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गुनाहों का देवता उपन्‍यास का आधुनिक समाज से परिचय

Jaunpur District
20-09-2018 02:55 PM

साहित्‍य समाज का दर्पण होता है, इस बात में कोई दो राह नहीं है। यदि हम हिन्‍दी साहित्‍य के इतिहास में विभिन्‍न लेखकों द्वारा लिखे गये साहित्‍यों को बारीकी से देखें, तो हमें उसमें तत्कालीन सामाज का परिदृश्‍य स्‍पष्‍ट दिखाई देता है। हिन्‍दी साहित्‍य में अनेक ऐसे लेखक और कवि हुए हैं, जिन्‍होंने अपनी लेखन क्षमता से स्‍वयं को साहित्‍य जगत में अमर कर दिया। आधुनिक गद्य साहित्‍य के प्रसिद्ध लेखक और कवियों में से एक थे ‘धर्मवीर भारती’ (1926-1997)। इनकी रचनाओं के ऊपर टीवी सिरियल और फिल्‍में भी बनाई गईं।

धर्मवीर भारती सिर्फ एक लेखक और कवि ही नहीं थे बल्कि, एक नाटक कलाकार और सामाजिक विचारक भी थे। धर्मवीर भारती का जन्‍म उत्‍तर प्रदेश (इलाहबाद) में हुआ और मृत्‍यु मुंबई में हुयी। इन्‍होंने अपने जीवन काल में अनेक उपन्‍यास (गुनाहों को देवता, सूरज का सातवां घोड़ा, अंधा युग) और कहानियां (मुर्दों का गाँव, स्वर्ग और पृथ्वी, चाँद और टूटे हुए लोग, बंद गली का आखिरी मकान, साँस की कलम से आदि) लिखीं। ये भारत की प्रसिद्ध साप्‍ताहिक पत्रिका धर्मयुग के प्रमुख संपादक (1960-97) भी रहे। इन्‍हें इनके उपन्‍यासों के लिए अनेक पुरूस्‍कारों (पद्मश्री-1972, वैली टर्मेरिक द्वारा सर्वश्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार-1984, महाराजा मेवाड़ फाउण्डेशन का सर्वश्रेष्ठ नाटककार पुरस्कार-1988 आदि अन्‍य) से भी नवाज़ा गया।

धर्मवीर भारती द्वारा लिखा गया प्रसिद्ध उपन्‍यास ‘गुनाहों का देवता’ (1959) आज भी युवाओं को पवित्र प्रेम का प्रत्‍यक्ष उदाहरण देता है। उपन्यास में बताई गयी कहानी अलाहाबाद के शहर में आधारित है। इस उपन्‍यास के प्रमुख पात्र चन्‍दर, सुधा और पम्‍मी हैं। सुधा और चन्‍दर एक दूसरे से प्रेम करते हैं, किंतु अपने आदर्शों के कारण अपनी भावनाओं को कभी एक दूसरे के समक्ष व्‍यक्‍त नहीं करते। सुधा का विवाह कहीं और हो जाता है तथा बाद में उसकी मृत्‍यु हो जाती है।

कथा में पम्‍मी और चन्‍दर के मध्‍य कामुकता की भावना तो दर्शायी गयी है किंतु किसी भी प्रकार की अशिष्‍टता का उल्‍लंघन नहीं किया गया है, जो युवा वर्ग को उत्‍तेजित करे। लेखक स्‍वयं इस उपन्‍यास के अत्‍यंत निकट हैं।

इस उपन्‍यास की प्रेम कथा के आधार पर लाईफ ओके (Life OK) चेनल में एक नाटक ‘एक था चन्‍द्र एक थी सुधा’ प्रसारित किया गया जिसका वीडियो आप नीचे देख सकते हैं। इसमें चन्‍द्र (प्रतिभाशाली) और सुधा (चंचल लड़की) नाम के दो पात्र एक दूसरे को पसंद करते हैं। किंतु लड़का लड़की को उसके पिता द्वारा पसंद किये गये लड़के से विवाह करने के लिए कहता है। इस कथा में दोनों पात्रों की विरह वेदना साफ झलकती है। साथ ही सामाज द्वारा बनायी गयी सीमाओं पर भी यह नाटक एक प्रश्‍न उठाता है।


वैश्वीकरण के इस दौर में अनुवाद का महत्‍व बढ़ता जा रहा है। गुनाहों का देवता उपन्‍यास को हिन्‍दी भाषा से अनभिज्ञ लोगों तक पहुंचाने के लिए पूनम सक्‍सेना ने एक प्रयास किया अर्थात इन्‍होंने आधुनिक पुस्‍तक प्रेमियों के लिए ‘गुनाहों का देवता’ उपन्‍यास का अंग्रेजी में अनुवाद किया। जो आज के युवाओं के लिए अत्‍यंत प्रासंगिक है। यह एक रोचक कथा ही नहीं वरन सामाजिक सोच को भी दर्शाता है।

संदर्भ:
1.https://en.wikipedia.org/wiki/Dharamvir_Bharati
2.https://goo.gl/1iEWpq
3.http://www.afaqs.com/news/story/45454_Life-OK-to-launch-love-story-based-on-classic-novel-Gunahon-Ka-Devta
4.https://www.hindustantimes.com/books/why-gunahon-ka-devta-is-relevant-to-new-age-readership/story-aYPUscF6n4e8glTfz4ue2L.html

http://prarang.in/Jaunpur_District/1809201850





ईसाई धर्म के कुछ प्रमुख भाग और सदस्‍य

Jaunpur District
19-09-2018 05:28 PM

विश्‍व के प्रमुख धर्मों में से एक ईसाई धर्म के अनुयायी एकेश्‍वरवाद पर विश्‍वास करते हैं। किंतु इस धर्म में भी अनेक भिन्‍नताएं देखने को मिलती हैं अर्थात एक ईश्‍वर में विश्‍वास के बाद भी इनके सिद्धान्‍त और आस्‍था में भिन्‍नताएं हैं। चलिए जानें ईसाई धर्म को थोड़ा करीब से।

ईसाई धर्म आज कैथोलिक, प्रोटेस्टैंट, ऑर्थोडोक्स, एवानजिलक के रूप में विभाजित हैं। जिसमें कैथोलिक सबसे ज्‍यादा प्रमुख हैं। जर्मनी से प्रारंभ हुए धर्म सुधार (लगभग 500 वर्ष पूर्व) में मार्टिन लूथर ((1483-1546) धर्मशास्‍त्री, पादरी, चर्च सुधारक आदि) ने कैथोलिक चर्च में सुधार का प्रयास किया जो चर्च में मतभेद का कारण बना, परिणाम स्‍वरूप चर्च का कैथोलिक और प्रोटेस्टैंट के रूप में विभाजन हो गया। प्रोटेस्टैंट धर्म के अनुयायी उन्‍हें नायक के रूप में पूजने लगे।

कैथोलिक और प्रोटेस्टैंट के मध्‍य भिन्‍नता:

1. बाइबिल के प्रति भिन्‍न दृष्टिकोण:
प्रोटेस्‍टेंट धर्म में लूथर ने स्‍पष्‍ट किया है कि, बाइबिल ईश्‍वर का एक मात्र पवित्र ग्रन्‍थ (या Sola Skriptura) है। जबकि कैथोलिक को मानने वाले सिर्फ बाईबिल को ही आधार नहीं मानते, वे कैथोलिक चर्च की पारंपरिक मान्‍यताओं का भी अनुसरण करते हैं।

2. चर्चों की प्रकृति:
कैथोलिक, पोप के नेतृत्‍व में चलने वाले सिर्फ अपने चर्च को दुनिया भर में पवित्र मानते हैं। इसके विपरीत प्रोटेस्‍टेंट चर्च का जन्‍म सुधारों के बाद हुआ है। इन्‍हें इवांजेलिकल (अर्थात सुसमाचार के अनुसार) भी कहा जाता है। इनके दुनिया भर में हज़ारों चर्च हैं तथा सबको इन्‍होंने समान माना है।

3. पोप तथा युहरिस्‍ट:
कैथोलिक पोप को अपोसिल पीटर (Apostle Peter) के उत्‍तराधिकारी के रूप में देखते हैं, जिन्‍हें यीशू द्वारा नियुक्‍त किया था। जबकि प्रोटेस्‍टैंटों द्वारा किसी भी पोप को नहीं माना जाता है, वे सुसमाचार या ईश्‍वर को सर्वोपरि मानते हैं।

4. धार्मिक उत्‍सव:
रोमन कैथोलिक चर्च में सात पवित्र संस्‍कार बपतिस्‍मा, युहरिस्‍ट, पुष्टि, सामंजस्य (तपस्या), अंतिम संस्कार, विवाह संस्‍कार और पवित्र आदेश हैं। इनका मानना है यह यीशु द्वारा बताए गये हैं। प्रोटेस्‍टैंट द्वारा मात्र इनमें से दो (बपतिस्‍मा, युहरिस्‍ट) का ही अनुसरण किया जाता है।

5. मैरी से जुड़े सिद्धांत और संतों की पूजा:
रोमन कैथोलिक यीशु की मां, मैरी को स्‍वर्ग की रानी के रूप में पूजते हैं। प्रोटेस्‍टैंट इसे स्वीकार नहीं करते। ये संतों की पूजा में विश्‍वास करते हैं जो भगवान में विश्‍वास करते हैं।

6. अविवाहित जीवन:
कैथोलिक चर्च में पोप का आजीवन अविवाहित रहना अनिवार्य है। किंतु प्रोटेस्‍टैंट में इस प्रकार की कोई बाध्‍यता नहीं है।

चलिए जानें ईसाई धर्म के प्रमुख संरक्षक संन्यासी, रोमन कैथोलिक भिक्षु, पादरी, और ब्रदर्स के मध्‍य अंतर:

1. चर्च में बपतिस्‍मा दिलाना, सुसमाचार को लागों के मध्‍य सुनाना और उनके लिए प्रार्थना करना तथा चर्च के अन्‍य धार्मिक अनुष्‍ठानों को पूरा करने वाला व्‍यक्ति पादरी होता है। यह चर्च का प्रमुख होता है।

2. कैथोलिक चर्च में ईसाई मठ (Monasteries) की परंपरा अत्‍यंत प्राचीन है। इन मठों में रहने वाले संत कहलाते हैं। ईसाई और यहूदी धर्म दोनों में यह परंपरा प्रचलित है, जो स्‍वयं (स्‍त्री या पुरूष) को ईश्‍वर में विलीन कर देना चाहते हैं, वे दुनिया की मोह माया त्‍याग संत बन जाते हैं। सभी पादरी संत नहीं होते और सभी संत पादरी नहीं होते हैं। संत अत्‍यंत अनुशासित और आध्‍यात्मिक जीवन व्यतीत करते हैं।

3. रोमन कैथोलिक परंपरा के अनुसार ब्रदर एक धार्मिक समुदाय का सदस्‍य होता है। ये मठों में रहने वाले संतों का एक समुदाय है। एक ब्रदर अभाव, शुद्धता और आज्ञाकारिता तीनों स्थितियों के प्रति संयमित होते हैं। ये पूरी निष्‍ठा के साथ अपनी सेवा चर्च को प्रदान करते हैं।

4. फ्रायर्स (बारहवीं और तेरहवीं सदी में प्रारंभ) भी ब्रदर्स का ही समूह होता है। ये आज्ञाकारिता के प्रति वचन बद्ध होते हैं। ये संतों से भिन्‍न होते हैं, ये समाज सेवक और धर्म प्रचारक के रूप में कार्य करते हैं। फ्रायर्स चार श्रेणी के सदस्‍य होते हैं - डोमिनिकन, फ्रांसिस्कन, कारमेलाइट्स और ऑगस्टीनियन। ये मठों या एक विशेष स्‍थान पर नहीं रहते हैं। ये स्‍थानांतरित होते रहते हैं।

कैथोलिक चर्च में एक और अन्‍य शब्‍द काफी प्रचलित है ‘पवित्र आदेश’। इसमें चर्च के बिशप, पादरी, डिकॉन शामिल होते हैं। सामान्‍य उपयोग में, यह चर्च के उन व्‍यक्तियों को संदर्भित करता है जिनके पास अधिकार होते हैं। वह मुख्‍यतः बिशप होता है, पादरी और डिकॉन उसके सहाय‍क होते हैं। ये सभी सदस्‍य प्रचार कर, विवाह संस्‍कार, बपतिस्‍मा देना, और अंतिम संस्‍कार कर सकते हैं।

कुछ अन्य बिंदु:
-पोप (अर्थात पिता) रोम के बिशप होते हैं। ये कैथोलिक साम्‍यवाद में प्रमुखता रखते हैं।
-पेट्रि‍यार्क लैटिन चर्च के प्रमुख होते हैं। ये विशेष चर्च के प्रमुख द्वारा चुने जाते हैं।
-मेजर आर्चबिशप कैथोलिक चर्चों में नियुक्‍त होते हैं।
-कार्डिनल्स पोप द्वारा नियुक्‍त चर्च के प्रिंस होते हैं, जो प्रमुखतः बिशपों को चुनता है।
-प्राइमेट का खिताब लैटिन चर्च द्वारा अन्‍य देशों के बिशपों को दिया जाता है।
-मेट्रोपॉलिटन बिशप पोप द्वारा नियुक्‍त किया जाता है। जिनके पास धार्मिक कार्य संपन्न करने का अधिकार होता है।
-आर्चबिशपों का शीर्षक बिशपों द्वारा दिया जाता है।

इस प्रकार अनेक ऐसे और सदस्‍य हैं जो चर्चों के प्रमुख द्वारा चर्च के हित में चुने जाते हैं। तथा वे समर्पित रूप से अपने धर्म का संचालन करते हैं।

संदर्भ:
1.https://www.dw.com/en/the-main-differences-between-catholics-and-protestants/a-37888597
2.http://priestvocation.com/difference-between-monks-friars-priests-and-brothers/
3.https://en.wikipedia.org/wiki/Hierarchy_of_the_Catholic_Church

http://prarang.in/Jaunpur_District/1809191847





अपने सुरों से प्रसिद्धि पाने वाले कुछ दृष्टिहीन संगीतकार

Jaunpur District
18-09-2018 04:37 PM

किसी भी प्रकार के शारीरिक विकार (विकलांगता, मूकबधिरता, नेत्रहीनता आदि) पर मनुष्‍य का कोई नियंत्रण नहीं होता। यह प्राकृतिक या अनैच्छिक हैं, किंतु समाज में अनेक उदाहरण ऐसे हैं जिन्‍होंने अपनी इस कमी को पीछे छोड़कर, स्‍वयं को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाया है। चलिए जानें ऐसे ही कुछ कलाकारों के विषय में, जिन्‍होंने अपने सुरों से समाज में एक नया मुकाम हासिल किया।

वर्ष 2015 में ‘लैन्सेट ग्‍लोबल हेल्‍थ जर्नल’ (Lancet Global Health Journal) द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार विश्‍व में लगभग 36 मिलियन लोग नेत्रहीन हैं, जिनमें से 8.8 मिलियन लोग भारत में हैं। सन 1990 में भारत के ये आंकड़े 7.2 मिलियन थे। तथा एक अनुमान के अनुसार विश्‍व में ये आंकड़े 2050 तक 115 मिलियन हो जाएंगे। सन 2007 की बात करें तो भारत के सभी नेत्र सम्बंधित मरीज़ों में से 75% का इलाज संभव था। परन्तु जहाँ भारत को 40,000 ऑप्टोमेट्रिस्ट (Optometrist, आँखों के डॉक्टर) की ज़रूरत थी वहाँ हमारे पास केवल 8,000 डॉक्टर मौजूद थे। साथ ही भारत में वार्षिक रूप से 2.5 लाख नेत्रदान की आवश्यकता थी परन्तु सिर्फ 25,000 वार्षिक नेत्रदान हो पाए जिनमें से 30% नेत्रों का इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकता। लेकिन अपने जीवन के इतने बड़े सच को बाधा ना मानते हुए कुछ लागों ने स्‍वयं को एक उदाहरण के रूप में उभारा है।

प्रारंभ करते हैं भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध कृष्‍ण भक्‍त सूरदास जी से। ये एक नेत्रहीन संगीतकार और कवि थे। 'पुष्टिमार्ग का जहाज' कहे जाने वाले सूरदास जी ने सं‍गीत के माध्‍यम से अपनी कृष्‍ण भक्ति को व्‍यक्‍त किया। सूरसागर, सूरसारावली और साहित्‍य लहरी इनकी प्रमुख रचनाओं में से कुछ हैं। इनके अतिरिक्‍त भारत में कई और ऐसे उदाहरण हैं।

20वीं सदी के एक प्रसिद्ध दृष्टिहीन भारतीय संगीतकार और गीतकार रविंदर जैन थे। आंखों की रोशनी ना होने के बावजूद उन्होंने गीत-संगीत से संसार को रोशन कर दिया। संगीतकार, गीतकार के रूप में रवींद्र जैन ने हिंदी फिल्मी जगत को सैकड़ों सदाबहार गाने दिए हैं। उन्होंने अपने सुरमयी संगीत और लाजवाब आवाज़ के दम से आज भी दुनियाभर के लोगों के दिल में अपनी जगह बना रखी है। उन्होंने फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक पुरस्कार भी जीता। उनकी पहली फिल्म, कांच और हीरा, 31 जुलाई 1972 को रिलीज़ हुई थी।

भारतीय उपमहा‍द्वीप में अनेक ऐसे भी दृष्टिहीन गायक हैं, जो दुनिया के मध्‍य तो प्रसिद्ध नहीं हुए हैं, लेकिन उनके सुर काफी मधुर हैं। जिनमें से एक है हरिद्वार में गंगा के तट पर पर स्थित हरी, जिसकी आवाज़ उसके लिए एक प्राकृतिक उपहार स्‍वरूप है। यह प्लास्टिक की बाल्टी को वाद्य के रूप में इस्तेमाल करके गाना गाता है। नीचे दिए गए वीडियो में आप हरी को गाते देख सकते हैं:


ऐतिहासिक रूप से, कुछ अंधे संगीतकारों, जिनमें से कुछ सबसे मशहूर भी हुए, ने औपचारिक निर्देशों के बिना ही प्रदर्शन किया है, चूंकि इस तरह के निर्देश लिखित रूप से नोटेशन (Notation) पर निर्भर होते हैं। हालांकि, आज नेत्रहीन संगीतकारों के लिए कई संसाधन उपलब्ध हैं, जो पश्चिमी संगीत सिद्धांत और शास्त्रीय नोटेशन को समझने में मदद करते हैं। लुई ब्रेल, जिन्होंने नेत्रहीन संगीतकारों के लिए ब्रेल वर्णमाला बनाई, तथा उन्होंने ऐसे संगीतकारों के लिए ब्रेल संगीत नामक शास्त्रीय नोटेशन की एक प्रणाली भी बनाई। यह प्रणाली नेत्रहीन संगीतकारों को नोटेशन पढ़ने और लिखने में सहायता देती है।

संदर्भ:
1.https://timesofindia.indiatimes.com/india/India-has-largest-blind-population/articleshow/2447603.cms
2.https://indianexpress.com/article/india/8-8-million-blind-in-india-in-2015-says-study-in-lancet-4781368/
3.http://www.freepressjournal.in/mind-matters/surdas-saint-singer-and-poet/613138
4.https://en.wikipedia.org/wiki/Ravindra_Jain
5.https://en.wikipedia.org/wiki/Blind_musicians
6.https://scroll.in/article/710288/discover-the-fabulous-street-singers-of-the-indian-subcontinent
7.http://www.radioandmusic.com/entertainment/editorial/news/170802-being-called-blind-spite-being-visually

http://prarang.in/Jaunpur_District/1809181843





हल्दी के कुछ चमत्कारी औषधीय गुण

Jaunpur District
17-09-2018 02:49 PM

चिकित्सा के क्षेत्र में आए दिन कोई ना कोई आविष्कार होते जा रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं यह सिलसिला आज से नहीं बल्कि भारत में ऐतिहासिक रूप से चलता आ रहा है। प्राचीनतम वेद, अथर्ववेद में सबसे पहले विभिन्न दवाइयों (जड़ी-बूटियों), चिकित्सा और इलाज जैसी बात कही गई है। जिसे आगे चलकर आयुर्वेद में शामिल किया गया। आयुर्वेद को ग्रीक और रोमन द्वारा लैटिन शब्द ‘मटेरिया मेडिका’ कहा जाता है। आइए आपको बताते हैं घर में भोजन में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली हल्दी के गुणों के बारे में। हल्दी अपने औषधीय गुणों के लिए सबसे लोकप्रिय और सबसे पुराने मसालों में से एक है। भारत में, हल्दी के चिकित्सीय गुणों के कारण आयुर्वेदिक दवाओं में हल्दी का उपयोग किया जाने लगा है। हल्दी उज्ज्वल पीले रंग की जड़ी-बूटियों का प्रकंद है, जो हिमालयी पहाड़ों के मूलतः अदरक की प्रजातियों से संबंधित है। आपको बताते हैं कि हल्दी, गठिया, मधुमेह, जठरांत्र मुद्दों, घावों, दर्द आदि जैसे कई स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज और रोकथाम में फायदेमंद पाया गया है।

हल्दी के स्वास्थ्य लाभ:

1. हल्दी में मिलने वाला यौगिक, कर्क्यूमिन (Curcumin), सूजन और विषाद के लक्षणों को कम करने में लाभदायक साबित होता है।

2. कुछ शोध से पता चलता है कि हल्दी ने ऑस्टियोआर्थराइटिस (Osteoarthritis) के दर्द को कम करने के लिए इबुप्रोफेन (Ibuprofen) के समरूप काम किया है, परन्तु यह दर्द में सुधार लाने के लिए सिद्ध साबित नहीं हुआ है।

3. इसका उपयोग पाचन और गैस में सुधार; लिवर रोग को नियंत्रित करने में; कैंसर के इलाज में; जौंडिस (Jaundice) के उपचार में; आंतो के कीड़ों को खत्म करने के लिए काफी साहयक साबित होता है।

त्वचा और बालों के लिए हल्दी के लाभ:

1. हल्दी आपके चहरे से मुँहासों को हटाता है। मुँहासे के लिए, आप एक फेस पैक (Face Pack) का उपयोग कर सकते हैं जिसमें चंदन और हल्दी पाउडर शामिल हों।

2. हल्दी और बेसन स्क्रब चेहरे के अनचाहे बालों को हटाने में मदद करता है। स्क्रब बनाने के लिए आप दूध में हल्दी पाउडर और बेसन को मिलाएं, फिर इसे चेहरे में उंगलियों से परिपत्र गति में मालिश करते हुए हटाएं। इसका प्रभाव प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से 4 सप्ताह के लिए उपयोग किया जाना चाहिए।

3. हल्दी का एंटीऑक्सीडेंट गुण झुर्रियों को कम करने में भी मदद करता है। हल्दी को दही/दूध में मिलाकर एक फेस पैक तैयार करें, 10 मिनट बाद इसे ठंडे पानी से धो दें।

हल्दी का पर्याप्त सेवन लाभदायक सिद्ध होता है, परंन्तु इसका आवश्यकता से अधिक सेवन नुकसान दायक भी हो सकता है। जैसे कि पेट की परेशान, उबकाई, चक्कर आना, पित्ताशय थैली की समस्याएं, और आइरन की कमी को भी उत्तपन कर सकता है।

*ऊपर दिए गए सभी उपचार शैक्षिक उद्देश्य के लिए हैं ना कि आज़माने लायक सिद्ध उपचार हैं। गलत खुराक इलाज के बजाय, आपको दुष्प्रभाव और नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए कोई भी उपचार अपनाने से पहले योग्य और प्रशिक्षित आयुर्वेदिक और एलोपैथिक डॉक्टरों से सलाह ज़रूर करें।

क्या आपको पता है कि हल्दी को विभिन्न भारतीय भाषाओं में किन-किन नामों से जाना जाता है। आइए बताते हैं आपको इसके विभिन्न नामों के बारे में:

बंगाली – हल्दी
गुजराती – हल्दी
कन्नड़ – अरिशिना
कोंकणी – हलाद
मलयालम – मंजल
मराठी – हल्दी
फारसी - सर्ड चुबाह
पंजाबी – हल्दी
संस्कृत – हरिद्रा
तमिल – मंजल
तेलुगु - पसुपु

संदर्भ:
1. अंग्रेज़ी पुस्तक: Kurian, J. C. (1995) Plants that Heal, Oriental Watchman Publishing House
2. http://www.turmeric.co.in/turmeric_medicinal_use.htm
3. https://www.healthbeckon.com/turmeric-benefits/
4. https://www.webmd.com/vitamins/ai/ingredientmono-662/turmeric
5. https://en.wikipedia.org/wiki/Materia_medica

http://prarang.in/Jaunpur_District/1809171839





शुरुआती भारतीय फिल्मों में 1928 की शिराज़

Jaunpur District
16-09-2018 01:17 PM

महान लोग हमेशा वे नहीं होते जो व्यवस्था और तंत्र के विरूद्ध जाते हैं तथा बाकी सबके लिए पथ बनाते हैं, कई बार वे ऐसे भी लोग होते हैं जो अपने पीछे एक छाप छोड़ जाते हैं जो समय के साथ धुंधली तो हो जाती है पर उसका प्रभाव आम हो जाता है। उन्हीं में से एक थे जर्मनी के फ्रान्ज़ ऑस्टेन। उनके द्वारा किया गया भिन्न संस्कृतियों का जोड़ आज दुनिया भुला चुकी है परन्तु आपको ये भी बता दें कि उनके बिना भारत का सिनेमा जगत वर्तमान स्थिति से बिलकुल अलग हो सकता था।

सही मायने में फ्रान्ज़ हिंदी फिल्मों के खोजकर्ता थे जिन्होंने सन 1940, 1950 और कुछ हद तक 1960 की सबसे बड़ी और मशहूर फ़िल्में निर्मित की थीं। सन 1924 में फ्रान्ज़ एक लन्दन में रहने वाले भारतीय वकील से मिले जिनका नाम था हिमांशु राय। उस समय राय फ्रान्ज़ की जन्मभूमि म्युनिक आये हुए थे। उनके म्युनिक आने का लक्ष्य था विश्व के धर्मों पर आधारित अपनी फिल्मों की एक श्रृंखला के लिए कुछ साथी ढूंढना और वहाँ उन्होंने साथी के रूप में हाथ मिलाया फ्रान्ज़ के भाई पीटर की कंपनी के साथ।

इसके बाद फ्रान्ज़ द्वारा फ़िल्में बनाने का सिलसिला शुरू हुआ। ऑस्टेन ने शुरुआत की ‘लाइट ऑफ़ एशिया’ (1925) की शूटिंग से। उस समय इसके जैसी काफी और भी फ़िल्में भिन्न निर्माताओं द्वारा बनाई जा रही थीं पर एक विशेषता जो इस फिल्म को सबसे अलग बनाती थी वह ये थी कि ‘लाइट ऑफ़ एशिया’ की शूटिंग भारत में हुई थी जिससे फिल्म और भी वास्तविक लगती थी। यह फिल्म यूरोप में काफी प्रसिद्ध हुई तथा इसके बाद ऑस्टेन और राय की जोड़ी ने ऐसी दो और फ़िल्में बनाईं, ‘शिराज़’ (1928) जो ताज महल की कहानी पर आधारित थी और ‘प्रपंच पाश’ (1929) जो महाभारत पर आधारित थी। हमारे जौनपुर को भी शिराज़ ए हिन्द के नाम से जगत में जाना जाता है, हालांकि इस बात का इस फिल्म से कोई ताल्लुक नहीं है। नीचे दी गयी विडियो में आप यह पूरी फिल्म देख सकते हैं:


सिनेमा में मौन से आवाज़ों के तकनीकी सफ़र की वजह से ऑस्टेन और राय की साझेदारी थम गयी क्योंकि जर्मन बोलते हुए भारतीय फिल्मों में अटपटे लगते। परन्तु ये उनकी साझेदारी का अंत नहीं था। 1934 में बॉम्बे टॉकीज़ की नींव रखने के बाद राय ने फ्रान्ज़ को दोबारा संपर्क किया और इसके बाद इन्होंने काफी फ़िल्में साथ बनाईं जिनमें से एक थी ‘अछूत कन्या’ (1937) जिसने मशहूर भारतीय अभिनेता अशोक कुमार को प्रसिद्धी की सीढ़ी पर चढ़ाया।

हालांकि ऑस्टेन को हिंदी का एक शब्द भी समझ नहीं आता था, फिर भी उन्होंने इतनी ख़ास फिल्मों का निर्माण किया जिन्हें आज तक फिल्म जगत की सबसे बेहतरीन रचनाओं में गिना जाता है, इससे समझ आता है कि फ्रान्ज़ को अपनी कला की पूरी पूरी समझ थी तथा शायद वे ना होते तो आज भारतीय सिनेमा जगत इतनी प्रगति न कर पाता।

संदर्भ:
1.https://swarajyamag.com/culture/the-many-ways-cinema-forgot-franz-osten
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Franz_Osten

http://prarang.in/Jaunpur_District/1809161832





ट्रकों से लेकर रॉयल इनफील्ड बनाने वाली आयशर की कहानी

Jaunpur District
15-09-2018 02:24 PM

किसी भी देश को आर्थिक जगत के आकाश में पहुंचाने के लिए, वहां पर स्थित कंपनियों का महत्‍वपूर्ण योगदान होता है। आज विश्‍व में लाखों कंपनियां हैं, लेकिन उनमें से कुछ ही ऐसी हैं, जो विश्‍व विख्‍यात हैं। यही स्थिति किसी देश विशेष की कंपनियों की भी होती है। किसी देश में कंपनियों की श्रृंखला में कौन सी उच्‍च स्‍तर पर होंगी और कौन सी निम्‍न इसका निर्धारण बाज़ार पूंजीकरण या मार्केट कैपिटलाइज़ेशन (Market Capitalization) द्वारा होता है।

बाज़ार पूंजीकरण = कंपनी के शेयरों का बाजार मूल्‍य × कंपनी के आउटस्टैंडिंग शेयरों की संख्‍या।
(आउटस्टैंडिंग शेयर- कंपनी के वे सभी शेयर जो वर्तमान में निवेशकों, कंपनी अधिकारियों और अंदरूनी सूत्रों के अधिकार में हैं।)

चलिए जानें भारत की सड़कों में चलने वाले बड़े-बड़े ट्रकों, बसों और अन्‍य वाहन का उत्‍पादन करने वाली, यहां की उच्‍चतम 100 कंपनियों में से एक आयशर मोटर के उद्भव, विकास और वर्तमान स्थिति के बारे में। 1948 में गुड अर्थ (Goodearth) नामक कंपनी भारत में विदेशों से ट्रैक्‍टर आयात करती थी। 1958 में इसने जर्मनी की आयशर कंपनी के साथ मिलकर भारत में ट्रैक्‍टर बनाने का निर्णय लिया। इन संयुक्‍त कंपनियों ने आयशर ट्रैक्टर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (ई.टी.सी.आई.) नाम से फरीदाबाद में अपना पहला कारखाना खोला। इनका पहला ट्रक 1959 में भारत में बेचा गया तथा 1965 में सार्वजनिक भागीदारी के बाद इसका नाम बदलकर आयशर ट्रैक्‍टर इंडिया लिमिटेड रखा गया। 1975 तक इसका निर्माण 100% स्‍वदेशी हो गया।

आयशर कंपनी के प्रसिद्धि प्राप्‍त करने के बाद, इसके नाम का लाभ उठाने की सोच के साथ आयशर का नाम बदलकर 'आयशर गुडअर्थ लिमिटेड' (1980) रख दिया गया। इसने जापान की एक कंपनी के साथ मिलकर हल्‍के वाणिज्यिक वाहन बनाना प्रारंभ किया। 1990 में आयशर कंपनी ने एनफील्ड इंडिया के 26% शेयर खरीद कर वाहन व्यवसाय में प्रवेश किया तथा 1993 में इस ग्रुप ने एनफील्ड इंडिया लिमिटेड में 60% हिस्‍से की भागीदारी ले ली। आज आयशर 'रॉयल एनफील्‍ड' कंपनी की (मध्‍यम वज़न वाली मोटरसाइकिल निर्माता) की प्रमुख कंपनी है।

रॉयल एनफील्‍ड विश्‍व भर में 40 से अधिक देशों (उत्‍तरी अमेरिका, यूरोप, थाइलैंड, ब्राज़ील आदि) में वाहन उपलब्‍ध कराता है। 2008 से आयशर कंपनी स्‍वीडन के वॉल्‍वो ग्रुप के साथ संयुक्‍त रूप से मिलकर आधुनिक वाहनों का निर्माण कर रही है। आज यह कंपनी प्रतिस्‍पर्धा में विश्‍व की वाहन निर्माता कंपनियों से तीव्रता से आगे बढ़ रही है। वर्तमान समय में इस कंपनी की मार्केट कैप (बाज़ार पूंजीकरण) 80 हज़ार करोड़ से भी अधिक है, जो भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के विकास में बहुत बड़ा योगदान दे रही है।

संदर्भ:
1.http://www.icmrindia.org/casestudies/catalogue/Marketing/Royal_Enfield_Revival-Case%20Study.htm
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Eicher_Motors
3.http://www.eicher.in/milestones
4.http://www.outlookindia.com/outlookmoney/investment-ideas/promising-eicher-motors-2190

http://prarang.in/Jaunpur_District/1809151831





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