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कौनसे वन गए थे श्री राम वनवास पर?

Jaunpur District
18-06-2018 10:50 AM

जब तक इस धरती पर पर्वत और नदियां मौजूद हैं, तब तक रामायण का इतिहास प्रबल और लोगों के बीच फैला रहेगा। संत वाल्मीकि ने दिव्य प्रेरणा के माध्यम से 24,000 दोहों में रामायण की गाथा गाई, जो पूरी दूनिया में आदि-काव्य के नाम से प्रसिद्ध है।

अयोध्या, सरयू या घाघरा नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है, जहां श्री राम का जन्म हुआ था। लेकिन अब यह लखनउ-वाराणसी रेल मार्ग पर स्थित है। माता कैकेयी की मांगों पर जब श्री राम ने जंगल में जाने का फैसला किया, तब सारथी सुमंत द्वारा श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण को रथ से गंगा नदी के किनारे तक छोड़ा गया।

जहां से श्री राम ने गंगा नदी से तमसा नदी ताल क्षेत्र तक की यात्रा तय की, जो अयोध्या से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। गोमती नदी पार करने के बाद श्री राम श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो इलाहाबाद से 20 किलोमीटर की दूरी पर निशादराज गुह राज्य में स्थित है। यह स्थल ‘केवट प्रसंग’ के नाम से भी जाना जाता है। पुराने कथन अनुसार, केवट नाम के एक नाविक ने उन्हें नाव पर बैठाने से इंकार कर दिया था। उसका कहना था कि जिनके पैरों की धूल, एक पत्थर को महिला में बदल सकती है, वो श्रीराम क्या कुछ नहीं कर सकते हैं।

गंगा नदी को पार करने के बाद वो पैदल ही गंगा, यमुना और सरस्वती के पवित्र संगम स्थल प्रयाग में पहुंचे, जिसे त्रिवणी संगम भी कहा जाता है। वहां वो ऋषि भारद्वाज के आश्रम पहुंचे, जिन्होंने उनको प्रयाग से चित्रकूट की पहाड़ियों के पास जगह खोजने की सलाह दी।

प्रयाग यात्रा के बाद, वे चित्रकूट पहुंचे जहां वाल्मीकि आश्रम, माण्डवया आश्रम और भारत कूप जैसे स्मारक आज भी मौजूद हैं। वहां पर श्री लक्ष्मण ने नदी के तट पर रहने के लिए एक साधारण-सी कुटिया बनायी। फिर चित्रकूट से श्रीराम, अत्री आश्रम पहुंचे। तत्पश्चात् वे मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों को पार करके दंडक अरण्य में पहुंचे, जहां वो शारबांग और सुतीशन मुनी आश्रम में पहुंचे। दंडक अरण्य एक विशाल क्षेत्र है, जिसने विन्ध्य पर्वत श्रेणी का दक्षिण का क्षेत्र घेरा हुआ है।

उन्होंने जंगल में चारों ओर घूमना शुरू किया और ऋषि अ़त्री के आश्रम का दौरा किया और उनसे अपने लिए आशीर्वाद मांगा। ऋषि अत्री की पत्नी अनुसूया ने उपहार स्वरूप सीता को सुन्दर आभूषण भेंट किये। ये वही गहनों का संग्रह था जिनका उपयोग सीता माता ने किश्किंडा के रास्ते में किया था, जब रावण उन्हें अपने पुष्पकयान से लंका ले जा रहा था।

श्रीराम और लक्ष्मण ने अपने वनवास काल के दौरान नर्मदा और महानदी के साथ-साथ और कई आश्रमों का भी दौरा किया और अंत में सुतीक्षा आश्रम लौट आए। पउना, रायपुर, बस्तर और जगदलपुर में मंडवया आश्रम, श्रिंगी आश्रम, राम-लक्ष्मण मंदिर और इससे आगे के कई स्मारकों के अवशेष आज भी यहां संजोए हुये हैं।

आखिरकार, वे अगस्त्य मुनि आश्रम पहुंचे, जो नासिक में है। वहां पर उन्हें अगस्त्य मुनि द्वारा अग्निशाला से बने हथियार भेंट किये गये। अगस्त्य मुनि आश्रम से वे पंचवटी पहुंचे, जहां पर वे गोदावरी नदी के तट पर कुटिया बनाकर रहने लगे। उसी जगह पर रावण की बहन सूर्पखा भी छिपी हुई थी। मायावी हिरण के छलावे से रावण, सीता माता को श्रीराम से दूर लंका ले गया।

गोदावरी नदी त्रियमबंकेश्वरम् नामक जगह के पश्चिमी घाटों से निकलती है, जो नासिक में है, किन्तु वर्तमान में इस जगह पर जाना निषेध है। पंचवटी बंगाल की खाड़ी के नज़दीक गोदावरी नदी के तट पर भद्रचलम के पास स्थित है। नासिक क्षेत्र मृगवीदेश्वर, बनेश्वर, सीता-सरोवर और राम-कुण्ड जैसे स्मारकों से भरा है। सरस्वती स्मारक आज भी नासिक से 56 किलोमीटर दूर टेकड गांव में संरक्षित है।

रामायण के इतिहासानुसार, भद्रचलम मंदिर का महत्तव रामायण युग से भी पहले का है। यह पहाड़ी स्थान रामायण काल के ‘दंडकारण्य’ में मौजूद था, जहां भगवान राम ने अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अपना वनवास काल व्यतीत किया था। यह स्थान पाणशाला कहलाता है- जो सुनहरे हिरण और रावण द्वारा माता सीता के अपहरण के लिए प्रसिद्ध है। पाणशाला क्षेत्र, भद्रचलम मंदिर के आस-पास ही है। तुंगभद्रा और कावेरी के पास राम और उनके छोटे भाई लक्ष्मण ने जटायु और काबंध से भेंट की। उसके बाद वे दक्षिण में ऋषिमूक पर्वत की ओर बढ़ गये। रावण द्वारा सीता माता को ले जाने के बाद, श्रीराम और लक्ष्मण जंगल में चारों ओर भटकते रहे और भटकते-भकटते हम्पी क्षेत्र में किश्किन्धा पर्वत श्रेणी की तुंगभद्रा नदी घाटी में जा पहुंचे।

रास्ते में उन्होंने पम्पासरोवर; बेलगांव में सोरवनद्ध क्षेत्र में शबरी आश्रम का दौरा किया, जो आज भी अपने बेर के पेड़ों के लिए प्रसिद्ध है। उसके बाद ऋषिमूक पर्वत पहुंचे, जहां उनकी भेंट हनुमान और सुग्रीव से हुयी। होस्पेट के पास अंजनाधरी नामक एक जगह है, जहां पर हनुमान का जन्म हुआ था। यह खास जगह श्रीराम के निर्वासन से सम्बंधित है, जहां उन्होंने बाली को मारा था। यह हम्पी क्षेत्र अब कर्नाटक में है। सुग्रीव द्वारा प्रदान सुसज्जित सेना के साथ, श्रीराम भारतीय प्रायद्वीप के दक्षिणी छोर पर पहुंचे।

हनुमान द्वारा, लंका में सीता माता का पता लगाने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण भूमि के दक्षिणी सिरे पर पहुंचे। जहां पर उनके द्वारा अपने धनुष से उस जगह को चिन्हित किया गया, इस प्रकार इस जगह को धनुषकोडी नाम मिला। जहां उन्होंने दिव्य राम-सेतु के पुल का निर्माण करके लंका-चढ़ाई अभियान आरम्भ किया। 1964 में एक ज्वारीय लहर द्वारा धनुषकोडी को धोया गया, जो अब समुद्र के नीचे है। लेकिन धनुषकोडी के कुछ अवशेष अभी भी वहां पर मिलते हैं। रामेश्वरम का शिव मंदिर जहां श्रीराम ने भगवान शिव की पूजा की थी, वो जगह हिन्दू तीर्थयात्रियों के लिए सबसे पवित्र तीर्थों में से एक है। यहां पर श्रीराम ने एक शिवलिंग का निर्माण किया और राम-सेतु बनाने से पहले शिव से विजयी होने की प्रार्थना की। तमिल संगम साहित्य में श्रीराम के सभी पराक्रमों का उल्लेख मिलता है।

हजारों सालों से रामायण पूरे भारत में उत्तर से दक्षिण और पश्चिम से पूर्व तक यथार्थ ढंग से नाटकीय, त्यौहारों और समारोहों के रूप में गली, गांव और जनजातीय कलाओं के माध्यम से फैली हुआ है।

संधर्भ
1.https://indiasix.wordpress.com/2016/03/28/14-years-of-vanvas-of-shri-ram-some-details/
2.https://nationalviews.com/lord-rama-vanvas-route-ayodhya-to-lanka
3.http://www.ramayam.ramprasadmaharaj.org/ramayam/14-%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B7-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%82/
4.http://blog.onlineprasad.com/place-lord-ram-11-years-vanvas/


रविवार कविता

Jaunpur District
17-06-2018 11:31 AM

यह कविता श्री 'वामिक़' जौनपुरी जी के द्वारा लिखी हुई है.'वामिक़' जौनपुरी का जन्म सन 1909 में जौनपुर में हुआ.

रात के समंदर में ग़म की नाव चलती है
दिन के गर्म साहिल पर ज़िंदा लाश जलती है

इक खिलौना है गीती तोड़ तोड़ के जिस को
बच्चों की तरह दुनिया रोती है मचलती है

फ़िक्र ओ फ़न की शह-ज़ादी किस बला की है नागिन
शब में ख़ून पीती है दिन में ज़हर उगलती है

ज़िंदगी की हैसियत बूँद जैसे पानी की
नाचती है शोलों पर चश्म-ए-नम में जलती है

भूके पेट की डाइन सोती ही नहीं इक पल
दिन में धूप खाती है शब में पी के चलती है

पत्तियों की ताली पर जाग उठे चमन वाले
और पत्ती पत्ती अब बैठी हाथ मलती है>

घुप अँधेरी राहों पर मशअल-ए-हुसाम-ए-ज़र
है लहू में ऐसी तर बुझती है न जलती है

इंक़िलाब-ए-दौराँ से कुछ तो कहती ही होगी
तेज़ रेलगाड़ी जब पटरियाँ बदलती है

तिश्नगी की तफ़्सीरें मिस्ल-ए-शम्मा हैं ‘वामिक’
जो ज़बान खुलती है उस से लौ निकलती है

संदर्भ

1.https://goo.gl/13jpqu


कैसे घटता और बढ़ता है किसी देश की मुद्रा का मूल्य?

Jaunpur District
16-06-2018 11:00 AM

मज़बूत मुद्रा किसी भी देश की अत्यंत महत्वपूर्ण जरूरत होती है और इसका एक महत्वपूर्ण प्रभाव देश की अर्थ व्यवस्था पर पड़ता है। भारतीय मुद्रा का सफ़र अत्यंत उठा-पटक वाला है। यह कभी मज़बूत स्थिति में रहती है तो कभी कमज़ोर। मुद्रा की स्थिति का माप अमेरिकी डॉलर के आधार पर होता है। 2018 की शुरुआत से ही भारतीय मुद्रा अत्यंत कमजोर स्थिति से गुज़र रही है तथा यह करीब 3% की दर से लुढ़की हुई है। ब्रिक्स (BRICS अर्थात ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) देशों में भारतीय मुद्रा दूसरी सबसे कमज़ोर दशा से जूझ रही है। रूसी रूबल ही एकमात्र ऐसी मुद्रा है जो कि सबसे खस्ताहाल मुद्रा में सबसे ऊपर आती है।

भारतीय मुद्रा के गिरने के कुछ कारण हैं कच्चा तेल, हथियार व अन्य वस्तुओं के दाम आसमान छू जाना जो कि आयात पर आधारित है। इस कारण देश से बाहर जाने वाली पूँजी में वृद्धि हुई। भारत में 2018 में आयात का विस्तार निर्यात से लगभग 2 गुना था। मुद्रा में हुयी गिरावट के कारण निर्यात की दर आयात से कम हो जाती है जिसका प्रभाव सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर पड़ता है। 2019 के वित्तीय वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद का 1.9% भाग निर्यातित हो रहा है। इसका सीधा सम्बन्ध यह है कि भारत अन्य देशों से ज्यादा मात्रा में डॉलर देकर सामान खरीदेगा जिससे रूपया और कमजोर होगा। मुद्रा मजबूत करने में सकल घरेलू उत्पाद और निर्यात का एक अहम योगदान होता है। जितना अधिक घरेलू उद्योगों और देश के अन्दर ही उत्पाद को समर्थन दिया जाता है मुद्रा की दर उतनी ही तेज़ी से बढ़ती है।

कच्चे तेल के कीमतों में होने वाले बढ़ोतरी भी मुद्रा पर एक गहरी छाप छोड़ता है। भारत कच्चे तेल का आयात सबसे ज्यादा करता है। करीब 80 फिसद कच्चा तेल भारत में आयात से ही आता है। भारत में तेल की खपत बहुत ज्यादा है जिस कारण से कच्चे तेल की कीमतों में भी उछाल आ रहा है। कच्चे तेल में प्रत्येक 10 डॉलर की बढ़त से भारत को सकल घरेलू उत्पाद का 0.1% राजकोषीय घाटा उठाना पड़ता है (यह आंकड़ा ग्लोबल ब्रोकिंग फर्म नोमुरा द्वारा दिया गया है)। मुद्रा में आई कमजोरी के कारण कई देशों में हमें ज्यादा भुगतान करना पड़ता है जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर एक महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। जौनपुर में एक बड़ी आबादी बेरोजगार है जिसका सम्बन्ध मुद्रा के कमजोर होने से भी है। मुद्रा में आई मजबूती से नौकरियों की संख्या में बढ़ोतरी होती है तथा व्यापार पर भी इसका असर देखने को मिलता है।

1. https://qz.com/1255215/the-indian-rupee-is-at-a-seven-month-low-here-are-three-reasons-why/


दुनिया भर में ईद के विशेष पकवान

Jaunpur District
15-06-2018 12:28 PM

ईद-उल-फ़ितर दुनियाभर के मुस्लिमों के लिए विशेष तौर पर मनाया जाना वाला त्यौहार है। यह रमज़ान के महीने का अंत है, जो रोज़े (उपवास) का पवित्र महीना है। ईद-उल-फ़ितर का अर्थ है ‘रोज़ा तोड़ने का त्यौहार’। यह शव्वल महीने का पहला दिन होता है। जिसमें चंद्रमा को देखकर ईद की तारीख तय की जाती है। चांद देखने का दिन ‘चांद रात’ के नाम से जाना जाता है। ईद-उल-फ़ितर के दिन की शुरूवात विषेश प्रार्थनाओं के साथ होती है, जो अल्लाह की दुआ और दया लाता है। आमतौर पर नमाज़ एक बड़े कमरे या खुले मैदान में होती है।

उत्साह हवा में है, चांद रात का जोर है- ईद की खरीददारी से बाज़ार भरा पड़ा है। इस अवसर पर सभी महिलाएं और युवा लड़कियां अपने हाथों में मेहंदी लगाती हैं और रंगीन चूड़ियां पहनती हैं। ईद-उल-फ़ितर तीन दिन तक मनाया जाने वाला त्यौहार है, जो ‘मिठाई ईद’ या ‘मीठी ईद’ के नाम से जाना जाता है।

भारत, पाकिस्तान, ईरान, इंडोनेशिया, मलेशिया, ब्रुनेई और बांग्लादेश में ईद का जश्न मनाने के लिए पारंपरिक व्यंजन हैं। इस मुबारक (शुभ) मौके पर मिठाईयों और मीठे खाद्य पदार्थ का एक अहम स्थान होता है और वे नाश्ते के मुख्य आर्कषण होते हैं। शीर खुर्मा या लच्छा सेवैय्याँ, जो दूध में भुना एक स्वादिष्ट पकवान है जिसमें सूखे फलों को मिलाया जाता है और यह पकवान ईद के दिन विशेष महत्त्व रखता है। इस दिन परिवार और मित्रगण एक-दूसरे के साथ सुसम्पन्न और उत्कृष्ट रूप से तैयार भोजन का आनन्द लेने के लिए एक साथ आते हैं।

क्षेत्र के आधार पर, व्यंजनों के प्रकार और रूप भी अलग-अलग होते हैं, लेकिन इस मौके पर हमेशा मीठे व्यंजन ही बनाये जाते हैं। दक्षिण एशिया में, चम-चम, बर्फी, गुलाब जामुन, केक के अलग-अलग किस्में, और रस मलाई काफी लोकप्रिय हैं। इन्हें न केवल घरों में खाया जाता है, बल्कि रिश्तेदारों और दोस्तों को ईद की बधाईयां देने के साथ-साथ उनके घरों में भी बांटा जाता है। बकलावा और पेस्ट्री की तरह बनी अन्य प्रकार की मिठाईयां तुर्की में खायी जाती हैं। केतुपत नामक एक मिठाई आमतौर पर इंडोनेशिया में ईद के दौरान परोसी जाती है। भारत, पाकिस्तान और बाग्लादेश में शीर खुर्मा का महत्त्व है। फिलिस्तीन, सीरिया, लेबेनान, मिस्र, ईराक में मक्खन कुकीज़ बनायी जाती हैं।

ईद का दिन विश्वभर के मुसलमानों को यह त्यौहार मनाने के लिए एकजुट करता है। ईद अपने दोस्तों, परिवार और पड़ोसियों के साथ मनाने वाला जश्न है। मिलकर दावत मनाएं और आनन्द फैलाएं, खुशियां बांटे। ऐसा करने के लिए त्यौहार से बेहतर कोई दूसरा समय नहीं है।

1.https://theculturetrip.com/europe/united-kingdom/articles/the-10-most-delicious-eid-al-fitr-foods-and-dishes-from-around-the-world/
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Eid_cuisine
3.https://en.wikipedia.org/wiki/Eid_cuisine


क्यों नहीं इस्तेमाल कर रहे जौनपुरवासी सुलभ शौचालय?

Jaunpur District
14-06-2018 01:09 PM

सही ज्ञान ही स्वच्छता की कुंजी है और स्वच्छता निरोगी काया का सुख है। सही जानकारी और निरोगी काया, प्रत्येक व्यक्ति के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। भारतीय रिकार्ड के अनुसार, जब स्वच्छता की बात आती है, यह कथन मात्र कथन ही रह जाता है। पूरे भारत में ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का बोल-बाला है। जिसके तहत शौचालय क्रांति अपने उफान पर है। लेकिन यह जमीनी हकीकत नहीं है।

भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में हमारा जौनपुर जिला स्थित है। जौनपुर में खुले में शौच की समस्या से निजात पाने के लिए अति आवश्यक स्थानों पर बहुत से डीलक्स सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण करवाया गया है, जो निःशुल्क हैं। लेकिन ठेकेदार लोग रख-रखाव के नाम पर जनता से पैसे वसूल कर रहे हैं। सरकार के मुताबिक शौचालय का रख-रखाव ठेकेदार की जिम्मेदारी है, पैसा वसूलना नहीं। ठेकेदार द्वारा पैसा वसूलने के कारण लोग खुले में ही शौच जा रहे हैं। जिस कारण स्वास्थ्य सम्बंधित समस्याएं बढ़ रही हैं और बढ़ती महंगाई के चलते आर्थिक समस्या से जूझते हुए लोगों के पास सही इलाज की उपलब्धता नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठनों के अनुसार, स्वच्छता की कमी वाले शहरों और गांवों में हैजा, खसरा, दस्त, हिपेटाइटिस-ए और टायफाइड जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे गंदगीयुक्त स्थानों पर सबसे अधिक बाल मृत्यु होती हैं।

इस समस्या से लड़ने के लिए सरकार कई नए कदम उठा रही है और नए सुझाव सामने आ रहे हैं जैसे ट्विन टॉयलेट्स (Twin Toilets)। इसमें एक साथ दो शौचालय बनवाए जाते हैं ताकि जब एक शौचालय की पूर्ण क्षमता तक इस्तेमाल हो जाये तब उसे साल भर के लिए बंद करके दूसरे का इस्तेमाल किया जाये और साल भर में पहले शौचालय का सारा मॉल-मूत्र खाद बनके तैयार हो जाये। यूनिसेफ (UNICEF) के मुताबिक सही शौच में निवेश किया गया एक रुपया किसी दूसरे रूप में 4.3 रूपए की बचत में तब्दील हो सकता है। अतः सिर्फ सरकार के प्रयासों से इस समस्या का हल संभव नहीं है, परन्तु हम आम जनता को भी जागरूक होना होगा और दूसरों को भी जागरूक करना होगा।

1.https://qrius.com/heres-why-the-government-needs-to-make-sanitation-a-priority-soon/
2.https://www.jagran.com/uttar-pradesh/jaunpur-deluxe-toilets-made-in-the-city-showpiece-18049252.html


मुस्लिम संस्कृति दर्शाती फ़िल्में लुभाती हैं शिराज़-ए-हिन्द को

Jaunpur District
13-06-2018 01:53 PM

जौनपुर शहर पूर्व-मुग़ल काल सल्तनत पर प्रकाश डालता है। आज भी, पहली बार आने वाला पर्यटक अक्सर स्वीकार करता है कि अकबर पुल के चारों ओर पुराने शहर में घूमना, मानो ऐसा है जैसा कि मुगलकालीन फिल्मों के सेट पर घूमना। कुछ फिल्में हैं जोकि जौनपुर में हमेशा पंसदीदा होनी चाहिए, क्योंकि वे मुग़ल मनोदशा को बहुत अच्छे से दर्शाती हीं और भारत भर में ब्लॉकबस्टर हिट थीं, साथ ही साथ संयुक्त राष्ट्र् अरब, पाकिस्तान, ईरान और पूरे मुस्लिम देशों में भी।

भारत में मुस्लिम संस्कृति ने सदियों तक अपना आकार लिया है। मुगल साम्रज्य 1526-1857 के दौरान अपने चरम पर था। जबकि कई तरह से भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम संस्कृति हिन्दू संस्कृति के साथ मिली हुयी है, इसका अपना स्वयं का सुंदर और व्यक्तिगत चरित्र है, जो इसकी संस्कृति और प्रभाव के विशिष्ट और अचूक पहलू हैं। मुस्लिम संस्कृति की सुंदरता और लालित्य को बॉलीवुड फिल्मों में सफलता और प्रशंसा के साथ बार-बार प्रदर्शित किया गया है। फिल्मों में मुस्लिम शिष्टाचार, उत्कृष्ट उर्दू कविता और संवाद को सुंदर प्रेम कहानियों के साथ चित्रित कर दर्शाया है। यहां पर मुस्लिम संस्कृति को दर्शाती कुछ सर्वोत्तम फिल्मों के बारे में बताया जा रहा है।

मुगल-ए-आज़म (1960) फिल्म सलीम और अनारकली की प्रेम कहानी दिखाती है। जहां इस फिल्म में दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच सुंदर प्रेम देखने को मिलता है, वहीं दूसरी ओर नौशाद द्वारा रचित शानदार संगीत भी हमें फिल्म की ओर खींचता है, जैसे ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’, ‘तेरी महफ़िल में किस्मत’, ‘ऐ मोहब्बत जिन्दाबाद’ आदि। लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जैसे महान गायकों ने फिल्म के गीतों को अपनी आवाज देकर सदा के लिए अमर बना दिया। सेट और वेशभूषा काफी बड़ा और शानदार तरीके से तैयार किये गये थे। मुगलों को आंनद देने वाली भव्य जीवन शैली और उत्कृष्ट उर्दू संवाद फिल्म की जान है। इस ‘ब्लैक एण्ड वाइट’ (Black & White) फिल्म को 2004 में रंग भरके नवीनीकृत करके फिर से रिलीज़ किया गया था।

पाकीज़ा (1972) फिल्म लगभग 14 सालों में बनकर तैयार हुयी। पाकिज़ा को मीना कुमारी के जीवनकाल की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक माना जाता है और यही उनकी आखिरी फिल्म भी है, क्योंकि फिल्म के रिलीज़ होने के कुछ सप्ताह बाद ही मीना कुमारी की मृत्यु भी हो गयी थी। इस फिल्म में बहुत से सुंदर दृश्य और संवाद थे। इस फिल्म की गजलें- कैफी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी, कैफ भोपाली और कमल अमरोही जैसे दिग्गजों द्वारा बहुत सुंदर तरीके से लिखी गयी थीं। लेकिन फिल्म के लिए लिखे गये 18 गानों में से सिर्फ 9 गानों को ही फिल्म में जगह मिल पायी थी। इस फिल्म में मीना कुमारी और राजकुमार द्वारा मुख्य भूमिका निभाई गयी थी। इसके गानों ने फिल्म पर चार चांद लगा दिये थे। लता मंगेशकर ने एक बार फिर अपनी आवाज से हमें अपनी ओर खींच लिया। मीना कुमारी का नृत्य यादगार बन गया। फिल्म में कथक की झलक हमें देखने को मिलती है।

इसी श्रेणी में ‘जोधा अकबर’ (2008), ‘अनारकली’ (1953), ‘ताजमहल’ (1963), ‘उमराव जान’ (1981), ‘जहां आरा’ (1964), ‘चौदहवीं का चाँद’ (1960), ‘शतरंज के खिलाड़ी’ (1977) आदि भी शामिल हैं। इन मुग़ल झुकाव वाली फिल्मों से हमारी संस्कृति पर भी एक प्रभाव पड़ता है। इनमें इस्तेमाल किये गए उर्दू, अरबी और फ़ारसी के कुछ शब्द आज इतने सामान्य रूप से इस्तेमाल होने लगे हैं कि वे हिंदी के ही प्रतीत होने लगे हैं, जैसे कुछ शब्द हैं – मोहब्बत (अरबी), ज़िंदगी (फ़ारसी), जान-ए-वफ़ा (फ़ारसी), दिल (अरबी), खान (मंगोलियन), किस्मत (फ़ारसी), मुबारक (अरबी) आदि। तो ज़ाहिर है कि इन फिल्मों से हमारी भाषा और संस्कृति भी प्रभावित होती है।

1. https://www.theodysseyonline.com/8-historical-bollywood-films-display-muslim-culture
2. https://www.quora.com/How-has-the-Mughal-Empire-influenced-Bollywood-cinema


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