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क्या हो सकती है कम बजट में एक आलीशान शादी?

Jaunpur District
13-08-2018 05:40 PM

भारत में गुज़रते हुए वक्‍त के साथ शादियों का आयोजन भव्य और शाही होता जा रहा है। यह कहना ज्यादा सही होगा कि पारंपरिक शादियाँ अब महेंगे आयोजनों में बदलती जा रही हैं, जहाँ शादी का निमंत्रण पत्र छापने से लेकर तमाम इंतज़ाम की जिम्मेदारी ज्यादातर वधू पक्ष पर होती है। दहेज प्रथा जैसी तमाम बुराइयों के बावजूद भी देश में ‘बिग फैट इंडियन वेडिंग’ (Big Fat Indian Wedding) अर्थात आलीशान भारतीय शादी का चलन लगातार बढ़ता जा रहा है। इसकी वजह यह है कि शादियाँ अब महज एक सामाजिक रस्म ही नहीं, वरन् व्यक्ति विशेष के सामाजिक और आर्थिक रुतबे का प्रतीक भी बन गई हैं।

भारत में होने वाली शादियों के खर्चे कुछ कारकों पर भी निर्भर करते हैं। इनमें से कुछ कारक हैं- परिवार की आर्थिक स्थिति, शादी का शहर, दुल्हन की शिक्षा का स्तर, दुल्हन की उम्र आदि। इसके अलावा एक धारणा भारतीय समाज में पहले से रही है कि लड़की वाले शादी में ज़्यादा खर्चा करते हैं। तो यदि घर की बेटी की शादी है तो खर्चा ज़्यादा और वहीं यदि उसी घर के लड़के की शादी है तो खर्चा कम। भारत में शादियों पर सबसे अधिक खर्चा करने वाला राज्य केरल है।

बिग फैट इंडियन वेडिंग के इस दौर में आज हमें ज़रुरत है भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री के सादा जीवन उच्च विचार की अवधारणा पर अमल करने की। शादियाँ कम खर्च में भी की जा सकती हैं, इससे समय और पैसे दोनों की ही बचत होती है। कम खर्च की शादी का मतलब ये नहीं कि आप सबकुछ त्याग दें, बल्कि जो चीज़ें शादी में जरूरी नहीं होती या केवल दिखावे के लिए होती हैं, उन्हे हटा दिजिए और केवल प्रमुख चीज़ों पर ध्यान दें। इस प्रकार केवल थोड़ी सी सही प्लानिंग (Planning) करके और शुरुआत में अपने बजट पर महत्वपूर्ण निर्णय लेकर आप शादी को कम खर्च में यादगार बना सकते हैं। ज़रा सोचिए, अगर आपकी शादी वाकई बिना फिज़ूल खर्चों, बैंड-बाजों के शोर-शराबे और कम मेहमानों के साथ यादगार बन जाये तो?

चलिए अब जानते हैं कुछ उपाए, जिनके ज़रिये आप अपने बजट में रहकर शानदार शादी कर सकते हैं। यदि आप शादी समारोह शहर के भीतर बड़े होटलों की बजाय, खुले स्‍थानों में करते हैं, तो आप काफी खर्च बचा सकते हैं। वेडिंग प्लानर्स भी ऑफ सीज़न के दौरान शादी करने की सलाह देते हैं, चूंकि होटल तथा केटरर्स (Caterers) इस समय के दौरान भारी छूट प्रदान करते हैं। विवाह में अंतर्राष्ट्रीय भोजन की बजाय देसी व्यंजन का चयन करें तथा लम्बी लिस्ट ‘मेनू’ (Menu) में ना रखें। शादी के जोड़े खरीदें नहीं, सिलवाएं, इससे काम काफी सस्ते यानी आधे पैसों में ही हो जाएगा। आप चाहें तो शादी वाले कपड़े और गहने किराए पर ला सकते हैं। ऑनलाइन कार्ड या ई-आमंत्रण से ही गेस्ट्स को इन्वाइट करें, इससे आप प्रिंटिंग और शादी के कार्ड भेजने के खर्चों पर बचत कर सकते हैं। फोटोग्राफर और डी.जे. का चयन समझदारी से करें तथा शादी पर केवल खास और जरूरी मेहमानों को बुलाएं।

बचत का सबसे आसान तरीका है, एक सही योजना और सीमित बजट के साथ अपनी शादी को पूरा करने का प्रयास करना, साथ ही अनावश्‍यक खर्चों से बचना।

संदर्भ:
1.https://www.huffingtonpost.in/2017/02/17/the-big-fat-indian-wedding-is-not-the-norm-but-the-unaffordable_a_21716010/
2.https://www.quora.com/How-much-does-a-typical-Indian-wedding-cost
3.https://economictimes.indiatimes.com/wealth/spend/7-smart-ways-to-cut-down-your-wedding-costs/articleshow/57704448.cms


क्या हवाई अड्डे से सुधरती है स्‍थानीय लोगों की आर्थिक स्‍थ‍िति?

Jaunpur District
12-08-2018 10:55 AM

हाल के वर्षों में हवाई अड्डे कई भारतीय शहरों और आसपास के इलाकों के लिये आर्थिक विकास में फायदेमंद साबित हो रहे हैं। अमेरिका के ब्रूस ब्लोनिगेन और एन्का क्रिस्टिया ने पाया कि हवाई यातायात में 50 प्रतिशत की वृद्धि के चलते 20 वर्षों में एक क्षेत्र के वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद में 7.5 प्रतिशत की वृद्धि होती है। वे यह भी बताते हैं कि यह वृद्धि विशेष रूप से सर्विस (Service) और खुदरा क्षेत्रों में होती है। यह माना जाता है कि क्षेत्रीय आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने में विमानन क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। वायु परिवहन सेवाएं किसी भी प्रकार की आपूर्ति में शीघ्र पहुँच द्वारा व्यवसाय संचालन में सुधार करती हैं, व्यापारियों को ग्राहकों और आपूर्तिकर्ताओं तक आसानी से पहुंचाती हैं, और कई उद्योगों के लिए एक आवश्यक सेवा का प्रतिनिधित्व करती है।

इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण है जौनपुर से 1 घंटे दूर जौनपुर-वाराणसी रोड पर स्थित वाराणसी हवाईअड्डा। वैश्विक आंकड़े के अनुसार, इस हवाई अड्डे के निर्माण से इसके आसपास के क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है। इस हवाई अड्डे से वर्ष 2016-17 में 15 लाख से अधिक यात्री अपनी मंजिल तक पहुंचे हैं। इसके बाद केंद्र सरकार द्वारा जनवरी में इसे एक प्रमुख हवाई अड्डे के रूप में पहचान भी मिली।

वाराणसी हवाईअड्डा देश में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले हवाई अड्डों में से एक रहा है और आगे बढ़ रहा है। उद्योग विश्लेषकों का कहना है कि इस हवाईअड्डे की यात्री वृद्धि लखनऊ और पटना जैसे हवाई अड्डों की तुलना में काफी अधिक है और यह व्यापार और पर्यटन दोनों के लिए एक वास्तविक केंद्र बन गया है। पर्यटन मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि शहर की पर्यटन क्षमता में वृद्धि शहर के विकास हेतु एक बड़ी योजना है।

संक्षेप में कहा जाए तो हवाईअड्डे की मात्र उपस्थिति सीधे-सीधे रूप से प्रभावित क्षेत्रों में दीर्घकालिक आर्थिक विकास नहीं करती है। परंतु हवाईअड्डे की मौजूदा क्षमताओं में वृद्धि करके और विमानन क्षेत्र में यातायात की वृद्धि से यातायात को सरल बनाकर क्षेत्रीय आर्थिक विकास पर सकारात्मक दीर्घकालिक प्रभाव हो सकता है।

संदर्भ:
1.https://economictimes.indiatimes.com/industry/transportation/airlines-/-aviation/varanasi-airport-gets-major-tag-after-handling-more-than-1-5-million-in-2016-17/articleshow/58269929.cms
2.https://economictimes.indiatimes.com/industry/transportation/airlines-/-aviation/aai-plans-national-strategy-for-airports-development/articleshow/62494990.cms
3.https://www.deccanherald.com/business/developing-airports-real-681361.html
4.http://eprints.lse.ac.uk/61959/1/blogs.lse.ac.uk-New%20evidence%20suggests%20that%20air%20services%20do%20boost%20regional%20economic%20growth.pdf
5.http://www.airneth.nl/news/details/article/how-do-airports-contribute-to-economic-growth/


क्या जौनपुर से हुई थी ख़याल गायकी की शुरुआत?

Jaunpur District
11-08-2018 11:17 PM

संगीत हम सभी को आकर्षित करता है। कहा जाता है कि संगीत में माँ सरस्वती का वास होता है। शायद ही कोई व्यक्ति होगा, जिसे संगीत पसंद न हो। प्राचीन काल में सम्पूर्ण भारत में संगीत की केवल एक पद्धति थी परंतु आज हम देखते हैं कि संगीत की दो पद्धतियां हैं। माना जाता है कि उत्तरी संगीत (हिन्‍दुस्‍तानी संगीत) पर अरब और फ़ारसी संगीत का प्रभाव पड़ा जिससे उत्तरी संगीत, दक्षिणी (कर्नाटक संगीत) संगीत से अलग हो गया।

उत्तरी संगीत या भारतीय शास्त्रीय संगीत में 7 मुख्य संरचना शैलियां हैं: ख़याल, ध्रुपद, धमार, ठुमरी, तराना, टप्पा, दादरा। कहा जाता है कि भारत में प्राचीन काल से ही ध्रुपद सबसे महान और सबसे श्रेष्ठ शैली थी, परंतु इस्लाम के विकास के दौरान भारत में संस्कृति और सभ्यता के साथ-साथ संगीत में भी परिवर्तन आये। इसी कारण 13वीं शताब्दी में ख़याल गायन शैली का जन्म हुआ। वस्तुत: यह ध्रुपद का ही एक प्रकार है। अंतर केवल इतना ही है कि ध्रुपद वास्तविक भारतीय शैली है। ख़याल में भारतीय और फारसी संगीत का मिश्रण है।

इसका आरंभ कब हुआ यह निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में अमीर खुसरो (महान फारसी संगीतकार) ने ख़याल गायकी का परिशोधन किया। लेकिन इस कहानी का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। कुछ लोग मानते हैं कि ख़याल गायकी 14वीं शताब्दी में जौनपुर के सुल्तान मुहम्मद शारक्वी (जो भारत के पहले मुगल शासक बाबर के समकालीन थे) के कोर्ट में विक्सित हुआ। किंतु उनके समय में इस गायकी का उतना स्पष्ट रूप नहीं था। 17वीं शताब्दी में मुगल सम्राट मुहम्मद शाह ‘रंगीले’ के समय, यह गायकी पुन: अस्तित्व में आयी। उनके ज़माने में नियामत खान (सदारंग) और फिरोज़ खान (अदारंग) नामक दो संगीतकार थे। इन संगीतकारों ने हजारों की संख्या में ख़याल की रचना की और अपने शिष्यों में उनका प्रसार किया।

चूंकि ख़याल पूरे भारत के दरबारों में विकसित हुआ, इसलिये इसकी अलग-अलग शैलीयां अलग-अलग घरानों में उभरीं। रियासतों के नाम पर तीन प्रमुख ख़याल घरानों (ग्वालियर, रामपुर और पटियाला) को मूल रूप से बढ़ावा दिया गया था। बाद में आगरा, किराना और जयपुर घराना ख़याल गायन के प्रमुख केंद्र बने। ख़याल में गायक की कल्पना का भी समावेश होता है। ख़याल दो प्रकार के होते हैं। पहला प्रकार है बड़ा ख़याल जो विलंबित लय और तिलवाड़ा, झुमरा तथा एक ताल में गाया जाता है तथा इसको गाने की गति धीमी होती है। दूसरा है छोटा ख़याल जो चपल चाल से त्रिताल, तथा एक ताल में गाया जाता है और साथ ही इसे गाने की गति भी तेज़ होती है।

अपने अधिकांश अस्तित्व में ख़याल हमेशा कुलीन संरक्षकों का संगीत रहा है। केवल 20वीं शताब्दी में अन्य समूहों ने ख़याल में महत्वपूर्ण भागीदारी प्राप्त की है। आज ख़याल, शास्त्रीय संगीत के सबसे जीवंत और विविधता से भरे रूपों में से एक है।

संदर्भ:
1.https://www.indianetzone.com/35/origin_development_khayal_indian_music.htm
2.अंग्रेज़ी पुस्तक: Bagchee, Sandeep. 2015. Nad: Understanding Raga Music, S.Chand (G/L) & Company Ltd
3.https://www.shivpreetsingh.com/2011/02/15/khayal-an-imagination-in-indian-classical-music/


पढ़िए जौनपुर को समर्पित ये 5 अनूठे लेख

Jaunpur District
10-08-2018 01:58 PM

कहते हैं कि कई बार सफ़र मंज़िल से भी कहीं ज़्यादा खूबसूरत होता है। प्रारंग का यह सफ़र भी कुछ ऐसा ही है जो अपने पाठकों के प्रोत्साहन के साथ चलता जा रहा है और दिन प्रतिदिन और भी मनोरंजक होता जा रहा है। हर दिन हमारे इस प्रारंग परिवार में कुछ नए सदस्य जुड़ते जा रहे हैं। तो आज हम कुछ समय निकालेंगे 2018 के अब तक के सफ़र की समीक्षा करने में।

आज की तारीख है 10 अगस्त 2018 तथा आज इस वर्ष का 222वां दिन है। इन 222 दिनों में प्रारंग अपने परिवार के जौनपुरवासियों तक 208 लेख पहुंचा चुका है तथा यह लेख 209वां लेख होगा। यदि देखा जाये तो लगभग हर दिन प्रारंग ने जौनपुर को समर्पित एक लेख आप तक पहुँचाया है। प्रारंग के अनूठे वर्गीकरण में यदि इन लेखों को देखा जाए तो संस्कृति से जुड़े 152 लेख तथा प्रकृति से जुड़े 56 लेख अब तक इस वर्ष में प्रस्तुत किये गए हैं। और यदि संस्कृति और प्रकृति के भीतर वर्गीकरण की बात करें तो लेखों का वितरण कुछ इस प्रकार है:

प्रकृति:
• समयसीमा- 19
• मानव व उसकी इन्द्रियाँ- 71
• मानव व उसके आविष्कार- 62

संस्कृति:
• भूगोल- 20
• जीव-जंतु- 14
• वनस्पति- 22

इन लेखों को प्रारंग के जौनपुर पोर्टल (http://jaunpur.prarang.in/), फेसबुक (https://www.facebook.com/prarang.in/), ट्विटर (https://twitter.com/prarang_in?lang=en) तथा प्रारंग की एंड्राइड मोबाइल एप्लीकेशन (https://play.google.com/store/apps/details?id=com.riversanskiriti.prarang&hl=en_IN) द्वारा आप तक पहुँचाया गया। इनमें से जौनपुरवासियों की सबसे अधिक प्रतिक्रिया फेसबुक पर देखने को मिली।

यदि बात करें फेसबुक लाइक्स (Facebook Likes) की तो वर्ष 2018 में जौनपुर के लेखों को करीब 10,000 बार लाइक किया गया तथा उनपर कमेंट (Comment) के रूप में पाठकों द्वारा 81 बार टिप्पणी की गयी। आज प्रारंग के साथ फेसबुक पर करीब 43,000+ पाठक जुड़े हुए हैं जिनमें से 10,000+ पाठक जौनपुर से हैं। साथ ही प्रारंग की एंड्राइड मोबाइल एप्लीकेशन के 1000 से भी अधिक डाउनलोड (Download) हो चुके हैं जिनमें से जौनपुर से करीब 300 डाउनलोड हैं।

प्रारंग द्वारा प्रकाशित किये गए प्रस्तुत 5 लेख जौनपुरवासियों में सबसे अधिक लोकप्रिय रहे। प्रत्येक लेख के ऊपर क्लिक कर आप उसे पढ़ सकते हैं:

1. जौनपुर में चुभती जलती गर्मी
2. 
रविवार कविता: वामिक़ जौनपुरी
3. कहाँ से आया जौनपुर की इमारतों का पत्थर?
4. 
मंदिर-नगर और स्थलवृक्ष का सम्बन्ध
5. 
विकास के लिए रोकना होगा जौनपुर में अपराध

साथ ही हम आप सभी से आग्रह करना चाहेंगे कि हर लेख पर कमेंट और लाइक के रूप में अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर ज़ाहिर करें। अंत में प्रारंग अपने सभी जौनपुर के पाठकों को हमारे साथ बने रहने के लिए धन्यवाद कहना चाहेगा क्योंकि यह आप लोगों का निरंतर प्रोत्साहन ही है जो हमें हर दिन बेहतर से बेहतर कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।


आज तक झेल रहे हैं परमाणु बम के दुष्प्रभाव

Jaunpur District
09-08-2018 04:40 PM

आज से लगभग 73 वर्ष पहले 6 अगस्त और 9 अगस्त को द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमरीका द्वारा जापान के दो शहरों हिरोशिमा (दुनिया का पहला शहर जहाँ परमाणु बम गिराया गया था) और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम की घटना मानवता को शर्मसार कर देने वाली घटना थी। हिरोशिमा पर जो परमाणु बम गिराया गया था उसका नाम ‘लिटिल बॉय’ (Little Boy) था, और नागासाकी पर गिराये गये परमाणु बम का नाम ‘फ़ैट मैन’ (Fat Man) था। इस त्रासदी ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। इस हमले में एक झटके में हज़ारों लोगों की मौत हो गई। दोनों शहर निर्जन हो चुके थे। हर तरफ सन्नाटा और लोगों की लाशें ही लाशें बिछी पड़ी थीं। इतना ही नहीं इस हमले के घातक प्रभाव के कारण लाखों लोग हमेशा के लिए अपाहिज हो गए। इन दोनों शहरों में आज भी उस परमाणु बम के रेडिएशन (Radiation) के कारण कई बच्चे अपाहिज पैदा होते हैं और वहाँ की वनस्पतियों तक में रेडिएशन का असर अब भी नज़र आता है।

यदि हम इसके दुष्‍प्रभावों को थोड़ी गहनता से देखें तो शब्‍दों में उसका वर्णण भी नहीं किया जा सकता है। फिर भी हम इसके कुछ कुप्रभाव के विषय में आपको बताना चाहेंगे। परमाणु बम विस्‍फोट के पश्‍चात जो लोग शेष बचे वे ल्‍यूकेमिया (Leukemia: एक प्रकार का कैंसर) के प्रभाव में आ गये तथा इसके कई वर्षों बाद तक जिनका जन्‍म हुआ वे विभिन्‍न शारीरिक कैंसर, अंधता, बौद्ध‍िक अल्‍पता, द्विमेरुता (Spina Bifida: एक तरह की बीमारी जिसमें नवजात शिशु की रीढ़ की हड्डी पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाती है), विकिरण के कारण बाल झड़ना आदि जैसी भयावह बीमारियों के साथ पैदा हुए।

जापान इस महाकाय त्रासदी से उबर तो गया परंतु आज भी यहाँ के लोग इस त्रासदी के पीड़ितों के लिए एक स्मारक ‘सदाको सासाकी’ (हिरोशिमा में परमाणु बम विस्फोट से पीड़ित लड़की) पर सेनबाज़ुरू (Senbazuru: कागज़ की बनाई 1000 सारस) की हज़ारों पुष्पांजलि अर्जित करते हैं। शान्ति की प्रतीक यह इमारत लोगों के मन में इस अमानवीय घटना के लिए एक शोक प्रकट कराती है तथा साथ ही इन्‍हें हिंसा के विरोध और शान्ति के समर्थन हेतु प्रेरित करती है।

संदर्भ:
1.http://zazenlife.com/2011/12/29/the-after-effects-of-the-atomic-bombs-on-hiroshima-nagasaki/
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Atomic_bombings_of_Hiroshima_and_Nagasaki
3.https://blog.nationalgeographic.org/2015/08/28/how-paper-cranes-became-a-symbol-of-healing-in-japan/


जौनपुर में सिंगापुर से आर्थिक लाभ

Jaunpur District
08-08-2018 02:21 PM

सिंगापुर का प्रतिव्यत्ति सकल घरेलू उत्पाद (GDP per capita) 2017 में अमेरिकी डॉलर (US $) 55235.51 थी, 2014 के 52244.4 से बढ़कर। उत्तर प्रदेश का प्रतिव्यत्ति सकल घरेलू उत्पाद 2015 में यू. एस. डॉलर 792.93 था। जौनपुर जिले की 2014 की जनसँख्या का यदि अनुमान लगाया जाये तो वह 4,699,491 होती है, यहां तब सकल घरेलू उत्पाद था 11,38,807 लाख रूपए, और प्रतिव्यत्ति सकल घरेलू उत्पाद फिर बनेगा यू. एस. डॉलर 807.75।

रूपया अभी कमज़ोर दर पर है; एक यु एस डॉलर के हिसाब से 68.62 और एक सिंगापुर डॉलर के हिसाब से 50.37। ऐसे में जौनपुर के लिए बहुत लाभदायक है कि कोई ऐसे देशों से अभी पैसे घर भेजे।

भला किसने सोचा होगा कि जौनपुर के गांव में किसानों के परिवार में जन्म लेने वाले मुश्ताक़ एक दिन सिंगापुर में व्यवसाय के क्षेत्र मे आसमान की बुलंदीयों को छुएंगे। अपने पिता हाजी मोहम्मद मुस्तफा के साथ वे 1956 में पांच वर्ष की उम्र में सिंगापुर गए। उन्होंने शुरुआत अपने पिता के बगल में एक रूमाल बेचने की स्टॉल से की, और धीरे-धीरे उनकी कड़ी मेहनत और लगन से उनका पारिवारिक व्यवसाय लाखों डॉलर के कारोबार में बदल गया, अप्रैल 1995 में उन्होंने सैयद अलवी रोड पर अपना मुस्तफा शॉपिंग सेंटर खोला।

आज मुश्ताक़ अहमद “मुस्तफा सेंटर” के सह-संस्थापक और प्रबंध निदेशक हैं। 2004 में, मुश्ताक़ को सिंगापुर पर्यटन बोर्ड द्वारा वर्ष 2003 के पर्यटन उद्यमी के रूप में नामांकित किया गया था। 2011 में, मुश्ताक़ अहमद को फोर्ब्स एशिया (Forbes Asia) द्वारा 240 मिलियन अमेरिकी डॉलर के अनुमानित कुल मूल्य के साथ सिंगापुर के 40 सबसे अमीर लोगों में से 37वां स्थान प्राप्‍त हुआ।

मुश्ताक़ की उपलब्धियों ने उन्हें एक सफल आप्रवासी कारोबारी के रूप में एक आदर्श बना दिया, जिसने सिंगापुर की आर्थिक सफलता में भी योगदान दिया है। सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली सियन लूंग ने 2006 के अपने राष्ट्रीय दिवस रैली भाषण में कहा,"हमे यहां बेहतरीन अप्रवासी कारोबारी मिले हैं, जैसे कि श्री मुश्ताक़ जिन्होने सिंगापुरियों के लिए हजारों नौकरियां प्रदान की हैं"। इस व्यवसाय के मौद्रिक लाभ से उनके गांव, जो आज मुस्तफाबाद कहलाता है, में बहुत उन्नती आई है- इसकी मात्रा ऊपर आंकड़ों से ही स्पष्ट होती है।

संदर्भ:
1.चित्र: from Wikimedia Commons
1.https://www.firstpost.com/living/mustafa-centre-how-india-dug-its-feet-into-singapore-506437.html
2.http://eresources.nlb.gov.sg/infopedia/articles/SIP_1164_2009-03-10.html
3.https://www.todayonline.com/business/founder-employees-stoic-about-closure-mustafas-serangoon-plaza-branch
4.https://tradingeconomics.com/singapore/gdp-per-capita
5.https://www.datanetindia-ebooks.com/pdf_Samples/district_factbook/Uttar_Pradesh/Jaunpur.pdf
6.https://statisticstimes.com/economy/comparing-indian-states-and-countries-by-gdp-capita.php


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