम चित्र) के ड्योढ़ी के ऊपर विशिष्ट प्रकार से अलंकरण किया गया है तथा इसकी दीवारों पर भी विभिन्न प्रकार के अलंकरण किये गए हैं। अटाला के द्वारों पर तारे का निशान भी बनवाया गया है जो की इस्लामिक इमारतों में बड़े पैमाने पर मिलता है। इस मस्जिद में जनाना के लिए भी स्थान बनवाया गया है जो की आंगने के तीन तरफ बने दो मंजिला ईमारत के दूसरी मंजिल पर है। यहाँ की छत और दीवारे भी अलंकृत की गयी हैं। जौनपुर कला का हीरा इसका प्रोप्य्लों है यह मस्जिद इजिप्ट के एक मंदिर के प्रोप्य्लों की याद दिलाता है। अटाला मस्जिद आज पूरे भारत की सुन्दर मस्जिदों में से एक है तथा अपने प्रकार की यह एकलौती मस्जिद भी है। अटाला मस्जिद जौनपुर में बड़े पैमाने पर पर्यटकों को आकर्षित करने का दम रखती है। तथा इसकी कलाकृतियाँ यहाँ के विशिष्ट कला को प्रदर्शित करती हैं।

1.द शर्की सल्तनत ऑफ़ जौनपुर, मियां मुहम्मद सईद


आखिर होता क्या है वीर स्तम्भ

Jaunpur District
12-03-2018 11:14 AM

किसी भी व्यक्ति की महानता या वीरता को सदैव जीवित रखने के लिए उसके कारनामों की कहानियां सभी को बताई जाती हैं और वो कहानियां सदियों तक जिन्दा रहती हैं। ऐसी ही एक परंपरा है वीर स्तम्भ बनाने की, ये स्तम्भ किसी एक व्यक्ति की बहादुरी के शौर्य गीत गाते हैं। वीर स्तंभों की प्राप्ति यदि देखी जाये तो 3सरी शताब्दी ईसा पूर्व से प्राप्त होना शुरू हो जाती है। वीर स्तम्भ कई कहानियां प्रस्तुत करते हैं ये व्यक्ति के आर्थिक स्थिति, उसके सामाजिक स्तर, उसके पद आदि की कहानी प्रस्तुत करते हैं। वीर स्तम्भ विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग प्रकार के पाए जाते हैं। सबसे ज्यादा मात्रा में पाए जाने वाले वीर स्तम्भ मुख्य रूप से तीन-चार परतों पर बनाये जाते थे- प्रथम स्तर पर एक सूर्य और एक चन्द्र का चित्र बनाया गया रहता है जिसका तात्पर्य है “जब तक सूर्य और चाँद होंगे तबतक उसकी वीरता का नाम रहेगा” । इसके नीचे वाले स्तर पर उस वीर को अपने आराध्य देव की पूजा करते हुए दिखाई देता है तथा सबसे नीचे उस व्यक्ति के मृत्यु का अंकन किया गया रहता है। वीर स्तम्भ पर अभिलेखों की भी प्राप्ति होती है जिसपर उस वीर से सम्बंधित बाते उकेरी गयी रहती है। कई वीर स्तंभों पर काफी अलंकरण दिखाई देता है जो की वीर के आर्थिक स्थिति व पद पर प्रकाश डालता है। जौनपुर जो की 7-8 विं शताब्दी में एक मशहूर स्थान था तथा यहाँ पर प्रतिहारों का शासन था। प्रतिहारों के काल में बड़े पैमाने पर वीर स्तंभों का निर्माण किया गया था। चित्र सदर इमामबाडा के पास स्थित मंदिरों के पास से प्राप्त हुये एक स्तम्भ के खंडित भाग को दिखाया गया है। इस स्तम्भ के बीच भाग पर एक व्यक्ति को तलवार व ढाल लिए लड़ाई की मुद्रा में दिखाया गया है।

1.आर्ट ऑफ़ हीरो स्टोंस, महासती स्टोंस, लिंग मुद्रे, वामन मुद्रे एंड नंदी कल्लुस: अ सर्वे
2.हीरो स्टोंस ऑफ़ महाराष्ट्र, सदाशिव टेटविलकर


जौनपुर के 7 राजाओं की कब्रें

Jaunpur District
11-03-2018 08:45 AM

यहाँ पर स्थित बुर्जों को व अन्य इमारतों को देखकर इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। यह "द किंग ऑफ द किंग्स जौनपुर" के रूप में जाना जाता है। यहाँ पर शर्की परिवार के बहुत महत्वपूर्ण व्यक्तियों को दफन किया जाता था- दफन व्यक्तियों में शाहजादा नासीर खान, मलिक बहरूज़, सुल्तान फिरोज शाह के छोटे बेटे और जौनपुर के पहले राज्यपाल और जफ्रबाद शामिल हैं। यहां पर शर्की सुल्तानों की कब्रें हमें मिलती हैं शर्की सुल्तानों में मलिक सरवार, सुल्तान मुबारक शाह शर्की , सुल्तान इब्राहिम शर्की और कई अन्य। ये कब्रें बड़े ईंटों से सजाए गए भव्य गुंबदों से ढंके हुए थे, पूरी वास्तुकला का अवशेष आसानी से देखा जा सकता है, सिकंदर लोधी द्वारा सभी संरचनाओं को गिरा दिया गया था। उन्होंने छोटे और बड़े पैमाने पर लगभग सभी स्मारकों को नष्ट कर दिया था। यह स्मारक जामी मस्जिद के पास है और जौनपुर रेलवे स्टेशन से सिर्फ 2 किलोमीटर दूर है। यहाँ पर दफन एक कब्र अत्यंत महत्वपूर्ण है जिसमे एक हांथी दफ़न है कहा जाता है की यह हांथी जामा मस्जिद में लगे सारे पत्थरों को ढोने का कार्य किया था जिस कारण इसका कब्र यहाँ पर मौजूद है और उसे सम्मानित किया गया था।

1.द शर्की सल्तनत ऑफ़ जौनपुर, मियां मुहम्मद सईद


जौनपुर के प्रमुख तालाब और राजा तालाब

Jaunpur District
10-03-2018 09:25 AM

पानी की आवश्यकता मानव जीवन की समस्त आवश्यकताओं में सबसे महत्वपूर्ण है यही कारण है की दुनिया भर की सभी मुख्य सभ्यताएं नदियों या जल श्रोतों के किनारे ही बसी हुयी हैं। जौनपुर शहर गोमती नदी के किनारे बसा हुआ है, यहाँ पर कई तालाब व पोखरे बनाये गए हैं जो जल की व्यवस्था को बरक़रार रखने में व कृषि कार्य में मददगार साबित हुए हैं। वर्तमानकाल में जौनपुर में कुल 647 निजी तालाब हैं और 3585 तालाब उपस्थित हैं जो यहाँ के तालाबों की परंपरा को प्रदर्शित करते हैं। जौनपुर शहर में स्थित राजा तालाब 19विं शताब्दी में बनवाया गया था यह तालाब प्राचीन तालाबों के आधार पर ही बनाया गया है जिसमे सीढियां व एक सपाट रास्ता बनाया गया है। सपाट रास्ता हाथियों व घोड़ों को पानी पीने के लिए बनाया गया था। तालाब के किनारे पर वस्त्र बदलने के स्थान भी बनवाये गए हैं। तालाब में वर्षा में जल भरने के लिए विभिन्न नालियों का इंतज़ाम किया गया था वर्तमान काल में तालाब के किनारे का वट वृक्ष के बगल में ही एक नाली दिखाई दे जाती है। तालाब में जल की स्थिति नापने के लिए एक स्तम्भ भी लगाया गया है जो की यहाँ के जल की स्थिति बताता है। जौनपुर शहर में चौकिया मंदिर में भी ऐसे ही तालाब का निर्माण किया गया है। महाराजगंज थाना क्षेत्र में लोहिंदा चौराहे के समीप भी एक हवेली के पास भी ऐसे ही एक और तालाब का निर्माण किया गया है।

जौनपुर में तालाब बनाने वाले लोगों को पालीवाल कहा जाता है पालीवाल ब्राह्मण थे। जैसलमेर, जोधपुर के पास दसवीं सदी में पल्ली नगर में बसने के कारण ये पल्लीवाल या पालीवाल कहलाए। इन ब्राह्मणों को मरुभूमि में बरसने वाले थोड़े- से पानी को पूरी तरह से रोक लेने का अच्छा कौशल सध गया था। वे खडीन के अच्छे निर्माता थे। मरुभूमि का कोई ऐसा बड़ा टुकड़ा जहां पानी बहकर आता हो, वहां दो या तीन तरफ से मेड़बंदी कर पानी रोक कर विशिष्ट ढंग से तैयार बांधनुमा खेत को खडीन कहा जाता है। खडीन खेत बाद में है, पहले तो तालाब ही है। मरुभूमि में सैकड़ों मन अनाज इन्हीं खडीनों में पैदा किया जाता रहा है। आज भी जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर क्षेत्र में सैकड़ों खडीन खड़ी हैं। लेकिन पानी के काम के अलावा स्वाभिमान भी क्या होता है, इसे पालीवाल ही जानते थे। जैसलमेर में न जाने कितने गांव पालीवालों के थे। राजा से किसी समय विवाद हुआ। बस, रातों-रात पालीवालों के गांव खाली हो गए। एक से एक कीमती, सुन्दर घर, कुएं खडीन सब छोड़कर पालीवाल राज्य से बाहर हो गए। पालीवाल वहां से निकलकर कहां-कहां गए इसका ठीक अंदाज नहीं है पर एक मुख्य धारा आगरा और जौनपुर में जा बसी थी।

इस से यह तथ्य सिद्ध होता है की जौनपुर में पालीवाल लोग आये थे और उन्होंने यहाँ पर अवश्य कई तालाबों आदि का निर्माण किया।

1.आज भी खरे हैं तालाब, अनुपम मिश्र
2.सी डी आई प जौनपुर


जौनपुर की झंझरी मस्जिद

Jaunpur District
09-03-2018 02:01 PM

झंझरी मस्जिद जौनपुर कला की उत्तम मस्जिदों में से सर्वोच्च स्थान पर आती है। यह मस्जिद अपनी विशिष्ट कला के लिए जानी जाती है। झंझरी मस्जिद जौनपुर के सिपाह में गोमती नदी के तट पर स्थित है। जौनपुर रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी मात्र 3 किलोमीटर है, 1.30 किलोमीटर जौनपुर किले से, 2 किलोमीटर जामा मस्जिद से, 1.30 किलोमीटर अटाला मस्जिद से और 4 किलोमीटर लाल दरवाजा मस्जिद से।

इस मस्जिद का निर्माण जौनपुर के सुल्तान इब्राहीम शर्की द्वारा करवाया गया था। यह मस्जिद हजरत सैद जहाँ अजमनी के जौनपुर आगमन पर उनके सम्मान के लिए बनवायी गयी थी। यदि इस मस्जिद के समय काल के बारे में बात की जाये तो इसका निर्माण अटाला और खालिस मुखलिस मस्जिदों के निर्माण काल के दौरान करवाया गया था। यह मस्जिद जौनपुर पर लोदियों के अधिपत्य के दौरान लोदियों द्वारा ध्वस्त कर दी गयी थी। रही-सही कसर गोमती में आयी बाढ़ ने पूरी कर दी थी।

वर्तमान काल में इस मस्जिद का मात्र एक हिस्सा बचा हुआ है। जनरल कनिंघम व फ्यूहरर ने इस मस्जिद के बचे हुए भाग के झंझरियों की सुन्दरता से प्रभावित होकर ही इसका नाम झंझरी मस्जिद रखा। यह मस्जिद चुनार से लाये बलुए पत्थर से बनायी गयी है तथा इसके केंद्रीय मेहराब के अर्धभाग पर डगरा शैली में कुरान की आयतों को उकेरा गया है जो कि अपने आप में एक सौंदर्य प्रदान करती हैं। शर्की शासन काल अपनी विशिष्ट प्रकार की निर्माण कला के लिए सर्वश्रेष्ठ है जिसका उदाहरण जौनपुर में बनी इमारतों में मिल जाता है।

1. द शर्की सल्तनत ऑफ़ जौनपुर, मियां मुहम्मद सईद
2. शर्की आर्किटेक्चर ऑफ़ जौनपुर, फ्यूहरर ए.


जौनपुर और सूफ़ीवाद का रिश्ता

Jaunpur District
08-03-2018 01:21 PM

अपने शब्दों को ऊँचा करो आवाज को नहीं! यह बारिश है जो फूलों को बढ़ने देती है इसकी गर्जन नहीं। - रूमी

रूमी उन मशहूर सूफीयों में से एक है जिन्होंने शायरी को लोगों तक सूफ़ीवाद को पहुँचाने का माध्यम बनाया।

आखिर क्या है सूफ़ीवाद?

मान्यता है कि सूफ़ीवाद इराक के बसरा नगर में तक़रीबन कुछ एक हज़ार साल पहले जन्मा, जिसकी प्रथम अन्वेषक राबी-अल-अदावियाह नाम की औरत थी। राबिया, अल ग़ज़ाली, अल अदहम, अत्तार, रूमी, हाफ़िज़ और ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती कुछ मशहूर सूफी शख़्सियत हैं। सूफीवाद इस्लाम का एक रहस्यवादी पंथ है और वे मानते हैं कि उनका स्त्रोत खुद पैगम्बर मुहम्मद हैं। सूफ़ी नाम कैसे मिला इसका कोई ठोस मत नहीं है, कुछ लोगों के हिसाब से ये उन्नी शब्द सोफोस (Sophos) मतलब ज्ञान से निकला है, कुछ लोगों के हिसाब से इसका मूल अरबी शब्द सफ़: (पवित्र) से है और किसी का यह मानना है कि सूफी यह शब्द सुफ़ (ऊन) से आया क्यूंकि सूफी दरवेश ऊन से बने कपड़े पहनते थे। सूफ़ियों के तरीके अथवा सिलसिले होते हैं जो उनके गुरु, उनके मुर्शिद के नाम से जाने जाते हैं जैसे चिश्ती, मदरिया, बेक्ताशी, नक्शबंदी, निमातुल्लाही आदि। सूफी संतों को फ़क़ीर अथवा दरवेश कहते हैं।

जौनपुर में मदरिया सिलसिला-

मदरिया सिलसिला के प्रथम अन्वेषक थे सूफी संत सईद बदिउद्दीन जिंदा शाह मदार जिन्हें क़ुतुब उल मदर के नाम से जाना जाता था।

मदरिया सिलसिला सामजस्यपूर्ण धारणा, कर्मकांड से ज्यादा धिक्र पर ज़ोर देने में, जिसमें आप अपने मन में अल्लाह का नाम स्मरण करते हैं, इन सिद्धांतों पर खड़ा हुआ है।

मदरिया सिलसिला का प्रसार बिहार से उत्तरप्रदेश और बंगाल की तरफ हुआ और उसके प्रचार एवं प्रसार में सबसे बड़ा हाथ था शर्की सुल्तानों का। जौनपुर सुलतान इब्राहिम शर्की ने मदरिया सिलसिला को राजाश्रय दिया। हज़रत मीर अशरफ़ जहाँगीर सिमनानी ने सुल्तान इब्राहिम शाह शर्की को एक ख़त लिखा था जिसमें पूरे उत्तर भारत के प्रमुख सिलसिलों के बारे में लिखा था और जिसमें मदरिया सिलसिला बहुत ज्यादा प्रसिद्ध था। सूफी संत सईद बदिउद्दीन जिंदा शाह मदार जौनपुर सुल्तान इब्राहिम शाह शर्की के बहुत करीबी सल्लागार एवं मुख्य वज़ीर थे। उनके गुजर जाने पर सुल्तान इब्राहिम ने उनकी कब्र पर दरगाह बनवाई। यह दरगाह मकानपुर, ज़िला कानपुर, उत्तर प्रदेश में स्थित है।

1. सोशल एंड कल्चरल हिस्ट्री ऑफ़ बंगाल वॉल्यूम 1: अब्दुर रहीम
2. मदरिया सिलसिला इन इंडियन पर्सपेक्टिव: आनंद भट्टाचार्य
3. रसैल-अर-रोवी-जिलिद 1, 2 और 3: हज़रत मौलवी जलालुद्दीन अहमद रसैल-अर-रोवी
4. सूफ़ी सेंटस एंड श्राइन्स इन इंडिया: जॉन ए. सुभान


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