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एक ऐसा कानून जो छीन सकता है आपसे आपकी ज़मीन

Jaunpur District
20-10-2018 01:47 PM

प्रत्‍येक व्‍यक्ति जो जिस छत के नीचे रह रहा है, उसका मालिक बनना चाहता है। अर्थात कोई व्‍यक्ति किसी स्‍थान पर लंबे समय से रह रहा है, तो वह उस क्षेत्र में प्रतिकूल कब्‍जा (Adverse Possession) कर सकता है। इसके लिए सरकार द्वारा कुछ दिशा निर्देश दिये गये हैं। जिनका अनुसरण कर वह उस क्षेत्र का मालिकाना हक प्राप्‍त कर सकता है। भारतीय कानून में परिसीमा अधिनियम 1963 के तहत प्रतिकूल कब्‍जे की अनुमति दी गयी है, बस वह कब्‍जा किसी अवैध तरीके से ना‍ किया गया हो या उसमें किसी के द्वारा कोई अवरोध उत्‍पन्‍न ना किया गया हो।

1. यदि कोई व्‍यक्ति कानून द्वारा निर्धारित समय (निजी संपत्ति-12 वर्ष, सरकारी संपत्ति-30 वर्ष) तक किसी स्‍थान पर अबाध रूप से रह रहा है, तो वह उस क्षेत्र के लिए मालिकाना हक की मांग कर सकता है।
2. उस क्षेत्र के लिए दावा करने वाला वह एकमात्र दावेदार होना चाहिए।
3. प्रतिकूल कब्‍जे वाले क्षेत्र के वास्‍तविक मालिक के पास उस क्षेत्र का मालिकाना हक होने के बाद भी वह उस क्षेत्र में अपना दावा करने का अधिकार खो देता है।
4. यदि वास्‍तविक मालिक नाबालिक, मानसिक रूप से पीड़ित या शसस्‍त्र सेना बल में कार्यरत हो तो उनके क्षेत्र में प्रतिकूल कब्‍जे का दावा नहीं किया जा सकता।
5. कब्‍जा करने वाली भूमि के विषय में अधिकांश लोगों को मालूम होना चाहिए। ताकि मूल मालिक तक इसकी सूचना पहुंच जाए तथा वह इस पर अपनी क्रिया प्रतिक्र‍िया दे सके।
6. निर्धारित समय सीमा के दौरान प्रतिकूल कब्‍जे के क्षेत्र में कब्‍जेदार द्वारा आवश्‍यक गतिविधियां जैसे फसल उत्‍पाद, भवन मरम्‍मत, वृक्षारोपण तथा भूमि या भवन के चारों ओर दीवार बनाना आदि होनी चाहिए। साथ ही निर्धारित समय के भीतर किसी भी प्रकार का अंतराल ना रहा हो, वह निरंतर उस क्षेत्र में रह रहा हो।
7. दावेदार को अपना दावा साबित करने के लिए पर्याप्‍त सबूत होने चाहिए।

वास्‍तविक मालिक द्वारा की गयी किसी भी प्रकार की अनदेखी या लापरवाही उससे उसका मालिकाना हक छीन सकती है। इस प्रकार की स्थिति से बचने के लिए वास्‍तविक भू-स्‍वामी (Landlord) को जागरूक रहना अनिवार्य है क्‍योंकि प्रतिकूल कब्‍जेदार अपने इरादों को वास्‍तविक मालिक को बताने के लिए बाध्‍य नहीं है। अर्थात अपनी संपत्ति की निगरानी की संपूर्ण जिम्‍मेदारी वास्‍तविक मालिक की है। वर्ष 2010 में सूप्रीम कोर्ट ने हरियाणा राज्‍य के एक केस में वास्‍तविक मालिक के पक्ष में फैसला दिया तथा इस प्रकार के केस की गहनता से जांच का आदेश दिया।

फिर भी आज इस कानून को सुधारने के लिए एक बड़े बदलाव की आवश्‍यकता है जिसमें एक असमानता देखने को मिल रही है अर्थात वास्‍तविक मालिक को अपनी संपत्ति का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ रहा है।

संदर्भ:
1.http://www.lawyersclubindia.com/articles/On-Adverse-Possession-and-Consequent-Change-of-Ownership--8413.asp
2.https://www.proptiger.com/guide/post/sc-puts-in-caveat-to-check-adverse-possession-by-squatters
3.https://www.makaan.com/iq/legal-taxes-laws/what-is-adverse-possession

http://prarang.in/Jaunpur_District/1810201973





दशहरे और नवरात्रों का गुप्त अर्थ

Jaunpur District
19-10-2018 01:28 PM

दशहरा संस्कृत के "दुश-हर" से बनाया गया है, जिसका मतलब है ‘बुरे भाग्य को हटाना’, जो भारत में मनाए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि दशहरे के दिन दस सिरों वाले रावण का वध किया जाता है। परन्तु क्या रावण के वास्तव में दस सर थे, या फिर ये किसी चीज़ का प्रतीक हैं? ये दस सिर असल में मानव के मन में उत्पन्न होने वाले विकारों को दर्शाते हैं।

रावण के दस सिर उसके अवगुणों के बारे में बताते हैं:

1. वासना
2. क्रोध
3. मोह
4. लोभ
5. गर्व
6. ईर्ष्या
7. मस्तिष्क
8. बुद्धि
9. चित्त
10. अहंकार

वहीं दूसरी ओर राम की राजसी गुणवत्ता उनकी सात्विकता से जुड़ी है। तभी तो राम ने रावण का वध करने के बाद भी उदारता दिखाई थी।

रामायण मस्‍तिष्‍क को सांसारिकता से हटाकर ब्रह्म में लीन करने के लिए एक अच्‍छा मार्ग दर्शाती है। जिसमें सीता ‘मस्तिष्क’ का प्रतीक हैं और श्री राम ‘ब्रह्म’ के प्रतीक हैं। सीता को लंका से वापस लाना और राम से दोबारा मिल जाना ‘मस्तिष्क को विषय (भौतिक वस्तु) से बाहर निकालकर ब्रह्म में विलीन कर देने को दर्शाता है। यह संक्षेप में रामायण का गुप्त अर्थ है, जो रामायण की आध्यात्मिकता को दर्शाता है।

भारतीय वैदिक ज्योतिष के अनुसार नौ ग्रह बताये गए हैं:

1. रवि
2. चंद्र
3. मंगल
4. बुद्ध
5. बृहस्पति
6. शुक्र
7. शनि
8. राहु
9. केतु

साथ ही हमारे शरीर के नौ प्रवेश द्वार (2 आंख, 2 कान, 2 नासिका, मुँह, गुदा, और मुत्रोत्‍सर्जन) होते हैं। नवरात्रि में हम नौ ग्रहों से आशीर्वाद लेकर अपने शरीर के नौ प्रवेश द्वार को नियंत्रित करते हैं। माँ दुर्गा के एक रूप की पूजा के साथ एक ग्रह की भी पूजा की जानी चाहिए और उसी के साथ हर रोज़ अपने शरीर के एक प्रवेश द्वार को बाहरी रूप से ही नहीं बल्कि दिल, मन और आत्मा की मदद से प्रत्येक दिन साफ किया जाना चाहिए। हमारे द्वारा किये जाने वाले शारीरिक कार्य अस्थायी हैं। शरीर के भीतर आत्मा से हमें इसका मूल्य प्राप्त होता है, इसलिए इसे एक पवित्र मंदिर के रूप में माना जाता है।

संदर्भ:
1.http://aumshiva.blogspot.com/2013/10/dasha-hara-deeper-meaning_13.html
2.https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10153995093856239&set=a.10150426417856239&type=3&theater

http://prarang.in/Jaunpur_District/1810191967





दुनिया की एक अद्भुत जीव चींटी की जीवनचर्या

Jaunpur District
18-10-2018 02:59 PM

साहस, एकता, दृढ़ता, निरंतरता, धैर्य, मेहनत जैसे शब्‍दों की जब बात की जाती है, तो हमारे ज़हन में चींटी का नाम आना स्‍वभाविक है। चींटियां समूह में रहकर जीवन-यापन करती हैं, जो समाज के लिए सामुहिकता का एक प्रत्‍यक्ष उदाहरण हैं। विश्‍व में चींटियों की 1000 से भी अधिक प्रजातियां मौजूद हैं। जिनमें से कुछ ही मानव के लिए हानिकारक होती हैं। सामान्‍यतः चीटियों को तीन समूह में बांटा गया है, जिनमें प्रमुखतः मादाएं ही होती हैं:

रानी चींटी:
रानी चींटी का एकमात्र कार्य अण्‍डे देना है। ये नये समूह का निर्माण करती हैं। वे अपने साथी को अपने पंखों के माध्‍यम से ढूंढती हैं। ये सन्तानोत्पत्ति तथा उनकी देखरेख के अतिरिक्‍त अन्‍य कोई कार्य नहीं करती। इनके लार्वा (Larvae) होने के समय पर अधिक खिलाया जाता है, जिस कारण यह कार्य करने वाली चींटियों से अधिक बड़ी होती हैं। तथा यह समूह के मुखिया की भूमिका निभाती हैं।

श्रमिक चींटी:
पंख रहित ये मादा चींटियां सन्तानोत्पत्ति के अतिरिक्‍त अन्‍य सभी कार्य करती हैं जैसे- सम्‍पूर्ण समूह के लिए भोजन एकत्रित करना, घर बनाना तथा बच्‍चों की देखरेख करना आदि। इन चींटियों के लार्वा होने के समय पर रानी चींटी की अपेक्षा इन्हें कम भोजन दिया जाता है। ये चींटियां कठोर परिश्रम का प्रत्‍यक्ष उदाहरण होती हैं।

नर चींटी:
रानी चींटी को ढूंढने के लिए इनके पास पंख होते हैं। इनका एकमात्र कार्य रानी चींटी से मिलना होता है। इनसे मिलने के पश्‍चात इनकी मृत्‍यु हो जाती है। इन्‍हें ड्रोन (Drone) कहा जाता है।

चींटिंयो का समूह तीस वर्ष तक बना रह सकता है, यह उनकी रानी चींटी की उम्र पर निर्भर करता है। चींटिंयों की आबादी इनकी प्रजातियों पर निर्भर करती है। फायर एन्ट (Fire ant) चींटिंयों की आबादी बढ़ई चींटियों (Carpenter ants) की अपेक्षा अधिक होती है। फायर एंट बढ़ई चींटियों की तुलना में अधिक नुकसानदेह भी होती हैं।

चीटियों के शरीर से फेरोमोन (Pheromone) नामक हार्मोन (Harmone) स्‍त्रावित होता है, जो इनको एक दूसरे से जोड़ने तथा भोजन एकत्रित करने में सहायता करता है। इसी हार्मोन की सुगंध इनके लिए संकेत का कार्य करती है, जिसकी सहायता से ये भोजन की तलाश में कई दूर निकलने के बाद भी वापस अपने घर तक पहुंच जाती हैं।

चींटियों के शरीर में फेफड़े नहीं होते हैं। ये अपने शरीर में स्थित छिद्रों के माध्‍यम से सांस लेती हैं, जो इन्‍हें पानी में भी सांस लेने में सहायता करते हैं। सबसे रोचक बात यह है कि चींटियां अपने शरीर के वज़न से 10-50 गुना अधिक वज़न उठा सकती हैं। साथ ही कुछ चींटियां क्षतिग्रस्‍त होने पर भी जीवित रह सकती हैं तथा कुछ भोजन पानी के बिना सप्‍ताह तक जीवित रह सकती हैं।

युवाओं को प्रोत्‍साहित करने के लिए, हरिवंश राय बच्‍चन जी ने चींटी को संकेत बनाकर बहुत खूबसूरत कविता लिखी है:

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है, चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का साहस रगों में हिम्मत भरता है, चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
मेहनत उसकी बेकार हर बार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

संदर्भ:
1.https://www.terminix.com/pest-control/ants/behavior/
2.https://www.terminix.com/blog/education/what-is-an-ant-colony/
3.https://www.rentokil-steritech.com/blog/5-interesting-facts-ants/

http://prarang.in/Jaunpur_District/1810181964





क्यों और किसने कहा जौनपुर को पहली बार शिराज़-ए-हिंद?

Jaunpur District
17-10-2018 01:46 PM

जौनपुर का इतिहास बहुत ही स्वर्णिम रहा है, इसको शिराज-ए-हिंद के खिताब से भी नवाजा गया था। आइए जानते हैं आखिर क्यों कहा जाता है जौनपुर को शिराज-ए-हिंद।

शरकी शासनकाल के दौरान जौनपुर श‍रकियों की राजधानी बन गयी थी। उन्होंने किले के भीतर और शहर चारों ओर सैकड़ों मस्जिदों और मदरसों का निर्माण किया। और इनमें दुनिया के विभिन्न हिस्सों से विद्वान पुरुषों और भक्तों को बुलाया गया। साथ ही शहर के राजा और राज्यपाल द्वारा शिक्षकों को उपनिवेश और पदकों से नवाजा गया, ताकि शिक्षक निश्‍चिंत रूप से छात्रों का पठन पाठन करा सकेे।

मुहम्मद शाह के समय में जौनपुर के गवर्नरों को विद्वानों और भक्तों का सम्मान करने के लिए हमेशा आदेश जारी किए जाते थे। साथ ही स्थानीय राजकोश के मुखिया को मदरसों की रक्षा करने के लिए नियुक्त किया गया था। राजाओं द्वारा लेखकों को मदरसों की स्थिती और शिक्षकों के वेतन की जांच करने और उसमें एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए बुलाया जाता था। वहीं राजाओं को खुश रखने के लिए मदरसों और मठ में आने वाले राजकुमारों और रईसों का बड़े उपहार देकर सम्मान किया जाता था।

मुहम्मद शाह के बाद अवध प्रांत, बनारस और जौनपुर सरकार को नवाब बुरहान-उल-मुल्क सादत खान की देखभाल के लिए सौंप दिया गया था। जब नवाब जौनपुर आए तो सभी उनके दरबार में पहुंचे, चुंकि धार्मिक विद्वान और शिक्षकों का राज दरबार में उपस्थित होना अनिवार्य नहीं था, इसलिए उनमें से कोई भी दरबार नहीं गया। संयोग से एक दिन नवाब खुद ही उस समय के सम्मानित प्रसिद्ध पुरूषों के नेता से मिलने चले गए।

एक दिन राजा हुमायूं और शाह ताहमास (फारस के सम्राट) की पहली मुलाकात मे जब शाह ताहमास ने हुमायूं से जौनपुर की जनसंख्या और प्रसिद्ध पुरुषों का मूल्यांकन करने को कहा, तब हुमायूं ने जौनपुर के राज्य के अधिकारियों को मदरसों की खोज करने को कहा और वहाँ के शिक्षित व्यक्तियों का सम्मान करने का आदेश दिया। और इसफान में भी मदरसे और मठ बनवाए, साथ ही शिक्षित और विद्वान लोगों को बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए बुलाया गया। इसके कई सालों बाद, शाहजहां द्वारा जब जौनपुर और ईरान के इस संबंध के बारे में पता चलता है तो वे जौनपुर के लिए "भारत के शिराज" का वर्णन करते हैं। यह "तारीख-ए-शाहजहानी" में भी दर्ज किया गया, और उन्होंने जौनपुर को ‘दार-उल-लम’ का नाम भी दिया था।

संदर्भ :-
1.https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.334064/page/n21

http://prarang.in/Jaunpur_District/1810171960





जौनपुर के अतीत (1300-1800) के विद्वानों की एक सूची

Jaunpur District
16-10-2018 02:17 PM

भारत काफी समय से मुस्लिम शिक्षा और संस्कृति का केंद्र रहा है। उस दौरान मुस्लिमों ने ना केवल शासन किया, बल्कि शांतिप्रिय रूप में मुस्लिम साहित्य, विज्ञान, धर्मशास्त्र और न्यायशास्त्र आदि के विभिन्न क्षेत्रों में सुधार और समृद्धि के लिए हर प्रकार की प्रेरणा और संरक्षण प्रदान किया। वहीं जौनपुर भारत में इस्लामिक शिक्षा के प्रसिद्ध केंद्र में से एक था।

1351 ईस्वी में सुल्तान फिरोज शाह तुगलक द्वारा इसकी नींव रखने और शर्की राजाओं (1394-1500 ईस्वी) की राजधानी होने के बाद जौनपुर को सुंदर और विशाल मस्जिद, मदरसा और मठों से सजाया गया, जहाँ विभिन्न हिस्सों से विद्वान और भक्त आया करते थे। जौनपुर पर लेखक मौलाना खैर-उद-दीन मुहम्मद द्वारा लिखी गयी पुस्तक "ताज़कीरत-उल उलामा ऑर ए मेमोयर ऑफ़ दी लर्नड मेन" (Tazkirat-ul Ulama Or A Memoir Of The Learned Men) में उन्होंने कुछ प्रमुख सिद्ध पुरुषों का एक संक्षिप्त विवरण दिया है, जो उस दौरान काफी प्रसिद्ध हुए थे।

मौलाना खैर-उद-दीन मुहम्मद का जन्म 1752 ईस्वी में इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने मौलाना मुहम्मद आस्कारी के साथ जौनपुर में अपनी शिक्षा पूरी की और एक शिक्षक के रूप में वहां कार्य भी किया। बाद में वे इलाहाबाद चले गए जहाँ उनके काम में काफी प्रगति हुई। उन्होंने कुछ यूरोपीय अधिकारियों की दोस्ती और संरक्षण का आनंद भी लिया। उनकी श्रीमान अब्राहम विलंद (उच्चस्तरीय ब्रिटिश अधिकारी) ने भी विभिन्न तरीकों से मदद की थी। साथ ही इस पुस्तक को लिखने का सुझाव श्रीमान विलैंड ने दिया था और इसे लोर्ड मार्कुइस वेलेस्ली (भारत के गवर्नर जनरल (1798-1805)) को समर्पित किया गया था।

मौलाना खैर-उद-दीन मुहम्मद ने पुस्तक को तीन अध्यायों में विभाजित किया है, जिसमें हर शासन काल की अवधि के प्रसिद्ध पुरुषों और पुरोहितों का उल्लेख किया है। जिसकी सूची निम्नलिखित है:

1. सुल्तान फ़िरोज़ शाह का शासन काल (1351-88): मौलाना अला-उद-दीन

2. सुल्तान-उश-शर्क ख्वाजा जहान (1394-99): मौलाना सरफ-उद-दीन लाहोरी

3. सुल्तान इब्राहिम शर्की (1400-1440):
* काज़ी शहाब-उद-दीन दौलताबाद
* काज़ी अब्द-उल-मुक़्तदिर
* काज़ी नासिर-उद-दीन गुंबुडी
* शेख अबुल फाथ
* दिल्ली के शेख ईसा

4. सुल्तान महमूद शर्की (1440-56) और सुल्तान हुसैन शर्की (1456-1500):
* मुहम्मद बिन ईसा
* बहा-उद-दीन जौनपुरी
* मौलाना इलहा डैड

5. सुल्तान बहलूल लोधी (1450-88) और सिकंदर लोधी (1488-1516): मौलाना सफी

6. सम्राट बाबर (1526-1530): काज़ी अब्द-उल-जबर

7. सम्राट हुमायूं (1530-56):
* शेख कबीर
* मौलाना शाह अज़ीज उल्लाह बिन शाह नियमुल्लाह
* मौलाना गजाली मशहादी

8. सम्राट अकबर (1556-1605):
* शेख मुल्तक्कि
* शेख अली मुल्तक्कि
* मीर हाजी सदर
* मीर यूसुफ मशहादी

9. सम्राट जहांगीर (1605-27):
* मुल्ला फर्राही
* मुल्ला मोहम्मद अफजल जौनपुरी

10. सम्राट शाहजहां (1627-58):
* मुल्ला महमूद जौनपुरी
* शेख अब्द-उर-रशीद

11. सम्राट औरंगज़ेब या आलमगीर (1658-1707): शेख मुहम्मद मह

12. सम्राट मुहम्मद शाह (1719-1748):
* शेख गुलाम घौस
* मुल्ला मोहम्मद अली
* काज़ी मुताइद खान
* मौलाना मुहम्मद 'अस्कारी

संदर्भ:
1. https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.334064/page/n7

http://prarang.in/Jaunpur_District/1810161955





कोका कोला की सफलता में था द्वितीय विश्वयुद्ध का विशेष योगदान

Jaunpur District
15-10-2018 02:54 PM

सबसे पुरानी कोल्ड्रिंक्स (Cold Drinks) में कोका कोला (Coca Cola) का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। ‘ठंडा मतलब कोका कोला’ जैसी शानदार टैगलाईन (Tagline) वाली कोका कोला के बारे में शायद आपको यह न पता हो कि एक समय ऐसा था जब कोका कोला को दवाई की तरह बेचा जाता था। लेकिन बदलते दौर में कोका कोला दुनिया का सबसे बड़ा ब्रांड बन गया है। इसका आविष्कार 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जॉन पेम्बर्टन नामक अमेरिकी फार्मासिस्ट (Pharmacist) द्वारा एक दवा के रूप में किया गया था।

अमेरिकी सिविल युद्ध के अंत में पेम्बर्टन ने फैसला किया कि ऐसा कुछ खोजा जाए जो उन्हें व्यवसायिक सफलता प्रदान करे। और इस प्रकार जन्म हुआ कोका-कोला का। मूलरूप कोका-कोला का नुस्खा पेम्बर्टन के ईगल ड्रग एंड केमिकल हाउस (Eagle Drug and Chemical House) में बनाया गया था। कोक ने अपने पहले साल में इतना लाभ नहीं कमाया। इसके बाद अगस्त 1888 में पेम्बर्टन की मृत्यु हो गई। वे कभी भी व्यवसायिक सफलता को नहीं देख पाए।

पेम्बर्टन की मृत्यु के बाद, 1891 में कोका-कोला व्यवसायी आसा ग्रिग्स कैंडलर द्वारा खरीदा गया था। उस समय कोका-कोला को पेटेंट दवा (कोका-कोला सिरप) के रूप में बेचा जाता था। वह दावा करते थे कि यह थकान और सिरदर्द से छुटकारा दिलाता है। 1898 में, स्पेनिश-अमेरिकी युद्ध के चलते कांग्रेस ने सभी दवाईयों पर कर पारित किया। इसलिये कोका-कोला केवल पेय के रूप में बेचा गया। अदालत की लड़ाई के बाद, कोका-कोला का दवा के रूप में बेचा जाना बंद हो गया।

द्वितीय विश्वयुद्ध से पूर्व के वर्षों में जर्मनी और बाकी यूरोप में कोका-कोला का व्यवसाय तेजी से बढ़ रहा था। 1933-39 के बीच नाज़ी जर्मनी में बेची गयी कोक की संख्या प्रति वर्ष लगभग 1,00,000 से बढ़कर 45 लाख हो गई थी, और इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए यहां 50 कारखानों का निर्माण किया गया। ब्रांड इतना लोकप्रिय था कि यह बर्लिन में 1936 के ओलंपिक, जिसे व्यापक रूप से हिटलर के लिए प्रचार के रूप में देखा गया था, के आधिकारिक प्रायोजकों में से एक बन गया।

परंतु 1939 में युद्ध के बाद नाज़ियों द्वारा आयात पर विभिन्न प्रतिबंधों के कारण जर्मन कारखानों तक कोका कोला बनाने का सिरप पहुँच पाना मुश्किल हो रहा था। इस वजह से, युद्ध के दौरान जर्मनी में कोक का उत्पादन बंद हो गया। हालांकि जर्मनी में कंपनी के प्रमुख मैक्स कीथ ने पूरी तरह से हार नहीं मानी थी, इसलिए उन्होंने जर्मनी में आसानी से उपलब्ध सामग्रियों को मिला दिया। इस प्रकार फलों (नारंगी, सतंरा आदि) के द्वारा नाज़ी जर्मनी में फैंटा का अविष्कार हुआ, और 1955 में फैंटा का उत्पादन और बिक्री शुरू हुई। जिसका स्वामित्व हमेशा से कोका-कोला के पास रहा है। जो कि वास्तव में जर्मनी में बनाया गया था।

कोका कोला पिछले कई दशकों से भारत के सबसे मशहूर कोल्ड्रिंक्स में शुमार है। भारत में इसका प्रवेश प्योर ड्रिंक्स लिमिटेड द्वारा पहले बोटलिंग संयंत्र के उद्घाटन के साथ 1950 में नई दिल्ली में हुआ था। 1977 में भारत के विदेशी मुद्रा अधिनियम के लागू होने के कारण कंपनी को देश से बाहर जाना पड़ा था परंतु 1992 के अंत में, भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेश के प्रारम्भ के बाद कोका-कोला भारत लौट आया। अब ये ब्रांड आज घर-घर में अपनी पहचान बना चुका है।

संदर्भ:
1.http://iml.jou.ufl.edu/projects/spring08/Cantwell/invention.html
2.https://www.thelocal.de/20170523/fanta-how-the-nazi-era-drink-became-the-world-famous-brand
3.https://en.wikipedia.org/wiki/Coca-Cola
4.https://www.coca-colaindia.com/stories/faq-history

http://prarang.in/Jaunpur_District/1810151953





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